{"id":"10.59","title":"दशम स्कन्ध · अध्याय 59","part":"दशम स्कन्ध (उत्तरार्ध)","heading":"अथैकोनषष्टितमोऽध्यायः","topics":["भौमासुरका उद्धार और सोलह हजार एक सौ राज- कन्याओंके साथ भगवान्‌का विवाह"],"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/59/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 10.59.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/59/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[503,510]},"verses":[{"id":"10.59.1","number":1,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/59/1/","page":503,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["यथा हतो भगवता भौमो येन च ताः स्त्रियः।","निरुद्धा एतदाचक्ष्व विक्रमं शार्ङ्गधन्वनः॥ १"],"iast":["yathā hato bhagavatā bhaumo yena ca tāḥ striyaḥ|","niruddhā etadācakṣva vikramaṃ śārṅgadhanvanaḥ|| 1"],"meaning":"राजा परीक्षित‍्ने पूछा—भगवन्! भगवान् श्रीकृष्णने भौमासुरको, जिसने उन स्त्रियोंको बंदीगृहमें डाल रखा था, क्यों और कैसे मारा? आप कृपा करके शार्ङ्ग-धनुषधारी भगवान् श्रीकृष्णका वह विचित्र चरित्र सुनाइये॥ १॥"},{"id":"10.59.2","number":2,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/59/2/","page":503,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इन्द्रेण हृतच्छत्रेण हृतकुण्डलबन्धुना।","हृतामराद्रिस्थानेन ज्ञापितो भौमचेष्टितम्।","सभार्यो गरुडारूढः प्राग्ज्योतिषपुरं ययौ॥ २"],"iast":["indreṇa hṛtacchatreṇa hṛtakuṇḍalabandhunā|","hṛtāmarādristhānena jñāpito bhaumaceṣṭitam|","sabhāryo garuḍārūḍhaḥ prāgjyotiṣapuraṃ yayau|| 2"],"meaning":"श्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित्! भौमासुरने वरुणका छत्र, माता अदितिके कुण्डल और मेरु पर्वतपर स्थित देवताओंका मणिपर्वत नामक स्थान छीन लिया था। इसपर सबके राजा इन्द्र द्वारकामें आये और उसकी एक-एक करतूत उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णको सुनायी। अब भगवान् श्रीकृष्ण अपनी प्रिय पत्‍नी सत्यभामाके साथ गरुड़पर सवार हुए और भौमासुरकी राजधानी प्राग्ज्योतिषपुरमें गये॥ २॥"},{"id":"10.59.3","number":3,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/59/3/","page":504,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["गिरिदुर्गैः शस्त्रदुर्गैर्जला‌ग्‍न्यनिलदुर्गमम्।","मुरपाशायुतैर्घोरैर्दृढैः सर्वत आवृतम्॥ ३"],"iast":["giridurgaiḥ śastradurgairjalāgnyaniladurgamam|","murapāśāyutairghorairdṛḍhaiḥ sarvata āvṛtam|| 3"],"meaning":"प्राग्ज्योतिषपुरमें प्रवेश करना बहुत कठिन था। पहले तो उसके चारों ओर पहाड़ोंकी किलेबंदी थी, उसके बाद शस्त्रोंका घेरा लगाया हुआ था। फिर जलसे भरी खाईं थी, उसके बाद आग या बिजलीकी चहारदीवारी थी और उसके भीतर वायु (गैस) बंद करके रखा गया था। इससे भी भीतर मुर दैत्यने नगरके चारों ओर अपने दस हजार घोर एवं सुदृढ फंदे (जाल) बिछा रखे थे॥ ३॥"},{"id":"10.59.4","number":4,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/59/4/","page":504,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["गदया निर्बिभेदाद्रीन् शस्त्रदुर्गाणि सायकैः।","चक्रेणाग्‍निं जलं वायुं मुरपाशांस्तथासिना॥ ४"],"iast":["gadayā nirbibhedādrīn śastradurgāṇi sāyakaiḥ|","cakreṇāgniṃ jalaṃ vāyuṃ murapāśāṃstathāsinā|| 4"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्णने अपनी गदाकी चोटसे पहाड़ोंको तोड़-फोड़ डाला और शस्त्रोंकी मोरचे-बंदीको बाणोंसे छिन्‍न-भिन्‍न कर दिया। चक्रके द्वारा अग्‍नि, जल और वायुकी चहारदीवारियोंको तहस-नहस कर दिया और मुर दैत्यके फंदोंको तलवारसे काट-कूटकर अलग रख दिया॥ ४॥"},{"id":"10.59.5","number":5,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/59/5/","page":504,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["शंखनादेन यन्त्राणि हृदयानि मनस्विनाम्।","प्राकारं गदया गुर्व्या निर्बिभेद गदाधरः॥ ५"],"iast":["śaṃkhanādena yantrāṇi hṛdayāni manasvinām|","prākāraṃ gadayā gurvyā nirbibheda gadādharaḥ|| 5"],"meaning":"जो बड़े-बड़े यन्त्र—मशीनें वहाँ लगी हुई थीं, उनको तथा वीरपुरुषोंके हृदयको शंखनादसे विदीर्ण कर दिया और नगरके परकोटेको गदाधर भगवान्‌ने अपनी भारी गदासे ध्वंस कर डाला॥ ५॥"},{"id":"10.59.6","number":6,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/59/6/","page":504,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["पांचजन्यध्वनिं श्रुत्वा युगान्ताशनिभीषणम्।","मुरः शयान उत्तस्थौ दैत्यः पंचशिरा जलात्॥ ६"],"iast":["pāṃcajanyadhvaniṃ śrutvā yugāntāśanibhīṣaṇam|","muraḥ śayāna uttasthau daityaḥ paṃcaśirā jalāt|| 6"],"meaning":"भगवान्‌के पांचजन्य शंखकी ध्वनि प्रलयकालीन बिजलीकी कड़कके समान महाभयंकर थी। उसे सुनकर मुर दैत्यकी नींद टूटी और वह बाहर निकल आया। उसके पाँच सिर थे और अबतक वह जलके भीतर सो रहा था॥ ६॥"},{"id":"10.59.7","number":7,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/59/7/","page":504,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["त्रिशूलमुद्यम्य सुदुर्निरीक्षणो","युगान्तसूर्यानलरोचिरुल्बणः ।","ग्रसंस्त्रिलोकीमिव पंचभिर्मुखै-","रभ्यद्रवत्तार्क्ष्यसुतं यथोरगः॥ ७"],"iast":["triśūlamudyamya sudurnirīkṣaṇo","yugāntasūryānalarocirulbaṇaḥ |","grasaṃstrilokīmiva paṃcabhirmukhai-","rabhyadravattārkṣyasutaṃ yathoragaḥ|| 7"],"meaning":"वह दैत्य प्रलयकालीन सूर्य और अग्‍निके समान प्रचण्ड तेजस्वी था। वह इतना भयंकर था कि उसकी ओर आँख उठाकर देखना भी आसान काम नहीं था। उसने त्रिशूल उठाया और इस प्रकार भगवान्‌की ओर दौड़ा, जैसे साँप गरुड़जीपर टूट पड़े। उस समय ऐसा मालूम होता था मानो वह अपने पाँचों मुखोंसे त्रिलोकीको निगल जायगा॥ ७॥"},{"id":"10.59.8","number":8,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/59/8/","page":504,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["आविध्य शूलं तरसा गरुत्मते","निरस्य वक्त्रैर्व्यनदत् स पंचभिः।","स रोदसी सर्वदिशोऽन्तरं महा-","नापूरयन्‍नण्डकटाहमावृणोत् ॥ ८"],"iast":["āvidhya śūlaṃ tarasā garutmate","nirasya vaktrairvyanadat sa paṃcabhiḥ|","sa rodasī sarvadiśo'ntaraṃ mahā-","nāpūrayannaṇḍakaṭāhamāvṛṇot || 8"],"meaning":"उसने अपने त्रिशूलको बड़े वेगसे घुमाकर गरुड़जीपर चलाया और फिर अपने पाँचों मुखोंसे घोर सिंहनाद करने लगा। उसके सिंहनादका महान् शब्द पृथ्वी, आकाश, पाताल और दसों दिशाओंमें फैलकर सारे ब्रह्माण्डमें भर गया॥ ८॥"},{"id":"10.59.9","number":9,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/59/9/","page":504,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तदापतद् वै त्रिशिखं गरुत्मते","हरिः शराभ्यामभिनत्त्रिधौजसा।","मुखेषु तं चापि शरैरताडयत्","तस्मै गदां सोऽपि रुषा व्यमुञ्चत॥ ९"],"iast":["tadāpatad vai triśikhaṃ garutmate","hariḥ śarābhyāmabhinattridhaujasā|","mukheṣu taṃ cāpi śarairatāḍayat","tasmai gadāṃ so'pi ruṣā vyamuñcata|| 9"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्णने देखा कि मुर दैत्यका त्रिशूल गरुड़की ओर बड़े वेगसे आ रहा है। तब अपना हस्तकौशल दिखाकर फुर्तीसे उन्होंने दो बाण मारे, जिनसे वह त्रिशूल कटकर तीन टूक हो गया। इसके साथ ही मुर दैत्यके मुखोंमें भी भगवान्‌ने बहुत-से बाण मारे। इससे वह दैत्य अत्यन्त क्रुद्ध हो उठा और उसने भगवान्‌पर अपनी गदा चलायी॥ ९॥"},{"id":"10.59.10","number":10,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/59/10/","page":505,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तामापतन्तीं गदया गदां मृधे","गदाग्रजो निर्बिभिदे सहस्रधा।","उद्यम्य बाहूनभिधावतोऽजितः","शिरांसि चक्रेण जहार लीलया॥ १०"],"iast":["tāmāpatantīṃ gadayā gadāṃ mṛdhe","gadāgrajo nirbibhide sahasradhā|","udyamya bāhūnabhidhāvato'jitaḥ","śirāṃsi cakreṇa jahāra līlayā|| 10"],"meaning":"परन्तु भगवान् श्रीकृष्णने अपनी गदाके प्रहारसे मुर दैत्यकी गदाको अपने पास पहुँचनेके पहले ही चूर-चूर कर दिया। अब वह अस्त्रहीन हो जानेके कारण अपनी भुजाएँ फैलाकर श्रीकृष्णकी ओर दौड़ा और उन्होंने खेल-खेलमें ही चक्रसे उसके पाँचों सिर उतार लिये॥ १०॥"},{"id":"10.59.11","number":11,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/59/11/","page":505,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["व्यसुः पपाताम्भसि कृत्तशीर्षो","निकृत्तशृंगोऽद्रिरिवेन्द्रतेजसा ।","तस्यात्मजाः सप्त पितुर्वधातुराः","प्रतिक्रियामर्षजुषः समुद्यताः॥ ११"],"iast":["vyasuḥ papātāmbhasi kṛttaśīrṣo","nikṛttaśṛṃgo'dririvendratejasā |","tasyātmajāḥ sapta piturvadhāturāḥ","pratikriyāmarṣajuṣaḥ samudyatāḥ|| 11"],"meaning":"सिर कटते ही मुर दैत्यके प्राण-पखेरू उड़ गये और वह ठीक वैसे ही जलमें गिर पड़ा, जैसे इन्द्रके वज्रसे शिखर कट जानेपर कोई पर्वत समुद्रमें गिर पड़ा हो। मुर दैत्यके सात पुत्र थे—ताम्र, अन्तरिक्ष, श्रवण, विभावसु, वसु, नभस्वान् और अरुण। ये अपने पिताकी मृत्युसे अत्यन्त शोकाकुल हो उठे और फिर बदला लेनेके लिये क्रोधसे भरकर शस्त्रास्त्रसे सुसज्जित हो गये तथा पीठ नामक दैत्यको अपना सेनापति बनाकर भौमासुरके आदेशसे श्रीकृष्णपर चढ़ आये॥ ११-१२॥","meaning_covers":[11,12]},{"id":"10.59.12","number":12,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/59/12/","page":505,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ताम्रोऽन्तरिक्षः श्रवणो विभावसु-","र्वसुर्नभस्वानरुणश्‍च सप्तमः।","पीठं पुरस्कृत्य चमूपतिं मृधे","भौमप्रयुक्ता निरगन् धृतायुधाः॥ १२"],"iast":["tāmro'ntarikṣaḥ śravaṇo vibhāvasu-","rvasurnabhasvānaruṇaśca saptamaḥ|","pīṭhaṃ puraskṛtya camūpatiṃ mṛdhe","bhaumaprayuktā niragan dhṛtāyudhāḥ|| 12"],"meaning":"सिर कटते ही मुर दैत्यके प्राण-पखेरू उड़ गये और वह ठीक वैसे ही जलमें गिर पड़ा, जैसे इन्द्रके वज्रसे शिखर कट जानेपर कोई पर्वत समुद्रमें गिर पड़ा हो। मुर दैत्यके सात पुत्र थे—ताम्र, अन्तरिक्ष, श्रवण, विभावसु, वसु, नभस्वान् और अरुण। ये अपने पिताकी मृत्युसे अत्यन्त शोकाकुल हो उठे और फिर बदला लेनेके लिये क्रोधसे भरकर शस्त्रास्त्रसे सुसज्जित हो गये तथा पीठ नामक दैत्यको अपना सेनापति बनाकर भौमासुरके आदेशसे श्रीकृष्णपर चढ़ आये॥ ११-१२॥","meaning_covers":[11,12]},{"id":"10.59.13","number":13,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/59/13/","page":505,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["प्रायुंजतासाद्य शरानसीन् गदाः","शक्त्यृष्टिशूलान्यजिते रुषोल्बणाः।","तच्छस्त्रकूटं भगवान् स्वमार्गणै-","रमोघवीर्यस्तिलशश्‍चकर्त ह॥ १३"],"iast":["prāyuṃjatāsādya śarānasīn gadāḥ","śaktyṛṣṭiśūlānyajite ruṣolbaṇāḥ|","tacchastrakūṭaṃ bhagavān svamārgaṇai-","ramoghavīryastilaśaścakarta ha|| 13"],"meaning":"वे वहाँ आकर बड़े क्रोधसे भगवान् श्रीकृष्णपर बाण, खड्ग, गदा, शक्ति, ऋष्टि और त्रिशूल आदि प्रचण्ड शस्त्रोंकी वर्षा करने लगे। परीक्षित्! भगवान्‌की शक्ति अमोघ और अनन्त है। उन्होंने अपने बाणोंसे उनके कोटि-कोटि शस्त्रास्त्र तिल-तिल करके काट गिराये॥ १३॥"},{"id":"10.59.14","number":14,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/59/14/","page":505,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तान् पीठमुख्याननयद् यमक्षयं","निकृत्तशीर्षोरुभुजाङ्‌घ्रिवर्मणः।","स्वानीकपानच्युतचक्रसायकै-","स्तथा निरस्तान् नरको धरासुतः॥ १४"],"iast":["tān pīṭhamukhyānanayad yamakṣayaṃ","nikṛttaśīrṣorubhujāṅghrivarmaṇaḥ|","svānīkapānacyutacakrasāyakai-","stathā nirastān narako dharāsutaḥ|| 14"],"meaning":"भगवान्‌के शस्त्रप्रहारसे सेनापति पीठ और उसके साथी दैत्योंके सिर, जाँघें, भुजा, पैर और कवच कट गये और उन सभीको भगवान्‌ने यमराजके घर पहुँचा दिया। जब पृथ्वीके पुत्र नरकासुर (भौमासुर) ने देखा कि भगवान् श्रीकृष्णके चक्र और बाणोंसे हमारी सेना और सेनापतियोंका संहार हो गया, तब उसे असह्य क्रोध हुआ। वह समुद्रतटपर पैदा हुए बहुत-से मदवाले हाथियोंकी सेना लेकर नगरसे बाहर निकला। उसने देखा कि भगवान् श्रीकृष्ण अपनी पत्‍नीके साथ आकाशमें गरुड़पर स्थित हैं, जैसे सूर्यके ऊपर बिजलीके साथ वर्षाकालीन श्याममेघ शोभायमान हो। भौमासुरने स्वयं भगवान्‌के ऊपर शतघ्नी नामकी शक्ति चलायी और उसके सब सैनिकोंने भी एक ही साथ उनपर अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र छोड़े॥ १४-१५॥","meaning_covers":[14,15]},{"id":"10.59.15","number":15,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/59/15/","page":505,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["निरीक्ष्य दुर्मर्षण आस्रवन्मदै-","र्गजैः पयोधिप्रभवैर्निराक्रमत्।","दृष्ट्वा सभार्यं गरुडोपरि स्थितं","सूर्योपरिष्टात् सतडिद्घनं यथा।","कृष्णं स तस्मै व्यसृजच्छतघ्नीं","योधाश्‍च सर्वे युगपत् स्म विव्यधुः॥ १५"],"iast":["nirīkṣya durmarṣaṇa āsravanmadai-","rgajaiḥ payodhiprabhavairnirākramat|","dṛṣṭvā sabhāryaṃ garuḍopari sthitaṃ","sūryopariṣṭāt sataḍidghanaṃ yathā|","kṛṣṇaṃ sa tasmai vyasṛjacchataghnīṃ","yodhāśca sarve yugapat sma vivyadhuḥ|| 15"],"meaning":"भगवान्‌के शस्त्रप्रहारसे सेनापति पीठ और उसके साथी दैत्योंके सिर, जाँघें, भुजा, पैर और कवच कट गये और उन सभीको भगवान्‌ने यमराजके घर पहुँचा दिया। जब पृथ्वीके पुत्र नरकासुर (भौमासुर) ने देखा कि भगवान् श्रीकृष्णके चक्र और बाणोंसे हमारी सेना और सेनापतियोंका संहार हो गया, तब उसे असह्य क्रोध हुआ। वह समुद्रतटपर पैदा हुए बहुत-से मदवाले हाथियोंकी सेना लेकर नगरसे बाहर निकला। उसने देखा कि भगवान् श्रीकृष्ण अपनी पत्‍नीके साथ आकाशमें गरुड़पर स्थित हैं, जैसे सूर्यके ऊपर बिजलीके साथ वर्षाकालीन श्याममेघ शोभायमान हो। भौमासुरने स्वयं भगवान्‌के ऊपर शतघ्नी नामकी शक्ति चलायी और उसके सब सैनिकोंने भी एक ही साथ उनपर अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र छोड़े॥ १४-१५॥","meaning_covers":[14,15]},{"id":"10.59.16","number":16,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/59/16/","page":506,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तद् भौमसैन्यं भगवान् गदाग्रजो","विचित्रवाजैर्निशितैः शिलीमुखैः।","निकृत्तबाहूरुशिरोध्रविग्रहं","चकार तर्ह्येव हताश्‍वकुञ्जरम्॥ १६"],"iast":["tad bhaumasainyaṃ bhagavān gadāgrajo","vicitravājairniśitaiḥ śilīmukhaiḥ|","nikṛttabāhūruśirodhravigrahaṃ","cakāra tarhyeva hatāśvakuñjaram|| 16"],"meaning":"अब भगवान् श्रीकृष्ण भी चित्र-विचित्र पंखवाले तीखे-तीखे बाण चलाने लगे। इससे उसी समय भौमासुरके सैनिकोंकी भुजाएँ, जाँघें, गर्दन और धड़ कट-कटकर गिरने लगे; हाथी और घोड़े भी मरने लगे॥ १६॥"},{"id":"10.59.17","number":17,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/59/17/","page":506,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यानि योधैः प्रयुक्तानि शस्त्रास्त्राणि कुरूद्वह।","हरिस्तान्यच्छिनत्तीक्ष्णैः शरैरेकैकशस्त्रिभिः॥ १७"],"iast":["yāni yodhaiḥ prayuktāni śastrāstrāṇi kurūdvaha|","haristānyacchinattīkṣṇaiḥ śarairekaikaśastribhiḥ|| 17"],"meaning":"परीक्षित्! भौमासुरके सैनिकोंने भगवान्‌पर जो-जो अस्त्र-शस्त्र चलाये थे, उनमेंसे प्रत्येकको भगवान्‌ने तीन-तीन तीखे बाणोंसे काट गिराया॥ १७॥"},{"id":"10.59.18","number":18,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/59/18/","page":506,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["उह्यमानः सुपर्णेन पक्षाभ्यां निघ्नता गजान्।","गरुत्मता हन्यमानास्तुण्डपक्षनखैर्गजाः॥ १८"],"iast":["uhyamānaḥ suparṇena pakṣābhyāṃ nighnatā gajān|","garutmatā hanyamānāstuṇḍapakṣanakhairgajāḥ|| 18"],"meaning":"उस समय भगवान् श्रीकृष्ण गरुड़जीपर सवार थे और गरुड़जी अपने पंखोंसे हाथियोंको मार रहे थे। उनकी चोंच, पंख और पंजोंकी मारसे हाथियोंको बड़ी पीड़ा हुई और वे सब-के-सब आर्त होकर युद्धभूमिसे भागकर नगरमें घुस गये। अब वहाँ अकेला भौमासुर ही लड़ता रहा। जब उसने देखा कि गरुड़जीकी मारसे पीड़ित होकर मेरी सेना भाग रही है, तब उसने उनपर वह शक्ति चलायी, जिसने वज्रको भी विफल कर दिया था। परन्तु उसकी चोटसे पक्षिराज गरुड़ तनिक भी विचलित न हुए, मानो किसीने मतवाले गजराजपर फूलोंकी मालासे प्रहार किया हो॥ १८—२०॥","meaning_covers":[18,20]},{"id":"10.59.19","number":19,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/59/19/","page":506,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["पुरमेवाविशन्‍नार्ता नरको युध्ययुध्यत।","दृष्ट्वा विद्रावितं सैन्यं गरुडेनार्दितं स्वकम्॥ १९"],"iast":["puramevāviśannārtā narako yudhyayudhyata|","dṛṣṭvā vidrāvitaṃ sainyaṃ garuḍenārditaṃ svakam|| 19"],"meaning":"उस समय भगवान् श्रीकृष्ण गरुड़जीपर सवार थे और गरुड़जी अपने पंखोंसे हाथियोंको मार रहे थे। उनकी चोंच, पंख और पंजोंकी मारसे हाथियोंको बड़ी पीड़ा हुई और वे सब-के-सब आर्त होकर युद्धभूमिसे भागकर नगरमें घुस गये। अब वहाँ अकेला भौमासुर ही लड़ता रहा। जब उसने देखा कि गरुड़जीकी मारसे पीड़ित होकर मेरी सेना भाग रही है, तब उसने उनपर वह शक्ति चलायी, जिसने वज्रको भी विफल कर दिया था। परन्तु उसकी चोटसे पक्षिराज गरुड़ तनिक भी विचलित न हुए, मानो किसीने मतवाले गजराजपर फूलोंकी मालासे प्रहार किया हो॥ १८—२०॥","meaning_covers":[18,20]},{"id":"10.59.20","number":20,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/59/20/","page":506,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तं भौमः प्राहरच्छक्त्या वज्रः प्रतिहतो यतः।","नाकम्पत तया विद्धो मालाहत इव द्विपः॥ २०"],"iast":["taṃ bhaumaḥ prāharacchaktyā vajraḥ pratihato yataḥ|","nākampata tayā viddho mālāhata iva dvipaḥ|| 20"],"meaning":"उस समय भगवान् श्रीकृष्ण गरुड़जीपर सवार थे और गरुड़जी अपने पंखोंसे हाथियोंको मार रहे थे। उनकी चोंच, पंख और पंजोंकी मारसे हाथियोंको बड़ी पीड़ा हुई और वे सब-के-सब आर्त होकर युद्धभूमिसे भागकर नगरमें घुस गये। अब वहाँ अकेला भौमासुर ही लड़ता रहा। जब उसने देखा कि गरुड़जीकी मारसे पीड़ित होकर मेरी सेना भाग रही है, तब उसने उनपर वह शक्ति चलायी, जिसने वज्रको भी विफल कर दिया था। परन्तु उसकी चोटसे पक्षिराज गरुड़ तनिक भी विचलित न हुए, मानो किसीने मतवाले गजराजपर फूलोंकी मालासे प्रहार किया हो॥ १८—२०॥","meaning_covers":[18,20]},{"id":"10.59.21","number":21,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/59/21/","page":506,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["शूलं भौमोऽच्युतं हन्तुमाददे वितथोद्यमः।","तद्विसर्गात् पूर्वमेव नरकस्य शिरो हरिः।","अपाहरद् गजस्थस्य चक्रेण क्षुरनेमिना॥ २१"],"iast":["śūlaṃ bhaumo'cyutaṃ hantumādade vitathodyamaḥ|","tadvisargāt pūrvameva narakasya śiro hariḥ|","apāharad gajasthasya cakreṇa kṣuraneminā|| 21"],"meaning":"अब भौमासुरने देखा कि मेरी एक भी चाल नहीं चलती, सारे उद्योग विफल होते जा रहे हैं, तब उसने श्रीकृष्णको मार डालनेके लिये एक त्रिशूल उठाया। परन्तु उसे अभी वह छोड़ भी न पाया था कि भगवान् श्रीकृष्णने छुरेके समान तीखी धारवाले चक्रसे हाथीपर बैठे हुए भौमासुरका सिर काट डाला॥ २१॥"},{"id":"10.59.22","number":22,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/59/22/","page":506,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सकुण्डलं चारुकिरीटभूषणं","बभौ पृथिव्यां पतितं समुज्ज्वलत्।","हाहेति साध्वित्यृषयः सुरेश्‍वरा","माल्यैर्मुकुन्दं विकिरन्त ईडिरे॥ २२"],"iast":["sakuṇḍalaṃ cārukirīṭabhūṣaṇaṃ","babhau pṛthivyāṃ patitaṃ samujjvalat|","hāheti sādhvityṛṣayaḥ sureśvarā","mālyairmukundaṃ vikiranta īḍire|| 22"],"meaning":"उसका जगमगाता हुआ सिर कुण्डल और सुन्दर किरीटके सहित पृथ्वीपर गिर पड़ा। उसे देखकर भौमासुरके सगे-सम्बन्धी हाय-हाय पुकार उठे, ऋषिलोग ‘साधु साधु’ कहने लगे और देवतालोग भगवान्‌पर पुष्पोंकी वर्षा करते हुए स्तुति करने लगे॥ २२॥"},{"id":"10.59.23","number":23,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/59/23/","page":506,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ततश्‍च भूः कृष्णमुपेत्य कुण्डले","प्रतप्तजाम्बूनदरत्‍नभास्वरे ।","सवैजयन्त्या वनमालयार्पयत्","प्राचेतसं छत्रमथो महामणिम्॥ २३"],"iast":["tataśca bhūḥ kṛṣṇamupetya kuṇḍale","prataptajāmbūnadaratnabhāsvare |","savaijayantyā vanamālayārpayat","prācetasaṃ chatramatho mahāmaṇim|| 23"],"meaning":"अब पृथ्वी भगवान्‌के पास आयी। उसने भगवान् श्रीकृष्णके गलेमें वैजयन्तीके साथ वनमाला पहना दी और अदिति माताके जगमगाते हुए कुण्डल, जो तपाये हुए सोनेके एवं रत्‍नजटित थे, भगवान्‌को दे दिये तथा वरुणका छत्र और साथ ही एक महामणि भी उनको दी॥ २३॥"},{"id":"10.59.24","number":24,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/59/24/","page":507,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अस्तौषीदथ विश्‍वेशं देवी देववरार्चितम्।","प्रांजलिः प्रणता राजन् भक्तिप्रवणया धिया॥ २४"],"iast":["astauṣīdatha viśveśaṃ devī devavarārcitam|","prāṃjaliḥ praṇatā rājan bhaktipravaṇayā dhiyā|| 24"],"meaning":"राजन्! इसके बाद पृथ्वीदेवी बड़े-बड़े देवताओंके द्वारा पूजित विश्‍वेश्‍वर भगवान् श्रीकृष्णको प्रणाम करके हाथ जोड़कर भक्तिभावभरे हृदयसे उनकी स्तुति करने लगीं॥ २४॥"},{"id":"10.59.25","number":25,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/59/25/","page":507,"speaker":"भूमिरुवाच","sanskrit":["नमस्ते देवदेवेश शंखचक्रगदाधर।","भक्तेच्छोपात्तरूपाय परमात्मन् नमोऽस्तु ते॥ २५"],"iast":["namaste devadeveśa śaṃkhacakragadādhara|","bhaktecchopāttarūpāya paramātman namo'stu te|| 25"],"meaning":"पृथ्वीदेवीने कहा—शंखचक्रगदाधारी देव-देवेश्‍वर! मैं आपको नमस्कार करती हूँ। परमात्मन्! आप अपने भक्तोंकी इच्छा पूर्ण करनेके लिये उसीके अनुसार रूप प्रकट किया करते हैं। आपको मैं नमस्कार करती हूँ॥ २५॥"},{"id":"10.59.26","number":26,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/59/26/","page":507,"speaker":"भूमिरुवाच","sanskrit":["नमः पंकजनाभाय नमः पंकजमालिने।","नमः पंकजनेत्राय नमस्ते पंकजाङ्‌घ्र‌ये॥ २६"],"iast":["namaḥ paṃkajanābhāya namaḥ paṃkajamāline|","namaḥ paṃkajanetrāya namaste paṃkajāṅghraye|| 26"],"meaning":"प्रभो! आपकी नाभिसे कमल प्रकट हुआ है। आप कमलकी माला पहनते हैं। आपके नेत्र कमलसे खिले हुए और शान्तिदायक हैं। आपके चरण कमलके समान सुकुमार और भक्तोंके हृदयको शीतल करनेवाले हैं। आपको मैं बार-बार नमस्कार करती हूँ॥ २६॥"},{"id":"10.59.27","number":27,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/59/27/","page":507,"speaker":"भूमिरुवाच","sanskrit":["नमो भगवते तुभ्यं वासुदेवाय विष्णवे।","पुरुषायादिबीजाय पूर्णबोधाय ते नमः॥ २७"],"iast":["namo bhagavate tubhyaṃ vāsudevāya viṣṇave|","puruṣāyādibījāya pūrṇabodhāya te namaḥ|| 27"],"meaning":"आप समग्र ऐश्‍वर्य, धर्म, यश, सम्पत्ति, ज्ञान और वैराग्यके आश्रय हैं। आप सर्वव्यापक होनेपर भी स्वयं वसुदेवनन्दनके रूपमें प्रकट हैं। मैं आपको नमस्कार करती हूँ। आप ही पुरुष हैं और समस्त कारणोंके भी परम कारण हैं। आप स्वयं पूर्ण ज्ञानस्वरूप हैं। मैं आपको नमस्कार करती हूँ॥ २७॥"},{"id":"10.59.28","number":28,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/59/28/","page":507,"speaker":"भूमिरुवाच","sanskrit":["अजाय जनयित्रेऽस्य ब्रह्मणेऽनन्तशक्तये।","परावरात्मन् भूतात्मन् परमात्मन् नमोऽस्तु ते॥ २८"],"iast":["ajāya janayitre'sya brahmaṇe'nantaśaktaye|","parāvarātman bhūtātman paramātman namo'stu te|| 28"],"meaning":"आप स्वयं तो हैं जन्मरहित, परन्तु इस जगत‍्के जन्मदाता आप ही हैं। आप ही अनन्त शक्तियोंके आश्रय ब्रह्म हैं। जगत‍्का जो कुछ भी कार्य-कारणमय रूप है, जितने भी प्राणी या अप्राणी हैं— सब आपके ही स्वरूप हैं। परमात्मन्! आपके चरणोंमें मेरे बार-बार नमस्कार॥ २८॥"},{"id":"10.59.29","number":29,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/59/29/","page":507,"speaker":"भूमिरुवाच","sanskrit":["त्वं वै सिसृक्षू रज उत्कटं प्रभो","तमो निरोधाय बिभर्ष्यसंवृतः।","स्थानाय सत्त्वं जगतो जगत्पते","कालः प्रधानं पुरुषो भवान् परः॥ २९"],"iast":["tvaṃ vai sisṛkṣū raja utkaṭaṃ prabho","tamo nirodhāya bibharṣyasaṃvṛtaḥ|","sthānāya sattvaṃ jagato jagatpate","kālaḥ pradhānaṃ puruṣo bhavān paraḥ|| 29"],"meaning":"प्रभो! जब आप जगत‍्की रचना करना चाहते हैं, तब उत्कट रजोगुणको, और जब इसका प्रलय करना चाहते हैं तब तमोगुणको, तथा जब इसका पालन करना चाहते हैं तब सत्त्वगुणको स्वीकार करते हैं। परन्तु यह सब करनेपर भी आप इन गुणोंसे ढकते नहीं, लिप्त नहीं होते। जगत्पते! आप स्वयं ही प्रकृति, पुरुष और दोनोंके संयोग-वियोगके हेतु काल हैं तथा उन तीनोंसे परे भी हैं॥ २९॥"},{"id":"10.59.30","number":30,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/59/30/","page":507,"speaker":"भूमिरुवाच","sanskrit":["अहं पयो ज्योतिरथानिलो नभो","मात्राणि देवा मन इन्द्रियाणि।","कर्ता महानित्यखिलं चराचरं","त्वय्यद्वितीये भगवन्‍नयं भ्रमः॥ ३०"],"iast":["ahaṃ payo jyotirathānilo nabho","mātrāṇi devā mana indriyāṇi|","kartā mahānityakhilaṃ carācaraṃ","tvayyadvitīye bhagavannayaṃ bhramaḥ|| 30"],"meaning":"भगवन्! मैं (पृथ्वी), जल, अग्‍नि, वायु, आकाश, पंचतन्मात्राएँ, मन, इन्द्रिय और इनके अधिष्ठातृ-देवता, अहंकार और महत्तत्त्व—कहाँतक कहूँ, यह सम्पूर्ण चराचर जगत् आपके अद्वितीय स्वरूपमें भ्रमके कारण ही पृथक् प्रतीत हो रहा है॥ ३०॥"},{"id":"10.59.31","number":31,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/59/31/","page":508,"speaker":"भूमिरुवाच","sanskrit":["तस्यात्मजोऽयं तव पादपंकजं","भीतः प्रपन्‍नार्तिहरोपसादितः।","तत् पालयैनं कुरु हस्तपंकजं","शिरस्यमुष्याखिलकल्मषापहम् ॥ ३१"],"iast":["tasyātmajo'yaṃ tava pādapaṃkajaṃ","bhītaḥ prapannārtiharopasāditaḥ|","tat pālayainaṃ kuru hastapaṃkajaṃ","śirasyamuṣyākhilakalmaṣāpaham || 31"],"meaning":"शरणागत-भय-भंजन प्रभो! मेरे पुत्र भौमासुरका यह पुत्र भगदत्त अत्यन्त भयभीत हो रहा है। मैं इसे आपके चरणकमलोंकी शरणमें ले आयी हूँ। प्रभो! आप इसकी रक्षा कीजिये और इसके सिरपर अपना वह करकमल रखिये जो सारे जगत‍्के समस्त पाप-तापोंको नष्ट करनेवाला है॥ ३१॥"},{"id":"10.59.32","number":32,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/59/32/","page":508,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इति भूम्यार्थितो वाग्भिर्भगवान् भक्तिनम्रया।","दत्त्वाभयं भौमगृहं प्राविशत् सकलर्द्धिमत्॥ ३२"],"iast":["iti bhūmyārthito vāgbhirbhagavān bhaktinamrayā|","dattvābhayaṃ bhaumagṛhaṃ prāviśat sakalarddhimat|| 32"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब पृथ्वीने भक्तिभावसे विनम्र होकर इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति-प्रार्थना की, तब उन्होंने भगदत्तको अभयदान दिया और भौमासुरके समस्त सम्पत्तियोंसे सम्पन्‍न महलमें प्रवेश किया॥ ३२॥"},{"id":"10.59.33","number":33,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/59/33/","page":508,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तत्र राजन्यकन्यानां षट्सहस्राधिकायुतम्।","भौमाहृतानां विक्रम्य राजभ्यो ददृशे हरिः॥ ३३"],"iast":["tatra rājanyakanyānāṃ ṣaṭsahasrādhikāyutam|","bhaumāhṛtānāṃ vikramya rājabhyo dadṛśe hariḥ|| 33"],"meaning":"वहाँ जाकर भगवान्‌ने देखा कि भौमासुरने बलपूर्वक राजाओंसे सोलह हजार राजकुमारियाँ छीनकर अपने यहाँ रख छोड़ी थीं॥ ३३॥"},{"id":"10.59.34","number":34,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/59/34/","page":508,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तं प्रविष्टं स्त्रियो वीक्ष्य नरवीरं विमोहिताः।","मनसा वव्रिरेऽभीष्टं पतिं दैवोपसादितम्॥ ३४"],"iast":["taṃ praviṣṭaṃ striyo vīkṣya naravīraṃ vimohitāḥ|","manasā vavrire'bhīṣṭaṃ patiṃ daivopasāditam|| 34"],"meaning":"जब उन राजकुमारियोंने अन्तःपुरमें पधारे हुए नरश्रेष्ठ भगवान् श्रीकृष्णको देखा, तब वे मोहित हो गयीं और उन्होंने उनकी अहैतुकी कृपा तथा अपना सौभाग्य समझकर मन-ही-मन भगवान्‌को अपने परम प्रियतम पतिके रूपमें वरण कर लिया॥ ३४॥"},{"id":"10.59.35","number":35,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/59/35/","page":508,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["भूयात् पतिरयं मह्यं धाता तदनुमोदताम्।","इति सर्वाः पृथक् कृष्णे भावेन हृदयं दधुः॥ ३५"],"iast":["bhūyāt patirayaṃ mahyaṃ dhātā tadanumodatām|","iti sarvāḥ pṛthak kṛṣṇe bhāvena hṛdayaṃ dadhuḥ|| 35"],"meaning":"उन राजकुमारियोंमेंसे प्रत्येकने अलग-अलग अपने मनमें यही निश्‍चय किया कि ‘ये श्रीकृष्ण ही मेरे पति हों और विधाता मेरी इस अभिलाषाको पूर्ण करें।’ इस प्रकार उन्होंने प्रेम-भावसे अपना हृदय भगवान्‌के प्रति निछावर कर दिया॥ ३५॥"},{"id":"10.59.36","number":36,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/59/36/","page":508,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ताः प्राहिणोद् द्वारवतीं सुमृष्टविरजोऽम्बराः।","नरयानैर्महाकोशान् रथाश्‍वान् द्रविणं महत्॥ ३६"],"iast":["tāḥ prāhiṇod dvāravatīṃ sumṛṣṭavirajo'mbarāḥ|","narayānairmahākośān rathāśvān draviṇaṃ mahat|| 36"],"meaning":"तब भगवान् श्रीकृष्णने उन राजकुमारियोंको सुन्दर-सुन्दर निर्मल वस्त्राभूषण पहनाकर पालकियोंसे द्वारका भेज दिया और उनके साथ ही बहुत-से खजाने, रथ, घोड़े तथा अतुल सम्पत्ति भी भेजी॥ ३६॥"},{"id":"10.59.37","number":37,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/59/37/","page":508,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ऐरावतकुलेभांश्‍च चतुर्दन्तांस्तरस्विनः।","पाण्डुरांश्‍च चतुःषष्टिं प्रेषयामास केशवः॥ ३७"],"iast":["airāvatakulebhāṃśca caturdantāṃstarasvinaḥ|","pāṇḍurāṃśca catuḥṣaṣṭiṃ preṣayāmāsa keśavaḥ|| 37"],"meaning":"ऐरावतके वंशमें उत्पन्‍न हुए अत्यन्त वेगवान् चार-चार दाँतोंवाले सफेद रंगके चौंसठ हाथी भी भगवान्‌ने वहाँसे द्वारका भेजे॥ ३७॥"},{"id":"10.59.38","number":38,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/59/38/","page":508,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["गत्वा सुरेन्द्रभवनं दत्त्वादित्यै च कुण्डले।","पूजितस्त्रिदशेन्द्रेण सहेन्द्राण्या च सप्रियः॥ ३८"],"iast":["gatvā surendrabhavanaṃ dattvādityai ca kuṇḍale|","pūjitastridaśendreṇa sahendrāṇyā ca sapriyaḥ|| 38"],"meaning":"इसके बाद भगवान् श्रीकृष्ण अमरावतीमें स्थित देवराज इन्द्रके महलोंमें गये। वहाँ देवराज इन्द्रने अपनी पत्‍नी इन्द्राणीके साथ सत्यभामाजी और भगवान् श्रीकृष्णकी पूजा की, तब भगवान्‌ने अदितिके कुण्डल उन्हें दे दिये॥ ३८॥"},{"id":"10.59.39","number":39,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/59/39/","page":508,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["चोदितो भार्ययोत्पाट्य पारिजातं गरुत्मति।","आरोप्य सेन्द्रान् विबुधान् निर्जित्योपानयत् पुरम्॥ ३९"],"iast":["codito bhāryayotpāṭya pārijātaṃ garutmati|","āropya sendrān vibudhān nirjityopānayat puram|| 39"],"meaning":"वहाँसे लौटते समय सत्यभामाजीकी प्रेरणासे भगवान् श्रीकृष्णने कल्पवृक्ष उखाड़कर गरुड़पर रख लिया और देवराज इन्द्र तथा समस्त देवताओंको जीतकर उसे द्वारकामें ले आये॥ ३९॥"},{"id":"10.59.40","number":40,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/59/40/","page":509,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स्थापितः सत्यभामाया गृहोद्यानोपशोभनः।","अन्वगुर्भ्रमराः स्वर्गात् तद्गन्धासवलम्पटाः॥ ४०"],"iast":["sthāpitaḥ satyabhāmāyā gṛhodyānopaśobhanaḥ|","anvagurbhramarāḥ svargāt tadgandhāsavalampaṭāḥ|| 40"],"meaning":"भगवान्‌ने उसे सत्यभामाके महलके बगीचेमें लगा दिया। इससे उस बगीचेकी शोभा अत्यन्त बढ़ गयी। कल्पवृक्षके साथ उसके गन्ध और मकरन्दके लोभी भौंरे स्वर्गसे द्वारकामें चले आये थे॥ ४०॥"},{"id":"10.59.41","number":41,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/59/41/","page":509,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ययाच आनम्य किरीटकोटिभिः","पादौ स्पृशन्‍नच्युतमर्थसाधनम्।","सिद्धार्थ एतेन विगृह्यते महा-","नहो सुराणां च तमो धिगाढ्यताम्॥ ४१"],"iast":["yayāca ānamya kirīṭakoṭibhiḥ","pādau spṛśannacyutamarthasādhanam|","siddhārtha etena vigṛhyate mahā-","naho surāṇāṃ ca tamo dhigāḍhyatām|| 41"],"meaning":"परीक्षित्! देखो तो सही, जब इन्द्रको अपना काम बनाना था, तब तो उन्होंने अपना सिर झुकाकर मुकुटकी नोकसे भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंका स्पर्श करके उनसे सहायताकी भिक्षा माँगी थी, परन्तु जब काम बन गया, तब उन्होंने उन्हीं भगवान् श्रीकृष्णसे लड़ाई ठान ली। सचमुच ये देवता भी बड़े तमोगुणी हैं और सबसे बड़ा दोष तो उनमें धनाढ्यताका है। धिक्कार है ऐसी धनाढ्यताको॥ ४१॥"},{"id":"10.59.42","number":42,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/59/42/","page":509,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अथो मुहूर्त एकस्मिन् नानागारेषु ताः स्त्रियः।","यथोपयेमे भगवांस्तावद्रूपधरोऽव्ययः॥ ४२"],"iast":["atho muhūrta ekasmin nānāgāreṣu tāḥ striyaḥ|","yathopayeme bhagavāṃstāvadrūpadharo'vyayaḥ|| 42"],"meaning":"तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्णने एक ही मुहूर्तमें अलग-अलग भवनोंमें अलग-अलग रूप धारण करके एक ही साथ सब राजकुमारियोंका शास्त्रोक्त विधिसे पाणिग्रहण किया। सर्वशक्तिमान् अविनाशी भगवान्‌के लिये इसमें आश्‍चर्यकी कौन-सी बात है॥ ४२॥"},{"id":"10.59.43","number":43,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/59/43/","page":509,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["गृहेषु तासामनपाय्यतर्क्यकृ-","न्‍निरस्तसाम्यातिशयेष्ववस्थितः ।","रेमे रमाभिर्निजकामसंप्लुतो","यथेतरो गार्हकमेधिकांश्‍चरन्॥ ४३"],"iast":["gṛheṣu tāsāmanapāyyatarkyakṛ-","nnirastasāmyātiśayeṣvavasthitaḥ |","reme ramābhirnijakāmasaṃpluto","yathetaro gārhakamedhikāṃścaran|| 43"],"meaning":"परीक्षित्! भगवान्‌की पत्‍नियोंके अलग-अलग महलोंमें ऐसी दिव्य सामग्रियाँ भरी हुई थीं, जिनके बराबर जगत‍्में कहीं भी और कोई भी सामग्री नहीं है; फिर अधिककी तो बात ही क्या है। उन महलोंमें रहकर मति-गतिके परेकी लीला करनेवाले अविनाशी भगवान् श्रीकृष्ण अपने आत्मानन्दमें म‌ग्‍न रहते हुए लक्ष्मीजीकी अंशस्वरूपा उन पत्‍नियोंके साथ ठीक वैसे ही विहार करते थे, जैसे कोई साधारण मनुष्य घर-गृहस्थीमें रहकर गृहस्थ-धर्मके अनुसार आचरण करता हो॥ ४३॥"},{"id":"10.59.44","number":44,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/59/44/","page":509,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इत्थं रमापतिमवाप्य पतिं स्त्रियस्ता","ब्रह्मादयोऽपि न विदुः पदवीं यदीयाम्।","भेजुर्मुदाविरतमेधितयानुराग-","हासावलोकनवसंगमजल्पलज्जाः ॥ ४४"],"iast":["itthaṃ ramāpatimavāpya patiṃ striyastā","brahmādayo'pi na viduḥ padavīṃ yadīyām|","bhejurmudāviratamedhitayānurāga-","hāsāvalokanavasaṃgamajalpalajjāḥ || 44"],"meaning":"परीक्षित्! ब्रह्मा आदि बड़े-बड़े देवता भी भगवान्‌के वास्तविक स्वरूपको और उनकी प्राप्तिके मार्गको नहीं जानते। उन्हीं रमारमण भगवान् श्रीकृष्णको उन स्त्रियोंने पतिके रूपमें प्राप्त किया था। अब नित्य-निरन्तर उनके प्रेम और आनन्दकी अभिवृद्धि होती रहती थी और वे प्रेमभरी मुसकराहट, मधुर चितवन, नवसमागम, प्रेमालाप तथा भाव बढ़ानेवाली लज्जासे युक्त होकर सब प्रकारसे भगवान्‌की सेवा करती रहती थीं॥ ४४॥"},{"id":"10.59.45","number":45,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/59/45/","page":510,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["प्रत्युद्गमासनवरार्हणपादशौच-","ताम्बूलविश्रमणवीजनगन्धमाल्यैः ।","केशप्रसारशयनस्नपनोपहार्यै-","र्दासीशता अपि विभोर्विदधुः स्म दास्यम्॥ ४५"],"iast":["pratyudgamāsanavarārhaṇapādaśauca-","tāmbūlaviśramaṇavījanagandhamālyaiḥ |","keśaprasāraśayanasnapanopahāryai-","rdāsīśatā api vibhorvidadhuḥ sma dāsyam|| 45"],"meaning":"उनमेंसे सभी पत्‍नियोंके साथ सेवा करनेके लिये सैकड़ों दासियाँ रहतीं, फिर भी जब उनके महलमें भगवान् पधारते तब वे स्वयं आगे जाकर आदरपूर्वक उन्हें लिवा लातीं, श्रेष्ठ आसनपर बैठातीं, उत्तम सामग्रियोंसे पूजा करतीं, चरणकमल पखारतीं, पान लगाकर खिलातीं, पाँव दबाकर थकावट दूर करतीं, पंखा झलतीं, इत्र-फुलेल, चन्दन आदि लगातीं, फूलोंके हार पहनातीं, केश सँवारतीं, सुलातीं, स्नान करातीं और अनेक प्रकारके भोजन कराकर अपने ही हाथों भगवान्‌की सेवा करतीं॥ ४५॥"}],"text":[{"b":34155,"kind":"adhyaya_heading","page":503,"text":"अथैकोनषष्टितमोऽध्यायः"},{"b":34156,"kind":"topic_heading","page":503,"text":"भौमासुरका उद्धार और सोलह हजार एक सौ राज- कन्याओंके साथ भगवान्‌का विवाह"},{"b":34157,"kind":"topic_heading","page":503,"text":"राजोवाच"},{"b":34158,"kind":"sanskrit_shloka","page":503,"verses":["10.59.1"],"text":"यथा हतो भगवता भौमो येन च ताः स्त्रियः।"},{"b":34159,"kind":"sanskrit_shloka","page":503,"verses":["10.59.1"],"text":"निरुद्धा एतदाचक्ष्व विक्रमं शार्ङ्गधन्वनः॥ १"},{"b":34160,"kind":"hindi_commentary","page":503,"explains":["10.59.1"],"text":"राजा परीक्षित‍्ने पूछा—भगवन्! भगवान् श्रीकृष्णने भौमासुरको, जिसने उन स्त्रियोंको बंदीगृहमें डाल रखा था, क्यों और कैसे मारा? आप कृपा करके शार्ङ्ग-धनुषधारी भगवान् श्रीकृष्णका वह विचित्र चरित्र सुनाइये॥ १॥"},{"b":34162,"kind":"topic_heading","page":503,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":34163,"kind":"sanskrit_shloka","page":503,"verses":["10.59.2"],"text":"इन्द्रेण हृतच्छत्रेण हृतकुण्डलबन्धुना।"},{"b":34164,"kind":"sanskrit_shloka","page":503,"verses":["10.59.2"],"text":"हृतामराद्रिस्थानेन ज्ञापितो भौमचेष्टितम्।"},{"b":34165,"kind":"sanskrit_shloka","page":503,"verses":["10.59.2"],"text":"सभार्यो गरुडारूढः प्राग्ज्योतिषपुरं ययौ॥ २"},{"b":34166,"kind":"sanskrit_shloka","page":504,"verses":["10.59.3"],"text":"गिरिदुर्गैः शस्त्रदुर्गैर्जला‌ग्‍न्यनिलदुर्गमम्।"},{"b":34167,"kind":"sanskrit_shloka","page":504,"verses":["10.59.3"],"text":"मुरपाशायुतैर्घोरैर्दृढैः सर्वत आवृतम्॥ ३"},{"b":34168,"kind":"sanskrit_shloka","page":504,"verses":["10.59.4"],"text":"गदया निर्बिभेदाद्रीन् शस्त्रदुर्गाणि सायकैः।"},{"b":34169,"kind":"sanskrit_shloka","page":504,"verses":["10.59.4"],"text":"चक्रेणाग्‍निं जलं वायुं मुरपाशांस्तथासिना॥ ४"},{"b":34170,"kind":"sanskrit_shloka","page":504,"verses":["10.59.5"],"text":"शंखनादेन यन्त्राणि हृदयानि मनस्विनाम्।"},{"b":34171,"kind":"sanskrit_shloka","page":504,"verses":["10.59.5"],"text":"प्राकारं गदया गुर्व्या निर्बिभेद गदाधरः॥ ५"},{"b":34172,"kind":"hindi_commentary","page":503,"explains":["10.59.2","10.59.3","10.59.4","10.59.5"],"text":"श्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित्! भौमासुरने वरुणका छत्र, माता अदितिके कुण्डल और मेरु पर्वतपर स्थित देवताओंका मणिपर्वत नामक स्थान छीन लिया था। इसपर सबके राजा इन्द्र द्वारकामें आये और उसकी एक-एक करतूत उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णको सुनायी। अब भगवान् श्रीकृष्ण अपनी प्रिय पत्‍नी सत्यभामाके साथ गरुड़पर सवार हुए और भौमासुरकी राजधानी प्राग्ज्योतिषपुरमें गये॥ २॥ प्राग्ज्योतिषपुरमें प्रवेश करना बहुत कठिन था। पहले तो उसके चारों ओर पहाड़ोंकी किलेबंदी थी, उसके बाद शस्त्रोंका घेरा लगाया हुआ था। फिर जलसे भरी खाईं थी, उसके बाद आग या बिजलीकी चहारदीवारी थी और उसके भीतर वायु (गैस) बंद करके रखा गया था। इससे भी भीतर मुर दैत्यने नगरके चारों ओर अपने दस हजार घोर एवं सुदृढ फंदे (जाल) बिछा रखे थे॥ ३॥ भगवान् श्रीकृष्णने अपनी गदाकी चोटसे पहाड़ोंको तोड़-फोड़ डाला और शस्त्रोंकी मोरचे-बंदीको बाणोंसे छिन्‍न-भिन्‍न कर दिया। चक्रके द्वारा अग्‍नि, जल और वायुकी चहारदीवारियोंको तहस-नहस कर दिया और मुर दैत्यके फंदोंको तलवारसे काट-कूटकर अलग रख दिया॥ ४॥ जो बड़े-बड़े यन्त्र—मशीनें वहाँ लगी हुई थीं, उनको तथा वीरपुरुषोंके हृदयको शंखनादसे विदीर्ण कर दिया और नगरके परकोटेको गदाधर भगवान्‌ने अपनी भारी गदासे ध्वंस कर डाला॥ ५॥"},{"b":34173,"kind":"sanskrit_shloka","page":504,"verses":["10.59.6"],"text":"पांचजन्यध्वनिं श्रुत्वा युगान्ताशनिभीषणम्।"},{"b":34174,"kind":"sanskrit_shloka","page":504,"verses":["10.59.6"],"text":"मुरः शयान उत्तस्थौ दैत्यः पंचशिरा जलात्॥ ६"},{"b":34175,"kind":"sanskrit_shloka","page":504,"verses":["10.59.7"],"text":"त्रिशूलमुद्यम्य सुदुर्निरीक्षणो"},{"b":34176,"kind":"hindi_commentary","page":504,"verses":["10.59.7"],"text":"युगान्तसूर्यानलरोचिरुल्बणः ।"},{"b":34177,"kind":"sanskrit_shloka","page":504,"verses":["10.59.7"],"text":"ग्रसंस्त्रिलोकीमिव पंचभिर्मुखै-"},{"b":34178,"kind":"hindi_commentary","page":504,"verses":["10.59.7"],"text":"रभ्यद्रवत्तार्क्ष्यसुतं यथोरगः॥ ७"},{"b":34179,"kind":"sanskrit_shloka","page":504,"verses":["10.59.8"],"text":"आविध्य शूलं तरसा गरुत्मते"},{"b":34180,"kind":"sanskrit_shloka","page":504,"verses":["10.59.8"],"text":"निरस्य वक्त्रैर्व्यनदत् स पंचभिः।"},{"b":34181,"kind":"sanskrit_shloka","page":504,"verses":["10.59.8"],"text":"स रोदसी सर्वदिशोऽन्तरं महा-"},{"b":34182,"kind":"hindi_commentary","page":504,"verses":["10.59.8"],"text":"नापूरयन्‍नण्डकटाहमावृणोत् ॥ ८"},{"b":34183,"kind":"sanskrit_shloka","page":504,"verses":["10.59.9"],"text":"तदापतद् वै त्रिशिखं गरुत्मते"},{"b":34184,"kind":"sanskrit_shloka","page":504,"verses":["10.59.9"],"text":"हरिः शराभ्यामभिनत्त्रिधौजसा।"},{"b":34185,"kind":"sanskrit_shloka","page":505,"verses":["10.59.9"],"text":"मुखेषु तं चापि शरैरताडयत्"},{"b":34186,"kind":"hindi_commentary","page":505,"verses":["10.59.9"],"text":"तस्मै गदां सोऽपि रुषा व्यमुञ्चत॥ ९"},{"b":34187,"kind":"sanskrit_shloka","page":505,"verses":["10.59.10"],"text":"तामापतन्तीं गदया गदां मृधे"},{"b":34188,"kind":"sanskrit_shloka","page":505,"verses":["10.59.10"],"text":"गदाग्रजो निर्बिभिदे सहस्रधा।"},{"b":34189,"kind":"sanskrit_shloka","page":505,"verses":["10.59.10"],"text":"उद्यम्य बाहूनभिधावतोऽजितः"},{"b":34190,"kind":"sanskrit_shloka","page":505,"verses":["10.59.10"],"text":"शिरांसि चक्रेण जहार लीलया॥ १०"},{"b":34191,"kind":"sanskrit_shloka","page":505,"verses":["10.59.11"],"text":"व्यसुः पपाताम्भसि कृत्तशीर्षो"},{"b":34192,"kind":"sanskrit_shloka","page":505,"verses":["10.59.11"],"text":"निकृत्तशृंगोऽद्रिरिवेन्द्रतेजसा ।"},{"b":34193,"kind":"sanskrit_shloka","page":505,"verses":["10.59.11"],"text":"तस्यात्मजाः सप्त पितुर्वधातुराः"},{"b":34194,"kind":"sanskrit_shloka","page":505,"verses":["10.59.11"],"text":"प्रतिक्रियामर्षजुषः समुद्यताः॥ ११"},{"b":34195,"kind":"sanskrit_shloka","page":505,"verses":["10.59.12"],"text":"ताम्रोऽन्तरिक्षः श्रवणो विभावसु-"},{"b":34196,"kind":"sanskrit_shloka","page":505,"verses":["10.59.12"],"text":"र्वसुर्नभस्वानरुणश्‍च सप्तमः।"},{"b":34197,"kind":"sanskrit_shloka","page":505,"verses":["10.59.12"],"text":"पीठं पुरस्कृत्य चमूपतिं मृधे"},{"b":34198,"kind":"sanskrit_shloka","page":505,"verses":["10.59.12"],"text":"भौमप्रयुक्ता निरगन् धृतायुधाः॥ १२"},{"b":34199,"kind":"sanskrit_shloka","page":505,"verses":["10.59.13"],"text":"प्रायुंजतासाद्य शरानसीन् गदाः"},{"b":34200,"kind":"sanskrit_shloka","page":505,"verses":["10.59.13"],"text":"शक्त्यृष्टिशूलान्यजिते रुषोल्बणाः।"},{"b":34201,"kind":"sanskrit_shloka","page":505,"verses":["10.59.13"],"text":"तच्छस्त्रकूटं भगवान् स्वमार्गणै-"},{"b":34202,"kind":"sanskrit_shloka","page":505,"verses":["10.59.13"],"text":"रमोघवीर्यस्तिलशश्‍चकर्त ह॥ १३"},{"b":34203,"kind":"sanskrit_shloka","page":505,"verses":["10.59.14"],"text":"तान् पीठमुख्याननयद् यमक्षयं"},{"b":34204,"kind":"sanskrit_shloka","page":505,"verses":["10.59.14"],"text":"निकृत्तशीर्षोरुभुजाङ्‌घ्रिवर्मणः।"},{"b":34205,"kind":"sanskrit_shloka","page":505,"verses":["10.59.14"],"text":"स्वानीकपानच्युतचक्रसायकै-"},{"b":34206,"kind":"sanskrit_shloka","page":505,"verses":["10.59.14"],"text":"स्तथा निरस्तान् नरको धरासुतः॥ १४"},{"b":34207,"kind":"sanskrit_shloka","page":505,"verses":["10.59.15"],"text":"निरीक्ष्य दुर्मर्षण आस्रवन्मदै-"},{"b":34208,"kind":"sanskrit_shloka","page":505,"verses":["10.59.15"],"text":"र्गजैः पयोधिप्रभवैर्निराक्रमत्।"},{"b":34209,"kind":"sanskrit_shloka","page":505,"verses":["10.59.15"],"text":"दृष्ट्वा सभार्यं गरुडोपरि स्थितं"},{"b":34210,"kind":"sanskrit_shloka","page":505,"verses":["10.59.15"],"text":"सूर्योपरिष्टात् सतडिद्घनं यथा।"},{"b":34211,"kind":"sanskrit_shloka","page":505,"verses":["10.59.15"],"text":"कृष्णं स तस्मै व्यसृजच्छतघ्नीं"},{"b":34212,"kind":"sanskrit_shloka","page":505,"verses":["10.59.15"],"text":"योधाश्‍च सर्वे युगपत् स्म विव्यधुः॥ १५"},{"b":34213,"kind":"sanskrit_shloka","page":506,"verses":["10.59.16"],"text":"तद् भौमसैन्यं भगवान् गदाग्रजो"},{"b":34214,"kind":"sanskrit_shloka","page":506,"verses":["10.59.16"],"text":"विचित्रवाजैर्निशितैः शिलीमुखैः।"},{"b":34215,"kind":"sanskrit_shloka","page":506,"verses":["10.59.16"],"text":"निकृत्तबाहूरुशिरोध्रविग्रहं"},{"b":34216,"kind":"sanskrit_shloka","page":506,"verses":["10.59.16"],"text":"चकार तर्ह्येव हताश्‍वकुञ्जरम्॥ १६"},{"b":34217,"kind":"hindi_commentary","page":504,"explains":["10.59.6","10.59.7","10.59.8","10.59.9","10.59.10","10.59.11","10.59.12","10.59.13","10.59.14","10.59.15","10.59.16"],"text":"भगवान्‌के पांचजन्य शंखकी ध्वनि प्रलयकालीन बिजलीकी कड़कके समान महाभयंकर थी। उसे सुनकर मुर दैत्यकी नींद टूटी और वह बाहर निकल आया। उसके पाँच सिर थे और अबतक वह जलके भीतर सो रहा था॥ ६॥ वह दैत्य प्रलयकालीन सूर्य और अग्‍निके समान प्रचण्ड तेजस्वी था। वह इतना भयंकर था कि उसकी ओर आँख उठाकर देखना भी आसान काम नहीं था। उसने त्रिशूल उठाया और इस प्रकार भगवान्‌की ओर दौड़ा, जैसे साँप गरुड़जीपर टूट पड़े। उस समय ऐसा मालूम होता था मानो वह अपने पाँचों मुखोंसे त्रिलोकीको निगल जायगा॥ ७॥ उसने अपने त्रिशूलको बड़े वेगसे घुमाकर गरुड़जीपर चलाया और फिर अपने पाँचों मुखोंसे घोर सिंहनाद करने लगा। उसके सिंहनादका महान् शब्द पृथ्वी, आकाश, पाताल और दसों दिशाओंमें फैलकर सारे ब्रह्माण्डमें भर गया॥ ८॥ भगवान् श्रीकृष्णने देखा कि मुर दैत्यका त्रिशूल गरुड़की ओर बड़े वेगसे आ रहा है। तब अपना हस्तकौशल दिखाकर फुर्तीसे उन्होंने दो बाण मारे, जिनसे वह त्रिशूल कटकर तीन टूक हो गया। इसके साथ ही मुर दैत्यके मुखोंमें भी भगवान्‌ने बहुत-से बाण मारे। इससे वह दैत्य अत्यन्त क्रुद्ध हो उठा और उसने भगवान्‌पर अपनी गदा चलायी॥ ९॥ परन्तु भगवान् श्रीकृष्णने अपनी गदाके प्रहारसे मुर दैत्यकी गदाको अपने पास पहुँचनेके पहले ही चूर-चूर कर दिया। अब वह अस्त्रहीन हो जानेके कारण अपनी भुजाएँ फैलाकर श्रीकृष्णकी ओर दौड़ा और उन्होंने खेल-खेलमें ही चक्रसे उसके पाँचों सिर उतार लिये॥ १०॥ सिर कटते ही मुर दैत्यके प्राण-पखेरू उड़ गये और वह ठीक वैसे ही जलमें गिर पड़ा, जैसे इन्द्रके वज्रसे शिखर कट जानेपर कोई पर्वत समुद्रमें गिर पड़ा हो। मुर दैत्यके सात पुत्र थे—ताम्र, अन्तरिक्ष, श्रवण, विभावसु, वसु, नभस्वान् और अरुण। ये अपने पिताकी मृत्युसे अत्यन्त शोकाकुल हो उठे और फिर बदला लेनेके लिये क्रोधसे भरकर शस्त्रास्त्रसे सुसज्जित हो गये तथा पीठ नामक दैत्यको अपना सेनापति बनाकर भौमासुरके आदेशसे श्रीकृष्णपर चढ़ आये॥ ११-१२॥ वे वहाँ आकर बड़े क्रोधसे भगवान् श्रीकृष्णपर बाण, खड्ग, गदा, शक्ति, ऋष्टि और त्रिशूल आदि प्रचण्ड शस्त्रोंकी वर्षा करने लगे। परीक्षित्! भगवान्‌की शक्ति अमोघ और अनन्त है। उन्होंने अपने बाणोंसे उनके कोटि-कोटि शस्त्रास्त्र तिल-तिल करके काट गिराये॥ १३॥ भगवान्‌के शस्त्रप्रहारसे सेनापति पीठ और उसके साथी दैत्योंके सिर, जाँघें, भुजा, पैर और कवच कट गये और उन सभीको भगवान्‌ने यमराजके घर पहुँचा दिया। जब पृथ्वीके पुत्र नरकासुर (भौमासुर) ने देखा कि भगवान् श्रीकृष्णके चक्र और बाणोंसे हमारी सेना और सेनापतियोंका संहार हो गया, तब उसे असह्य क्रोध हुआ। वह समुद्रतटपर पैदा हुए बहुत-से मदवाले हाथियोंकी सेना लेकर नगरसे बाहर निकला। उसने देखा कि भगवान् श्रीकृष्ण अपनी पत्‍नीके साथ आकाशमें गरुड़पर स्थित हैं, जैसे सूर्यके ऊपर बिजलीके साथ वर्षाकालीन श्याममेघ शोभायमान हो। भौमासुरने स्वयं भगवान्‌के ऊपर शतघ्नी नामकी शक्ति चलायी और उसके सब सैनिकोंने भी एक ही साथ उनपर अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र छोड़े॥ १४-१५॥ अब भगवान् श्रीकृष्ण भी चित्र-विचित्र पंखवाले तीखे-तीखे बाण चलाने लगे। इससे उसी समय भौमासुरके सैनिकोंकी भुजाएँ, जाँघें, गर्दन और धड़ कट-कटकर गिरने लगे; हाथी और घोड़े भी मरने लगे॥ १६॥"},{"b":34218,"kind":"sanskrit_shloka","page":506,"verses":["10.59.17"],"text":"यानि योधैः प्रयुक्तानि शस्त्रास्त्राणि कुरूद्वह।"},{"b":34219,"kind":"sanskrit_shloka","page":506,"verses":["10.59.17"],"text":"हरिस्तान्यच्छिनत्तीक्ष्णैः शरैरेकैकशस्त्रिभिः॥ १७"},{"b":34220,"kind":"sanskrit_shloka","page":506,"verses":["10.59.18"],"text":"उह्यमानः सुपर्णेन पक्षाभ्यां निघ्नता गजान्।"},{"b":34221,"kind":"sanskrit_shloka","page":506,"verses":["10.59.18"],"text":"गरुत्मता हन्यमानास्तुण्डपक्षनखैर्गजाः॥ १८"},{"b":34222,"kind":"sanskrit_shloka","page":506,"verses":["10.59.19"],"text":"पुरमेवाविशन्‍नार्ता नरको युध्ययुध्यत।"},{"b":34223,"kind":"sanskrit_shloka","page":506,"verses":["10.59.19"],"text":"दृष्ट्वा विद्रावितं सैन्यं गरुडेनार्दितं स्वकम्॥ १९"},{"b":34224,"kind":"sanskrit_shloka","page":506,"verses":["10.59.20"],"text":"तं भौमः प्राहरच्छक्त्या वज्रः प्रतिहतो यतः।"},{"b":34225,"kind":"sanskrit_shloka","page":506,"verses":["10.59.20"],"text":"नाकम्पत तया विद्धो मालाहत इव द्विपः॥ २०"},{"b":34226,"kind":"sanskrit_shloka","page":506,"verses":["10.59.21"],"text":"शूलं भौमोऽच्युतं हन्तुमाददे वितथोद्यमः।"},{"b":34227,"kind":"sanskrit_shloka","page":506,"verses":["10.59.21"],"text":"तद्विसर्गात् पूर्वमेव नरकस्य शिरो हरिः।"},{"b":34228,"kind":"sanskrit_shloka","page":506,"verses":["10.59.21"],"text":"अपाहरद् गजस्थस्य चक्रेण क्षुरनेमिना॥ २१"},{"b":34229,"kind":"sanskrit_shloka","page":506,"verses":["10.59.22"],"text":"सकुण्डलं चारुकिरीटभूषणं"},{"b":34230,"kind":"sanskrit_shloka","page":506,"verses":["10.59.22"],"text":"बभौ पृथिव्यां पतितं समुज्ज्वलत्।"},{"b":34231,"kind":"sanskrit_shloka","page":506,"verses":["10.59.22"],"text":"हाहेति साध्वित्यृषयः सुरेश्‍वरा"},{"b":34232,"kind":"sanskrit_shloka","page":506,"verses":["10.59.22"],"text":"माल्यैर्मुकुन्दं विकिरन्त ईडिरे॥ २२"},{"b":34233,"kind":"hindi_commentary","page":506,"explains":["10.59.17","10.59.18","10.59.19","10.59.20","10.59.21","10.59.22"],"text":"परीक्षित्! भौमासुरके सैनिकोंने भगवान्‌पर जो-जो अस्त्र-शस्त्र चलाये थे, उनमेंसे प्रत्येकको भगवान्‌ने तीन-तीन तीखे बाणोंसे काट गिराया॥ १७॥ उस समय भगवान् श्रीकृष्ण गरुड़जीपर सवार थे और गरुड़जी अपने पंखोंसे हाथियोंको मार रहे थे। उनकी चोंच, पंख और पंजोंकी मारसे हाथियोंको बड़ी पीड़ा हुई और वे सब-के-सब आर्त होकर युद्धभूमिसे भागकर नगरमें घुस गये। अब वहाँ अकेला भौमासुर ही लड़ता रहा। जब उसने देखा कि गरुड़जीकी मारसे पीड़ित होकर मेरी सेना भाग रही है, तब उसने उनपर वह शक्ति चलायी, जिसने वज्रको भी विफल कर दिया था। परन्तु उसकी चोटसे पक्षिराज गरुड़ तनिक भी विचलित न हुए, मानो किसीने मतवाले गजराजपर फूलोंकी मालासे प्रहार किया हो॥ १८—२०॥ अब भौमासुरने देखा कि मेरी एक भी चाल नहीं चलती, सारे उद्योग विफल होते जा रहे हैं, तब उसने श्रीकृष्णको मार डालनेके लिये एक त्रिशूल उठाया। परन्तु उसे अभी वह छोड़ भी न पाया था कि भगवान् श्रीकृष्णने छुरेके समान तीखी धारवाले चक्रसे हाथीपर बैठे हुए भौमासुरका सिर काट डाला॥ २१॥ उसका जगमगाता हुआ सिर कुण्डल और सुन्दर किरीटके सहित पृथ्वीपर गिर पड़ा। उसे देखकर भौमासुरके सगे-सम्बन्धी हाय-हाय पुकार उठे, ऋषिलोग ‘साधु साधु’ कहने लगे और देवतालोग भगवान्‌पर पुष्पोंकी वर्षा करते हुए स्तुति करने लगे॥ २२॥"},{"b":34234,"kind":"sanskrit_shloka","page":506,"verses":["10.59.23"],"text":"ततश्‍च भूः कृष्णमुपेत्य कुण्डले"},{"b":34235,"kind":"sanskrit_shloka","page":506,"verses":["10.59.23"],"text":"प्रतप्तजाम्बूनदरत्‍नभास्वरे ।"},{"b":34236,"kind":"sanskrit_shloka","page":506,"verses":["10.59.23"],"text":"सवैजयन्त्या वनमालयार्पयत्"},{"b":34237,"kind":"sanskrit_shloka","page":506,"verses":["10.59.23"],"text":"प्राचेतसं छत्रमथो महामणिम्॥ २३"},{"b":34238,"kind":"sanskrit_shloka","page":507,"verses":["10.59.24"],"text":"अस्तौषीदथ विश्‍वेशं देवी देववरार्चितम्।"},{"b":34239,"kind":"sanskrit_shloka","page":507,"verses":["10.59.24"],"text":"प्रांजलिः प्रणता राजन् भक्तिप्रवणया धिया॥ २४"},{"b":34240,"kind":"hindi_translation","page":506,"explains":["10.59.23","10.59.24"],"text":"अब पृथ्वी भगवान्‌के पास आयी। उसने भगवान् श्रीकृष्णके गलेमें वैजयन्तीके साथ वनमाला पहना दी और अदिति माताके जगमगाते हुए कुण्डल, जो तपाये हुए सोनेके एवं रत्‍नजटित थे, भगवान्‌को दे दिये तथा वरुणका छत्र और साथ ही एक महामणि भी उनको दी॥ २३॥ राजन्! इसके बाद पृथ्वीदेवी बड़े-बड़े देवताओंके द्वारा पूजित विश्‍वेश्‍वर भगवान् श्रीकृष्णको प्रणाम करके हाथ जोड़कर भक्तिभावभरे हृदयसे उनकी स्तुति करने लगीं॥ २४॥"},{"b":34241,"kind":"topic_heading","page":507,"text":"भूमिरुवाच"},{"b":34242,"kind":"sanskrit_shloka","page":507,"verses":["10.59.25"],"text":"नमस्ते देवदेवेश शंखचक्रगदाधर।"},{"b":34243,"kind":"sanskrit_shloka","page":507,"verses":["10.59.25"],"text":"भक्तेच्छोपात्तरूपाय परमात्मन् नमोऽस्तु ते॥ २५"},{"b":34244,"kind":"sanskrit_shloka","page":507,"verses":["10.59.26"],"text":"नमः पंकजनाभाय नमः पंकजमालिने।"},{"b":34245,"kind":"sanskrit_shloka","page":507,"verses":["10.59.26"],"text":"नमः पंकजनेत्राय नमस्ते पंकजाङ्‌घ्र‌ये॥ २६"},{"b":34246,"kind":"sanskrit_shloka","page":507,"verses":["10.59.27"],"text":"नमो भगवते तुभ्यं वासुदेवाय विष्णवे।"},{"b":34247,"kind":"sanskrit_shloka","page":507,"verses":["10.59.27"],"text":"पुरुषायादिबीजाय पूर्णबोधाय ते नमः॥ २७"},{"b":34248,"kind":"sanskrit_shloka","page":507,"verses":["10.59.28"],"text":"अजाय जनयित्रेऽस्य ब्रह्मणेऽनन्तशक्तये।"},{"b":34249,"kind":"sanskrit_shloka","page":507,"verses":["10.59.28"],"text":"परावरात्मन् भूतात्मन् परमात्मन् नमोऽस्तु ते॥ २८"},{"b":34250,"kind":"hindi_commentary","page":507,"explains":["10.59.25","10.59.26","10.59.27","10.59.28"],"text":"पृथ्वीदेवीने कहा—शंखचक्रगदाधारी देव-देवेश्‍वर! मैं आपको नमस्कार करती हूँ। परमात्मन्! आप अपने भक्तोंकी इच्छा पूर्ण करनेके लिये उसीके अनुसार रूप प्रकट किया करते हैं। आपको मैं नमस्कार करती हूँ॥ २५॥ प्रभो! आपकी नाभिसे कमल प्रकट हुआ है। आप कमलकी माला पहनते हैं। आपके नेत्र कमलसे खिले हुए और शान्तिदायक हैं। आपके चरण कमलके समान सुकुमार और भक्तोंके हृदयको शीतल करनेवाले हैं। आपको मैं बार-बार नमस्कार करती हूँ॥ २६॥ आप समग्र ऐश्‍वर्य, धर्म, यश, सम्पत्ति, ज्ञान और वैराग्यके आश्रय हैं। आप सर्वव्यापक होनेपर भी स्वयं वसुदेवनन्दनके रूपमें प्रकट हैं। मैं आपको नमस्कार करती हूँ। आप ही पुरुष हैं और समस्त कारणोंके भी परम कारण हैं। आप स्वयं पूर्ण ज्ञानस्वरूप हैं। मैं आपको नमस्कार करती हूँ॥ २७॥ आप स्वयं तो हैं जन्मरहित, परन्तु इस जगत‍्के जन्मदाता आप ही हैं। आप ही अनन्त शक्तियोंके आश्रय ब्रह्म हैं। जगत‍्का जो कुछ भी कार्य-कारणमय रूप है, जितने भी प्राणी या अप्राणी हैं— सब आपके ही स्वरूप हैं। परमात्मन्! आपके चरणोंमें मेरे बार-बार नमस्कार॥ २८॥"},{"b":34251,"kind":"sanskrit_shloka","page":507,"verses":["10.59.29"],"text":"त्वं वै सिसृक्षू रज उत्कटं प्रभो"},{"b":34252,"kind":"sanskrit_shloka","page":507,"verses":["10.59.29"],"text":"तमो निरोधाय बिभर्ष्यसंवृतः।"},{"b":34253,"kind":"sanskrit_shloka","page":507,"verses":["10.59.29"],"text":"स्थानाय सत्त्वं जगतो जगत्पते"},{"b":34254,"kind":"sanskrit_shloka","page":507,"verses":["10.59.29"],"text":"कालः प्रधानं पुरुषो भवान् परः॥ २९"},{"b":34255,"kind":"sanskrit_shloka","page":507,"verses":["10.59.30"],"text":"अहं पयो ज्योतिरथानिलो नभो"},{"b":34256,"kind":"sanskrit_shloka","page":507,"verses":["10.59.30"],"text":"मात्राणि देवा मन इन्द्रियाणि।"},{"b":34257,"kind":"sanskrit_shloka","page":507,"verses":["10.59.30"],"text":"कर्ता महानित्यखिलं चराचरं"},{"b":34258,"kind":"sanskrit_shloka","page":507,"verses":["10.59.30"],"text":"त्वय्यद्वितीये भगवन्‍नयं भ्रमः॥ ३०"},{"b":34259,"kind":"sanskrit_shloka","page":508,"verses":["10.59.31"],"text":"तस्यात्मजोऽयं तव पादपंकजं"},{"b":34260,"kind":"sanskrit_shloka","page":508,"verses":["10.59.31"],"text":"भीतः प्रपन्‍नार्तिहरोपसादितः।"},{"b":34261,"kind":"sanskrit_shloka","page":508,"verses":["10.59.31"],"text":"तत् पालयैनं कुरु हस्तपंकजं"},{"b":34262,"kind":"sanskrit_shloka","page":508,"verses":["10.59.31"],"text":"शिरस्यमुष्याखिलकल्मषापहम् ॥ ३१"},{"b":34263,"kind":"hindi_translation","page":507,"explains":["10.59.29","10.59.30","10.59.31"],"text":"प्रभो! जब आप जगत‍्की रचना करना चाहते हैं, तब उत्कट रजोगुणको, और जब इसका प्रलय करना चाहते हैं तब तमोगुणको, तथा जब इसका पालन करना चाहते हैं तब सत्त्वगुणको स्वीकार करते हैं। परन्तु यह सब करनेपर भी आप इन गुणोंसे ढकते नहीं, लिप्त नहीं होते। जगत्पते! आप स्वयं ही प्रकृति, पुरुष और दोनोंके संयोग-वियोगके हेतु काल हैं तथा उन तीनोंसे परे भी हैं॥ २९॥ भगवन्! मैं (पृथ्वी), जल, अग्‍नि, वायु, आकाश, पंचतन्मात्राएँ, मन, इन्द्रिय और इनके अधिष्ठातृ-देवता, अहंकार और महत्तत्त्व—कहाँतक कहूँ, यह सम्पूर्ण चराचर जगत् आपके अद्वितीय स्वरूपमें भ्रमके कारण ही पृथक् प्रतीत हो रहा है॥ ३०॥ शरणागत-भय-भंजन प्रभो! मेरे पुत्र भौमासुरका यह पुत्र भगदत्त अत्यन्त भयभीत हो रहा है। मैं इसे आपके चरणकमलोंकी शरणमें ले आयी हूँ। प्रभो! आप इसकी रक्षा कीजिये और इसके सिरपर अपना वह करकमल रखिये जो सारे जगत‍्के समस्त पाप-तापोंको नष्ट करनेवाला है॥ ३१॥"},{"b":34264,"kind":"topic_heading","page":508,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":34265,"kind":"sanskrit_shloka","page":508,"verses":["10.59.32"],"text":"इति भूम्यार्थितो वाग्भिर्भगवान् भक्तिनम्रया।"},{"b":34266,"kind":"sanskrit_shloka","page":508,"verses":["10.59.32"],"text":"दत्त्वाभयं भौमगृहं प्राविशत् सकलर्द्धिमत्॥ ३२"},{"b":34267,"kind":"sanskrit_shloka","page":508,"verses":["10.59.33"],"text":"तत्र राजन्यकन्यानां षट्सहस्राधिकायुतम्।"},{"b":34268,"kind":"sanskrit_shloka","page":508,"verses":["10.59.33"],"text":"भौमाहृतानां विक्रम्य राजभ्यो ददृशे हरिः॥ ३३"},{"b":34269,"kind":"sanskrit_shloka","page":508,"verses":["10.59.34"],"text":"तं प्रविष्टं स्त्रियो वीक्ष्य नरवीरं विमोहिताः।"},{"b":34270,"kind":"sanskrit_shloka","page":508,"verses":["10.59.34"],"text":"मनसा वव्रिरेऽभीष्टं पतिं दैवोपसादितम्॥ ३४"},{"b":34271,"kind":"sanskrit_shloka","page":508,"verses":["10.59.35"],"text":"भूयात् पतिरयं मह्यं धाता तदनुमोदताम्।"},{"b":34272,"kind":"sanskrit_shloka","page":508,"verses":["10.59.35"],"text":"इति सर्वाः पृथक् कृष्णे भावेन हृदयं दधुः॥ ३५"},{"b":34273,"kind":"sanskrit_shloka","page":508,"verses":["10.59.36"],"text":"ताः प्राहिणोद् द्वारवतीं सुमृष्टविरजोऽम्बराः।"},{"b":34274,"kind":"sanskrit_shloka","page":508,"verses":["10.59.36"],"text":"नरयानैर्महाकोशान् रथाश्‍वान् द्रविणं महत्॥ ३६"},{"b":34275,"kind":"sanskrit_shloka","page":508,"verses":["10.59.37"],"text":"ऐरावतकुलेभांश्‍च चतुर्दन्तांस्तरस्विनः।"},{"b":34276,"kind":"sanskrit_shloka","page":508,"verses":["10.59.37"],"text":"पाण्डुरांश्‍च चतुःषष्टिं प्रेषयामास केशवः॥ ३७"},{"b":34277,"kind":"hindi_commentary","page":508,"explains":["10.59.32","10.59.33","10.59.34","10.59.35","10.59.36","10.59.37"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब पृथ्वीने भक्तिभावसे विनम्र होकर इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति-प्रार्थना की, तब उन्होंने भगदत्तको अभयदान दिया और भौमासुरके समस्त सम्पत्तियोंसे सम्पन्‍न महलमें प्रवेश किया॥ ३२॥ वहाँ जाकर भगवान्‌ने देखा कि भौमासुरने बलपूर्वक राजाओंसे सोलह हजार राजकुमारियाँ छीनकर अपने यहाँ रख छोड़ी थीं॥ ३३॥ जब उन राजकुमारियोंने अन्तःपुरमें पधारे हुए नरश्रेष्ठ भगवान् श्रीकृष्णको देखा, तब वे मोहित हो गयीं और उन्होंने उनकी अहैतुकी कृपा तथा अपना सौभाग्य समझकर मन-ही-मन भगवान्‌को अपने परम प्रियतम पतिके रूपमें वरण कर लिया॥ ३४॥ उन राजकुमारियोंमेंसे प्रत्येकने अलग-अलग अपने मनमें यही निश्‍चय किया कि ‘ये श्रीकृष्ण ही मेरे पति हों और विधाता मेरी इस अभिलाषाको पूर्ण करें।’ इस प्रकार उन्होंने प्रेम-भावसे अपना हृदय भगवान्‌के प्रति निछावर कर दिया॥ ३५॥ तब भगवान् श्रीकृष्णने उन राजकुमारियोंको सुन्दर-सुन्दर निर्मल वस्त्राभूषण पहनाकर पालकियोंसे द्वारका भेज दिया और उनके साथ ही बहुत-से खजाने, रथ, घोड़े तथा अतुल सम्पत्ति भी भेजी॥ ३६॥ ऐरावतके वंशमें उत्पन्‍न हुए अत्यन्त वेगवान् चार-चार दाँतोंवाले सफेद रंगके चौंसठ हाथी भी भगवान्‌ने वहाँसे द्वारका भेजे॥ ३७॥"},{"b":34278,"kind":"sanskrit_shloka","page":508,"verses":["10.59.38"],"text":"गत्वा सुरेन्द्रभवनं दत्त्वादित्यै च कुण्डले।"},{"b":34279,"kind":"sanskrit_shloka","page":508,"verses":["10.59.38"],"text":"पूजितस्त्रिदशेन्द्रेण सहेन्द्राण्या च सप्रियः॥ ३८"},{"b":34280,"kind":"sanskrit_shloka","page":508,"verses":["10.59.39"],"text":"चोदितो भार्ययोत्पाट्य पारिजातं गरुत्मति।"},{"b":34281,"kind":"sanskrit_shloka","page":508,"verses":["10.59.39"],"text":"आरोप्य सेन्द्रान् विबुधान् निर्जित्योपानयत् पुरम्॥ ३९"},{"b":34282,"kind":"sanskrit_shloka","page":509,"verses":["10.59.40"],"text":"स्थापितः सत्यभामाया गृहोद्यानोपशोभनः।"},{"b":34283,"kind":"topic_heading","page":509,"verses":["10.59.40"],"text":"अन्वगुर्भ्रमराः स्वर्गात् तद्गन्धासवलम्पटाः॥ ४०"},{"b":34284,"kind":"sanskrit_shloka","page":509,"verses":["10.59.41"],"text":"ययाच आनम्य किरीटकोटिभिः"},{"b":34285,"kind":"sanskrit_shloka","page":509,"verses":["10.59.41"],"text":"पादौ स्पृशन्‍नच्युतमर्थसाधनम्।"},{"b":34286,"kind":"sanskrit_shloka","page":509,"verses":["10.59.41"],"text":"सिद्धार्थ एतेन विगृह्यते महा-"},{"b":34287,"kind":"sanskrit_shloka","page":509,"verses":["10.59.41"],"text":"नहो सुराणां च तमो धिगाढ्यताम्॥ ४१"},{"b":34288,"kind":"hindi_commentary","page":508,"explains":["10.59.38","10.59.39","10.59.40","10.59.41"],"text":"इसके बाद भगवान् श्रीकृष्ण अमरावतीमें स्थित देवराज इन्द्रके महलोंमें गये। वहाँ देवराज इन्द्रने अपनी पत्‍नी इन्द्राणीके साथ सत्यभामाजी और भगवान् श्रीकृष्णकी पूजा की, तब भगवान्‌ने अदितिके कुण्डल उन्हें दे दिये॥ ३८॥ वहाँसे लौटते समय सत्यभामाजीकी प्रेरणासे भगवान् श्रीकृष्णने कल्पवृक्ष उखाड़कर गरुड़पर रख लिया और देवराज इन्द्र तथा समस्त देवताओंको जीतकर उसे द्वारकामें ले आये॥ ३९॥ भगवान्‌ने उसे सत्यभामाके महलके बगीचेमें लगा दिया। इससे उस बगीचेकी शोभा अत्यन्त बढ़ गयी। कल्पवृक्षके साथ उसके गन्ध और मकरन्दके लोभी भौंरे स्वर्गसे द्वारकामें चले आये थे॥ ४०॥ परीक्षित्! देखो तो सही, जब इन्द्रको अपना काम बनाना था, तब तो उन्होंने अपना सिर झुकाकर मुकुटकी नोकसे भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंका स्पर्श करके उनसे सहायताकी भिक्षा माँगी थी, परन्तु जब काम बन गया, तब उन्होंने उन्हीं भगवान् श्रीकृष्णसे लड़ाई ठान ली। सचमुच ये देवता भी बड़े तमोगुणी हैं और सबसे बड़ा दोष तो उनमें धनाढ्यताका है। धिक्कार है ऐसी धनाढ्यताको॥ ४१॥"},{"b":34289,"kind":"sanskrit_shloka","page":509,"verses":["10.59.42"],"text":"अथो मुहूर्त एकस्मिन् नानागारेषु ताः स्त्रियः।"},{"b":34290,"kind":"sanskrit_shloka","page":509,"verses":["10.59.42"],"text":"यथोपयेमे भगवांस्तावद्रूपधरोऽव्ययः॥ ४२"},{"b":34291,"kind":"sanskrit_shloka","page":509,"verses":["10.59.43"],"text":"गृहेषु तासामनपाय्यतर्क्यकृ-"},{"b":34292,"kind":"sanskrit_shloka","page":509,"verses":["10.59.43"],"text":"न्‍निरस्तसाम्यातिशयेष्ववस्थितः ।"},{"b":34293,"kind":"sanskrit_shloka","page":509,"verses":["10.59.43"],"text":"रेमे रमाभिर्निजकामसंप्लुतो"},{"b":34294,"kind":"sanskrit_shloka","page":509,"verses":["10.59.43"],"text":"यथेतरो गार्हकमेधिकांश्‍चरन्॥ ४३"},{"b":34295,"kind":"sanskrit_shloka","page":509,"verses":["10.59.44"],"text":"इत्थं रमापतिमवाप्य पतिं स्त्रियस्ता"},{"b":34296,"kind":"sanskrit_shloka","page":509,"verses":["10.59.44"],"text":"ब्रह्मादयोऽपि न विदुः पदवीं यदीयाम्।"},{"b":34297,"kind":"sanskrit_shloka","page":509,"verses":["10.59.44"],"text":"भेजुर्मुदाविरतमेधितयानुराग-"},{"b":34298,"kind":"sanskrit_shloka","page":509,"verses":["10.59.44"],"text":"हासावलोकनवसंगमजल्पलज्जाः ॥ ४४"},{"b":34299,"kind":"sanskrit_shloka","page":510,"verses":["10.59.45"],"text":"प्रत्युद्गमासनवरार्हणपादशौच-"},{"b":34300,"kind":"sanskrit_shloka","page":510,"verses":["10.59.45"],"text":"ताम्बूलविश्रमणवीजनगन्धमाल्यैः ।"},{"b":34301,"kind":"sanskrit_shloka","page":510,"verses":["10.59.45"],"text":"केशप्रसारशयनस्नपनोपहार्यै-"},{"b":34302,"kind":"sanskrit_shloka","page":510,"verses":["10.59.45"],"text":"र्दासीशता अपि विभोर्विदधुः स्म दास्यम्॥ ४५"},{"b":34303,"kind":"hindi_commentary","page":509,"explains":["10.59.42","10.59.43","10.59.44","10.59.45"],"text":"तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्णने एक ही मुहूर्तमें अलग-अलग भवनोंमें अलग-अलग रूप धारण करके एक ही साथ सब राजकुमारियोंका शास्त्रोक्त विधिसे पाणिग्रहण किया। सर्वशक्तिमान् अविनाशी भगवान्‌के लिये इसमें आश्‍चर्यकी कौन-सी बात है॥ ४२॥ परीक्षित्! भगवान्‌की पत्‍नियोंके अलग-अलग महलोंमें ऐसी दिव्य सामग्रियाँ भरी हुई थीं, जिनके बराबर जगत‍्में कहीं भी और कोई भी सामग्री नहीं है; फिर अधिककी तो बात ही क्या है। उन महलोंमें रहकर मति-गतिके परेकी लीला करनेवाले अविनाशी भगवान् श्रीकृष्ण अपने आत्मानन्दमें म‌ग्‍न रहते हुए लक्ष्मीजीकी अंशस्वरूपा उन पत्‍नियोंके साथ ठीक वैसे ही विहार करते थे, जैसे कोई साधारण मनुष्य घर-गृहस्थीमें रहकर गृहस्थ-धर्मके अनुसार आचरण करता हो॥ ४३॥ परीक्षित्! ब्रह्मा आदि बड़े-बड़े देवता भी भगवान्‌के वास्तविक स्वरूपको और उनकी प्राप्तिके मार्गको नहीं जानते। उन्हीं रमारमण भगवान् श्रीकृष्णको उन स्त्रियोंने पतिके रूपमें प्राप्त किया था। अब नित्य-निरन्तर उनके प्रेम और आनन्दकी अभिवृद्धि होती रहती थी और वे प्रेमभरी मुसकराहट, मधुर चितवन, नवसमागम, प्रेमालाप तथा भाव बढ़ानेवाली लज्जासे युक्त होकर सब प्रकारसे भगवान्‌की सेवा करती रहती थीं॥ ४४॥ उनमेंसे सभी पत्‍नियोंके साथ सेवा करनेके लिये सैकड़ों दासियाँ रहतीं, फिर भी जब उनके महलमें भगवान् पधारते तब वे स्वयं आगे जाकर आदरपूर्वक उन्हें लिवा लातीं, श्रेष्ठ आसनपर बैठातीं, उत्तम सामग्रियोंसे पूजा करतीं, चरणकमल पखारतीं, पान लगाकर खिलातीं, पाँव दबाकर थकावट दूर करतीं, पंखा झलतीं, इत्र-फुलेल, चन्दन आदि लगातीं, फूलोंके हार पहनातीं, केश सँवारतीं, सुलातीं, स्नान करातीं और अनेक प्रकारके भोजन कराकर अपने ही हाथों भगवान्‌की सेवा करतीं॥ ४५॥"},{"b":34304,"kind":"hindi_translation","page":510,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे पारिजातहरणनरकवधो नाम एकोनषष्टितमोऽध्यायः॥ ५९॥"}],"notes":[],"corrections":{"count":3,"list":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/shuddhi/"}}