{"id":"10.28","title":"दशम स्कन्ध · अध्याय 28","part":"दशम स्कन्ध (पूर्वार्ध)","heading":"अथाष्टाविंशोऽध्यायः","topics":["वरुणलोकसे नन्दजीको छुड़ाकर लाना"],"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/28/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 10.28.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/28/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[303,307]},"verses":[{"id":"10.28.1","number":1,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/28/1/","page":304,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एकादश्यां निराहारः समभ्यर्च्य जनार्दनम्।","स्नातुं नन्दस्तु कालिन्द्या द्वादश्यां जलमाविशत्॥ १"],"iast":["ekādaśyāṃ nirāhāraḥ samabhyarcya janārdanam|","snātuṃ nandastu kālindyā dvādaśyāṃ jalamāviśat|| 1"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! नन्दबाबाने कार्तिक शुक्ल एकादशीका उपवास किया और भगवान्‌की पूजा की तथा उसी दिन रातमें द्वादशी लगनेपर स्नान करनेके लिये यमुना-जलमें प्रवेश किया॥ १॥"},{"id":"10.28.2","number":2,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/28/2/","page":304,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तं गृहीत्वानयद् भृत्यो वरुणस्यासुरोऽन्तिकम्।","अविज्ञायासुरीं वेलां प्रविष्टमुदकं निशि॥ २"],"iast":["taṃ gṛhītvānayad bhṛtyo varuṇasyāsuro'ntikam|","avijñāyāsurīṃ velāṃ praviṣṭamudakaṃ niśi|| 2"],"meaning":"नन्दबाबाको यह मालूम नहीं था कि यह असुरोंकी वेला है, इसलिये वे रातके समय ही यमुनाजलमें घुस गये। उस समय वरुणके सेवक एक असुरने उन्हें पकड़ लिया और वह अपने स्वामीके पास ले गया॥ २॥"},{"id":"10.28.3","number":3,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/28/3/","page":305,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["चुक्रुशुस्तमपश्यन्तः कृष्ण रामेति गोपकाः।","भगवांस्तदुपश्रुत्य पितरं वरुणाहृतम्।","तदन्तिकं गतो राजन् स्वानामभयदो विभुः॥ ३"],"iast":["cukruśustamapaśyantaḥ kṛṣṇa rāmeti gopakāḥ|","bhagavāṃstadupaśrutya pitaraṃ varuṇāhṛtam|","tadantikaṃ gato rājan svānāmabhayado vibhuḥ|| 3"],"meaning":"नन्दबाबाके खो जानेसे व्रजके सारे गोप ‘श्रीकृष्ण! अब तुम्हीं अपने पिताको ला सकते हो; बलराम! अब तुम्हारा ही भरोसा है’—इस प्रकार कहते हुए रोने-पीटने लगे। भगवान् श्रीकृष्ण सर्वशक्तिमान् हैं एवं सदासे ही अपने भक्तोंका भय भगाते आये हैं। जब उन्होंने व्रजवासियोंका रोना-पीटना सुना और यह जाना कि पिताजीको वरुणका कोई सेवक ले गया है, तब वे वरुणजीके पास गये॥ ३॥"},{"id":"10.28.4","number":4,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/28/4/","page":305,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["प्राप्तं वीक्ष्य हृषीकेशं लोकपालः सपर्यया।","महत्या पूजयित्वाऽऽह तद्दर्शनमहोत्सवः॥ ४"],"iast":["prāptaṃ vīkṣya hṛṣīkeśaṃ lokapālaḥ saparyayā|","mahatyā pūjayitvā''ha taddarśanamahotsavaḥ|| 4"],"meaning":"जब लोकपाल वरुणने देखा कि समस्त जगत‍्के अन्तरिन्द्रिय और बहिरिन्द्रियोंके प्रवर्तक भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं ही उनके यहाँ पधारे हैं, तब उन्होंने उनकी बहुत बड़ी पूजा की। भगवान्‌के दर्शनसे उनका रोम-रोम आनन्दसे खिल उठा। इसके बाद उन्होंने भगवान्‌से निवेदन किया॥ ४॥"},{"id":"10.28.5","number":5,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/28/5/","page":305,"speaker":"वरुण उवाच","sanskrit":["अद्य मे निभृतो देहोऽद्यैवार्थोऽधिगतः प्रभो।","त्वत्पादभाजो भगवन्‍नवापुः पारमध्वनः॥ ५"],"iast":["adya me nibhṛto deho'dyaivārtho'dhigataḥ prabho|","tvatpādabhājo bhagavannavāpuḥ pāramadhvanaḥ|| 5"],"meaning":"वरुणजीने कहा—प्रभो! आज मेरा शरीर धारण करना सफल हुआ। आज मुझे सम्पूर्ण पुरुषार्थ प्राप्त हो गया; क्योंकि आज मुझे आपके चरणोंकी सेवाका शुभ अवसर प्राप्त हुआ है। भगवन्! जिन्हें भी आपके चरणकमलोंकी सेवाका सुअवसर मिला, वे भवसागरसे पार हो गये॥ ५॥"},{"id":"10.28.6","number":6,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/28/6/","page":305,"speaker":"वरुण उवाच","sanskrit":["नमस्तुभ्यं भगवते ब्रह्मणे परमात्मने।","न यत्र श्रूयते माया लोकसृष्टिविकल्पना॥ ६"],"iast":["namastubhyaṃ bhagavate brahmaṇe paramātmane|","na yatra śrūyate māyā lokasṛṣṭivikalpanā|| 6"],"meaning":"आप भक्तोंके भगवान्, वेदान्तियोंके ब्रह्म और योगियोंके परमात्मा हैं। आपके स्वरूपमें विभिन्‍न लोकसृष्टियोंकी कल्पना करनेवाली माया नहीं है—ऐसा श्रुति कहती है। मैं आपको नमस्कार करता हूँ॥ ६॥"},{"id":"10.28.7","number":7,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/28/7/","page":305,"speaker":"वरुण उवाच","sanskrit":["अजानता मामकेन मूढेनाकार्यवेदिना।","आनीतोऽयं तव पिता तद् भवान् क्षन्तुमर्हति॥ ७"],"iast":["ajānatā māmakena mūḍhenākāryavedinā|","ānīto'yaṃ tava pitā tad bhavān kṣantumarhati|| 7"],"meaning":"प्रभो! मेरा यह सेवक बड़ा मूढ़ और अनजान है। वह अपने कर्तव्यको भी नहीं जानता। वही आपके पिताजीको ले आया है, आप कृपा करके उसका अपराध क्षमा कीजिये॥ ७॥"},{"id":"10.28.8","number":8,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/28/8/","page":305,"speaker":"वरुण उवाच","sanskrit":["ममाप्यनुग्रहं कृष्ण कर्तुमर्हस्यशेषदृक्।","गोविन्द नीयतामेष पिता ते पितृवत्सल॥ ८"],"iast":["mamāpyanugrahaṃ kṛṣṇa kartumarhasyaśeṣadṛk|","govinda nīyatāmeṣa pitā te pitṛvatsala|| 8"],"meaning":"गोविन्द! मैं जानता हूँ कि आप अपने पिताके प्रति बड़ा प्रेमभाव रखते हैं। ये आपके पिता हैं। इन्हें आप ले जाइये। परन्तु भगवन्! आप सबके अन्तर्यामी, सबके साक्षी हैं। इसलिये विश्‍वविमोहन श्रीकृष्ण! आप मुझ दासपर भी कृपा कीजिये॥ ८॥"},{"id":"10.28.9","number":9,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/28/9/","page":305,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवं प्रसादितः कृष्णो भगवानीश्‍वरेश्‍वरः।","आदायागात् स्वपितरं बन्धूनां चावहन् मुदम्॥ ९"],"iast":["evaṃ prasāditaḥ kṛṣṇo bhagavānīśvareśvaraḥ|","ādāyāgāt svapitaraṃ bandhūnāṃ cāvahan mudam|| 9"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण ब्रह्मा आदि ईश्‍वरोंके भी ईश्‍वर हैं। लोकपाल वरुणने इस प्रकार उनकी स्तुति करके उन्हें प्रसन्‍न किया। इसके बाद भगवान् अपने पिता नन्दजीको लेकर व्रजमें चले आये और व्रजवासी भाई-बन्धुओंको आनन्दित किया॥ ९॥"},{"id":"10.28.10","number":10,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/28/10/","page":306,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["नन्दस्त्वतीन्द्रियं दृष्ट्वा लोकपालमहोदयम्।","कृष्णे च सन्‍नतिं तेषां ज्ञातिभ्यो विस्मितोऽब्रवीत्॥ १०"],"iast":["nandastvatīndriyaṃ dṛṣṭvā lokapālamahodayam|","kṛṣṇe ca sannatiṃ teṣāṃ jñātibhyo vismito'bravīt|| 10"],"meaning":"नन्दबाबाने वरुणलोकमें लोक-पालके इन्द्रियातीत ऐश्‍वर्य और सुख-सम्पत्तिको देखा तथा यह भी देखा कि वहाँके निवासी उनके पुत्र श्रीकृष्णके चरणोंमें झुक-झुककर प्रणाम कर रहे हैं। उन्हें बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने व्रजमें आकर अपने जाति-भाइयोंको सब बातें कह सुनायीं॥ १०॥"},{"id":"10.28.11","number":11,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/28/11/","page":306,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ते त्वौत्सुक्यधियो राजन् मत्वा गोपास्तमीश्‍वरम्।","अपि नः स्वगतिं सूक्ष्मामुपाधास्यदधीश्‍वरः॥ ११"],"iast":["te tvautsukyadhiyo rājan matvā gopāstamīśvaram|","api naḥ svagatiṃ sūkṣmāmupādhāsyadadhīśvaraḥ|| 11"],"meaning":"परीक्षित्! भगवान्‌के प्रेमी गोप यह सुनकर ऐसा समझने लगे कि अरे, ये तो स्वयं भगवान् हैं। तब उन्होंने मन-ही-मन बड़ी उत्सुकतासे विचार किया कि क्या कभी जगदीश्‍वर भगवान् श्रीकृष्ण हमलोगोंको भी अपना वह मायातीत स्वधाम, जहाँ केवल इनके प्रेमी-भक्त ही जा सकते हैं, दिखलायेंगे॥ ११॥"},{"id":"10.28.12","number":12,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/28/12/","page":306,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इति स्वानां स भगवान् विज्ञायाखिलदृक् स्वयम्।","संकल्पसिद्धये तेषां कृपयैतदचिन्तयत्॥ १२"],"iast":["iti svānāṃ sa bhagavān vijñāyākhiladṛk svayam|","saṃkalpasiddhaye teṣāṃ kṛpayaitadacintayat|| 12"],"meaning":"परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं सर्वदर्शी हैं। भला, उनसे यह बात कैसे छिपी रहती? वे अपने आत्मीय गोपोंकी यह अभिलाषा जान गये और उनका संकल्प सिद्ध करनेके लिये कृपासे भरकर इस प्रकार सोचने लगे॥ १२॥"},{"id":"10.28.13","number":13,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/28/13/","page":306,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["जनो वै लोक एतस्मिन्‍नविद्याकामकर्मभिः।","उच्चावचासु गतिषु न वेद स्वां गतिं भ्रमन्॥ १३"],"iast":["jano vai loka etasminnavidyākāmakarmabhiḥ|","uccāvacāsu gatiṣu na veda svāṃ gatiṃ bhraman|| 13"],"meaning":"‘इस संसारमें जीव अज्ञानवश शरीरमें आत्मबुद्धि करके भाँति-भाँतिकी कामना और उनकी पूर्तिके लिये नाना प्रकारके कर्म करता है। फिर उनके फलस्वरूप देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि ऊँची-नीची योनियोंमें भटकता फिरता है, अपनी असली गतिको—आत्मस्वरूपको नहीं पहचान पाता॥ १३॥"},{"id":"10.28.14","number":14,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/28/14/","page":306,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इति संचिन्त्य भगवान् महाकारुणिको हरिः।","दर्शयामास लोकं स्वं गोपानां तमसः परम्॥ १४"],"iast":["iti saṃcintya bhagavān mahākāruṇiko hariḥ|","darśayāmāsa lokaṃ svaṃ gopānāṃ tamasaḥ param|| 14"],"meaning":"परमदयालु भगवान् श्रीकृष्णने इस प्रकार सोचकर उन गोपोंको मायान्धकारसे अतीत अपना परमधाम दिखलाया॥ १४॥"},{"id":"10.28.15","number":15,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/28/15/","page":306,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सत्यं ज्ञानमनन्तं यद् ब्रह्म ज्योतिः सनातनम्।","यद्धि पश्यन्ति मुनयो गुणापाये समाहिताः॥ १५"],"iast":["satyaṃ jñānamanantaṃ yad brahma jyotiḥ sanātanam|","yaddhi paśyanti munayo guṇāpāye samāhitāḥ|| 15"],"meaning":"भगवान्‌ने पहले उनको उस ब्रह्मका साक्षात्कार करवाया जिसका स्वरूप सत्य, ज्ञान, अनन्त, सनातन और ज्योतिःस्वरूप है तथा समाधिनिष्ठ गुणातीत पुरुष ही जिसे देख पाते हैं॥ १५॥"},{"id":"10.28.16","number":16,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/28/16/","page":306,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ते तु ब्रह्मह्रदं नीता म‌ग्‍नाः कृष्णेन चोद‍्धृताः।","ददृशुर्ब्रह्मणो लोकं यत्राक्रूरोऽध्यगात् पुरा॥ १६"],"iast":["te tu brahmahradaṃ nītā magnāḥ kṛṣṇena coddhṛtāḥ|","dadṛśurbrahmaṇo lokaṃ yatrākrūro'dhyagāt purā|| 16"],"meaning":"जिस जलाशयमें अक्रूरको भगवान्‌ने अपना स्वरूप दिखलाया था, उसी ब्रह्मस्वरूप ब्रह्मह्रदमें भगवान् उन गोपोंको ले गये। वहाँ उन लोगोंने उसमें डुबकी लगायी। वे ब्रह्मह्रदमें प्रवेश कर गये। तब भगवान्‌ने उसमेंसे उनको निकालकर अपने परमधामका दर्शन कराया॥ १६॥"},{"id":"10.28.17","number":17,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/28/17/","page":307,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["नन्दादयस्तु तं दृष्ट्वा परमानन्दनिर्वृताः।","कृष्णं च तत्रच्छन्दोभिः स्तूयमानं सुविस्मिताः॥ १७"],"iast":["nandādayastu taṃ dṛṣṭvā paramānandanirvṛtāḥ|","kṛṣṇaṃ ca tatracchandobhiḥ stūyamānaṃ suvismitāḥ|| 17"],"meaning":"उस दिव्य भगवत्स्वरूप लोकको देखकर नन्द आदि गोप परमानन्दमें म‌ग्‍न हो गये। वहाँ उन्होंने देखा कि सारे वेद मूर्तिमान् होकर भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति कर रहे हैं। यह देखकर वे सब-के-सब परम विस्मित हो गये॥ १७॥"}],"text":[{"b":30336,"kind":"adhyaya_heading","page":304,"text":"अथाष्टाविंशोऽध्यायः"},{"b":30337,"kind":"topic_heading","page":304,"text":"वरुणलोकसे नन्दजीको छुड़ाकर लाना"},{"b":30338,"kind":"topic_heading","page":303,"text":"श्रीशुक 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आये और व्रजवासी भाई-बन्धुओंको आनन्दित किया॥ ९॥ नन्दबाबाने वरुणलोकमें लोक-पालके इन्द्रियातीत ऐश्‍वर्य और सुख-सम्पत्तिको देखा तथा यह भी देखा कि वहाँके निवासी उनके पुत्र श्रीकृष्णके चरणोंमें झुक-झुककर प्रणाम कर रहे हैं। उन्हें बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने व्रजमें आकर अपने जाति-भाइयोंको सब बातें कह सुनायीं॥ १०॥"},{"b":30365,"kind":"sanskrit_shloka","page":306,"verses":["10.28.11"],"text":"ते त्वौत्सुक्यधियो राजन् मत्वा गोपास्तमीश्‍वरम्।"},{"b":30366,"kind":"sanskrit_shloka","page":306,"verses":["10.28.11"],"text":"अपि नः स्वगतिं सूक्ष्मामुपाधास्यदधीश्‍वरः॥ ११"},{"b":30367,"kind":"hindi_translation","page":306,"explains":["10.28.11"],"text":"परीक्षित्! भगवान्‌के प्रेमी गोप यह सुनकर ऐसा समझने लगे कि अरे, ये तो स्वयं भगवान् हैं। तब उन्होंने मन-ही-मन बड़ी उत्सुकतासे विचार किया कि क्या कभी जगदीश्‍वर भगवान् श्रीकृष्ण हमलोगोंको भी अपना वह मायातीत स्वधाम, जहाँ केवल इनके प्रेमी-भक्त ही जा सकते हैं, दिखलायेंगे॥ ११॥"},{"b":30368,"kind":"sanskrit_shloka","page":306,"verses":["10.28.12"],"text":"इति स्वानां स भगवान् विज्ञायाखिलदृक् स्वयम्।"},{"b":30369,"kind":"sanskrit_shloka","page":306,"verses":["10.28.12"],"text":"संकल्पसिद्धये तेषां कृपयैतदचिन्तयत्॥ १२"},{"b":30370,"kind":"sanskrit_shloka","page":306,"verses":["10.28.13"],"text":"जनो वै लोक एतस्मिन्‍नविद्याकामकर्मभिः।"},{"b":30371,"kind":"sanskrit_shloka","page":306,"verses":["10.28.13"],"text":"उच्चावचासु गतिषु न वेद स्वां गतिं भ्रमन्॥ १३"},{"b":30372,"kind":"hindi_commentary","page":306,"explains":["10.28.12","10.28.13"],"text":"परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं सर्वदर्शी हैं। भला, उनसे यह बात कैसे छिपी रहती? वे अपने आत्मीय गोपोंकी यह अभिलाषा जान गये और उनका संकल्प सिद्ध करनेके लिये कृपासे भरकर इस प्रकार सोचने लगे॥ १२॥ ‘इस संसारमें जीव अज्ञानवश शरीरमें आत्मबुद्धि करके भाँति-भाँतिकी कामना और उनकी पूर्तिके लिये नाना प्रकारके कर्म करता है। फिर उनके फलस्वरूप देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि ऊँची-नीची योनियोंमें भटकता फिरता है, अपनी असली गतिको—आत्मस्वरूपको नहीं पहचान पाता॥ १३॥"},{"b":30373,"kind":"sanskrit_shloka","page":306,"verses":["10.28.14"],"text":"इति संचिन्त्य भगवान् महाकारुणिको हरिः।"},{"b":30374,"kind":"sanskrit_shloka","page":306,"verses":["10.28.14"],"text":"दर्शयामास लोकं स्वं गोपानां तमसः परम्॥ १४"},{"b":30375,"kind":"hindi_translation","page":306,"explains":["10.28.14"],"text":"परमदयालु भगवान् श्रीकृष्णने इस प्रकार सोचकर उन गोपोंको मायान्धकारसे अतीत अपना परमधाम दिखलाया॥ १४॥"},{"b":30376,"kind":"sanskrit_shloka","page":306,"verses":["10.28.15"],"text":"सत्यं ज्ञानमनन्तं यद् ब्रह्म ज्योतिः सनातनम्।"},{"b":30377,"kind":"sanskrit_shloka","page":306,"verses":["10.28.15"],"text":"यद्धि पश्यन्ति मुनयो गुणापाये समाहिताः॥ १५"},{"b":30378,"kind":"hindi_commentary","page":306,"explains":["10.28.15"],"text":"भगवान्‌ने पहले उनको उस ब्रह्मका साक्षात्कार करवाया जिसका स्वरूप सत्य, ज्ञान, अनन्त, सनातन और ज्योतिःस्वरूप है तथा समाधिनिष्ठ गुणातीत पुरुष ही जिसे देख पाते हैं॥ १५॥"},{"b":30379,"kind":"sanskrit_shloka","page":306,"verses":["10.28.16"],"text":"ते तु ब्रह्मह्रदं नीता म‌ग्‍नाः कृष्णेन चोद‍्धृताः।"},{"b":30380,"kind":"sanskrit_shloka","page":306,"verses":["10.28.16"],"text":"ददृशुर्ब्रह्मणो लोकं यत्राक्रूरोऽध्यगात् पुरा॥ १६"},{"b":30381,"kind":"hindi_translation","page":306,"explains":["10.28.16"],"text":"जिस जलाशयमें अक्रूरको भगवान्‌ने अपना स्वरूप दिखलाया था, उसी ब्रह्मस्वरूप ब्रह्मह्रदमें भगवान् उन गोपोंको ले गये। वहाँ उन लोगोंने उसमें डुबकी लगायी। वे ब्रह्मह्रदमें प्रवेश कर गये। तब भगवान्‌ने उसमेंसे उनको निकालकर अपने परमधामका दर्शन कराया॥ १६॥"},{"b":30382,"kind":"sanskrit_shloka","page":307,"verses":["10.28.17"],"text":"नन्दादयस्तु तं दृष्ट्वा परमानन्दनिर्वृताः।"},{"b":30383,"kind":"sanskrit_shloka","page":307,"verses":["10.28.17"],"text":"कृष्णं च तत्रच्छन्दोभिः स्तूयमानं सुविस्मिताः॥ १७"},{"b":30384,"kind":"hindi_translation","page":307,"explains":["10.28.17"],"text":"उस दिव्य भगवत्स्वरूप लोकको देखकर नन्द आदि गोप परमानन्दमें म‌ग्‍न हो गये। वहाँ उन्होंने देखा कि सारे वेद मूर्तिमान् होकर भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति कर रहे हैं। यह देखकर वे सब-के-सब परम विस्मित हो गये॥ १७॥"},{"b":30385,"kind":"hindi_commentary","page":307,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे"},{"b":30386,"kind":"hindi_translation","page":307,"text":"पूर्वार्धेऽष्टाविंशोऽध्यायः॥ २८॥"}],"notes":[],"corrections":{"count":4,"list":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/shuddhi/"}}