{"id":"1.2","title":"प्रथम स्कन्ध · अध्याय 2","part":"प्रथम स्कन्ध","heading":"अथ द्वितीयोऽध्यायः","topics":["भगवत्कथा और भगवद्भक्तिका माहात्म्य"],"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/2/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 1.2.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/2/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":1,"pages":[84,88]},"verses":[{"id":"1.2.1","number":1,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/2/1/","page":84,"speaker":"व्यास उवाच","sanskrit":["इति सम्प्रश्नसंहृष्टो विप्राणां रौमहर्षणिः।","प्रतिपूज्य वचस्तेषां प्रवक्तुमुपचक्रमे॥ १"],"iast":["iti sampraśnasaṃhṛṣṭo viprāṇāṃ raumaharṣaṇiḥ|","pratipūjya vacasteṣāṃ pravaktumupacakrame|| 1"],"meaning":"श्रीव्यासजी कहते हैं—शौनकादि ब्रह्मवादी ऋषियोंके ये प्रश्न सुनकर रोमहर्षणके पुत्र उग्रश्रवाको बड़ा ही आनन्द हुआ। उन्होंने ऋषियोंके इस मंगलमय प्रश्नका अभिनन्दन करके कहना आरम्भ किया॥ १॥"},{"id":"1.2.2","number":2,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/2/2/","page":84,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["यं प्रव्रजन्तमनुपेतमपेतकृत्यं","द्वैपायनो विरहकातर आजुहाव।","पुत्रेति तन्मयतया तरवोऽभिनेदु-","स्तं सर्वभूतहृदयं मुनिमानतोऽस्मि॥ २"],"iast":["yaṃ pravrajantamanupetamapetakṛtyaṃ","dvaipāyano virahakātara ājuhāva|","putreti tanmayatayā taravo'bhinedu-","staṃ sarvabhūtahṛdayaṃ munimānato'smi|| 2"],"meaning":"सूतजीने कहा—जिस समय श्रीशुकदेवजीका यज्ञोपवीत-संस्कार भी नहीं हुआ था, सुतरां लौकिक-वैदिक कर्मोंके अनुष्ठानका अवसर भी नहीं आया था, उन्हें अकेले ही संन्यास लेनेके उद्देश्यसे जाते देखकर उनके पिता व्यासजी विरहसे कातर होकर पुकारने लगे—‘बेटा! बेटा!’ उस समय तन्मय होनेके कारण श्रीशुकदेवजीकी ओरसे वृक्षोंने उत्तर दिया। ऐसे सबके हृदयमें विराजमान श्रीशुकदेव मुनिको मैं नमस्कार करता हूँ॥ २॥"},{"id":"1.2.3","number":3,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/2/3/","page":85,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["यः स्वानुभावमखिलश्रुतिसारमेक-","मध्यात्मदीपमतितितीर्षतां तमोऽन्धम्।","संसारिणां करुणयाऽऽह पुराणगुह्यं","तं व्याससूनुमुपयामि गुरुं मुनीनाम्॥ ३"],"iast":["yaḥ svānubhāvamakhilaśrutisārameka-","madhyātmadīpamatititīrṣatāṃ tamo'ndham|","saṃsāriṇāṃ karuṇayā''ha purāṇaguhyaṃ","taṃ vyāsasūnumupayāmi guruṃ munīnām|| 3"],"meaning":"यह श्रीमद्भागवत अत्यन्त गोपनीय—रहस्यात्मक पुराण है। यह भगवत्स्वरूपका अनुभव करानेवाला और समस्त वेदोंका सार है। संसारमें फँसे हुए जो लोग इस घोर अज्ञानान्धकारसे पार जाना चाहते हैं, उनके लिये आध्यात्मिक तत्त्वोंको प्रकाशित करानेवाला यह एक अद्वितीय दीपक है। वास्तवमें उन्हींपर करुणा करके बड़े-बड़े मुनियोंके आचार्य श्रीशुकदेवजीने इसका वर्णन किया है। मैं उनकी शरण ग्रहण करता हूँ॥ ३॥"},{"id":"1.2.4","number":4,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/2/4/","page":85,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।","देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्॥ ४"],"iast":["nārāyaṇaṃ namaskṛtya naraṃ caiva narottamam|","devīṃ sarasvatīṃ vyāsaṃ tato jayamudīrayet|| 4"],"meaning":"मनुष्योंमें सर्वश्रेष्ठ भगवान्‌के अवतार नर-नारायण ऋषियोंको, सरस्वती देवीको और श्रीव्यासदेवजीको नमस्कार करके तब संसार और अन्तःकरणके समस्त विकारोंपर विजय प्राप्त करानेवाले इस श्रीमद्भागवतमहापुराणका पाठ करना चाहिये॥ ४॥"},{"id":"1.2.5","number":5,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/2/5/","page":85,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["मुनयः साधु पृष्टोऽहं भवद्भिर्लोकमङ्गलम्।","यत्कृतः कृष्णसंप्रश्नो येनात्मा सुप्रसीदति॥ ५"],"iast":["munayaḥ sādhu pṛṣṭo'haṃ bhavadbhirlokamaṅgalam|","yatkṛtaḥ kṛṣṇasaṃpraśno yenātmā suprasīdati|| 5"],"meaning":"ऋषियो! आपने सम्पूर्ण विश्‍वके कल्याणके लिये यह बहुत सुन्दर प्रश्न किया है; क्योंकि यह प्रश्न श्रीकृष्णके सम्बन्धमें है और इससे भलीभाँति आत्मशुद्धि हो जाती है॥ ५॥"},{"id":"1.2.6","number":6,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/2/6/","page":85,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे।","अहैतुक्यप्रतिहता ययाऽऽत्मा सम्प्रसीदति॥ ६"],"iast":["sa vai puṃsāṃ paro dharmo yato bhaktiradhokṣaje|","ahaitukyapratihatā yayā''tmā samprasīdati|| 6"],"meaning":"मनुष्योंके लिये सर्वश्रेष्ठ धर्म वही है, जिससे भगवान् श्रीकृष्णमें भक्ति हो—भक्ति भी ऐसी, जिसमें किसी प्रकारकी कामना न हो और जो नित्य-निरन्तर बनी रहे; ऐसी भक्तिसे हृदय आनन्दस्वरूप परमात्माकी उपलब्धि करके कृतकृत्य हो जाता है॥ ६॥"},{"id":"1.2.7","number":7,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/2/7/","page":85,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["वासुदेवे भगवति भक्तियोगः प्रयोजितः।","जनयत्याशु वैराग्यं ज्ञानं च यदहैतुकम्॥ ७"],"iast":["vāsudeve bhagavati bhaktiyogaḥ prayojitaḥ|","janayatyāśu vairāgyaṃ jñānaṃ ca yadahaitukam|| 7"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्णमें भक्ति होते ही, अनन्य प्रेमसे उनमें चित्त जोड़ते ही निष्काम ज्ञान और वैराग्यका आविर्भाव हो जाता है॥ ७॥"},{"id":"1.2.8","number":8,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/2/8/","page":85,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["धर्मः स्वनुष्ठितः पुंसां विष्वक्सेनकथासु यः।","नोत्पादयेद्यदि रतिं श्रम एव हि केवलम्॥ ८"],"iast":["dharmaḥ svanuṣṭhitaḥ puṃsāṃ viṣvaksenakathāsu yaḥ|","notpādayedyadi ratiṃ śrama eva hi kevalam|| 8"],"meaning":"धर्मका ठीक-ठीक अनुष्ठान करनेपर भी यदि मनुष्यके हृदयमें भगवान्‌की लीला-कथाओंके प्रति अनुरागका उदय न हो तो वह निरा श्रम-ही-श्रम है॥ ८॥"},{"id":"1.2.9","number":9,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/2/9/","page":85,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["धर्मस्य ह्यापवर्ग्यस्य नार्थोऽर्थायोपकल्पते।","नार्थस्य धर्मैकान्तस्य कामो लाभाय हि स्मृतः॥ ९"],"iast":["dharmasya hyāpavargyasya nārtho'rthāyopakalpate|","nārthasya dharmaikāntasya kāmo lābhāya hi smṛtaḥ|| 9"],"meaning":"धर्मका फल है मोक्ष। उसकी सार्थकता अर्थप्राप्तिमें नहीं है। अर्थ केवल धर्मके लिये है। भोगविलास उसका फल नहीं माना गया है॥ ९॥"},{"id":"1.2.10","number":10,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/2/10/","page":85,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["कामस्य नेन्द्रियप्रीतिर्लाभो जीवेत यावता।","जीवस्य तत्त्वजिज्ञासा नार्थो यश्चेह कर्मभिः॥ १०"],"iast":["kāmasya nendriyaprītirlābho jīveta yāvatā|","jīvasya tattvajijñāsā nārtho yaśceha karmabhiḥ|| 10"],"meaning":"भोगविलासका फल इन्द्रियोंको तृप्त करना नहीं है, उसका प्रयोजन है केवल जीवननिर्वाह। जीवनका फल भी तत्त्वजिज्ञासा है। बहुत कर्म करके स्वर्गादि प्राप्त करना उसका फल नहीं है॥ १०॥"},{"id":"1.2.11","number":11,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/2/11/","page":85,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्।","ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते॥ ११"],"iast":["vadanti tattattvavidastattvaṃ yajjñānamadvayam|","brahmeti paramātmeti bhagavāniti śabdyate|| 11"],"meaning":"तत्त्ववेत्तालोग ज्ञाता और ज्ञेयके भेदसे रहित अखण्ड अद्वितीय सच्चिदानन्दस्वरूप ज्ञानको ही तत्त्व कहते हैं। उसीको कोई ब्रह्म, कोई परमात्मा और कोई भगवान्‌के नामसे पुकारते हैं॥ ११॥"},{"id":"1.2.12","number":12,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/2/12/","page":86,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["तच्छ्रद्दधाना मुनयो ज्ञानवैराग्ययुक्तया।","पश्यन्त्यात्मनि चात्मानं भक्‍त्या श्रुतगृहीतया॥ १२"],"iast":["tacchraddadhānā munayo jñānavairāgyayuktayā|","paśyantyātmani cātmānaṃ bhaktyā śrutagṛhītayā|| 12"],"meaning":"श्रद्धालु मुनिजन भागवतश्रवणसे प्राप्त ज्ञान-वैराग्ययुक्त भक्तिसे अपने हृदयमें उस परमतत्त्वरूप परमात्माका अनुभव करते हैं॥ १२॥"},{"id":"1.2.13","number":13,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/2/13/","page":86,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["अतः पुम्भिर्द्विजश्रेष्ठा वर्णाश्रमविभागशः।","स्वनुष्ठितस्य धर्मस्य संसिद्धिर्हरितोषणम्॥ १३"],"iast":["ataḥ pumbhirdvijaśreṣṭhā varṇāśramavibhāgaśaḥ|","svanuṣṭhitasya dharmasya saṃsiddhirharitoṣaṇam|| 13"],"meaning":"शौनकादि ऋषियो! यही कारण है कि अपने-अपने वर्ण तथा आश्रमके अनुसार मनुष्य जो धर्मका अनुष्ठान करते हैं, उसकी पूर्ण सिद्धि इसीमें है कि भगवान् प्रसन्‍न हों॥ १३॥"},{"id":"1.2.14","number":14,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/2/14/","page":86,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["तस्मादेकेन मनसा भगवान् सात्वतां पतिः।","श्रोतव्यः कीर्तितव्यश्‍च ध्येयः पूज्यश्‍च नित्यदा॥ १४"],"iast":["tasmādekena manasā bhagavān sātvatāṃ patiḥ|","śrotavyaḥ kīrtitavyaśca dhyeyaḥ pūjyaśca nityadā|| 14"],"meaning":"इसलिये एकाग्र मनसे भक्तवत्सल भगवान्‌का ही नित्य-निरन्तर श्रवण, कीर्तन, ध्यान और आराधन करना चाहिये॥ १४॥"},{"id":"1.2.15","number":15,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/2/15/","page":86,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["यदनुध्यासिना युक्ताः कर्मग्रन्थिनिबन्धनम्।","छिन्दन्ति कोविदास्तस्य को न कुर्यात्कथारतिम्॥ १५"],"iast":["yadanudhyāsinā yuktāḥ karmagranthinibandhanam|","chindanti kovidāstasya ko na kuryātkathāratim|| 15"],"meaning":"कर्मोंकी गाँठ बड़ी कड़ी है। विचारवान् पुरुष भगवान्‌के चिन्तनकी तलवारसे उस गाँठको काट डालते हैं। तब भला, ऐसा कौन मनुष्य होगा, जो भगवान्‌की लीलाकथामें प्रेम न करे॥ १५॥"},{"id":"1.2.16","number":16,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/2/16/","page":86,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["शुश्रूषोः श्रद्दधानस्य वासुदेवकथारुचिः।","स्यान्महत्सेवया विप्राः पुण्यतीर्थनिषेवणात्॥ १६"],"iast":["śuśrūṣoḥ śraddadhānasya vāsudevakathāruciḥ|","syānmahatsevayā viprāḥ puṇyatīrthaniṣevaṇāt|| 16"],"meaning":"शौनकादि ऋषियो! पवित्र तीर्थोंका सेवन करनेसे महत्सेवा, तदनन्तर श्रवणकी इच्छा, फिर श्रद्धा, तत्पश्चात् भगवत्-कथामें रुचि होती है॥ १६॥"},{"id":"1.2.17","number":17,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/2/17/","page":86,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["शृण्वतां स्वकथां कृष्णः पुण्यश्रवणकीर्तनः।","हृद्यन्तःस्थो ह्यभद्राणि विधुनोति सुहृत्सताम्॥ १७"],"iast":["śṛṇvatāṃ svakathāṃ kṛṣṇaḥ puṇyaśravaṇakīrtanaḥ|","hṛdyantaḥstho hyabhadrāṇi vidhunoti suhṛtsatām|| 17"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्णके यशका श्रवण और कीर्तन दोनों पवित्र करनेवाले हैं। वे अपनी कथा सुननेवालोंके हृदयमें आकर स्थित हो जाते हैं और उनकी अशुभ वासनाओंको नष्ट कर देते हैं; क्योंकि वे संतोंके नित्य सुहृद‍् हैं॥ १७॥"},{"id":"1.2.18","number":18,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/2/18/","page":86,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["नष्टप्रायेष्वभद्रेषु नित्यं भागवतसेवया।","भगवत्युत्तमश्लोके भक्तिर्भवति नैष्ठिकी॥ १८"],"iast":["naṣṭaprāyeṣvabhadreṣu nityaṃ bhāgavatasevayā|","bhagavatyuttamaśloke bhaktirbhavati naiṣṭhikī|| 18"],"meaning":"जब श्रीमद्भागवत अथवा भगवद्भक्तोंके निरन्तर सेवनसे अशुभ वासनाएँ नष्ट हो जाती हैं, तब पवित्रकीर्ति भगवान् श्रीकृष्णके प्रति स्थायी प्रेमकी प्राप्ति होती है॥ १८॥"},{"id":"1.2.19","number":19,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/2/19/","page":86,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["तदा रजस्तमोभावाः कामलोभादयश्‍च ये।","चेत एतैरनाविद्धं स्थितं सत्त्वे प्रसीदति॥ १९"],"iast":["tadā rajastamobhāvāḥ kāmalobhādayaśca ye|","ceta etairanāviddhaṃ sthitaṃ sattve prasīdati|| 19"],"meaning":"तब रजोगुण और तमोगुणके भाव—काम और लोभादि शान्त हो जाते हैं और चित्त इनसे रहित होकर सत्त्वगुणमें स्थित एवं निर्मल हो जाता है॥ १९॥"},{"id":"1.2.20","number":20,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/2/20/","page":86,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["एवं प्रसन्‍नमनसो भगवद्भक्तियोगतः।","भगवत्तत्त्वविज्ञानं मुक्तसङ्गस्य जायते॥ २०"],"iast":["evaṃ prasannamanaso bhagavadbhaktiyogataḥ|","bhagavattattvavijñānaṃ muktasaṅgasya jāyate|| 20"],"meaning":"इस प्रकार भगवान्‌की प्रेममयी भक्तिसे जब संसारकी समस्त आसक्तियाँ मिट जाती हैं, हृदय आनन्दसे भर जाता है, तब भगवान्‌के तत्त्वका अनुभव अपने-आप हो जाता है॥ २०॥"},{"id":"1.2.21","number":21,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/2/21/","page":86,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः।","क्षीयन्ते चास्य कर्माणि दृष्ट एवात्मनीश्‍वरे॥ २१"],"iast":["bhidyate hṛdayagranthiśchidyante sarvasaṃśayāḥ|","kṣīyante cāsya karmāṇi dṛṣṭa evātmanīśvare|| 21"],"meaning":"हृदयमें आत्मस्वरूप भगवान्‌का साक्षात्कार होते ही हृदयकी ग्रन्थि टूट जाती है, सारे सन्देह मिट जाते हैं और कर्मबन्धन क्षीण हो जाता है॥ २१॥"},{"id":"1.2.22","number":22,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/2/22/","page":86,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["अतो वै कवयो नित्यं भक्तिं परमया मुदा।","वासुदेवे भगवति कुर्वन्त्यात्मप्रसादनीम्॥ २२"],"iast":["ato vai kavayo nityaṃ bhaktiṃ paramayā mudā|","vāsudeve bhagavati kurvantyātmaprasādanīm|| 22"],"meaning":"इसीसे बुद्धिमान् लोग नित्य-निरन्तर बड़े आनन्दसे भगवान् श्रीकृष्णके प्रति प्रेम-भक्ति करते हैं, जिससे आत्मप्रसादकी प्राप्ति होती है॥ २२॥"},{"id":"1.2.23","number":23,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/2/23/","page":87,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["सत्त्वं रजस्तम इति प्रकृतेर्गुणास्तैर्युक्तः परः पुरुष एक इहास्य धत्ते।","स्थित्यादये हरिविरिञ्चिहरेति संज्ञाः श्रेयांसि तत्र खलु सत्त्वतनोर्नृणां स्युः॥ २३"],"iast":["sattvaṃ rajastama iti prakṛterguṇāstairyuktaḥ paraḥ puruṣa eka ihāsya dhatte|","sthityādaye hariviriñcihareti saṃjñāḥ śreyāṃsi tatra khalu sattvatanornṛṇāṃ syuḥ|| 23"],"meaning":"प्रकृतिके तीन गुण हैं—सत्त्व, रज और तम। इनको स्वीकार करके इस संसारकी स्थिति, उत्पत्ति और प्रलयके लिये एक अद्वितीय परमात्मा ही विष्णु, ब्रह्मा और रुद्र—ये तीन नाम ग्रहण करते हैं। फिर भी मनुष्योंका परम कल्याण तो सत्त्वगुण स्वीकार करनेवाले श्रीहरिसे ही होता है॥ २३॥"},{"id":"1.2.24","number":24,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/2/24/","page":87,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["पार्थिवाद्दारुणो धूमस्तस्मादग्‍निस्त्रयीमयः।","तमसस्तु रजस्तस्मात्सत्त्वं यद्ब्रह्मदर्शनम्॥ २४"],"iast":["pārthivāddāruṇo dhūmastasmādagnistrayīmayaḥ|","tamasastu rajastasmātsattvaṃ yadbrahmadarśanam|| 24"],"meaning":"जैसे पृथ्वीके विकार लकड़ीकी अपेक्षा धुआँ श्रेष्ठ है और उससे भी श्रेष्ठ है अग्‍नि—क्योंकि वेदोक्त यज्ञ-यागादिके द्वारा अग्‍नि सद्गति देनेवाला है—वैसे ही तमोगुणसे रजोगुण श्रेष्ठ है और रजोगुणसे भी सत्त्वगुण श्रेष्ठ है; क्योंकि वह भगवान्‌का दर्शन करानेवाला है॥ २४॥"},{"id":"1.2.25","number":25,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/2/25/","page":87,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["भेजिरे मुनयोऽथाग्रे भगवन्तमधोक्षजम्।","सत्त्वं विशुद्धं क्षेमाय कल्पन्ते येऽनु तानिह॥ २५"],"iast":["bhejire munayo'thāgre bhagavantamadhokṣajam|","sattvaṃ viśuddhaṃ kṣemāya kalpante ye'nu tāniha|| 25"],"meaning":"प्राचीन युगमें महात्मालोग अपने कल्याणके लिये विशुद्ध सत्त्वमय भगवान् विष्णुकी ही आराधना किया करते थे। अब भी जो लोग उनका अनुसरण करते हैं, वे उन्हींके समान कल्याणभाजन होते हैं॥ २५॥"},{"id":"1.2.26","number":26,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/2/26/","page":87,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["मुमुक्षवो घोररूपान् हित्वा भूतपतीनथ।","नारायणकलाः शान्ता भजन्ति ह्यनसूयवः॥ २६"],"iast":["mumukṣavo ghorarūpān hitvā bhūtapatīnatha|","nārāyaṇakalāḥ śāntā bhajanti hyanasūyavaḥ|| 26"],"meaning":"जो लोग इस संसारसागरसे पार जाना चाहते हैं, वे यद्यपि किसीकी निन्दा तो नहीं करते, न किसीमें दोष ही देखते हैं, फिर भी घोररूपवाले—तमोगुणी-रजोगुणी भैरवादि भूतपतियोंकी उपासना न करके सत्त्वगुणी विष्णुभगवान् और उनके अंश—कलास्वरूपोंका ही भजन करते हैं॥ २६॥"},{"id":"1.2.27","number":27,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/2/27/","page":87,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["रजस्तमःप्रकृतयः समशीला भजन्ति वै।","पितृभूतप्रजेशादीन् श्रियैश्‍वर्यप्रजेप्सवः॥ २७"],"iast":["rajastamaḥprakṛtayaḥ samaśīlā bhajanti vai|","pitṛbhūtaprajeśādīn śriyaiśvaryaprajepsavaḥ|| 27"],"meaning":"परन्तु जिसका स्वभाव रजोगुणी अथवा तमोगुणी है, वे धन, ऐश्‍वर्य और संतानकी कामनासे भूत, पितर और प्रजापतियोंकी उपासना करते हैं; क्योंकि इन लोगोंका स्वभाव उन (भूतादि)-से मिलता-जुलता होता है॥ २७॥"},{"id":"1.2.28","number":28,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/2/28/","page":87,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["वासुदेवपरा वेदा वासुदेवपरा मखाः।","वासुदेवपरा योगा वासुदेवपराः क्रियाः॥ २८"],"iast":["vāsudevaparā vedā vāsudevaparā makhāḥ|","vāsudevaparā yogā vāsudevaparāḥ kriyāḥ|| 28"],"meaning":"वेदोंका तात्पर्य श्रीकृष्णमें ही है। यज्ञोंके उद्देश्य श्रीकृष्ण ही हैं। योग श्रीकृष्णके लिये ही किये जाते हैं और समस्त कर्मोंकी परिसमाप्ति भी श्रीकृष्णमें ही है॥ २८॥"},{"id":"1.2.29","number":29,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/2/29/","page":87,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["वासुदेवपरं ज्ञानं वासुदेवपरं तपः।","वासुदेवपरो धर्मो वासुदेवपरा गतिः॥ २९"],"iast":["vāsudevaparaṃ jñānaṃ vāsudevaparaṃ tapaḥ|","vāsudevaparo dharmo vāsudevaparā gatiḥ|| 29"],"meaning":"ज्ञानसे ब्रह्मस्वरूप श्रीकृष्णकी ही प्राप्ति होती है। तपस्या श्रीकृष्णकी प्रसन्‍नताके लिये ही की जाती है। श्रीकृष्णके लिये ही धर्मोंका अनुष्ठान होता है और सब गतियाँ श्रीकृष्णमें ही समा जाती हैं॥ २९॥"},{"id":"1.2.30","number":30,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/2/30/","page":87,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["स एवेदं ससर्जाग्रे भगवानात्ममायया।","सदसद्रूपया चासौ गुणमय्यागुणो विभुः॥ ३०"],"iast":["sa evedaṃ sasarjāgre bhagavānātmamāyayā|","sadasadrūpayā cāsau guṇamayyāguṇo vibhuḥ|| 30"],"meaning":"यद्यपि भगवान् श्रीकृष्ण प्रकृति और उसके गुणोंसे अतीत हैं, फिर भी अपनी गुणमयी मायासे, जो प्रपंचकी दृष्टिसे है और तत्त्वकी दृष्टिसे नहीं है—उन्होंने ही सर्गके आदिमें इस संसारकी रचना की थी॥ ३०॥"},{"id":"1.2.31","number":31,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/2/31/","page":88,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["तया विलसितेष्वेषु गुणेषु गुणवानिव।","अन्तःप्रविष्ट आभाति विज्ञानेन विजृम्भितः॥ ३१"],"iast":["tayā vilasiteṣveṣu guṇeṣu guṇavāniva|","antaḥpraviṣṭa ābhāti vijñānena vijṛmbhitaḥ|| 31"],"meaning":"ये सत्त्व, रज और तम—तीनों गुण उसी मायाके विलास हैं; इनके भीतर रहकर भगवान् इनसे युक्त-सरीखे मालूम पड़ते हैं। वास्तवमें तो वे परिपूर्ण विज्ञानानन्दघन हैं॥ ३१॥"},{"id":"1.2.32","number":32,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/2/32/","page":88,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["यथा ह्यवहितो वह्निर्दारुष्वेकः स्वयोनिषु।","नानेव भाति विश्वात्मा भूतेषु च तथा पुमान्॥ ३२"],"iast":["yathā hyavahito vahnirdāruṣvekaḥ svayoniṣu|","nāneva bhāti viśvātmā bhūteṣu ca tathā pumān|| 32"],"meaning":"अग्‍नि तो वस्तुतः एक ही है, परंतु जब वह अनेक प्रकारकी लकड़ियोंमें प्रकट होती है तब अनेक-सी मालूम पड़ती है। वैसे ही सबके आत्मरूप भगवान् तो एक ही हैं, परंतु प्राणियोंकी अनेकतासे अनेक-जैसे जान पड़ते हैं॥ ३२॥"},{"id":"1.2.33","number":33,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/2/33/","page":88,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["असौ गुणमयैर्भावैर्भूतसूक्ष्मेन्द्रियात्मभिः।","स्वनिर्मितेषु निर्विष्टो भुङ्क्ते भूतेषु तद‍्गुणान्॥ ३३"],"iast":["asau guṇamayairbhāvairbhūtasūkṣmendriyātmabhiḥ|","svanirmiteṣu nirviṣṭo bhuṅkte bhūteṣu tadguṇān|| 33"],"meaning":"भगवान् ही सूक्ष्म भूत—तन्मात्रा, इन्द्रिय तथा अन्तःकरण आदि गुणोंके विकारभूत भावोंके द्वारा नाना प्रकारकी योनियोंका निर्माण करते हैं और उनमें भिन्‍न-भिन्‍न जीवोंके रूपमें प्रवेश करके उन-उन योनियोंके अनुरूप विषयोंका उपभोग करते-कराते हैं॥ ३३॥"},{"id":"1.2.34","number":34,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/2/34/","page":88,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["भावयत्येष सत्त्वेन लोकान् वै लोकभावनः।","लीलावतारानुरतो देवतिर्यङ्नरादिषु॥ ३४"],"iast":["bhāvayatyeṣa sattvena lokān vai lokabhāvanaḥ|","līlāvatārānurato devatiryaṅnarādiṣu|| 34"],"meaning":"वे ही सम्पूर्ण लोकोंकी रचना करते हैं और देवता, पशु-पक्षी, मनुष्य आदि योनियोंमें लीलावतार ग्रहण करके सत्त्वगुणके द्वारा जीवोंका पालन-पोषण करते हैं॥ ३४॥"}],"text":[{"b":1899,"kind":"adhyaya_heading","page":84,"text":"अथ द्वितीयोऽध्यायः"},{"b":1900,"kind":"topic_heading","page":84,"text":"भगवत्कथा और भगवद्भक्तिका माहात्म्य"},{"b":1901,"kind":"topic_heading","page":84,"text":"व्यास उवाच"},{"b":1902,"kind":"sanskrit_shloka","page":84,"verses":["1.2.1"],"text":"इति सम्प्रश्नसंहृष्टो विप्राणां रौमहर्षणिः।"},{"b":1903,"kind":"sanskrit_shloka","page":84,"verses":["1.2.1"],"text":"प्रतिपूज्य वचस्तेषां प्रवक्तुमुपचक्रमे॥ १"},{"b":1904,"kind":"hindi_commentary","page":84,"explains":["1.2.1"],"text":"श्रीव्यासजी कहते हैं—शौनकादि ब्रह्मवादी ऋषियोंके ये प्रश्न सुनकर रोमहर्षणके पुत्र उग्रश्रवाको बड़ा ही आनन्द हुआ। उन्होंने ऋषियोंके इस मंगलमय प्रश्नका अभिनन्दन करके कहना आरम्भ किया॥ १॥"},{"b":1905,"kind":"topic_heading","page":84,"text":"सूत उवाच"},{"b":1906,"kind":"sanskrit_shloka","page":84,"verses":["1.2.2"],"text":"यं प्रव्रजन्तमनुपेतमपेतकृत्यं"},{"b":1907,"kind":"sanskrit_shloka","page":84,"verses":["1.2.2"],"text":"द्वैपायनो विरहकातर आजुहाव।"},{"b":1908,"kind":"sanskrit_shloka","page":84,"verses":["1.2.2"],"text":"पुत्रेति तन्मयतया तरवोऽभिनेदु-"},{"b":1909,"kind":"sanskrit_shloka","page":84,"verses":["1.2.2"],"text":"स्तं सर्वभूतहृदयं मुनिमानतोऽस्मि॥ २"},{"b":1910,"kind":"hindi_commentary","page":84,"explains":["1.2.2"],"text":"सूतजीने कहा—जिस समय श्रीशुकदेवजीका यज्ञोपवीत-संस्कार भी नहीं हुआ था, सुतरां लौकिक-वैदिक कर्मोंके अनुष्ठानका अवसर भी नहीं आया था, उन्हें अकेले ही संन्यास लेनेके उद्देश्यसे जाते देखकर उनके पिता व्यासजी विरहसे कातर होकर पुकारने लगे—‘बेटा! बेटा!’ उस समय तन्मय होनेके कारण श्रीशुकदेवजीकी ओरसे वृक्षोंने उत्तर दिया। ऐसे सबके हृदयमें विराजमान श्रीशुकदेव मुनिको मैं नमस्कार करता हूँ॥ २॥"},{"b":1911,"kind":"sanskrit_shloka","page":85,"verses":["1.2.3"],"text":"यः स्वानुभावमखिलश्रुतिसारमेक-"},{"b":1912,"kind":"sanskrit_shloka","page":85,"verses":["1.2.3"],"text":"मध्यात्मदीपमतितितीर्षतां तमोऽन्धम्।"},{"b":1913,"kind":"sanskrit_shloka","page":85,"verses":["1.2.3"],"text":"संसारिणां करुणयाऽऽह पुराणगुह्यं"},{"b":1914,"kind":"sanskrit_shloka","page":85,"verses":["1.2.3"],"text":"तं व्याससूनुमुपयामि गुरुं मुनीनाम्॥ ३"},{"b":1915,"kind":"sanskrit_shloka","page":85,"verses":["1.2.4"],"text":"नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।"},{"b":1916,"kind":"sanskrit_shloka","page":85,"verses":["1.2.4"],"text":"देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्॥ ४"},{"b":1917,"kind":"hindi_commentary","page":85,"explains":["1.2.3","1.2.4"],"text":"यह श्रीमद्भागवत अत्यन्त गोपनीय—रहस्यात्मक पुराण है। यह भगवत्स्वरूपका अनुभव करानेवाला और समस्त वेदोंका सार है। संसारमें फँसे हुए जो लोग इस घोर अज्ञानान्धकारसे पार जाना चाहते हैं, उनके लिये आध्यात्मिक तत्त्वोंको प्रकाशित करानेवाला यह एक अद्वितीय दीपक है। वास्तवमें उन्हींपर करुणा करके बड़े-बड़े मुनियोंके आचार्य श्रीशुकदेवजीने इसका वर्णन किया है। मैं उनकी शरण ग्रहण करता हूँ॥ ३॥ मनुष्योंमें सर्वश्रेष्ठ भगवान्‌के अवतार नर-नारायण ऋषियोंको, सरस्वती देवीको और श्रीव्यासदेवजीको नमस्कार करके तब संसार और अन्तःकरणके समस्त विकारोंपर विजय प्राप्त करानेवाले इस श्रीमद्भागवतमहापुराणका पाठ करना चाहिये॥ ४॥"},{"b":1918,"kind":"sanskrit_shloka","page":85,"verses":["1.2.5"],"text":"मुनयः साधु पृष्टोऽहं भवद्भिर्लोकमङ्गलम्।"},{"b":1919,"kind":"sanskrit_shloka","page":85,"verses":["1.2.5"],"text":"यत्कृतः कृष्णसंप्रश्नो येनात्मा सुप्रसीदति॥ ५"},{"b":1920,"kind":"sanskrit_shloka","page":85,"verses":["1.2.6"],"text":"स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे।"},{"b":1921,"kind":"sanskrit_shloka","page":85,"verses":["1.2.6"],"text":"अहैतुक्यप्रतिहता ययाऽऽत्मा सम्प्रसीदति॥ ६"},{"b":1922,"kind":"sanskrit_shloka","page":85,"verses":["1.2.7"],"text":"वासुदेवे भगवति भक्तियोगः प्रयोजितः।"},{"b":1923,"kind":"sanskrit_shloka","page":85,"verses":["1.2.7"],"text":"जनयत्याशु वैराग्यं ज्ञानं च यदहैतुकम्॥ ७"},{"b":1924,"kind":"sanskrit_shloka","page":85,"verses":["1.2.8"],"text":"धर्मः स्वनुष्ठितः पुंसां विष्वक्सेनकथासु यः।"},{"b":1925,"kind":"sanskrit_shloka","page":85,"verses":["1.2.8"],"text":"नोत्पादयेद्यदि रतिं श्रम एव हि केवलम्॥ ८"},{"b":1926,"kind":"sanskrit_shloka","page":85,"verses":["1.2.9"],"text":"धर्मस्य ह्यापवर्ग्यस्य नार्थोऽर्थायोपकल्पते।"},{"b":1927,"kind":"sanskrit_shloka","page":85,"verses":["1.2.9"],"text":"नार्थस्य धर्मैकान्तस्य कामो लाभाय हि स्मृतः॥ ९"},{"b":1928,"kind":"sanskrit_shloka","page":85,"verses":["1.2.10"],"text":"कामस्य नेन्द्रियप्रीतिर्लाभो जीवेत यावता।"},{"b":1929,"kind":"sanskrit_shloka","page":85,"verses":["1.2.10"],"text":"जीवस्य तत्त्वजिज्ञासा नार्थो यश्चेह कर्मभिः॥ १०"},{"b":1930,"kind":"sanskrit_shloka","page":85,"verses":["1.2.11"],"text":"वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्।"},{"b":1931,"kind":"sanskrit_shloka","page":85,"verses":["1.2.11"],"text":"ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते॥ ११"},{"b":1932,"kind":"hindi_commentary","page":85,"explains":["1.2.5","1.2.6","1.2.7","1.2.8","1.2.9","1.2.10","1.2.11"],"text":"ऋषियो! आपने सम्पूर्ण विश्‍वके कल्याणके लिये यह बहुत सुन्दर प्रश्न किया है; क्योंकि यह प्रश्न श्रीकृष्णके सम्बन्धमें है और इससे भलीभाँति आत्मशुद्धि हो जाती है॥ ५॥ मनुष्योंके लिये सर्वश्रेष्ठ धर्म वही है, जिससे भगवान् श्रीकृष्णमें भक्ति हो—भक्ति भी ऐसी, जिसमें किसी प्रकारकी कामना न हो और जो नित्य-निरन्तर बनी रहे; ऐसी भक्तिसे हृदय आनन्दस्वरूप परमात्माकी उपलब्धि करके कृतकृत्य हो जाता है॥ ६॥ भगवान् श्रीकृष्णमें भक्ति होते ही, अनन्य प्रेमसे उनमें चित्त जोड़ते ही निष्काम ज्ञान और वैराग्यका आविर्भाव हो जाता है॥ ७॥ धर्मका ठीक-ठीक अनुष्ठान करनेपर भी यदि मनुष्यके हृदयमें भगवान्‌की लीला-कथाओंके प्रति अनुरागका उदय न हो तो वह निरा श्रम-ही-श्रम है॥ ८॥ धर्मका फल है मोक्ष। उसकी सार्थकता अर्थप्राप्तिमें नहीं है। अर्थ केवल धर्मके लिये है। भोगविलास उसका फल नहीं माना गया है॥ ९॥ भोगविलासका फल इन्द्रियोंको तृप्त करना नहीं है, उसका प्रयोजन है केवल जीवननिर्वाह। जीवनका फल भी तत्त्वजिज्ञासा है। बहुत कर्म करके स्वर्गादि प्राप्त करना उसका फल नहीं है॥ १०॥ तत्त्ववेत्तालोग ज्ञाता और ज्ञेयके भेदसे रहित अखण्ड अद्वितीय सच्चिदानन्दस्वरूप ज्ञानको ही तत्त्व कहते हैं। उसीको कोई ब्रह्म, कोई परमात्मा और कोई भगवान्‌के नामसे पुकारते हैं॥ ११॥"},{"b":1933,"kind":"sanskrit_shloka","page":86,"verses":["1.2.12"],"text":"तच्छ्रद्दधाना मुनयो ज्ञानवैराग्ययुक्तया।"},{"b":1934,"kind":"sanskrit_shloka","page":86,"verses":["1.2.12"],"text":"पश्यन्त्यात्मनि चात्मानं भक्‍त्या श्रुतगृहीतया॥ १२"},{"b":1935,"kind":"sanskrit_shloka","page":86,"verses":["1.2.13"],"text":"अतः पुम्भिर्द्विजश्रेष्ठा वर्णाश्रमविभागशः।"},{"b":1936,"kind":"sanskrit_shloka","page":86,"verses":["1.2.13"],"text":"स्वनुष्ठितस्य धर्मस्य संसिद्धिर्हरितोषणम्॥ १३"},{"b":1937,"kind":"sanskrit_shloka","page":86,"verses":["1.2.14"],"text":"तस्मादेकेन मनसा भगवान् सात्वतां पतिः।"},{"b":1938,"kind":"sanskrit_shloka","page":86,"verses":["1.2.14"],"text":"श्रोतव्यः कीर्तितव्यश्‍च ध्येयः पूज्यश्‍च नित्यदा॥ १४"},{"b":1939,"kind":"sanskrit_shloka","page":86,"verses":["1.2.15"],"text":"यदनुध्यासिना युक्ताः कर्मग्रन्थिनिबन्धनम्।"},{"b":1940,"kind":"sanskrit_shloka","page":86,"verses":["1.2.15"],"text":"छिन्दन्ति कोविदास्तस्य को न कुर्यात्कथारतिम्॥ १५"},{"b":1941,"kind":"hindi_commentary","page":86,"explains":["1.2.12","1.2.13","1.2.14","1.2.15"],"text":"श्रद्धालु मुनिजन भागवतश्रवणसे प्राप्त ज्ञान-वैराग्ययुक्त भक्तिसे अपने हृदयमें उस परमतत्त्वरूप परमात्माका अनुभव करते हैं॥ १२॥ शौनकादि ऋषियो! यही कारण है कि अपने-अपने वर्ण तथा आश्रमके अनुसार मनुष्य जो धर्मका अनुष्ठान करते हैं, उसकी पूर्ण सिद्धि इसीमें है कि भगवान् प्रसन्‍न हों॥ १३॥ इसलिये एकाग्र मनसे भक्तवत्सल भगवान्‌का ही नित्य-निरन्तर श्रवण, कीर्तन, ध्यान और आराधन करना चाहिये॥ १४॥ कर्मोंकी गाँठ बड़ी कड़ी है। विचारवान् पुरुष भगवान्‌के चिन्तनकी तलवारसे उस गाँठको काट डालते हैं। तब भला, ऐसा कौन मनुष्य होगा, जो भगवान्‌की लीलाकथामें प्रेम न करे॥ १५॥"},{"b":1942,"kind":"sanskrit_shloka","page":86,"verses":["1.2.16"],"text":"शुश्रूषोः श्रद्दधानस्य वासुदेवकथारुचिः।"},{"b":1943,"kind":"sanskrit_shloka","page":86,"verses":["1.2.16"],"text":"स्यान्महत्सेवया विप्राः पुण्यतीर्थनिषेवणात्॥ १६"},{"b":1944,"kind":"sanskrit_shloka","page":86,"verses":["1.2.17"],"text":"शृण्वतां स्वकथां कृष्णः पुण्यश्रवणकीर्तनः।"},{"b":1945,"kind":"sanskrit_shloka","page":86,"verses":["1.2.17"],"text":"हृद्यन्तःस्थो ह्यभद्राणि विधुनोति सुहृत्सताम्॥ १७"},{"b":1946,"kind":"sanskrit_shloka","page":86,"verses":["1.2.18"],"text":"नष्टप्रायेष्वभद्रेषु नित्यं भागवतसेवया।"},{"b":1947,"kind":"sanskrit_shloka","page":86,"verses":["1.2.18"],"text":"भगवत्युत्तमश्लोके भक्तिर्भवति नैष्ठिकी॥ १८"},{"b":1948,"kind":"sanskrit_shloka","page":86,"verses":["1.2.19"],"text":"तदा रजस्तमोभावाः कामलोभादयश्‍च ये।"},{"b":1949,"kind":"sanskrit_shloka","page":86,"verses":["1.2.19"],"text":"चेत एतैरनाविद्धं स्थितं सत्त्वे प्रसीदति॥ १९"},{"b":1950,"kind":"sanskrit_shloka","page":86,"verses":["1.2.20"],"text":"एवं प्रसन्‍नमनसो भगवद्भक्तियोगतः।"},{"b":1951,"kind":"sanskrit_shloka","page":86,"verses":["1.2.20"],"text":"भगवत्तत्त्वविज्ञानं मुक्तसङ्गस्य जायते॥ २०"},{"b":1952,"kind":"sanskrit_shloka","page":86,"verses":["1.2.21"],"text":"भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः।"},{"b":1953,"kind":"sanskrit_shloka","page":86,"verses":["1.2.21"],"text":"क्षीयन्ते चास्य कर्माणि दृष्ट एवात्मनीश्‍वरे॥ २१"},{"b":1954,"kind":"sanskrit_shloka","page":86,"verses":["1.2.22"],"text":"अतो वै कवयो नित्यं भक्तिं परमया मुदा।"},{"b":1955,"kind":"sanskrit_shloka","page":86,"verses":["1.2.22"],"text":"वासुदेवे भगवति कुर्वन्त्यात्मप्रसादनीम्॥ २२"},{"b":1956,"kind":"hindi_commentary","page":86,"explains":["1.2.16","1.2.17","1.2.18","1.2.19","1.2.20","1.2.21","1.2.22"],"text":"शौनकादि ऋषियो! पवित्र तीर्थोंका सेवन करनेसे महत्सेवा, तदनन्तर श्रवणकी इच्छा, फिर श्रद्धा, तत्पश्चात् भगवत्-कथामें रुचि होती है॥ १६॥ भगवान् श्रीकृष्णके यशका श्रवण और कीर्तन दोनों पवित्र करनेवाले हैं। वे अपनी कथा सुननेवालोंके हृदयमें आकर स्थित हो जाते हैं और उनकी अशुभ वासनाओंको नष्ट कर देते हैं; क्योंकि वे संतोंके नित्य सुहृद‍् हैं॥ १७॥ जब श्रीमद्भागवत अथवा भगवद्भक्तोंके निरन्तर सेवनसे अशुभ वासनाएँ नष्ट हो जाती हैं, तब पवित्रकीर्ति भगवान् श्रीकृष्णके प्रति स्थायी प्रेमकी प्राप्ति होती है॥ १८॥ तब रजोगुण और तमोगुणके भाव—काम और लोभादि शान्त हो जाते हैं और चित्त इनसे रहित होकर सत्त्वगुणमें स्थित एवं निर्मल हो जाता है॥ १९॥ इस प्रकार भगवान्‌की प्रेममयी भक्तिसे जब संसारकी समस्त आसक्तियाँ मिट जाती हैं, हृदय आनन्दसे भर जाता है, तब भगवान्‌के तत्त्वका अनुभव अपने-आप हो जाता है॥ २०॥ हृदयमें आत्मस्वरूप भगवान्‌का साक्षात्कार होते ही हृदयकी ग्रन्थि टूट जाती है, सारे सन्देह मिट जाते हैं और कर्मबन्धन क्षीण हो जाता है॥ २१॥ इसीसे बुद्धिमान् लोग नित्य-निरन्तर बड़े आनन्दसे भगवान् श्रीकृष्णके प्रति प्रेम-भक्ति करते हैं, जिससे आत्मप्रसादकी प्राप्ति होती है॥ २२॥"},{"b":1957,"kind":"sanskrit_shloka","page":87,"verses":["1.2.23"],"text":"सत्त्वं रजस्तम इति प्रकृतेर्गुणास्तैर्युक्तः परः पुरुष एक इहास्य धत्ते।"},{"b":1958,"kind":"sanskrit_shloka","page":87,"verses":["1.2.23"],"text":"स्थित्यादये हरिविरिञ्चिहरेति संज्ञाः श्रेयांसि तत्र खलु सत्त्वतनोर्नृणां स्युः॥ २३"},{"b":1959,"kind":"sanskrit_shloka","page":87,"verses":["1.2.24"],"text":"पार्थिवाद्दारुणो धूमस्तस्मादग्‍निस्त्रयीमयः।"},{"b":1960,"kind":"sanskrit_shloka","page":87,"verses":["1.2.24"],"text":"तमसस्तु रजस्तस्मात्सत्त्वं यद्ब्रह्मदर्शनम्॥ २४"},{"b":1961,"kind":"sanskrit_shloka","page":87,"verses":["1.2.25"],"text":"भेजिरे मुनयोऽथाग्रे भगवन्तमधोक्षजम्।"},{"b":1962,"kind":"sanskrit_shloka","page":87,"verses":["1.2.25"],"text":"सत्त्वं विशुद्धं क्षेमाय कल्पन्ते येऽनु तानिह॥ २५"},{"b":1963,"kind":"sanskrit_shloka","page":87,"verses":["1.2.26"],"text":"मुमुक्षवो घोररूपान् हित्वा भूतपतीनथ।"},{"b":1964,"kind":"sanskrit_shloka","page":87,"verses":["1.2.26"],"text":"नारायणकलाः शान्ता भजन्ति ह्यनसूयवः॥ २६"},{"b":1965,"kind":"sanskrit_shloka","page":87,"verses":["1.2.27"],"text":"रजस्तमःप्रकृतयः समशीला भजन्ति वै।"},{"b":1966,"kind":"sanskrit_shloka","page":87,"verses":["1.2.27"],"text":"पितृभूतप्रजेशादीन् श्रियैश्‍वर्यप्रजेप्सवः॥ २७"},{"b":1967,"kind":"sanskrit_shloka","page":87,"verses":["1.2.28"],"text":"वासुदेवपरा वेदा वासुदेवपरा मखाः।"},{"b":1968,"kind":"sanskrit_shloka","page":87,"verses":["1.2.28"],"text":"वासुदेवपरा योगा वासुदेवपराः क्रियाः॥ २८"},{"b":1969,"kind":"sanskrit_shloka","page":87,"verses":["1.2.29"],"text":"वासुदेवपरं ज्ञानं वासुदेवपरं तपः।"},{"b":1970,"kind":"sanskrit_shloka","page":87,"verses":["1.2.29"],"text":"वासुदेवपरो धर्मो वासुदेवपरा गतिः॥ २९"},{"b":1971,"kind":"sanskrit_shloka","page":87,"verses":["1.2.30"],"text":"स एवेदं ससर्जाग्रे भगवानात्ममायया।"},{"b":1972,"kind":"sanskrit_shloka","page":87,"verses":["1.2.30"],"text":"सदसद्रूपया चासौ गुणमय्यागुणो विभुः॥ ३०"},{"b":1973,"kind":"hindi_commentary","page":87,"explains":["1.2.23","1.2.24","1.2.25","1.2.26","1.2.27","1.2.28","1.2.29","1.2.30"],"text":"प्रकृतिके तीन गुण हैं—सत्त्व, रज और तम। इनको स्वीकार करके इस संसारकी स्थिति, उत्पत्ति और प्रलयके लिये एक अद्वितीय परमात्मा ही विष्णु, ब्रह्मा और रुद्र—ये तीन नाम ग्रहण करते हैं। फिर भी मनुष्योंका परम कल्याण तो सत्त्वगुण स्वीकार करनेवाले श्रीहरिसे ही होता है॥ २३॥ जैसे पृथ्वीके विकार लकड़ीकी अपेक्षा धुआँ श्रेष्ठ है और उससे भी श्रेष्ठ है अग्‍नि—क्योंकि वेदोक्त यज्ञ-यागादिके द्वारा अग्‍नि सद्गति देनेवाला है—वैसे ही तमोगुणसे रजोगुण श्रेष्ठ है और रजोगुणसे भी सत्त्वगुण श्रेष्ठ है; क्योंकि वह भगवान्‌का दर्शन करानेवाला है॥ २४॥ प्राचीन युगमें महात्मालोग अपने कल्याणके लिये विशुद्ध सत्त्वमय भगवान् विष्णुकी ही आराधना किया करते थे। अब भी जो लोग उनका अनुसरण करते हैं, वे उन्हींके समान कल्याणभाजन होते हैं॥ २५॥ जो लोग इस संसारसागरसे पार जाना चाहते हैं, वे यद्यपि किसीकी निन्दा तो नहीं करते, न किसीमें दोष ही देखते हैं, फिर भी घोररूपवाले—तमोगुणी-रजोगुणी भैरवादि भूतपतियोंकी उपासना न करके सत्त्वगुणी विष्णुभगवान् और उनके अंश—कलास्वरूपोंका ही भजन करते हैं॥ २६॥ परन्तु जिसका स्वभाव रजोगुणी अथवा तमोगुणी है, वे धन, ऐश्‍वर्य और संतानकी कामनासे भूत, पितर और प्रजापतियोंकी उपासना करते हैं; क्योंकि इन लोगोंका स्वभाव उन (भूतादि)-से मिलता-जुलता होता है॥ २७॥ वेदोंका तात्पर्य श्रीकृष्णमें ही है। यज्ञोंके उद्देश्य श्रीकृष्ण ही हैं। योग श्रीकृष्णके लिये ही किये जाते हैं और समस्त कर्मोंकी परिसमाप्ति भी श्रीकृष्णमें ही है॥ २८॥ ज्ञानसे ब्रह्मस्वरूप श्रीकृष्णकी ही प्राप्ति होती है। तपस्या श्रीकृष्णकी प्रसन्‍नताके लिये ही की जाती है। श्रीकृष्णके लिये ही धर्मोंका अनुष्ठान होता है और सब गतियाँ श्रीकृष्णमें ही समा जाती हैं॥ २९॥ यद्यपि भगवान् श्रीकृष्ण प्रकृति और उसके गुणोंसे अतीत हैं, फिर भी अपनी गुणमयी मायासे, जो प्रपंचकी दृष्टिसे है और तत्त्वकी दृष्टिसे नहीं है—उन्होंने ही सर्गके आदिमें इस संसारकी रचना की थी॥ ३०॥"},{"b":1974,"kind":"sanskrit_shloka","page":88,"verses":["1.2.31"],"text":"तया विलसितेष्वेषु गुणेषु गुणवानिव।"},{"b":1975,"kind":"sanskrit_shloka","page":88,"verses":["1.2.31"],"text":"अन्तःप्रविष्ट आभाति विज्ञानेन विजृम्भितः॥ ३१"},{"b":1976,"kind":"sanskrit_shloka","page":88,"verses":["1.2.32"],"text":"यथा ह्यवहितो वह्निर्दारुष्वेकः स्वयोनिषु।"},{"b":1977,"kind":"sanskrit_shloka","page":88,"verses":["1.2.32"],"text":"नानेव भाति विश्वात्मा भूतेषु च तथा पुमान्॥ ३२"},{"b":1978,"kind":"sanskrit_shloka","page":88,"verses":["1.2.33"],"text":"असौ गुणमयैर्भावैर्भूतसूक्ष्मेन्द्रियात्मभिः।"},{"b":1979,"kind":"sanskrit_shloka","page":88,"verses":["1.2.33"],"text":"स्वनिर्मितेषु निर्विष्टो भुङ्क्ते भूतेषु तद‍्गुणान्॥ ३३"},{"b":1980,"kind":"sanskrit_shloka","page":88,"verses":["1.2.34"],"text":"भावयत्येष सत्त्वेन लोकान् वै लोकभावनः।"},{"b":1981,"kind":"sanskrit_shloka","page":88,"verses":["1.2.34"],"text":"लीलावतारानुरतो देवतिर्यङ्नरादिषु॥ ३४"},{"b":1982,"kind":"hindi_commentary","page":88,"explains":["1.2.31","1.2.32","1.2.33","1.2.34"],"text":"ये सत्त्व, रज और तम—तीनों गुण उसी मायाके विलास हैं; इनके भीतर रहकर भगवान् इनसे युक्त-सरीखे मालूम पड़ते हैं। वास्तवमें तो वे परिपूर्ण विज्ञानानन्दघन हैं॥ ३१॥ अग्‍नि तो वस्तुतः एक ही है, परंतु जब वह अनेक प्रकारकी लकड़ियोंमें प्रकट होती है तब अनेक-सी मालूम पड़ती है। वैसे ही सबके आत्मरूप भगवान् तो एक ही हैं, परंतु प्राणियोंकी अनेकतासे अनेक-जैसे जान पड़ते हैं॥ ३२॥ भगवान् ही सूक्ष्म भूत—तन्मात्रा, इन्द्रिय तथा अन्तःकरण आदि गुणोंके विकारभूत भावोंके द्वारा नाना प्रकारकी योनियोंका निर्माण करते हैं और उनमें भिन्‍न-भिन्‍न जीवोंके रूपमें प्रवेश करके उन-उन योनियोंके अनुरूप विषयोंका उपभोग करते-कराते हैं॥ ३३॥ वे ही सम्पूर्ण लोकोंकी रचना करते हैं और देवता, पशु-पक्षी, मनुष्य आदि योनियोंमें लीलावतार ग्रहण करके सत्त्वगुणके द्वारा जीवोंका पालन-पोषण करते हैं॥ ३४॥"},{"b":1983,"kind":"hindi_translation","page":88,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे नैमिषीयोपाख्याने द्वितीयोऽध्यायः॥ २॥"}],"notes":[{"id":"v1:5","mark":"१","page":86,"after_verse":"1.2.12","text":"प्रा० पा०—युक्तयः।"},{"id":"v1:6","mark":"२","page":86,"after_verse":"1.2.18","text":"प्रा० पा०—भगवदाश्रयात्।"},{"id":"v1:7","mark":"१","page":87,"after_verse":"1.2.26","text":"प्रा० पा०—कलां।"},{"id":"v1:8","mark":"२","page":87,"after_verse":"1.2.26","text":"प्रा० 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