{"id":"10.48","title":"दशम स्कन्ध · अध्याय 48","part":"दशम स्कन्ध (पूर्वार्ध)","heading":"अथाष्टचत्वारिंशोऽध्यायः","topics":["भगवान्‌का कुब्जा और अक्रूरजीके घर जाना"],"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/48/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 10.48.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/48/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[434,440]},"verses":[{"id":"10.48.1","number":1,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/48/1/","page":435,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अथ विज्ञाय भगवान् सर्वात्मा सर्वदर्शनः।","सैरन्ध्र्याः कामतप्तायाः प्रियमिच्छन् गृहं ययौ॥ १"],"iast":["atha vijñāya bhagavān sarvātmā sarvadarśanaḥ|","sairandhryāḥ kāmataptāyāḥ priyamicchan gṛhaṃ yayau|| 1"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! तदनन्तर सबके आत्मा तथा सब कुछ देखनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण अपनेसे मिलनकी आकांक्षा रखकर व्याकुल हुई कुब्जाका प्रिय करने—उसे सुख देनेकी इच्छासे उसके घर गये॥ १॥"},{"id":"10.48.2","number":2,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/48/2/","page":435,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["महार्होपस्करैराढ्यं कामोपायोपबृंहितम्।","मुक्तादामपताकाभिर्वितानशयनासनैः ।","धूपैः सुरभिभिर्दीपैः स्रग्गन्धैरपि मण्डितम्॥ २"],"iast":["mahārhopaskarairāḍhyaṃ kāmopāyopabṛṃhitam|","muktādāmapatākābhirvitānaśayanāsanaiḥ |","dhūpaiḥ surabhibhirdīpaiḥ sraggandhairapi maṇḍitam|| 2"],"meaning":"कुब्जाका घर बहुमूल्य सामग्रियोंसे सम्पन्‍न था। उसमें शृंगार-रसका उद्दीपन करनेवाली बहुत-सी साधन-सामग्री भी भरी हुई थी। मोतीकी झालरें और स्थान-स्थानपर झंडियाँ भी लगी हुई थीं। चँदोवे तने हुए थे। सेजें बिछायी हुई थीं और बैठनेके लिये बहुत सुन्दर-सुन्दर आसन लगाये हुए थे। धूपकी सुगन्ध फैल रही थी। दीपककी शिखाएँ जगमगा रही थीं। स्थान-स्थानपर फूलोंके हार और चन्दन रखे हुए थे॥ २॥"},{"id":"10.48.3","number":3,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/48/3/","page":435,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["गृहं तमायान्तमवेक्ष्य साऽऽसनात्","सद्यः समुत्थाय हि जातसम्भ्रमा।","यथोपसंगम्य सखीभिरच्युतं","सभाजयामास सदासनादिभिः॥ ३"],"iast":["gṛhaṃ tamāyāntamavekṣya sā''sanāt","sadyaḥ samutthāya hi jātasambhramā|","yathopasaṃgamya sakhībhiracyutaṃ","sabhājayāmāsa sadāsanādibhiḥ|| 3"],"meaning":"भगवान्‌को अपने घर आते देख कुब्जा तुरंत हड़बड़ाकर अपने आसनसे उठ खड़ी हुई और सखियोंके साथ आगे बढ़कर उसने विधिपूर्वक भगवान्‌का स्वागत-सत्कार किया। फिर श्रेष्ठ आसन आदि देकर विविध उपचारोंसे उनकी विधिपूर्वक पूजा की॥ ३॥"},{"id":"10.48.4","number":4,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/48/4/","page":435,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तथोद्धवः साधु तयाभिपूजितो","न्यषीददुर्व्यामभिमृश्य चासनम्।","कृष्णोऽपि तूर्णं शयनं महाधनं","विवेश लोकाचरितान्यनुव्रतः॥ ४"],"iast":["tathoddhavaḥ sādhu tayābhipūjito","nyaṣīdadurvyāmabhimṛśya cāsanam|","kṛṣṇo'pi tūrṇaṃ śayanaṃ mahādhanaṃ","viveśa lokācaritānyanuvrataḥ|| 4"],"meaning":"कुब्जाने भगवान्‌के परमभक्त उद्धवजीकी भी समुचित रीतिसे पूजा की; परन्तु वे उसके सम्मानके लिये उसका दिया हुआ आसन छूकर धरतीपर ही बैठ गये। (अपने स्वामीके सामने उन्होंने आसनपर बैठना उचित न समझा।) भगवान् श्रीकृष्ण सच्चिदानन्द-स्वरूप होनेपर भी लोकाचारका अनुकरण करते हुए तुरंत उसकी बहुमूल्य सेजपर जा बैठे॥ ४॥"},{"id":"10.48.5","number":5,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/48/5/","page":435,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सा मज्जनालेपदुकूलभूषण-","स्रग्गन्धताम्बूलसुधासवादिभिः ।","प्रसाधितात्मोपससार माधवं","सव्रीडलीलोत्स्मितविभ्रमेक्षितैः ॥ ५"],"iast":["sā majjanālepadukūlabhūṣaṇa-","sraggandhatāmbūlasudhāsavādibhiḥ |","prasādhitātmopasasāra mādhavaṃ","savrīḍalīlotsmitavibhramekṣitaiḥ || 5"],"meaning":"तब कुब्जा स्नान, अंगराग, वस्त्र, आभूषण, हार, गन्ध (इत्र आदि), ताम्बूल और सुधासव आदिसे अपनेको खूब सजाकर लीलामयी लजीली मुसकान तथा हाव-भावके साथ भगवान्‌की ओर देखती हुई उनके पास आयी॥ ५॥"},{"id":"10.48.6","number":6,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/48/6/","page":435,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["आहूय कान्तां नवसंगमह्रिया","विशंकितां कंकणभूषिते करे।","प्रगृह्य शय्यामधिवेश्य रामया","रेमेऽनुलेपार्पणपुण्यलेशया ॥ ६"],"iast":["āhūya kāntāṃ navasaṃgamahriyā","viśaṃkitāṃ kaṃkaṇabhūṣite kare|","pragṛhya śayyāmadhiveśya rāmayā","reme'nulepārpaṇapuṇyaleśayā || 6"],"meaning":"कुब्जा नवीन मिलनके संकोचसे कुछ झिझक रही थी। तब श्यामसुन्दर श्रीकृष्णने उसे अपने पास बुला लिया और उसकी कंकणसे सुशोभित कलाई पकड़कर अपने पास बैठा लिया और उसके साथ क्रीडा करने लगे। परीक्षित्! कुब्जाने इस जन्ममें केवल भगवान्‌को अंगराग अर्पित किया था, उसी एक शुभकर्मके फलस्वरूप उसे ऐसा अनुपम अवसर मिला॥ ६॥"},{"id":"10.48.7","number":7,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/48/7/","page":436,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सानंगतप्तकुचयोरुरसस्तथाक्ष्णो-","र्जिघ्रन्त्यनन्तचरणेन रुजो मृजन्ती।","दोर्भ्यां स्तनान्तरगतं परिरभ्य कान्त-","मानन्दमूर्तिमजहादतिदीर्घतापम्॥ ७"],"iast":["sānaṃgataptakucayorurasastathākṣṇo-","rjighrantyanantacaraṇena rujo mṛjantī|","dorbhyāṃ stanāntaragataṃ parirabhya kānta-","mānandamūrtimajahādatidīrghatāpam|| 7"],"meaning":"कुब्जा भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंको अपने काम-संतप्त हृदय, वक्षःस्थल और नेत्रोंपर रखकर उनकी दिव्य सुगन्ध लेने लगी और इस प्रकार उसने अपने हृदयकी सारी आधि-व्याधि शान्त कर ली। वक्षःस्थलसे सटे हुए आनन्दमूर्ति प्रियतम श्यामसुन्दरका अपनी दोनों भुजाओंसे गाढ़ आलिंगन करके कुब्जाने दीर्घकालसे बढ़े हुए विरहतापको शान्त किया॥ ७॥"},{"id":"10.48.8","number":8,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/48/8/","page":436,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सैवं कैवल्यनाथं तं प्राप्य दुष्प्रापमीश्‍वरम्।","अंगरागार्पणेनाहो दुर्भगेदमयाचत॥ ८"],"iast":["saivaṃ kaivalyanāthaṃ taṃ prāpya duṣprāpamīśvaram|","aṃgarāgārpaṇenāho durbhagedamayācata|| 8"],"meaning":"परीक्षित्! कुब्जाने केवल अंगराग समर्पित किया था। उतनेसे ही उसे उन सर्वशक्तिमान् भगवान्‌की प्राप्ति हुई, जो कैवल्यमोक्षके अधीश्‍वर हैं और जिनकी प्राप्ति अत्यन्त कठिन है। परन्तु उस दुर्भगाने उन्हें प्राप्त करके भी व्रजगोपियोंकी भाँति सेवा न माँगकर यही माँगा—॥ ८॥"},{"id":"10.48.9","number":9,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/48/9/","page":436,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["आहोष्यतामिह प्रेष्ठ दिनानि कतिचिन्मया।","रमस्व नोत्सहे त्यक्तुं संगं तेऽम्बुरुहेक्षण॥ ९"],"iast":["āhoṣyatāmiha preṣṭha dināni katicinmayā|","ramasva notsahe tyaktuṃ saṃgaṃ te'mburuhekṣaṇa|| 9"],"meaning":"‘प्रियतम! आप कुछ दिन यहीं रहकर मेरे साथ क्रीडा कीजिये। क्योंकि हे कमलनयन! मुझसे आपका साथ नहीं छोड़ा जाता’॥ ९॥"},{"id":"10.48.10","number":10,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/48/10/","page":436,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तस्यै कामवरं दत्त्वा मानयित्वा च मानदः।","सहोद्धवेन सर्वेशः स्वधामागमदर्चितम्॥ १०"],"iast":["tasyai kāmavaraṃ dattvā mānayitvā ca mānadaḥ|","sahoddhavena sarveśaḥ svadhāmāgamadarcitam|| 10"],"meaning":"परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण सबका मान रखनेवाले और सर्वेश्‍वर हैं। उन्होंने अभीष्ट वर देकर उसकी पूजा स्वीकार की और फिर अपने प्यारे भक्त उद्धवजीके साथ अपने सर्वसम्मानित घरपर लौट आये॥ १०॥"},{"id":"10.48.11","number":11,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/48/11/","page":436,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["दुराराध्यं समाराध्य विष्णुं सर्वेश्‍वरेश्‍वरम्।","यो वृणीते मनोग्राह्यमसत्त्वात् कुमनीष्यसौ॥ ११"],"iast":["durārādhyaṃ samārādhya viṣṇuṃ sarveśvareśvaram|","yo vṛṇīte manogrāhyamasattvāt kumanīṣyasau|| 11"],"meaning":"परीक्षित्! भगवान् ब्रह्मा आदि समस्त ईश्‍वरोंके भी ईश्‍वर हैं। उनको प्रसन्‍न कर लेना भी जीवके लिये बहुत ही कठिन है। जो कोई उन्हें प्रसन्‍न करके उनसे विषय-सुख माँगता है, वह निश्‍चय ही दुर्बुद्धि है; क्योंकि वास्तवमें विषय-सुख अत्यन्त तुच्छ—नहींके बराबर है॥ ११॥"},{"id":"10.48.12","number":12,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/48/12/","page":436,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अक्रूरभवनं कृष्णः सहरामोद्धवः प्रभुः।","किंचिच्चिकीर्षयन् प्रागादक्रूरप्रियकाम्यया॥ १२"],"iast":["akrūrabhavanaṃ kṛṣṇaḥ saharāmoddhavaḥ prabhuḥ|","kiṃciccikīrṣayan prāgādakrūrapriyakāmyayā|| 12"],"meaning":"तदनन्तर एक दिन सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीकृष्ण बलरामजी और उद्धवजीके साथ अक्रूरजीकी अभिलाषा पूर्ण करने और उनसे कुछ काम लेनेके लिये उनके घर गये॥ १२॥"},{"id":"10.48.13","number":13,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/48/13/","page":436,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स तान् नरवरश्रेष्ठानाराद् वीक्ष्य स्वबान्धवान्।","प्रत्युत्थाय प्रमुदितः परिष्वज्याभ्यनन्दत॥ १३"],"iast":["sa tān naravaraśreṣṭhānārād vīkṣya svabāndhavān|","pratyutthāya pramuditaḥ pariṣvajyābhyanandata|| 13"],"meaning":"अक्रूरजीने दूरसे ही देख लिया कि हमारे परम बन्धु मनुष्यलोकशिरोमणि भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी आदि पधार रहे हैं। वे तुरंत उठकर आगे गये तथा आनन्दसे भरकर उनका अभिनन्दन और आलिंगन किया॥ १३॥"},{"id":"10.48.14","number":14,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/48/14/","page":437,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ननाम कृष्णं रामं च स तैरप्यभिवादितः।","पूजयामास विधिवत् कृतासनपरिग्रहान्॥ १४"],"iast":["nanāma kṛṣṇaṃ rāmaṃ ca sa tairapyabhivāditaḥ|","pūjayāmāsa vidhivat kṛtāsanaparigrahān|| 14"],"meaning":"अक्रूरजीने भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीको नमस्कार किया तथा उद्धवजीके साथ उन दोनों भाइयोंने भी उन्हें नमस्कार किया। जब सब लोग आरामसे आसनोंपर बैठ गये, तब अक्रूरजी उन लोगोंकी विधिवत् पूजा करने लगे॥ १४॥"},{"id":"10.48.15","number":15,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/48/15/","page":437,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["पादावनेजनीरापो धारयञ्छिरसा नृप।","अर्हणेनाम्बरैर्दिव्यैर्गन्धस्रग्भूषणोत्तमैः॥ १५"],"iast":["pādāvanejanīrāpo dhārayañchirasā nṛpa|","arhaṇenāmbarairdivyairgandhasragbhūṣaṇottamaiḥ|| 15"],"meaning":"परीक्षित्! उन्होंने पहले भगवान्‌के चरण धोकर चरणोदक सिरपर धारण किया और फिर अनेकों प्रकारकी पूजा-सामग्री, दिव्य वस्त्र, गन्ध, माला और श्रेष्ठ आभूषणोंसे उनका पूजन किया, सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम किया और उनके चरणोंको अपनी गोदमें लेकर दबाने लगे। उसी समय उन्होंने विनयावनत होकर भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीसे कहा—॥ १५-१६॥","meaning_covers":[15,16]},{"id":"10.48.16","number":16,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/48/16/","page":437,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अर्चित्वा शिरसाऽऽनम्य पादावंकगतौ मृजन्।","प्रश्रयावनतोऽक्रूरः कृष्णरामावभाषत॥ १६"],"iast":["arcitvā śirasā''namya pādāvaṃkagatau mṛjan|","praśrayāvanato'krūraḥ kṛṣṇarāmāvabhāṣata|| 16"],"meaning":"परीक्षित्! उन्होंने पहले भगवान्‌के चरण धोकर चरणोदक सिरपर धारण किया और फिर अनेकों प्रकारकी पूजा-सामग्री, दिव्य वस्त्र, गन्ध, माला और श्रेष्ठ आभूषणोंसे उनका पूजन किया, सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम किया और उनके चरणोंको अपनी गोदमें लेकर दबाने लगे। उसी समय उन्होंने विनयावनत होकर भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीसे कहा—॥ १५-१६॥","meaning_covers":[15,16]},{"id":"10.48.17","number":17,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/48/17/","page":437,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["दिष्ट्या पापो हतः कंसः सानुगो वामिदं कुलम्।","भवद‍्भ्यामुद‍्धृतं कृच्छ्राद् दुरन्ताच्च समेधितम्॥ १७"],"iast":["diṣṭyā pāpo hataḥ kaṃsaḥ sānugo vāmidaṃ kulam|","bhavadbhyāmuddhṛtaṃ kṛcchrād durantācca samedhitam|| 17"],"meaning":"‘भगवन्! यह बड़े ही आनन्द और सौभाग्यकी बात है कि पापी कंस अपने अनुयायियोंके साथ मारा गया। उसे मारकर आप दोनोंने युदवंशको बहुत बड़े संकटसे बचा लिया है तथा उन्‍नत और समृद्ध किया है॥ १७॥"},{"id":"10.48.18","number":18,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/48/18/","page":437,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["युवां प्रधानपुरुषौ जगद्धेतू जगन्मयौ।","भवद‍्भ्यां न विना किंचित् परमस्ति न चापरम्॥ १८"],"iast":["yuvāṃ pradhānapuruṣau jagaddhetū jaganmayau|","bhavadbhyāṃ na vinā kiṃcit paramasti na cāparam|| 18"],"meaning":"आप दोनों जगत‍्के कारण और जगद्रूप, आदिपुरुष हैं। आपके अतिरिक्त और कोई वस्तु नहीं है, न कारण और न तो कार्य॥ १८॥"},{"id":"10.48.19","number":19,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/48/19/","page":437,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["आत्मसृष्टमिदं विश्‍वमन्वाविश्य स्वशक्तिभिः।","ईयते बहुधा ब्रह्मन् श्रुतप्रत्यक्षगोचरम्॥ १९"],"iast":["ātmasṛṣṭamidaṃ viśvamanvāviśya svaśaktibhiḥ|","īyate bahudhā brahman śrutapratyakṣagocaram|| 19"],"meaning":"परमात्मन्! आपने ही अपनी शक्तिसे इसकी रचना की है और आप ही अपनी काल, माया आदि शक्तियोंसे इसमें प्रविष्ट होकर जितनी भी वस्तुएँ देखी और सुनी जाती हैं, उनके रूपमें प्रतीत हो रहे हैं॥ १९॥"},{"id":"10.48.20","number":20,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/48/20/","page":437,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यथा हि भूतेषु चराचरेषु","मह्यादयो योनिषु भान्ति नाना।","एवं भवान् केवल आत्मयोनि-","ष्वात्माऽऽत्मतन्त्रो बहुधा विभाति॥ २०"],"iast":["yathā hi bhūteṣu carācareṣu","mahyādayo yoniṣu bhānti nānā|","evaṃ bhavān kevala ātmayoni-","ṣvātmā''tmatantro bahudhā vibhāti|| 20"],"meaning":"जैसे पृथ्वी आदि कारणतत्त्वोंसे ही उनके कार्य स्थावर-जंगम शरीर बनते हैं; वे उनमें अनुप्रविष्ट-से होकर अनेक रूपोंमें प्रतीत होते हैं, परन्तु वास्तवमें वे कारणरूप ही हैं। इसी प्रकार हैं तो केवल आप ही, परन्तु अपने कार्यरूप जगत‍्में स्वेच्छासे अनेक रूपोंमें प्रतीत होते हैं। यह भी आपकी एक लीला ही है॥ २०॥"},{"id":"10.48.21","number":21,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/48/21/","page":437,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सृजस्यथो लुम्पसि पासि विश्‍वं","रजस्तमःसत्त्वगुणैः स्वशक्तिभिः।","न बध्यसे तद्गुणकर्मभिर्वा","ज्ञानात्मनस्ते क्व च बन्धहेतुः॥ २१"],"iast":["sṛjasyatho lumpasi pāsi viśvaṃ","rajastamaḥsattvaguṇaiḥ svaśaktibhiḥ|","na badhyase tadguṇakarmabhirvā","jñānātmanaste kva ca bandhahetuḥ|| 21"],"meaning":"प्रभो! आप रजोगुण, सत्त्वगुण और तमोगुणरूप अपनी शक्तियोंसे क्रमशः जगत‍्की रचना, पालन और संहार करते हैं; किन्तु आप उन गुणोंसे अथवा उनके द्वारा होनेवाले कर्मोंसे बन्धनमें नहीं पड़ते, क्योंकि आप शुद्ध ज्ञानस्वरूप हैं। ऐसी स्थितिमें आपके लिये बन्धनका कारण ही क्या हो सकता है?॥ २१॥"},{"id":"10.48.22","number":22,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/48/22/","page":438,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["देहाद्युपाधेरनिरूपितत्वाद्","भवो न साक्षान्‍न भिदाऽऽत्मनः स्यात्।","अतो न बन्धस्तव नैव मोक्षः","स्यातां निकामस्त्वयि नोऽविवेकः॥ २२"],"iast":["dehādyupādheranirūpitatvād","bhavo na sākṣānna bhidā''tmanaḥ syāt|","ato na bandhastava naiva mokṣaḥ","syātāṃ nikāmastvayi no'vivekaḥ|| 22"],"meaning":"प्रभो! स्वयं आत्मवस्तुमें स्थूलदेह, सूक्ष्मदेह आदि उपाधियाँ न होनेके कारण न तो उसमें जन्म-मृत्यु है और न किसी प्रकारका भेदभाव। यही कारण है कि न आपमें बन्धन है और न मोक्ष! आपमें अपने-अपने अभिप्रायके अनुसार बन्धन या मोक्षकी जो कुछ कल्पना होती है, उसका कारण केवल हमारा अविवेक ही है॥ २२॥"},{"id":"10.48.23","number":23,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/48/23/","page":438,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["त्वयोदितोऽयं जगतो हिताय","यदा यदा वेदपथः पुराणः।","बाध्येत पाखण्डपथैरसद्भि-","स्तदा भवान् सत्त्वगुणं बिभर्ति॥ २३"],"iast":["tvayodito'yaṃ jagato hitāya","yadā yadā vedapathaḥ purāṇaḥ|","bādhyeta pākhaṇḍapathairasadbhi-","stadā bhavān sattvaguṇaṃ bibharti|| 23"],"meaning":"आपने जगत‍्के कल्याणके लिये यह सनातन वेदमार्ग प्रकट किया है। जब-जब इसे पाखण्ड-पथसे चलनेवाले दुष्टोंके द्वारा क्षति पहुँचती है, तब-तब आप शुद्ध सत्त्वमय शरीर ग्रहण करते हैं॥ २३॥"},{"id":"10.48.24","number":24,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/48/24/","page":438,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स त्वं प्रभोऽद्य वसुदेवगृहेऽवतीर्णः","स्वांशेन भारमपनेतुमिहासि भूमेः।","अक्षौहिणीशतवधेन सुरेतरांश-","राज्ञाममुष्य च कुलस्य यशो वितन्वन्॥ २४"],"iast":["sa tvaṃ prabho'dya vasudevagṛhe'vatīrṇaḥ","svāṃśena bhāramapanetumihāsi bhūmeḥ|","akṣauhiṇīśatavadhena suretarāṃśa-","rājñāmamuṣya ca kulasya yaśo vitanvan|| 24"],"meaning":"प्रभो! वही आप इस समय अपने अंश श्रीबलरामजीके साथ पृथ्वीका भार दूर करनेके लिये यहाँ वसुदेवजीके घर अवतीर्ण हुए हैं। आप असुरोंके अंशसे उत्पन्‍न नाममात्रके शासकोंकी सौ-सौ अक्षौहिणी सेनाका संहार करेंगे और यदुवंशके यशका विस्तार करेंगे॥ २४॥"},{"id":"10.48.25","number":25,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/48/25/","page":438,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अद्येश नो वसतयः खलु भूरिभागा","यः सर्वदेवपितृभूतनृदेवमूर्तिः।","यत्पादशौचसलिलं त्रिजगत् पुनाति","स त्वं जगद्गुरुरधोक्षज याः प्रविष्टः॥ २५"],"iast":["adyeśa no vasatayaḥ khalu bhūribhāgā","yaḥ sarvadevapitṛbhūtanṛdevamūrtiḥ|","yatpādaśaucasalilaṃ trijagat punāti","sa tvaṃ jagadgururadhokṣaja yāḥ praviṣṭaḥ|| 25"],"meaning":"इन्द्रियातीत परमात्मन्! सारे देवता, पितर, भूतगण और राजा आपकी मूर्ति हैं। आपके चरणोंकी धोवन गंगाजी तीनों लोकोंको पवित्र करती हैं। आप सारे जगत‍्के एकमात्र पिता और शिक्षक हैं। वही आज आप हमारे घर पधारे। इसमें सन्देह नहीं कि आज हमारे घर धन्य-धन्य हो गये। उनके सौभाग्यकी सीमा न रही॥ २५॥"},{"id":"10.48.26","number":26,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/48/26/","page":438,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कः पण्डितस्त्वदपरं शरणं समीयाद्","भक्तप्रियादृतगिरः सुहृदः कृतज्ञात्।","सर्वान् ददाति सुहृदो भजतोऽभिकामा-","नात्मानमप्युपचयापचयौ न यस्य॥ २६"],"iast":["kaḥ paṇḍitastvadaparaṃ śaraṇaṃ samīyād","bhaktapriyādṛtagiraḥ suhṛdaḥ kṛtajñāt|","sarvān dadāti suhṛdo bhajato'bhikāmā-","nātmānamapyupacayāpacayau na yasya|| 26"],"meaning":"प्रभो! आप प्रेमी भक्तोंके परम प्रियतम, सत्यवक्ता, अकारण हितू और कृतज्ञ हैं—जरा-सी सेवाको भी मान लेते हैं। भला, ऐसा कौन बुद्धिमान् पुरुष है जो आपको छोड़कर किसी दूसरेकी शरणमें जायगा? आप अपना भजन करनेवाले प्रेमी भक्तकी समस्त अभिलाषाएँ पूर्ण कर देते हैं। यहाँतक कि जिसकी कभी क्षति और वृद्धि नहीं होती—जो एकरस है, अपने उस आत्माका भी आप दान कर देते हैं॥ २६॥"},{"id":"10.48.27","number":27,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/48/27/","page":438,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["दिष्ट्या जनार्दन भवानिह नः प्रतीतो","योगेश्‍वरैरपि दुरापगतिः सुरेशैः।","छिन्ध्याशु नः सुतकलत्रधनाप्तगेह-","देहादिमोहरशनां भवदीयमायाम्॥ २७"],"iast":["diṣṭyā janārdana bhavāniha naḥ pratīto","yogeśvarairapi durāpagatiḥ sureśaiḥ|","chindhyāśu naḥ sutakalatradhanāptageha-","dehādimoharaśanāṃ bhavadīyamāyām|| 27"],"meaning":"भक्तोंके कष्ट मिटानेवाले और जन्म-मृत्युके बन्धनसे छुड़ानेवाले प्रभो! बड़े-बड़े योगिराज और देवराज भी आपके स्वरूपको नहीं जान सकते। परन्तु हमें आपका साक्षात् दर्शन हो गया, यह कितने सौभाग्यकी बात है। प्रभो! हम स्त्री, पुत्र, धन, स्वजन, गेह और देह आदिके मोहकी रस्सीसे बँधे हुए हैं। अवश्य ही यह आपकी मायाका खेल है। आप कृपा करके इस गाढ़े बन्धनको शीघ्र काट दीजिये’॥ २७॥"},{"id":"10.48.28","number":28,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/48/28/","page":439,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इत्यर्चितः संस्तुतश्‍च भक्तेन भगवान् हरिः।","अक्रूरं सस्मितं प्राह गीर्भिः सम्मोहयन्‍निव॥ २८"],"iast":["ityarcitaḥ saṃstutaśca bhaktena bhagavān hariḥ|","akrūraṃ sasmitaṃ prāha gīrbhiḥ sammohayanniva|| 28"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! इस प्रकार भक्त अक्रूरजीने भगवान् श्रीकृष्णकी पूजा और स्तुति की। इसके बाद भगवान् श्रीकृष्णने मुसकराकर अपनी मधुर वाणीसे उन्हें मानो मोहित करते हुए कहा॥ २८॥"},{"id":"10.48.29","number":29,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/48/29/","page":439,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["त्वं नो गुरुः पितृव्यश्‍च श्‍लाघ्यो बन्धुश्‍च नित्यदा।","वयं तु रक्ष्याः पोष्याश्‍च अनुकम्प्याः प्रजा हि वः॥ २९"],"iast":["tvaṃ no guruḥ pitṛvyaśca ślāghyo bandhuśca nityadā|","vayaṃ tu rakṣyāḥ poṣyāśca anukampyāḥ prajā hi vaḥ|| 29"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्णने कहा—‘तात! आप हमारे गुरु—हितोपदेशक और चाचा हैं। हमारे वंशमें अत्यन्त प्रशंसनीय तथा हमारे सदाके हितैषी हैं। हम तो आपके बालक हैं और सदा ही आपकी रक्षा, पालन और कृपाके पात्र हैं॥ २९॥"},{"id":"10.48.30","number":30,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/48/30/","page":439,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["भवद्विधा महाभागा निषेव्या अर्हसत्तमाः।","श्रेयस्कामैर्नृभिर्नित्यं देवाः स्वार्था न साधवः॥ ३०"],"iast":["bhavadvidhā mahābhāgā niṣevyā arhasattamāḥ|","śreyaskāmairnṛbhirnityaṃ devāḥ svārthā na sādhavaḥ|| 30"],"meaning":"अपना परम कल्याण चाहनेवाले मनुष्योंको आप-जैसे परम पूजनीय और महाभाग्यवान् संतोंकी सर्वदा सेवा करनी चाहिये। आप-जैसे संत देवताओंसे भी बढ़कर हैं; क्योंकि देवताओंमें तो स्वार्थ रहता है, परन्तु संतोंमें नहीं॥ ३०॥"},{"id":"10.48.31","number":31,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/48/31/","page":439,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["न ह्यम्मयानि तीर्थानि न देवा मृच्छिलामयाः।","ते पुनन्त्युरुकालेन दर्शनादेव साधवः॥ ३१"],"iast":["na hyammayāni tīrthāni na devā mṛcchilāmayāḥ|","te punantyurukālena darśanādeva sādhavaḥ|| 31"],"meaning":"केवल जलके तीर्थ (नदी, सरोवर आदि) ही तीर्थ नहीं हैं, केवल मृत्तिका और शिला आदिकी बनी हुई मूर्तियाँ ही देवता नहीं हैं। चाचाजी! उनकी तो बहुत दिनोंतक श्रद्धासे सेवा की जाय, तब वे पवित्र करते हैं। परन्तु संतपुरुष तो अपने दर्शनमात्रसे पवित्र कर देते हैं॥ ३१॥"},{"id":"10.48.32","number":32,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/48/32/","page":439,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["स भवान् सुहृदां वै नः श्रेयाञ्छ्रेयश्‍चिकीर्षया।","जिज्ञासार्थं पाण्डवानां गच्छस्व त्वं गजाह्वयम्॥ ३२"],"iast":["sa bhavān suhṛdāṃ vai naḥ śreyāñchreyaścikīrṣayā|","jijñāsārthaṃ pāṇḍavānāṃ gacchasva tvaṃ gajāhvayam|| 32"],"meaning":"चाचाजी! आप हमारे हितैषी सुहृदोंमें सर्वश्रेष्ठ हैं। इसलिये आप पाण्डवोंका हित करनेके लिये तथा उनका कुशल-मंगल जाननेके लिये हस्तिनापुर जाइये॥ ३२॥"},{"id":"10.48.33","number":33,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/48/33/","page":439,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["पितर्युपरते बालाः सह मात्रा सुदुःखिताः।","आनीताः स्वपुरं राज्ञा वसन्त इति शुश्रुम॥ ३३"],"iast":["pitaryuparate bālāḥ saha mātrā suduḥkhitāḥ|","ānītāḥ svapuraṃ rājñā vasanta iti śuśruma|| 33"],"meaning":"हमने ऐसा सुना है कि राजा पाण्डुके मर जानेपर अपनी माता कुन्तीके साथ युधिष्ठिर आदि पाण्डव बड़े दुःखमें पड़ गये थे। अब राजा धृतराष्ट्र उन्हें अपनी राजधानी हस्तिनापुरमें ले आये हैं और वे वहीं रहते हैं॥ ३३॥"},{"id":"10.48.34","number":34,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/48/34/","page":439,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["तेषु राजाम्बिकापुत्रो भ्रातृपुत्रेषु दीनधीः।","समो न वर्तते नूनं दुष्पुत्रवशगोऽन्धदृक्॥ ३४"],"iast":["teṣu rājāmbikāputro bhrātṛputreṣu dīnadhīḥ|","samo na vartate nūnaṃ duṣputravaśago'ndhadṛk|| 34"],"meaning":"आप जानते ही हैं कि राजा धृतराष्ट्र एक तो अंधे हैं और दूसरे उनमें मनोबलकी भी कमी है। उनका पुत्र दुर्योधन बहुत दुष्ट है और उसके अधीन होनेके कारण वे पाण्डवोंके साथ अपने पुत्रों-जैसा—समान व्यवहार नहीं कर पाते॥ ३४॥"},{"id":"10.48.35","number":35,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/48/35/","page":440,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["गच्छ जानीहि तद‍्वृत्तमधुना साध्वसाधु वा।","विज्ञाय तद् विधास्यामो यथा शं सुहृदां भवेत्॥ ३५"],"iast":["gaccha jānīhi tadvṛttamadhunā sādhvasādhu vā|","vijñāya tad vidhāsyāmo yathā śaṃ suhṛdāṃ bhavet|| 35"],"meaning":"इसलिये आप वहाँ जाइये और मालूम कीजिये कि उनकी स्थिति अच्छी है या बुरी। आपके द्वारा उनका समाचार जानकर मैं ऐसा उपाय करूँगा, जिससे उन सुहृदोंको सुख मिले’॥ ३५॥"},{"id":"10.48.36","number":36,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/48/36/","page":440,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["इत्यक्रूरं समादिश्य भगवान् हरिरीश्‍वरः।","संकर्षणोद्धवाभ्यां वै ततः स्वभवनं ययौ॥ ३६"],"iast":["ityakrūraṃ samādiśya bhagavān harirīśvaraḥ|","saṃkarṣaṇoddhavābhyāṃ vai tataḥ svabhavanaṃ yayau|| 36"],"meaning":"सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीकृष्ण अक्रूरजीको इस प्रकार आदेश देकर बलरामजी और उद्धवजीके साथ वहाँसे अपने घर लौट आये॥ ३६॥"}],"text":[{"b":32737,"kind":"adhyaya_heading","page":435,"text":"अथाष्टचत्वारिंशोऽध्यायः"},{"b":32738,"kind":"topic_heading","page":435,"text":"भगवान्‌का कुब्जा और अक्रूरजीके घर जाना"},{"b":32739,"kind":"topic_heading","page":434,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":32740,"kind":"sanskrit_shloka","page":435,"verses":["10.48.1"],"text":"अथ विज्ञाय भगवान् सर्वात्मा सर्वदर्शनः।"},{"b":32741,"kind":"sanskrit_shloka","page":435,"verses":["10.48.1"],"text":"सैरन्ध्र्याः कामतप्तायाः प्रियमिच्छन् गृहं ययौ॥ १"},{"b":32742,"kind":"sanskrit_shloka","page":435,"verses":["10.48.2"],"text":"महार्होपस्करैराढ्यं कामोपायोपबृंहितम्।"},{"b":32743,"kind":"sanskrit_shloka","page":435,"verses":["10.48.2"],"text":"मुक्तादामपताकाभिर्वितानशयनासनैः ।"},{"b":32744,"kind":"sanskrit_shloka","page":435,"verses":["10.48.2"],"text":"धूपैः सुरभिभिर्दीपैः स्रग्गन्धैरपि मण्डितम्॥ २"},{"b":32745,"kind":"sanskrit_shloka","page":435,"verses":["10.48.3"],"text":"गृहं तमायान्तमवेक्ष्य साऽऽसनात्"},{"b":32746,"kind":"sanskrit_shloka","page":435,"verses":["10.48.3"],"text":"सद्यः समुत्थाय हि जातसम्भ्रमा।"},{"b":32747,"kind":"sanskrit_shloka","page":435,"verses":["10.48.3"],"text":"यथोपसंगम्य सखीभिरच्युतं"},{"b":32748,"kind":"sanskrit_shloka","page":435,"verses":["10.48.3"],"text":"सभाजयामास सदासनादिभिः॥ ३"},{"b":32749,"kind":"sanskrit_shloka","page":435,"verses":["10.48.4"],"text":"तथोद्धवः साधु तयाभिपूजितो"},{"b":32750,"kind":"sanskrit_shloka","page":435,"verses":["10.48.4"],"text":"न्यषीददुर्व्यामभिमृश्य चासनम्।"},{"b":32751,"kind":"sanskrit_shloka","page":435,"verses":["10.48.4"],"text":"कृष्णोऽपि तूर्णं शयनं महाधनं"},{"b":32752,"kind":"sanskrit_shloka","page":435,"verses":["10.48.4"],"text":"विवेश लोकाचरितान्यनुव्रतः॥ ४"},{"b":32753,"kind":"sanskrit_shloka","page":435,"verses":["10.48.5"],"text":"सा मज्जनालेपदुकूलभूषण-"},{"b":32754,"kind":"sanskrit_shloka","page":435,"verses":["10.48.5"],"text":"स्रग्गन्धताम्बूलसुधासवादिभिः ।"},{"b":32755,"kind":"sanskrit_shloka","page":435,"verses":["10.48.5"],"text":"प्रसाधितात्मोपससार माधवं"},{"b":32756,"kind":"hindi_commentary","page":435,"verses":["10.48.5"],"text":"सव्रीडलीलोत्स्मितविभ्रमेक्षितैः ॥ ५"},{"b":32757,"kind":"sanskrit_shloka","page":435,"verses":["10.48.6"],"text":"आहूय कान्तां नवसंगमह्रिया"},{"b":32758,"kind":"sanskrit_shloka","page":435,"verses":["10.48.6"],"text":"विशंकितां कंकणभूषिते करे।"},{"b":32759,"kind":"sanskrit_shloka","page":435,"verses":["10.48.6"],"text":"प्रगृह्य शय्यामधिवेश्य रामया"},{"b":32760,"kind":"hindi_commentary","page":435,"verses":["10.48.6"],"text":"रेमेऽनुलेपार्पणपुण्यलेशया ॥ ६"},{"b":32761,"kind":"sanskrit_shloka","page":436,"verses":["10.48.7"],"text":"सानंगतप्तकुचयोरुरसस्तथाक्ष्णो-"},{"b":32762,"kind":"sanskrit_shloka","page":436,"verses":["10.48.7"],"text":"र्जिघ्रन्त्यनन्तचरणेन रुजो मृजन्ती।"},{"b":32763,"kind":"sanskrit_shloka","page":436,"verses":["10.48.7"],"text":"दोर्भ्यां स्तनान्तरगतं परिरभ्य कान्त-"},{"b":32764,"kind":"hindi_commentary","page":436,"verses":["10.48.7"],"text":"मानन्दमूर्तिमजहादतिदीर्घतापम्॥ ७"},{"b":32765,"kind":"sanskrit_shloka","page":436,"verses":["10.48.8"],"text":"सैवं कैवल्यनाथं तं प्राप्य दुष्प्रापमीश्‍वरम्।"},{"b":32766,"kind":"sanskrit_shloka","page":436,"verses":["10.48.8"],"text":"अंगरागार्पणेनाहो दुर्भगेदमयाचत॥ ८"},{"b":32767,"kind":"sanskrit_shloka","page":436,"verses":["10.48.9"],"text":"आहोष्यतामिह प्रेष्ठ दिनानि कतिचिन्मया।"},{"b":32768,"kind":"sanskrit_shloka","page":436,"verses":["10.48.9"],"text":"रमस्व नोत्सहे त्यक्तुं संगं तेऽम्बुरुहेक्षण॥ ९"},{"b":32769,"kind":"hindi_commentary","page":434,"explains":["10.48.1","10.48.2","10.48.3","10.48.4","10.48.5","10.48.6","10.48.7","10.48.8","10.48.9"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! तदनन्तर सबके आत्मा तथा सब कुछ देखनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण अपनेसे मिलनकी आकांक्षा रखकर व्याकुल हुई कुब्जाका प्रिय करने—उसे सुख देनेकी इच्छासे उसके घर गये॥ १॥ कुब्जाका घर बहुमूल्य सामग्रियोंसे सम्पन्‍न था। उसमें शृंगार-रसका उद्दीपन करनेवाली बहुत-सी साधन-सामग्री भी भरी हुई थी। मोतीकी झालरें और स्थान-स्थानपर झंडियाँ भी लगी हुई थीं। चँदोवे तने हुए थे। सेजें बिछायी हुई थीं और बैठनेके लिये बहुत सुन्दर-सुन्दर आसन लगाये हुए थे। धूपकी सुगन्ध फैल रही थी। दीपककी शिखाएँ जगमगा रही थीं। स्थान-स्थानपर फूलोंके हार और चन्दन रखे हुए थे॥ २॥ भगवान्‌को अपने घर आते देख कुब्जा तुरंत हड़बड़ाकर अपने आसनसे उठ खड़ी हुई और सखियोंके साथ आगे बढ़कर उसने विधिपूर्वक भगवान्‌का स्वागत-सत्कार किया। फिर श्रेष्ठ आसन आदि देकर विविध उपचारोंसे उनकी विधिपूर्वक पूजा की॥ ३॥ कुब्जाने भगवान्‌के परमभक्त उद्धवजीकी भी समुचित रीतिसे पूजा की; परन्तु वे उसके सम्मानके लिये उसका दिया हुआ आसन छूकर धरतीपर ही बैठ गये। (अपने स्वामीके सामने उन्होंने आसनपर बैठना उचित न समझा।) भगवान् श्रीकृष्ण सच्चिदानन्द-स्वरूप होनेपर भी लोकाचारका अनुकरण करते हुए तुरंत उसकी बहुमूल्य सेजपर जा बैठे॥ ४॥ तब कुब्जा स्नान, अंगराग, वस्त्र, आभूषण, हार, गन्ध (इत्र आदि), ताम्बूल और सुधासव आदिसे अपनेको खूब सजाकर लीलामयी लजीली मुसकान तथा हाव-भावके साथ भगवान्‌की ओर देखती हुई उनके पास आयी॥ ५॥ कुब्जा नवीन मिलनके संकोचसे कुछ झिझक रही थी। तब श्यामसुन्दर श्रीकृष्णने उसे अपने पास बुला लिया और उसकी कंकणसे सुशोभित कलाई पकड़कर अपने पास बैठा लिया और उसके साथ क्रीडा करने लगे। परीक्षित्! कुब्जाने इस जन्ममें केवल भगवान्‌को अंगराग अर्पित किया था, उसी एक शुभकर्मके फलस्वरूप उसे ऐसा अनुपम अवसर मिला॥ ६॥ कुब्जा भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंको अपने काम-संतप्त हृदय, वक्षःस्थल और नेत्रोंपर रखकर उनकी दिव्य सुगन्ध लेने लगी और इस प्रकार उसने अपने हृदयकी सारी आधि-व्याधि शान्त कर ली। वक्षःस्थलसे सटे हुए आनन्दमूर्ति प्रियतम श्यामसुन्दरका अपनी दोनों भुजाओंसे गाढ़ आलिंगन करके कुब्जाने दीर्घकालसे बढ़े हुए विरहतापको शान्त किया॥ ७॥ परीक्षित्! कुब्जाने केवल अंगराग समर्पित किया था। उतनेसे ही उसे उन सर्वशक्तिमान् भगवान्‌की प्राप्ति हुई, जो कैवल्यमोक्षके अधीश्‍वर हैं और जिनकी प्राप्ति अत्यन्त कठिन है। परन्तु उस दुर्भगाने उन्हें प्राप्त करके भी व्रजगोपियोंकी भाँति सेवा न माँगकर यही माँगा—॥ ८॥ ‘प्रियतम! आप कुछ दिन यहीं रहकर मेरे साथ क्रीडा कीजिये। क्योंकि हे कमलनयन! मुझसे आपका साथ नहीं छोड़ा जाता’॥ ९॥"},{"b":32770,"kind":"sanskrit_shloka","page":436,"verses":["10.48.10"],"text":"तस्यै कामवरं दत्त्वा मानयित्वा च मानदः।"},{"b":32771,"kind":"hindi_commentary","page":436,"verses":["10.48.10"],"text":"सहोद्धवेन सर्वेशः स्वधामागमदर्चितम्॥ १०"},{"b":32772,"kind":"sanskrit_shloka","page":436,"verses":["10.48.11"],"text":"दुराराध्यं समाराध्य विष्णुं सर्वेश्‍वरेश्‍वरम्।"},{"b":32773,"kind":"sanskrit_shloka","page":436,"verses":["10.48.11"],"text":"यो वृणीते मनोग्राह्यमसत्त्वात् कुमनीष्यसौ॥ ११"},{"b":32774,"kind":"hindi_translation","page":436,"explains":["10.48.10","10.48.11"],"text":"परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण सबका मान रखनेवाले और सर्वेश्‍वर हैं। उन्होंने अभीष्ट वर देकर उसकी पूजा स्वीकार की और फिर अपने प्यारे भक्त उद्धवजीके साथ अपने सर्वसम्मानित घरपर लौट आये॥ १०॥ परीक्षित्! भगवान् ब्रह्मा आदि समस्त ईश्‍वरोंके भी ईश्‍वर हैं। उनको प्रसन्‍न कर लेना भी जीवके लिये बहुत ही कठिन है। जो कोई उन्हें प्रसन्‍न करके उनसे विषय-सुख माँगता है, वह निश्‍चय ही दुर्बुद्धि है; क्योंकि वास्तवमें विषय-सुख अत्यन्त तुच्छ—नहींके बराबर है॥ ११॥"},{"b":32775,"kind":"sanskrit_shloka","page":436,"verses":["10.48.12"],"text":"अक्रूरभवनं कृष्णः सहरामोद्धवः प्रभुः।"},{"b":32776,"kind":"sanskrit_shloka","page":436,"verses":["10.48.12"],"text":"किंचिच्चिकीर्षयन् प्रागादक्रूरप्रियकाम्यया॥ १२"},{"b":32777,"kind":"sanskrit_shloka","page":436,"verses":["10.48.13"],"text":"स तान् नरवरश्रेष्ठानाराद् वीक्ष्य स्वबान्धवान्।"},{"b":32778,"kind":"sanskrit_shloka","page":436,"verses":["10.48.13"],"text":"प्रत्युत्थाय प्रमुदितः परिष्वज्याभ्यनन्दत॥ १३"},{"b":32779,"kind":"sanskrit_shloka","page":437,"verses":["10.48.14"],"text":"ननाम कृष्णं रामं च स तैरप्यभिवादितः।"},{"b":32780,"kind":"sanskrit_shloka","page":437,"verses":["10.48.14"],"text":"पूजयामास विधिवत् कृतासनपरिग्रहान्॥ १४"},{"b":32781,"kind":"sanskrit_shloka","page":437,"verses":["10.48.15"],"text":"पादावनेजनीरापो धारयञ्छिरसा नृप।"},{"b":32782,"kind":"sanskrit_shloka","page":437,"verses":["10.48.15"],"text":"अर्हणेनाम्बरैर्दिव्यैर्गन्धस्रग्भूषणोत्तमैः॥ १५"},{"b":32783,"kind":"sanskrit_shloka","page":437,"verses":["10.48.16"],"text":"अर्चित्वा शिरसाऽऽनम्य पादावंकगतौ मृजन्।"},{"b":32784,"kind":"sanskrit_shloka","page":437,"verses":["10.48.16"],"text":"प्रश्रयावनतोऽक्रूरः कृष्णरामावभाषत॥ १६"},{"b":32785,"kind":"sanskrit_shloka","page":437,"verses":["10.48.17"],"text":"दिष्ट्या पापो हतः कंसः सानुगो वामिदं कुलम्।"},{"b":32786,"kind":"sanskrit_shloka","page":437,"verses":["10.48.17"],"text":"भवद‍्भ्यामुद‍्धृतं कृच्छ्राद् दुरन्ताच्च समेधितम्॥ १७"},{"b":32787,"kind":"sanskrit_shloka","page":437,"verses":["10.48.18"],"text":"युवां प्रधानपुरुषौ जगद्धेतू जगन्मयौ।"},{"b":32788,"kind":"sanskrit_shloka","page":437,"verses":["10.48.18"],"text":"भवद‍्भ्यां न विना किंचित् परमस्ति न चापरम्॥ १८"},{"b":32789,"kind":"sanskrit_shloka","page":437,"verses":["10.48.19"],"text":"आत्मसृष्टमिदं विश्‍वमन्वाविश्य स्वशक्तिभिः।"},{"b":32790,"kind":"sanskrit_shloka","page":437,"verses":["10.48.19"],"text":"ईयते बहुधा ब्रह्मन् श्रुतप्रत्यक्षगोचरम्॥ १९"},{"b":32791,"kind":"sanskrit_shloka","page":437,"verses":["10.48.20"],"text":"यथा हि भूतेषु चराचरेषु"},{"b":32792,"kind":"sanskrit_shloka","page":437,"verses":["10.48.20"],"text":"मह्यादयो योनिषु भान्ति नाना।"},{"b":32793,"kind":"sanskrit_shloka","page":437,"verses":["10.48.20"],"text":"एवं भवान् केवल आत्मयोनि-"},{"b":32794,"kind":"sanskrit_shloka","page":437,"verses":["10.48.20"],"text":"ष्वात्माऽऽत्मतन्त्रो बहुधा विभाति॥ २०"},{"b":32795,"kind":"sanskrit_shloka","page":437,"verses":["10.48.21"],"text":"सृजस्यथो लुम्पसि पासि विश्‍वं"},{"b":32796,"kind":"sanskrit_shloka","page":437,"verses":["10.48.21"],"text":"रजस्तमःसत्त्वगुणैः स्वशक्तिभिः।"},{"b":32797,"kind":"sanskrit_shloka","page":437,"verses":["10.48.21"],"text":"न बध्यसे तद्गुणकर्मभिर्वा"},{"b":32798,"kind":"sanskrit_shloka","page":437,"verses":["10.48.21"],"text":"ज्ञानात्मनस्ते क्व च बन्धहेतुः॥ २१"},{"b":32799,"kind":"hindi_translation","page":436,"explains":["10.48.12","10.48.13","10.48.14","10.48.15","10.48.16","10.48.17","10.48.18","10.48.19","10.48.20","10.48.21"],"text":"तदनन्तर एक दिन सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीकृष्ण बलरामजी और उद्धवजीके साथ अक्रूरजीकी अभिलाषा पूर्ण करने और उनसे कुछ काम लेनेके लिये उनके घर गये॥ १२॥ अक्रूरजीने दूरसे ही देख लिया कि हमारे परम बन्धु मनुष्यलोकशिरोमणि भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी आदि पधार रहे हैं। वे तुरंत उठकर आगे गये तथा आनन्दसे भरकर उनका अभिनन्दन और आलिंगन किया॥ १३॥ अक्रूरजीने भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीको नमस्कार किया तथा उद्धवजीके साथ उन दोनों भाइयोंने भी उन्हें नमस्कार किया। जब सब लोग आरामसे आसनोंपर बैठ गये, तब अक्रूरजी उन लोगोंकी विधिवत् पूजा करने लगे॥ १४॥ परीक्षित्! उन्होंने पहले भगवान्‌के चरण धोकर चरणोदक सिरपर धारण किया और फिर अनेकों प्रकारकी पूजा-सामग्री, दिव्य वस्त्र, गन्ध, माला और श्रेष्ठ आभूषणोंसे उनका पूजन किया, सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम किया और उनके चरणोंको अपनी गोदमें लेकर दबाने लगे। उसी समय उन्होंने विनयावनत होकर भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीसे कहा—॥ १५-१६॥ ‘भगवन्! यह बड़े ही आनन्द और सौभाग्यकी बात है कि पापी कंस अपने अनुयायियोंके साथ मारा गया। उसे मारकर आप दोनोंने युदवंशको बहुत बड़े संकटसे बचा लिया है तथा उन्‍नत और समृद्ध किया है॥ १७॥ आप दोनों जगत‍्के कारण और जगद्रूप, आदिपुरुष हैं। आपके अतिरिक्त और कोई वस्तु नहीं है, न कारण और न तो कार्य॥ १८॥ परमात्मन्! आपने ही अपनी शक्तिसे इसकी रचना की है और आप ही अपनी काल, माया आदि शक्तियोंसे इसमें प्रविष्ट होकर जितनी भी वस्तुएँ देखी और सुनी जाती हैं, उनके रूपमें प्रतीत हो रहे हैं॥ १९॥ जैसे पृथ्वी आदि कारणतत्त्वोंसे ही उनके कार्य स्थावर-जंगम शरीर बनते हैं; वे उनमें अनुप्रविष्ट-से होकर अनेक रूपोंमें प्रतीत होते हैं, परन्तु वास्तवमें वे कारणरूप ही हैं। इसी प्रकार हैं तो केवल आप ही, परन्तु अपने कार्यरूप जगत‍्में स्वेच्छासे अनेक रूपोंमें प्रतीत होते हैं। यह भी आपकी एक लीला ही है॥ २०॥ प्रभो! आप रजोगुण, सत्त्वगुण और तमोगुणरूप अपनी शक्तियोंसे क्रमशः जगत‍्की रचना, पालन और संहार करते हैं; किन्तु आप उन गुणोंसे अथवा उनके द्वारा होनेवाले कर्मोंसे बन्धनमें नहीं पड़ते, क्योंकि आप शुद्ध ज्ञानस्वरूप हैं। ऐसी स्थितिमें आपके लिये बन्धनका कारण ही क्या हो सकता है?॥ २१॥"},{"b":32800,"kind":"sanskrit_shloka","page":438,"verses":["10.48.22"],"text":"देहाद्युपाधेरनिरूपितत्वाद्"},{"b":32801,"kind":"sanskrit_shloka","page":438,"verses":["10.48.22"],"text":"भवो न साक्षान्‍न भिदाऽऽत्मनः स्यात्।"},{"b":32802,"kind":"sanskrit_shloka","page":438,"verses":["10.48.22"],"text":"अतो न बन्धस्तव नैव मोक्षः"},{"b":32803,"kind":"sanskrit_shloka","page":438,"verses":["10.48.22"],"text":"स्यातां निकामस्त्वयि नोऽविवेकः॥ २२"},{"b":32804,"kind":"sanskrit_shloka","page":438,"verses":["10.48.23"],"text":"त्वयोदितोऽयं जगतो हिताय"},{"b":32805,"kind":"sanskrit_shloka","page":438,"verses":["10.48.23"],"text":"यदा यदा वेदपथः पुराणः।"},{"b":32806,"kind":"sanskrit_shloka","page":438,"verses":["10.48.23"],"text":"बाध्येत पाखण्डपथैरसद्भि-"},{"b":32807,"kind":"sanskrit_shloka","page":438,"verses":["10.48.23"],"text":"स्तदा भवान् सत्त्वगुणं बिभर्ति॥ २३"},{"b":32808,"kind":"sanskrit_shloka","page":438,"verses":["10.48.24"],"text":"स त्वं प्रभोऽद्य वसुदेवगृहेऽवतीर्णः"},{"b":32809,"kind":"sanskrit_shloka","page":438,"verses":["10.48.24"],"text":"स्वांशेन भारमपनेतुमिहासि भूमेः।"},{"b":32810,"kind":"sanskrit_shloka","page":438,"verses":["10.48.24"],"text":"अक्षौहिणीशतवधेन सुरेतरांश-"},{"b":32811,"kind":"sanskrit_shloka","page":438,"verses":["10.48.24"],"text":"राज्ञाममुष्य च कुलस्य यशो वितन्वन्॥ २४"},{"b":32812,"kind":"sanskrit_shloka","page":438,"verses":["10.48.25"],"text":"अद्येश नो वसतयः खलु भूरिभागा"},{"b":32813,"kind":"sanskrit_shloka","page":438,"verses":["10.48.25"],"text":"यः सर्वदेवपितृभूतनृदेवमूर्तिः।"},{"b":32814,"kind":"sanskrit_shloka","page":438,"verses":["10.48.25"],"text":"यत्पादशौचसलिलं त्रिजगत् पुनाति"},{"b":32815,"kind":"sanskrit_shloka","page":438,"verses":["10.48.25"],"text":"स त्वं जगद्गुरुरधोक्षज याः प्रविष्टः॥ २५"},{"b":32816,"kind":"sanskrit_shloka","page":438,"verses":["10.48.26"],"text":"कः पण्डितस्त्वदपरं शरणं समीयाद्"},{"b":32817,"kind":"sanskrit_shloka","page":438,"verses":["10.48.26"],"text":"भक्तप्रियादृतगिरः सुहृदः कृतज्ञात्।"},{"b":32818,"kind":"sanskrit_shloka","page":438,"verses":["10.48.26"],"text":"सर्वान् ददाति सुहृदो भजतोऽभिकामा-"},{"b":32819,"kind":"sanskrit_shloka","page":438,"verses":["10.48.26"],"text":"नात्मानमप्युपचयापचयौ न यस्य॥ २६"},{"b":32820,"kind":"sanskrit_shloka","page":438,"verses":["10.48.27"],"text":"दिष्ट्या जनार्दन भवानिह नः प्रतीतो"},{"b":32821,"kind":"sanskrit_shloka","page":438,"verses":["10.48.27"],"text":"योगेश्‍वरैरपि दुरापगतिः सुरेशैः।"},{"b":32822,"kind":"sanskrit_shloka","page":438,"verses":["10.48.27"],"text":"छिन्ध्याशु नः सुतकलत्रधनाप्तगेह-"},{"b":32823,"kind":"sanskrit_shloka","page":438,"verses":["10.48.27"],"text":"देहादिमोहरशनां भवदीयमायाम्॥ २७"},{"b":32824,"kind":"hindi_translation","page":438,"explains":["10.48.22","10.48.23","10.48.24","10.48.25","10.48.26","10.48.27"],"text":"प्रभो! स्वयं आत्मवस्तुमें स्थूलदेह, सूक्ष्मदेह आदि उपाधियाँ न होनेके कारण न तो उसमें जन्म-मृत्यु है और न किसी प्रकारका भेदभाव। यही कारण है कि न आपमें बन्धन है और न मोक्ष! आपमें अपने-अपने अभिप्रायके अनुसार बन्धन या मोक्षकी जो कुछ कल्पना होती है, उसका कारण केवल हमारा अविवेक ही है॥ २२॥ आपने जगत‍्के कल्याणके लिये यह सनातन वेदमार्ग प्रकट किया है। जब-जब इसे पाखण्ड-पथसे चलनेवाले दुष्टोंके द्वारा क्षति पहुँचती है, तब-तब आप शुद्ध सत्त्वमय शरीर ग्रहण करते हैं॥ २३॥ प्रभो! वही आप इस समय अपने अंश श्रीबलरामजीके साथ पृथ्वीका भार दूर करनेके लिये यहाँ वसुदेवजीके घर अवतीर्ण हुए हैं। आप असुरोंके अंशसे उत्पन्‍न नाममात्रके शासकोंकी सौ-सौ अक्षौहिणी सेनाका संहार करेंगे और यदुवंशके यशका विस्तार करेंगे॥ २४॥ इन्द्रियातीत परमात्मन्! सारे देवता, पितर, भूतगण और राजा आपकी मूर्ति हैं। आपके चरणोंकी धोवन गंगाजी तीनों लोकोंको पवित्र करती हैं। आप सारे जगत‍्के एकमात्र पिता और शिक्षक हैं। वही आज आप हमारे घर पधारे। इसमें सन्देह नहीं कि आज हमारे घर धन्य-धन्य हो गये। उनके सौभाग्यकी सीमा न रही॥ २५॥ प्रभो! आप प्रेमी भक्तोंके परम प्रियतम, सत्यवक्ता, अकारण हितू और कृतज्ञ हैं—जरा-सी सेवाको भी मान लेते हैं। भला, ऐसा कौन बुद्धिमान् पुरुष है जो आपको छोड़कर किसी दूसरेकी शरणमें जायगा? आप अपना भजन करनेवाले प्रेमी भक्तकी समस्त अभिलाषाएँ पूर्ण कर देते हैं। यहाँतक कि जिसकी कभी क्षति और वृद्धि नहीं होती—जो एकरस है, अपने उस आत्माका भी आप दान कर देते हैं॥ २६॥ भक्तोंके कष्ट मिटानेवाले और जन्म-मृत्युके बन्धनसे छुड़ानेवाले प्रभो! बड़े-बड़े योगिराज और देवराज भी आपके स्वरूपको नहीं जान सकते। परन्तु हमें आपका साक्षात् दर्शन हो गया, यह कितने सौभाग्यकी बात है। प्रभो! हम स्त्री, पुत्र, धन, स्वजन, गेह और देह आदिके मोहकी रस्सीसे बँधे हुए हैं। अवश्य ही यह आपकी मायाका खेल है। आप कृपा करके इस गाढ़े बन्धनको शीघ्र काट दीजिये’॥ २७॥"},{"b":32825,"kind":"topic_heading","page":439,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":32826,"kind":"sanskrit_shloka","page":439,"verses":["10.48.28"],"text":"इत्यर्चितः संस्तुतश्‍च भक्तेन भगवान् हरिः।"},{"b":32827,"kind":"sanskrit_shloka","page":439,"verses":["10.48.28"],"text":"अक्रूरं सस्मितं प्राह गीर्भिः सम्मोहयन्‍निव॥ २८"},{"b":32828,"kind":"hindi_commentary","page":439,"explains":["10.48.28"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! इस प्रकार भक्त अक्रूरजीने भगवान् श्रीकृष्णकी पूजा और स्तुति की। इसके बाद भगवान् श्रीकृष्णने मुसकराकर अपनी मधुर वाणीसे उन्हें मानो मोहित करते हुए कहा॥ २८॥"},{"b":32829,"kind":"topic_heading","page":439,"text":"श्रीभगवानुवाच"},{"b":32830,"kind":"sanskrit_shloka","page":439,"verses":["10.48.29"],"text":"त्वं नो गुरुः पितृव्यश्‍च श्‍लाघ्यो बन्धुश्‍च नित्यदा।"},{"b":32831,"kind":"sanskrit_shloka","page":439,"verses":["10.48.29"],"text":"वयं तु रक्ष्याः पोष्याश्‍च अनुकम्प्याः प्रजा हि वः॥ २९"},{"b":32832,"kind":"hindi_commentary","page":439,"explains":["10.48.29"],"text":"भगवान् श्रीकृष्णने कहा—‘तात! आप हमारे गुरु—हितोपदेशक और चाचा हैं। हमारे वंशमें अत्यन्त प्रशंसनीय तथा हमारे सदाके हितैषी हैं। हम तो आपके बालक हैं और सदा ही आपकी रक्षा, पालन और कृपाके पात्र हैं॥ २९॥"},{"b":32833,"kind":"sanskrit_shloka","page":439,"verses":["10.48.30"],"text":"भवद्विधा महाभागा निषेव्या अर्हसत्तमाः।"},{"b":32834,"kind":"sanskrit_shloka","page":439,"verses":["10.48.30"],"text":"श्रेयस्कामैर्नृभिर्नित्यं देवाः स्वार्था न साधवः॥ ३०"},{"b":32835,"kind":"hindi_commentary","page":439,"explains":["10.48.30"],"text":"अपना परम कल्याण चाहनेवाले मनुष्योंको आप-जैसे परम पूजनीय और महाभाग्यवान् संतोंकी सर्वदा सेवा करनी चाहिये। आप-जैसे संत देवताओंसे भी बढ़कर हैं; क्योंकि देवताओंमें तो स्वार्थ रहता है, परन्तु संतोंमें नहीं॥ ३०॥"},{"b":32836,"kind":"sanskrit_shloka","page":439,"verses":["10.48.31"],"text":"न ह्यम्मयानि तीर्थानि न देवा मृच्छिलामयाः।"},{"b":32837,"kind":"sanskrit_shloka","page":439,"verses":["10.48.31"],"text":"ते पुनन्त्युरुकालेन दर्शनादेव साधवः॥ ३१"},{"b":32838,"kind":"hindi_commentary","page":439,"explains":["10.48.31"],"text":"केवल जलके तीर्थ (नदी, सरोवर आदि) ही तीर्थ नहीं हैं, केवल मृत्तिका और शिला आदिकी बनी हुई मूर्तियाँ ही देवता नहीं हैं। चाचाजी! उनकी तो बहुत दिनोंतक श्रद्धासे सेवा की जाय, तब वे पवित्र करते हैं। परन्तु संतपुरुष तो अपने दर्शनमात्रसे पवित्र कर देते हैं॥ ३१॥"},{"b":32839,"kind":"sanskrit_shloka","page":439,"verses":["10.48.32"],"text":"स भवान् सुहृदां वै नः श्रेयाञ्छ्रेयश्‍चिकीर्षया।"},{"b":32840,"kind":"sanskrit_shloka","page":439,"verses":["10.48.32"],"text":"जिज्ञासार्थं पाण्डवानां गच्छस्व त्वं गजाह्वयम्॥ ३२"},{"b":32841,"kind":"hindi_commentary","page":439,"explains":["10.48.32"],"text":"चाचाजी! आप हमारे हितैषी सुहृदोंमें सर्वश्रेष्ठ हैं। इसलिये आप पाण्डवोंका हित करनेके लिये तथा उनका कुशल-मंगल जाननेके लिये हस्तिनापुर जाइये॥ ३२॥"},{"b":32842,"kind":"sanskrit_shloka","page":439,"verses":["10.48.33"],"text":"पितर्युपरते बालाः सह मात्रा सुदुःखिताः।"},{"b":32843,"kind":"sanskrit_shloka","page":439,"verses":["10.48.33"],"text":"आनीताः स्वपुरं राज्ञा वसन्त इति शुश्रुम॥ ३३"},{"b":32844,"kind":"hindi_commentary","page":439,"explains":["10.48.33"],"text":"हमने ऐसा सुना है कि राजा पाण्डुके मर जानेपर अपनी माता कुन्तीके साथ युधिष्ठिर आदि पाण्डव बड़े दुःखमें पड़ गये थे। अब राजा धृतराष्ट्र उन्हें अपनी राजधानी हस्तिनापुरमें ले आये हैं और वे वहीं रहते हैं॥ ३३॥"},{"b":32845,"kind":"sanskrit_shloka","page":439,"verses":["10.48.34"],"text":"तेषु राजाम्बिकापुत्रो भ्रातृपुत्रेषु दीनधीः।"},{"b":32846,"kind":"sanskrit_shloka","page":439,"verses":["10.48.34"],"text":"समो न वर्तते नूनं दुष्पुत्रवशगोऽन्धदृक्॥ ३४"},{"b":32847,"kind":"hindi_commentary","page":439,"explains":["10.48.34"],"text":"आप जानते ही हैं कि राजा धृतराष्ट्र एक तो अंधे हैं और दूसरे उनमें मनोबलकी भी कमी है। उनका पुत्र दुर्योधन बहुत दुष्ट है और उसके अधीन होनेके कारण वे पाण्डवोंके साथ अपने पुत्रों-जैसा—समान व्यवहार नहीं कर पाते॥ ३४॥"},{"b":32848,"kind":"sanskrit_shloka","page":440,"verses":["10.48.35"],"text":"गच्छ जानीहि तद‍्वृत्तमधुना साध्वसाधु वा।"},{"b":32849,"kind":"sanskrit_shloka","page":440,"verses":["10.48.35"],"text":"विज्ञाय तद् विधास्यामो यथा शं सुहृदां भवेत्॥ ३५"},{"b":32850,"kind":"sanskrit_shloka","page":440,"verses":["10.48.36"],"text":"इत्यक्रूरं समादिश्य भगवान् हरिरीश्‍वरः।"},{"b":32851,"kind":"sanskrit_shloka","page":440,"verses":["10.48.36"],"text":"संकर्षणोद्धवाभ्यां वै ततः स्वभवनं ययौ॥ ३६"},{"b":32852,"kind":"hindi_translation","page":440,"explains":["10.48.35","10.48.36"],"text":"इसलिये आप वहाँ जाइये और मालूम कीजिये कि उनकी स्थिति अच्छी है या बुरी। आपके द्वारा उनका समाचार जानकर मैं ऐसा उपाय करूँगा, जिससे उन सुहृदोंको सुख मिले’॥ ३५॥ सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीकृष्ण अक्रूरजीको इस प्रकार आदेश देकर बलरामजी और उद्धवजीके साथ वहाँसे अपने घर लौट आये॥ ३६॥"},{"b":32853,"kind":"hindi_translation","page":440,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४८॥"}],"notes":[{"id":"v2:297","mark":"१","page":436,"after_verse":"10.48.10","text":"दृद्धिमत्।"}],"corrections":{"count":3,"list":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/shuddhi/"}}