{"id":"10.1","title":"दशम स्कन्ध · अध्याय 1","part":"दशम स्कन्ध (पूर्वार्ध)","heading":"अथ प्रथमोऽध्यायः","topics":["भगवान्‌के द्वारा पृथ्वीको आश्‍वासन, वसुदेव-देवकीका विवाह और कंसके द्वारा देवकीके छः पुत्रोंकी हत्या"],"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 10.1.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[118,128]},"verses":[{"id":"10.1.1","number":1,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/1/","page":119,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["कथितो वंशविस्तारो भवता सोमसूर्ययोः।","राज्ञां चोभयवंश्यानां चरितं परमाद्भुतम्॥ १"],"iast":["kathito vaṃśavistāro bhavatā somasūryayoḥ|","rājñāṃ cobhayavaṃśyānāṃ caritaṃ paramādbhutam|| 1"],"meaning":"राजा परीक्षित‍्ने पूछा—भगवन्! आपने चन्द्रवंश और सूर्यवंशके विस्तार तथा दोनों वंशोंके राजाओंका अत्यन्त अद्भुत चरित्र वर्णन किया। भगवान्‌के परम प्रेमी मुनिवर! आपने स्वभावसे ही धर्मप्रेमी यदुवंशका भी विशद वर्णन किया। अब कृपा करके उसी वंशमें अपने अंश श्रीबलरामजीके साथ अवतीर्ण हुए भगवान् श्रीकृष्णके परम पवित्र चरित्र भी हमें सुनाइये॥ १-२॥","meaning_covers":[1,2]},{"id":"10.1.2","number":2,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/2/","page":119,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["यदोश्‍च धर्मशीलस्य नितरां मुनिसत्तम।","तत्रांशेनावतीर्णस्य विष्णोर्वीर्याणि शंस नः॥ २"],"iast":["yadośca dharmaśīlasya nitarāṃ munisattama|","tatrāṃśenāvatīrṇasya viṣṇorvīryāṇi śaṃsa naḥ|| 2"],"meaning":"राजा परीक्षित‍्ने पूछा—भगवन्! आपने चन्द्रवंश और सूर्यवंशके विस्तार तथा दोनों वंशोंके राजाओंका अत्यन्त अद्भुत चरित्र वर्णन किया। भगवान्‌के परम प्रेमी मुनिवर! आपने स्वभावसे ही धर्मप्रेमी यदुवंशका भी विशद वर्णन किया। अब कृपा करके उसी वंशमें अपने अंश श्रीबलरामजीके साथ अवतीर्ण हुए भगवान् श्रीकृष्णके परम पवित्र चरित्र भी हमें सुनाइये॥ १-२॥","meaning_covers":[1,2]},{"id":"10.1.3","number":3,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/3/","page":119,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["अवतीर्य यदोर्वंशे भगवान् भूतभावनः।","कृतवान् यानि विश्‍वात्मा तानि नो वद विस्तरात्॥ ३"],"iast":["avatīrya yadorvaṃśe bhagavān bhūtabhāvanaḥ|","kṛtavān yāni viśvātmā tāni no vada vistarāt|| 3"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्ण समस्त प्राणियोंके जीवनदाता एवं सर्वात्मा हैं। उन्होंने यदुवंशमें अवतार लेकर जो-जो लीलाएँ कीं, उनका विस्तारसे हमलोगोंको श्रवण कराइये॥ ३॥"},{"id":"10.1.4","number":4,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/4/","page":119,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["निवृत्ततर्षैरुपगीयमानाद् भवौषधाच्छ्रोत्रमनोऽभिरामात् ।","क उत्तमश्‍लोकगुणानुवादात् पुमान् विरज्येत विना पशुघ्नात्॥ ४"],"iast":["nivṛttatarṣairupagīyamānād bhavauṣadhācchrotramano'bhirāmāt |","ka uttamaślokaguṇānuvādāt pumān virajyeta vinā paśughnāt|| 4"],"meaning":"जिनकी तृष्णाकी प्यास सर्वदाके लिये बुझ चुकी है, वे जीवन्मुक्त महापुरुष जिसका पूर्ण प्रेमसे अतृप्त रहकर गान किया करते हैं, मुमुक्षुजनोंके लिये जो भवरोगका रामबाण औषध है तथा विषयी लोगोंके लिये भी उनके कान और मनको परम आह्लाद देनेवाला है, भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रके ऐसे सुन्दर, सुखद, रसीले, गुणानुवादसे पशुघाती अथवा आत्मघाती मनुष्यके अतिरिक्त और ऐसा कौन है जो विमुख हो जाय, उससे प्रीति न करे?॥ ४॥"},{"id":"10.1.5","number":5,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/5/","page":119,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["पितामहा मे समरेऽमरंजयैर्देवव्रताद्यातिरथैस्तिमिंगिलैः ।","दुरत्ययं कौरवसैन्यसागरं कृत्वातरन् वत्सपदं स्म यत्प्लवाः॥ ५"],"iast":["pitāmahā me samare'maraṃjayairdevavratādyātirathaistimiṃgilaiḥ |","duratyayaṃ kauravasainyasāgaraṃ kṛtvātaran vatsapadaṃ sma yatplavāḥ|| 5"],"meaning":"(श्रीकृष्ण तो मेरे कुलदेव ही हैं।) जब कुरुक्षेत्रमें महाभारत-युद्ध हो रहा था और देवताओंको भी जीत लेनेवाले भीष्मपितामह आदि अतिरथियोंसे मेरे दादा पाण्डवोंका युद्ध हो रहा था, उस समय कौरवोंकी सेना उनके लिये अपार समुद्रके समान थी—जिसमें भीष्म आदि वीर बड़े-बड़े मच्छोंको भी निगल जानेवाले तिमिंगिल मच्छोंकी भाँति भय उत्पन्‍न कर रहे थे। परन्तु मेरे स्वनामधन्य पितामह भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी नौकाका आश्रय लेकर उस समुद्रको अनायास ही पार कर गये—ठीक वैसे ही जैसे कोई मार्गमें चलता हुआ स्वभावसे ही बछड़ेके खुरका गड्ढा पार कर जाय॥ ५॥"},{"id":"10.1.6","number":6,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/6/","page":120,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["द्रौण्यस्त्रविप्लुष्टमिदं मदंगं सन्तानबीजं कुरुपाण्डवानाम्।","जुगोप कुक्षिंगत आत्तचक्रो मातुश्‍च मे यः शरणं गतायाः॥ ६"],"iast":["drauṇyastravipluṣṭamidaṃ madaṃgaṃ santānabījaṃ kurupāṇḍavānām|","jugopa kukṣiṃgata āttacakro mātuśca me yaḥ śaraṇaṃ gatāyāḥ|| 6"],"meaning":"महाराज! मेरा यह शरीर—जो आपके सामने है तथा जो कौरव और पाण्डव दोनों ही वंशोंका एकमात्र सहारा था—अश्‍वत्थामाके ब्रह्मास्त्रसे जल चुका था। उस समय मेरी माता जब भगवान्‌की शरणमें गयीं, तब उन्होंने हाथमें चक्र लेकर मेरी माताके गर्भमें प्रवेश किया और मेरी रक्षा की॥ ६॥"},{"id":"10.1.7","number":7,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/7/","page":120,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["वीर्याणि तस्याखिलदेहभाजामन्तर्बहिः पूरुषकालरूपैः।","प्रयच्छतो मृत्युमुतामृतं च मायामनुष्यस्य वदस्व विद्वन्॥ ७"],"iast":["vīryāṇi tasyākhiladehabhājāmantarbahiḥ pūruṣakālarūpaiḥ|","prayacchato mṛtyumutāmṛtaṃ ca māyāmanuṣyasya vadasva vidvan|| 7"],"meaning":"(केवल मेरी ही बात नहीं,) वे समस्त शरीरधारियोंके भीतर आत्मारूपसे रहकर अमृतत्वका दान कर रहे हैं और बाहर कालरूपसे रहकर मृत्युका। मनुष्यके रूपमें प्रतीत होना, यह तो उनकी एक लीला है। आप उन्हींकी ऐश्‍वर्य और माधुर्यसे परिपूर्ण लीलाओंका वर्णन कीजिये॥ ७॥"},{"id":"10.1.8","number":8,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/8/","page":120,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["रोहिण्यास्तनयः प्रोक्तो रामः संकर्षणस्त्वया।","देवक्या गर्भसम्बन्धः कुतो देहान्तरं विना॥ ८"],"iast":["rohiṇyāstanayaḥ prokto rāmaḥ saṃkarṣaṇastvayā|","devakyā garbhasambandhaḥ kuto dehāntaraṃ vinā|| 8"],"meaning":"भगवन्! आपने अभी बतलाया था कि बलरामजी रोहिणीके पुत्र थे। इसके बाद देवकीके पुत्रोंमें भी आपने उनकी गणना की। दूसरा शरीर धारण किये बिना दो माताओंका पुत्र होना कैसे सम्भव है?॥ ८॥"},{"id":"10.1.9","number":9,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/9/","page":120,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["कस्मान्मुकुन्दो भगवान् पितुर्गेहाद् व्रजं गतः।","क्व वासं ज्ञातिभिः सार्धं कृतवान् सात्वतांपतिः॥ ९"],"iast":["kasmānmukundo bhagavān piturgehād vrajaṃ gataḥ|","kva vāsaṃ jñātibhiḥ sārdhaṃ kṛtavān sātvatāṃpatiḥ|| 9"],"meaning":"असुरोंको मुक्ति देनेवाले और भक्तोंको प्रेम वितरण करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण अपने वात्सल्य-स्नेहसे भरे हुए पिताका घर छोड़कर व्रजमें क्यों चले गये? यदुवंशशिरोमणि भक्तवत्सल प्रभुने नन्द आदि गोप-बन्धुओंके साथ कहाँ-कहाँ निवास किया?॥ ९॥"},{"id":"10.1.10","number":10,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/10/","page":120,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["व्रजे वसन् किमकरोन्मधुपुर्यां च केशवः।","भ्रातरं चावधीत् कंसं मातुरद्धातदर्हणम्॥ १०"],"iast":["vraje vasan kimakaronmadhupuryāṃ ca keśavaḥ|","bhrātaraṃ cāvadhīt kaṃsaṃ māturaddhātadarhaṇam|| 10"],"meaning":"ब्रह्मा और शंकरका भी शासन करनेवाले प्रभुने व्रजमें तथा मधुपुरीमें रहकर कौन-कौन-सी लीलाएँ कीं? और महाराज! उन्होंने अपनी माँके भाई मामा कंसको अपने हाथों क्यों मार डाला? वह मामा होनेके कारण उनके द्वारा मारे जाने योग्य तो नहीं था॥ १०॥"},{"id":"10.1.11","number":11,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/11/","page":121,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["देहं मानुषमाश्रित्य कति वर्षाणि वृष्णिभिः।","यदुपुर्यां सहावात्सीत् पत्‍न्यः कत्यभवन् प्रभोः॥ ११"],"iast":["dehaṃ mānuṣamāśritya kati varṣāṇi vṛṣṇibhiḥ|","yadupuryāṃ sahāvātsīt patnyaḥ katyabhavan prabhoḥ|| 11"],"meaning":"मनुष्याकार सच्चिदानन्दमय विग्रह प्रकट करके द्वारकापुरीमें यदुवंशियोंके साथ उन्होंने कितने वर्षोंतक निवास किया? और उन सर्वशक्तिमान् प्रभुकी पत्‍नियाँ कितनी थीं?॥ ११॥"},{"id":"10.1.12","number":12,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/12/","page":121,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["एतदन्यच्च सर्वं मे मुने कृष्णविचेष्टितम्।","वक्तुमर्हसि सर्वज्ञ श्रद्दधानाय विस्तृतम्॥ १२"],"iast":["etadanyacca sarvaṃ me mune kṛṣṇaviceṣṭitam|","vaktumarhasi sarvajña śraddadhānāya vistṛtam|| 12"],"meaning":"मुने! मैंने श्रीकृष्णकी जितनी लीलाएँ पूछी हैं और जो नहीं पूछी हैं, वे सब आप मुझे विस्तारसे सुनाइये; क्योंकि आप सब कुछ जानते हैं और मैं बड़ी श्रद्धाके साथ उन्हें सुनना चाहता हूँ॥ १२॥"},{"id":"10.1.13","number":13,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/13/","page":121,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["नैषातिदुःसहा क्षुन्मां त्यक्तोदमपि बाधते।","पिबन्तं त्वन्मुखाम्भोजच्युतं हरिकथामृतम्॥ १३"],"iast":["naiṣātiduḥsahā kṣunmāṃ tyaktodamapi bādhate|","pibantaṃ tvanmukhāmbhojacyutaṃ harikathāmṛtam|| 13"],"meaning":"भगवन्! अन्‍नकी तो बात ही क्या, मैंने जलका भी परित्याग कर दिया है। फिर भी वह असह्य भूख-प्यास (जिसके कारण मैंने मुनिके गलेमें मृत सर्प डालनेका अन्याय किया था) मुझे तनिक भी नहीं सता रही है; क्योंकि मैं आपके मुखकमलसे झरती हुई भगवान्‌की सुधामयी लीला-कथाका पान कर रहा हूँ॥ १३॥"},{"id":"10.1.14","number":14,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/14/","page":121,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["एवं निशम्य भृगुनन्दन साधुवादं","वैयासकिः स भगवानथ विष्णुरातम्।","प्रत्यर्च्य कृष्णचरितं कलिकल्मषघ्नं","व्याहर्तुमारभत भागवतप्रधानः॥ १४"],"iast":["evaṃ niśamya bhṛgunandana sādhuvādaṃ","vaiyāsakiḥ sa bhagavānatha viṣṇurātam|","pratyarcya kṛṣṇacaritaṃ kalikalmaṣaghnaṃ","vyāhartumārabhata bhāgavatapradhānaḥ|| 14"],"meaning":"सूतजी कहते हैं—शौनकजी! भगवान्‌के प्रेमियोंमें अग्रगण्य एवं सर्वज्ञ श्रीशुकदेवजी महाराजने परीक्षित‍्का ऐसा समीचीन प्रश्‍न सुनकर (जो संतोंकी सभामें भगवान्‌की लीलाके वर्णनका हेतु हुआ करता है) उनका अभिनन्दन किया और भगवान् श्रीकृष्णकी उन लीलाओंका वर्णन प्रारम्भ किया, जो समस्त कलिमलोंको सदाके लिये धो डालती है॥ १४॥"},{"id":"10.1.15","number":15,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/15/","page":121,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सम्यग्व्यवसिता बुद्धिस्तव राजर्षिसत्तम।","वासुदेवकथायां ते यज्जाता नैष्ठिकी रतिः॥ १५"],"iast":["samyagvyavasitā buddhistava rājarṣisattama|","vāsudevakathāyāṃ te yajjātā naiṣṭhikī ratiḥ|| 15"],"meaning":"श्रीशुकदेवजीने कहा—भगवान्‌के लीला-रसके रसिक राजर्षे! तुमने जो कुछ निश्‍चय किया है, वह बहुत ही सुन्दर और आदरणीय है; क्योंकि सबके हृदयाराध्य श्रीकृष्णकी लीला-कथा श्रवण करनेमें तुम्हें सहज एवं सुदृढ़ प्रीति प्राप्त हो गयी है॥ १५॥"},{"id":"10.1.16","number":16,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/16/","page":121,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["वासुदेवकथाप्रश्‍नः पुरुषांस्त्रीन् पुनाति हि।","वक्तारं पृच्छकं श्रोतॄंस्तत्पादसलिलं यथा॥ १६"],"iast":["vāsudevakathāpraśnaḥ puruṣāṃstrīn punāti hi|","vaktāraṃ pṛcchakaṃ śrotṝṃstatpādasalilaṃ yathā|| 16"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्णकी कथाके सम्बन्धमें प्रश्‍न करनेसे ही वक्ता, प्रश्‍नकर्ता और श्रोता तीनों ही पवित्र हो जाते हैं—जैसे गंगाजीका जल या भगवान् शालग्रामका चरणामृत सभीको पवित्र कर देता है॥ १६॥"},{"id":"10.1.17","number":17,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/17/","page":121,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["भूमिर्दृप्तनृपव्याजदैत्यानीकशतायुतैः ।","आक्रान्ता भूरिभारेण ब्रह्माणं शरणं ययौ॥ १७"],"iast":["bhūmirdṛptanṛpavyājadaityānīkaśatāyutaiḥ |","ākrāntā bhūribhāreṇa brahmāṇaṃ śaraṇaṃ yayau|| 17"],"meaning":"परीक्षित्! उस समय लाखों दैत्योंके दलने घमंडी राजाओंका रूप धारण कर अपने भारी भारसे पृथ्वीको आक्रान्त कर रखा था। उससे त्राण पानेके लिये वह ब्रह्माजीकी शरणमें गयी॥ १७॥"},{"id":"10.1.18","number":18,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/18/","page":122,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["गौर्भूत्वाश्रुमुखी खिन्‍ना क्रन्दन्ती करुणं विभोः।","उपस्थितान्तिके तस्मै व्यसनं स्वमवोचत॥ १८"],"iast":["gaurbhūtvāśrumukhī khinnā krandantī karuṇaṃ vibhoḥ|","upasthitāntike tasmai vyasanaṃ svamavocata|| 18"],"meaning":"पृथ्वीने उस समय गौका रूप धारण कर रखा था। उसके नेत्रोंसे आँसू बह-बहकर मुँहपर आ रहे थे। उसका मन तो खिन्‍न था ही, शरीर भी बहुत कृश हो गया था। वह बड़े करुण स्वरसे रँभा रही थी। ब्रह्माजीके पास जाकर उसने उन्हें अपनी पूरी कष्ट-कहानी सुनायी॥ १८॥"},{"id":"10.1.19","number":19,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/19/","page":122,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ब्रह्मा तदुपधार्याथ सह देवैस्तया सह।","जगाम सत्रिनयनस्तीरं क्षीरपयोनिधेः॥ १९"],"iast":["brahmā tadupadhāryātha saha devaistayā saha|","jagāma satrinayanastīraṃ kṣīrapayonidheḥ|| 19"],"meaning":"ब्रह्माजीने बड़ी सहानुभूतिके साथ उसकी दुःख-गाथा सुनी। उसके बाद वे भगवान् शंकर, स्वर्गके अन्यान्य प्रमुख देवता तथा गौके रूपमें आयी हुई पृथ्वीको अपने साथ लेकर क्षीरसागरके तटपर गये॥ १९॥"},{"id":"10.1.20","number":20,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/20/","page":122,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तत्र गत्वा जगन्‍नाथं देवदेवं वृषाकपिम्।","पुरुषं पुरुषसूक्तेन उपतस्थे समाहितः॥ २०"],"iast":["tatra gatvā jagannāthaṃ devadevaṃ vṛṣākapim|","puruṣaṃ puruṣasūktena upatasthe samāhitaḥ|| 20"],"meaning":"भगवान् देवताओंके भी आराध्यदेव हैं। वे अपने भक्तोंकी समस्त अभिलाषाएँ पूर्ण करते और उनके समस्त क्लेशोंको नष्ट कर देते हैं। वे ही जगत‍्के एकमात्र स्वामी हैं। क्षीरसागरके तटपर पहुँचकर ब्रह्मा आदि देवताओंने ‘पुरुषसूक्त’ के द्वारा उन्हीं परम पुरुष सर्वान्तर्यामी प्रभुकी स्तुति की। स्तुति करते-करते ब्रह्माजी समाधिस्थ हो गये॥ २०॥"},{"id":"10.1.21","number":21,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/21/","page":122,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["गिरं समाधौ गगने समीरितां","निशम्य वेधास्त्रिदशानुवाच ह।","गां पौरुषीं मे शृणुतामराः पुन-","र्विधीयतामाशु तथैव मा चिरम्॥ २१"],"iast":["giraṃ samādhau gagane samīritāṃ","niśamya vedhāstridaśānuvāca ha|","gāṃ pauruṣīṃ me śṛṇutāmarāḥ puna-","rvidhīyatāmāśu tathaiva mā ciram|| 21"],"meaning":"उन्होंने समाधि-अवस्थामें आकाशवाणी सुनी। इसके बाद जगत‍्के निर्माणकर्ता ब्रह्माजीने देवताओंसे कहा—‘देवताओ! मैंने भगवान्‌की वाणी सुनी है। तुमलोग भी उसे मेरे द्वारा अभी सुन लो और फिर वैसा ही करो। उसके पालनमें विलम्ब नहीं होना चाहिये॥ २१॥"},{"id":"10.1.22","number":22,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/22/","page":122,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["पुरैव पुंसावधृतो धराज्वरो","भवद्भिरंशैर्यदुषूपजन्यताम् ।","स यावदुर्व्या भरमीश्‍वरेश्‍वरः","स्वकालशक्त्या क्षपयंश्‍चरेद् भुवि॥ २२"],"iast":["puraiva puṃsāvadhṛto dharājvaro","bhavadbhiraṃśairyaduṣūpajanyatām |","sa yāvadurvyā bharamīśvareśvaraḥ","svakālaśaktyā kṣapayaṃścared bhuvi|| 22"],"meaning":"भगवान्‌को पृथ्वीके कष्टका पहलेसे ही पता है। वे ईश्‍वरोंके भी ईश्‍वर हैं। अतः अपनी कालशक्तिके द्वारा पृथ्वीका भार हरण करते हुए वे जबतक पृथ्वीपर लीला करें, तबतक तुम लोग भी अपने-अपने अंशोंके साथ यदुकुलमें जन्म लेकर उनकी लीलामें सहयोग दो॥ २२॥"},{"id":"10.1.23","number":23,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/23/","page":122,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["वसुदेवगृहे साक्षाद् भगवान् पुरुषः परः।","जनिष्यते तत्प्रियार्थं सम्भवन्तु सुरस्त्रियः॥ २३"],"iast":["vasudevagṛhe sākṣād bhagavān puruṣaḥ paraḥ|","janiṣyate tatpriyārthaṃ sambhavantu surastriyaḥ|| 23"],"meaning":"वसुदेवजीके घर स्वयं पुरुषोत्तम भगवान् प्रकट होंगे। उनकी और उनकी प्रियतमा (श्रीराधा) की सेवाके लिये देवांगनाएँ जन्म ग्रहण करें॥ २३॥"},{"id":"10.1.24","number":24,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/24/","page":122,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["वासुदेवकलानन्तः सहस्रवदनः स्वराट्।","अग्रतो भविता देवो हरेः प्रियचिकीर्षया॥ २४"],"iast":["vāsudevakalānantaḥ sahasravadanaḥ svarāṭ|","agrato bhavitā devo hareḥ priyacikīrṣayā|| 24"],"meaning":"स्वयंप्रकाश भगवान् शेष भी, जो भगवान्‌की कला होनेके कारण अनन्त हैं (अनन्तका अंश भी अनन्त ही होता है) और जिनके सहस्र मुख हैं, भगवान्‌के प्रिय कार्य करनेके लिये उनसे पहले ही उनके बड़े भाईके रूपमें अवतार ग्रहण करेंगे॥ २४॥"},{"id":"10.1.25","number":25,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/25/","page":123,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["विष्णोर्माया भगवती यया सम्मोहितं जगत्।","आदिष्टा प्रभुणांशेन कार्यार्थे सम्भविष्यति॥ २५"],"iast":["viṣṇormāyā bhagavatī yayā sammohitaṃ jagat|","ādiṣṭā prabhuṇāṃśena kāryārthe sambhaviṣyati|| 25"],"meaning":"भगवान्‌की वह ऐश्‍वर्यशालिनी योगमाया भी, जिसने सारे जगत‍्को मोहित कर रखा है, उनकी आज्ञासे उनकी लीलाके कार्य सम्पन्‍न करनेके लिये अंशरूपसे अवतार ग्रहण करेगी’॥ २५॥"},{"id":"10.1.26","number":26,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/26/","page":123,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इत्यादिश्यामरगणान् प्रजापतिपतिर्विभुः।","आश्‍वास्य च महीं गीर्भिः स्वधाम परमं ययौ॥ २६"],"iast":["ityādiśyāmaragaṇān prajāpatipatirvibhuḥ|","āśvāsya ca mahīṃ gīrbhiḥ svadhāma paramaṃ yayau|| 26"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! प्रजापतियोंके स्वामी भगवान् ब्रह्माजीने देवताओंको इस प्रकार आज्ञा दी और पृथ्वीको समझा-बुझाकर ढाढ़स बँधाया। इसके बाद वे अपने परम धामको चले गये॥ २६॥"},{"id":"10.1.27","number":27,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/27/","page":123,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["शूरसेनो यदुपतिर्मथुरामावसन् पुरीम्।","माथुराञ्छूरसेनांश्‍च विषयान् बुभुजे पुरा॥ २७"],"iast":["śūraseno yadupatirmathurāmāvasan purīm|","māthurāñchūrasenāṃśca viṣayān bubhuje purā|| 27"],"meaning":"प्राचीन कालमें यदुवंशी राजा थे शूरसेन। वे मथुरापुरीमें रहकर माथुरमण्डल और शूरसेनमण्डलका राज्यशासन करते थे॥ २७॥"},{"id":"10.1.28","number":28,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/28/","page":123,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["राजधानी ततः साभूत् सर्वयादवभूभुजाम्।","मथुरा भगवान् यत्र नित्यं संनिहितो हरिः॥ २८"],"iast":["rājadhānī tataḥ sābhūt sarvayādavabhūbhujām|","mathurā bhagavān yatra nityaṃ saṃnihito hariḥ|| 28"],"meaning":"उसी समयसे मथुरा ही समस्त यदुवंशी नरपतियोंकी राजधानी हो गयी थी। भगवान् श्रीहरि सर्वदा वहाँ विराजमान रहते हैं॥ २८॥"},{"id":"10.1.29","number":29,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/29/","page":123,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तस्यां तु कर्हिचिच्छौरिर्वसुदेवः कृतोद्वहः।","देवक्या सूर्यया सार्धं प्रयाणे रथमारुहत्॥ २९"],"iast":["tasyāṃ tu karhicicchaurirvasudevaḥ kṛtodvahaḥ|","devakyā sūryayā sārdhaṃ prayāṇe rathamāruhat|| 29"],"meaning":"एक बार मथुरामें शूरके पुत्र वसुदेवजी विवाह करके अपनी नवविवाहिता पत्‍नी देवकीके साथ घर जानेके लिये रथपर सवार हुए॥ २९॥"},{"id":"10.1.30","number":30,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/30/","page":123,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["उग्रसेनसुतः कंसः स्वसुः प्रियचिकीर्षया।","रश्मीन् हयानां जग्राह रौक्मै रथशतैर्वृतः॥ ३०"],"iast":["ugrasenasutaḥ kaṃsaḥ svasuḥ priyacikīrṣayā|","raśmīn hayānāṃ jagrāha raukmai rathaśatairvṛtaḥ|| 30"],"meaning":"उग्रसेनका लड़का था कंस। उसने अपनी चचेरी बहिन देवकीको प्रसन्‍न करनेके लिये उसके रथके घोड़ोंकी रास पकड़ ली। वह स्वयं ही रथ हाँकने लगा, यद्यपि उसके साथ सैकड़ों सोनेके बने हुए रथ चल रहे थे॥ ३०॥"},{"id":"10.1.31","number":31,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/31/","page":123,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["चतुःशतं पारिबर्हं गजानां हेममालिनाम्।","अश्‍वानामयुतं सार्धं रथानां च त्रिषट्शतम्॥ ३१"],"iast":["catuḥśataṃ pāribarhaṃ gajānāṃ hemamālinām|","aśvānāmayutaṃ sārdhaṃ rathānāṃ ca triṣaṭśatam|| 31"],"meaning":"देवकीके पिता थे देवक। अपनी पुत्रीपर उनका बड़ा प्रेम था। कन्याको विदा करते समय उन्होंने उसे सोनेके हारोंसे अलंकृत चार सौ हाथी, पंद्रह हजार घोड़े, अठारह सौ रथ तथा सुन्दर-सुन्दर वस्त्राभूषणोंसे विभूषित दो सौ सुकुमारी दासियाँ दहेजमें दीं॥ ३१-३२॥","meaning_covers":[31,32]},{"id":"10.1.32","number":32,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/32/","page":123,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["दासीनां सुकुमारीणां द्वे शते समलंकृते।","दुहित्रे देवकः प्रादाद् याने दुहितृवत्सलः॥ ३२"],"iast":["dāsīnāṃ sukumārīṇāṃ dve śate samalaṃkṛte|","duhitre devakaḥ prādād yāne duhitṛvatsalaḥ|| 32"],"meaning":"देवकीके पिता थे देवक। अपनी पुत्रीपर उनका बड़ा प्रेम था। कन्याको विदा करते समय उन्होंने उसे सोनेके हारोंसे अलंकृत चार सौ हाथी, पंद्रह हजार घोड़े, अठारह सौ रथ तथा सुन्दर-सुन्दर वस्त्राभूषणोंसे विभूषित दो सौ सुकुमारी दासियाँ दहेजमें दीं॥ ३१-३२॥","meaning_covers":[31,32]},{"id":"10.1.33","number":33,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/33/","page":123,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["शंखतूर्यमृदंगाश्‍च नेदुर्दुन्दुभयः समम्।","प्रयाणप्रक्रमे तावद् वरवध्वोः सुमंगलम्॥ ३३"],"iast":["śaṃkhatūryamṛdaṃgāśca nedurdundubhayaḥ samam|","prayāṇaprakrame tāvad varavadhvoḥ sumaṃgalam|| 33"],"meaning":"विदाईके समय वर-वधूके मंगलके लिये एक ही साथ शंख, तुरही, मृदंग और दुन्दुभियाँ बजने लगीं॥ ३३॥"},{"id":"10.1.34","number":34,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/34/","page":123,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["पथि प्रग्रहिणं कंसमाभाष्याहाशरीरवाक्।","अस्यास्त्वामष्टमो गर्भो हन्ता यां वहसेऽबुध॥ ३४"],"iast":["pathi pragrahiṇaṃ kaṃsamābhāṣyāhāśarīravāk|","asyāstvāmaṣṭamo garbho hantā yāṃ vahase'budha|| 34"],"meaning":"मार्गमें जिस समय घोड़ोंकी रास पकड़कर कंस रथ हाँक रहा था, उस समय आकाशवाणीने उसे सम्बोधन करके कहा—‘अरे मूर्ख! जिसको तू रथमें बैठाकर लिये जा रहा है, उसकी आठवें गर्भकी सन्तान तुझे मार डालेगी’॥ ३४॥"},{"id":"10.1.35","number":35,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/35/","page":123,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इत्युक्तः स खलः पापो भोजानां कुलपांसनः।","भगिनीं हन्तुमारब्धः खड्गपाणिः कचेऽग्रहीत्॥ ३५"],"iast":["ityuktaḥ sa khalaḥ pāpo bhojānāṃ kulapāṃsanaḥ|","bhaginīṃ hantumārabdhaḥ khaḍgapāṇiḥ kace'grahīt|| 35"],"meaning":"कंस बड़ा पापी था। उसकी दुष्टताकी सीमा नहीं थी। वह भोजवंशका कलंक ही था। आकाशवाणी सुनते ही उसने तलवार खींच ली और अपनी बहिनकी चोटी पकड़कर उसे मारनेके लिये तैयार हो गया॥ ३५॥"},{"id":"10.1.36","number":36,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/36/","page":124,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तं जुगुप्सितकर्माणं नृशंसं निरपत्रपम्।","वसुदेवो महाभाग उवाच परिसान्त्वयन्॥ ३६"],"iast":["taṃ jugupsitakarmāṇaṃ nṛśaṃsaṃ nirapatrapam|","vasudevo mahābhāga uvāca parisāntvayan|| 36"],"meaning":"वह अत्यन्त क्रूर तो था ही, पाप-कर्म करते-करते निर्लज्ज भी हो गया था। उसका यह काम देखकर महात्मा वसुदेवजी उसको शान्त करते हुए बोले—॥ ३६॥"},{"id":"10.1.37","number":37,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/37/","page":124,"speaker":"वसुदेव उवाच","sanskrit":["श्‍लाघनीयगुणः शूरैर्भवान् भोजयशस्करः।","स कथं भगिनीं हन्यात् स्त्रियमुद्वाहपर्वणि॥ ३७"],"iast":["ślāghanīyaguṇaḥ śūrairbhavān bhojayaśaskaraḥ|","sa kathaṃ bhaginīṃ hanyāt striyamudvāhaparvaṇi|| 37"],"meaning":"वसुदेवजीने कहा—राजकुमार! आप भोजवंशके होनहार वंशधर तथा अपने कुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले हैं। बड़े-बड़े शूरवीर आपके गुणोंकी सराहना करते हैं। इधर यह एक तो स्त्री, दूसरे आपकी बहिन और तीसरे यह विवाहका शुभ अवसर! ऐसी स्थितिमें आप इसे कैसे मार सकते हैं?॥ ३७॥"},{"id":"10.1.38","number":38,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/38/","page":124,"speaker":"वसुदेव उवाच","sanskrit":["मृत्युर्जन्मवतां वीर देहेन सह जायते।","अद्य वाब्दशतान्ते वा मृत्युर्वै प्राणिनां ध्रुवः॥ ३८"],"iast":["mṛtyurjanmavatāṃ vīra dehena saha jāyate|","adya vābdaśatānte vā mṛtyurvai prāṇināṃ dhruvaḥ|| 38"],"meaning":"वीरवर! जो जन्म लेते हैं, उनके शरीरके साथ ही मृत्यु भी उत्पन्‍न होती है। आज हो या सौ वर्षके बाद—जो प्राणी है, उसकी मृत्यु होगी ही॥ ३८॥"},{"id":"10.1.39","number":39,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/39/","page":124,"speaker":"वसुदेव उवाच","sanskrit":["देहे पंचत्वमापन्‍ने देही कर्मानुगोऽवशः।","देहान्तरमनुप्राप्य प्राक्तनं त्यजते वपुः॥ ३९"],"iast":["dehe paṃcatvamāpanne dehī karmānugo'vaśaḥ|","dehāntaramanuprāpya prāktanaṃ tyajate vapuḥ|| 39"],"meaning":"जब शरीरका अन्त हो जाता है, तब जीव अपने कर्मके अनुसार दूसरे शरीरको ग्रहण करके अपने पहले शरीरको छोड़ देता है। उसे विवश होकर ऐसा करना पड़ता है॥ ३९॥"},{"id":"10.1.40","number":40,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/40/","page":124,"speaker":"वसुदेव उवाच","sanskrit":["व्रजंस्तिष्ठन् पदैकेन यथैवैकेन गच्छति।","यथा तृणजलूकैवं देही कर्मगतिं गतः॥ ४०"],"iast":["vrajaṃstiṣṭhan padaikena yathaivaikena gacchati|","yathā tṛṇajalūkaivaṃ dehī karmagatiṃ gataḥ|| 40"],"meaning":"जैसे चलते समय मनुष्य एक पैर जमाकर ही दूसरा पैर उठाता है और जैसे जोंक किसी अगले तिनकेको पकड़ लेती है, तब पहलेके पकड़े हुए तिनकेको छोड़ती है—वैसे जीव भी अपने कर्मके अनुसार किसी शरीरको प्राप्त करनेके बाद ही इस शरीरको छोड़ता है॥ ४०॥"},{"id":"10.1.41","number":41,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/41/","page":124,"speaker":"वसुदेव उवाच","sanskrit":["स्वप्ने यथा पश्यति देहमीदृशं","मनोरथेनाभिनिविष्टचेतनः ।","दृष्टश्रुताभ्यां मनसानुचिन्तयन्","प्रपद्यते तत् किमपि ह्यपस्मृतिः॥ ४१"],"iast":["svapne yathā paśyati dehamīdṛśaṃ","manorathenābhiniviṣṭacetanaḥ |","dṛṣṭaśrutābhyāṃ manasānucintayan","prapadyate tat kimapi hyapasmṛtiḥ|| 41"],"meaning":"जैसे कोई पुरुष जाग्रत्-अवस्थामें राजाके ऐश्‍वर्यको देखकर और इन्द्रादिके ऐश्‍वर्यको सुनकर उसकी अभिलाषा करने लगता है और उसका चिन्तन करते-करते उन्हीं बातोंमें घुल-मिलकर एक हो जाता है तथा स्वप्नमें अपनेको राजा या इन्द्रके रूपमें अनुभव करने लगता है, साथ ही अपने दरिद्रावस्थाके शरीरको भूल जाता है। कभी-कभी तो जाग्रत् अवस्थामें ही मन-ही-मन उन बातोंका चिन्तन करते-करते तन्मय हो जाता है और उसे स्थूल शरीरकी सुधि नहीं रहती। वैसे ही जीव कर्मकृत कामना और कामनाकृत कर्मके वश होकर दूसरे शरीरको प्राप्त हो जाता है और अपने पहले शरीरको भूल जाता है॥ ४१॥"},{"id":"10.1.42","number":42,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/42/","page":124,"speaker":"वसुदेव उवाच","sanskrit":["यतो यतो धावति दैवचोदितं","मनो विकारात्मकमाप पंचसु।","गुणेषु मायारचितेषु देह्यसौ","प्रपद्यमानः सह तेन जायते॥ ४२"],"iast":["yato yato dhāvati daivacoditaṃ","mano vikārātmakamāpa paṃcasu|","guṇeṣu māyāraciteṣu dehyasau","prapadyamānaḥ saha tena jāyate|| 42"],"meaning":"जीवका मन अनेक विकारोंका पुंज है। देहान्तके समय वह अनेक जन्मोंके संचित और प्रारब्ध कर्मोंकी वासनाओंके अधीन होकर मायाके द्वारा रचे हुए अनेक पांचभौतिक शरीरोंमेंसे जिस किसी शरीरके चिन्तनमें तल्लीन हो जाता है और मान बैठता है कि यह मैं हूँ, उसे वही शरीर ग्रहण करके जन्म लेना पड़ता है॥ ४२॥"},{"id":"10.1.43","number":43,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/43/","page":125,"speaker":"वसुदेव उवाच","sanskrit":["ज्योतिर्यथैवोदकपार्थिवेष्वदः","समीरवेगानुगतं विभाव्यते।","एवं स्वमायारचितेष्वसौ पुमान्","गुणेषु रागानुगतो विमुह्यति॥ ४३"],"iast":["jyotiryathaivodakapārthiveṣvadaḥ","samīravegānugataṃ vibhāvyate|","evaṃ svamāyāraciteṣvasau pumān","guṇeṣu rāgānugato vimuhyati|| 43"],"meaning":"जैसे सूर्य, चन्द्रमा आदि चमकीली वस्तुएँ जलसे भरे हुए घड़ोंमें या तेल आदि तरल पदार्थोंमें प्रतिबिम्बित होती हैं और हवाके झोंकेसे उनके जल आदिके हिलने-डोलनेपर उनमें प्रतिबिम्बित वस्तुएँ भी चंचल जान पड़ती हैं—वैसे ही जीव अपने स्वरूपके अज्ञानद्वारा रचे हुए शरीरोंमें राग करके उन्हें अपना आप मान बैठता है और मोहवश उनके आने-जानेको अपना आना-जाना मानने लगता है॥ ४३॥"},{"id":"10.1.44","number":44,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/44/","page":125,"speaker":"वसुदेव उवाच","sanskrit":["तस्मान्‍न कस्यचिद् द्रोहमाचरेत् स तथाविधः।","आत्मनः क्षेममन्विच्छन् द्रोग्धुर्वै परतो भयम्॥ ४४"],"iast":["tasmānna kasyacid drohamācaret sa tathāvidhaḥ|","ātmanaḥ kṣemamanvicchan drogdhurvai parato bhayam|| 44"],"meaning":"इसलिये जो अपना कल्याण चाहता है, उसे किसीसे द्रोह नहीं करना चाहिये; क्योंकि जीव कर्मके अधीन हो गया है और जो किसीसे भी द्रोह करेगा, उसको इस जीवनमें शत्रुसे और जीवनके बाद परलोकसे भयभीत होना ही पड़ेगा॥ ४४॥"},{"id":"10.1.45","number":45,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/45/","page":125,"speaker":"वसुदेव उवाच","sanskrit":["एषा तवानुजा बाला कृपणा पुत्रिकोपमा।","हन्तुं नार्हसि कल्याणीमिमां त्वं दीनवत्सलः॥ ४५"],"iast":["eṣā tavānujā bālā kṛpaṇā putrikopamā|","hantuṃ nārhasi kalyāṇīmimāṃ tvaṃ dīnavatsalaḥ|| 45"],"meaning":"कंस! यह आपकी छोटी बहिन अभी बच्ची और बहुत दीन है। यह तो आपकी कन्याके समान है। इसपर, अभी-अभी इसका विवाह हुआ है, विवाहके मंगलचिह्न भी इसके शरीरपरसे नहीं उतरे हैं। ऐसी दशामें आप-जैसे दीनवत्सल पुरुषको इस बेचारीका वध करना उचित नहीं है॥ ४५॥"},{"id":"10.1.46","number":46,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/46/","page":125,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवं स सामभिर्भेदैर्बोध्यमानोऽपि दारुणः।","न न्यवर्तत कौरव्य पुरुषादाननुव्रतः॥ ४६"],"iast":["evaṃ sa sāmabhirbhedairbodhyamāno'pi dāruṇaḥ|","na nyavartata kauravya puruṣādānanuvrataḥ|| 46"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! इस प्रकार वसुदेवजीने प्रशंसा आदि सामनीति और भय आदि भेदनीतिसे कंसको बहुत समझाया। परन्तु वह क्रूर तो राक्षसोंका अनुयायी हो रहा था; इसलिये उसने अपने घोर संकल्पको नहीं छोड़ा॥ ४६॥"},{"id":"10.1.47","number":47,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/47/","page":125,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["निर्बन्धं तस्य तं ज्ञात्वा विचिन्त्यानकदुन्दुभिः।","प्राप्तं कालं प्रतिव्योढुमिदं तत्रान्वपद्यत॥ ४७"],"iast":["nirbandhaṃ tasya taṃ jñātvā vicintyānakadundubhiḥ|","prāptaṃ kālaṃ prativyoḍhumidaṃ tatrānvapadyata|| 47"],"meaning":"वसुदेवजीने कंसका विकट हठ देखकर यह विचार किया कि किसी प्रकार यह समय तो टाल ही देना चाहिये। तब वे इस निश्‍चयपर पहुँचे॥ ४७॥"},{"id":"10.1.48","number":48,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/48/","page":125,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["मृत्युर्बुद्धिमतापोह्यो यावद्बुद्धिबलोदयम्।","यद्यसौ न निवर्तेत नापराधोऽस्ति देहिनः॥ ४८"],"iast":["mṛtyurbuddhimatāpohyo yāvadbuddhibalodayam|","yadyasau na nivarteta nāparādho'sti dehinaḥ|| 48"],"meaning":"‘बुद्धिमान् पुरुषको, जहाँतक उसकी बुद्धि और बल साथ दें, मृत्युको टालनेका प्रयत्‍न करना चाहिये। प्रयत्‍न करनेपर भी वह न टल सके, तो फिर प्रयत्‍न करनेवालेका कोई दोष नहीं रहता॥ ४८॥"},{"id":"10.1.49","number":49,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/49/","page":125,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["प्रदाय मृत्यवे पुत्रान् मोचये कृपणामिमाम्।","सुता मे यदि जायेरन् मृत्युर्वा न म्रियेत चेत्॥ ४९"],"iast":["pradāya mṛtyave putrān mocaye kṛpaṇāmimām|","sutā me yadi jāyeran mṛtyurvā na mriyeta cet|| 49"],"meaning":"इसलिये इस मृत्युरूप कंसको अपने पुत्र दे देनेकी प्रतिज्ञा करके मैं इस दीन देवकीको बचा लूँ। यदि मेरे लड़के होंगे और तबतक यह कंस स्वयं नहीं मर जायगा, तब क्या होगा?॥ ४९॥"},{"id":"10.1.50","number":50,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/50/","page":125,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["विपर्ययो वा किं न स्याद् गतिर्धातुर्दुरत्यया।","उपस्थितो निवर्तेत निवृत्तः पुनरापतेत्॥ ५०"],"iast":["viparyayo vā kiṃ na syād gatirdhāturduratyayā|","upasthito nivarteta nivṛttaḥ punarāpatet|| 50"],"meaning":"सम्भव है, उलटा ही हो। मेरा लड़का ही इसे मार डाले! क्योंकि विधाताके विधानका पार पाना बहुत कठिन है । मृत्यु सामने आकर भी टल जाती है और टली हुई भी लौट आती है॥ ५०॥"},{"id":"10.1.51","number":51,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/51/","page":126,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अ‌ग्‍नेर्यथा दारुवियोगयोगयो-","रदृष्टतोऽन्यन्‍न निमित्तमस्ति।","एवं हि जन्तोरपि दुर्विभाव्यः","शरीरसंयोगवियोगहेतुः ॥ ५१"],"iast":["agneryathā dāruviyogayogayo-","radṛṣṭato'nyanna nimittamasti|","evaṃ hi jantorapi durvibhāvyaḥ","śarīrasaṃyogaviyogahetuḥ || 51"],"meaning":"जिस समय वनमें आग लगती है, उस समय कौन-सी लकड़ी जले और कौन-सी न जले, दूरकी जल जाय और पासकी बच रहे—इन सब बातोंमें अदृष्टके सिवा और कोई कारण नहीं होता। वैसे ही किस प्राणीका कौन-सा शरीर बना रहेगा और किस हेतुसे कौन-सा शरीर नष्ट हो जायगा—इस बातका पता लगा लेना बहुत ही कठिन है’॥ ५१॥"},{"id":"10.1.52","number":52,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/52/","page":126,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवं विमृश्य तं पापं यावदात्मनिदर्शनम्।","पूजयामास वै शौरिर्बहुमानपुरःसरम्॥ ५२"],"iast":["evaṃ vimṛśya taṃ pāpaṃ yāvadātmanidarśanam|","pūjayāmāsa vai śaurirbahumānapuraḥsaram|| 52"],"meaning":"अपनी बुद्धिके अनुसार ऐसा निश्‍चय करके वसुदेवजीने बहुत सम्मानके साथ पापी कंसकी बड़ी प्रशंसा की॥ ५२॥"},{"id":"10.1.53","number":53,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/53/","page":126,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["प्रसन्‍नवदनाम्भोजो नृशंसं निरपत्रपम्।","मनसा दूयमानेन विहसन्‍निदमब्रवीत्॥ ५३"],"iast":["prasannavadanāmbhojo nṛśaṃsaṃ nirapatrapam|","manasā dūyamānena vihasannidamabravīt|| 53"],"meaning":"परीक्षित्! कंस बड़ा क्रूर और निर्लज्ज था; अतः ऐसा करते समय वसुदेवजीके मनमें बड़ी पीड़ा भी हो रही थी। फिर भी उन्होंने ऊपरसे अपने मुखकमलको प्रफुल्लित करके हँसते हुए कहा—॥ ५३॥"},{"id":"10.1.54","number":54,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/54/","page":126,"speaker":"वसुदेव उवाच","sanskrit":["न ह्यस्यास्ते भयं सौम्य यद् वागाहाशरीरिणी।","पुत्रान् समर्पयिष्येऽस्या यतस्ते भयमुत्थितम्॥ ५४"],"iast":["na hyasyāste bhayaṃ saumya yad vāgāhāśarīriṇī|","putrān samarpayiṣye'syā yataste bhayamutthitam|| 54"],"meaning":"वसुदेवजीने कहा—सौम्य! आपको देवकीसे तो कोई भय है नहीं, जैसा कि आकाशवाणीने कहा है । भय है पुत्रोंसे, सो इसके पुत्र मैं आपको लाकर सौंप दूँगा॥ ५४॥"},{"id":"10.1.55","number":55,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/55/","page":126,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स्वसुर्वधान्‍निववृते कंसस्तद्वाक्यसारवित्।","वसुदेवोऽपि तं प्रीतः प्रशस्य प्राविशद् गृहम्॥ ५५"],"iast":["svasurvadhānnivavṛte kaṃsastadvākyasāravit|","vasudevo'pi taṃ prītaḥ praśasya prāviśad gṛham|| 55"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! कंस जानता था कि वसुदेवजीके वचन झूठे नहीं होते और इन्होंने जो कुछ कहा है, वह युक्तिसंगत भी है। इसलिये उसने अपनी बहिन देवकीको मारनेका विचार छोड़ दिया। इससे वसुदेवजी बहुत प्रसन्‍न हुए और उसकी प्रशंसा करके अपने घर चले आये॥ ५५॥"},{"id":"10.1.56","number":56,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/56/","page":126,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अथ काल उपावृत्ते देवकी सर्वदेवता।","पुत्रान् प्रसुषुवे चाष्टौ कन्यां चैवानुवत्सरम्॥ ५६"],"iast":["atha kāla upāvṛtte devakī sarvadevatā|","putrān prasuṣuve cāṣṭau kanyāṃ caivānuvatsaram|| 56"],"meaning":"देवकी बड़ी सती-साध्वी थी। सारे देवता उसके शरीरमें निवास करते थे। समय आनेपर देवकीके गर्भसे प्रतिवर्ष एक-एक करके आठ पुत्र तथा एक कन्या उत्पन्‍न हुई॥ ५६॥"},{"id":"10.1.57","number":57,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/57/","page":126,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कीर्तिमन्तं प्रथमजं कंसायानकदुन्दुभिः।","अर्पयामास कृच्छ्रेण सोऽनृतादतिविह्वलः॥ ५७"],"iast":["kīrtimantaṃ prathamajaṃ kaṃsāyānakadundubhiḥ|","arpayāmāsa kṛcchreṇa so'nṛtādativihvalaḥ|| 57"],"meaning":"पहले पुत्रका नाम था कीर्तिमान्। वसुदेवजीने उसे लाकर कंसको दे दिया। ऐसा करते समय उन्हें कष्ट तो अवश्य हुआ, परन्तु उससे भी बड़ा कष्ट उन्हें इस बातका था कि कहीं मेरे वचन झूठे न हो जायँ॥ ५७॥"},{"id":"10.1.58","number":58,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/58/","page":126,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["किं दुःसहं नु साधूनां विदुषां किमपेक्षितम्।","किमकार्यं कदर्याणां दुस्त्यजं किं धृतात्मनाम्॥ ५८"],"iast":["kiṃ duḥsahaṃ nu sādhūnāṃ viduṣāṃ kimapekṣitam|","kimakāryaṃ kadaryāṇāṃ dustyajaṃ kiṃ dhṛtātmanām|| 58"],"meaning":"परीक्षित्! सत्यसन्ध पुरुष बड़े-से-बड़ा कष्ट भी सह लेते हैं, ज्ञानियोंको किसी बातकी अपेक्षा नहीं होती, नीच पुरुष बुरे-से-बुरा काम भी कर सकते हैं और जो जितेन्द्रिय हैं—जिन्होंने भगवान्‌को हृदयमें धारण कर रखा है, वे सब कुछ त्याग सकते हैं॥ ५८॥"},{"id":"10.1.59","number":59,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/59/","page":127,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["दृष्ट्वा समत्वं तच्छौरेः सत्ये चैव व्यवस्थितिम्।","कंसस्तुष्टमना राजन् प्रहसन्‍निदमब्रवीत्॥ ५९"],"iast":["dṛṣṭvā samatvaṃ tacchaureḥ satye caiva vyavasthitim|","kaṃsastuṣṭamanā rājan prahasannidamabravīt|| 59"],"meaning":"जब कंसने देखा कि वसुदेवजीका अपने पुत्रके जीवन और मृत्युमें समान भाव है एवं वे सत्यमें पूर्ण निष्ठावान् भी हैं, तब वह बहुत प्रसन्‍न हुआ और उनसे हँसकर बोला॥ ५९॥"},{"id":"10.1.60","number":60,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/60/","page":127,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["प्रतियातु कुमारोऽयं न ह्यस्मादस्ति मे भयम्।","अष्टमाद् युवयोर्गर्भान्मृत्युर्मे विहितः किल॥ ६०"],"iast":["pratiyātu kumāro'yaṃ na hyasmādasti me bhayam|","aṣṭamād yuvayorgarbhānmṛtyurme vihitaḥ kila|| 60"],"meaning":"वसुदेवजी! आप इस नन्हे-से सुकुमार बालकको ले जाइये। इससे मुझे कोई भय नहीं है। क्योंकि आकाशवाणीने तो ऐसा कहा था कि देवकीके आठवें गर्भसे उत्पन्‍न सन्तानके द्वारा मेरी मृत्यु होगी॥ ६०॥"},{"id":"10.1.61","number":61,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/61/","page":127,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तथेति सुतमादाय ययावानकदुन्दुभिः।","नाभ्यनन्दत तद्वाक्यमसतोऽविजितात्मनः॥ ६१"],"iast":["tatheti sutamādāya yayāvānakadundubhiḥ|","nābhyanandata tadvākyamasato'vijitātmanaḥ|| 61"],"meaning":"वसुदेवजीने कहा—‘ठीक है’ और उस बालकको लेकर वे लौट आये। परन्तु उन्हें मालूम था कि कंस बड़ा दुष्ट है और उसका मन उसके हाथमें नहीं है। वह किसी क्षण बदल सकता है। इसलिये उन्होंने उसकी बातपर विश्‍वास नहीं किया॥ ६१॥"},{"id":"10.1.62","number":62,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/62/","page":127,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["नन्दाद्या ये व्रजे गोपा याश्‍चामीषां च योषितः।","वृष्णयो वसुदेवाद्या देवक्याद्या यदुस्त्रियः॥ ६२"],"iast":["nandādyā ye vraje gopā yāścāmīṣāṃ ca yoṣitaḥ|","vṛṣṇayo vasudevādyā devakyādyā yadustriyaḥ|| 62"],"meaning":"परीक्षित्! इधर भगवान् नारद कंसके पास आये और उससे बोले कि ‘कंस! व्रजमें रहनेवाले नन्द आदि गोप, उनकी स्त्रियाँ, वसुदेव आदि वृष्णिवंशी यादव, देवकी आदि यदुवंशकी स्त्रियाँ और नन्द, वसुदेव दोनोंके सजातीय बन्धु-बान्धव और सगे-सम्बन्धी—सब-के-सब देवता हैं; जो इस समय तुम्हारी सेवा कर रहे हैं, वे भी देवता ही हैं।’ उन्होंने यह भी बतलाया कि ‘दैत्योंके कारण पृथ्वीका भार बढ़ गया है, इसलिये देवताओंकी ओरसे अब उनके वधकी तैयारी की जा रही है’॥ ६२—६४॥","meaning_covers":[62,64]},{"id":"10.1.63","number":63,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/63/","page":127,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सर्वे वै देवताप्राया उभयोरपि भारत।","ज्ञातयो बन्धुसुहृदो ये च कंसमनुव्रताः॥ ६३"],"iast":["sarve vai devatāprāyā ubhayorapi bhārata|","jñātayo bandhusuhṛdo ye ca kaṃsamanuvratāḥ|| 63"],"meaning":"परीक्षित्! इधर भगवान् नारद कंसके पास आये और उससे बोले कि ‘कंस! व्रजमें रहनेवाले नन्द आदि गोप, उनकी स्त्रियाँ, वसुदेव आदि वृष्णिवंशी यादव, देवकी आदि यदुवंशकी स्त्रियाँ और नन्द, वसुदेव दोनोंके सजातीय बन्धु-बान्धव और सगे-सम्बन्धी—सब-के-सब देवता हैं; जो इस समय तुम्हारी सेवा कर रहे हैं, वे भी देवता ही हैं।’ उन्होंने यह भी बतलाया कि ‘दैत्योंके कारण पृथ्वीका भार बढ़ गया है, इसलिये देवताओंकी ओरसे अब उनके वधकी तैयारी की जा रही है’॥ ६२—६४॥","meaning_covers":[62,64]},{"id":"10.1.64","number":64,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/64/","page":127,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एतत् कंसाय भगवाञ्छशंसाभ्येत्य नारदः।","भूमेर्भारायमाणानां दैत्यानां च वधोद्यमम्॥ ६४"],"iast":["etat kaṃsāya bhagavāñchaśaṃsābhyetya nāradaḥ|","bhūmerbhārāyamāṇānāṃ daityānāṃ ca vadhodyamam|| 64"],"meaning":"परीक्षित्! इधर भगवान् नारद कंसके पास आये और उससे बोले कि ‘कंस! व्रजमें रहनेवाले नन्द आदि गोप, उनकी स्त्रियाँ, वसुदेव आदि वृष्णिवंशी यादव, देवकी आदि यदुवंशकी स्त्रियाँ और नन्द, वसुदेव दोनोंके सजातीय बन्धु-बान्धव और सगे-सम्बन्धी—सब-के-सब देवता हैं; जो इस समय तुम्हारी सेवा कर रहे हैं, वे भी देवता ही हैं।’ उन्होंने यह भी बतलाया कि ‘दैत्योंके कारण पृथ्वीका भार बढ़ गया है, इसलिये देवताओंकी ओरसे अब उनके वधकी तैयारी की जा रही है’॥ ६२—६४॥","meaning_covers":[62,64]},{"id":"10.1.65","number":65,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/65/","page":127,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ऋषेर्विनिर्गमे कंसो यदून् मत्वा सुरानिति।","देवक्या गर्भसम्भूतं विष्णुं च स्ववधं प्रति॥ ६५"],"iast":["ṛṣervinirgame kaṃso yadūn matvā surāniti|","devakyā garbhasambhūtaṃ viṣṇuṃ ca svavadhaṃ prati|| 65"],"meaning":"जब देवर्षि नारद इतना कहकर चले गये, तब कंसको यह निश्‍चय हो गया कि यदुवंशी देवता हैं और देवकीके गर्भसे विष्णुभगवान् ही मुझे मारनेके लिये पैदा होनेवाले हैं। इसलिये उसने देवकी और वसुदेवको हथकड़ी-बेड़ीसे जकड़कर कैदमें डाल दिया और उन दोनोंसे जो-जो पुत्र होते गये, उन्हें वह मारता गया। उसे हर बार यह शंका बनी रहती कि कहीं विष्णु ही उस बालकके रूपमें न आ गया हो॥ ६५-६६॥","meaning_covers":[65,66]},{"id":"10.1.66","number":66,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/66/","page":127,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["देवकीं वसुदेवं च निगृह्य निगडैर्गृहे।","जातं जातमहन् पुत्रं तयोरजनशंकया॥ ६६"],"iast":["devakīṃ vasudevaṃ ca nigṛhya nigaḍairgṛhe|","jātaṃ jātamahan putraṃ tayorajanaśaṃkayā|| 66"],"meaning":"जब देवर्षि नारद इतना कहकर चले गये, तब कंसको यह निश्‍चय हो गया कि यदुवंशी देवता हैं और देवकीके गर्भसे विष्णुभगवान् ही मुझे मारनेके लिये पैदा होनेवाले हैं। इसलिये उसने देवकी और वसुदेवको हथकड़ी-बेड़ीसे जकड़कर कैदमें डाल दिया और उन दोनोंसे जो-जो पुत्र होते गये, उन्हें वह मारता गया। उसे हर बार यह शंका बनी रहती कि कहीं विष्णु ही उस बालकके रूपमें न आ गया हो॥ ६५-६६॥","meaning_covers":[65,66]},{"id":"10.1.67","number":67,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/67/","page":127,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["मातरं पितरं भ्रातॄन् सर्वांश्‍च सुहृदस्तथा।","घ्नन्ति ह्यसुतृपो लुब्धा राजानः प्रायशो भुवि॥ ६७"],"iast":["mātaraṃ pitaraṃ bhrātṝn sarvāṃśca suhṛdastathā|","ghnanti hyasutṛpo lubdhā rājānaḥ prāyaśo bhuvi|| 67"],"meaning":"परीक्षित्! पृथ्वीमें यह बात प्रायः देखी जाती है कि अपने प्राणोंका ही पोषण करनेवाले लोभी राजा अपने स्वार्थके लिये माता-पिता, भाई-बन्धु और अपने अत्यन्त हितैषी इष्ट-मित्रोंकी भी हत्या कर डालते हैं॥ ६७॥"},{"id":"10.1.68","number":68,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/68/","page":128,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["आत्मानमिह संजातं जानन् प्राग् विष्णुना हतम्।","महासुरं कालनेमिं यदुभिः स व्यरुध्यत॥ ६८"],"iast":["ātmānamiha saṃjātaṃ jānan prāg viṣṇunā hatam|","mahāsuraṃ kālanemiṃ yadubhiḥ sa vyarudhyata|| 68"],"meaning":"कंस जानता था कि मैं पहले कालनेमि असुर था और विष्णुने मुझे मार डाला था। इससे उसने यदुवंशियोंसे घोर विरोध ठान लिया॥ ६८॥"},{"id":"10.1.69","number":69,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/69/","page":128,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["उग्रसेनं च पितरं यदुभोजान्धकाधिपम्।","स्वयं निगृह्य बुभुजे शूरसेनान् महाबलः॥ ६९"],"iast":["ugrasenaṃ ca pitaraṃ yadubhojāndhakādhipam|","svayaṃ nigṛhya bubhuje śūrasenān mahābalaḥ|| 69"],"meaning":"कंस बड़ा बलवान् था। उसने यदु, भोज और अन्धक वंशके अधिनायक अपने पिता उग्रसेनको कैद कर लिया और शूरसेन-देशका राज्य वह स्वयं करने लगा॥ ६९॥"}],"text":[{"b":26993,"kind":"adhyaya_heading","page":119,"text":"अथ प्रथमोऽध्यायः"},{"b":26994,"kind":"topic_heading","page":119,"text":"भगवान्‌के द्वारा पृथ्वीको आश्‍वासन, वसुदेव-देवकीका विवाह और कंसके द्वारा देवकीके छः पुत्रोंकी हत्या"},{"b":26995,"kind":"topic_heading","page":119,"text":"राजोवाच"},{"b":26996,"kind":"sanskrit_shloka","page":119,"verses":["10.1.1"],"text":"कथितो वंशविस्तारो भवता सोमसूर्ययोः।"},{"b":26997,"kind":"sanskrit_shloka","page":119,"verses":["10.1.1"],"text":"राज्ञां चोभयवंश्यानां चरितं परमाद्भुतम्॥ १"},{"b":26998,"kind":"sanskrit_shloka","page":119,"verses":["10.1.2"],"text":"यदोश्‍च धर्मशीलस्य नितरां मुनिसत्तम।"},{"b":26999,"kind":"sanskrit_shloka","page":119,"verses":["10.1.2"],"text":"तत्रांशेनावतीर्णस्य विष्णोर्वीर्याणि शंस नः॥ २"},{"b":27000,"kind":"sanskrit_shloka","page":119,"verses":["10.1.3"],"text":"अवतीर्य यदोर्वंशे भगवान् भूतभावनः।"},{"b":27001,"kind":"sanskrit_shloka","page":119,"verses":["10.1.3"],"text":"कृतवान् यानि विश्‍वात्मा तानि नो वद विस्तरात्॥ ३"},{"b":27002,"kind":"sanskrit_shloka","page":119,"verses":["10.1.4"],"text":"निवृत्ततर्षैरुपगीयमानाद् भवौषधाच्छ्रोत्रमनोऽभिरामात् ।"},{"b":27003,"kind":"sanskrit_shloka","page":119,"verses":["10.1.4"],"text":"क उत्तमश्‍लोकगुणानुवादात् पुमान् विरज्येत विना पशुघ्नात्॥ ४"},{"b":27004,"kind":"sanskrit_shloka","page":119,"verses":["10.1.5"],"text":"पितामहा मे समरेऽमरंजयैर्देवव्रताद्यातिरथैस्तिमिंगिलैः ।"},{"b":27005,"kind":"sanskrit_shloka","page":120,"verses":["10.1.5"],"text":"दुरत्ययं कौरवसैन्यसागरं कृत्वातरन् वत्सपदं स्म यत्प्लवाः॥ ५"},{"b":27006,"kind":"sanskrit_shloka","page":120,"verses":["10.1.6"],"text":"द्रौण्यस्त्रविप्लुष्टमिदं मदंगं सन्तानबीजं कुरुपाण्डवानाम्।"},{"b":27007,"kind":"sanskrit_shloka","page":120,"verses":["10.1.6"],"text":"जुगोप कुक्षिंगत आत्तचक्रो मातुश्‍च मे यः शरणं गतायाः॥ ६"},{"b":27008,"kind":"sanskrit_shloka","page":120,"verses":["10.1.7"],"text":"वीर्याणि तस्याखिलदेहभाजामन्तर्बहिः पूरुषकालरूपैः।"},{"b":27009,"kind":"sanskrit_shloka","page":120,"verses":["10.1.7"],"text":"प्रयच्छतो मृत्युमुतामृतं च मायामनुष्यस्य वदस्व विद्वन्॥ ७"},{"b":27010,"kind":"hindi_commentary","page":118,"explains":["10.1.1","10.1.2","10.1.3","10.1.4","10.1.5","10.1.6","10.1.7"],"text":"राजा परीक्षित‍्ने पूछा—भगवन्! आपने चन्द्रवंश और सूर्यवंशके विस्तार तथा दोनों वंशोंके राजाओंका अत्यन्त अद्भुत चरित्र वर्णन किया। भगवान्‌के परम प्रेमी मुनिवर! आपने स्वभावसे ही धर्मप्रेमी यदुवंशका भी विशद वर्णन किया। अब कृपा करके उसी वंशमें अपने अंश श्रीबलरामजीके साथ अवतीर्ण हुए भगवान् श्रीकृष्णके परम पवित्र चरित्र भी हमें सुनाइये॥ १-२॥ भगवान् श्रीकृष्ण समस्त प्राणियोंके जीवनदाता एवं सर्वात्मा हैं। उन्होंने यदुवंशमें अवतार लेकर जो-जो लीलाएँ कीं, उनका विस्तारसे हमलोगोंको श्रवण कराइये॥ ३॥ जिनकी तृष्णाकी प्यास सर्वदाके लिये बुझ चुकी है, वे जीवन्मुक्त महापुरुष जिसका पूर्ण प्रेमसे अतृप्त रहकर गान किया करते हैं, मुमुक्षुजनोंके लिये जो भवरोगका रामबाण औषध है तथा विषयी लोगोंके लिये भी उनके कान और मनको परम आह्लाद देनेवाला है, भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रके ऐसे सुन्दर, सुखद, रसीले, गुणानुवादसे पशुघाती अथवा आत्मघाती मनुष्यके अतिरिक्त और ऐसा कौन है जो विमुख हो जाय, उससे प्रीति न करे?॥ ४॥ (श्रीकृष्ण तो मेरे कुलदेव ही हैं।) जब कुरुक्षेत्रमें महाभारत-युद्ध हो रहा था और देवताओंको भी जीत लेनेवाले भीष्मपितामह आदि अतिरथियोंसे मेरे दादा पाण्डवोंका युद्ध हो रहा था, उस समय कौरवोंकी सेना उनके लिये अपार समुद्रके समान थी—जिसमें भीष्म आदि वीर बड़े-बड़े मच्छोंको भी निगल जानेवाले तिमिंगिल मच्छोंकी भाँति भय उत्पन्‍न कर रहे थे। परन्तु मेरे स्वनामधन्य पितामह भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी नौकाका आश्रय लेकर उस समुद्रको अनायास ही पार कर गये—ठीक वैसे ही जैसे कोई मार्गमें चलता हुआ स्वभावसे ही बछड़ेके खुरका गड्ढा पार कर जाय॥ ५॥ महाराज! मेरा यह शरीर—जो आपके सामने है तथा जो कौरव और पाण्डव दोनों ही वंशोंका एकमात्र सहारा था—अश्‍वत्थामाके ब्रह्मास्त्रसे जल चुका था। उस समय मेरी माता जब भगवान्‌की शरणमें गयीं, तब उन्होंने हाथमें चक्र लेकर मेरी माताके गर्भमें प्रवेश किया और मेरी रक्षा की॥ ६॥ (केवल मेरी ही बात नहीं,) वे समस्त शरीरधारियोंके भीतर आत्मारूपसे रहकर अमृतत्वका दान कर रहे हैं और बाहर कालरूपसे रहकर मृत्युका। मनुष्यके रूपमें प्रतीत होना, यह तो उनकी एक लीला है। आप उन्हींकी ऐश्‍वर्य और माधुर्यसे परिपूर्ण लीलाओंका वर्णन कीजिये॥ ७॥"},{"b":27011,"kind":"sanskrit_shloka","page":120,"verses":["10.1.8"],"text":"रोहिण्यास्तनयः प्रोक्तो रामः संकर्षणस्त्वया।"},{"b":27012,"kind":"sanskrit_shloka","page":120,"verses":["10.1.8"],"text":"देवक्या गर्भसम्बन्धः कुतो देहान्तरं विना॥ ८"},{"b":27013,"kind":"sanskrit_shloka","page":120,"verses":["10.1.9"],"text":"कस्मान्मुकुन्दो भगवान् पितुर्गेहाद् व्रजं गतः।"},{"b":27014,"kind":"sanskrit_shloka","page":120,"verses":["10.1.9"],"text":"क्व वासं ज्ञातिभिः सार्धं कृतवान् सात्वतांपतिः॥ ९"},{"b":27015,"kind":"sanskrit_shloka","page":120,"verses":["10.1.10"],"text":"व्रजे वसन् किमकरोन्मधुपुर्यां च केशवः।"},{"b":27016,"kind":"sanskrit_shloka","page":120,"verses":["10.1.10"],"text":"भ्रातरं चावधीत् कंसं मातुरद्धातदर्हणम्॥ १०"},{"b":27017,"kind":"sanskrit_shloka","page":121,"verses":["10.1.11"],"text":"देहं मानुषमाश्रित्य कति वर्षाणि वृष्णिभिः।"},{"b":27018,"kind":"sanskrit_shloka","page":121,"verses":["10.1.11"],"text":"यदुपुर्यां सहावात्सीत् पत्‍न्यः कत्यभवन् प्रभोः॥ ११"},{"b":27019,"kind":"sanskrit_shloka","page":121,"verses":["10.1.12"],"text":"एतदन्यच्च सर्वं मे मुने कृष्णविचेष्टितम्।"},{"b":27020,"kind":"sanskrit_shloka","page":121,"verses":["10.1.12"],"text":"वक्तुमर्हसि सर्वज्ञ श्रद्दधानाय विस्तृतम्॥ १२"},{"b":27021,"kind":"sanskrit_shloka","page":121,"verses":["10.1.13"],"text":"नैषातिदुःसहा क्षुन्मां त्यक्तोदमपि बाधते।"},{"b":27022,"kind":"sanskrit_shloka","page":121,"verses":["10.1.13"],"text":"पिबन्तं त्वन्मुखाम्भोजच्युतं हरिकथामृतम्॥ १३"},{"b":27023,"kind":"hindi_translation","page":120,"explains":["10.1.8","10.1.9","10.1.10","10.1.11","10.1.12","10.1.13"],"text":"भगवन्! आपने अभी बतलाया था कि बलरामजी रोहिणीके पुत्र थे। इसके बाद देवकीके पुत्रोंमें भी आपने उनकी गणना की। दूसरा शरीर धारण किये बिना दो माताओंका पुत्र होना कैसे सम्भव है?॥ ८॥ असुरोंको मुक्ति देनेवाले और भक्तोंको प्रेम वितरण करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण अपने वात्सल्य-स्नेहसे भरे हुए पिताका घर छोड़कर व्रजमें क्यों चले गये? यदुवंशशिरोमणि भक्तवत्सल प्रभुने नन्द आदि गोप-बन्धुओंके साथ कहाँ-कहाँ निवास किया?॥ ९॥ ब्रह्मा और शंकरका भी शासन करनेवाले प्रभुने व्रजमें तथा मधुपुरीमें रहकर कौन-कौन-सी लीलाएँ कीं? और महाराज! उन्होंने अपनी माँके भाई मामा कंसको अपने हाथों क्यों मार डाला? वह मामा होनेके कारण उनके द्वारा मारे जाने योग्य तो नहीं था॥ १०॥ मनुष्याकार सच्चिदानन्दमय विग्रह प्रकट करके द्वारकापुरीमें यदुवंशियोंके साथ उन्होंने कितने वर्षोंतक निवास किया? और उन सर्वशक्तिमान् प्रभुकी पत्‍नियाँ कितनी थीं?॥ ११॥ मुने! मैंने श्रीकृष्णकी जितनी लीलाएँ पूछी हैं और जो नहीं पूछी हैं, वे सब आप मुझे विस्तारसे सुनाइये; क्योंकि आप सब कुछ जानते हैं और मैं बड़ी श्रद्धाके साथ उन्हें सुनना चाहता हूँ॥ १२॥ भगवन्! अन्‍नकी तो बात ही क्या, मैंने जलका भी परित्याग कर दिया है। फिर भी वह असह्य भूख-प्यास (जिसके कारण मैंने मुनिके गलेमें मृत सर्प डालनेका अन्याय किया था) मुझे तनिक भी नहीं सता रही है; क्योंकि मैं आपके मुखकमलसे झरती हुई भगवान्‌की सुधामयी लीला-कथाका पान कर रहा हूँ॥ १३॥"},{"b":27024,"kind":"topic_heading","page":121,"text":"सूत उवाच"},{"b":27025,"kind":"sanskrit_shloka","page":121,"verses":["10.1.14"],"text":"एवं निशम्य भृगुनन्दन साधुवादं"},{"b":27026,"kind":"sanskrit_shloka","page":121,"verses":["10.1.14"],"text":"वैयासकिः स भगवानथ विष्णुरातम्।"},{"b":27027,"kind":"sanskrit_shloka","page":121,"verses":["10.1.14"],"text":"प्रत्यर्च्य कृष्णचरितं कलिकल्मषघ्नं"},{"b":27028,"kind":"sanskrit_shloka","page":121,"verses":["10.1.14"],"text":"व्याहर्तुमारभत भागवतप्रधानः॥ १४"},{"b":27029,"kind":"hindi_commentary","page":121,"explains":["10.1.14"],"text":"सूतजी कहते हैं—शौनकजी! भगवान्‌के प्रेमियोंमें अग्रगण्य एवं सर्वज्ञ श्रीशुकदेवजी महाराजने परीक्षित‍्का ऐसा समीचीन प्रश्‍न सुनकर (जो संतोंकी सभामें भगवान्‌की लीलाके वर्णनका हेतु हुआ करता है) उनका अभिनन्दन किया और भगवान् श्रीकृष्णकी उन लीलाओंका वर्णन प्रारम्भ किया, जो समस्त कलिमलोंको सदाके लिये धो डालती है॥ १४॥"},{"b":27030,"kind":"topic_heading","page":121,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":27031,"kind":"sanskrit_shloka","page":121,"verses":["10.1.15"],"text":"सम्यग्व्यवसिता बुद्धिस्तव राजर्षिसत्तम।"},{"b":27032,"kind":"hindi_commentary","page":121,"verses":["10.1.15"],"text":"वासुदेवकथायां ते यज्जाता नैष्ठिकी रतिः॥ १५"},{"b":27033,"kind":"sanskrit_shloka","page":121,"verses":["10.1.16"],"text":"वासुदेवकथाप्रश्‍नः पुरुषांस्त्रीन् पुनाति हि।"},{"b":27034,"kind":"sanskrit_shloka","page":121,"verses":["10.1.16"],"text":"वक्तारं पृच्छकं श्रोतॄंस्तत्पादसलिलं यथा॥ १६"},{"b":27035,"kind":"hindi_commentary","page":121,"explains":["10.1.15","10.1.16"],"text":"श्रीशुकदेवजीने कहा—भगवान्‌के लीला-रसके रसिक राजर्षे! तुमने जो कुछ निश्‍चय किया है, वह बहुत ही सुन्दर और आदरणीय है; क्योंकि सबके हृदयाराध्य श्रीकृष्णकी लीला-कथा श्रवण करनेमें तुम्हें सहज एवं सुदृढ़ प्रीति प्राप्त हो गयी है॥ १५॥ भगवान् श्रीकृष्णकी कथाके सम्बन्धमें प्रश्‍न करनेसे ही वक्ता, प्रश्‍नकर्ता और श्रोता तीनों ही पवित्र हो जाते हैं—जैसे गंगाजीका जल या भगवान् शालग्रामका चरणामृत सभीको पवित्र कर देता है॥ १६॥"},{"b":27036,"kind":"sanskrit_shloka","page":121,"verses":["10.1.17"],"text":"भूमिर्दृप्तनृपव्याजदैत्यानीकशतायुतैः ।"},{"b":27037,"kind":"sanskrit_shloka","page":121,"verses":["10.1.17"],"text":"आक्रान्ता भूरिभारेण ब्रह्माणं शरणं ययौ॥ १७"},{"b":27038,"kind":"hindi_translation","page":121,"explains":["10.1.17"],"text":"परीक्षित्! उस समय लाखों दैत्योंके दलने घमंडी राजाओंका रूप धारण कर अपने भारी भारसे पृथ्वीको आक्रान्त कर रखा था। उससे त्राण पानेके लिये वह ब्रह्माजीकी शरणमें गयी॥ १७॥"},{"b":27039,"kind":"sanskrit_shloka","page":122,"verses":["10.1.18"],"text":"गौर्भूत्वाश्रुमुखी खिन्‍ना क्रन्दन्ती करुणं विभोः।"},{"b":27040,"kind":"hindi_commentary","page":122,"verses":["10.1.18"],"text":"उपस्थितान्तिके तस्मै व्यसनं स्वमवोचत॥ १८"},{"b":27041,"kind":"sanskrit_shloka","page":122,"verses":["10.1.19"],"text":"ब्रह्मा तदुपधार्याथ सह देवैस्तया सह।"},{"b":27042,"kind":"sanskrit_shloka","page":122,"verses":["10.1.19"],"text":"जगाम सत्रिनयनस्तीरं क्षीरपयोनिधेः॥ १९"},{"b":27043,"kind":"sanskrit_shloka","page":122,"verses":["10.1.20"],"text":"तत्र गत्वा जगन्‍नाथं देवदेवं वृषाकपिम्।"},{"b":27044,"kind":"sanskrit_shloka","page":122,"verses":["10.1.20"],"text":"पुरुषं पुरुषसूक्तेन उपतस्थे समाहितः॥ २०"},{"b":27045,"kind":"sanskrit_shloka","page":122,"verses":["10.1.21"],"text":"गिरं समाधौ गगने समीरितां"},{"b":27046,"kind":"sanskrit_shloka","page":122,"verses":["10.1.21"],"text":"निशम्य वेधास्त्रिदशानुवाच ह।"},{"b":27047,"kind":"sanskrit_shloka","page":122,"verses":["10.1.21"],"text":"गां पौरुषीं मे शृणुतामराः पुन-"},{"b":27048,"kind":"sanskrit_shloka","page":122,"verses":["10.1.21"],"text":"र्विधीयतामाशु तथैव मा चिरम्॥ २१"},{"b":27049,"kind":"sanskrit_shloka","page":122,"verses":["10.1.22"],"text":"पुरैव पुंसावधृतो धराज्वरो"},{"b":27050,"kind":"sanskrit_shloka","page":122,"verses":["10.1.22"],"text":"भवद्भिरंशैर्यदुषूपजन्यताम् ।"},{"b":27051,"kind":"sanskrit_shloka","page":122,"verses":["10.1.22"],"text":"स यावदुर्व्या भरमीश्‍वरेश्‍वरः"},{"b":27052,"kind":"sanskrit_shloka","page":122,"verses":["10.1.22"],"text":"स्वकालशक्त्या क्षपयंश्‍चरेद् भुवि॥ २२"},{"b":27053,"kind":"sanskrit_shloka","page":122,"verses":["10.1.23"],"text":"वसुदेवगृहे साक्षाद् भगवान् पुरुषः परः।"},{"b":27054,"kind":"hindi_commentary","page":122,"verses":["10.1.23"],"text":"जनिष्यते तत्प्रियार्थं सम्भवन्तु सुरस्त्रियः॥ २३"},{"b":27055,"kind":"hindi_translation","page":122,"explains":["10.1.18","10.1.19","10.1.20","10.1.21","10.1.22","10.1.23"],"text":"पृथ्वीने उस समय गौका रूप धारण कर रखा था। उसके नेत्रोंसे आँसू बह-बहकर मुँहपर आ रहे थे। उसका मन तो खिन्‍न था ही, शरीर भी बहुत कृश हो गया था। वह बड़े करुण स्वरसे रँभा रही थी। ब्रह्माजीके पास जाकर उसने उन्हें अपनी पूरी कष्ट-कहानी सुनायी॥ १८॥ ब्रह्माजीने बड़ी सहानुभूतिके साथ उसकी दुःख-गाथा सुनी। उसके बाद वे भगवान् शंकर, स्वर्गके अन्यान्य प्रमुख देवता तथा गौके रूपमें आयी हुई पृथ्वीको अपने साथ लेकर क्षीरसागरके तटपर गये॥ १९॥ भगवान् देवताओंके भी आराध्यदेव हैं। वे अपने भक्तोंकी समस्त अभिलाषाएँ पूर्ण करते और उनके समस्त क्लेशोंको नष्ट कर देते हैं। वे ही जगत‍्के एकमात्र स्वामी हैं। क्षीरसागरके तटपर पहुँचकर ब्रह्मा आदि देवताओंने ‘पुरुषसूक्त’ के द्वारा उन्हीं परम पुरुष सर्वान्तर्यामी प्रभुकी स्तुति की। स्तुति करते-करते ब्रह्माजी समाधिस्थ हो गये॥ २०॥ उन्होंने समाधि-अवस्थामें आकाशवाणी सुनी। इसके बाद जगत‍्के निर्माणकर्ता ब्रह्माजीने देवताओंसे कहा—‘देवताओ! मैंने भगवान्‌की वाणी सुनी है। तुमलोग भी उसे मेरे द्वारा अभी सुन लो और फिर वैसा ही करो। उसके पालनमें विलम्ब नहीं होना चाहिये॥ २१॥ भगवान्‌को पृथ्वीके कष्टका पहलेसे ही पता है। वे ईश्‍वरोंके भी ईश्‍वर हैं। अतः अपनी कालशक्तिके द्वारा पृथ्वीका भार हरण करते हुए वे जबतक पृथ्वीपर लीला करें, तबतक तुम लोग भी अपने-अपने अंशोंके साथ यदुकुलमें जन्म लेकर उनकी लीलामें सहयोग दो॥ २२॥ वसुदेवजीके घर स्वयं पुरुषोत्तम भगवान् प्रकट होंगे। उनकी और उनकी प्रियतमा (श्रीराधा) की सेवाके लिये देवांगनाएँ जन्म ग्रहण करें॥ २३॥"},{"b":27056,"kind":"sanskrit_shloka","page":122,"verses":["10.1.24"],"text":"वासुदेवकलानन्तः सहस्रवदनः स्वराट्।"},{"b":27057,"kind":"sanskrit_shloka","page":122,"verses":["10.1.24"],"text":"अग्रतो भविता देवो हरेः प्रियचिकीर्षया॥ २४"},{"b":27058,"kind":"sanskrit_shloka","page":123,"verses":["10.1.25"],"text":"विष्णोर्माया भगवती यया सम्मोहितं जगत्।"},{"b":27059,"kind":"sanskrit_shloka","page":123,"verses":["10.1.25"],"text":"आदिष्टा प्रभुणांशेन कार्यार्थे सम्भविष्यति॥ २५"},{"b":27060,"kind":"hindi_translation","page":122,"explains":["10.1.24","10.1.25"],"text":"स्वयंप्रकाश भगवान् शेष भी, जो भगवान्‌की कला होनेके कारण अनन्त हैं (अनन्तका अंश भी अनन्त ही होता है) और जिनके सहस्र मुख हैं, भगवान्‌के प्रिय कार्य करनेके लिये उनसे पहले ही उनके बड़े भाईके रूपमें अवतार ग्रहण करेंगे॥ २४॥ भगवान्‌की वह ऐश्‍वर्यशालिनी योगमाया भी, जिसने सारे जगत‍्को मोहित कर रखा है, उनकी आज्ञासे उनकी लीलाके कार्य सम्पन्‍न करनेके लिये अंशरूपसे अवतार ग्रहण करेगी’॥ २५॥"},{"b":27061,"kind":"topic_heading","page":121,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":27062,"kind":"sanskrit_shloka","page":123,"verses":["10.1.26"],"text":"इत्यादिश्यामरगणान् प्रजापतिपतिर्विभुः।"},{"b":27063,"kind":"sanskrit_shloka","page":123,"verses":["10.1.26"],"text":"आश्‍वास्य च महीं गीर्भिः स्वधाम परमं ययौ॥ २६"},{"b":27064,"kind":"sanskrit_shloka","page":123,"verses":["10.1.27"],"text":"शूरसेनो यदुपतिर्मथुरामावसन् पुरीम्।"},{"b":27065,"kind":"sanskrit_shloka","page":123,"verses":["10.1.27"],"text":"माथुराञ्छूरसेनांश्‍च विषयान् बुभुजे पुरा॥ २७"},{"b":27066,"kind":"sanskrit_shloka","page":123,"verses":["10.1.28"],"text":"राजधानी ततः साभूत् सर्वयादवभूभुजाम्।"},{"b":27067,"kind":"sanskrit_shloka","page":123,"verses":["10.1.28"],"text":"मथुरा भगवान् यत्र नित्यं संनिहितो हरिः॥ २८"},{"b":27068,"kind":"sanskrit_shloka","page":123,"verses":["10.1.29"],"text":"तस्यां तु कर्हिचिच्छौरिर्वसुदेवः कृतोद्वहः।"},{"b":27069,"kind":"sanskrit_shloka","page":123,"verses":["10.1.29"],"text":"देवक्या सूर्यया सार्धं प्रयाणे रथमारुहत्॥ २९"},{"b":27070,"kind":"sanskrit_shloka","page":123,"verses":["10.1.30"],"text":"उग्रसेनसुतः कंसः स्वसुः प्रियचिकीर्षया।"},{"b":27071,"kind":"sanskrit_shloka","page":123,"verses":["10.1.30"],"text":"रश्मीन् हयानां जग्राह रौक्मै रथशतैर्वृतः॥ ३०"},{"b":27072,"kind":"sanskrit_shloka","page":123,"verses":["10.1.31"],"text":"चतुःशतं पारिबर्हं गजानां हेममालिनाम्।"},{"b":27073,"kind":"sanskrit_shloka","page":123,"verses":["10.1.31"],"text":"अश्‍वानामयुतं सार्धं रथानां च त्रिषट्शतम्॥ ३१"},{"b":27074,"kind":"sanskrit_shloka","page":123,"verses":["10.1.32"],"text":"दासीनां सुकुमारीणां द्वे शते समलंकृते।"},{"b":27075,"kind":"sanskrit_shloka","page":123,"verses":["10.1.32"],"text":"दुहित्रे देवकः प्रादाद् याने दुहितृवत्सलः॥ ३२"},{"b":27076,"kind":"sanskrit_shloka","page":123,"verses":["10.1.33"],"text":"शंखतूर्यमृदंगाश्‍च नेदुर्दुन्दुभयः समम्।"},{"b":27077,"kind":"sanskrit_shloka","page":123,"verses":["10.1.33"],"text":"प्रयाणप्रक्रमे तावद् वरवध्वोः सुमंगलम्॥ ३३"},{"b":27078,"kind":"sanskrit_shloka","page":123,"verses":["10.1.34"],"text":"पथि प्रग्रहिणं कंसमाभाष्याहाशरीरवाक्।"},{"b":27079,"kind":"sanskrit_shloka","page":123,"verses":["10.1.34"],"text":"अस्यास्त्वामष्टमो गर्भो हन्ता यां वहसेऽबुध॥ ३४"},{"b":27080,"kind":"sanskrit_shloka","page":123,"verses":["10.1.35"],"text":"इत्युक्तः स खलः पापो भोजानां कुलपांसनः।"},{"b":27081,"kind":"sanskrit_shloka","page":123,"verses":["10.1.35"],"text":"भगिनीं हन्तुमारब्धः खड्गपाणिः कचेऽग्रहीत्॥ ३५"},{"b":27082,"kind":"sanskrit_shloka","page":124,"verses":["10.1.36"],"text":"तं जुगुप्सितकर्माणं नृशंसं निरपत्रपम्।"},{"b":27083,"kind":"sanskrit_shloka","page":124,"verses":["10.1.36"],"text":"वसुदेवो महाभाग उवाच परिसान्त्वयन्॥ ३६"},{"b":27084,"kind":"hindi_commentary","page":123,"explains":["10.1.26","10.1.27","10.1.28","10.1.29","10.1.30","10.1.31","10.1.32","10.1.33","10.1.34","10.1.35","10.1.36"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! प्रजापतियोंके स्वामी भगवान् ब्रह्माजीने देवताओंको इस प्रकार आज्ञा दी और पृथ्वीको समझा-बुझाकर ढाढ़स बँधाया। इसके बाद वे अपने परम धामको चले गये॥ २६॥ प्राचीन कालमें यदुवंशी राजा थे शूरसेन। वे मथुरापुरीमें रहकर माथुरमण्डल और शूरसेनमण्डलका राज्यशासन करते थे॥ २७॥ उसी समयसे मथुरा ही समस्त यदुवंशी नरपतियोंकी राजधानी हो गयी थी। भगवान् श्रीहरि सर्वदा वहाँ विराजमान रहते हैं॥ २८॥ एक बार मथुरामें शूरके पुत्र वसुदेवजी विवाह करके अपनी नवविवाहिता पत्‍नी देवकीके साथ घर जानेके लिये रथपर सवार हुए॥ २९॥ उग्रसेनका लड़का था कंस। उसने अपनी चचेरी बहिन देवकीको प्रसन्‍न करनेके लिये उसके रथके घोड़ोंकी रास पकड़ ली। वह स्वयं ही रथ हाँकने लगा, यद्यपि उसके साथ सैकड़ों सोनेके बने हुए रथ चल रहे थे॥ ३०॥ देवकीके पिता थे देवक। अपनी पुत्रीपर उनका बड़ा प्रेम था। कन्याको विदा करते समय उन्होंने उसे सोनेके हारोंसे अलंकृत चार सौ हाथी, पंद्रह हजार घोड़े, अठारह सौ रथ तथा सुन्दर-सुन्दर वस्त्राभूषणोंसे विभूषित दो सौ सुकुमारी दासियाँ दहेजमें दीं॥ ३१-३२॥ विदाईके समय वर-वधूके मंगलके लिये एक ही साथ शंख, तुरही, मृदंग और दुन्दुभियाँ बजने लगीं॥ ३३॥ मार्गमें जिस समय घोड़ोंकी रास पकड़कर कंस रथ हाँक रहा था, उस समय आकाशवाणीने उसे सम्बोधन करके कहा—‘अरे मूर्ख! जिसको तू रथमें बैठाकर लिये जा रहा है, उसकी आठवें गर्भकी सन्तान तुझे मार डालेगी’॥ ३४॥ कंस बड़ा पापी था। उसकी दुष्टताकी सीमा नहीं थी। वह भोजवंशका कलंक ही था। आकाशवाणी सुनते ही उसने तलवार खींच ली और अपनी बहिनकी चोटी पकड़कर उसे मारनेके लिये तैयार हो गया॥ ३५॥ वह अत्यन्त क्रूर तो था ही, पाप-कर्म करते-करते निर्लज्ज भी हो गया था। उसका यह काम देखकर महात्मा वसुदेवजी उसको शान्त करते हुए बोले—॥ ३६॥"},{"b":27085,"kind":"topic_heading","page":124,"text":"वसुदेव उवाच"},{"b":27086,"kind":"sanskrit_shloka","page":124,"verses":["10.1.37"],"text":"श्‍लाघनीयगुणः शूरैर्भवान् भोजयशस्करः।"},{"b":27087,"kind":"sanskrit_shloka","page":124,"verses":["10.1.37"],"text":"स कथं भगिनीं हन्यात् स्त्रियमुद्वाहपर्वणि॥ ३७"},{"b":27088,"kind":"sanskrit_shloka","page":124,"verses":["10.1.38"],"text":"मृत्युर्जन्मवतां वीर देहेन सह जायते।"},{"b":27089,"kind":"sanskrit_shloka","page":124,"verses":["10.1.38"],"text":"अद्य वाब्दशतान्ते वा मृत्युर्वै प्राणिनां ध्रुवः॥ ३८"},{"b":27090,"kind":"sanskrit_shloka","page":124,"verses":["10.1.39"],"text":"देहे पंचत्वमापन्‍ने देही कर्मानुगोऽवशः।"},{"b":27091,"kind":"sanskrit_shloka","page":124,"verses":["10.1.39"],"text":"देहान्तरमनुप्राप्य प्राक्तनं त्यजते वपुः॥ ३९"},{"b":27092,"kind":"sanskrit_shloka","page":124,"verses":["10.1.40"],"text":"व्रजंस्तिष्ठन् पदैकेन यथैवैकेन गच्छति।"},{"b":27093,"kind":"sanskrit_shloka","page":124,"verses":["10.1.40"],"text":"यथा तृणजलूकैवं देही कर्मगतिं गतः॥ ४०"},{"b":27094,"kind":"sanskrit_shloka","page":124,"verses":["10.1.41"],"text":"स्वप्ने यथा पश्यति देहमीदृशं"},{"b":27095,"kind":"sanskrit_shloka","page":124,"verses":["10.1.41"],"text":"मनोरथेनाभिनिविष्टचेतनः ।"},{"b":27096,"kind":"sanskrit_shloka","page":124,"verses":["10.1.41"],"text":"दृष्टश्रुताभ्यां मनसानुचिन्तयन्"},{"b":27097,"kind":"sanskrit_shloka","page":124,"verses":["10.1.41"],"text":"प्रपद्यते तत् किमपि ह्यपस्मृतिः॥ ४१"},{"b":27098,"kind":"sanskrit_shloka","page":124,"verses":["10.1.42"],"text":"यतो यतो धावति दैवचोदितं"},{"b":27099,"kind":"sanskrit_shloka","page":124,"verses":["10.1.42"],"text":"मनो विकारात्मकमाप पंचसु।"},{"b":27100,"kind":"sanskrit_shloka","page":124,"verses":["10.1.42"],"text":"गुणेषु मायारचितेषु देह्यसौ"},{"b":27101,"kind":"sanskrit_shloka","page":124,"verses":["10.1.42"],"text":"प्रपद्यमानः सह तेन जायते॥ ४२"},{"b":27102,"kind":"sanskrit_shloka","page":125,"verses":["10.1.43"],"text":"ज्योतिर्यथैवोदकपार्थिवेष्वदः"},{"b":27103,"kind":"sanskrit_shloka","page":125,"verses":["10.1.43"],"text":"समीरवेगानुगतं विभाव्यते।"},{"b":27104,"kind":"sanskrit_shloka","page":125,"verses":["10.1.43"],"text":"एवं स्वमायारचितेष्वसौ पुमान्"},{"b":27105,"kind":"sanskrit_shloka","page":125,"verses":["10.1.43"],"text":"गुणेषु रागानुगतो विमुह्यति॥ ४३"},{"b":27106,"kind":"sanskrit_shloka","page":125,"verses":["10.1.44"],"text":"तस्मान्‍न कस्यचिद् द्रोहमाचरेत् स तथाविधः।"},{"b":27107,"kind":"sanskrit_shloka","page":125,"verses":["10.1.44"],"text":"आत्मनः क्षेममन्विच्छन् द्रोग्धुर्वै परतो भयम्॥ ४४"},{"b":27108,"kind":"sanskrit_shloka","page":125,"verses":["10.1.45"],"text":"एषा तवानुजा बाला कृपणा पुत्रिकोपमा।"},{"b":27109,"kind":"sanskrit_shloka","page":125,"verses":["10.1.45"],"text":"हन्तुं नार्हसि कल्याणीमिमां त्वं दीनवत्सलः॥ ४५"},{"b":27110,"kind":"hindi_commentary","page":124,"explains":["10.1.37","10.1.38","10.1.39","10.1.40","10.1.41","10.1.42","10.1.43","10.1.44","10.1.45"],"text":"वसुदेवजीने कहा—राजकुमार! आप भोजवंशके होनहार वंशधर तथा अपने कुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले हैं। बड़े-बड़े शूरवीर आपके गुणोंकी सराहना करते हैं। इधर यह एक तो स्त्री, दूसरे आपकी बहिन और तीसरे यह विवाहका शुभ अवसर! ऐसी स्थितिमें आप इसे कैसे मार सकते हैं?॥ ३७॥ वीरवर! जो जन्म लेते हैं, उनके शरीरके साथ ही मृत्यु भी उत्पन्‍न होती है। आज हो या सौ वर्षके बाद—जो प्राणी है, उसकी मृत्यु होगी ही॥ ३८॥ जब शरीरका अन्त हो जाता है, तब जीव अपने कर्मके अनुसार दूसरे शरीरको ग्रहण करके अपने पहले शरीरको छोड़ देता है। उसे विवश होकर ऐसा करना पड़ता है॥ ३९॥ जैसे चलते समय मनुष्य एक पैर जमाकर ही दूसरा पैर उठाता है और जैसे जोंक किसी अगले तिनकेको पकड़ लेती है, तब पहलेके पकड़े हुए तिनकेको छोड़ती है—वैसे जीव भी अपने कर्मके अनुसार किसी शरीरको प्राप्त करनेके बाद ही इस शरीरको छोड़ता है॥ ४०॥ जैसे कोई पुरुष जाग्रत्-अवस्थामें राजाके ऐश्‍वर्यको देखकर और इन्द्रादिके ऐश्‍वर्यको सुनकर उसकी अभिलाषा करने लगता है और उसका चिन्तन करते-करते उन्हीं बातोंमें घुल-मिलकर एक हो जाता है तथा स्वप्नमें अपनेको राजा या इन्द्रके रूपमें अनुभव करने लगता है, साथ ही अपने दरिद्रावस्थाके शरीरको भूल जाता है। कभी-कभी तो जाग्रत् अवस्थामें ही मन-ही-मन उन बातोंका चिन्तन करते-करते तन्मय हो जाता है और उसे स्थूल शरीरकी सुधि नहीं रहती। वैसे ही जीव कर्मकृत कामना और कामनाकृत कर्मके वश होकर दूसरे शरीरको प्राप्त हो जाता है और अपने पहले शरीरको भूल जाता है॥ ४१॥ जीवका मन अनेक विकारोंका पुंज है। देहान्तके समय वह अनेक जन्मोंके संचित और प्रारब्ध कर्मोंकी वासनाओंके अधीन होकर मायाके द्वारा रचे हुए अनेक पांचभौतिक शरीरोंमेंसे जिस किसी शरीरके चिन्तनमें तल्लीन हो जाता है और मान बैठता है कि यह मैं हूँ, उसे वही शरीर ग्रहण करके जन्म लेना पड़ता है॥ ४२॥ जैसे सूर्य, चन्द्रमा आदि चमकीली वस्तुएँ जलसे भरे हुए घड़ोंमें या तेल आदि तरल पदार्थोंमें प्रतिबिम्बित होती हैं और हवाके झोंकेसे उनके जल आदिके हिलने-डोलनेपर उनमें प्रतिबिम्बित वस्तुएँ भी चंचल जान पड़ती हैं—वैसे ही जीव अपने स्वरूपके अज्ञानद्वारा रचे हुए शरीरोंमें राग करके उन्हें अपना आप मान बैठता है और मोहवश उनके आने-जानेको अपना आना-जाना मानने लगता है॥ ४३॥ इसलिये जो अपना कल्याण चाहता है, उसे किसीसे द्रोह नहीं करना चाहिये; क्योंकि जीव कर्मके अधीन हो गया है और जो किसीसे भी द्रोह करेगा, उसको इस जीवनमें शत्रुसे और जीवनके बाद परलोकसे भयभीत होना ही पड़ेगा॥ ४४॥ कंस! यह आपकी छोटी बहिन अभी बच्ची और बहुत दीन है। यह तो आपकी कन्याके समान है। इसपर, अभी-अभी इसका विवाह हुआ है, विवाहके मंगलचिह्न भी इसके शरीरपरसे नहीं उतरे हैं। ऐसी दशामें आप-जैसे दीनवत्सल पुरुषको इस बेचारीका वध करना उचित नहीं है॥ ४५॥"},{"b":27111,"kind":"topic_heading","page":125,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":27112,"kind":"sanskrit_shloka","page":125,"verses":["10.1.46"],"text":"एवं स सामभिर्भेदैर्बोध्यमानोऽपि दारुणः।"},{"b":27113,"kind":"sanskrit_shloka","page":125,"verses":["10.1.46"],"text":"न न्यवर्तत कौरव्य पुरुषादाननुव्रतः॥ ४६"},{"b":27114,"kind":"sanskrit_shloka","page":125,"verses":["10.1.47"],"text":"निर्बन्धं तस्य तं ज्ञात्वा विचिन्त्यानकदुन्दुभिः।"},{"b":27115,"kind":"sanskrit_shloka","page":125,"verses":["10.1.47"],"text":"प्राप्तं कालं प्रतिव्योढुमिदं तत्रान्वपद्यत॥ ४७"},{"b":27116,"kind":"sanskrit_shloka","page":125,"verses":["10.1.48"],"text":"मृत्युर्बुद्धिमतापोह्यो यावद्बुद्धिबलोदयम्।"},{"b":27117,"kind":"sanskrit_shloka","page":125,"verses":["10.1.48"],"text":"यद्यसौ न निवर्तेत नापराधोऽस्ति देहिनः॥ ४८"},{"b":27118,"kind":"sanskrit_shloka","page":125,"verses":["10.1.49"],"text":"प्रदाय मृत्यवे पुत्रान् मोचये कृपणामिमाम्।"},{"b":27119,"kind":"sanskrit_shloka","page":125,"verses":["10.1.49"],"text":"सुता मे यदि जायेरन् मृत्युर्वा न म्रियेत चेत्॥ ४९"},{"b":27120,"kind":"sanskrit_shloka","page":125,"verses":["10.1.50"],"text":"विपर्ययो वा किं न स्याद् गतिर्धातुर्दुरत्यया।"},{"b":27121,"kind":"sanskrit_shloka","page":125,"verses":["10.1.50"],"text":"उपस्थितो निवर्तेत निवृत्तः पुनरापतेत्॥ ५०"},{"b":27122,"kind":"sanskrit_shloka","page":126,"verses":["10.1.51"],"text":"अ‌ग्‍नेर्यथा दारुवियोगयोगयो-"},{"b":27123,"kind":"sanskrit_shloka","page":126,"verses":["10.1.51"],"text":"रदृष्टतोऽन्यन्‍न निमित्तमस्ति।"},{"b":27124,"kind":"sanskrit_shloka","page":126,"verses":["10.1.51"],"text":"एवं हि जन्तोरपि दुर्विभाव्यः"},{"b":27125,"kind":"sanskrit_shloka","page":126,"verses":["10.1.51"],"text":"शरीरसंयोगवियोगहेतुः ॥ ५१"},{"b":27126,"kind":"sanskrit_shloka","page":126,"verses":["10.1.52"],"text":"एवं विमृश्य तं पापं यावदात्मनिदर्शनम्।"},{"b":27127,"kind":"sanskrit_shloka","page":126,"verses":["10.1.52"],"text":"पूजयामास वै शौरिर्बहुमानपुरःसरम्॥ ५२"},{"b":27128,"kind":"sanskrit_shloka","page":126,"verses":["10.1.53"],"text":"प्रसन्‍नवदनाम्भोजो नृशंसं निरपत्रपम्।"},{"b":27129,"kind":"sanskrit_shloka","page":126,"verses":["10.1.53"],"text":"मनसा दूयमानेन विहसन्‍निदमब्रवीत्॥ ५३"},{"b":27130,"kind":"hindi_commentary","page":125,"explains":["10.1.46","10.1.47","10.1.48","10.1.49","10.1.50","10.1.51","10.1.52","10.1.53"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! इस प्रकार वसुदेवजीने प्रशंसा आदि सामनीति और भय आदि भेदनीतिसे कंसको बहुत समझाया। परन्तु वह क्रूर तो राक्षसोंका अनुयायी हो रहा था; इसलिये उसने अपने घोर संकल्पको नहीं छोड़ा॥ ४६॥ वसुदेवजीने कंसका विकट हठ देखकर यह विचार किया कि किसी प्रकार यह समय तो टाल ही देना चाहिये। तब वे इस निश्‍चयपर पहुँचे॥ ४७॥ ‘बुद्धिमान् पुरुषको, जहाँतक उसकी बुद्धि और बल साथ दें, मृत्युको टालनेका प्रयत्‍न करना चाहिये। प्रयत्‍न करनेपर भी वह न टल सके, तो फिर प्रयत्‍न करनेवालेका कोई दोष नहीं रहता॥ ४८॥ इसलिये इस मृत्युरूप कंसको अपने पुत्र दे देनेकी प्रतिज्ञा करके मैं इस दीन देवकीको बचा लूँ। यदि मेरे लड़के होंगे और तबतक यह कंस स्वयं नहीं मर जायगा, तब क्या होगा?॥ ४९॥ सम्भव है, उलटा ही हो। मेरा लड़का ही इसे मार डाले! क्योंकि विधाताके विधानका पार पाना बहुत कठिन है । मृत्यु सामने आकर भी टल जाती है और टली हुई भी लौट आती है॥ ५०॥ जिस समय वनमें आग लगती है, उस समय कौन-सी लकड़ी जले और कौन-सी न जले, दूरकी जल जाय और पासकी बच रहे—इन सब बातोंमें अदृष्टके सिवा और कोई कारण नहीं होता। वैसे ही किस प्राणीका कौन-सा शरीर बना रहेगा और किस हेतुसे कौन-सा शरीर नष्ट हो जायगा—इस बातका पता लगा लेना बहुत ही कठिन है’॥ ५१॥ अपनी बुद्धिके अनुसार ऐसा निश्‍चय करके वसुदेवजीने बहुत सम्मानके साथ पापी कंसकी बड़ी प्रशंसा की॥ ५२॥ परीक्षित्! कंस बड़ा क्रूर और निर्लज्ज था; अतः ऐसा करते समय वसुदेवजीके मनमें बड़ी पीड़ा भी हो रही थी। फिर भी उन्होंने ऊपरसे अपने मुखकमलको प्रफुल्लित करके हँसते हुए कहा—॥ ५३॥"},{"b":27131,"kind":"topic_heading","page":124,"text":"वसुदेव उवाच"},{"b":27132,"kind":"sanskrit_shloka","page":126,"verses":["10.1.54"],"text":"न ह्यस्यास्ते भयं सौम्य यद् वागाहाशरीरिणी।"},{"b":27133,"kind":"sanskrit_shloka","page":126,"verses":["10.1.54"],"text":"पुत्रान् समर्पयिष्येऽस्या यतस्ते भयमुत्थितम्॥ ५४"},{"b":27134,"kind":"hindi_commentary","page":126,"explains":["10.1.54"],"text":"वसुदेवजीने कहा—सौम्य! आपको देवकीसे तो कोई भय है नहीं, जैसा कि आकाशवाणीने कहा है । भय है पुत्रोंसे, सो इसके पुत्र मैं आपको लाकर सौंप दूँगा॥ ५४॥"},{"b":27135,"kind":"topic_heading","page":125,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":27136,"kind":"sanskrit_shloka","page":126,"verses":["10.1.55"],"text":"स्वसुर्वधान्‍निववृते कंसस्तद्वाक्यसारवित्।"},{"b":27137,"kind":"sanskrit_shloka","page":126,"verses":["10.1.55"],"text":"वसुदेवोऽपि तं प्रीतः प्रशस्य प्राविशद् गृहम्॥ ५५"},{"b":27138,"kind":"sanskrit_shloka","page":126,"verses":["10.1.56"],"text":"अथ काल उपावृत्ते देवकी सर्वदेवता।"},{"b":27139,"kind":"sanskrit_shloka","page":126,"verses":["10.1.56"],"text":"पुत्रान् प्रसुषुवे चाष्टौ कन्यां चैवानुवत्सरम्॥ ५६"},{"b":27140,"kind":"sanskrit_shloka","page":126,"verses":["10.1.57"],"text":"कीर्तिमन्तं प्रथमजं कंसायानकदुन्दुभिः।"},{"b":27141,"kind":"sanskrit_shloka","page":126,"verses":["10.1.57"],"text":"अर्पयामास कृच्छ्रेण सोऽनृतादतिविह्वलः॥ ५७"},{"b":27142,"kind":"sanskrit_shloka","page":126,"verses":["10.1.58"],"text":"किं दुःसहं नु साधूनां विदुषां किमपेक्षितम्।"},{"b":27143,"kind":"sanskrit_shloka","page":126,"verses":["10.1.58"],"text":"किमकार्यं कदर्याणां दुस्त्यजं किं धृतात्मनाम्॥ ५८"},{"b":27144,"kind":"hindi_commentary","page":126,"explains":["10.1.55","10.1.56","10.1.57","10.1.58"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! कंस जानता था कि वसुदेवजीके वचन झूठे नहीं होते और इन्होंने जो कुछ कहा है, वह युक्तिसंगत भी है। इसलिये उसने अपनी बहिन देवकीको मारनेका विचार छोड़ दिया। इससे वसुदेवजी बहुत प्रसन्‍न हुए और उसकी प्रशंसा करके अपने घर चले आये॥ ५५॥ देवकी बड़ी सती-साध्वी थी। सारे देवता उसके शरीरमें निवास करते थे। समय आनेपर देवकीके गर्भसे प्रतिवर्ष एक-एक करके आठ पुत्र तथा एक कन्या उत्पन्‍न हुई॥ ५६॥ पहले पुत्रका नाम था कीर्तिमान्। वसुदेवजीने उसे लाकर कंसको दे दिया। ऐसा करते समय उन्हें कष्ट तो अवश्य हुआ, परन्तु उससे भी बड़ा कष्ट उन्हें इस बातका था कि कहीं मेरे वचन झूठे न हो जायँ॥ ५७॥ परीक्षित्! सत्यसन्ध पुरुष बड़े-से-बड़ा कष्ट भी सह लेते हैं, ज्ञानियोंको किसी बातकी अपेक्षा नहीं होती, नीच पुरुष बुरे-से-बुरा काम भी कर सकते हैं और जो जितेन्द्रिय हैं—जिन्होंने भगवान्‌को हृदयमें धारण कर रखा है, वे सब कुछ त्याग सकते हैं॥ ५८॥"},{"b":27145,"kind":"sanskrit_shloka","page":127,"verses":["10.1.59"],"text":"दृष्ट्वा समत्वं तच्छौरेः सत्ये चैव व्यवस्थितिम्।"},{"b":27146,"kind":"sanskrit_shloka","page":127,"verses":["10.1.59"],"text":"कंसस्तुष्टमना राजन् प्रहसन्‍निदमब्रवीत्॥ ५९"},{"b":27147,"kind":"sanskrit_shloka","page":127,"verses":["10.1.60"],"text":"प्रतियातु कुमारोऽयं न ह्यस्मादस्ति मे भयम्।"},{"b":27148,"kind":"sanskrit_shloka","page":127,"verses":["10.1.60"],"text":"अष्टमाद् युवयोर्गर्भान्मृत्युर्मे विहितः किल॥ ६०"},{"b":27149,"kind":"sanskrit_shloka","page":127,"verses":["10.1.61"],"text":"तथेति सुतमादाय ययावानकदुन्दुभिः।"},{"b":27150,"kind":"sanskrit_shloka","page":127,"verses":["10.1.61"],"text":"नाभ्यनन्दत तद्वाक्यमसतोऽविजितात्मनः॥ ६१"},{"b":27151,"kind":"hindi_translation","page":127,"explains":["10.1.59","10.1.60","10.1.61"],"text":"जब कंसने देखा कि वसुदेवजीका अपने पुत्रके जीवन और मृत्युमें समान भाव है एवं वे सत्यमें पूर्ण निष्ठावान् भी हैं, तब वह बहुत प्रसन्‍न हुआ और उनसे हँसकर बोला॥ ५९॥ वसुदेवजी! आप इस नन्हे-से सुकुमार बालकको ले जाइये। इससे मुझे कोई भय नहीं है। क्योंकि आकाशवाणीने तो ऐसा कहा था कि देवकीके आठवें गर्भसे उत्पन्‍न सन्तानके द्वारा मेरी मृत्यु होगी॥ ६०॥ वसुदेवजीने कहा—‘ठीक है’ और उस बालकको लेकर वे लौट आये। परन्तु उन्हें मालूम था कि कंस बड़ा दुष्ट है और उसका मन उसके हाथमें नहीं है। वह किसी क्षण बदल सकता है। इसलिये उन्होंने उसकी बातपर विश्‍वास नहीं किया॥ ६१॥"},{"b":27152,"kind":"sanskrit_shloka","page":127,"verses":["10.1.62"],"text":"नन्दाद्या ये व्रजे गोपा याश्‍चामीषां च योषितः।"},{"b":27153,"kind":"sanskrit_shloka","page":127,"verses":["10.1.62"],"text":"वृष्णयो वसुदेवाद्या देवक्याद्या यदुस्त्रियः॥ ६२"},{"b":27154,"kind":"sanskrit_shloka","page":127,"verses":["10.1.63"],"text":"सर्वे वै देवताप्राया उभयोरपि भारत।"},{"b":27155,"kind":"sanskrit_shloka","page":127,"verses":["10.1.63"],"text":"ज्ञातयो बन्धुसुहृदो ये च कंसमनुव्रताः॥ ६३"},{"b":27156,"kind":"sanskrit_shloka","page":127,"verses":["10.1.64"],"text":"एतत् कंसाय भगवाञ्छशंसाभ्येत्य नारदः।"},{"b":27157,"kind":"sanskrit_shloka","page":127,"verses":["10.1.64"],"text":"भूमेर्भारायमाणानां दैत्यानां च वधोद्यमम्॥ ६४"},{"b":27158,"kind":"sanskrit_shloka","page":127,"verses":["10.1.65"],"text":"ऋषेर्विनिर्गमे कंसो यदून् मत्वा सुरानिति।"},{"b":27159,"kind":"sanskrit_shloka","page":127,"verses":["10.1.65"],"text":"देवक्या गर्भसम्भूतं विष्णुं च स्ववधं प्रति॥ ६५"},{"b":27160,"kind":"sanskrit_shloka","page":127,"verses":["10.1.66"],"text":"देवकीं वसुदेवं च निगृह्य निगडैर्गृहे।"},{"b":27161,"kind":"sanskrit_shloka","page":127,"verses":["10.1.66"],"text":"जातं जातमहन् पुत्रं तयोरजनशंकया॥ ६६"},{"b":27162,"kind":"sanskrit_shloka","page":127,"verses":["10.1.67"],"text":"मातरं पितरं भ्रातॄन् सर्वांश्‍च सुहृदस्तथा।"},{"b":27163,"kind":"sanskrit_shloka","page":127,"verses":["10.1.67"],"text":"घ्नन्ति ह्यसुतृपो लुब्धा राजानः प्रायशो भुवि॥ ६७"},{"b":27164,"kind":"hindi_translation","page":127,"explains":["10.1.62","10.1.63","10.1.64","10.1.65","10.1.66","10.1.67"],"text":"परीक्षित्! इधर भगवान् नारद कंसके पास आये और उससे बोले कि ‘कंस! व्रजमें रहनेवाले नन्द आदि गोप, उनकी स्त्रियाँ, वसुदेव आदि वृष्णिवंशी यादव, देवकी आदि यदुवंशकी स्त्रियाँ और नन्द, वसुदेव दोनोंके सजातीय बन्धु-बान्धव और सगे-सम्बन्धी—सब-के-सब देवता हैं; जो इस समय तुम्हारी सेवा कर रहे हैं, वे भी देवता ही हैं।’ उन्होंने यह भी बतलाया कि ‘दैत्योंके कारण पृथ्वीका भार बढ़ गया है, इसलिये देवताओंकी ओरसे अब उनके वधकी तैयारी की जा रही है’॥ ६२—६४॥ जब देवर्षि नारद इतना कहकर चले गये, तब कंसको यह निश्‍चय हो गया कि यदुवंशी देवता हैं और देवकीके गर्भसे विष्णुभगवान् ही मुझे मारनेके लिये पैदा होनेवाले हैं। इसलिये उसने देवकी और वसुदेवको हथकड़ी-बेड़ीसे जकड़कर कैदमें डाल दिया और उन दोनोंसे जो-जो पुत्र होते गये, उन्हें वह मारता गया। उसे हर बार यह शंका बनी रहती कि कहीं विष्णु ही उस बालकके रूपमें न आ गया हो॥ ६५-६६॥ परीक्षित्! पृथ्वीमें यह बात प्रायः देखी जाती है कि अपने प्राणोंका ही पोषण करनेवाले लोभी राजा अपने स्वार्थके लिये माता-पिता, भाई-बन्धु और अपने अत्यन्त हितैषी इष्ट-मित्रोंकी भी हत्या कर डालते हैं॥ ६७॥"},{"b":27165,"kind":"sanskrit_shloka","page":128,"verses":["10.1.68"],"text":"आत्मानमिह संजातं जानन् प्राग् विष्णुना हतम्।"},{"b":27166,"kind":"sanskrit_shloka","page":128,"verses":["10.1.68"],"text":"महासुरं कालनेमिं यदुभिः स व्यरुध्यत॥ ६८"},{"b":27167,"kind":"sanskrit_shloka","page":128,"verses":["10.1.69"],"text":"उग्रसेनं च पितरं यदुभोजान्धकाधिपम्।"},{"b":27168,"kind":"sanskrit_shloka","page":128,"verses":["10.1.69"],"text":"स्वयं निगृह्य बुभुजे शूरसेनान् महाबलः॥ ६९"},{"b":27169,"kind":"hindi_translation","page":128,"explains":["10.1.68","10.1.69"],"text":"कंस जानता था कि मैं पहले कालनेमि असुर था और विष्णुने मुझे मार डाला था। इससे उसने यदुवंशियोंसे घोर विरोध ठान लिया॥ ६८॥ कंस बड़ा बलवान् था। उसने यदु, भोज और अन्धक वंशके अधिनायक अपने पिता उग्रसेनको कैद कर लिया और शूरसेन-देशका राज्य वह स्वयं करने लगा॥ ६९॥"},{"b":27170,"kind":"hindi_translation","page":128,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे श्रीकृष्णावतारोपक्रमे प्रथमोऽध्यायः॥ १॥"}],"notes":[{"id":"v2:153","mark":"*","page":120,"after_verse":"10.1.7","text":"समस्त देहधारियोंके अन्तःकरणमें अन्तर्यामीरूपसे स्थित भगवान् उनके जीवनके कारण हैं तथा बाहर कालरूपसे स्थित हुए वे ही उनका नाश करते हैं। अतः जो आत्मज्ञानीजन अन्तर्दृष्टिद्वारा उन अन्तर्यामीकी उपासना करते हैं, वे मोक्षरूप अमरपद पाते हैं और जो विषयपरायण अज्ञानी पुरुष बाह्यदृष्टिसे विषयचिन्तनमें ही लगे रहते हैं, वे जन्म-मरणरूप मृत्युके भागी होते हैं।"},{"id":"v2:154","mark":"१","page":121,"after_verse":"10.1.15","text":"मतिः।"},{"id":"v2:155","mark":"१","page":122,"after_verse":"10.1.18","text":"समवोचत।"},{"id":"v2:156","mark":"२","page":122,"after_verse":"10.1.23","text":"ष्यति।"},{"id":"v2:157","mark":"३","page":122,"after_verse":"10.1.23","text":"वन्त्वमरस्त्रियः।"},{"id":"v2:158","mark":"१","page":127,"after_verse":"10.1.60","text":"यवीयांस्तु।"},{"id":"v2:159","mark":"२","page":127,"after_verse":"10.1.60","text":"योः पुत्रान्मृ०।"},{"id":"v2:160","mark":"१","page":128,"after_verse":"10.1.69","text":"यदूनामन्धका०।"}],"corrections":{"count":2,"list":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/shuddhi/"}}