{"id":"10.15","title":"दशम स्कन्ध · अध्याय 15","part":"दशम स्कन्ध (पूर्वार्ध)","heading":"अथ पञ्चदशोऽध्यायः","topics":["धेनुकासुरका उद्धार और ग्वालबालोंको कालियनागके विषसे बचाना"],"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/15/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 10.15.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/15/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[231,238]},"verses":[{"id":"10.15.1","number":1,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/15/1/","page":231,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ततश्‍च पौगण्डवयःश्रितौ व्रजे","बभूवतुस्तौ पशुपालसम्मतौ।","गाश्‍चारयन्तौ सखिभिः समं पदै-","र्वृन्दावनं पुण्यमतीव चक्रतुः॥ १"],"iast":["tataśca paugaṇḍavayaḥśritau vraje","babhūvatustau paśupālasammatau|","gāścārayantau sakhibhiḥ samaṃ padai-","rvṛndāvanaṃ puṇyamatīva cakratuḥ|| 1"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! अब बलराम और श्रीकृष्णने पौगण्ड-अवस्थामें अर्थात् छठे वर्षमें प्रवेश किया था। अब उन्हें गौएँ चरानेकी स्वीकृति मिल गयी। वे अपने सखा ग्वालबालोंके साथ गौएँ चराते हुए वृन्दावनमें जाते और अपने चरणोंसे वृन्दावनको अत्यन्त पावन करते॥ १॥"},{"id":"10.15.2","number":2,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/15/2/","page":231,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तन्माधवो वेणुमुदीरयन् वृतो","गोपैर्गृणद्भिः स्वयशो बलान्वितः।","पशून् पुरस्कृत्य पशव्यमाविशद्","विहर्तुकामः कुसुमाकरं वनम्॥ २"],"iast":["tanmādhavo veṇumudīrayan vṛto","gopairgṛṇadbhiḥ svayaśo balānvitaḥ|","paśūn puraskṛtya paśavyamāviśad","vihartukāmaḥ kusumākaraṃ vanam|| 2"],"meaning":"यह वन गौओंके लिये हरी-हरी घाससे युक्त एवं रंग-बिरंगे पुष्पोंकी खान हो रहा था। आगे-आगे गौएँ, उनके पीछे-पीछे बाँसुरी बजाते हुए श्यामसुन्दर, तदनन्तर बलराम और फिर श्रीकृष्णके यशका गान करते हुए ग्वालबाल—इस प्रकार विहार करनेके लिये उन्होंने उस वनमें प्रवेश किया॥ २॥"},{"id":"10.15.3","number":3,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/15/3/","page":231,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तन्मंजुघोषालिमृगद्विजाकुलं","महन्मनःप्रख्यपयःसरस्वता ।","वातेन जुष्टं शतपत्रगन्धिना","निरीक्ष्य रन्तुं भगवान् मनो दधे॥ ३"],"iast":["tanmaṃjughoṣālimṛgadvijākulaṃ","mahanmanaḥprakhyapayaḥsarasvatā |","vātena juṣṭaṃ śatapatragandhinā","nirīkṣya rantuṃ bhagavān mano dadhe|| 3"],"meaning":"उस वनमें कहीं तो भौंरे बड़ी मधुर गुंजार कर रहे थे, कहीं झुंड-के-झुंड हरिन चौकड़ी भर रहे थे और कहीं सुन्दर-सुन्दर पक्षी चहक रहे थे। बड़े ही सुन्दर-सुन्दर सरोवर थे, जिनका जल महात्माओंके हृदयके समान स्वच्छ और निर्मल था। उनमें खिले हुए कमलोंके सौरभसे सुवासित होकर शीतल-मन्द-सुगन्ध वायु उस वनकी सेवा कर रही थी। इतना मनोहर था वह वन कि उसे देखकर भगवान्‌ने मन-ही-मन उसमें विहार करनेका संकल्प किया॥ ३॥"},{"id":"10.15.4","number":4,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/15/4/","page":231,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स तत्र तत्रारुणपल्लवश्रिया","फलप्रसूनोरुभरेण पादयोः।","स्पृशच्छिखान् वीक्ष्य वनस्पतीन् मुदा","स्मयन्‍निवाहाग्रजमादिपूरुषः ॥ ४"],"iast":["sa tatra tatrāruṇapallavaśriyā","phalaprasūnorubhareṇa pādayoḥ|","spṛśacchikhān vīkṣya vanaspatīn mudā","smayannivāhāgrajamādipūruṣaḥ || 4"],"meaning":"पुरुषोत्तम भगवान्‌ने देखा कि बड़े-बड़े वृक्ष फल और फूलोंके भारसे झुककर अपनी डालियों और नूतन कोंपलोंकी लालिमासे उनके चरणोंका स्पर्श कर रहे हैं, तब उन्होंने बड़े आनन्दसे कुछ मुसकरात हुए-से अपने बड़े भाई बलरामजीसे कहा॥ ४॥"},{"id":"10.15.5","number":5,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/15/5/","page":232,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["अहो अमी देववरामरार्चितं","पादाम्बुजं ते सुमनःफलार्हणम्।","नमन्त्युपादाय शिखाभिरात्मन-","स्तमोऽपहत्यै तरुजन्म यत्कृतम्॥ ५"],"iast":["aho amī devavarāmarārcitaṃ","pādāmbujaṃ te sumanaḥphalārhaṇam|","namantyupādāya śikhābhirātmana-","stamo'pahatyai tarujanma yatkṛtam|| 5"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्णने कहा—देवशिरोमणे! यों तो बड़े-बड़े देवता आपके चरणकमलोंकी पूजा करते हैं; परन्तु देखिये तो, ये वृक्ष भी अपनी डालियोंसे सुन्दर पुष्प और फलोंकी सामग्री लेकर आपके चरणकमलोंमें झुक रहे हैं, नमस्कार कर रहे हैं। क्यों न हो, इन्होंने इसी सौभाग्यके लिये तथा अपना दर्शन एवं श्रवण करनेवालोंके अज्ञानका नाश करनेके लिये ही तो वृन्दावनधाममें वृक्ष-योनि ग्रहण की है। इनका जीवन धन्य है॥ ५॥"},{"id":"10.15.6","number":6,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/15/6/","page":232,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["एतेऽलिनस्तव यशोऽखिललोकतीर्थं","गायन्त आदिपुरुषानुपदं भजन्ते।","प्रायो अमी मुनिगणा भवदीयमुख्या","गूढं वनेऽपि न जहत्यनघात्मदैवम्॥ ६"],"iast":["ete'linastava yaśo'khilalokatīrthaṃ","gāyanta ādipuruṣānupadaṃ bhajante|","prāyo amī munigaṇā bhavadīyamukhyā","gūḍhaṃ vane'pi na jahatyanaghātmadaivam|| 6"],"meaning":"आदिपुरुष! यद्यपि आप इस वृन्दावनमें अपने ऐश्‍वर्यरूपको छिपाकर बालकोंकी-सी लीला कर रहे हैं, फिर भी आपके श्रेष्ठ भक्त मुनिगण अपने इष्टदेवको पहचानकर यहाँ भी प्रायः भौंरोंके रूपमें आपके भुवन-पावन यशका निरन्तर गान करते हुए आपके भजनमें लगे रहते हैं। वे एक क्षणके लिये भी आपको नहीं छोड़ना चाहते॥ ६॥"},{"id":"10.15.7","number":7,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/15/7/","page":232,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["नृत्यन्त्यमी शिखिन ईड्य मुदा हरिण्यः","कुर्वन्ति गोप्य इव ते प्रियमीक्षणेन।","सूक्तैश्‍च कोकिलगणा गृहमागताय","धन्या वनौकस इयान् हि सतां निसर्गः॥ ७"],"iast":["nṛtyantyamī śikhina īḍya mudā hariṇyaḥ","kurvanti gopya iva te priyamīkṣaṇena|","sūktaiśca kokilagaṇā gṛhamāgatāya","dhanyā vanaukasa iyān hi satāṃ nisargaḥ|| 7"],"meaning":"भाईजी! वास्तवमें आप ही स्तुति करनेयोग्य हैं। देखिये, आपको अपने घर आया देख ये मोर आपके दर्शनोंसे आनन्दित होकर नाच रहे हैं। हरिनियाँ मृगनयनी गोपियोंके समान अपनी प्रेमभरी तिरछी चितवनसे आपके प्रति प्रेम प्रकट कर रही हैं, आपको प्रसन्‍न कर रही हैं। ये कोयलें अपनी मधुर कुहू-कुहू ध्वनिसे आपका कितना सुन्दर स्वागत कर रही हैं! ये वनवासी होनेपर भी धन्य हैं। क्योंकि सत्पुरुषोंका स्वभाव ही ऐसा होता है कि वे घर आये अतिथिको अपनी प्रिय-से-प्रिय वस्तु भेंट कर देते हैं॥ ७॥"},{"id":"10.15.8","number":8,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/15/8/","page":232,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["धन्येयमद्य धरणी तृणवीरुधस्त्वत्-","पादस्पृशो द्रुमलताः करजाभिमृष्टाः।","नद्योऽद्रयः खगमृगाः सदयावलोकै-","र्गोप्योऽन्तरेण भुजयोरपि यत्स्पृहा श्रीः॥ ८"],"iast":["dhanyeyamadya dharaṇī tṛṇavīrudhastvat-","pādaspṛśo drumalatāḥ karajābhimṛṣṭāḥ|","nadyo'drayaḥ khagamṛgāḥ sadayāvalokai-","rgopyo'ntareṇa bhujayorapi yatspṛhā śrīḥ|| 8"],"meaning":"आज यहाँकी भूमि अपनी हरी-हरी घासके साथ आपके चरणोंका स्पर्श प्राप्त करके धन्य हो रही है। यहाँके वृक्ष, लताएँ और झाड़ियाँ आपकी अँगुलियोंका स्पर्श पाकर अपना अहोभाग्य मान रही हैं। आपकी दयाभरी चितवनसे नदी, पर्वत, पशु, पक्षी— सब कृतार्थ हो रहे हैं और व्रजकी गोपियाँ आपके वक्षःस्थलका स्पर्श प्राप्त करके, जिसके लिये स्वयं लक्ष्मी भी लालायित रहती हैं, धन्य-धन्य हो रही हैं॥ ८॥"},{"id":"10.15.9","number":9,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/15/9/","page":233,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवं वृन्दावनं श्रीमत् कृष्णः प्रीतमनाः पशून्।","रेमे संचारयन्‍नद्रेः सरिद्रोधस्सु सानुगः॥ ९"],"iast":["evaṃ vṛndāvanaṃ śrīmat kṛṣṇaḥ prītamanāḥ paśūn|","reme saṃcārayannadreḥ saridrodhassu sānugaḥ|| 9"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! इस प्रकार परम सुन्दर वृन्दावनको देखकर भगवान् श्रीकृष्ण बहुत ही आनन्दित हुए। वे अपने सखा ग्वालबालोंके साथ गोवर्धनकी तराईमें, यमुनातटपर गौओंको चराते हुए अनेकों प्रकारकी लीलाएँ करने लगे॥ ९॥"},{"id":"10.15.10","number":10,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/15/10/","page":233,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["क्वचिद् गायति गायत्सु मदान्धालिष्वनुव्रतैः।","उपगीयमानचरितः स्रग्वी संकर्षणान्वितः॥ १०"],"iast":["kvacid gāyati gāyatsu madāndhāliṣvanuvrataiḥ|","upagīyamānacaritaḥ sragvī saṃkarṣaṇānvitaḥ|| 10"],"meaning":"एक ओर ग्वालबाल भगवान् श्रीकृष्णके चरित्रोंकी मधुर तान छेड़े रहते हैं, तो दूसरी ओर बलरामजीके साथ वनमाला पहने हुए श्रीकृष्ण मतवाले भौंरोंकी सुरीली गुनगुनाहटमें अपना स्वर मिलाकर मधुर संगीत अलापने लगते हैं॥ १०॥"},{"id":"10.15.11","number":11,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/15/11/","page":233,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["क्वचिच्च कलहंसानामनुकूजति कूजितम्।","अभिनृत्यति नृत्यन्तं बर्हिणं हासयन् क्‍वचित्॥ ११"],"iast":["kvacicca kalahaṃsānāmanukūjati kūjitam|","abhinṛtyati nṛtyantaṃ barhiṇaṃ hāsayan kvacit|| 11"],"meaning":"कभी-कभी श्रीकृष्ण कूजते हुए राजहंसोंके साथ स्वयं भी कूजने लगते हैं और कभी नाचते हुए मोरोंके साथ स्वयं भी ठुमुक-ठुमुक नाचने लगते हैं और ऐसा नाचते हैं कि मयूरको उपहासास्पद बना देते हैं॥ ११॥"},{"id":"10.15.12","number":12,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/15/12/","page":233,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["मेघगम्भीरया वाचा नामभिर्दूरगान् पशून्।","क्वचिदाह्वयति प्रीत्या गोगोपालमनोज्ञया॥ १२"],"iast":["meghagambhīrayā vācā nāmabhirdūragān paśūn|","kvacidāhvayati prītyā gogopālamanojñayā|| 12"],"meaning":"कभी मेघके समान गम्भीर वाणीसे दूर गये हुए पशुओंको उनका नाम ले-लेकर बड़े प्रेमसे पुकारते हैं। उनके कण्ठकी मधुर ध्वनि सुनकर गायों और ग्वालबालोंका चित्त भी अपने वशमें नहीं रहता॥ १२॥"},{"id":"10.15.13","number":13,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/15/13/","page":233,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["चकोरक्रौञ्चचक्राह्वभारद्वाजांश्‍च बर्हिणः।","अनुरौति स्म सत्त्वानां भीतवद् व्याघ्रसिंहयोः॥ १३"],"iast":["cakorakrauñcacakrāhvabhāradvājāṃśca barhiṇaḥ|","anurauti sma sattvānāṃ bhītavad vyāghrasiṃhayoḥ|| 13"],"meaning":"कभी चकोर, क्रौंच (कराँकुल), चकवा, भरदूल और मोर आदि पक्षियोंकी-सी बोली बोलते तो कभी बाघ, सिंह आदिकी गर्जनासे डरे हुए जीवोंके समान स्वयं भी भयभीतकी-सी लीला करते॥ १३॥"},{"id":"10.15.14","number":14,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/15/14/","page":233,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["क्‍वचित् क्रीडापरिश्रान्तं गोपोत्संगोपबर्हणम्।","स्वयं विश्रमयत्यार्यं पादसंवाहनादिभिः॥ १४"],"iast":["kvacit krīḍāpariśrāntaṃ gopotsaṃgopabarhaṇam|","svayaṃ viśramayatyāryaṃ pādasaṃvāhanādibhiḥ|| 14"],"meaning":"जब बलरामजी खेलते-खेलते थककर किसी ग्वाल-बालकी गोदके तकियेपर सिर रखकर लेट जाते, तब श्रीकृष्ण उनके पैर दबाने लगते, पंखा झलने लगते और इस प्रकार अपने बड़े भाईकी थकावट दूर करते॥ १४॥"},{"id":"10.15.15","number":15,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/15/15/","page":233,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["नृत्यतो गायतः क्वापि वल्गतो युध्यतो मिथः।","गृहीतहस्तौ गोपालान् हसन्तौ प्रशशंसतुः॥ १५"],"iast":["nṛtyato gāyataḥ kvāpi valgato yudhyato mithaḥ|","gṛhītahastau gopālān hasantau praśaśaṃsatuḥ|| 15"],"meaning":"जब ग्वालबाल नाचने-गाने लगते अथवा ताल ठोंक-ठोंककर एक-दूसरेसे कुश्ती लड़ने लगते, तब श्याम और राम दोनों भाई हाथमें हाथ डालकर खड़े हो जाते और हँस-हँसकर ‘वाह-वाह’ करते॥ १५॥"},{"id":"10.15.16","number":16,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/15/16/","page":233,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["क्‍वचित् पल्लवतल्पेषु नियुद्धश्रमकर्शितः।","वृक्षमूलाश्रयः शेते गोपोत्संगोपबर्हणः॥ १६"],"iast":["kvacit pallavatalpeṣu niyuddhaśramakarśitaḥ|","vṛkṣamūlāśrayaḥ śete gopotsaṃgopabarhaṇaḥ|| 16"],"meaning":"कभी-कभी स्वयं श्रीकृष्ण भी ग्वाल-बालोंके साथ कुश्ती लड़ते-लड़ते थक जाते तथा किसी सुन्दर वृक्षके नीचे कोमल पल्लवोंकी सेजपर किसी ग्वालबालकी गोदमें सिर रखकर लेट जाते॥ १६॥"},{"id":"10.15.17","number":17,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/15/17/","page":233,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["पादसंवाहनं चक्रुः केचित्तस्य महात्मनः।","अपरे हतपाप्मानो व्यजनैः समवीजयन्॥ १७"],"iast":["pādasaṃvāhanaṃ cakruḥ kecittasya mahātmanaḥ|","apare hatapāpmāno vyajanaiḥ samavījayan|| 17"],"meaning":"परीक्षित्! उस समय कोई-कोई पुण्यके मूर्तिमान् स्वरूप ग्वालबाल महात्मा श्रीकृष्णके चरण दबाने लगते और दूसरे निष्पाप बालक उन्हें बड़े-बड़े पत्तों या अँगोछियोंसे पंखा झलने लगते॥ १७॥"},{"id":"10.15.18","number":18,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/15/18/","page":234,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अन्ये तदनुरूपाणि मनोज्ञानि महात्मनः।","गायन्ति स्म महाराज स्नेहक्लिन्‍नधियः शनैः॥ १८"],"iast":["anye tadanurūpāṇi manojñāni mahātmanaḥ|","gāyanti sma mahārāja snehaklinnadhiyaḥ śanaiḥ|| 18"],"meaning":"किसी-किसीके हृदयमें प्रेमकी धारा उमड़ आती तो वह धीरे-धीरे उदारशिरोमणि परममनस्वी श्रीकृष्णकी लीलाओंके अनुरूप उनके मनको प्रिय लगनेवाले मनोहर गीत गाने लगता॥ १८॥"},{"id":"10.15.19","number":19,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/15/19/","page":234,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवं निगूढात्मगतिः स्वमायया","गोपात्मजत्वं चरितैर्विडम्बयन्।","रेमे रमालालितपादपल्लवो","ग्राम्यैः समं ग्राम्यवदीशचेष्टितः॥ १९"],"iast":["evaṃ nigūḍhātmagatiḥ svamāyayā","gopātmajatvaṃ caritairviḍambayan|","reme ramālālitapādapallavo","grāmyaiḥ samaṃ grāmyavadīśaceṣṭitaḥ|| 19"],"meaning":"भगवान्‌ने इस प्रकार अपनी योगमायासे अपने ऐश्‍वर्यमय स्वरूपको छिपा रखा था। वे ऐसी लीलाएँ करते, जो ठीक-ठीक गोपबालकोंकी-सी ही मालूम पड़तीं। स्वयं भगवती लक्ष्मी जिनके चरणकमलोंकी सेवामें संल‌ग्‍न रहती हैं, वे ही भगवान् इन ग्रामीण बालकोंके साथ बड़े प्रेमसे ग्रामीण खेल खेला करते थे। परीक्षित्! ऐसा होनेपर भी कभी-कभी उनकी ऐश्‍वर्यमयी लीलाएँ भी प्रकट हो जाया करतीं॥ १९॥"},{"id":"10.15.20","number":20,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/15/20/","page":234,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["श्रीदामा नाम गोपालो रामकेशवयोः सखा।","सुबलस्तोककृष्णाद्या गोपाः प्रेम्णेदमब्रुवन्॥ २०"],"iast":["śrīdāmā nāma gopālo rāmakeśavayoḥ sakhā|","subalastokakṛṣṇādyā gopāḥ premṇedamabruvan|| 20"],"meaning":"बलरामजी और श्रीकृष्णके सखाओंमें एक प्रधान गोप-बालक थे श्रीदामा। एक दिन उन्होंने तथा सुबल और स्तोककृष्ण (छोटे कृष्ण) आदि ग्वालबालोंने श्याम और रामसे बड़े प्रेमके साथ कहा—॥ २०॥"},{"id":"10.15.21","number":21,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/15/21/","page":234,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["राम राम महाबाहो कृष्ण दुष्टनिबर्हण।","इतोऽविदूरे सुमहद् वनं तालालिसंकुलम्॥ २१"],"iast":["rāma rāma mahābāho kṛṣṇa duṣṭanibarhaṇa|","ito'vidūre sumahad vanaṃ tālālisaṃkulam|| 21"],"meaning":"‘हमलोगोंको सर्वदा सुख पहुँचानेवाले बलरामजी! आपके बाहुबलकी तो कोई थाह ही नहीं है। हमारे मनमोहन श्रीकृष्ण! दुष्टोंको नष्ट कर डालना तो तुम्हारा स्वभाव ही है। यहाँसे थोड़ी ही दूरपर एक बड़ा भारी वन है। बस, उसमें पाँत-के-पाँत ताड़के वृक्ष भरे पड़े हैं॥ २१॥"},{"id":"10.15.22","number":22,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/15/22/","page":234,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["फलानि तत्र भूरीणि पतन्ति पतितानि च।","सन्ति किंत्ववरुद्धानि धेनुकेन दुरात्मना॥ २२"],"iast":["phalāni tatra bhūrīṇi patanti patitāni ca|","santi kiṃtvavaruddhāni dhenukena durātmanā|| 22"],"meaning":"वहाँ बहुत-से ताड़के फल पक-पककर गिरते रहते हैं और बहुत-से पहलेके गिरे हुए भी हैं। परन्तु वहाँ धेनुक नामका एक दुष्ट दैत्य रहता है। उसने उन फलोंपर रोक लगा रखी है॥ २२॥"},{"id":"10.15.23","number":23,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/15/23/","page":234,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सोऽतिवीर्योऽसुरो राम हे कृष्ण खररूपधृक्।","आत्मतुल्यबलैरन्यैर्ज्ञातिभिर्बहुभिर्वृतः॥ २३"],"iast":["so'tivīryo'suro rāma he kṛṣṇa khararūpadhṛk|","ātmatulyabalairanyairjñātibhirbahubhirvṛtaḥ|| 23"],"meaning":"बलरामजी और भैया श्रीकृष्ण! वह दैत्य गधेके रूपमें रहता है। वह स्वयं तो बड़ा बलवान् है ही, उसके साथी और भी बहुत-से उसीके समान बलवान् दैत्य उसी रूपमें रहते हैं॥ २३॥"},{"id":"10.15.24","number":24,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/15/24/","page":234,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तस्मात् कृतनराहाराद् भीतैर्नृभिरमित्रहन्।","न सेव्यते पशुगणैः पक्षिसंघैर्विवर्जितम्॥ २४"],"iast":["tasmāt kṛtanarāhārād bhītairnṛbhiramitrahan|","na sevyate paśugaṇaiḥ pakṣisaṃghairvivarjitam|| 24"],"meaning":"मेरे शत्रुघाती भैया! उस दैत्यने अबतक न जाने कितने मनुष्य खा डाले हैं। यही कारण है कि उसके डरके मारे मनुष्य उसका सेवन नहीं करते और पशु-पक्षी भी उस जंगलमें नहीं जाते॥ २४॥"},{"id":"10.15.25","number":25,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/15/25/","page":234,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["विद्यन्तेऽभुक्तपूर्वाणि फलानि सुरभीणि च।","एष वै सुरभिर्गन्धो विषूचीनोऽवगृह्यते॥ २५"],"iast":["vidyante'bhuktapūrvāṇi phalāni surabhīṇi ca|","eṣa vai surabhirgandho viṣūcīno'vagṛhyate|| 25"],"meaning":"उसके फल हैं तो बड़े सुगन्धित, परन्तु हमने कभी नहीं खाये। देखो न, चारों ओर उन्हींकी मन्द-मन्द सुगन्ध फैल रही है। तनिक-सा ध्यान देनेसे उसका रस मिलने लगता है॥ २५॥"},{"id":"10.15.26","number":26,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/15/26/","page":235,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["प्रयच्छ तानि नः कृष्ण गन्धलोभितचेतसाम्।","वाञ्छास्ति महती राम गम्यतां यदि रोचते॥ २६"],"iast":["prayaccha tāni naḥ kṛṣṇa gandhalobhitacetasām|","vāñchāsti mahatī rāma gamyatāṃ yadi rocate|| 26"],"meaning":"श्रीकृष्ण! उनकी सुगन्धसे हमारा मन मोहित हो गया है और उन्हें पानेके लिये मचल रहा है। तुम हमें वे फल अवश्य खिलाओ। दाऊ दादा! हमें उन फलोंकी बड़ी उत्कट अभिलाषा है। आपको रुचे तो वहाँ अवश्य चलिये॥ २६॥"},{"id":"10.15.27","number":27,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/15/27/","page":235,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवं सुहृद्वचः श्रुत्वा सुहृत्प्रियचिकीर्षया।","प्रहस्य जग्मतुर्गोपैर्वृतौ तालवनं प्रभू॥ २७"],"iast":["evaṃ suhṛdvacaḥ śrutvā suhṛtpriyacikīrṣayā|","prahasya jagmaturgopairvṛtau tālavanaṃ prabhū|| 27"],"meaning":"अपने सखा ग्वालबालोंकी यह बात सुनकर भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी दोनों हँसे और फिर उन्हें प्रसन्‍न करनेके लिये उनके साथ तालवनके लिये चल पड़े॥ २७॥"},{"id":"10.15.28","number":28,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/15/28/","page":235,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["बलः प्रविश्य बाहुभ्यां तालान् सम्परिकम्पयन्।","फलानि पातयामास मतंगज इवौजसा॥ २८"],"iast":["balaḥ praviśya bāhubhyāṃ tālān samparikampayan|","phalāni pātayāmāsa mataṃgaja ivaujasā|| 28"],"meaning":"उस वनमें पहुँचकर बलरामजीने अपनी बाँहोंसे उन ताड़के पेड़ोंको पकड़ लिया और मतवाले हाथीके बच्चेके समान उन्हें बड़े जोरसे हिलाकर बहुत-से फल नीचे गिरा दिये॥ २८॥"},{"id":"10.15.29","number":29,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/15/29/","page":235,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["फलानां पततां शब्दं निशम्यासुररासभः।","अभ्यधावत् क्षितितलं सनगं परिकम्पयन्॥ २९"],"iast":["phalānāṃ patatāṃ śabdaṃ niśamyāsurarāsabhaḥ|","abhyadhāvat kṣititalaṃ sanagaṃ parikampayan|| 29"],"meaning":"जब गधेके रूपमें रहनेवाले दैत्यने फलोंके गिरनेका शब्द सुना, तब वह पर्वतोंके साथ सारी पृथ्वीको कँपाता हुआ उनकी ओर दौड़ा॥ २९॥"},{"id":"10.15.30","number":30,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/15/30/","page":235,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["समेत्य तरसा प्रत्यग् द्वाभ्यां पद‍्भ्यां बलं बली।","निहत्योरसि काशब्दं मुंचन् पर्यसरत् खलः॥ ३०"],"iast":["sametya tarasā pratyag dvābhyāṃ padbhyāṃ balaṃ balī|","nihatyorasi kāśabdaṃ muṃcan paryasarat khalaḥ|| 30"],"meaning":"वह बड़ा बलवान् था। उसने बड़े वेगसे बलरामजीके सामने आकर अपने पिछले पैरोंसे उनकी छातीमें दुलत्ती मारी और इसके बाद वह दुष्ट बड़े जोरसे रेंकता हुआ वहाँसे हट गया॥ ३०॥"},{"id":"10.15.31","number":31,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/15/31/","page":235,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["पुनरासाद्य संरब्ध उपक्रोष्टा पराक् स्थितः।","चरणावपरौ राजन् बलाय प्राक्षिपद् रुषा॥ ३१"],"iast":["punarāsādya saṃrabdha upakroṣṭā parāk sthitaḥ|","caraṇāvaparau rājan balāya prākṣipad ruṣā|| 31"],"meaning":"राजन्! वह गधा क्रोधमें भरकर फिर रेंकता हुआ दूसरी बार बलरामजीके पास पहुँचा और उनकी ओर पीठ करके फिर बड़े क्रोधसे अपने पिछले पैरोंकी दुलत्ती चलायी॥ ३१॥"},{"id":"10.15.32","number":32,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/15/32/","page":235,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स तं गृहीत्वा प्रपदोर्भ्रामयित्वैकपाणिना।","चिक्षेप तृणराजाग्रे भ्रामणत्यक्तजीवितम्॥ ३२"],"iast":["sa taṃ gṛhītvā prapadorbhrāmayitvaikapāṇinā|","cikṣepa tṛṇarājāgre bhrāmaṇatyaktajīvitam|| 32"],"meaning":"बलरामजीने अपने एक ही हाथसे उसके दोनों पैर पकड़ लिये और उसे आकाशमें घुमाकर एक ताड़के पेड़पर दे मारा। घुमाते समय ही उस गधेके प्राणपखेरू उड़ गये थे॥ ३२॥"},{"id":"10.15.33","number":33,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/15/33/","page":235,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तेनाहतो महातालो वेपमानो बृहच्छिराः।","पार्श्‍वस्थं कम्पयन् भ‌ग्‍नः स चान्यं सोऽपि चापरम्॥ ३३"],"iast":["tenāhato mahātālo vepamāno bṛhacchirāḥ|","pārśvasthaṃ kampayan bhagnaḥ sa cānyaṃ so'pi cāparam|| 33"],"meaning":"उसके गिरनेकी चोटसे वह महान् ताड़का वृक्ष—जिसका ऊपरी भाग बहुत विशाल था—स्वयं तो तड़तड़ाकर गिर ही पड़ा, सटे हुए दूसरे वृक्षको भी उसने तोड़ डाला। उसने तीसरेको, तीसरेने चौथेको—इस प्रकार एक-दूसरेको गिराते हुए बहुत-से तालवृक्ष गिर पड़े॥ ३३॥"},{"id":"10.15.34","number":34,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/15/34/","page":235,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["बलस्य लीलयोत्सृष्टखरदेहहताहताः।","तालाश्‍चकम्पिरे सर्वे महावातेरिता इव॥ ३४"],"iast":["balasya līlayotsṛṣṭakharadehahatāhatāḥ|","tālāścakampire sarve mahāvāteritā iva|| 34"],"meaning":"बलरामजीके लिये तो यह एक खेल था। परन्तु उनके द्वारा फेंके हुए गधेके शरीरसे चोट खा-खाकर वहाँ सब-के-सब ताड़ हिल गये। ऐसा जान पड़ा, मानो सबको झंझावातने झकझोर दिया हो॥ ३४॥"},{"id":"10.15.35","number":35,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/15/35/","page":236,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["नैतच्चित्रं भगवति ह्यनन्ते जगदीश्‍वरे।","ओतप्रोतमिदं यस्मिंस्तन्तुष्वंग यथा पटः॥ ३५"],"iast":["naitaccitraṃ bhagavati hyanante jagadīśvare|","otaprotamidaṃ yasmiṃstantuṣvaṃga yathā paṭaḥ|| 35"],"meaning":"भगवान् बलराम स्वयं जगदीश्‍वर हैं। उनमें यह सारा संसार ठीक वैसे ही ओतप्रोत है, जैसे सूतोंमें वस्त्र। तब भला, उनके लिये यह कौन आश्‍चर्यकी बात है॥ ३५॥"},{"id":"10.15.36","number":36,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/15/36/","page":236,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ततः कृष्णं च रामं च ज्ञातयो धेनुकस्य ये।","क्रोष्टारोऽभ्यद्रवन् सर्वे संरब्धा हतबान्धवाः॥ ३६"],"iast":["tataḥ kṛṣṇaṃ ca rāmaṃ ca jñātayo dhenukasya ye|","kroṣṭāro'bhyadravan sarve saṃrabdhā hatabāndhavāḥ|| 36"],"meaning":"उस समय धेनुकासुरके भाई-बन्धु अपने भाईके मारे जानेसे क्रोधके मारे आगबबूला हो गये। सब-के-सब गधे बलरामजी और श्रीकृष्णपर बड़े वेगसे टूट पड़े॥ ३६॥"},{"id":"10.15.37","number":37,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/15/37/","page":236,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तांस्तानापततः कृष्णो रामश्‍च नृप लीलया।","गृहीतपश्‍चाच्चरणान् प्राहिणोत्तृणराजसु॥ ३७"],"iast":["tāṃstānāpatataḥ kṛṣṇo rāmaśca nṛpa līlayā|","gṛhītapaścāccaraṇān prāhiṇottṛṇarājasu|| 37"],"meaning":"राजन्! उनमेंसे जो-जो पास आया, उसी-उसीको बलरामजी और श्रीकृष्णने खेल-खेलमें ही पिछले पैर पकड़कर तालवृक्षोंपर दे मारा॥ ३७॥"},{"id":"10.15.38","number":38,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/15/38/","page":236,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["फलप्रकरसंकीर्णं दैत्यदेहैर्गतासुभिः।","रराज भूः सतालाग्रैर्घनैरिव नभस्तलम्॥ ३८"],"iast":["phalaprakarasaṃkīrṇaṃ daityadehairgatāsubhiḥ|","rarāja bhūḥ satālāgrairghanairiva nabhastalam|| 38"],"meaning":"उस समय वह भूमि ताड़के फलोंसे पट गयी और टूटे हुए वृक्ष तथा दैत्योंके प्राणहीन शरीरोंसे भर गयी। जैसे बादलोंसे आकाश ढक गया हो, उस भूमिकी वैसी ही शोभा होने लगी॥ ३८॥"},{"id":"10.15.39","number":39,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/15/39/","page":236,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तयोस्तत् सुमहत् कर्म निशाम्य विबुधादयः।","मुमुचुः पुष्पवर्षाणि चक्रुर्वाद्यानि तुष्टुवुः॥ ३९"],"iast":["tayostat sumahat karma niśāmya vibudhādayaḥ|","mumucuḥ puṣpavarṣāṇi cakrurvādyāni tuṣṭuvuḥ|| 39"],"meaning":"बलरामजी और श्रीकृष्णकी यह मंगलमयी लीला देखकर देवतागण उनपर फूल बरसाने लगे और बाजे बजा-बजाकर स्तुति करने लगे॥ ३९॥"},{"id":"10.15.40","number":40,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/15/40/","page":236,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अथ तालफलान्यादन् मनुष्या गतसाध्वसाः।","तृणं च पशवश्‍चेरुर्हतधेनुककानने॥ ४०"],"iast":["atha tālaphalānyādan manuṣyā gatasādhvasāḥ|","tṛṇaṃ ca paśavaścerurhatadhenukakānane|| 40"],"meaning":"जिस दिन धेनुकासुर मरा, उसी दिनसे लोग निडर होकर उस वनके तालफल खाने लगे तथा पशु भी स्वच्छन्दताके साथ घास चरने लगे॥ ४०॥"},{"id":"10.15.41","number":41,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/15/41/","page":236,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कृष्णः कमलपत्राक्षः पुण्यश्रवणकीर्तनः।","स्तूयमानोऽनुगैर्गोपैः साग्रजो व्रजमाव्रजत्॥ ४१"],"iast":["kṛṣṇaḥ kamalapatrākṣaḥ puṇyaśravaṇakīrtanaḥ|","stūyamāno'nugairgopaiḥ sāgrajo vrajamāvrajat|| 41"],"meaning":"इसके बाद कमलदललोचन भगवान् श्रीकृष्ण बड़े भाई बलरामजीके साथ व्रजमें आये। उस समय उनके साथी ग्वालबाल उनके पीछे-पीछे चलते हुए उनकी स्तुति करते जाते थे। क्यों न हो; भगवान्‌की लीलाओंका श्रवण-कीर्तन ही सबसे बढ़कर पवित्र जो है॥ ४१॥"},{"id":"10.15.42","number":42,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/15/42/","page":236,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तं गोरजश्छुरितकुन्तलबद्धबर्ह-","वन्यप्रसूनरुचिरेक्षणचारुहासम्।","वेणुं क्वणन्तमनुगैरनुगीतकीर्तिं","गोप्यो दिदृक्षितदृशोऽभ्यगमन् समेताः॥ ४२"],"iast":["taṃ gorajaśchuritakuntalabaddhabarha-","vanyaprasūnarucirekṣaṇacāruhāsam|","veṇuṃ kvaṇantamanugairanugītakīrtiṃ","gopyo didṛkṣitadṛśo'bhyagaman sametāḥ|| 42"],"meaning":"उस समय श्रीकृष्णकी घुँघराली अलकोंपर गौओंके खुरोंसे उड़-उड़कर धूलि पड़ी हुई थी, सिरपर मोरपंखका मुकुट था और बालोंमें सुन्दर-सुन्दर जंगली पुष्प गुँथे हुए थे। उनके नेत्रोंमें मधुर चितवन और मुखपर मनोहर मुसकान थी। वे मधुर-मधुर मुरली बजा रहे थे और साथी ग्वालबाल उनकी ललित कीर्तिका गान कर रहे थे। वंशीकी ध्वनि सुनकर बहुत-सी गोपियाँ एक साथ ही व्रजसे बाहर निकल आयीं। उनकी आँखें न जाने कबसे श्रीकृष्णके दर्शनके लिये तरस रही थीं॥ ४२॥"},{"id":"10.15.43","number":43,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/15/43/","page":237,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["पीत्वा मुकुन्दमुखसारघमक्षिभृङ्गै-","स्तापं जहुर्विरहजं व्रजयोषितोऽह्नि।","तत्सत्कृतिं समधिगम्य विवेश गोष्ठं","सव्रीडहासविनयं यदपांगमोक्षम्॥ ४३"],"iast":["pītvā mukundamukhasāraghamakṣibhṛṅgai-","stāpaṃ jahurvirahajaṃ vrajayoṣito'hni|","tatsatkṛtiṃ samadhigamya viveśa goṣṭhaṃ","savrīḍahāsavinayaṃ yadapāṃgamokṣam|| 43"],"meaning":"गोपियोंने अपने नेत्ररूप भ्रमरोंसे भगवान्‌के मुखारविन्दका मकरन्द-रस पान करके दिनभरके विरहकी जलन शान्त की। और भगवान्‌ने भी उनकी लाजभरी हँसी तथा विनयसे युक्त प्रेमभरी तिरछी चितवनका सत्कार स्वीकार करके व्रजमें प्रवेश किया॥ ४३॥"},{"id":"10.15.44","number":44,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/15/44/","page":237,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तयोर्यशोदारोहिण्यौ पुत्रयोः पुत्रवत्सले।","यथाकामं यथाकालं व्यधत्तां परमाशिषः॥ ४४"],"iast":["tayoryaśodārohiṇyau putrayoḥ putravatsale|","yathākāmaṃ yathākālaṃ vyadhattāṃ paramāśiṣaḥ|| 44"],"meaning":"उधर यशोदामैया और रोहिणीजीका हृदय वात्सल्यस्नेहसे उमड़ रहा था। उन्होंने श्याम और रामके घर पहुँचते ही उनकी इच्छाके अनुसार तथा समयके अनुरूप पहलेसे ही सोच-सँजोकर रखी हुई वस्तुएँ उन्हें खिलायीं-पिलायीं और पहनायीं॥ ४४॥"},{"id":"10.15.45","number":45,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/15/45/","page":237,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["गताध्वानश्रमौ तत्र मज्जनोन्मर्दनादिभिः।","नीवीं वसित्वा रुचिरां दिव्यस्रग्गन्धमण्डितौ॥ ४५"],"iast":["gatādhvānaśramau tatra majjanonmardanādibhiḥ|","nīvīṃ vasitvā rucirāṃ divyasraggandhamaṇḍitau|| 45"],"meaning":"माताओंने तेल-उबटन आदि लगाकर स्नान कराया। इससे उनकी दिनभर घूमने-फिरनेकी मार्गकी थकान दूर हो गयी। फिर उन्होंने सुन्दर वस्त्र पहनाकर दिव्य पुष्पोंकी माला पहनायी तथा चन्दन लगाया॥ ४५॥"},{"id":"10.15.46","number":46,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/15/46/","page":237,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["जनन्युपहृतं प्राश्य स्वाद्वन्‍नमुपलालितौ।","संविश्य वरशय्यायां सुखं सुषुपतुर्व्रजे॥ ४६"],"iast":["jananyupahṛtaṃ prāśya svādvannamupalālitau|","saṃviśya varaśayyāyāṃ sukhaṃ suṣupaturvraje|| 46"],"meaning":"तत्पश्‍चात् दोनों भाइयोंने माताओंका परोसा हुआ स्वादिष्ट अन्‍न भोजन किया। इसके बाद बड़े लाड़-प्यारसे दुलार-दुलार कर यशोदा और रोहिणीने उन्हें सुन्दर शय्यापर सुलाया। श्याम और राम बड़े आरामसे सो गये॥ ४६॥"},{"id":"10.15.47","number":47,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/15/47/","page":237,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवं स भगवान् कृष्णो वृन्दावनचरः क्‍वचित्।","ययौ राममृते राजन् कालिन्दीं सखिभिर्वृतः॥ ४७"],"iast":["evaṃ sa bhagavān kṛṣṇo vṛndāvanacaraḥ kvacit|","yayau rāmamṛte rājan kālindīṃ sakhibhirvṛtaḥ|| 47"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्ण इस प्रकार वृन्दावनमें अनेकों लीलाएँ करते। एक दिन अपने सखा ग्वालबालोंके साथ वे यमुना-तटपर गये। राजन्! उस दिन बलरामजी उनके साथ नहीं थे॥ ४७॥"},{"id":"10.15.48","number":48,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/15/48/","page":237,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अथ गावश्‍च गोपाश्‍च निदाघातपपीडिताः।","दुष्टं जलं पपुस्तस्यास्तृषार्ता विषदूषितम्॥ ४८"],"iast":["atha gāvaśca gopāśca nidāghātapapīḍitāḥ|","duṣṭaṃ jalaṃ papustasyāstṛṣārtā viṣadūṣitam|| 48"],"meaning":"उस समय जेठ-आषाढ़के घामसे गौएँ और ग्वालबाल अत्यन्त पीड़ित हो रहे थे। प्याससे उनका कण्ठ सूख रहा था। इसलिये उन्होंने यमुनाजीका विषैला जल पी लिया॥ ४८॥"},{"id":"10.15.49","number":49,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/15/49/","page":237,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["विषाम्भस्तदुपस्पृश्य दैवोपहतचेतसः।","निपेतुर्व्यसवः सर्वे सलिलान्ते कुरूद्वह॥ ४९"],"iast":["viṣāmbhastadupaspṛśya daivopahatacetasaḥ|","nipeturvyasavaḥ sarve salilānte kurūdvaha|| 49"],"meaning":"परीक्षित्! होनहारके वश उन्हें इस बातका ध्यान ही नहीं रहा था। उस विषैले जलके पीते ही सब गौएँ और ग्वालबाल प्राणहीन होकर यमुनाजीके तटपर गिर पड़े॥ ४९॥"},{"id":"10.15.50","number":50,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/15/50/","page":237,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["वीक्ष्य तान् वै तथा भूतान् कृष्णो योगेश्‍वरेश्‍वरः।","ईक्षयामृतवर्षिण्या स्वनाथान् समजीवयत्॥ ५०"],"iast":["vīkṣya tān vai tathā bhūtān kṛṣṇo yogeśvareśvaraḥ|","īkṣayāmṛtavarṣiṇyā svanāthān samajīvayat|| 50"],"meaning":"उन्हें ऐसी अवस्थामें देखकर योगेश्‍वरोंके भी ईश्‍वर भगवान् श्रीकृष्णने अपनी अमृत बरसानेवाली दृष्टिसे उन्हें जीवित कर दिया। उनके स्वामी और सर्वस्व तो एकमात्र श्रीकृष्ण ही थे॥ ५०॥"},{"id":"10.15.51","number":51,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/15/51/","page":237,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ते सम्प्रतीतस्मृतयः समुत्थाय जलान्तिकात्।","आसन् सुविस्मिताः सर्वे वीक्षमाणाः परस्परम्॥ ५१"],"iast":["te sampratītasmṛtayaḥ samutthāya jalāntikāt|","āsan suvismitāḥ sarve vīkṣamāṇāḥ parasparam|| 51"],"meaning":"परीक्षित्! चेतना आनेपर वे सब यमुनाजीके तटपर उठ खड़े हुए और आश्‍चर्यचकित होकर एक-दूसरेकी ओर देखने लगे॥ ५१॥"},{"id":"10.15.52","number":52,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/15/52/","page":238,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अन्वमंसत तद् राजन् गोविन्दानुग्रहेक्षितम्।","पीत्वा विषं परेतस्य पुनरुत्थानमात्मनः॥ ५२"],"iast":["anvamaṃsata tad rājan govindānugrahekṣitam|","pītvā viṣaṃ paretasya punarutthānamātmanaḥ|| 52"],"meaning":"राजन्! अन्तमें उन्होंने यही निश्‍चय किया कि हमलोग विषैला जल पी लेनेके कारण मर चुके थे, परन्तु हमारे श्रीकृष्णने अपनी अनुग्रहभरी दृष्टिसे देखकर हमें फिरसे जिला दिया है॥ ५२॥"}],"text":[{"b":28972,"kind":"adhyaya_heading","page":231,"text":"अथ पञ्चदशोऽध्यायः"},{"b":28973,"kind":"topic_heading","page":231,"text":"धेनुकासुरका उद्धार और ग्वालबालोंको कालियनागके विषसे बचाना"},{"b":28974,"kind":"topic_heading","page":231,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":28975,"kind":"sanskrit_shloka","page":231,"verses":["10.15.1"],"text":"ततश्‍च पौगण्डवयःश्रितौ व्रजे"},{"b":28976,"kind":"sanskrit_shloka","page":231,"verses":["10.15.1"],"text":"बभूवतुस्तौ पशुपालसम्मतौ।"},{"b":28977,"kind":"sanskrit_shloka","page":231,"verses":["10.15.1"],"text":"गाश्‍चारयन्तौ सखिभिः समं पदै-"},{"b":28978,"kind":"sanskrit_shloka","page":231,"verses":["10.15.1"],"text":"र्वृन्दावनं पुण्यमतीव चक्रतुः॥ १"},{"b":28979,"kind":"sanskrit_shloka","page":231,"verses":["10.15.2"],"text":"तन्माधवो वेणुमुदीरयन् वृतो"},{"b":28980,"kind":"sanskrit_shloka","page":231,"verses":["10.15.2"],"text":"गोपैर्गृणद्भिः स्वयशो बलान्वितः।"},{"b":28981,"kind":"sanskrit_shloka","page":231,"verses":["10.15.2"],"text":"पशून् पुरस्कृत्य पशव्यमाविशद्"},{"b":28982,"kind":"sanskrit_shloka","page":231,"verses":["10.15.2"],"text":"विहर्तुकामः कुसुमाकरं वनम्॥ २"},{"b":28983,"kind":"sanskrit_shloka","page":231,"verses":["10.15.3"],"text":"तन्मंजुघोषालिमृगद्विजाकुलं"},{"b":28984,"kind":"sanskrit_shloka","page":231,"verses":["10.15.3"],"text":"महन्मनःप्रख्यपयःसरस्वता ।"},{"b":28985,"kind":"sanskrit_shloka","page":231,"verses":["10.15.3"],"text":"वातेन जुष्टं शतपत्रगन्धिना"},{"b":28986,"kind":"sanskrit_shloka","page":231,"verses":["10.15.3"],"text":"निरीक्ष्य रन्तुं भगवान् मनो दधे॥ ३"},{"b":28987,"kind":"sanskrit_shloka","page":231,"verses":["10.15.4"],"text":"स तत्र तत्रारुणपल्लवश्रिया"},{"b":28988,"kind":"sanskrit_shloka","page":231,"verses":["10.15.4"],"text":"फलप्रसूनोरुभरेण पादयोः।"},{"b":28989,"kind":"sanskrit_shloka","page":231,"verses":["10.15.4"],"text":"स्पृशच्छिखान् वीक्ष्य वनस्पतीन् मुदा"},{"b":28990,"kind":"sanskrit_shloka","page":231,"verses":["10.15.4"],"text":"स्मयन्‍निवाहाग्रजमादिपूरुषः ॥ ४"},{"b":28991,"kind":"hindi_commentary","page":231,"explains":["10.15.1","10.15.2","10.15.3","10.15.4"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! अब बलराम और श्रीकृष्णने पौगण्ड-अवस्थामें अर्थात् छठे वर्षमें प्रवेश किया था। अब उन्हें गौएँ चरानेकी स्वीकृति मिल गयी। वे अपने सखा ग्वालबालोंके साथ गौएँ चराते हुए वृन्दावनमें जाते और अपने चरणोंसे वृन्दावनको अत्यन्त पावन करते॥ १॥ यह वन गौओंके लिये हरी-हरी घाससे युक्त एवं रंग-बिरंगे पुष्पोंकी खान हो रहा था। आगे-आगे गौएँ, उनके पीछे-पीछे बाँसुरी बजाते हुए श्यामसुन्दर, तदनन्तर बलराम और फिर श्रीकृष्णके यशका गान करते हुए ग्वालबाल—इस प्रकार विहार करनेके लिये उन्होंने उस वनमें प्रवेश किया॥ २॥ उस वनमें कहीं तो भौंरे बड़ी मधुर गुंजार कर रहे थे, कहीं झुंड-के-झुंड हरिन चौकड़ी भर रहे थे और कहीं सुन्दर-सुन्दर पक्षी चहक रहे थे। बड़े ही सुन्दर-सुन्दर सरोवर थे, जिनका जल महात्माओंके हृदयके समान स्वच्छ और निर्मल था। उनमें खिले हुए कमलोंके सौरभसे सुवासित होकर शीतल-मन्द-सुगन्ध वायु उस वनकी सेवा कर रही थी। इतना मनोहर था वह वन कि उसे देखकर भगवान्‌ने मन-ही-मन उसमें विहार करनेका संकल्प किया॥ ३॥ पुरुषोत्तम भगवान्‌ने देखा कि बड़े-बड़े वृक्ष फल और फूलोंके भारसे झुककर अपनी डालियों और नूतन कोंपलोंकी लालिमासे उनके चरणोंका स्पर्श कर रहे हैं, तब उन्होंने बड़े आनन्दसे कुछ मुसकरात हुए-से अपने बड़े भाई बलरामजीसे कहा॥ ४॥"},{"b":28992,"kind":"topic_heading","page":232,"text":"श्रीभगवानुवाच"},{"b":28993,"kind":"sanskrit_shloka","page":232,"verses":["10.15.5"],"text":"अहो अमी देववरामरार्चितं"},{"b":28994,"kind":"sanskrit_shloka","page":232,"verses":["10.15.5"],"text":"पादाम्बुजं ते सुमनःफलार्हणम्।"},{"b":28995,"kind":"sanskrit_shloka","page":232,"verses":["10.15.5"],"text":"नमन्त्युपादाय शिखाभिरात्मन-"},{"b":28996,"kind":"sanskrit_shloka","page":232,"verses":["10.15.5"],"text":"स्तमोऽपहत्यै तरुजन्म यत्कृतम्॥ ५"},{"b":28997,"kind":"sanskrit_shloka","page":232,"verses":["10.15.6"],"text":"एतेऽलिनस्तव यशोऽखिललोकतीर्थं"},{"b":28998,"kind":"sanskrit_shloka","page":232,"verses":["10.15.6"],"text":"गायन्त आदिपुरुषानुपदं भजन्ते।"},{"b":28999,"kind":"sanskrit_shloka","page":232,"verses":["10.15.6"],"text":"प्रायो अमी मुनिगणा भवदीयमुख्या"},{"b":29000,"kind":"sanskrit_shloka","page":232,"verses":["10.15.6"],"text":"गूढं वनेऽपि न जहत्यनघात्मदैवम्॥ ६"},{"b":29001,"kind":"sanskrit_shloka","page":232,"verses":["10.15.7"],"text":"नृत्यन्त्यमी शिखिन ईड्य मुदा हरिण्यः"},{"b":29002,"kind":"sanskrit_shloka","page":232,"verses":["10.15.7"],"text":"कुर्वन्ति गोप्य इव ते प्रियमीक्षणेन।"},{"b":29003,"kind":"sanskrit_shloka","page":232,"verses":["10.15.7"],"text":"सूक्तैश्‍च कोकिलगणा गृहमागताय"},{"b":29004,"kind":"sanskrit_shloka","page":232,"verses":["10.15.7"],"text":"धन्या वनौकस इयान् हि सतां निसर्गः॥ ७"},{"b":29005,"kind":"sanskrit_shloka","page":232,"verses":["10.15.8"],"text":"धन्येयमद्य धरणी तृणवीरुधस्त्वत्-"},{"b":29006,"kind":"sanskrit_shloka","page":232,"verses":["10.15.8"],"text":"पादस्पृशो द्रुमलताः करजाभिमृष्टाः।"},{"b":29007,"kind":"sanskrit_shloka","page":232,"verses":["10.15.8"],"text":"नद्योऽद्रयः खगमृगाः सदयावलोकै-"},{"b":29008,"kind":"sanskrit_shloka","page":232,"verses":["10.15.8"],"text":"र्गोप्योऽन्तरेण भुजयोरपि यत्स्पृहा श्रीः॥ ८"},{"b":29009,"kind":"hindi_commentary","page":232,"explains":["10.15.5","10.15.6","10.15.7","10.15.8"],"text":"भगवान् श्रीकृष्णने कहा—देवशिरोमणे! यों तो बड़े-बड़े देवता आपके चरणकमलोंकी पूजा करते हैं; परन्तु देखिये तो, ये वृक्ष भी अपनी डालियोंसे सुन्दर पुष्प और फलोंकी सामग्री लेकर आपके चरणकमलोंमें झुक रहे हैं, नमस्कार कर रहे हैं। क्यों न हो, इन्होंने इसी सौभाग्यके लिये तथा अपना दर्शन एवं श्रवण करनेवालोंके अज्ञानका नाश करनेके लिये ही तो वृन्दावनधाममें वृक्ष-योनि ग्रहण की है। इनका जीवन धन्य है॥ ५॥ आदिपुरुष! यद्यपि आप इस वृन्दावनमें अपने ऐश्‍वर्यरूपको छिपाकर बालकोंकी-सी लीला कर रहे हैं, फिर भी आपके श्रेष्ठ भक्त मुनिगण अपने इष्टदेवको पहचानकर यहाँ भी प्रायः भौंरोंके रूपमें आपके भुवन-पावन यशका निरन्तर गान करते हुए आपके भजनमें लगे रहते हैं। वे एक क्षणके लिये भी आपको नहीं छोड़ना चाहते॥ ६॥ भाईजी! वास्तवमें आप ही स्तुति करनेयोग्य हैं। देखिये, आपको अपने घर आया देख ये मोर आपके दर्शनोंसे आनन्दित होकर नाच रहे हैं। हरिनियाँ मृगनयनी गोपियोंके समान अपनी प्रेमभरी तिरछी चितवनसे आपके प्रति प्रेम प्रकट कर रही हैं, आपको प्रसन्‍न कर रही हैं। ये कोयलें अपनी मधुर कुहू-कुहू ध्वनिसे आपका कितना सुन्दर स्वागत कर रही हैं! ये वनवासी होनेपर भी धन्य हैं। क्योंकि सत्पुरुषोंका स्वभाव ही ऐसा होता है कि वे घर आये अतिथिको अपनी प्रिय-से-प्रिय वस्तु भेंट कर देते हैं॥ ७॥ आज यहाँकी भूमि अपनी हरी-हरी घासके साथ आपके चरणोंका स्पर्श प्राप्त करके धन्य हो रही है। यहाँके वृक्ष, लताएँ और झाड़ियाँ आपकी अँगुलियोंका स्पर्श पाकर अपना अहोभाग्य मान रही हैं। आपकी दयाभरी चितवनसे नदी, पर्वत, पशु, पक्षी— सब कृतार्थ हो रहे हैं और व्रजकी गोपियाँ आपके वक्षःस्थलका स्पर्श प्राप्त करके, जिसके लिये स्वयं लक्ष्मी भी लालायित रहती हैं, धन्य-धन्य हो रही हैं॥ ८॥"},{"b":29010,"kind":"topic_heading","page":231,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":29011,"kind":"sanskrit_shloka","page":233,"verses":["10.15.9"],"text":"एवं वृन्दावनं श्रीमत् कृष्णः प्रीतमनाः पशून्।"},{"b":29012,"kind":"sanskrit_shloka","page":233,"verses":["10.15.9"],"text":"रेमे संचारयन्‍नद्रेः सरिद्रोधस्सु सानुगः॥ ९"},{"b":29013,"kind":"sanskrit_shloka","page":233,"verses":["10.15.10"],"text":"क्वचिद् गायति गायत्सु मदान्धालिष्वनुव्रतैः।"},{"b":29014,"kind":"sanskrit_shloka","page":233,"verses":["10.15.10"],"text":"उपगीयमानचरितः स्रग्वी संकर्षणान्वितः॥ १०"},{"b":29015,"kind":"hindi_commentary","page":233,"explains":["10.15.9","10.15.10"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! इस प्रकार परम सुन्दर वृन्दावनको देखकर भगवान् श्रीकृष्ण बहुत ही आनन्दित हुए। वे अपने सखा ग्वालबालोंके साथ गोवर्धनकी तराईमें, यमुनातटपर गौओंको चराते हुए अनेकों प्रकारकी लीलाएँ करने लगे॥ ९॥ एक ओर ग्वालबाल भगवान् श्रीकृष्णके चरित्रोंकी मधुर तान छेड़े रहते हैं, तो दूसरी ओर बलरामजीके साथ वनमाला पहने हुए श्रीकृष्ण मतवाले भौंरोंकी सुरीली गुनगुनाहटमें अपना स्वर मिलाकर मधुर संगीत अलापने लगते हैं॥ १०॥"},{"b":29016,"kind":"sanskrit_shloka","page":233,"verses":["10.15.11"],"text":"क्वचिच्च कलहंसानामनुकूजति कूजितम्।"},{"b":29017,"kind":"sanskrit_shloka","page":233,"verses":["10.15.11"],"text":"अभिनृत्यति नृत्यन्तं बर्हिणं हासयन् क्‍वचित्॥ ११"},{"b":29018,"kind":"sanskrit_shloka","page":233,"verses":["10.15.12"],"text":"मेघगम्भीरया वाचा नामभिर्दूरगान् पशून्।"},{"b":29019,"kind":"sanskrit_shloka","page":233,"verses":["10.15.12"],"text":"क्वचिदाह्वयति प्रीत्या गोगोपालमनोज्ञया॥ १२"},{"b":29020,"kind":"sanskrit_shloka","page":233,"verses":["10.15.13"],"text":"चकोरक्रौञ्चचक्राह्वभारद्वाजांश्‍च बर्हिणः।"},{"b":29021,"kind":"sanskrit_shloka","page":233,"verses":["10.15.13"],"text":"अनुरौति स्म सत्त्वानां भीतवद् व्याघ्रसिंहयोः॥ १३"},{"b":29022,"kind":"sanskrit_shloka","page":233,"verses":["10.15.14"],"text":"क्‍वचित् क्रीडापरिश्रान्तं गोपोत्संगोपबर्हणम्।"},{"b":29023,"kind":"sanskrit_shloka","page":233,"verses":["10.15.14"],"text":"स्वयं विश्रमयत्यार्यं पादसंवाहनादिभिः॥ १४"},{"b":29024,"kind":"sanskrit_shloka","page":233,"verses":["10.15.15"],"text":"नृत्यतो गायतः क्वापि वल्गतो युध्यतो मिथः।"},{"b":29025,"kind":"sanskrit_shloka","page":233,"verses":["10.15.15"],"text":"गृहीतहस्तौ गोपालान् हसन्तौ प्रशशंसतुः॥ १५"},{"b":29026,"kind":"sanskrit_shloka","page":233,"verses":["10.15.16"],"text":"क्‍वचित् पल्लवतल्पेषु नियुद्धश्रमकर्शितः।"},{"b":29027,"kind":"sanskrit_shloka","page":233,"verses":["10.15.16"],"text":"वृक्षमूलाश्रयः शेते गोपोत्संगोपबर्हणः॥ १६"},{"b":29028,"kind":"sanskrit_shloka","page":233,"verses":["10.15.17"],"text":"पादसंवाहनं चक्रुः केचित्तस्य महात्मनः।"},{"b":29029,"kind":"sanskrit_shloka","page":233,"verses":["10.15.17"],"text":"अपरे हतपाप्मानो व्यजनैः समवीजयन्॥ १७"},{"b":29030,"kind":"sanskrit_shloka","page":234,"verses":["10.15.18"],"text":"अन्ये तदनुरूपाणि मनोज्ञानि महात्मनः।"},{"b":29031,"kind":"sanskrit_shloka","page":234,"verses":["10.15.18"],"text":"गायन्ति स्म महाराज स्नेहक्लिन्‍नधियः शनैः॥ १८"},{"b":29032,"kind":"sanskrit_shloka","page":234,"verses":["10.15.19"],"text":"एवं निगूढात्मगतिः स्वमायया"},{"b":29033,"kind":"sanskrit_shloka","page":234,"verses":["10.15.19"],"text":"गोपात्मजत्वं चरितैर्विडम्बयन्।"},{"b":29034,"kind":"sanskrit_shloka","page":234,"verses":["10.15.19"],"text":"रेमे रमालालितपादपल्लवो"},{"b":29035,"kind":"sanskrit_shloka","page":234,"verses":["10.15.19"],"text":"ग्राम्यैः समं ग्राम्यवदीशचेष्टितः॥ १९"},{"b":29036,"kind":"hindi_translation","page":233,"explains":["10.15.11","10.15.12","10.15.13","10.15.14","10.15.15","10.15.16","10.15.17","10.15.18","10.15.19"],"text":"कभी-कभी श्रीकृष्ण कूजते हुए राजहंसोंके साथ स्वयं भी कूजने लगते हैं और कभी नाचते हुए मोरोंके साथ स्वयं भी ठुमुक-ठुमुक नाचने लगते हैं और ऐसा नाचते हैं कि मयूरको उपहासास्पद बना देते हैं॥ ११॥ कभी मेघके समान गम्भीर वाणीसे दूर गये हुए पशुओंको उनका नाम ले-लेकर बड़े प्रेमसे पुकारते हैं। उनके कण्ठकी मधुर ध्वनि सुनकर गायों और ग्वालबालोंका चित्त भी अपने वशमें नहीं रहता॥ १२॥ कभी चकोर, क्रौंच (कराँकुल), चकवा, भरदूल और मोर आदि पक्षियोंकी-सी बोली बोलते तो कभी बाघ, सिंह आदिकी गर्जनासे डरे हुए जीवोंके समान स्वयं भी भयभीतकी-सी लीला करते॥ १३॥ जब बलरामजी खेलते-खेलते थककर किसी ग्वाल-बालकी गोदके तकियेपर सिर रखकर लेट जाते, तब श्रीकृष्ण उनके पैर दबाने लगते, पंखा झलने लगते और इस प्रकार अपने बड़े भाईकी थकावट दूर करते॥ १४॥ जब ग्वालबाल नाचने-गाने लगते अथवा ताल ठोंक-ठोंककर एक-दूसरेसे कुश्ती लड़ने लगते, तब श्याम और राम दोनों भाई हाथमें हाथ डालकर खड़े हो जाते और हँस-हँसकर ‘वाह-वाह’ करते॥ १५॥ कभी-कभी स्वयं श्रीकृष्ण भी ग्वाल-बालोंके साथ कुश्ती लड़ते-लड़ते थक जाते तथा किसी सुन्दर वृक्षके नीचे कोमल पल्लवोंकी सेजपर किसी ग्वालबालकी गोदमें सिर रखकर लेट जाते॥ १६॥ परीक्षित्! उस समय कोई-कोई पुण्यके मूर्तिमान् स्वरूप ग्वालबाल महात्मा श्रीकृष्णके चरण दबाने लगते और दूसरे निष्पाप बालक उन्हें बड़े-बड़े पत्तों या अँगोछियोंसे पंखा झलने लगते॥ १७॥ किसी-किसीके हृदयमें प्रेमकी धारा उमड़ आती तो वह धीरे-धीरे उदारशिरोमणि परममनस्वी श्रीकृष्णकी लीलाओंके अनुरूप उनके मनको प्रिय लगनेवाले मनोहर गीत गाने लगता॥ १८॥ भगवान्‌ने इस प्रकार अपनी योगमायासे अपने ऐश्‍वर्यमय स्वरूपको छिपा रखा था। वे ऐसी लीलाएँ करते, जो ठीक-ठीक गोपबालकोंकी-सी ही मालूम पड़तीं। स्वयं भगवती लक्ष्मी जिनके चरणकमलोंकी सेवामें संल‌ग्‍न रहती हैं, वे ही भगवान् इन ग्रामीण बालकोंके साथ बड़े प्रेमसे ग्रामीण खेल खेला करते थे। परीक्षित्! ऐसा होनेपर भी कभी-कभी उनकी ऐश्‍वर्यमयी लीलाएँ भी प्रकट हो जाया करतीं॥ १९॥"},{"b":29037,"kind":"sanskrit_shloka","page":234,"verses":["10.15.20"],"text":"श्रीदामा नाम गोपालो रामकेशवयोः सखा।"},{"b":29038,"kind":"sanskrit_shloka","page":234,"verses":["10.15.20"],"text":"सुबलस्तोककृष्णाद्या गोपाः प्रेम्णेदमब्रुवन्॥ २०"},{"b":29039,"kind":"sanskrit_shloka","page":234,"verses":["10.15.21"],"text":"राम राम महाबाहो कृष्ण दुष्टनिबर्हण।"},{"b":29040,"kind":"sanskrit_shloka","page":234,"verses":["10.15.21"],"text":"इतोऽविदूरे सुमहद् वनं तालालिसंकुलम्॥ २१"},{"b":29041,"kind":"sanskrit_shloka","page":234,"verses":["10.15.22"],"text":"फलानि तत्र भूरीणि पतन्ति पतितानि च।"},{"b":29042,"kind":"sanskrit_shloka","page":234,"verses":["10.15.22"],"text":"सन्ति किंत्ववरुद्धानि धेनुकेन दुरात्मना॥ २२"},{"b":29043,"kind":"sanskrit_shloka","page":234,"verses":["10.15.23"],"text":"सोऽतिवीर्योऽसुरो राम हे कृष्ण खररूपधृक्।"},{"b":29044,"kind":"sanskrit_shloka","page":234,"verses":["10.15.23"],"text":"आत्मतुल्यबलैरन्यैर्ज्ञातिभिर्बहुभिर्वृतः॥ २३"},{"b":29045,"kind":"sanskrit_shloka","page":234,"verses":["10.15.24"],"text":"तस्मात् कृतनराहाराद् भीतैर्नृभिरमित्रहन्।"},{"b":29046,"kind":"sanskrit_shloka","page":234,"verses":["10.15.24"],"text":"न सेव्यते पशुगणैः पक्षिसंघैर्विवर्जितम्॥ २४"},{"b":29047,"kind":"sanskrit_shloka","page":234,"verses":["10.15.25"],"text":"विद्यन्तेऽभुक्तपूर्वाणि फलानि सुरभीणि च।"},{"b":29048,"kind":"sanskrit_shloka","page":234,"verses":["10.15.25"],"text":"एष वै सुरभिर्गन्धो विषूचीनोऽवगृह्यते॥ २५"},{"b":29049,"kind":"sanskrit_shloka","page":235,"verses":["10.15.26"],"text":"प्रयच्छ तानि नः कृष्ण गन्धलोभितचेतसाम्।"},{"b":29050,"kind":"sanskrit_shloka","page":235,"verses":["10.15.26"],"text":"वाञ्छास्ति महती राम गम्यतां यदि रोचते॥ २६"},{"b":29051,"kind":"hindi_commentary","page":234,"explains":["10.15.20","10.15.21","10.15.22","10.15.23","10.15.24","10.15.25","10.15.26"],"text":"बलरामजी और श्रीकृष्णके सखाओंमें एक प्रधान गोप-बालक थे श्रीदामा। एक दिन उन्होंने तथा सुबल और स्तोककृष्ण (छोटे कृष्ण) आदि ग्वालबालोंने श्याम और रामसे बड़े प्रेमके साथ कहा—॥ २०॥ ‘हमलोगोंको सर्वदा सुख पहुँचानेवाले बलरामजी! आपके बाहुबलकी तो कोई थाह ही नहीं है। हमारे मनमोहन श्रीकृष्ण! दुष्टोंको नष्ट कर डालना तो तुम्हारा स्वभाव ही है। यहाँसे थोड़ी ही दूरपर एक बड़ा भारी वन है। बस, उसमें पाँत-के-पाँत ताड़के वृक्ष भरे पड़े हैं॥ २१॥ वहाँ बहुत-से ताड़के फल पक-पककर गिरते रहते हैं और बहुत-से पहलेके गिरे हुए भी हैं। परन्तु वहाँ धेनुक नामका एक दुष्ट दैत्य रहता है। उसने उन फलोंपर रोक लगा रखी है॥ २२॥ बलरामजी और भैया श्रीकृष्ण! वह दैत्य गधेके रूपमें रहता है। वह स्वयं तो बड़ा बलवान् है ही, उसके साथी और भी बहुत-से उसीके समान बलवान् दैत्य उसी रूपमें रहते हैं॥ २३॥ मेरे शत्रुघाती भैया! उस दैत्यने अबतक न जाने कितने मनुष्य खा डाले हैं। यही कारण है कि उसके डरके मारे मनुष्य उसका सेवन नहीं करते और पशु-पक्षी भी उस जंगलमें नहीं जाते॥ २४॥ उसके फल हैं तो बड़े सुगन्धित, परन्तु हमने कभी नहीं खाये। देखो न, चारों ओर उन्हींकी मन्द-मन्द सुगन्ध फैल रही है। तनिक-सा ध्यान देनेसे उसका रस मिलने लगता है॥ २५॥ श्रीकृष्ण! उनकी सुगन्धसे हमारा मन मोहित हो गया है और उन्हें पानेके लिये मचल रहा है। तुम हमें वे फल अवश्य खिलाओ। दाऊ दादा! हमें उन फलोंकी बड़ी उत्कट अभिलाषा है। आपको रुचे तो वहाँ अवश्य चलिये॥ २६॥"},{"b":29052,"kind":"sanskrit_shloka","page":235,"verses":["10.15.27"],"text":"एवं सुहृद्वचः श्रुत्वा सुहृत्प्रियचिकीर्षया।"},{"b":29053,"kind":"sanskrit_shloka","page":235,"verses":["10.15.27"],"text":"प्रहस्य जग्मतुर्गोपैर्वृतौ तालवनं प्रभू॥ २७"},{"b":29054,"kind":"sanskrit_shloka","page":235,"verses":["10.15.28"],"text":"बलः प्रविश्य बाहुभ्यां तालान् सम्परिकम्पयन्।"},{"b":29055,"kind":"sanskrit_shloka","page":235,"verses":["10.15.28"],"text":"फलानि पातयामास मतंगज इवौजसा॥ २८"},{"b":29056,"kind":"sanskrit_shloka","page":235,"verses":["10.15.29"],"text":"फलानां पततां शब्दं निशम्यासुररासभः।"},{"b":29057,"kind":"sanskrit_shloka","page":235,"verses":["10.15.29"],"text":"अभ्यधावत् क्षितितलं सनगं परिकम्पयन्॥ २९"},{"b":29058,"kind":"sanskrit_shloka","page":235,"verses":["10.15.30"],"text":"समेत्य तरसा प्रत्यग् द्वाभ्यां पद‍्भ्यां बलं बली।"},{"b":29059,"kind":"sanskrit_shloka","page":235,"verses":["10.15.30"],"text":"निहत्योरसि काशब्दं मुंचन् पर्यसरत् खलः॥ ३०"},{"b":29060,"kind":"sanskrit_shloka","page":235,"verses":["10.15.31"],"text":"पुनरासाद्य संरब्ध उपक्रोष्टा पराक् स्थितः।"},{"b":29061,"kind":"sanskrit_shloka","page":235,"verses":["10.15.31"],"text":"चरणावपरौ राजन् बलाय प्राक्षिपद् रुषा॥ ३१"},{"b":29062,"kind":"sanskrit_shloka","page":235,"verses":["10.15.32"],"text":"स तं गृहीत्वा प्रपदोर्भ्रामयित्वैकपाणिना।"},{"b":29063,"kind":"sanskrit_shloka","page":235,"verses":["10.15.32"],"text":"चिक्षेप तृणराजाग्रे भ्रामणत्यक्तजीवितम्॥ ३२"},{"b":29064,"kind":"hindi_commentary","page":235,"explains":["10.15.27","10.15.28","10.15.29","10.15.30","10.15.31","10.15.32"],"text":"अपने सखा ग्वालबालोंकी यह बात सुनकर भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी दोनों हँसे और फिर उन्हें प्रसन्‍न करनेके लिये उनके साथ तालवनके लिये चल पड़े॥ २७॥ उस वनमें पहुँचकर बलरामजीने अपनी बाँहोंसे उन ताड़के पेड़ोंको पकड़ लिया और मतवाले हाथीके बच्चेके समान उन्हें बड़े जोरसे हिलाकर बहुत-से फल नीचे गिरा दिये॥ २८॥ जब गधेके रूपमें रहनेवाले दैत्यने फलोंके गिरनेका शब्द सुना, तब वह पर्वतोंके साथ सारी पृथ्वीको कँपाता हुआ उनकी ओर दौड़ा॥ २९॥ वह बड़ा बलवान् था। उसने बड़े वेगसे बलरामजीके सामने आकर अपने पिछले पैरोंसे उनकी छातीमें दुलत्ती मारी और इसके बाद वह दुष्ट बड़े जोरसे रेंकता हुआ वहाँसे हट गया॥ ३०॥ राजन्! वह गधा क्रोधमें भरकर फिर रेंकता हुआ दूसरी बार बलरामजीके पास पहुँचा और उनकी ओर पीठ करके फिर बड़े क्रोधसे अपने पिछले पैरोंकी दुलत्ती चलायी॥ ३१॥ बलरामजीने अपने एक ही हाथसे उसके दोनों पैर पकड़ लिये और उसे आकाशमें घुमाकर एक ताड़के पेड़पर दे मारा। घुमाते समय ही उस गधेके प्राणपखेरू उड़ गये थे॥ ३२॥"},{"b":29065,"kind":"sanskrit_shloka","page":235,"verses":["10.15.33"],"text":"तेनाहतो महातालो वेपमानो बृहच्छिराः।"},{"b":29066,"kind":"sanskrit_shloka","page":235,"verses":["10.15.33"],"text":"पार्श्‍वस्थं कम्पयन् भ‌ग्‍नः स चान्यं सोऽपि चापरम्॥ ३३"},{"b":29067,"kind":"sanskrit_shloka","page":235,"verses":["10.15.34"],"text":"बलस्य लीलयोत्सृष्टखरदेहहताहताः।"},{"b":29068,"kind":"sanskrit_shloka","page":235,"verses":["10.15.34"],"text":"तालाश्‍चकम्पिरे सर्वे महावातेरिता इव॥ ३४"},{"b":29069,"kind":"hindi_translation","page":235,"explains":["10.15.33","10.15.34"],"text":"उसके गिरनेकी चोटसे वह महान् ताड़का वृक्ष—जिसका ऊपरी भाग बहुत विशाल था—स्वयं तो तड़तड़ाकर गिर ही पड़ा, सटे हुए दूसरे वृक्षको भी उसने तोड़ डाला। उसने तीसरेको, तीसरेने चौथेको—इस प्रकार एक-दूसरेको गिराते हुए बहुत-से तालवृक्ष गिर पड़े॥ ३३॥ बलरामजीके लिये तो यह एक खेल था। परन्तु उनके द्वारा फेंके हुए गधेके शरीरसे चोट खा-खाकर वहाँ सब-के-सब ताड़ हिल गये। ऐसा जान पड़ा, मानो सबको झंझावातने झकझोर दिया हो॥ ३४॥"},{"b":29070,"kind":"sanskrit_shloka","page":236,"verses":["10.15.35"],"text":"नैतच्चित्रं भगवति ह्यनन्ते जगदीश्‍वरे।"},{"b":29071,"kind":"sanskrit_shloka","page":236,"verses":["10.15.35"],"text":"ओतप्रोतमिदं यस्मिंस्तन्तुष्वंग यथा पटः॥ ३५"},{"b":29072,"kind":"sanskrit_shloka","page":236,"verses":["10.15.36"],"text":"ततः कृष्णं च रामं च ज्ञातयो धेनुकस्य ये।"},{"b":29073,"kind":"sanskrit_shloka","page":236,"verses":["10.15.36"],"text":"क्रोष्टारोऽभ्यद्रवन् सर्वे संरब्धा हतबान्धवाः॥ ३६"},{"b":29074,"kind":"sanskrit_shloka","page":236,"verses":["10.15.37"],"text":"तांस्तानापततः कृष्णो रामश्‍च नृप लीलया।"},{"b":29075,"kind":"sanskrit_shloka","page":236,"verses":["10.15.37"],"text":"गृहीतपश्‍चाच्चरणान् प्राहिणोत्तृणराजसु॥ ३७"},{"b":29076,"kind":"sanskrit_shloka","page":236,"verses":["10.15.38"],"text":"फलप्रकरसंकीर्णं दैत्यदेहैर्गतासुभिः।"},{"b":29077,"kind":"sanskrit_shloka","page":236,"verses":["10.15.38"],"text":"रराज भूः सतालाग्रैर्घनैरिव नभस्तलम्॥ ३८"},{"b":29078,"kind":"sanskrit_shloka","page":236,"verses":["10.15.39"],"text":"तयोस्तत् सुमहत् कर्म निशाम्य विबुधादयः।"},{"b":29079,"kind":"sanskrit_shloka","page":236,"verses":["10.15.39"],"text":"मुमुचुः पुष्पवर्षाणि चक्रुर्वाद्यानि तुष्टुवुः॥ ३९"},{"b":29080,"kind":"sanskrit_shloka","page":236,"verses":["10.15.40"],"text":"अथ तालफलान्यादन् मनुष्या गतसाध्वसाः।"},{"b":29081,"kind":"sanskrit_shloka","page":236,"verses":["10.15.40"],"text":"तृणं च पशवश्‍चेरुर्हतधेनुककानने॥ ४०"},{"b":29082,"kind":"sanskrit_shloka","page":236,"explains":["10.15.35","10.15.36","10.15.37","10.15.38","10.15.39","10.15.40"],"text":"भगवान् बलराम स्वयं जगदीश्‍वर हैं। उनमें यह सारा संसार ठीक वैसे ही ओतप्रोत है, जैसे सूतोंमें वस्त्र। तब भला, उनके लिये यह कौन आश्‍चर्यकी बात है॥ ३५॥ उस समय धेनुकासुरके भाई-बन्धु अपने भाईके मारे जानेसे क्रोधके मारे आगबबूला हो गये। सब-के-सब गधे बलरामजी और श्रीकृष्णपर बड़े वेगसे टूट पड़े॥ ३६॥ राजन्! उनमेंसे जो-जो पास आया, उसी-उसीको बलरामजी और श्रीकृष्णने खेल-खेलमें ही पिछले पैर पकड़कर तालवृक्षोंपर दे मारा॥ ३७॥ उस समय वह भूमि ताड़के फलोंसे पट गयी और टूटे हुए वृक्ष तथा दैत्योंके प्राणहीन शरीरोंसे भर गयी। जैसे बादलोंसे आकाश ढक गया हो, उस भूमिकी वैसी ही शोभा होने लगी॥ ३८॥ बलरामजी और श्रीकृष्णकी यह मंगलमयी लीला देखकर देवतागण उनपर फूल बरसाने लगे और बाजे बजा-बजाकर स्तुति करने लगे॥ ३९॥ जिस दिन धेनुकासुर मरा, उसी दिनसे लोग निडर होकर उस वनके तालफल खाने लगे तथा पशु भी स्वच्छन्दताके साथ घास चरने लगे॥ ४०॥"},{"b":29083,"kind":"sanskrit_shloka","page":236,"verses":["10.15.41"],"text":"कृष्णः कमलपत्राक्षः पुण्यश्रवणकीर्तनः।"},{"b":29084,"kind":"topic_heading","page":236,"verses":["10.15.41"],"text":"स्तूयमानोऽनुगैर्गोपैः साग्रजो व्रजमाव्रजत्॥ ४१"},{"b":29085,"kind":"sanskrit_shloka","page":236,"verses":["10.15.42"],"text":"तं गोरजश्छुरितकुन्तलबद्धबर्ह-"},{"b":29086,"kind":"sanskrit_shloka","page":236,"verses":["10.15.42"],"text":"वन्यप्रसूनरुचिरेक्षणचारुहासम्।"},{"b":29087,"kind":"sanskrit_shloka","page":236,"verses":["10.15.42"],"text":"वेणुं क्वणन्तमनुगैरनुगीतकीर्तिं"},{"b":29088,"kind":"sanskrit_shloka","page":236,"verses":["10.15.42"],"text":"गोप्यो दिदृक्षितदृशोऽभ्यगमन् समेताः॥ ४२"},{"b":29089,"kind":"sanskrit_shloka","page":236,"explains":["10.15.41","10.15.42"],"text":"इसके बाद कमलदललोचन भगवान् श्रीकृष्ण बड़े भाई बलरामजीके साथ व्रजमें आये। उस समय उनके साथी ग्वालबाल उनके पीछे-पीछे चलते हुए उनकी स्तुति करते जाते थे। क्यों न हो; भगवान्‌की लीलाओंका श्रवण-कीर्तन ही सबसे बढ़कर पवित्र जो है॥ ४१॥ उस समय श्रीकृष्णकी घुँघराली अलकोंपर गौओंके खुरोंसे उड़-उड़कर धूलि पड़ी हुई थी, सिरपर मोरपंखका मुकुट था और बालोंमें सुन्दर-सुन्दर जंगली पुष्प गुँथे हुए थे। उनके नेत्रोंमें मधुर चितवन और मुखपर मनोहर मुसकान थी। वे मधुर-मधुर मुरली बजा रहे थे और साथी ग्वालबाल उनकी ललित कीर्तिका गान कर रहे थे। वंशीकी ध्वनि सुनकर बहुत-सी गोपियाँ एक साथ ही व्रजसे बाहर निकल आयीं। उनकी आँखें न जाने कबसे श्रीकृष्णके दर्शनके लिये तरस रही थीं॥ ४२॥"},{"b":29090,"kind":"sanskrit_shloka","page":237,"verses":["10.15.43"],"text":"पीत्वा मुकुन्दमुखसारघमक्षिभृङ्गै-"},{"b":29091,"kind":"sanskrit_shloka","page":237,"verses":["10.15.43"],"text":"स्तापं जहुर्विरहजं व्रजयोषितोऽह्नि।"},{"b":29092,"kind":"sanskrit_shloka","page":237,"verses":["10.15.43"],"text":"तत्सत्कृतिं समधिगम्य विवेश गोष्ठं"},{"b":29093,"kind":"sanskrit_shloka","page":237,"verses":["10.15.43"],"text":"सव्रीडहासविनयं यदपांगमोक्षम्॥ ४३"},{"b":29094,"kind":"sanskrit_shloka","page":237,"verses":["10.15.44"],"text":"तयोर्यशोदारोहिण्यौ पुत्रयोः पुत्रवत्सले।"},{"b":29095,"kind":"sanskrit_shloka","page":237,"verses":["10.15.44"],"text":"यथाकामं यथाकालं व्यधत्तां परमाशिषः॥ ४४"},{"b":29096,"kind":"sanskrit_shloka","page":237,"verses":["10.15.45"],"text":"गताध्वानश्रमौ तत्र मज्जनोन्मर्दनादिभिः।"},{"b":29097,"kind":"sanskrit_shloka","page":237,"verses":["10.15.45"],"text":"नीवीं वसित्वा रुचिरां दिव्यस्रग्गन्धमण्डितौ॥ ४५"},{"b":29098,"kind":"sanskrit_shloka","page":237,"verses":["10.15.46"],"text":"जनन्युपहृतं प्राश्य स्वाद्वन्‍नमुपलालितौ।"},{"b":29099,"kind":"sanskrit_shloka","page":237,"verses":["10.15.46"],"text":"संविश्य वरशय्यायां सुखं सुषुपतुर्व्रजे॥ ४६"},{"b":29100,"kind":"hindi_commentary","page":237,"explains":["10.15.43","10.15.44","10.15.45","10.15.46"],"text":"गोपियोंने अपने नेत्ररूप भ्रमरोंसे भगवान्‌के मुखारविन्दका मकरन्द-रस पान करके दिनभरके विरहकी जलन शान्त की। और भगवान्‌ने भी उनकी लाजभरी हँसी तथा विनयसे युक्त प्रेमभरी तिरछी चितवनका सत्कार स्वीकार करके व्रजमें प्रवेश किया॥ ४३॥ उधर यशोदामैया और रोहिणीजीका हृदय वात्सल्यस्नेहसे उमड़ रहा था। उन्होंने श्याम और रामके घर पहुँचते ही उनकी इच्छाके अनुसार तथा समयके अनुरूप पहलेसे ही सोच-सँजोकर रखी हुई वस्तुएँ उन्हें खिलायीं-पिलायीं और पहनायीं॥ ४४॥ माताओंने तेल-उबटन आदि लगाकर स्नान कराया। इससे उनकी दिनभर घूमने-फिरनेकी मार्गकी थकान दूर हो गयी। फिर उन्होंने सुन्दर वस्त्र पहनाकर दिव्य पुष्पोंकी माला पहनायी तथा चन्दन लगाया॥ ४५॥ तत्पश्‍चात् दोनों भाइयोंने माताओंका परोसा हुआ स्वादिष्ट अन्‍न भोजन किया। इसके बाद बड़े लाड़-प्यारसे दुलार-दुलार कर यशोदा और रोहिणीने उन्हें सुन्दर शय्यापर सुलाया। श्याम और राम बड़े आरामसे सो गये॥ ४६॥"},{"b":29101,"kind":"sanskrit_shloka","page":237,"verses":["10.15.47"],"text":"एवं स भगवान् कृष्णो वृन्दावनचरः क्‍वचित्।"},{"b":29102,"kind":"sanskrit_shloka","page":237,"verses":["10.15.47"],"text":"ययौ राममृते राजन् कालिन्दीं सखिभिर्वृतः॥ ४७"},{"b":29103,"kind":"sanskrit_shloka","page":237,"verses":["10.15.48"],"text":"अथ गावश्‍च गोपाश्‍च निदाघातपपीडिताः।"},{"b":29104,"kind":"sanskrit_shloka","page":237,"verses":["10.15.48"],"text":"दुष्टं जलं पपुस्तस्यास्तृषार्ता विषदूषितम्॥ ४८"},{"b":29105,"kind":"sanskrit_shloka","page":237,"verses":["10.15.49"],"text":"विषाम्भस्तदुपस्पृश्य दैवोपहतचेतसः।"},{"b":29106,"kind":"sanskrit_shloka","page":237,"verses":["10.15.49"],"text":"निपेतुर्व्यसवः सर्वे सलिलान्ते कुरूद्वह॥ ४९"},{"b":29107,"kind":"sanskrit_shloka","page":237,"verses":["10.15.50"],"text":"वीक्ष्य तान् वै तथा भूतान् कृष्णो योगेश्‍वरेश्‍वरः।"},{"b":29108,"kind":"sanskrit_shloka","page":237,"verses":["10.15.50"],"text":"ईक्षयामृतवर्षिण्या स्वनाथान् समजीवयत्॥ ५०"},{"b":29109,"kind":"sanskrit_shloka","page":237,"verses":["10.15.51"],"text":"ते सम्प्रतीतस्मृतयः समुत्थाय जलान्तिकात्।"},{"b":29110,"kind":"sanskrit_shloka","page":237,"verses":["10.15.51"],"text":"आसन् सुविस्मिताः सर्वे वीक्षमाणाः परस्परम्॥ ५१"},{"b":29111,"kind":"hindi_translation","page":237,"explains":["10.15.47","10.15.48","10.15.49","10.15.50","10.15.51"],"text":"भगवान् श्रीकृष्ण इस प्रकार वृन्दावनमें अनेकों लीलाएँ करते। एक दिन अपने सखा ग्वालबालोंके साथ वे यमुना-तटपर गये। राजन्! उस दिन बलरामजी उनके साथ नहीं थे॥ ४७॥ उस समय जेठ-आषाढ़के घामसे गौएँ और ग्वालबाल अत्यन्त पीड़ित हो रहे थे। प्याससे उनका कण्ठ सूख रहा था। इसलिये उन्होंने यमुनाजीका विषैला जल पी लिया॥ ४८॥ परीक्षित्! होनहारके वश उन्हें इस बातका ध्यान ही नहीं रहा था। उस विषैले जलके पीते ही सब गौएँ और ग्वालबाल प्राणहीन होकर यमुनाजीके तटपर गिर पड़े॥ ४९॥ उन्हें ऐसी अवस्थामें देखकर योगेश्‍वरोंके भी ईश्‍वर भगवान् श्रीकृष्णने अपनी अमृत बरसानेवाली दृष्टिसे उन्हें जीवित कर दिया। उनके स्वामी और सर्वस्व तो एकमात्र श्रीकृष्ण ही थे॥ ५०॥ परीक्षित्! चेतना आनेपर वे सब यमुनाजीके तटपर उठ खड़े हुए और आश्‍चर्यचकित होकर एक-दूसरेकी ओर देखने लगे॥ ५१॥"},{"b":29112,"kind":"sanskrit_shloka","page":238,"verses":["10.15.52"],"text":"अन्वमंसत तद् राजन् गोविन्दानुग्रहेक्षितम्।"},{"b":29113,"kind":"sanskrit_shloka","page":238,"verses":["10.15.52"],"text":"पीत्वा विषं परेतस्य पुनरुत्थानमात्मनः॥ ५२"},{"b":29114,"kind":"hindi_translation","page":238,"explains":["10.15.52"],"text":"राजन्! अन्तमें उन्होंने यही निश्‍चय किया कि हमलोग विषैला जल पी लेनेके कारण मर चुके थे, परन्तु हमारे श्रीकृष्णने अपनी अनुग्रहभरी दृष्टिसे देखकर हमें फिरसे जिला दिया है॥ ५२॥"},{"b":29115,"kind":"hindi_translation","page":238,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे धेनुकवधो नाम पञ्चदशोऽध्यायः॥ १५॥"}],"notes":[],"corrections":{"count":2,"list":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/shuddhi/"}}