{"id":"10.39","title":"दशम स्कन्ध · अध्याय 39","part":"दशम स्कन्ध (पूर्वार्ध)","heading":"अथैकोनचत्वारिंशोऽध्यायः","topics":["श्रीकृष्ण-बलरामका मथुरागमन"],"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 10.39.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[373,381]},"verses":[{"id":"10.39.1","number":1,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/1/","page":373,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सुखोपविष्टः पर्यंके रामकृष्णोरुमानितः।","लेभे मनोरथान् सर्वान् पथि यान् स चकार ह॥ १"],"iast":["sukhopaviṣṭaḥ paryaṃke rāmakṛṣṇorumānitaḥ|","lebhe manorathān sarvān pathi yān sa cakāra ha|| 1"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीने अक्रूरजीका भलीभाँति सम्मान किया। वे आरामसे पलँगपर बैठ गये। उन्होंने मार्गमें जो-जो अभिलाषाएँ की थीं, वे सब पूरी हो गयीं॥ १॥"},{"id":"10.39.2","number":2,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/2/","page":373,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["किमलभ्यं भगवति प्रसन्‍ने श्रीनिकेतने।","तथापि तत्परा राजन्‍न हि वाञ्छन्ति किंचन॥ २"],"iast":["kimalabhyaṃ bhagavati prasanne śrīniketane|","tathāpi tatparā rājanna hi vāñchanti kiṃcana|| 2"],"meaning":"परीक्षित्! लक्ष्मीके आश्रयस्थान भगवान् श्रीकृष्णके प्रसन्‍न होनेपर ऐसी कौन-सी वस्तु है, जो प्राप्त नहीं हो सकती? फिर भी भगवान्‌के परमप्रेमी भक्तजन किसी भी वस्तुकी कामना नहीं करते॥ २॥"},{"id":"10.39.3","number":3,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/3/","page":373,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सायंतनाशनं कृत्वा भगवान् देवकीसुतः।","सुहृत्सु वृत्तं कंसस्य पप्रच्छान्यच्चिकीर्षितम्॥ ३"],"iast":["sāyaṃtanāśanaṃ kṛtvā bhagavān devakīsutaḥ|","suhṛtsu vṛttaṃ kaṃsasya papracchānyaccikīrṣitam|| 3"],"meaning":"देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने सायंकालका भोजन करनेके बाद अक्रूरजीके पास जाकर अपने स्वजन-सम्बन्धियोंके साथ कंसके व्यवहार और उसके अगले कार्यक्रमके सम्बन्धमें पूछा॥ ३॥"},{"id":"10.39.4","number":4,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/4/","page":373,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["तात सौम्यागतः कच्चित् स्वागतं भद्रमस्तु वः।","अपि स्वज्ञातिबन्धूनामनमीवमनामयम्॥ ४"],"iast":["tāta saumyāgataḥ kaccit svāgataṃ bhadramastu vaḥ|","api svajñātibandhūnāmanamīvamanāmayam|| 4"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्णने कहा—चाचाजी! आपका हृदय बड़ा शुद्ध है। आपको यात्रामें कोई कष्ट तो नहीं हुआ? स्वागत है। मैं आपकी मंगलकामना करता हूँ। मथुराके हमारे आत्मीय सुहृद्, कुटुम्बी तथा अन्य सम्बन्धी सब सकुशल और स्वस्थ हैं न?॥ ४॥"},{"id":"10.39.5","number":5,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/5/","page":373,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["किं नु नः कुशलं पृच्छे एधमाने कुलामये।","कंसे मातुलनाम्‍न्यङ्ग स्वानां नस्तत्प्रजासु च॥ ५"],"iast":["kiṃ nu naḥ kuśalaṃ pṛcche edhamāne kulāmaye|","kaṃse mātulanāmnyaṅga svānāṃ nastatprajāsu ca|| 5"],"meaning":"हमारा नाममात्रका मामा कंस तो हमारे कुलके लिये एक भयंकर व्याधि है। जबतक उसकी बढ़ती हो रही है, तबतक हम अपने वंशवालों और उनके बाल-बच्चोंका कुशल-मंगल क्या पूछें॥ ५॥"},{"id":"10.39.6","number":6,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/6/","page":374,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["अहो अस्मदभूद् भूरि पित्रोर्वृजिनमार्ययोः।","यद्धेतोः पुत्रमरणं यद्धेतोर्बन्धनं तयोः॥ ६"],"iast":["aho asmadabhūd bhūri pitrorvṛjinamāryayoḥ|","yaddhetoḥ putramaraṇaṃ yaddhetorbandhanaṃ tayoḥ|| 6"],"meaning":"चाचाजी! हमारे लिये यह बड़े खेदकी बात है कि मेरे ही कारण मेरे निरपराध और सदाचारी माता-पिताको अनेकों प्रकारकी यातनाएँ झेलनी पड़ीं—तरह-तरहके कष्ट उठाने पड़े। और तो क्या कहूँ, मेरे ही कारण उन्हें हथकड़ी-बेड़ीसे जकड़कर जेलमें डाल दिया गया तथा मेरे ही कारण उनके बच्चे भी मार डाले गये॥ ६॥"},{"id":"10.39.7","number":7,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/7/","page":374,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["दिष्ट्याद्य दर्शनं स्वानां मह्यं वः सौम्य कांक्षितम्।","संजातं वर्ण्यतां तात तवागमनकारणम्॥ ७"],"iast":["diṣṭyādya darśanaṃ svānāṃ mahyaṃ vaḥ saumya kāṃkṣitam|","saṃjātaṃ varṇyatāṃ tāta tavāgamanakāraṇam|| 7"],"meaning":"मैं बहुत दिनोंसे चाहता था कि आप-लोगोंमेंसे किसी-न-किसीका दर्शन हो। यह बड़े सौभाग्यकी बात है कि आज मेरी वह अभिलाषा पूरी हो गयी। सौम्यस्वभाव चाचाजी! अब आप कृपा करके यह बतलाइये कि आपका शुभागमन किस निमित्तसे हुआ?॥ ७॥"},{"id":"10.39.8","number":8,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/8/","page":374,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["पृष्टो भगवता सर्वं वर्णयामास माधवः।","वैरानुबन्धं यदुषु वसुदेववधोद्यमम्॥ ८"],"iast":["pṛṣṭo bhagavatā sarvaṃ varṇayāmāsa mādhavaḥ|","vairānubandhaṃ yaduṣu vasudevavadhodyamam|| 8"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब भगवान् श्रीकृष्णने अक्रूरजीसे इस प्रकार प्रश्‍न किया, तब उन्होंने बतलाया कि ‘कंसने तो सभी यदुवंशियोंसे घोर वैर ठान रखा है। वह वसुदेवजीको मार डालनेका भी उद्यम कर चुका है’॥ ८॥"},{"id":"10.39.9","number":9,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/9/","page":374,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यत्संदेशो यदर्थं वा दूतः संप्रेषितः स्वयम्।","यदुक्तं नारदेनास्य स्वजन्मानकदुन्दुभेः॥ ९"],"iast":["yatsaṃdeśo yadarthaṃ vā dūtaḥ saṃpreṣitaḥ svayam|","yaduktaṃ nāradenāsya svajanmānakadundubheḥ|| 9"],"meaning":"अक्रूरजीने कंसका सन्देश और जिस उद्देश्यसे उसने स्वयं अक्रूरजीको दूत बनाकर भेजा था और नारदजीने जिस प्रकार वसुदेवजीके घर श्रीकृष्णके जन्म लेनेका वृत्तान्त उसको बता दिया था, सो सब कह सुनाया॥ ९॥"},{"id":"10.39.10","number":10,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/10/","page":374,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["श्रुत्वाक्रूरवचः कृष्णो बलश्‍च परवीरहा।","प्रहस्य नन्दं पितरं राज्ञाऽऽदिष्टं विजज्ञतुः॥ १०"],"iast":["śrutvākrūravacaḥ kṛṣṇo balaśca paravīrahā|","prahasya nandaṃ pitaraṃ rājñā''diṣṭaṃ vijajñatuḥ|| 10"],"meaning":"अक्रूरजीकी यह बात सुनकर विपक्षी शत्रुओंका दमन करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी हँसने लगे और इसके बाद उन्होंने अपने पिता नन्दजीको कंसकी आज्ञा सुना दी॥ १०॥"},{"id":"10.39.11","number":11,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/11/","page":374,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["गोपान् समादिशत् सोऽपि गृह्यतां सर्वगोरसः।","उपायनानि गृह्णीध्वं युज्यन्तां शकटानि च॥ ११"],"iast":["gopān samādiśat so'pi gṛhyatāṃ sarvagorasaḥ|","upāyanāni gṛhṇīdhvaṃ yujyantāṃ śakaṭāni ca|| 11"],"meaning":"तब नन्दबाबाने सब गोपोंको आज्ञा दी कि ‘सारा गोरस एकत्र करो। भेंटकी सामग्री ले लो और छकड़े जोड़ो॥ ११॥"},{"id":"10.39.12","number":12,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/12/","page":374,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यास्यामः श्‍वो मधुपुरीं दास्यामो नृपते रसान्।","द्रक्ष्यामः सुमहत् पर्व यान्ति जानपदाः किल।","एवमाघोषयत् क्षत्त्रा नन्दगोपः स्वगोकुले॥ १२"],"iast":["yāsyāmaḥ śvo madhupurīṃ dāsyāmo nṛpate rasān|","drakṣyāmaḥ sumahat parva yānti jānapadāḥ kila|","evamāghoṣayat kṣattrā nandagopaḥ svagokule|| 12"],"meaning":"कल प्रातःकाल ही हम सब मथुराकी यात्रा करेंगे और वहाँ चलकर राजा कंसको गोरस देंगे। वहाँ एक बहुत बड़ा उत्सव हो रहा है। उसे देखनेके लिये देशकी सारी प्रजा इकट्ठी हो रही है। हमलोग भी उसे देखेंगे।’ नन्दबाबाने गाँवके कोतवालके द्वारा यह घोषणा सारे व्रजमें करवा दी॥ १२॥"},{"id":"10.39.13","number":13,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/13/","page":374,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["गोप्यस्तास्तदुपश्रुत्य बभूवुर्व्यथिता भृशम्।","रामकृष्णौ पुरीं नेतुमक्रूरं व्रजमागतम्॥ १३"],"iast":["gopyastāstadupaśrutya babhūvurvyathitā bhṛśam|","rāmakṛṣṇau purīṃ netumakrūraṃ vrajamāgatam|| 13"],"meaning":"परीक्षित्! जब गोपियोंने सुना कि हमारे मनमोहन श्यामसुन्दर और गौरसुन्दर बलरामजीको मथुरा ले जानेके लिये अक्रूरजी व्रजमें आये हैं तब उनके हृदयमें बड़ी व्यथा हुई। वे व्याकुल हो गयीं॥ १३॥"},{"id":"10.39.14","number":14,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/14/","page":375,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["काश्‍चित्तत्कृतहृत्तापश्‍वासम्लानमुखश्रियः।","स्रंसद्दुकूलवलयकेशग्रन्थ्यश्‍च काश्‍चन॥ १४"],"iast":["kāścittatkṛtahṛttāpaśvāsamlānamukhaśriyaḥ|","sraṃsaddukūlavalayakeśagranthyaśca kāścana|| 14"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्णके मथुरा जानेकी बात सुनते ही बहुतोंके हृदयमें ऐसी जलन हुई कि गरम साँस चलने लगी, मुखकमल कुम्हला गया। और बहुतोंकी ऐसी दशा हुई—वे इस प्रकार अचेत हो गयीं कि उन्हें खिसकी हुई ओढ़नी, गिरते हुए कंगन और ढीले हुए जूड़ोंतकका पता न रहा॥ १४॥"},{"id":"10.39.15","number":15,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/15/","page":375,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अन्याश्‍च तदनुध्याननिवृत्ताशेषवृत्तयः।","नाभ्यजानन्‍निमं लोकमात्मलोकं गता इव॥ १५"],"iast":["anyāśca tadanudhyānanivṛttāśeṣavṛttayaḥ|","nābhyajānannimaṃ lokamātmalokaṃ gatā iva|| 15"],"meaning":"भगवान्‌के स्वरूपका ध्यान आते ही बहुत-सी गोपियोंकी चित्तवृत्तियाँ सर्वथा निवृत्त हो गयीं, मानो वे समाधिस्थ—आत्मामें स्थित हो गयी हों, और उन्हें अपने शरीर और संसारका कुछ ध्यान ही न रहा॥ १५॥"},{"id":"10.39.16","number":16,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/16/","page":375,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स्मरन्त्यश्‍चापराः शौरेरनुरागस्मितेरिताः।","हृदिस्पृशश्‍चित्रपदा गिरः संमुमुहुः स्त्रियः॥ १६"],"iast":["smarantyaścāparāḥ śaureranurāgasmiteritāḥ|","hṛdispṛśaścitrapadā giraḥ saṃmumuhuḥ striyaḥ|| 16"],"meaning":"बहुत-सी गोपियोंके सामने भगवान् श्रीकृष्णका प्रेम, उनकी मन्द-मन्द मुसकान और हृदयको स्पर्श करनेवाली विचित्र पदोंसे युक्त मधुर वाणी नाचने लगी। वे उसमें तल्लीन हो गयीं। मोहित हो गयीं॥ १६॥"},{"id":"10.39.17","number":17,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/17/","page":375,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["गतिं सुललितां चेष्टां स्निग्धहासावलोकनम्।","शोकापहानि नर्माणि प्रोद्दामचरितानि च॥ १७"],"iast":["gatiṃ sulalitāṃ ceṣṭāṃ snigdhahāsāvalokanam|","śokāpahāni narmāṇi proddāmacaritāni ca|| 17"],"meaning":"गोपियाँ मन-ही-मन भगवान्‌की लटकीली चाल, भाव-भंगी, प्रेमभरी मुसकान, चितवन, सारे शोकोंको मिटा देनेवाली ठिठोलियाँ तथा उदारता-भरी लीलाओंका चिन्तन करने लगीं और उनके विरहके भयसे कातर हो गयीं। उनका हृदय, उनका जीवन—सब कुछ भगवान्‌के प्रति समर्पित था। उनकी आँखोंसे आँसू बह रहे थे। वे झुंड-की-झुंड इकट्ठी होकर इस प्रकार कहने लगीं॥ १७-१८॥","meaning_covers":[17,18]},{"id":"10.39.18","number":18,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/18/","page":375,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["चिन्तयन्त्यो मुकुन्दस्य भीता विरहकातराः।","समेताः संघशः प्रोचुरश्रुमुख्योऽच्युताशयाः॥ १८"],"iast":["cintayantyo mukundasya bhītā virahakātarāḥ|","sametāḥ saṃghaśaḥ procuraśrumukhyo'cyutāśayāḥ|| 18"],"meaning":"गोपियाँ मन-ही-मन भगवान्‌की लटकीली चाल, भाव-भंगी, प्रेमभरी मुसकान, चितवन, सारे शोकोंको मिटा देनेवाली ठिठोलियाँ तथा उदारता-भरी लीलाओंका चिन्तन करने लगीं और उनके विरहके भयसे कातर हो गयीं। उनका हृदय, उनका जीवन—सब कुछ भगवान्‌के प्रति समर्पित था। उनकी आँखोंसे आँसू बह रहे थे। वे झुंड-की-झुंड इकट्ठी होकर इस प्रकार कहने लगीं॥ १७-१८॥","meaning_covers":[17,18]},{"id":"10.39.19","number":19,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/19/","page":375,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["अहो विधातस्तव न क्वचिद् दया","संयोज्य मैत्र्या प्रणयेन देहिनः।","तांश्‍चाकृतार्थान् वियुनङ्क्ष्यपार्थकं","विक्रीडितं तेऽर्भकचेष्टितं यथा॥ १९"],"iast":["aho vidhātastava na kvacid dayā","saṃyojya maitryā praṇayena dehinaḥ|","tāṃścākṛtārthān viyunaṅkṣyapārthakaṃ","vikrīḍitaṃ te'rbhakaceṣṭitaṃ yathā|| 19"],"meaning":"गोपियोंने कहा—धन्य हो विधाता! तुम सब कुछ विधान तो करते हो, परन्तु तुम्हारे हृदयमें दयाका लेश भी नहीं है। पहले तो तुम सौहार्द और प्रेमसे जगत‍्के प्राणियोंको एक-दूसरेके साथ जोड़ देते हो, उन्हें आपसमें एक कर देते हो; मिला देते हो परन्तु अभी उनकी आशा-अभिलाषाएँ पूरी भी नहीं हो पातीं, वे तृप्त भी नहीं हो पाते कि तुम उन्हें व्यर्थ ही अलग-अलग कर देते हो! सच है, तुम्हारा यह खिलवाड़ बच्चोंके खेलकी तरह व्यर्थ ही है॥ १९॥"},{"id":"10.39.20","number":20,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/20/","page":375,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["यस्त्वं प्रदर्श्यासितकुन्तलावृतं","मुकुन्दवक्त्रं सुकपोलमुन्‍नसम्।","शोकापनोदस्मितलेशसुन्दरं","करोषि पारोक्ष्यमसाधु ते कृतम्॥ २०"],"iast":["yastvaṃ pradarśyāsitakuntalāvṛtaṃ","mukundavaktraṃ sukapolamunnasam|","śokāpanodasmitaleśasundaraṃ","karoṣi pārokṣyamasādhu te kṛtam|| 20"],"meaning":"यह कितने दुःखकी बात है! विधाता! तुमने पहले हमें प्रेमका वितरण करनेवाले श्यामसुन्दरका मुखकमल दिखलाया। कितना सुन्दर है वह! काले-काले घुँघराले बाल कपोलोंपर झलक रहे हैं। मरकतमणि-से चिकने सुस्निग्ध कपोल और तोतेकी चोंच-सी सुन्दर नासिका तथा अधरोंपर मन्द-मन्द मुसकानकी सुन्दर रेखा, जो सारे शोकोंको तत्क्षण भगा देती है। विधाता! तुमने एक बार तो हमें वह परम सुन्दर मुखकमल दिखाया और अब उसे ही हमारी आँखोंसे ओझल कर रहे हो! सचमुच तुम्हारी यह करतूत बहुत ही अनुचित है॥ २०॥"},{"id":"10.39.21","number":21,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/21/","page":376,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["क्रूरस्त्वमक्रूरसमाख्यया स्म न-","श्‍चक्षुर्हि दत्तं हरसे बताज्ञवत्।","येनैकदेशेऽखिलसर्गसौष्ठवं","त्वदीयमद्राक्ष्म वयं मधुद्विषः॥ २१"],"iast":["krūrastvamakrūrasamākhyayā sma na-","ścakṣurhi dattaṃ harase batājñavat|","yenaikadeśe'khilasargasauṣṭhavaṃ","tvadīyamadrākṣma vayaṃ madhudviṣaḥ|| 21"],"meaning":"हम जानती हैं, इसमें अक्रूरका दोष नहीं है; यह तो साफ तुम्हारी क्रूरता है। वास्तवमें तुम्हीं अक्रूरके नामसे यहाँ आये हो और अपनी ही दी हुई आँखें तुम हमसे मूर्खकी भाँति छीन रहे हो। इनके द्वारा हम श्यामसुन्दरके एक-एक अंगमें तुम्हारी सृष्टिका सम्पूर्ण सौन्दर्य निहारती रहती थीं। विधाता! तुम्हें ऐसा नहीं चाहिये॥ २१॥"},{"id":"10.39.22","number":22,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/22/","page":376,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["न नन्दसूनुः क्षणभंगसौहृदः","समीक्षते नः स्वकृतातुरा बत।","विहाय गेहान् स्वजनान् सुतान् पतीं-","स्तद्दास्यमद्धोपगता नवप्रियः॥ २२"],"iast":["na nandasūnuḥ kṣaṇabhaṃgasauhṛdaḥ","samīkṣate naḥ svakṛtāturā bata|","vihāya gehān svajanān sutān patīṃ-","staddāsyamaddhopagatā navapriyaḥ|| 22"],"meaning":"अहो! नन्दनन्दन श्यामसुन्दरको भी नये-नये लोगोंसे नेह लगानेकी चाट पड़ गयी है। देखो तो सही—इनका सौहार्द, इनका प्रेम एक क्षणमें ही कहाँ चला गया? हम तो अपने घर-द्वार, स्वजन-सम्बन्धी, पति-पुत्र आदिको छोड़कर इनकी दासी बनीं और इन्हींके लिये आज हमारा हृदय शोकातुर हो रहा है, परन्तु ये ऐसे हैं कि हमारी ओर देखतेतक नहीं॥ २२॥"},{"id":"10.39.23","number":23,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/23/","page":376,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["सुखं प्रभाता रजनीयमाशिषः","सत्या बभूवुः पुरयोषितां ध्रुवम्।","याः संप्रविष्टस्य मुखं व्रजस्पतेः","पास्यन्त्यपांगोत्कलितस्मितासवम्॥ २३"],"iast":["sukhaṃ prabhātā rajanīyamāśiṣaḥ","satyā babhūvuḥ purayoṣitāṃ dhruvam|","yāḥ saṃpraviṣṭasya mukhaṃ vrajaspateḥ","pāsyantyapāṃgotkalitasmitāsavam|| 23"],"meaning":"आजकी रातका प्रातःकाल मथुराकी स्त्रियोंके लिये निश्‍चय ही बड़ा मंगलमय होगा। आज उनकी बहुत दिनोंकी अभिलाषाएँ अवश्य ही पूरी हो जायँगी। जब हमारे व्रजराज श्यामसुन्दर अपनी तिरछी चितवन और मन्द-मन्द मुसकानसे युक्त मुखारविन्दका मादक मधु वितरण करते हुए मथुरापुरीमें प्रवेश करेंगे, तब वे उसका पान करके धन्य-धन्य हो जायँगी॥ २३॥"},{"id":"10.39.24","number":24,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/24/","page":376,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["तासां मुकुन्दो मधुमंजुभाषितै-","र्गृहीतचित्तः परवान् मनस्व्यपि।","कथं पुनर्नः प्रतियास्यतेऽबला","ग्राम्याः सलज्जस्मितविभ्रमैर्भ्रमन्॥ २४"],"iast":["tāsāṃ mukundo madhumaṃjubhāṣitai-","rgṛhītacittaḥ paravān manasvyapi|","kathaṃ punarnaḥ pratiyāsyate'balā","grāmyāḥ salajjasmitavibhramairbhraman|| 24"],"meaning":"यद्यपि हमारे श्यामसुन्दर धैर्यवान् होनेके साथ ही नन्दबाबा आदि गुरुजनोंकी आज्ञामें रहते हैं, तथापि मथुराकी युवतियाँ अपने मधुके समान मधुर वचनोंसे इनका चित्त बरबस अपनी ओर खींच लेंगी और ये उनकी सलज्ज मुसकान तथा विलासपूर्ण भाव-भंगीसे वहीं रम जायँगे। फिर हम गँवार ग्वालिनोंके पास ये लौटकर क्यों आने लगे॥ २४॥"},{"id":"10.39.25","number":25,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/25/","page":376,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["अद्य ध्रुवं तत्र दृशो भविष्यते","दाशार्हभोजान्धकवृष्णिसात्वताम्।","महोत्सवः श्रीरमणं गुणास्पदं","द्रक्ष्यन्ति ये चाध्वनि देवकीसुतम्॥ २५"],"iast":["adya dhruvaṃ tatra dṛśo bhaviṣyate","dāśārhabhojāndhakavṛṣṇisātvatām|","mahotsavaḥ śrīramaṇaṃ guṇāspadaṃ","drakṣyanti ye cādhvani devakīsutam|| 25"],"meaning":"धन्य है आज हमारे श्यामसुन्दरका दर्शन करके मथुराके दाशार्ह, भोज, अन्धक और वृष्णिवंशी यादवोंके नेत्र अवश्य ही परमानन्दका साक्षात्कार करेंगे। आज उनके यहाँ महान् उत्सव होगा। साथ ही जो लोग यहाँसे मथुरा जाते हुए रमारमण गुणसागर नटनागर देवकीनन्दन श्यामसुन्दरका मार्गमें दर्शन करेंगे, वे भी निहाल हो जायँगे॥ २५॥"},{"id":"10.39.26","number":26,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/26/","page":377,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["मैतद्विधस्याकरुणस्य नाम भू-","दक्रूर इत्येतदतीव दारुणः।","योऽसावनाश्‍वास्य सुदुःखितं जनं","प्रियात्प्रियं नेष्यति पारमध्वनः॥ २६"],"iast":["maitadvidhasyākaruṇasya nāma bhū-","dakrūra ityetadatīva dāruṇaḥ|","yo'sāvanāśvāsya suduḥkhitaṃ janaṃ","priyātpriyaṃ neṣyati pāramadhvanaḥ|| 26"],"meaning":"देखो सखी! यह अक्रूर कितना निठुर, कितना हृदयहीन है। इधर तो हम गोपियाँ इतनी दुःखित हो रही हैं और यह हमारे परम प्रियतम नन्ददुलारे श्यामसुन्दरको हमारी आँखोंसे ओझल करके बहुत दूर ले जाना चाहता है और दो बात कहकर हमें धीरज भी नहीं बँधाता, आश्‍वासन भी नहीं देता। सचमुच ऐसे अत्यन्त क्रूर पुरुषका ‘अक्रूर’ नाम नहीं होना चाहिये था॥ २६॥"},{"id":"10.39.27","number":27,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/27/","page":377,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["अनार्द्रधीरेष समास्थितो रथं","तमन्वमी च त्वरयन्ति दुर्मदाः।","गोपा अनोभिः स्थविरैरुपेक्षितं","दैवं च नोऽद्य प्रतिकूलमीहते॥ २७"],"iast":["anārdradhīreṣa samāsthito rathaṃ","tamanvamī ca tvarayanti durmadāḥ|","gopā anobhiḥ sthavirairupekṣitaṃ","daivaṃ ca no'dya pratikūlamīhate|| 27"],"meaning":"सखी! हमारे ये श्यामसुन्दर भी तो कम निठुर नहीं हैं। देखो-देखो, वे भी रथपर बैठ गये। और मतवाले गोपगण छकड़ोंद्वारा उनके साथ जानेके लिये कितनी जल्दी मचा रहे हैं। सचमुच ये मूर्ख हैं। और हमारे बड़े-बूढ़े! उन्होंने तो इन लोगोंकी जल्दबाजी देखकर उपेक्षा कर दी है कि ‘जाओ जो मनमें आवे, करो!’ अब हम क्या करें? आज विधाता सर्वथा हमारे प्रतिकूल चेष्टा कर रहा है॥ २७॥"},{"id":"10.39.28","number":28,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/28/","page":377,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["निवारयामः समुपेत्य माधवं","किं नोऽकरिष्यन् कुलवृद्धबान्धवाः।","मुकुन्दसंगान्‍निमिषार्धदुस्त्यजाद्","दैवेन विध्वंसितदीनचेतसाम्॥ २८"],"iast":["nivārayāmaḥ samupetya mādhavaṃ","kiṃ no'kariṣyan kulavṛddhabāndhavāḥ|","mukundasaṃgānnimiṣārdhadustyajād","daivena vidhvaṃsitadīnacetasām|| 28"],"meaning":"चलो, हम स्वयं ही चलकर अपने प्राणप्यारे श्यामसुन्दरको रोकेंगी; कुलके बड़े-बूढ़े और बन्धुजन हमारा क्या कर लेंगे? अरी सखी! हम आधे क्षणके लिये भी प्राणवल्लभ नन्दनन्दनका संग छोड़नेमें असमर्थ थीं। आज हमारे दुर्भाग्यने हमारे सामने उनका वियोग उपस्थित करके हमारे चित्तको विनष्ट एवं व्याकुल कर दिया है॥ २८॥"},{"id":"10.39.29","number":29,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/29/","page":377,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["यस्यानुरागललितस्मितवल्गुमन्त्र-","लीलावलोकपरिरम्भणरासगोष्ठ्याम्।","नीताः स्म नः क्षणमिव क्षणदा विना तं","गोप्यः कथं न्वतितरेम तमो दुरन्तम्॥ २९"],"iast":["yasyānurāgalalitasmitavalgumantra-","līlāvalokaparirambhaṇarāsagoṣṭhyām|","nītāḥ sma naḥ kṣaṇamiva kṣaṇadā vinā taṃ","gopyaḥ kathaṃ nvatitarema tamo durantam|| 29"],"meaning":"सखियो! जिनकी प्रेमभरी मनोहर मुसकान, रहस्यकी मीठी-मीठी बातें, विलासपूर्ण चितवन और प्रेमालिंगनसे हमने रासलीलाकी वे रात्रियाँ—जो बहुत विशाल थीं—एक क्षणके समान बिता दी थीं। अब भला, उनके बिना हम उन्हींकी दी हुई अपार विरहव्यथाका पार कैसे पावेंगी॥ २९॥"},{"id":"10.39.30","number":30,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/30/","page":377,"speaker":"गोप्य ऊचुः","sanskrit":["योऽह्नः क्षये व्रजमनन्तसखः परीतो","गोपैर्विशन् खुररजश्छुरितालकस्रक्।","वेणुं क्वणन् स्मितकटाक्षनिरीक्षणेन","चित्तं क्षिणोत्यमुमृते नु कथं भवेम॥ ३०"],"iast":["yo'hnaḥ kṣaye vrajamanantasakhaḥ parīto","gopairviśan khurarajaśchuritālakasrak|","veṇuṃ kvaṇan smitakaṭākṣanirīkṣaṇena","cittaṃ kṣiṇotyamumṛte nu kathaṃ bhavema|| 30"],"meaning":"एक दिनकी नहीं, प्रतिदिनकी बात है, सायंकालमें प्रतिदिन वे ग्वालबालोंसे घिरे हुए बलरामजीके साथ वनसे गौएँ चराकर लौटते हैं। उनकी काली-काली घुँघराली अलकें और गलेके पुष्पहार गौओंके खुरकी रजसे ढके रहते हैं। वे बाँसुरी बजाते हुए अपनी मन्द-मन्द मुसकान और तिरछी चितवनसे देख-देखकर हमारे हृदयको बेध डालते हैं। उनके बिना भला, हम कैसे जी सकेंगी?॥ ३०॥"},{"id":"10.39.31","number":31,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/31/","page":378,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवं ब्रुवाणा विरहातुरा भृशं","व्रजस्त्रियः कृष्णविषक्तमानसाः।","विसृज्य लज्जां रुरुदुः स्म सुस्वरं","गोविन्द दामोदर माधवेति॥ ३१"],"iast":["evaṃ bruvāṇā virahāturā bhṛśaṃ","vrajastriyaḥ kṛṣṇaviṣaktamānasāḥ|","visṛjya lajjāṃ ruruduḥ sma susvaraṃ","govinda dāmodara mādhaveti|| 31"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! गोपियाँ वाणीसे तो इस प्रकार कह रही थीं; परन्तु उनका एक-एक मनोभाव भगवान् श्रीकृष्णका स्पर्श, उनका आलिंगन कर रहा था। वे विरहकी सम्भावनासे अत्यन्त व्याकुल हो गयीं और लाज छोड़कर ‘हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव!’—इस प्रकार ऊँची आवाजसे पुकार-पुकारकर सुललित स्वरसे रोने लगीं॥ ३१॥"},{"id":"10.39.32","number":32,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/32/","page":378,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स्त्रीणामेवं रुदन्तीनामुदिते सवितर्यथ।","अक्रूरश्‍चोदयामास कृतमैत्रादिको रथम्॥ ३२"],"iast":["strīṇāmevaṃ rudantīnāmudite savitaryatha|","akrūraścodayāmāsa kṛtamaitrādiko ratham|| 32"],"meaning":"गोपियाँ इस प्रकार रो रही थीं! रोते-रोते सारी रात बीत गयी, सूर्योदय हुआ। अक्रूरजी सन्ध्या-वन्दन आदि नित्य कर्मोंसे निवृत्त होकर रथपर सवार हुए और उसे हाँक ले चले॥ ३२॥"},{"id":"10.39.33","number":33,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/33/","page":378,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["गोपास्तमन्वसज्जन्त नन्दाद्याः शकटैस्ततः।","आदायोपायनं भूरि कुम्भान् गोरससम्भृतान्॥ ३३"],"iast":["gopāstamanvasajjanta nandādyāḥ śakaṭaistataḥ|","ādāyopāyanaṃ bhūri kumbhān gorasasambhṛtān|| 33"],"meaning":"नन्दबाबा आदि गोपोंने भी दूध, दही, मक्खन, घी आदिसे भरे मटके और भेंटकी बहुत-सी सामग्रियाँ ले लीं तथा वे छकड़ोंपर चढ़कर उनके पीछे-पीछे चले॥ ३३॥"},{"id":"10.39.34","number":34,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/34/","page":378,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["गोप्यश्‍च दयितं कृष्णमनुव्रज्यानुरंजिताः।","प्रत्यादेशं भगवतः कांक्षन्त्यश्‍चावतस्थिरे॥ ३४"],"iast":["gopyaśca dayitaṃ kṛṣṇamanuvrajyānuraṃjitāḥ|","pratyādeśaṃ bhagavataḥ kāṃkṣantyaścāvatasthire|| 34"],"meaning":"इसी समय अनुरागके रंगमें रँगी हुई गोपियाँ अपने प्राणप्यारे श्रीकृष्णके पास गयीं और उनकी चितवन, मुसकान आदि निरखकर कुछ-कुछ सुखी हुईं। अब वे अपने प्रियतम श्यामसुन्दरसे कुछ सन्देश पानेकी आकांक्षासे वहीं खड़ी हो गयीं॥ ३४॥"},{"id":"10.39.35","number":35,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/35/","page":378,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तास्तथा तप्यतीर्वीक्ष्य स्वप्रस्थाने यदूत्तमः।","सान्त्वयामास सप्रेमैरायास्य इति दौत्यकैः॥ ३५"],"iast":["tāstathā tapyatīrvīkṣya svaprasthāne yadūttamaḥ|","sāntvayāmāsa sapremairāyāsya iti dautyakaiḥ|| 35"],"meaning":"यदुवंशशिरोमणि भगवान् श्रीकृष्णने देखा कि मेरे मथुरा जानेसे गोपियोंके हृदयमें बड़ी जलन हो रही है, वे सन्तप्त हो रही हैं, तब उन्होंने दूतके द्वारा ‘मैं आऊँगा’ यह प्रेम-सन्देश भेजकर उन्हें धीरज बँधाया॥ ३५॥"},{"id":"10.39.36","number":36,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/36/","page":378,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यावदालक्ष्यते केतुर्यावद् रेणू रथस्य च।","अनुप्रस्थापितात्मानो लेख्यानीवोपलक्षिताः॥ ३६"],"iast":["yāvadālakṣyate keturyāvad reṇū rathasya ca|","anuprasthāpitātmāno lekhyānīvopalakṣitāḥ|| 36"],"meaning":"गोपियोंको जबतक रथकी ध्वजा और पहियोंसे उड़ती हुई धूल दीखती रही तबतक उनके शरीर चित्रलिखित-से वहीं ज्यों-के-त्यों खड़े रहे। परन्तु उन्होंने अपना चित्त तो मनमोहन प्राणवल्लभ श्रीकृष्णके साथ ही भेज दिया था॥ ३६॥"},{"id":"10.39.37","number":37,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/37/","page":378,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ता निराशा निववृतुर्गोविन्दविनिवर्तने।","विशोका अहनी निन्युर्गायन्त्यः प्रियचेष्टितम्॥ ३७"],"iast":["tā nirāśā nivavṛturgovindavinivartane|","viśokā ahanī ninyurgāyantyaḥ priyaceṣṭitam|| 37"],"meaning":"अभी उनके मनमें आशा थी कि शायद श्रीकृष्ण कुछ दूर जाकर लौट आयें! परन्तु जब नहीं लौटे, तब वे निराश हो गयीं और अपने-अपने घर चली आयीं। परीक्षित्! वे रात-दिन अपने प्यारे श्यामसुन्दरकी लीलाओंका गान करती रहतीं और इस प्रकार अपने शोकसन्तापको हलका करतीं॥ ३७॥"},{"id":"10.39.38","number":38,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/38/","page":378,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["भगवानपि सम्प्राप्तो रामाक्रूरयुतो नृप।","रथेन वायुवेगेन कालिन्दीमघनाशिनीम्॥ ३८"],"iast":["bhagavānapi samprāpto rāmākrūrayuto nṛpa|","rathena vāyuvegena kālindīmaghanāśinīm|| 38"],"meaning":"परीक्षित्! इधर भगवान् श्रीकृष्ण भी बलरामजी और अक्रूरजीके साथ वायुके समान वेगवाले रथपर सवार होकर पापनाशिनी यमुनाजीके किनारे जा पहुँचे॥ ३८॥"},{"id":"10.39.39","number":39,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/39/","page":379,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तत्रोपस्पृश्य पानीयं पीत्वा मृष्टं मणिप्रभम्।","वृक्षषण्डमुपव्रज्य सरामो रथमाविशत्॥ ३९"],"iast":["tatropaspṛśya pānīyaṃ pītvā mṛṣṭaṃ maṇiprabham|","vṛkṣaṣaṇḍamupavrajya sarāmo rathamāviśat|| 39"],"meaning":"वहाँ उन लोगोंने हाथ-मुँह धोकर यमुनाजीका मरकतमणिके समान नीला और अमृतके समान मीठा जल पिया। इसके बाद बलरामजीके साथ भगवान् वृक्षोंके झुरमुटमें खड़े रथपर सवार हो गये॥ ३९॥"},{"id":"10.39.40","number":40,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/40/","page":379,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अक्रूरस्तावुपामन्त्र्य निवेश्य च रथोपरि।","कालिन्द्या ह्रदमागत्य स्नानं विधिवदाचरत्॥ ४०"],"iast":["akrūrastāvupāmantrya niveśya ca rathopari|","kālindyā hradamāgatya snānaṃ vidhivadācarat|| 40"],"meaning":"अक्रूरजीने दोनों भाइयोंको रथपर बैठाकर उनसे आज्ञा ली और यमुनाजीके कुण्ड (अनन्त—तीर्थ या ब्रह्मह्रद) पर आकर वे विधिपूर्वक स्नान करने लगे॥ ४०॥"},{"id":"10.39.41","number":41,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/41/","page":379,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["निमज्ज्य तस्मिन् सलिले जपन् ब्रह्म सनातनम्।","तावेव ददृशेऽक्रूरो रामकृष्णौ समन्वितौ॥ ४१"],"iast":["nimajjya tasmin salile japan brahma sanātanam|","tāveva dadṛśe'krūro rāmakṛṣṇau samanvitau|| 41"],"meaning":"उस कुण्डमें स्नान करनेके बाद वे जलमें डुबकी लगाकर गायत्रीका जप करने लगे। उसी समय जलके भीतर अक्रूरजीने देखा कि श्रीकृष्ण और बलराम दोनों भाई एक साथ ही बैठे हुए हैं॥ ४१॥"},{"id":"10.39.42","number":42,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/42/","page":379,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तौ रथस्थौ कथमिह सुतावानकदुन्दुभेः।","तर्हि स्वित् स्यन्दने न स्त इत्युन्मज्ज्य व्यचष्ट सः॥ ४२"],"iast":["tau rathasthau kathamiha sutāvānakadundubheḥ|","tarhi svit syandane na sta ityunmajjya vyacaṣṭa saḥ|| 42"],"meaning":"अब उनके मनमें यह शंका हुई कि ‘वसुदेवजीके पुत्रोंको तो मैं रथपर बैठा आया हूँ, अब वे यहाँ जलमें कैसे आ गये? जब यहाँ हैं तो शायद रथपर नहीं होंगे।’ ऐसा सोचकर उन्होंने सिर बाहर निकालकर देखा॥ ४२॥"},{"id":"10.39.43","number":43,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/43/","page":379,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तत्रापि च यथापूर्वमासीनौ पुनरेव सः।","न्यमज्जद् दर्शनं यन्मे मृषा किं सलिले तयोः॥ ४३"],"iast":["tatrāpi ca yathāpūrvamāsīnau punareva saḥ|","nyamajjad darśanaṃ yanme mṛṣā kiṃ salile tayoḥ|| 43"],"meaning":"वे उस रथपर भी पूर्ववत् बैठे हुए थे। उन्होंने यह सोचकर कि मैंने उन्हें जो जलमें देखा था, वह भ्रम ही रहा होगा, फिर डुबकी लगायी ॥ ४३॥"},{"id":"10.39.44","number":44,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/44/","page":379,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["भूयस्तत्रापि सोऽद्राक्षीत् स्तूयमानमहीश्‍वरम्।","सिद्धचारणगन्धर्वैरसुरैर्नतकन्धरैः ॥ ४४"],"iast":["bhūyastatrāpi so'drākṣīt stūyamānamahīśvaram|","siddhacāraṇagandharvairasurairnatakandharaiḥ || 44"],"meaning":"परन्तु फिर उन्होंने वहाँ भी देखा कि साक्षात् अनन्तदेव श्रीशेषजी विराजमान हैं और सिद्ध, चारण, गन्धर्व एवं असुर अपने-अपने सिर झुकाकर उनकी स्तुति कर रहे हैं॥ ४४॥"},{"id":"10.39.45","number":45,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/45/","page":379,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सहस्रशिरसं देवं सहस्रफणमौलिनम्।","नीलाम्बरं बिसश्‍वेतं शृङ्गैः श्‍वेतमिव स्थितम्॥ ४५"],"iast":["sahasraśirasaṃ devaṃ sahasraphaṇamaulinam|","nīlāmbaraṃ bisaśvetaṃ śṛṅgaiḥ śvetamiva sthitam|| 45"],"meaning":"शेषजीके हजार सिर हैं और प्रत्येक फणपर मुकुट सुशोभित है। कमलनालके समान उज्ज्वल शरीरपर नीलाम्बर धारण किये हुए हैं और उनकी ऐसी शोभा हो रही है, मानो सहस्र शिखरोंसे युक्त श्‍वेतगिरि कैलास शोभायमान हो॥ ४५॥"},{"id":"10.39.46","number":46,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/46/","page":379,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तस्योत्संगे घनश्यामं पीतकौशेयवाससम्।","पुरुषं चतुर्भुजं शान्तं पद्मपत्रारुणेक्षणम्॥ ४६"],"iast":["tasyotsaṃge ghanaśyāmaṃ pītakauśeyavāsasam|","puruṣaṃ caturbhujaṃ śāntaṃ padmapatrāruṇekṣaṇam|| 46"],"meaning":"अक्रूरजीने देखा कि शेषजीकी गोदमें श्याम मेघके समान घनश्याम विराजमान हो रहे हैं। वे रेशमी पीताम्बर पहने हुए हैं। बड़ी ही शान्त चतुर्भुज मूर्ति है और कमलके रक्तदलके समान रतनारे नेत्र हैं॥ ४६॥"},{"id":"10.39.47","number":47,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/47/","page":379,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["चारुप्रसन्‍नवदनं चारुहासनिरीक्षणम्।","सुभ्रून्‍नसं चारुकर्णं सुकपोलारुणाधरम्॥ ४७"],"iast":["cāruprasannavadanaṃ cāruhāsanirīkṣaṇam|","subhrūnnasaṃ cārukarṇaṃ sukapolāruṇādharam|| 47"],"meaning":"उनका वदन बड़ा ही मनोहर और प्रसन्‍नताका सदन है। उनका मधुर हास्य और चारु चितवन चित्तको चुराये लेती है। भौंहें सुन्दर और नासिका तनिक ऊँची तथा बड़ी ही सुघड़ है। सुन्दर कान, कपोल और लाल-लाल अधरोंकी छटा निराली ही है॥ ४७॥"},{"id":"10.39.48","number":48,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/48/","page":380,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["प्रलम्बपीवरभुजं तुंगांसोरःस्थलश्रियम्।","कम्बुकण्ठं निम्‍ननाभिं वलिमत्पल्लवोदरम्॥ ४८"],"iast":["pralambapīvarabhujaṃ tuṃgāṃsoraḥsthalaśriyam|","kambukaṇṭhaṃ nimnanābhiṃ valimatpallavodaram|| 48"],"meaning":"बाँहें घुटनोंतक लंबी और हृष्ट-पुष्ट हैं। कंधे ऊँचे और वक्षःस्थल लक्ष्मीजीका आश्रय-स्थान है। शंखके समान उतार-चढ़ाववाला सुडौल गला, गहरी नाभि और त्रिवलीयुक्त उदर पीपलके पत्तेके समान शोभायमान है॥ ४८॥"},{"id":"10.39.49","number":49,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/49/","page":380,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["बृहत्कटितटश्रोणिकरभोरुद्वयान्वितम्।","चारुजानुयुगं चारुजंघायुगलसंयुतम्॥ ४९"],"iast":["bṛhatkaṭitaṭaśroṇikarabhorudvayānvitam|","cārujānuyugaṃ cārujaṃghāyugalasaṃyutam|| 49"],"meaning":"स्थूल कटिप्रदेश और नितम्ब, हाथीकी सूँडके समान जाँघें, सुन्दर घुटने एवं पिंडलियाँ हैं। एड़ीके ऊपरकी गाँठें उभरी हुई हैं और लाल-लाल नखोंसे दिव्य ज्योतिर्मय किरणें फैल रही हैं। चरणकमलकी अंगुलियाँ और अंगूठे नयी और कोमल पँखुड़ियोंके समान सुशोभित हैं॥ ४९-५०॥","meaning_covers":[49,50]},{"id":"10.39.50","number":50,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/50/","page":380,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तुंगगुल्फारुणनखव्रातदीधितिभिर्वृतम् ।","नवांगुल्यंगुष्ठदलैर्विलसत्पादपंकजम् ॥ ५०"],"iast":["tuṃgagulphāruṇanakhavrātadīdhitibhirvṛtam |","navāṃgulyaṃguṣṭhadalairvilasatpādapaṃkajam || 50"],"meaning":"स्थूल कटिप्रदेश और नितम्ब, हाथीकी सूँडके समान जाँघें, सुन्दर घुटने एवं पिंडलियाँ हैं। एड़ीके ऊपरकी गाँठें उभरी हुई हैं और लाल-लाल नखोंसे दिव्य ज्योतिर्मय किरणें फैल रही हैं। चरणकमलकी अंगुलियाँ और अंगूठे नयी और कोमल पँखुड़ियोंके समान सुशोभित हैं॥ ४९-५०॥","meaning_covers":[49,50]},{"id":"10.39.51","number":51,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/51/","page":380,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सुमहार्हमणिव्रातकिरीटकटकांगदैः ।","कटिसूत्रब्रह्मसूत्रहारनूपुरकुण्डलैः ॥ ५१"],"iast":["sumahārhamaṇivrātakirīṭakaṭakāṃgadaiḥ |","kaṭisūtrabrahmasūtrahāranūpurakuṇḍalaiḥ || 51"],"meaning":"अत्यन्त बहुमूल्य मणियोंसे जड़ा हुआ मुकुट, कड़े, बाजूबंद, करधनी, हार, नूपुर और कुण्डलोंसे तथा यज्ञोपवीतसे वह दिव्य मूर्ति अलंकृत हो रही है। एक हाथमें पद्म शोभा पा रहा है और शेष तीन हाथोंमें शंख, चक्र और गदा, वक्षःस्थलपर श्रीवत्सका चिह्न, गलेमें कौस्तुभमणि और वनमाला लटक रही है॥ ५१-५२॥","meaning_covers":[51,52]},{"id":"10.39.52","number":52,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/52/","page":380,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["भ्राजमानं पद्मकरं शंखचक्रगदाधरम्।","श्रीवत्सवक्षसं भ्राजत्कौस्तुभं वनमालिनम्॥ ५२"],"iast":["bhrājamānaṃ padmakaraṃ śaṃkhacakragadādharam|","śrīvatsavakṣasaṃ bhrājatkaustubhaṃ vanamālinam|| 52"],"meaning":"अत्यन्त बहुमूल्य मणियोंसे जड़ा हुआ मुकुट, कड़े, बाजूबंद, करधनी, हार, नूपुर और कुण्डलोंसे तथा यज्ञोपवीतसे वह दिव्य मूर्ति अलंकृत हो रही है। एक हाथमें पद्म शोभा पा रहा है और शेष तीन हाथोंमें शंख, चक्र और गदा, वक्षःस्थलपर श्रीवत्सका चिह्न, गलेमें कौस्तुभमणि और वनमाला लटक रही है॥ ५१-५२॥","meaning_covers":[51,52]},{"id":"10.39.53","number":53,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/53/","page":380,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सुनन्दनन्दप्रमुखैः पार्षदैः सनकादिभिः।","सुरेशैर्ब्रह्मरुद्राद्यैर्नवभिश्‍च द्विजोत्तमैः॥ ५३"],"iast":["sunandanandapramukhaiḥ pārṣadaiḥ sanakādibhiḥ|","sureśairbrahmarudrādyairnavabhiśca dvijottamaiḥ|| 53"],"meaning":"नन्द-सुनन्द आदि पार्षद अपने ‘स्वामी’, सनकादि परमर्षि ‘परब्रह्म’, ब्रह्मा, महादेव आदि देवता ‘सर्वेश्‍वर’, मरीचि आदि नौ ब्राह्मण ‘प्रजापति’ और प्रह्लाद-नारद आदि भगवान्‌के परम प्रेमी भक्त तथा आठों वसु अपने परम प्रियतम ‘भगवान्’ समझकर भिन्‍न-भिन्‍न भावोंके अनुसार निर्दोष वेदवाणीसे भगवान्‌की स्तुति कर रहे हैं॥ ५३-५४॥","meaning_covers":[53,54]},{"id":"10.39.54","number":54,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/54/","page":380,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["प्रह्रादनारदवसुप्रमुखैर्भागवतोत्तमैः ।","स्तूयमानं पृथग्भावैर्वचोभिरमलात्मभिः॥ ५४"],"iast":["prahrādanāradavasupramukhairbhāgavatottamaiḥ |","stūyamānaṃ pṛthagbhāvairvacobhiramalātmabhiḥ|| 54"],"meaning":"नन्द-सुनन्द आदि पार्षद अपने ‘स्वामी’, सनकादि परमर्षि ‘परब्रह्म’, ब्रह्मा, महादेव आदि देवता ‘सर्वेश्‍वर’, मरीचि आदि नौ ब्राह्मण ‘प्रजापति’ और प्रह्लाद-नारद आदि भगवान्‌के परम प्रेमी भक्त तथा आठों वसु अपने परम प्रियतम ‘भगवान्’ समझकर भिन्‍न-भिन्‍न भावोंके अनुसार निर्दोष वेदवाणीसे भगवान्‌की स्तुति कर रहे हैं॥ ५३-५४॥","meaning_covers":[53,54]},{"id":"10.39.55","number":55,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/55/","page":380,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["श्रिया पुष्ट्या गिरा कान्त्या कीर्त्या तुष्ट्येलयोर्जया।","विद्ययाविद्यया शक्त्या मायया च निषेवितम्॥ ५५"],"iast":["śriyā puṣṭyā girā kāntyā kīrtyā tuṣṭyelayorjayā|","vidyayāvidyayā śaktyā māyayā ca niṣevitam|| 55"],"meaning":"साथ ही लक्ष्मी, पुष्टि, सरस्वती, कान्ति, कीर्ति और तुष्टि (अर्थात् ऐश्‍वर्य, बल, ज्ञान, श्री, यश और वैराग्य—ये षडैश्‍वर्यरूप शक्तियाँ), इला (सन्धिनीरूप पृथ्वी-शक्ति), ऊर्जा (लीलाशक्ति), विद्या-अविद्या (जीवोंके मोक्ष और बन्धनमें कारणरूपा बहिरंग शक्ति), ह्लादिनी, संवित् (अन्तरंगा शक्ति) और माया आदि शक्तियाँ मूर्तिमान् होकर उनकी सेवा कर रही हैं॥ ५५॥"},{"id":"10.39.56","number":56,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/56/","page":381,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["विलोक्य सुभृशं प्रीतो भक्त्या परमया युतः।","हृष्यत्तनूरुहो भावपरिक्लिन्‍नात्मलोचनः॥ ५६"],"iast":["vilokya subhṛśaṃ prīto bhaktyā paramayā yutaḥ|","hṛṣyattanūruho bhāvapariklinnātmalocanaḥ|| 56"],"meaning":"भगवान्‌की यह झाँकी निरखकर अक्रूरजीका हृदय परमानन्दसे लबालब भर गया। उन्हें परम भक्ति प्राप्त हो गयी। सारा शरीर हर्षावेशसे पुलकित हो गया। प्रेमभावका उद्रेक होनेसे उनके नेत्र आँसूसे भर गये॥ ५६॥"},{"id":"10.39.57","number":57,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/57/","page":381,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["गिरा गद्गदयास्तौषीत् सत्त्वमालम्ब्य सात्वतः।","प्रणम्य मूर्ध्नावहितः कृतांजलिपुटः शनैः॥ ५७"],"iast":["girā gadgadayāstauṣīt sattvamālambya sātvataḥ|","praṇamya mūrdhnāvahitaḥ kṛtāṃjalipuṭaḥ śanaiḥ|| 57"],"meaning":"अब अक्रूरजीने अपना साहस बटोरकर भगवान्‌के चरणोंमें सिर रखकर प्रणाम किया और वे उसके बाद हाथ जोड़कर बड़ी सावधानीसे धीरे-धीरे गद्गद स्वरसे भगवान्‌की स्तुति करने लगे॥ ५७॥"}],"text":[{"b":31493,"kind":"adhyaya_heading","page":373,"text":"अथैकोनचत्वारिंशोऽध्यायः"},{"b":31494,"kind":"topic_heading","page":373,"text":"श्रीकृष्ण-बलरामका मथुरागमन"},{"b":31495,"kind":"topic_heading","page":373,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":31496,"kind":"sanskrit_shloka","page":373,"verses":["10.39.1"],"text":"सुखोपविष्टः पर्यंके रामकृष्णोरुमानितः।"},{"b":31497,"kind":"sanskrit_shloka","page":373,"verses":["10.39.1"],"text":"लेभे मनोरथान् सर्वान् पथि यान् स चकार ह॥ १"},{"b":31498,"kind":"sanskrit_shloka","page":373,"verses":["10.39.2"],"text":"किमलभ्यं भगवति प्रसन्‍ने श्रीनिकेतने।"},{"b":31499,"kind":"sanskrit_shloka","page":373,"verses":["10.39.2"],"text":"तथापि तत्परा राजन्‍न हि वाञ्छन्ति किंचन॥ २"},{"b":31500,"kind":"hindi_commentary","page":373,"explains":["10.39.1","10.39.2"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीने अक्रूरजीका भलीभाँति सम्मान किया। वे आरामसे पलँगपर बैठ गये। उन्होंने मार्गमें जो-जो अभिलाषाएँ की थीं, वे सब पूरी हो गयीं॥ १॥ परीक्षित्! लक्ष्मीके आश्रयस्थान भगवान् श्रीकृष्णके प्रसन्‍न होनेपर ऐसी कौन-सी वस्तु है, जो प्राप्त नहीं हो सकती? फिर भी भगवान्‌के परमप्रेमी भक्तजन किसी भी वस्तुकी कामना नहीं करते॥ २॥"},{"b":31501,"kind":"sanskrit_shloka","page":373,"verses":["10.39.3"],"text":"सायंतनाशनं कृत्वा भगवान् देवकीसुतः।"},{"b":31502,"kind":"sanskrit_shloka","page":373,"verses":["10.39.3"],"text":"सुहृत्सु वृत्तं कंसस्य पप्रच्छान्यच्चिकीर्षितम्॥ ३"},{"b":31503,"kind":"hindi_translation","page":373,"explains":["10.39.3"],"text":"देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने सायंकालका भोजन करनेके बाद अक्रूरजीके पास जाकर अपने स्वजन-सम्बन्धियोंके साथ कंसके व्यवहार और उसके अगले कार्यक्रमके सम्बन्धमें पूछा॥ ३॥"},{"b":31504,"kind":"topic_heading","page":373,"text":"श्रीभगवानुवाच"},{"b":31505,"kind":"sanskrit_shloka","page":373,"verses":["10.39.4"],"text":"तात सौम्यागतः कच्चित् स्वागतं भद्रमस्तु वः।"},{"b":31506,"kind":"sanskrit_shloka","page":373,"verses":["10.39.4"],"text":"अपि स्वज्ञातिबन्धूनामनमीवमनामयम्॥ ४"},{"b":31507,"kind":"sanskrit_shloka","page":373,"verses":["10.39.5"],"text":"किं नु नः कुशलं पृच्छे एधमाने कुलामये।"},{"b":31508,"kind":"sanskrit_shloka","page":373,"verses":["10.39.5"],"text":"कंसे मातुलनाम्‍न्यङ्ग स्वानां नस्तत्प्रजासु च॥ ५"},{"b":31509,"kind":"sanskrit_shloka","page":374,"verses":["10.39.6"],"text":"अहो अस्मदभूद् भूरि पित्रोर्वृजिनमार्ययोः।"},{"b":31510,"kind":"sanskrit_shloka","page":374,"verses":["10.39.6"],"text":"यद्धेतोः पुत्रमरणं यद्धेतोर्बन्धनं तयोः॥ ६"},{"b":31511,"kind":"sanskrit_shloka","page":374,"verses":["10.39.7"],"text":"दिष्ट्याद्य दर्शनं स्वानां मह्यं वः सौम्य कांक्षितम्।"},{"b":31512,"kind":"hindi_commentary","page":374,"verses":["10.39.7"],"text":"संजातं वर्ण्यतां तात तवागमनकारणम्॥ ७"},{"b":31513,"kind":"hindi_commentary","page":373,"explains":["10.39.4","10.39.5","10.39.6","10.39.7"],"text":"भगवान् श्रीकृष्णने कहा—चाचाजी! आपका हृदय बड़ा शुद्ध है। आपको यात्रामें कोई कष्ट तो नहीं हुआ? स्वागत है। मैं आपकी मंगलकामना करता हूँ। मथुराके हमारे आत्मीय सुहृद्, कुटुम्बी तथा अन्य सम्बन्धी सब सकुशल और स्वस्थ हैं न?॥ ४॥ हमारा नाममात्रका मामा कंस तो हमारे कुलके लिये एक भयंकर व्याधि है। जबतक उसकी बढ़ती हो रही है, तबतक हम अपने वंशवालों और उनके बाल-बच्चोंका कुशल-मंगल क्या पूछें॥ ५॥ चाचाजी! हमारे लिये यह बड़े खेदकी बात है कि मेरे ही कारण मेरे निरपराध और सदाचारी माता-पिताको अनेकों प्रकारकी यातनाएँ झेलनी पड़ीं—तरह-तरहके कष्ट उठाने पड़े। और तो क्या कहूँ, मेरे ही कारण उन्हें हथकड़ी-बेड़ीसे जकड़कर जेलमें डाल दिया गया तथा मेरे ही कारण उनके बच्चे भी मार डाले गये॥ ६॥ मैं बहुत दिनोंसे चाहता था कि आप-लोगोंमेंसे किसी-न-किसीका दर्शन हो। यह बड़े सौभाग्यकी बात है कि आज मेरी वह अभिलाषा पूरी हो गयी। सौम्यस्वभाव चाचाजी! अब आप कृपा करके यह बतलाइये कि आपका शुभागमन किस निमित्तसे हुआ?॥ ७॥"},{"b":31514,"kind":"topic_heading","page":373,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":31515,"kind":"sanskrit_shloka","page":374,"verses":["10.39.8"],"text":"पृष्टो भगवता सर्वं वर्णयामास माधवः।"},{"b":31516,"kind":"sanskrit_shloka","page":374,"verses":["10.39.8"],"text":"वैरानुबन्धं यदुषु वसुदेववधोद्यमम्॥ ८"},{"b":31517,"kind":"sanskrit_shloka","page":374,"verses":["10.39.9"],"text":"यत्संदेशो यदर्थं वा दूतः संप्रेषितः स्वयम्।"},{"b":31518,"kind":"sanskrit_shloka","page":374,"verses":["10.39.9"],"text":"यदुक्तं नारदेनास्य स्वजन्मानकदुन्दुभेः॥ ९"},{"b":31519,"kind":"sanskrit_shloka","page":374,"verses":["10.39.10"],"text":"श्रुत्वाक्रूरवचः कृष्णो बलश्‍च परवीरहा।"},{"b":31520,"kind":"sanskrit_shloka","page":374,"verses":["10.39.10"],"text":"प्रहस्य नन्दं पितरं राज्ञाऽऽदिष्टं विजज्ञतुः॥ १०"},{"b":31521,"kind":"sanskrit_shloka","page":374,"verses":["10.39.11"],"text":"गोपान् समादिशत् सोऽपि गृह्यतां सर्वगोरसः।"},{"b":31522,"kind":"sanskrit_shloka","page":374,"verses":["10.39.11"],"text":"उपायनानि गृह्णीध्वं युज्यन्तां शकटानि च॥ ११"},{"b":31523,"kind":"sanskrit_shloka","page":374,"verses":["10.39.12"],"text":"यास्यामः श्‍वो मधुपुरीं दास्यामो नृपते रसान्।"},{"b":31524,"kind":"sanskrit_shloka","page":374,"verses":["10.39.12"],"text":"द्रक्ष्यामः सुमहत् पर्व यान्ति जानपदाः किल।"},{"b":31525,"kind":"sanskrit_shloka","page":374,"verses":["10.39.12"],"text":"एवमाघोषयत् क्षत्त्रा नन्दगोपः स्वगोकुले॥ १२"},{"b":31526,"kind":"hindi_commentary","page":374,"explains":["10.39.8","10.39.9","10.39.10","10.39.11","10.39.12"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब भगवान् श्रीकृष्णने अक्रूरजीसे इस प्रकार प्रश्‍न किया, तब उन्होंने बतलाया कि ‘कंसने तो सभी यदुवंशियोंसे घोर वैर ठान रखा है। वह वसुदेवजीको मार डालनेका भी उद्यम कर चुका है’॥ ८॥ अक्रूरजीने कंसका सन्देश और जिस उद्देश्यसे उसने स्वयं अक्रूरजीको दूत बनाकर भेजा था और नारदजीने जिस प्रकार वसुदेवजीके घर श्रीकृष्णके जन्म लेनेका वृत्तान्त उसको बता दिया था, सो सब कह सुनाया॥ ९॥ अक्रूरजीकी यह बात सुनकर विपक्षी शत्रुओंका दमन करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी हँसने लगे और इसके बाद उन्होंने अपने पिता नन्दजीको कंसकी आज्ञा सुना दी॥ १०॥ तब नन्दबाबाने सब गोपोंको आज्ञा दी कि ‘सारा गोरस एकत्र करो। भेंटकी सामग्री ले लो और छकड़े जोड़ो॥ ११॥ कल प्रातःकाल ही हम सब मथुराकी यात्रा करेंगे और वहाँ चलकर राजा कंसको गोरस देंगे। वहाँ एक बहुत बड़ा उत्सव हो रहा है। उसे देखनेके लिये देशकी सारी प्रजा इकट्ठी हो रही है। हमलोग भी उसे देखेंगे।’ नन्दबाबाने गाँवके कोतवालके द्वारा यह घोषणा सारे व्रजमें करवा दी॥ १२॥"},{"b":31527,"kind":"sanskrit_shloka","page":374,"verses":["10.39.13"],"text":"गोप्यस्तास्तदुपश्रुत्य बभूवुर्व्यथिता भृशम्।"},{"b":31528,"kind":"sanskrit_shloka","page":374,"verses":["10.39.13"],"text":"रामकृष्णौ पुरीं नेतुमक्रूरं व्रजमागतम्॥ १३"},{"b":31529,"kind":"hindi_commentary","page":375,"verses":["10.39.14"],"text":"काश्‍चित्तत्कृतहृत्तापश्‍वासम्लानमुखश्रियः।"},{"b":31530,"kind":"hindi_commentary","page":375,"verses":["10.39.14"],"text":"स्रंसद्दुकूलवलयकेशग्रन्थ्यश्‍च काश्‍चन॥ १४"},{"b":31531,"kind":"sanskrit_shloka","page":375,"verses":["10.39.15"],"text":"अन्याश्‍च तदनुध्याननिवृत्ताशेषवृत्तयः।"},{"b":31532,"kind":"sanskrit_shloka","page":375,"verses":["10.39.15"],"text":"नाभ्यजानन्‍निमं लोकमात्मलोकं गता इव॥ १५"},{"b":31533,"kind":"hindi_commentary","page":375,"verses":["10.39.16"],"text":"स्मरन्त्यश्‍चापराः शौरेरनुरागस्मितेरिताः।"},{"b":31534,"kind":"sanskrit_shloka","page":375,"verses":["10.39.16"],"text":"हृदिस्पृशश्‍चित्रपदा गिरः संमुमुहुः स्त्रियः॥ १६"},{"b":31535,"kind":"sanskrit_shloka","page":375,"verses":["10.39.17"],"text":"गतिं सुललितां चेष्टां स्निग्धहासावलोकनम्।"},{"b":31536,"kind":"sanskrit_shloka","page":375,"verses":["10.39.17"],"text":"शोकापहानि नर्माणि प्रोद्दामचरितानि च॥ १७"},{"b":31537,"kind":"sanskrit_shloka","page":375,"verses":["10.39.18"],"text":"चिन्तयन्त्यो मुकुन्दस्य भीता विरहकातराः।"},{"b":31538,"kind":"hindi_commentary","page":375,"verses":["10.39.18"],"text":"समेताः संघशः प्रोचुरश्रुमुख्योऽच्युताशयाः॥ १८"},{"b":31539,"kind":"hindi_commentary","page":374,"explains":["10.39.13","10.39.14","10.39.15","10.39.16","10.39.17","10.39.18"],"text":"परीक्षित्! जब गोपियोंने सुना कि हमारे मनमोहन श्यामसुन्दर और गौरसुन्दर बलरामजीको मथुरा ले जानेके लिये अक्रूरजी व्रजमें आये हैं तब उनके हृदयमें बड़ी व्यथा हुई। वे व्याकुल हो गयीं॥ १३॥ भगवान् श्रीकृष्णके मथुरा जानेकी बात सुनते ही बहुतोंके हृदयमें ऐसी जलन हुई कि गरम साँस चलने लगी, मुखकमल कुम्हला गया। और बहुतोंकी ऐसी दशा हुई—वे इस प्रकार अचेत हो गयीं कि उन्हें खिसकी हुई ओढ़नी, गिरते हुए कंगन और ढीले हुए जूड़ोंतकका पता न रहा॥ १४॥ भगवान्‌के स्वरूपका ध्यान आते ही बहुत-सी गोपियोंकी चित्तवृत्तियाँ सर्वथा निवृत्त हो गयीं, मानो वे समाधिस्थ—आत्मामें स्थित हो गयी हों, और उन्हें अपने शरीर और संसारका कुछ ध्यान ही न रहा॥ १५॥ बहुत-सी गोपियोंके सामने भगवान् श्रीकृष्णका प्रेम, उनकी मन्द-मन्द मुसकान और हृदयको स्पर्श करनेवाली विचित्र पदोंसे युक्त मधुर वाणी नाचने लगी। वे उसमें तल्लीन हो गयीं। मोहित हो गयीं॥ १६॥ गोपियाँ मन-ही-मन भगवान्‌की लटकीली चाल, भाव-भंगी, प्रेमभरी मुसकान, चितवन, सारे शोकोंको मिटा देनेवाली ठिठोलियाँ तथा उदारता-भरी लीलाओंका चिन्तन करने लगीं और उनके विरहके भयसे कातर हो गयीं। उनका हृदय, उनका जीवन—सब कुछ भगवान्‌के प्रति समर्पित था। उनकी आँखोंसे आँसू बह रहे थे। वे झुंड-की-झुंड इकट्ठी होकर इस प्रकार कहने लगीं॥ १७-१८॥"},{"b":31540,"kind":"topic_heading","page":375,"text":"गोप्य ऊचुः"},{"b":31541,"kind":"sanskrit_shloka","page":375,"verses":["10.39.19"],"text":"अहो विधातस्तव न क्वचिद् दया"},{"b":31542,"kind":"sanskrit_shloka","page":375,"verses":["10.39.19"],"text":"संयोज्य मैत्र्या प्रणयेन देहिनः।"},{"b":31543,"kind":"sanskrit_shloka","page":375,"verses":["10.39.19"],"text":"तांश्‍चाकृतार्थान् वियुनङ्क्ष्यपार्थकं"},{"b":31544,"kind":"sanskrit_shloka","page":375,"verses":["10.39.19"],"text":"विक्रीडितं तेऽर्भकचेष्टितं यथा॥ १९"},{"b":31545,"kind":"sanskrit_shloka","page":375,"verses":["10.39.20"],"text":"यस्त्वं प्रदर्श्यासितकुन्तलावृतं"},{"b":31546,"kind":"sanskrit_shloka","page":375,"verses":["10.39.20"],"text":"मुकुन्दवक्त्रं सुकपोलमुन्‍नसम्।"},{"b":31547,"kind":"sanskrit_shloka","page":376,"verses":["10.39.20"],"text":"शोकापनोदस्मितलेशसुन्दरं"},{"b":31548,"kind":"sanskrit_shloka","page":376,"verses":["10.39.20"],"text":"करोषि पारोक्ष्यमसाधु ते कृतम्॥ २०"},{"b":31549,"kind":"sanskrit_shloka","page":376,"verses":["10.39.21"],"text":"क्रूरस्त्वमक्रूरसमाख्यया स्म न-"},{"b":31550,"kind":"sanskrit_shloka","page":376,"verses":["10.39.21"],"text":"श्‍चक्षुर्हि दत्तं हरसे बताज्ञवत्।"},{"b":31551,"kind":"sanskrit_shloka","page":376,"verses":["10.39.21"],"text":"येनैकदेशेऽखिलसर्गसौष्ठवं"},{"b":31552,"kind":"sanskrit_shloka","page":376,"verses":["10.39.21"],"text":"त्वदीयमद्राक्ष्म वयं मधुद्विषः॥ २१"},{"b":31553,"kind":"hindi_commentary","page":375,"explains":["10.39.19","10.39.20","10.39.21"],"text":"गोपियोंने कहा—धन्य हो विधाता! तुम सब कुछ विधान तो करते हो, परन्तु तुम्हारे हृदयमें दयाका लेश भी नहीं है। पहले तो तुम सौहार्द और प्रेमसे जगत‍्के प्राणियोंको एक-दूसरेके साथ जोड़ देते हो, उन्हें आपसमें एक कर देते हो; मिला देते हो परन्तु अभी उनकी आशा-अभिलाषाएँ पूरी भी नहीं हो पातीं, वे तृप्त भी नहीं हो पाते कि तुम उन्हें व्यर्थ ही अलग-अलग कर देते हो! सच है, तुम्हारा यह खिलवाड़ बच्चोंके खेलकी तरह व्यर्थ ही है॥ १९॥ यह कितने दुःखकी बात है! विधाता! तुमने पहले हमें प्रेमका वितरण करनेवाले श्यामसुन्दरका मुखकमल दिखलाया। कितना सुन्दर है वह! काले-काले घुँघराले बाल कपोलोंपर झलक रहे हैं। मरकतमणि-से चिकने सुस्निग्ध कपोल और तोतेकी चोंच-सी सुन्दर नासिका तथा अधरोंपर मन्द-मन्द मुसकानकी सुन्दर रेखा, जो सारे शोकोंको तत्क्षण भगा देती है। विधाता! तुमने एक बार तो हमें वह परम सुन्दर मुखकमल दिखाया और अब उसे ही हमारी आँखोंसे ओझल कर रहे हो! सचमुच तुम्हारी यह करतूत बहुत ही अनुचित है॥ २०॥ हम जानती हैं, इसमें अक्रूरका दोष नहीं है; यह तो साफ तुम्हारी क्रूरता है। वास्तवमें तुम्हीं अक्रूरके नामसे यहाँ आये हो और अपनी ही दी हुई आँखें तुम हमसे मूर्खकी भाँति छीन रहे हो। इनके द्वारा हम श्यामसुन्दरके एक-एक अंगमें तुम्हारी सृष्टिका सम्पूर्ण सौन्दर्य निहारती रहती थीं। विधाता! तुम्हें ऐसा नहीं चाहिये॥ २१॥"},{"b":31554,"kind":"sanskrit_shloka","page":376,"verses":["10.39.22"],"text":"न नन्दसूनुः क्षणभंगसौहृदः"},{"b":31555,"kind":"sanskrit_shloka","page":376,"verses":["10.39.22"],"text":"समीक्षते नः स्वकृतातुरा बत।"},{"b":31556,"kind":"sanskrit_shloka","page":376,"verses":["10.39.22"],"text":"विहाय गेहान् स्वजनान् सुतान् पतीं-"},{"b":31557,"kind":"sanskrit_shloka","page":376,"verses":["10.39.22"],"text":"स्तद्दास्यमद्धोपगता नवप्रियः॥ २२"},{"b":31558,"kind":"sanskrit_shloka","page":376,"verses":["10.39.23"],"text":"सुखं प्रभाता रजनीयमाशिषः"},{"b":31559,"kind":"sanskrit_shloka","page":376,"verses":["10.39.23"],"text":"सत्या बभूवुः पुरयोषितां ध्रुवम्।"},{"b":31560,"kind":"sanskrit_shloka","page":376,"verses":["10.39.23"],"text":"याः संप्रविष्टस्य मुखं व्रजस्पतेः"},{"b":31561,"kind":"sanskrit_shloka","page":376,"verses":["10.39.23"],"text":"पास्यन्त्यपांगोत्कलितस्मितासवम्॥ २३"},{"b":31562,"kind":"sanskrit_shloka","page":376,"verses":["10.39.24"],"text":"तासां मुकुन्दो मधुमंजुभाषितै-"},{"b":31563,"kind":"sanskrit_shloka","page":376,"verses":["10.39.24"],"text":"र्गृहीतचित्तः परवान् मनस्व्यपि।"},{"b":31564,"kind":"sanskrit_shloka","page":376,"verses":["10.39.24"],"text":"कथं पुनर्नः प्रतियास्यतेऽबला"},{"b":31565,"kind":"sanskrit_shloka","page":376,"verses":["10.39.24"],"text":"ग्राम्याः सलज्जस्मितविभ्रमैर्भ्रमन्॥ २४"},{"b":31566,"kind":"sanskrit_shloka","page":376,"verses":["10.39.25"],"text":"अद्य ध्रुवं तत्र दृशो भविष्यते"},{"b":31567,"kind":"sanskrit_shloka","page":376,"verses":["10.39.25"],"text":"दाशार्हभोजान्धकवृष्णिसात्वताम्।"},{"b":31568,"kind":"sanskrit_shloka","page":377,"verses":["10.39.25"],"text":"महोत्सवः श्रीरमणं गुणास्पदं"},{"b":31569,"kind":"sanskrit_shloka","page":377,"verses":["10.39.25"],"text":"द्रक्ष्यन्ति ये चाध्वनि देवकीसुतम्॥ २५"},{"b":31570,"kind":"hindi_commentary","page":376,"explains":["10.39.22","10.39.23","10.39.24","10.39.25"],"text":"अहो! नन्दनन्दन श्यामसुन्दरको भी नये-नये लोगोंसे नेह लगानेकी चाट पड़ गयी है। देखो तो सही—इनका सौहार्द, इनका प्रेम एक क्षणमें ही कहाँ चला गया? हम तो अपने घर-द्वार, स्वजन-सम्बन्धी, पति-पुत्र आदिको छोड़कर इनकी दासी बनीं और इन्हींके लिये आज हमारा हृदय शोकातुर हो रहा है, परन्तु ये ऐसे हैं कि हमारी ओर देखतेतक नहीं॥ २२॥ आजकी रातका प्रातःकाल मथुराकी स्त्रियोंके लिये निश्‍चय ही बड़ा मंगलमय होगा। आज उनकी बहुत दिनोंकी अभिलाषाएँ अवश्य ही पूरी हो जायँगी। जब हमारे व्रजराज श्यामसुन्दर अपनी तिरछी चितवन और मन्द-मन्द मुसकानसे युक्त मुखारविन्दका मादक मधु वितरण करते हुए मथुरापुरीमें प्रवेश करेंगे, तब वे उसका पान करके धन्य-धन्य हो जायँगी॥ २३॥ यद्यपि हमारे श्यामसुन्दर धैर्यवान् होनेके साथ ही नन्दबाबा आदि गुरुजनोंकी आज्ञामें रहते हैं, तथापि मथुराकी युवतियाँ अपने मधुके समान मधुर वचनोंसे इनका चित्त बरबस अपनी ओर खींच लेंगी और ये उनकी सलज्ज मुसकान तथा विलासपूर्ण भाव-भंगीसे वहीं रम जायँगे। फिर हम गँवार ग्वालिनोंके पास ये लौटकर क्यों आने लगे॥ २४॥ धन्य है आज हमारे श्यामसुन्दरका दर्शन करके मथुराके दाशार्ह, भोज, अन्धक और वृष्णिवंशी यादवोंके नेत्र अवश्य ही परमानन्दका साक्षात्कार करेंगे। आज उनके यहाँ महान् उत्सव होगा। साथ ही जो लोग यहाँसे मथुरा जाते हुए रमारमण गुणसागर नटनागर देवकीनन्दन श्यामसुन्दरका मार्गमें दर्शन करेंगे, वे भी निहाल हो जायँगे॥ २५॥"},{"b":31571,"kind":"sanskrit_shloka","page":377,"verses":["10.39.26"],"text":"मैतद्विधस्याकरुणस्य नाम भू-"},{"b":31572,"kind":"sanskrit_shloka","page":377,"verses":["10.39.26"],"text":"दक्रूर इत्येतदतीव दारुणः।"},{"b":31573,"kind":"sanskrit_shloka","page":377,"verses":["10.39.26"],"text":"योऽसावनाश्‍वास्य सुदुःखितं जनं"},{"b":31574,"kind":"sanskrit_shloka","page":377,"verses":["10.39.26"],"text":"प्रियात्प्रियं नेष्यति पारमध्वनः॥ २६"},{"b":31575,"kind":"sanskrit_shloka","page":377,"verses":["10.39.27"],"text":"अनार्द्रधीरेष समास्थितो रथं"},{"b":31576,"kind":"sanskrit_shloka","page":377,"verses":["10.39.27"],"text":"तमन्वमी च त्वरयन्ति दुर्मदाः।"},{"b":31577,"kind":"sanskrit_shloka","page":377,"verses":["10.39.27"],"text":"गोपा अनोभिः स्थविरैरुपेक्षितं"},{"b":31578,"kind":"sanskrit_shloka","page":377,"verses":["10.39.27"],"text":"दैवं च नोऽद्य प्रतिकूलमीहते॥ २७"},{"b":31579,"kind":"sanskrit_shloka","page":377,"verses":["10.39.28"],"text":"निवारयामः समुपेत्य माधवं"},{"b":31580,"kind":"sanskrit_shloka","page":377,"verses":["10.39.28"],"text":"किं नोऽकरिष्यन् कुलवृद्धबान्धवाः।"},{"b":31581,"kind":"sanskrit_shloka","page":377,"verses":["10.39.28"],"text":"मुकुन्दसंगान्‍निमिषार्धदुस्त्यजाद्"},{"b":31582,"kind":"sanskrit_shloka","page":377,"verses":["10.39.28"],"text":"दैवेन विध्वंसितदीनचेतसाम्॥ २८"},{"b":31583,"kind":"hindi_commentary","page":377,"verses":["10.39.29"],"text":"यस्यानुरागललितस्मितवल्गुमन्त्र-"},{"b":31584,"kind":"hindi_commentary","page":377,"verses":["10.39.29"],"text":"लीलावलोकपरिरम्भणरासगोष्ठ्याम्।"},{"b":31585,"kind":"hindi_commentary","page":377,"verses":["10.39.29"],"text":"नीताः स्म नः क्षणमिव क्षणदा विना तं"},{"b":31586,"kind":"hindi_translation","page":377,"verses":["10.39.29"],"text":"गोप्यः कथं न्वतितरेम तमो दुरन्तम्॥ २९"},{"b":31587,"kind":"hindi_commentary","page":377,"verses":["10.39.30"],"text":"योऽह्नः क्षये व्रजमनन्तसखः परीतो"},{"b":31588,"kind":"hindi_commentary","page":377,"verses":["10.39.30"],"text":"गोपैर्विशन् खुररजश्छुरितालकस्रक्।"},{"b":31589,"kind":"hindi_commentary","page":377,"verses":["10.39.30"],"text":"वेणुं क्वणन् स्मितकटाक्षनिरीक्षणेन"},{"b":31590,"kind":"hindi_commentary","page":377,"verses":["10.39.30"],"text":"चित्तं क्षिणोत्यमुमृते नु कथं भवेम॥ ३०"},{"b":31591,"kind":"hindi_translation","page":377,"explains":["10.39.26","10.39.27","10.39.28","10.39.29","10.39.30"],"text":"देखो सखी! यह अक्रूर कितना निठुर, कितना हृदयहीन है। इधर तो हम गोपियाँ इतनी दुःखित हो रही हैं और यह हमारे परम प्रियतम नन्ददुलारे श्यामसुन्दरको हमारी आँखोंसे ओझल करके बहुत दूर ले जाना चाहता है और दो बात कहकर हमें धीरज भी नहीं बँधाता, आश्‍वासन भी नहीं देता। सचमुच ऐसे अत्यन्त क्रूर पुरुषका ‘अक्रूर’ नाम नहीं होना चाहिये था॥ २६॥ सखी! हमारे ये श्यामसुन्दर भी तो कम निठुर नहीं हैं। देखो-देखो, वे भी रथपर बैठ गये। और मतवाले गोपगण छकड़ोंद्वारा उनके साथ जानेके लिये कितनी जल्दी मचा रहे हैं। सचमुच ये मूर्ख हैं। और हमारे बड़े-बूढ़े! उन्होंने तो इन लोगोंकी जल्दबाजी देखकर उपेक्षा कर दी है कि ‘जाओ जो मनमें आवे, करो!’ अब हम क्या करें? आज विधाता सर्वथा हमारे प्रतिकूल चेष्टा कर रहा है॥ २७॥ चलो, हम स्वयं ही चलकर अपने प्राणप्यारे श्यामसुन्दरको रोकेंगी; कुलके बड़े-बूढ़े और बन्धुजन हमारा क्या कर लेंगे? अरी सखी! हम आधे क्षणके लिये भी प्राणवल्लभ नन्दनन्दनका संग छोड़नेमें असमर्थ थीं। आज हमारे दुर्भाग्यने हमारे सामने उनका वियोग उपस्थित करके हमारे चित्तको विनष्ट एवं व्याकुल कर दिया है॥ २८॥ सखियो! जिनकी प्रेमभरी मनोहर मुसकान, रहस्यकी मीठी-मीठी बातें, विलासपूर्ण चितवन और प्रेमालिंगनसे हमने रासलीलाकी वे रात्रियाँ—जो बहुत विशाल थीं—एक क्षणके समान बिता दी थीं। अब भला, उनके बिना हम उन्हींकी दी हुई अपार विरहव्यथाका पार कैसे पावेंगी॥ २९॥ एक दिनकी नहीं, प्रतिदिनकी बात है, सायंकालमें प्रतिदिन वे ग्वालबालोंसे घिरे हुए बलरामजीके साथ वनसे गौएँ चराकर लौटते हैं। उनकी काली-काली घुँघराली अलकें और गलेके पुष्पहार गौओंके खुरकी रजसे ढके रहते हैं। वे बाँसुरी बजाते हुए अपनी मन्द-मन्द मुसकान और तिरछी चितवनसे देख-देखकर हमारे हृदयको बेध डालते हैं। उनके बिना भला, हम कैसे जी सकेंगी?॥ ३०॥"},{"b":31592,"kind":"topic_heading","page":378,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":31593,"kind":"sanskrit_shloka","page":378,"verses":["10.39.31"],"text":"एवं ब्रुवाणा विरहातुरा भृशं"},{"b":31594,"kind":"sanskrit_shloka","page":378,"verses":["10.39.31"],"text":"व्रजस्त्रियः कृष्णविषक्तमानसाः।"},{"b":31595,"kind":"sanskrit_shloka","page":378,"verses":["10.39.31"],"text":"विसृज्य लज्जां रुरुदुः स्म सुस्वरं"},{"b":31596,"kind":"sanskrit_shloka","page":378,"verses":["10.39.31"],"text":"गोविन्द दामोदर माधवेति॥ ३१"},{"b":31597,"kind":"sanskrit_shloka","page":378,"verses":["10.39.32"],"text":"स्त्रीणामेवं रुदन्तीनामुदिते सवितर्यथ।"},{"b":31598,"kind":"sanskrit_shloka","page":378,"verses":["10.39.32"],"text":"अक्रूरश्‍चोदयामास कृतमैत्रादिको रथम्॥ ३२"},{"b":31599,"kind":"sanskrit_shloka","page":378,"verses":["10.39.33"],"text":"गोपास्तमन्वसज्जन्त नन्दाद्याः शकटैस्ततः।"},{"b":31600,"kind":"sanskrit_shloka","page":378,"verses":["10.39.33"],"text":"आदायोपायनं भूरि कुम्भान् गोरससम्भृतान्॥ ३३"},{"b":31601,"kind":"sanskrit_shloka","page":378,"verses":["10.39.34"],"text":"गोप्यश्‍च दयितं कृष्णमनुव्रज्यानुरंजिताः।"},{"b":31602,"kind":"sanskrit_shloka","page":378,"verses":["10.39.34"],"text":"प्रत्यादेशं भगवतः कांक्षन्त्यश्‍चावतस्थिरे॥ ३४"},{"b":31603,"kind":"sanskrit_shloka","page":378,"verses":["10.39.35"],"text":"तास्तथा तप्यतीर्वीक्ष्य स्वप्रस्थाने यदूत्तमः।"},{"b":31604,"kind":"sanskrit_shloka","page":378,"verses":["10.39.35"],"text":"सान्त्वयामास सप्रेमैरायास्य इति दौत्यकैः॥ ३५"},{"b":31605,"kind":"sanskrit_shloka","page":378,"verses":["10.39.36"],"text":"यावदालक्ष्यते केतुर्यावद् रेणू रथस्य च।"},{"b":31606,"kind":"sanskrit_shloka","page":378,"verses":["10.39.36"],"text":"अनुप्रस्थापितात्मानो लेख्यानीवोपलक्षिताः॥ ३६"},{"b":31607,"kind":"sanskrit_shloka","page":378,"verses":["10.39.37"],"text":"ता निराशा निववृतुर्गोविन्दविनिवर्तने।"},{"b":31608,"kind":"sanskrit_shloka","page":378,"verses":["10.39.37"],"text":"विशोका अहनी निन्युर्गायन्त्यः प्रियचेष्टितम्॥ ३७"},{"b":31609,"kind":"hindi_commentary","page":378,"explains":["10.39.31","10.39.32","10.39.33","10.39.34","10.39.35","10.39.36","10.39.37"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! गोपियाँ वाणीसे तो इस प्रकार कह रही थीं; परन्तु उनका एक-एक मनोभाव भगवान् श्रीकृष्णका स्पर्श, उनका आलिंगन कर रहा था। वे विरहकी सम्भावनासे अत्यन्त व्याकुल हो गयीं और लाज छोड़कर ‘हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव!’—इस प्रकार ऊँची आवाजसे पुकार-पुकारकर सुललित स्वरसे रोने लगीं॥ ३१॥ गोपियाँ इस प्रकार रो रही थीं! रोते-रोते सारी रात बीत गयी, सूर्योदय हुआ। अक्रूरजी सन्ध्या-वन्दन आदि नित्य कर्मोंसे निवृत्त होकर रथपर सवार हुए और उसे हाँक ले चले॥ ३२॥ नन्दबाबा आदि गोपोंने भी दूध, दही, मक्खन, घी आदिसे भरे मटके और भेंटकी बहुत-सी सामग्रियाँ ले लीं तथा वे छकड़ोंपर चढ़कर उनके पीछे-पीछे चले॥ ३३॥ इसी समय अनुरागके रंगमें रँगी हुई गोपियाँ अपने प्राणप्यारे श्रीकृष्णके पास गयीं और उनकी चितवन, मुसकान आदि निरखकर कुछ-कुछ सुखी हुईं। अब वे अपने प्रियतम श्यामसुन्दरसे कुछ सन्देश पानेकी आकांक्षासे वहीं खड़ी हो गयीं॥ ३४॥ यदुवंशशिरोमणि भगवान् श्रीकृष्णने देखा कि मेरे मथुरा जानेसे गोपियोंके हृदयमें बड़ी जलन हो रही है, वे सन्तप्त हो रही हैं, तब उन्होंने दूतके द्वारा ‘मैं आऊँगा’ यह प्रेम-सन्देश भेजकर उन्हें धीरज बँधाया॥ ३५॥ गोपियोंको जबतक रथकी ध्वजा और पहियोंसे उड़ती हुई धूल दीखती रही तबतक उनके शरीर चित्रलिखित-से वहीं ज्यों-के-त्यों खड़े रहे। परन्तु उन्होंने अपना चित्त तो मनमोहन प्राणवल्लभ श्रीकृष्णके साथ ही भेज दिया था॥ ३६॥ अभी उनके मनमें आशा थी कि शायद श्रीकृष्ण कुछ दूर जाकर लौट आयें! परन्तु जब नहीं लौटे, तब वे निराश हो गयीं और अपने-अपने घर चली आयीं। परीक्षित्! वे रात-दिन अपने प्यारे श्यामसुन्दरकी लीलाओंका गान करती रहतीं और इस प्रकार अपने शोकसन्तापको हलका करतीं॥ ३७॥"},{"b":31610,"kind":"sanskrit_shloka","page":378,"verses":["10.39.38"],"text":"भगवानपि सम्प्राप्तो रामाक्रूरयुतो नृप।"},{"b":31611,"kind":"sanskrit_shloka","page":378,"verses":["10.39.38"],"text":"रथेन वायुवेगेन कालिन्दीमघनाशिनीम्॥ ३८"},{"b":31612,"kind":"sanskrit_shloka","page":379,"verses":["10.39.39"],"text":"तत्रोपस्पृश्य पानीयं पीत्वा मृष्टं मणिप्रभम्।"},{"b":31613,"kind":"sanskrit_shloka","page":379,"verses":["10.39.39"],"text":"वृक्षषण्डमुपव्रज्य सरामो रथमाविशत्॥ ३९"},{"b":31614,"kind":"sanskrit_shloka","page":379,"verses":["10.39.40"],"text":"अक्रूरस्तावुपामन्त्र्य निवेश्य च रथोपरि।"},{"b":31615,"kind":"sanskrit_shloka","page":379,"verses":["10.39.40"],"text":"कालिन्द्या ह्रदमागत्य स्नानं विधिवदाचरत्॥ ४०"},{"b":31616,"kind":"sanskrit_shloka","page":379,"verses":["10.39.41"],"text":"निमज्ज्य तस्मिन् सलिले जपन् ब्रह्म सनातनम्।"},{"b":31617,"kind":"sanskrit_shloka","page":379,"verses":["10.39.41"],"text":"तावेव ददृशेऽक्रूरो रामकृष्णौ समन्वितौ॥ ४१"},{"b":31618,"kind":"sanskrit_shloka","page":379,"verses":["10.39.42"],"text":"तौ रथस्थौ कथमिह सुतावानकदुन्दुभेः।"},{"b":31619,"kind":"sanskrit_shloka","page":379,"verses":["10.39.42"],"text":"तर्हि स्वित् स्यन्दने न स्त इत्युन्मज्ज्य व्यचष्ट सः॥ ४२"},{"b":31620,"kind":"sanskrit_shloka","page":379,"verses":["10.39.43"],"text":"तत्रापि च यथापूर्वमासीनौ पुनरेव सः।"},{"b":31621,"kind":"sanskrit_shloka","page":379,"verses":["10.39.43"],"text":"न्यमज्जद् दर्शनं यन्मे मृषा किं सलिले तयोः॥ ४३"},{"b":31622,"kind":"sanskrit_shloka","page":379,"verses":["10.39.44"],"text":"भूयस्तत्रापि सोऽद्राक्षीत् स्तूयमानमहीश्‍वरम्।"},{"b":31623,"kind":"hindi_commentary","page":379,"verses":["10.39.44"],"text":"सिद्धचारणगन्धर्वैरसुरैर्नतकन्धरैः ॥ ४४"},{"b":31624,"kind":"sanskrit_shloka","page":379,"verses":["10.39.45"],"text":"सहस्रशिरसं देवं सहस्रफणमौलिनम्।"},{"b":31625,"kind":"sanskrit_shloka","page":379,"verses":["10.39.45"],"text":"नीलाम्बरं बिसश्‍वेतं शृङ्गैः श्‍वेतमिव स्थितम्॥ ४५"},{"b":31626,"kind":"sanskrit_shloka","page":379,"verses":["10.39.46"],"text":"तस्योत्संगे घनश्यामं पीतकौशेयवाससम्।"},{"b":31627,"kind":"sanskrit_shloka","page":379,"verses":["10.39.46"],"text":"पुरुषं चतुर्भुजं शान्तं पद्मपत्रारुणेक्षणम्॥ ४६"},{"b":31628,"kind":"sanskrit_shloka","page":379,"verses":["10.39.47"],"text":"चारुप्रसन्‍नवदनं चारुहासनिरीक्षणम्।"},{"b":31629,"kind":"sanskrit_shloka","page":379,"verses":["10.39.47"],"text":"सुभ्रून्‍नसं चारुकर्णं सुकपोलारुणाधरम्॥ ४७"},{"b":31630,"kind":"sanskrit_shloka","page":380,"verses":["10.39.48"],"text":"प्रलम्बपीवरभुजं तुंगांसोरःस्थलश्रियम्।"},{"b":31631,"kind":"sanskrit_shloka","page":380,"verses":["10.39.48"],"text":"कम्बुकण्ठं निम्‍ननाभिं वलिमत्पल्लवोदरम्॥ ४८"},{"b":31632,"kind":"hindi_commentary","page":378,"explains":["10.39.38","10.39.39","10.39.40","10.39.41","10.39.42","10.39.43","10.39.44","10.39.45","10.39.46","10.39.47","10.39.48"],"text":"परीक्षित्! इधर भगवान् श्रीकृष्ण भी बलरामजी और अक्रूरजीके साथ वायुके समान वेगवाले रथपर सवार होकर पापनाशिनी यमुनाजीके किनारे जा पहुँचे॥ ३८॥ वहाँ उन लोगोंने हाथ-मुँह धोकर यमुनाजीका मरकतमणिके समान नीला और अमृतके समान मीठा जल पिया। इसके बाद बलरामजीके साथ भगवान् वृक्षोंके झुरमुटमें खड़े रथपर सवार हो गये॥ ३९॥ अक्रूरजीने दोनों भाइयोंको रथपर बैठाकर उनसे आज्ञा ली और यमुनाजीके कुण्ड (अनन्त—तीर्थ या ब्रह्मह्रद) पर आकर वे विधिपूर्वक स्नान करने लगे॥ ४०॥ उस कुण्डमें स्नान करनेके बाद वे जलमें डुबकी लगाकर गायत्रीका जप करने लगे। उसी समय जलके भीतर अक्रूरजीने देखा कि श्रीकृष्ण और बलराम दोनों भाई एक साथ ही बैठे हुए हैं॥ ४१॥ अब उनके मनमें यह शंका हुई कि ‘वसुदेवजीके पुत्रोंको तो मैं रथपर बैठा आया हूँ, अब वे यहाँ जलमें कैसे आ गये? जब यहाँ हैं तो शायद रथपर नहीं होंगे।’ ऐसा सोचकर उन्होंने सिर बाहर निकालकर देखा॥ ४२॥ वे उस रथपर भी पूर्ववत् बैठे हुए थे। उन्होंने यह सोचकर कि मैंने उन्हें जो जलमें देखा था, वह भ्रम ही रहा होगा, फिर डुबकी लगायी ॥ ४३॥ परन्तु फिर उन्होंने वहाँ भी देखा कि साक्षात् अनन्तदेव श्रीशेषजी विराजमान हैं और सिद्ध, चारण, गन्धर्व एवं असुर अपने-अपने सिर झुकाकर उनकी स्तुति कर रहे हैं॥ ४४॥ शेषजीके हजार सिर हैं और प्रत्येक फणपर मुकुट सुशोभित है। कमलनालके समान उज्ज्वल शरीरपर नीलाम्बर धारण किये हुए हैं और उनकी ऐसी शोभा हो रही है, मानो सहस्र शिखरोंसे युक्त श्‍वेतगिरि कैलास शोभायमान हो॥ ४५॥ अक्रूरजीने देखा कि शेषजीकी गोदमें श्याम मेघके समान घनश्याम विराजमान हो रहे हैं। वे रेशमी पीताम्बर पहने हुए हैं। बड़ी ही शान्त चतुर्भुज मूर्ति है और कमलके रक्तदलके समान रतनारे नेत्र हैं॥ ४६॥ उनका वदन बड़ा ही मनोहर और प्रसन्‍नताका सदन है। उनका मधुर हास्य और चारु चितवन चित्तको चुराये लेती है। भौंहें सुन्दर और नासिका तनिक ऊँची तथा बड़ी ही सुघड़ है। सुन्दर कान, कपोल और लाल-लाल अधरोंकी छटा निराली ही है॥ ४७॥ बाँहें घुटनोंतक लंबी और हृष्ट-पुष्ट हैं। कंधे ऊँचे और वक्षःस्थल लक्ष्मीजीका आश्रय-स्थान है। शंखके समान उतार-चढ़ाववाला सुडौल गला, गहरी नाभि और त्रिवलीयुक्त उदर पीपलके पत्तेके समान शोभायमान है॥ ४८॥"},{"b":31633,"kind":"sanskrit_shloka","page":380,"verses":["10.39.49"],"text":"बृहत्कटितटश्रोणिकरभोरुद्वयान्वितम्।"},{"b":31634,"kind":"sanskrit_shloka","page":380,"verses":["10.39.49"],"text":"चारुजानुयुगं चारुजंघायुगलसंयुतम्॥ ४९"},{"b":31635,"kind":"hindi_commentary","page":380,"verses":["10.39.50"],"text":"तुंगगुल्फारुणनखव्रातदीधितिभिर्वृतम् ।"},{"b":31636,"kind":"sanskrit_shloka","page":380,"verses":["10.39.50"],"text":"नवांगुल्यंगुष्ठदलैर्विलसत्पादपंकजम् ॥ ५०"},{"b":31637,"kind":"hindi_translation","page":380,"explains":["10.39.49","10.39.50"],"text":"स्थूल कटिप्रदेश और नितम्ब, हाथीकी सूँडके समान जाँघें, सुन्दर घुटने एवं पिंडलियाँ हैं। एड़ीके ऊपरकी गाँठें उभरी हुई हैं और लाल-लाल नखोंसे दिव्य ज्योतिर्मय किरणें फैल रही हैं। चरणकमलकी अंगुलियाँ और अंगूठे नयी और कोमल पँखुड़ियोंके समान सुशोभित हैं॥ ४९-५०॥"},{"b":31638,"kind":"sanskrit_shloka","page":380,"verses":["10.39.51"],"text":"सुमहार्हमणिव्रातकिरीटकटकांगदैः ।"},{"b":31639,"kind":"sanskrit_shloka","page":380,"verses":["10.39.51"],"text":"कटिसूत्रब्रह्मसूत्रहारनूपुरकुण्डलैः ॥ ५१"},{"b":31640,"kind":"sanskrit_shloka","page":380,"verses":["10.39.52"],"text":"भ्राजमानं पद्मकरं शंखचक्रगदाधरम्।"},{"b":31641,"kind":"sanskrit_shloka","page":380,"verses":["10.39.52"],"text":"श्रीवत्सवक्षसं भ्राजत्कौस्तुभं वनमालिनम्॥ ५२"},{"b":31642,"kind":"hindi_translation","page":380,"explains":["10.39.51","10.39.52"],"text":"अत्यन्त बहुमूल्य मणियोंसे जड़ा हुआ मुकुट, कड़े, बाजूबंद, करधनी, हार, नूपुर और कुण्डलोंसे तथा यज्ञोपवीतसे वह दिव्य मूर्ति अलंकृत हो रही है। एक हाथमें पद्म शोभा पा रहा है और शेष तीन हाथोंमें शंख, चक्र और गदा, वक्षःस्थलपर श्रीवत्सका चिह्न, गलेमें कौस्तुभमणि और वनमाला लटक रही है॥ ५१-५२॥"},{"b":31643,"kind":"sanskrit_shloka","page":380,"verses":["10.39.53"],"text":"सुनन्दनन्दप्रमुखैः पार्षदैः सनकादिभिः।"},{"b":31644,"kind":"sanskrit_shloka","page":380,"verses":["10.39.53"],"text":"सुरेशैर्ब्रह्मरुद्राद्यैर्नवभिश्‍च द्विजोत्तमैः॥ ५३"},{"b":31645,"kind":"sanskrit_shloka","page":380,"verses":["10.39.54"],"text":"प्रह्रादनारदवसुप्रमुखैर्भागवतोत्तमैः ।"},{"b":31646,"kind":"sanskrit_shloka","page":380,"verses":["10.39.54"],"text":"स्तूयमानं पृथग्भावैर्वचोभिरमलात्मभिः॥ ५४"},{"b":31647,"kind":"hindi_translation","page":380,"explains":["10.39.53","10.39.54"],"text":"नन्द-सुनन्द आदि पार्षद अपने ‘स्वामी’, सनकादि परमर्षि ‘परब्रह्म’, ब्रह्मा, महादेव आदि देवता ‘सर्वेश्‍वर’, मरीचि आदि नौ ब्राह्मण ‘प्रजापति’ और प्रह्लाद-नारद आदि भगवान्‌के परम प्रेमी भक्त तथा आठों वसु अपने परम प्रियतम ‘भगवान्’ समझकर भिन्‍न-भिन्‍न भावोंके अनुसार निर्दोष वेदवाणीसे भगवान्‌की स्तुति कर रहे हैं॥ ५३-५४॥"},{"b":31648,"kind":"sanskrit_shloka","page":380,"verses":["10.39.55"],"text":"श्रिया पुष्ट्या गिरा कान्त्या कीर्त्या तुष्ट्येलयोर्जया।"},{"b":31649,"kind":"sanskrit_shloka","page":380,"verses":["10.39.55"],"text":"विद्ययाविद्यया शक्त्या मायया च निषेवितम्॥ ५५"},{"b":31650,"kind":"hindi_translation","page":380,"explains":["10.39.55"],"text":"साथ ही लक्ष्मी, पुष्टि, सरस्वती, कान्ति, कीर्ति और तुष्टि (अर्थात् ऐश्‍वर्य, बल, ज्ञान, श्री, यश और वैराग्य—ये षडैश्‍वर्यरूप शक्तियाँ), इला (सन्धिनीरूप पृथ्वी-शक्ति), ऊर्जा (लीलाशक्ति), विद्या-अविद्या (जीवोंके मोक्ष और बन्धनमें कारणरूपा बहिरंग शक्ति), ह्लादिनी, संवित् (अन्तरंगा शक्ति) और माया आदि शक्तियाँ मूर्तिमान् होकर उनकी सेवा कर रही हैं॥ ५५॥"},{"b":31651,"kind":"sanskrit_shloka","page":381,"verses":["10.39.56"],"text":"विलोक्य सुभृशं प्रीतो भक्त्या परमया युतः।"},{"b":31652,"kind":"sanskrit_shloka","page":381,"verses":["10.39.56"],"text":"हृष्यत्तनूरुहो भावपरिक्लिन्‍नात्मलोचनः॥ ५६"},{"b":31653,"kind":"sanskrit_shloka","page":381,"verses":["10.39.57"],"text":"गिरा गद्गदयास्तौषीत् सत्त्वमालम्ब्य सात्वतः।"},{"b":31654,"kind":"sanskrit_shloka","page":381,"verses":["10.39.57"],"text":"प्रणम्य मूर्ध्नावहितः कृतांजलिपुटः शनैः॥ ५७"},{"b":31655,"kind":"hindi_translation","page":381,"explains":["10.39.56","10.39.57"],"text":"भगवान्‌की यह झाँकी निरखकर अक्रूरजीका हृदय परमानन्दसे लबालब भर गया। उन्हें परम भक्ति प्राप्त हो गयी। सारा शरीर हर्षावेशसे पुलकित हो गया। प्रेमभावका उद्रेक होनेसे उनके नेत्र आँसूसे भर गये॥ ५६॥ अब अक्रूरजीने अपना साहस बटोरकर भगवान्‌के चरणोंमें सिर रखकर प्रणाम किया और वे उसके बाद हाथ जोड़कर बड़ी सावधानीसे धीरे-धीरे गद्गद स्वरसे भगवान्‌की स्तुति करने लगे॥ ५७॥"},{"b":31656,"kind":"hindi_translation","page":381,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धेऽक्रूरप्रतियाने एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ३९॥"}],"notes":[{"id":"v2:285","mark":"१","page":375,"after_verse":"10.39.14","text":"संतापाः श्‍वास०।"},{"id":"v2:286","mark":"२","page":375,"after_verse":"10.39.14","text":"बन्‍धाश्‍च।"},{"id":"v2:287","mark":"३","page":375,"after_verse":"10.39.16","text":"तेक्षणाः।"},{"id":"v2:288","mark":"४","page":375,"after_verse":"10.39.18","text":"ताश्रयाः।"},{"id":"v2:289","mark":"१","page":379,"after_verse":"10.39.44","text":"सिद्धैर्भुजंगपतिभिरसु०।"},{"id":"v2:290","mark":"१","page":380,"after_verse":"10.39.50","text":"भिर्नृप।"},{"id":"v2:291","mark":"१","page":381,"after_verse":"10.39.56","text":"शान्तं।"},{"id":"v2:292","mark":"२","page":381,"after_verse":null,"text":"न्धेऽक्रूरप्रतियानं नामैकोन०।"}],"corrections":{"count":9,"list":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/shuddhi/"}}