{"id":"11.11","title":"एकादश स्कन्ध · अध्याय 11","part":"एकादश स्कन्ध","heading":"अथैकादशोऽध्यायः","topics":["बद्ध, मुक्त और भक्तजनोंके लक्षण"],"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/11/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 11.11.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/11/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[781,787]},"verses":[{"id":"11.11.1","number":1,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/11/1/","page":781,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["बद्धो मुक्त इति व्याख्या गुणतो मे न वस्तुतः।","गुणस्य मायामूलत्वान्‍न मे मोक्षो न बन्धनम्॥ १"],"iast":["baddho mukta iti vyākhyā guṇato me na vastutaḥ|","guṇasya māyāmūlatvānna me mokṣo na bandhanam|| 1"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्णने कहा—प्यारे उद्धव! आत्मा बद्ध है या मुक्त है, इस प्रकारकी व्याख्या या व्यवहार मेरे अधीन रहनेवाले सत्त्वादि गुणोंकी उपाधिसे ही होता है। वस्तुतः—तत्त्वदृष्टिसे नहीं। सभी गुण माया-मूलक हैं—इन्द्रजाल हैं—जादूके खेलके समान हैं। इसलिये न मेरा मोक्ष है, न तो मेरा बन्धन ही है॥ १॥"},{"id":"11.11.2","number":2,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/11/2/","page":781,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["शोकमोहौ सुखं दुःखं देहापत्तिश्‍च मायया।","स्वप्नो यथाऽऽत्मनः ख्यातिः संसृतिर्न तु वास्तवी॥ २"],"iast":["śokamohau sukhaṃ duḥkhaṃ dehāpattiśca māyayā|","svapno yathā''tmanaḥ khyātiḥ saṃsṛtirna tu vāstavī|| 2"],"meaning":"जैसे स्वप्न बुद्धिका विवर्त है—उसमें बिना हुए ही भासता है—मिथ्या है, वैसे ही शोक-मोह, सुख-दुःख, शरीरकी उत्पत्ति और मृत्यु—यह सब संसारका बखेड़ा माया (अविद्या) के कारण प्रतीत होनेपर भी वास्तविक नहीं है॥ २॥"},{"id":"11.11.3","number":3,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/11/3/","page":781,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["विद्याविद्ये मम तनू विद्ध्युद्धव शरीरिणाम्।","मोक्षबन्धकरी आद्ये मायया मे विनिर्मिते॥ ३"],"iast":["vidyāvidye mama tanū viddhyuddhava śarīriṇām|","mokṣabandhakarī ādye māyayā me vinirmite|| 3"],"meaning":"उद्धव! शरीरधारियोंको मुक्तिका अनुभव करानेवाली आत्मविद्या और बन्धनका अनुभव करानेवाली अविद्या—ये दोनों ही मेरी अनादि शक्तियाँ हैं। मेरी मायासे ही इनकी रचना हुई है। इनका कोई वास्तविक अस्तित्व नहीं है॥ ३॥"},{"id":"11.11.4","number":4,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/11/4/","page":781,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["एकस्यैव ममांशस्य जीवस्यैव महामते।","बन्धोऽस्याविद्ययानादिर्विद्यया च तथेतरः॥ ४"],"iast":["ekasyaiva mamāṃśasya jīvasyaiva mahāmate|","bandho'syāvidyayānādirvidyayā ca tathetaraḥ|| 4"],"meaning":"भाई! तुम तो स्वयं बड़े बुद्धिमान् हो, विचार करो—जीव तो एक ही है। वह व्यवहारके लिये ही मेरे अंशके रूपमें कल्पित हुआ है, वस्तुतः मेरा स्वरूप ही है। आत्मज्ञानसे सम्पन्‍न होनेपर उसे मुक्त कहते हैं और आत्माका ज्ञान न होनेसे बद्ध। और यह अज्ञान अनादि होनेसे बन्धन भी अनादि कहलाता है॥ ४॥"},{"id":"11.11.5","number":5,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/11/5/","page":781,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["अथ बद्धस्य मुक्तस्य वैलक्षण्यं वदामि ते।","विरुद्धधर्मिणोस्तात स्थितयोरेकधर्मिणि॥ ५"],"iast":["atha baddhasya muktasya vailakṣaṇyaṃ vadāmi te|","viruddhadharmiṇostāta sthitayorekadharmiṇi|| 5"],"meaning":"इस प्रकार मुझ एक ही धर्मीमें रहनेपर भी जो शोक और आनन्दरूप विरुद्ध धर्मवाले जान पड़ते हैं, उन बद्ध और मुक्त जीवका भेद मैं बतलाता हूँ॥ ५॥"},{"id":"11.11.6","number":6,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/11/6/","page":781,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["सुपर्णावेतौ सदृशौ सखायौ","यदृच्छयैतौ कृतनीडौ च वृक्षे।","एकस्तयोः खादति पिप्पलान्‍न-","मन्यो निरन्‍नोऽपि बलेन भूयान्॥ ६"],"iast":["suparṇāvetau sadṛśau sakhāyau","yadṛcchayaitau kṛtanīḍau ca vṛkṣe|","ekastayoḥ khādati pippalānna-","manyo niranno'pi balena bhūyān|| 6"],"meaning":"(वह भेद दो प्रकारका है—एक तो नित्यमुक्त ईश्‍वरसे जीवका भेद, और दूसरा मुक्त-बद्ध जीवका भेद। पहला सुनो)—जीव और ईश्‍वर बद्ध और मुक्तके भेदसे भिन्‍न-भिन्‍न होनेपर भी एक ही शरीरमें नियन्ता और नियन्त्रितके रूपसे स्थित हैं। ऐसा समझो कि शरीर एक वृक्ष है, इसमें हृदयका घोंसला बनाकर जीव और ईश्‍वर नामके दो पक्षी रहते हैं। वे दोनों चेतन होनेके कारण समान हैं और कभी न बिछुड़नेके कारण सखा हैं। इनके निवास करनेका कारण केवल लीला ही है। इतनी समानता होनेपर भी जीव तो शरीररूप वृक्षके फल सुख-दुःख आदि भोगता है, परन्तु ईश्‍वर उन्हें न भोगकर कर्मफल सुख-दुःख आदिसे असंग और उनका साक्षीमात्र रहता है। अभोक्ता होनेपर भी ईश्‍वरकी यह विलक्षणता है कि वह ज्ञान, ऐश्‍वर्य, आनन्द और सामर्थ्य आदिमें भोक्ता जीवसे बढ़कर है॥ ६॥"},{"id":"11.11.7","number":7,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/11/7/","page":782,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["आत्मानमन्यं च स वेद विद्वा-","नपिप्पलादो न तु पिप्पलादः।","योऽविद्यया युक् स तु नित्यबद्धो","विद्यामयो यः स तु नित्यमुक्तः॥ ७"],"iast":["ātmānamanyaṃ ca sa veda vidvā-","napippalādo na tu pippalādaḥ|","yo'vidyayā yuk sa tu nityabaddho","vidyāmayo yaḥ sa tu nityamuktaḥ|| 7"],"meaning":"साथ ही एक यह भी विलक्षणता है कि अभोक्ता ईश्‍वर तो अपने वास्तविक स्वरूप और इसके अतिरिक्त जगत‍्को भी जानता है, परन्तु भोक्ता जीव न अपने वास्तविक रूपको जानता है और न अपनेसे अतिरिक्तको! इन दोनोंमें जीव तो अविद्यासे युक्त होनेके कारण नित्यबद्ध है और ईश्‍वर विद्यास्वरूप होनेके कारण नित्यमुक्त है॥ ७॥"},{"id":"11.11.8","number":8,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/11/8/","page":782,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["देहस्थोऽपि न देहस्थो विद्वान् स्वप्नाद् यथोत्थितः।","अदेहस्थोऽपि देहस्थः कुमतिः स्वप्नदृग् यथा॥ ८"],"iast":["dehastho'pi na dehastho vidvān svapnād yathotthitaḥ|","adehastho'pi dehasthaḥ kumatiḥ svapnadṛg yathā|| 8"],"meaning":"प्यारे उद्धव! ज्ञानसम्पन्‍न पुरुष भी मुक्त ही है; जैसे स्वप्न टूट जानेपर जगा हुआ पुरुष स्वप्नके स्मर्यमाण शरीरसे कोई सम्बन्ध नहीं रखता, वैसे ही ज्ञानी पुरुष सूक्ष्म और स्थूलशरीरमें रहनेपर भी उनसे किसी प्रकारका सम्बन्ध नहीं रखता, परन्तु अज्ञानी पुरुष वास्तवमें शरीरसे कोई सम्बन्ध न रखनेपर भी अज्ञानके कारण शरीरमें ही स्थित रहता है, जैसे स्वप्न देखनेवाला पुरुष स्वप्न देखते समय स्वाप्निक शरीरमें बँध जाता है॥ ८॥"},{"id":"11.11.9","number":9,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/11/9/","page":782,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["इन्द्रियैरिन्द्रियार्थेषु गुणैरपि गुणेषु च।","गृह्यमाणेष्वहंकुर्यान्‍न विद्वान् यस्त्वविक्रियः॥ ९"],"iast":["indriyairindriyārtheṣu guṇairapi guṇeṣu ca|","gṛhyamāṇeṣvahaṃkuryānna vidvān yastvavikriyaḥ|| 9"],"meaning":"व्यवहारादिमें इन्द्रियाँ शब्द-स्पर्शादि विषयोंको ग्रहण करती हैं; क्योंकि यह तो नियम ही है कि गुण ही गुणको ग्रहण करते हैं, आत्मा नहीं। इसलिये जिसने अपने निर्विकार आत्मस्वरूपको समझ लिया है, वह उन विषयोंके ग्रहण-त्यागमें किसी प्रकारका अभिमान नहीं करता॥ ९॥"},{"id":"11.11.10","number":10,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/11/10/","page":782,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["दैवाधीने शरीरेऽस्मिन् गुणभाव्येन कर्मणा।","वर्तमानोऽबुधस्तत्र कर्तास्मीति निबद्ध्यते॥ १०"],"iast":["daivādhīne śarīre'smin guṇabhāvyena karmaṇā|","vartamāno'budhastatra kartāsmīti nibaddhyate|| 10"],"meaning":"यह शरीर प्रारब्धके अधीन है। इससे शारीरिक और मानसिक जितने भी कर्म होते हैं, सब गुणोंकी प्रेरणासे ही होते हैं। अज्ञानी पुरुष झूठमूठ अपनेको उन ग्रहण-त्याग आदि कर्मोंका कर्ता मान बैठता है और इसी अभिमानके कारण वह बँध जाता है॥ १०॥"},{"id":"11.11.11","number":11,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/11/11/","page":782,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["एवं विरक्तः शयने आसनाटनमज्जने।","दर्शनस्पर्शनघ्राणभोजनश्रवणादिषु ॥ ११"],"iast":["evaṃ viraktaḥ śayane āsanāṭanamajjane|","darśanasparśanaghrāṇabhojanaśravaṇādiṣu || 11"],"meaning":"प्यारे उद्धव! पूर्वोक्त पद्धतिसे विचार करके विवेकी पुरुष समस्त विषयोंसे विरक्त रहता है और सोने-बैठने, घूमने-फिरने, नहाने, देखने, छूने, सूँघने, खाने और सुनने आदि क्रियाओंमें अपनेको कर्ता नहीं मानता, बल्कि गुणोंको ही कर्ता मानता है। गुण ही सभी कर्मोंके कर्ता-भोक्ता हैं—ऐसा जानकर विद्वान् पुरुष कर्मवासना और फलोंसे नहीं बँधते। वे प्रकृतिमें रहकर भी वैसे ही असंग रहते हैं, जैसे स्पर्श आदिसे आकाश, जलकी आर्द्रता आदिसे सूर्य और गन्ध आदिसे वायु। उनकी विमल बुद्धिकी तलवार असंग-भावनाकी सानसे और भी तीखी हो जाती है, और वे उससे अपने सारे संशय-सन्देहोंको काट-कूटकर फेंक देते हैं। जैसे कोई स्वप्नसे जाग उठा हो, उसी प्रकार वे इस भेदबुद्धिके भ्रमसे मुक्त हो जाते हैं॥ ११—१३॥","meaning_covers":[11,13]},{"id":"11.11.12","number":12,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/11/12/","page":783,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["न तथा बद्ध्यते विद्वांस्तत्र तत्रादयन् गुणान्।","प्रकृतिस्थोऽप्यसंसक्तो यथा खं सवितानिलः॥ १२"],"iast":["na tathā baddhyate vidvāṃstatra tatrādayan guṇān|","prakṛtistho'pyasaṃsakto yathā khaṃ savitānilaḥ|| 12"],"meaning":"प्यारे उद्धव! पूर्वोक्त पद्धतिसे विचार करके विवेकी पुरुष समस्त विषयोंसे विरक्त रहता है और सोने-बैठने, घूमने-फिरने, नहाने, देखने, छूने, सूँघने, खाने और सुनने आदि क्रियाओंमें अपनेको कर्ता नहीं मानता, बल्कि गुणोंको ही कर्ता मानता है। गुण ही सभी कर्मोंके कर्ता-भोक्ता हैं—ऐसा जानकर विद्वान् पुरुष कर्मवासना और फलोंसे नहीं बँधते। वे प्रकृतिमें रहकर भी वैसे ही असंग रहते हैं, जैसे स्पर्श आदिसे आकाश, जलकी आर्द्रता आदिसे सूर्य और गन्ध आदिसे वायु। उनकी विमल बुद्धिकी तलवार असंग-भावनाकी सानसे और भी तीखी हो जाती है, और वे उससे अपने सारे संशय-सन्देहोंको काट-कूटकर फेंक देते हैं। जैसे कोई स्वप्नसे जाग उठा हो, उसी प्रकार वे इस भेदबुद्धिके भ्रमसे मुक्त हो जाते हैं॥ ११—१३॥","meaning_covers":[11,13]},{"id":"11.11.13","number":13,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/11/13/","page":783,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["वैशारद्येक्षयासंगशितया छिन्‍नसंशयः।","प्रतिबुद्ध इव स्वप्नान्‍नानात्वाद् विनिवर्तते॥ १३"],"iast":["vaiśāradyekṣayāsaṃgaśitayā chinnasaṃśayaḥ|","pratibuddha iva svapnānnānātvād vinivartate|| 13"],"meaning":"प्यारे उद्धव! पूर्वोक्त पद्धतिसे विचार करके विवेकी पुरुष समस्त विषयोंसे विरक्त रहता है और सोने-बैठने, घूमने-फिरने, नहाने, देखने, छूने, सूँघने, खाने और सुनने आदि क्रियाओंमें अपनेको कर्ता नहीं मानता, बल्कि गुणोंको ही कर्ता मानता है। गुण ही सभी कर्मोंके कर्ता-भोक्ता हैं—ऐसा जानकर विद्वान् पुरुष कर्मवासना और फलोंसे नहीं बँधते। वे प्रकृतिमें रहकर भी वैसे ही असंग रहते हैं, जैसे स्पर्श आदिसे आकाश, जलकी आर्द्रता आदिसे सूर्य और गन्ध आदिसे वायु। उनकी विमल बुद्धिकी तलवार असंग-भावनाकी सानसे और भी तीखी हो जाती है, और वे उससे अपने सारे संशय-सन्देहोंको काट-कूटकर फेंक देते हैं। जैसे कोई स्वप्नसे जाग उठा हो, उसी प्रकार वे इस भेदबुद्धिके भ्रमसे मुक्त हो जाते हैं॥ ११—१३॥","meaning_covers":[11,13]},{"id":"11.11.14","number":14,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/11/14/","page":783,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["यस्य स्युर्वीतसंकल्पाः प्राणेन्द्रियमनोधियाम्।","वृत्तयः स विनिर्मुक्तो देहस्थोऽपि हि तद्गुणैः॥ १४"],"iast":["yasya syurvītasaṃkalpāḥ prāṇendriyamanodhiyām|","vṛttayaḥ sa vinirmukto dehastho'pi hi tadguṇaiḥ|| 14"],"meaning":"जिनके प्राण, इन्द्रिय, मन और बुद्धिकी समस्त चेष्टाएँ बिना संकल्पके होती हैं, वे देहमें स्थित रहकर भी उसके गुणोंसे मुक्त हैं॥ १४॥"},{"id":"11.11.15","number":15,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/11/15/","page":783,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["यस्यात्मा हिंस्यते हिंस्रैर्येन किंचिद् यदृच्छया।","अर्च्यते वा क्‍वचित्तत्र न व्यतिक्रियते बुधः॥ १५"],"iast":["yasyātmā hiṃsyate hiṃsrairyena kiṃcid yadṛcchayā|","arcyate vā kvacittatra na vyatikriyate budhaḥ|| 15"],"meaning":"उन तत्त्वज्ञ मुक्त पुरुषोंके शरीरको चाहे हिंसक लोग पीड़ा पहुँचायें और चाहे कभी कोई दैवयोगसे पूजा करने लगे—वे न तो किसीके सतानेसे दुःखी होते हैं और न पूजा करनेसे सुखी॥ १५॥"},{"id":"11.11.16","number":16,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/11/16/","page":783,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["न स्तुवीत न निन्देत कुर्वतः साध्वसाधु वा।","वदतो गुणदोषाभ्यां वर्जितः समदृङ्मुनिः॥ १६"],"iast":["na stuvīta na nindeta kurvataḥ sādhvasādhu vā|","vadato guṇadoṣābhyāṃ varjitaḥ samadṛṅmuniḥ|| 16"],"meaning":"जो समदर्शी महात्मा गुण और दोषकी भेददृष्टिसे ऊपर उठ गये हैं, वे न तो अच्छे काम करनेवालेकी स्तुति करते हैं और न बुरे काम करनेवालेकी निन्दा; न वे किसीकी अच्छी बात सुनकर उसकी सराहना करते हैं और न बुरी बात सुनकर किसीको झिड़कते ही हैं॥ १६॥"},{"id":"11.11.17","number":17,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/11/17/","page":783,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["न कुर्यान्‍न वदेत् किंचिन्‍न ध्यायेत् साध्वसाधु वा।","आत्मारामोऽनया वृत्त्या विचरेज्जडवन्मुनिः॥ १७"],"iast":["na kuryānna vadet kiṃcinna dhyāyet sādhvasādhu vā|","ātmārāmo'nayā vṛttyā vicarejjaḍavanmuniḥ|| 17"],"meaning":"जीवन्मुक्त पुरुष न तो कुछ भला या बुरा काम करते हैं, न कुछ भला या बुरा कहते हैं और न सोचते ही हैं। वे व्यवहारमें अपनी समान वृत्ति रखकर आत्मानन्दमें ही म‌ग्‍न रहते हैं और जडके समान मानो कोई मूर्ख हो इस प्रकार विचरण करते रहते हैं॥ १७॥"},{"id":"11.11.18","number":18,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/11/18/","page":783,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["शब्दब्रह्मणि निष्णातो न निष्णायात् परे यदि।","श्रमस्तस्य श्रमफलो ह्यधेनुमिव रक्षतः॥ १८"],"iast":["śabdabrahmaṇi niṣṇāto na niṣṇāyāt pare yadi|","śramastasya śramaphalo hyadhenumiva rakṣataḥ|| 18"],"meaning":"प्यारे उद्धव! जो पुरुष वेदोंका तो पारगामी विद्वान् हो, परन्तु परब्रह्मके ज्ञानसे शून्य हो, उसके परिश्रमका कोई फल नहीं है वह तो वैसा ही है, जैसे बिना दूधकी गायका पालनेवाला॥ १८॥"},{"id":"11.11.19","number":19,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/11/19/","page":783,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["गां दुग्धदोहामसतीं च भार्यां","देहं पराधीनमसत्प्रजां च।","वित्तं त्वतीर्थीकृतमंग वाचं","हीनां मया रक्षति दुःखदुःखी॥ १९"],"iast":["gāṃ dugdhadohāmasatīṃ ca bhāryāṃ","dehaṃ parādhīnamasatprajāṃ ca|","vittaṃ tvatīrthīkṛtamaṃga vācaṃ","hīnāṃ mayā rakṣati duḥkhaduḥkhī|| 19"],"meaning":"दूध न देनेवाली गाय, व्यभिचारिणी स्त्री, पराधीन शरीर, दुष्ट पुत्र, सत्पात्रके प्राप्त होनेपर भी दान न किया हुआ धन और मेरे गुणोंसे रहित वाणी व्यर्थ है। इन वस्तुओंकी रखवाली करनेवाला दुःख-पर-दुःख ही भोगता रहता है॥ १९॥"},{"id":"11.11.20","number":20,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/11/20/","page":783,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["यस्यां न मे पावनमंग कर्म","स्थित्युद्भवप्राणनिरोधमस्य ।","लीलावतारेप्सितजन्म वा स्याद्","वन्ध्यां गिरं तां बिभृयान्‍न धीरः॥ २०"],"iast":["yasyāṃ na me pāvanamaṃga karma","sthityudbhavaprāṇanirodhamasya |","līlāvatārepsitajanma vā syād","vandhyāṃ giraṃ tāṃ bibhṛyānna dhīraḥ|| 20"],"meaning":"इसलिये उद्धव! जिस वाणीमें जगत‍्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयरूप मेरी लोकपावन लीलाका वर्णन न हो और लीलावतारोंमें भी मेरे लोकप्रिय राम-कृष्णादि अवतारोंका जिसमें यशोगान न हो, वह वाणी वन्ध्या है। बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि ऐसी वाणीका उच्चारण एवं श्रवण न करे॥ २०॥"},{"id":"11.11.21","number":21,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/11/21/","page":784,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["एवं जिज्ञासयापोह्य नानात्वभ्रममात्मनि।","उपारमेत विरजं मनो मय्यर्प्य सर्वगे॥ २१"],"iast":["evaṃ jijñāsayāpohya nānātvabhramamātmani|","upārameta virajaṃ mano mayyarpya sarvage|| 21"],"meaning":"प्रिय उद्धव! जैसा कि ऊपर वर्णन किया गया है, आत्मजिज्ञासा और विचारके द्वारा आत्मामें जो अनेकताका भ्रम है उसे दूर कर दे और मुझ सर्वव्यापी परमात्मामें अपना निर्मल मन लगा दे तथा संसारके व्यवहारोंसे उपराम हो जाय॥ २१॥"},{"id":"11.11.22","number":22,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/11/22/","page":784,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["यद्यनीशो धारयितुं मनो ब्रह्मणि निश्‍चलम्।","मयि सर्वाणि कर्माणि निरपेक्षः समाचर॥ २२"],"iast":["yadyanīśo dhārayituṃ mano brahmaṇi niścalam|","mayi sarvāṇi karmāṇi nirapekṣaḥ samācara|| 22"],"meaning":"यदि तुम अपना मन परब्रह्ममें स्थिर न कर सको तो सारे कर्म निरपेक्ष होकर मेरे लिये ही करो॥ २२॥"},{"id":"11.11.23","number":23,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/11/23/","page":784,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["श्रद्धालुर्मे कथाः शृण्वन् सुभद्रा लोकपावनीः।","गायन्‍ननुस्मरन् कर्म जन्म चाभिनयन् मुहुः॥ २३"],"iast":["śraddhālurme kathāḥ śṛṇvan subhadrā lokapāvanīḥ|","gāyannanusmaran karma janma cābhinayan muhuḥ|| 23"],"meaning":"मेरी कथाएँ समस्त लोकोंको पवित्र करनेवाली एवं कल्याणस्वरूपिणी हैं। श्रद्धाके साथ उन्हें सुनना चाहिये। बार-बार मेरे अवतार और लीलाओंका गान, स्मरण और अभिनय करना चाहिये॥ २३॥"},{"id":"11.11.24","number":24,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/11/24/","page":784,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["मदर्थे धर्मकामार्थानाचरन् मदपाश्रयः।","लभते निश्‍चलां भक्तिं मय्युद्धव सनातने॥ २४"],"iast":["madarthe dharmakāmārthānācaran madapāśrayaḥ|","labhate niścalāṃ bhaktiṃ mayyuddhava sanātane|| 24"],"meaning":"मेरे आश्रित रहकर मेरे ही लिये धर्म, काम और अर्थका सेवन करना चाहिये। प्रिय उद्धव! जो ऐसा करता है, उसे मुझ अविनाशी पुरुषके प्रति अनन्य प्रेममयी भक्ति प्राप्त हो जाती है॥ २४॥"},{"id":"11.11.25","number":25,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/11/25/","page":784,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["सत्संगलब्धया भक्त्या मयि मां स उपासिता।","स वै मे दर्शितं सद्भिरंजसा विन्दते पदम्॥ २५"],"iast":["satsaṃgalabdhayā bhaktyā mayi māṃ sa upāsitā|","sa vai me darśitaṃ sadbhiraṃjasā vindate padam|| 25"],"meaning":"भक्तिकी प्राप्ति सत्संगसे होती है; जिसे भक्ति प्राप्त हो जाती है वह मेरी उपासना करता है, मेरे सान्‍निध्यका अनुभव करता है। इस प्रकार जब उसका अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है, तब वह संतोंके उपदेशोंके अनुसार उनके द्वारा बताये हुए मेरे परमपदको—वास्तविक स्वरूपको सहजहीमें प्राप्त हो जाता है॥ २५॥"},{"id":"11.11.26","number":26,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/11/26/","page":784,"speaker":"उद्धव उवाच","sanskrit":["साधुस्तवोत्तमश्‍लोक मतः कीदृग्विधः प्रभो।","भक्तिस्त्वय्युपयुज्येत कीदृशी सद्भिरादृता॥ २६"],"iast":["sādhustavottamaśloka mataḥ kīdṛgvidhaḥ prabho|","bhaktistvayyupayujyeta kīdṛśī sadbhirādṛtā|| 26"],"meaning":"उद्धवजीने पूछा—भगवन्! बड़े-बड़े संत आपकी कीर्तिका गान करते हैं। आप कृपया बतलाइये कि आपके विचारसे संत पुरुषका क्या लक्षण है? आपके प्रति कैसी भक्ति करनी चाहिये, जिसका संतलोग आदर करते हैं?॥ २६॥"},{"id":"11.11.27","number":27,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/11/27/","page":784,"speaker":"उद्धव उवाच","sanskrit":["एतन्मे पुरुषाध्यक्ष लोकाध्यक्ष जगत्प्रभो।","प्रणतायानुरक्ताय प्रपन्‍नाय च कथ्यताम्॥ २७"],"iast":["etanme puruṣādhyakṣa lokādhyakṣa jagatprabho|","praṇatāyānuraktāya prapannāya ca kathyatām|| 27"],"meaning":"भगवन्! आप ही ब्रह्मा आदि श्रेष्ठ देवता, सत्यादि लोक और चराचर जगत‍्के स्वामी हैं। मैं आपका विनीत, प्रेमी और शरणागत भक्त हूँ। आप मुझे भक्ति और भक्तका रहस्य बतलाइये॥ २७॥"},{"id":"11.11.28","number":28,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/11/28/","page":784,"speaker":"उद्धव उवाच","sanskrit":["त्वं ब्रह्म परमं व्योम पुरुषः प्रकृतेः परः।","अवतीर्णोऽसि भगवन् स्वेच्छोपात्तपृथग्वपुः॥ २८"],"iast":["tvaṃ brahma paramaṃ vyoma puruṣaḥ prakṛteḥ paraḥ|","avatīrṇo'si bhagavan svecchopāttapṛthagvapuḥ|| 28"],"meaning":"भगवन्! मैं जानता हूँ कि आप प्रकृतिसे परे पुरुषोत्तम एवं चिदाकाशस्वरूप ब्रह्म हैं। आपसे भिन्‍न कुछ भी नहीं है; फिर भी आपने लीलाके लिये स्वेच्छासे ही यह अलग शरीर धारण करके अवतार लिया है। इसलिये वास्तवमें आप ही भक्ति और भक्तका रहस्य बतला सकते हैं॥ २८॥"},{"id":"11.11.29","number":29,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/11/29/","page":785,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["कृपालुरकृतद्रोहस्तितिक्षुः सर्वदेहिनाम्।","सत्यसारोऽनवद्यात्मा समः सर्वोपकारकः॥ २९"],"iast":["kṛpālurakṛtadrohastitikṣuḥ sarvadehinām|","satyasāro'navadyātmā samaḥ sarvopakārakaḥ|| 29"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्णने कहा—प्यारे उद्धव! मेरा भक्त कृपाकी मूर्ति होता है। वह किसी भी प्राणीसे वैरभाव नहीं रखता और घोर-से-घोर दुःख भी प्रसन्‍नतापूर्वक सहता है। उसके जीवनका सार है सत्य, और उसके मनमें किसी प्रकारकी पापवासना कभी नहीं आती। वह समदर्शी और सबका भला करनेवाला होता है॥ २९॥"},{"id":"11.11.30","number":30,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/11/30/","page":785,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["कामैरहतधीर्दान्तो मृदुः शुचिरकिंचनः।","अनीहो मितभुक् शान्तः स्थिरो मच्छरणो मुनिः॥ ३०"],"iast":["kāmairahatadhīrdānto mṛduḥ śucirakiṃcanaḥ|","anīho mitabhuk śāntaḥ sthiro maccharaṇo muniḥ|| 30"],"meaning":"उसकी बुद्धि कामनाओंसे कलुषित नहीं होती। वह संयमी, मधुरस्वभाव और पवित्र होता है। संग्रह-परिग्रहसे सर्वथा दूर रहता है। किसी भी वस्तुके लिये वह कोई चेष्टा नहीं करता। परिमित भोजन करता है और शान्त रहता है। उसकी बुद्धि स्थिर होती है। उसे केवल मेरा ही भरोसा होता है और वह आत्मतत्त्वके चिन्तनमें सदा संल‌ग्‍न रहता है॥ ३०॥"},{"id":"11.11.31","number":31,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/11/31/","page":785,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["अप्रमत्तो गभीरात्मा धृतिमांजितषड्गुणः।","अमानी मानदः कल्पो मैत्रः कारुणिकः कविः॥ ३१"],"iast":["apramatto gabhīrātmā dhṛtimāṃjitaṣaḍguṇaḥ|","amānī mānadaḥ kalpo maitraḥ kāruṇikaḥ kaviḥ|| 31"],"meaning":"वह प्रमादरहित, गम्भीरस्वभाव और धैर्यवान् होता है। भूख-प्यास, शोक-मोह और जन्म-मृत्यु—ये छहों उसके वशमें रहते हैं। वह स्वयं तो कभी किसीसे किसी प्रकारका सम्मान नहीं चाहता, परन्तु दूसरोंका सम्मान करता रहता है। मेरे सम्बन्धकी बातें दूसरोंको समझानेमें बड़ा निपुण होता है और सभीके साथ मित्रताका व्यवहार करता है। उसके हृदयमें करुणा भरी होती है। मेरे तत्त्वका उसे यथार्थ ज्ञान होता है॥ ३१॥"},{"id":"11.11.32","number":32,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/11/32/","page":785,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["आज्ञायैवं गुणान् दोषान् मयाऽऽदिष्टानपि स्वकान्।","धर्मान् सन्त्यज्य यः सर्वान् मां भजेत स सत्तमः॥ ३२"],"iast":["ājñāyaivaṃ guṇān doṣān mayā''diṣṭānapi svakān|","dharmān santyajya yaḥ sarvān māṃ bhajeta sa sattamaḥ|| 32"],"meaning":"प्रिय उद्धव! मैंने वेदों और शास्त्रोंके रूपमें मनुष्योंके धर्मका उपदेश किया है, उनके पालनसे अन्तःकरणशुद्धि आदि गुण और उल्लंघनसे नरकादि दुःख प्राप्त होते हैं; परन्तु मेरा जो भक्त उन्हें भी अपने ध्यान आदिमें विक्षेप समझकर त्याग देता है और केवल मेरे ही भजनमें लगा रहता है, वह परम संत है॥ ३२॥"},{"id":"11.11.33","number":33,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/11/33/","page":785,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["ज्ञात्वाज्ञात्वाथ ये वै मां यावान् यश्‍चास्मि यादृशः।","भजन्त्यनन्यभावेन ते मे भक्ततमा मताः॥ ३३"],"iast":["jñātvājñātvātha ye vai māṃ yāvān yaścāsmi yādṛśaḥ|","bhajantyananyabhāvena te me bhaktatamā matāḥ|| 33"],"meaning":"मैं कौन हूँ, कितना बड़ा हूँ, कैसा हूँ—इन बातोंको जाने, चाहे न जाने; किन्तु जो अनन्यभावसे मेरा भजन करते हैं, वे मेरे विचारसे मेरे परम भक्त हैं॥ ३३॥"},{"id":"11.11.34","number":34,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/11/34/","page":785,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["मल्लिङ्गमद्भक्तजनदर्शनस्पर्शनार्चनम् ।","परिचर्या स्तुतिः प्रह्वगुणकर्मानुकीर्तनम्॥ ३४"],"iast":["malliṅgamadbhaktajanadarśanasparśanārcanam |","paricaryā stutiḥ prahvaguṇakarmānukīrtanam|| 34"],"meaning":"प्यारे उद्धव! मेरी मूर्ति और मेरे भक्तजनोंका दर्शन, स्पर्श, पूजा, सेवा-शुश्रूषा, स्तुति और प्रणाम करे तथा मेरे गुण और कर्मोंका कीर्तन करे॥ ३४॥"},{"id":"11.11.35","number":35,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/11/35/","page":786,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["मत्कथाश्रवणे श्रद्धा मदनुध्यानमुद्धव।","सर्वलाभोपहरणं दास्येनात्मनिवेदनम्॥ ३५"],"iast":["matkathāśravaṇe śraddhā madanudhyānamuddhava|","sarvalābhopaharaṇaṃ dāsyenātmanivedanam|| 35"],"meaning":"उद्धव! मेरी कथा सुननेमें श्रद्धा रखे और निरन्तर मेरा ध्यान करता रहे। जो कुछ मिले, वह मुझे समर्पित कर दे और दास्यभावसे मुझे आत्मनिवेदन करे॥ ३५॥"},{"id":"11.11.36","number":36,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/11/36/","page":786,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["मज्जन्मकर्मकथनं मम पर्वानुमोदनम्।","गीतताण्डववादित्रगोष्ठीभिर्मद‍्गृहोत्सवः॥ ३६"],"iast":["majjanmakarmakathanaṃ mama parvānumodanam|","gītatāṇḍavavāditragoṣṭhībhirmadgṛhotsavaḥ|| 36"],"meaning":"मेरे दिव्य जन्म और कर्मोंकी चर्चा करे। जन्माष्टमी, रामनवमी आदि पर्वोंपर आनन्द मनावे और संगीत, नृत्य, बाजे और समाजोंद्वारा मेरे मन्दिरोंमें उत्सव करे-करावे॥ ३६॥"},{"id":"11.11.37","number":37,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/11/37/","page":786,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["यात्रा बलिविधानं च सर्ववार्षिकपर्वसु।","वैदिकी तान्त्रिकी दीक्षा मदीयव्रतधारणम्॥ ३७"],"iast":["yātrā balividhānaṃ ca sarvavārṣikaparvasu|","vaidikī tāntrikī dīkṣā madīyavratadhāraṇam|| 37"],"meaning":"वार्षिक त्योहारोंके दिन मेरे स्थानोंकी यात्रा करे, जुलूस निकाले तथा विविध उपहारोंसे मेरी पूजा करे। वैदिक अथवा तान्त्रिक पद्धतिसे दीक्षा ग्रहण करे। मेरे व्रतोंका पालन करे॥ ३७॥"},{"id":"11.11.38","number":38,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/11/38/","page":786,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["ममार्चास्थापने श्रद्धा स्वतः संहत्य चोद्यमः।","उद्यानोपवनाक्रीडपुरमन्दिरकर्मणि ॥ ३८"],"iast":["mamārcāsthāpane śraddhā svataḥ saṃhatya codyamaḥ|","udyānopavanākrīḍapuramandirakarmaṇi || 38"],"meaning":"मन्दिरोंमें मेरी मूर्तियोंकी स्थापनामें श्रद्धा रखे। यदि यह काम अकेला न कर सके, तो औरोंके साथ मिलकर उद्योग करे। मेरे लिये पुष्पवाटिका, बगीचे, क्रीड़ाके स्थान, नगर और मन्दिर बनवावे॥ ३८॥"},{"id":"11.11.39","number":39,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/11/39/","page":786,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["सम्मार्जनोपलेपाभ्यां सेकमण्डलवर्तनैः।","गृहशुश्रूषणं मह्यं दासवद् यदमायया॥ ३९"],"iast":["sammārjanopalepābhyāṃ sekamaṇḍalavartanaiḥ|","gṛhaśuśrūṣaṇaṃ mahyaṃ dāsavad yadamāyayā|| 39"],"meaning":"सेवककी भाँति श्रद्धाभक्तिके साथ निष्कपट भावसे मेरे मन्दिरोंकी सेवा-शुश्रूषा करे—झाड़े-बुहारे, लीपे-पोते, छिड़काव करे और तरह-तरहके चौक पूरे॥ ३९॥"},{"id":"11.11.40","number":40,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/11/40/","page":786,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["अमानित्वमदम्भित्वं कृतस्यापरिकीर्तनम्।","अपि दीपावलोकं मे नोपयुञ्ज्यान्‍निवेदितम्॥ ४०"],"iast":["amānitvamadambhitvaṃ kṛtasyāparikīrtanam|","api dīpāvalokaṃ me nopayuñjyānniveditam|| 40"],"meaning":"अभिमान न करे, दम्भ न करे। साथ ही अपने शुभ कर्मोंका ढिंढोरा भी न पीटे। प्रिय उद्धव! मेरे चढ़ावेकी, अपने काममें लगानेकी बात तो दूर रही, मुझे समर्पित दीपकके प्रकाशसे भी अपना काम न ले। किसी दूसरे देवताकी चढ़ायी हुई वस्तु मुझे न चढ़ावे॥ ४०॥"},{"id":"11.11.41","number":41,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/11/41/","page":786,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["यद् यदिष्टतमं लोके यच्चातिप्रियमात्मनः।","तत्तन्‍निवेदयेन्मह्यं तदानन्त्याय कल्पते॥ ४१"],"iast":["yad yadiṣṭatamaṃ loke yaccātipriyamātmanaḥ|","tattannivedayenmahyaṃ tadānantyāya kalpate|| 41"],"meaning":"संसारमें जो वस्तु अपनेको सबसे प्रिय, सबसे अभीष्ट जान पड़े वह मुझे समर्पित कर दे। ऐसा करनेसे वह वस्तु अनन्त फल देनेवाली हो जाती है॥ ४१॥"},{"id":"11.11.42","number":42,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/11/42/","page":786,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["सूर्योऽग्‍निर्ब्राह्मणो गावो वैष्णवः खं मरुज्जलम्।","भूरात्मा सर्वभूतानि भद्र पूजापदानि मे॥ ४२"],"iast":["sūryo'gnirbrāhmaṇo gāvo vaiṣṇavaḥ khaṃ marujjalam|","bhūrātmā sarvabhūtāni bhadra pūjāpadāni me|| 42"],"meaning":"भद्र! सूर्य, अग्‍नि, ब्राह्मण, गौ, वैष्णव, आकाश, वायु, जल, पृथ्वी, आत्मा और समस्त प्राणी—ये सब मेरी पूजाके स्थान हैं॥ ४२॥"},{"id":"11.11.43","number":43,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/11/43/","page":786,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["सूर्ये तु विद्यया त्रय्या हविषा‌ग्‍नौ यजेत माम्।","आतिथ्येन तु विप्राग्र्ये गोष्वंग यवसादिना॥ ४३"],"iast":["sūrye tu vidyayā trayyā haviṣāgnau yajeta mām|","ātithyena tu viprāgrye goṣvaṃga yavasādinā|| 43"],"meaning":"प्यारे उद्धव! ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदके मन्त्रोंद्वारा सूर्यमें मेरी पूजा करनी चाहिये। हवनके द्वारा अग्‍निमें, आतिथ्यद्वारा श्रेष्ठ ब्राह्मणमें और हरी-हरी घास आदिके द्वारा गौमें मेरी पूजा करे॥ ४३॥"},{"id":"11.11.44","number":44,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/11/44/","page":786,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["वैष्णवे बन्धुसत्कृत्या हृदि खे ध्याननिष्ठया।","वायौ मुख्यधिया तोये द्रव्यैस्तोयपुरस्कृतैः॥ ४४"],"iast":["vaiṣṇave bandhusatkṛtyā hṛdi khe dhyānaniṣṭhayā|","vāyau mukhyadhiyā toye dravyaistoyapuraskṛtaiḥ|| 44"],"meaning":"भाई-बन्धुके समान सत्कारके द्वारा वैष्णवमें, निरन्तर ध्यानमें लगे रहनेसे हृदयाकाशमें, मुख्य प्राण समझनेसे वायुमें और जल-पुष्प आदि सामग्रियोंद्वारा जलमें मेरी आराधना की जाती है॥ ४४॥"},{"id":"11.11.45","number":45,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/11/45/","page":787,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["स्थण्डिले मन्त्रहृदयैर्भोगैरात्मानमात्मनि।","क्षेत्रज्ञं सर्वभूतेषु समत्वेन यजेत माम्॥ ४५"],"iast":["sthaṇḍile mantrahṛdayairbhogairātmānamātmani|","kṣetrajñaṃ sarvabhūteṣu samatvena yajeta mām|| 45"],"meaning":"गुप्त मन्त्रोंद्वारा न्यास करके मिट्टीकी वेदीमें, उपयुक्त भोगोंद्वारा आत्मामें और समदृष्टिद्वारा सम्पूर्ण प्राणियोंमें मेरी आराधना करनी चाहिये, क्योंकि मैं सभीमें क्षेत्रज्ञ आत्माके रूपसे स्थित हूँ॥ ४५॥"},{"id":"11.11.46","number":46,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/11/46/","page":787,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["धिष्ण्येष्वेष्विति मद्रूपं शंखचक्रगदाम्बुजैः।","युक्तं चतुर्भुजं शान्तं ध्यायन्‍नर्चेत् समाहितः॥ ४६"],"iast":["dhiṣṇyeṣveṣviti madrūpaṃ śaṃkhacakragadāmbujaiḥ|","yuktaṃ caturbhujaṃ śāntaṃ dhyāyannarcet samāhitaḥ|| 46"],"meaning":"इन सभी स्थानोंमें शंख-चक्र-गदा-पद्म धारण किये चार भुजाओंवाले शान्तमूर्ति श्रीभगवान् विराजमान हैं, ऐसा ध्यान करते हुए एकाग्रताके साथ मेरी पूजा करनी चाहिये॥ ४६॥"},{"id":"11.11.47","number":47,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/11/47/","page":787,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["इष्टापूर्तेन मामेवं यो यजेत समाहितः।","लभते मयि सद्भक्तिं मत्स्मृतिः साधुसेवया॥ ४७"],"iast":["iṣṭāpūrtena māmevaṃ yo yajeta samāhitaḥ|","labhate mayi sadbhaktiṃ matsmṛtiḥ sādhusevayā|| 47"],"meaning":"इस प्रकार जो मनुष्य एकाग्र चित्तसे यज्ञ-यागादि इष्ट और कुआँ-बावली बनवाना आदि पूर्त्तकर्मोंके द्वारा मेरी पूजा करता है, उसे मेरी श्रेष्ठ भक्ति प्राप्त होती है तथा संत-पुरुषोंकी सेवा करनेसे मेरे स्वरूपका ज्ञान भी हो जाता है॥ ४७॥"},{"id":"11.11.48","number":48,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/11/48/","page":787,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["प्रायेण भक्तियोगेन सत्संगेन विनोद्धव।","नोपायो विद्यते सध्र्यङ् प्रायणं हि सतामहम्॥ ४८"],"iast":["prāyeṇa bhaktiyogena satsaṃgena vinoddhava|","nopāyo vidyate sadhryaṅ prāyaṇaṃ hi satāmaham|| 48"],"meaning":"प्यारे उद्धव! मेरा ऐसा निश्‍चय है कि सत्संग और भक्तियोग—इन दो साधनोंका एक साथ ही अनुष्ठान करते रहना चाहिये। प्रायः इन दोनोंके अतिरिक्त संसारसागरसे पार होनेका और कोई उपाय नहीं है, क्योंकि संतपुरुष मुझे अपना आश्रय मानते हैं और मैं सदा-सर्वदा उनके पास बना रहता हूँ॥ ४८॥"},{"id":"11.11.49","number":49,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/11/49/","page":787,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["अथैतत् परमं गुह्यं शृण्वतो यदुनन्दन।","सुगोप्यमपि वक्ष्यामि त्वं मे भृत्यः सुहृत् सखा॥ ४९"],"iast":["athaitat paramaṃ guhyaṃ śṛṇvato yadunandana|","sugopyamapi vakṣyāmi tvaṃ me bhṛtyaḥ suhṛt sakhā|| 49"],"meaning":"प्यारे उद्धव! अब मैं तुम्हें एक अत्यन्त गोपनीय परम रहस्यकी बात बतलाऊँगा; क्योंकि तुम मेरे प्रिय सेवक, हितैषी, सुहृद् और प्रेमी सखा हो; साथ ही सुननेके भी इच्छुक हो॥ ४९॥"}],"text":[{"b":39593,"kind":"adhyaya_heading","page":781,"text":"अथैकादशोऽध्यायः"},{"b":39594,"kind":"topic_heading","page":781,"text":"बद्ध, मुक्त और भक्तजनोंके लक्षण"},{"b":39595,"kind":"topic_heading","page":781,"text":"श्रीभगवानुवाच"},{"b":39596,"kind":"sanskrit_shloka","page":781,"verses":["11.11.1"],"text":"बद्धो मुक्त इति व्याख्या गुणतो मे न वस्तुतः।"},{"b":39597,"kind":"sanskrit_shloka","page":781,"verses":["11.11.1"],"text":"गुणस्य मायामूलत्वान्‍न मे मोक्षो न बन्धनम्॥ १"},{"b":39598,"kind":"sanskrit_shloka","page":781,"verses":["11.11.2"],"text":"शोकमोहौ सुखं दुःखं देहापत्तिश्‍च मायया।"},{"b":39599,"kind":"sanskrit_shloka","page":781,"verses":["11.11.2"],"text":"स्वप्नो यथाऽऽत्मनः ख्यातिः संसृतिर्न तु वास्तवी॥ २"},{"b":39600,"kind":"sanskrit_shloka","page":781,"verses":["11.11.3"],"text":"विद्याविद्ये मम तनू विद्ध्युद्धव शरीरिणाम्।"},{"b":39601,"kind":"sanskrit_shloka","page":781,"verses":["11.11.3"],"text":"मोक्षबन्धकरी आद्ये मायया मे विनिर्मिते॥ ३"},{"b":39602,"kind":"sanskrit_shloka","page":781,"verses":["11.11.4"],"text":"एकस्यैव ममांशस्य जीवस्यैव महामते।"},{"b":39603,"kind":"sanskrit_shloka","page":781,"verses":["11.11.4"],"text":"बन्धोऽस्याविद्ययानादिर्विद्यया च तथेतरः॥ ४"},{"b":39604,"kind":"sanskrit_shloka","page":781,"verses":["11.11.5"],"text":"अथ बद्धस्य मुक्तस्य वैलक्षण्यं वदामि ते।"},{"b":39605,"kind":"sanskrit_shloka","page":781,"verses":["11.11.5"],"text":"विरुद्धधर्मिणोस्तात स्थितयोरेकधर्मिणि॥ ५"},{"b":39606,"kind":"hindi_commentary","page":781,"verses":["11.11.6"],"text":"सुपर्णावेतौ सदृशौ सखायौ"},{"b":39607,"kind":"sanskrit_shloka","page":781,"verses":["11.11.6"],"text":"यदृच्छयैतौ कृतनीडौ च वृक्षे।"},{"b":39608,"kind":"hindi_commentary","page":782,"verses":["11.11.6"],"text":"एकस्तयोः खादति पिप्पलान्‍न-"},{"b":39609,"kind":"sanskrit_shloka","page":782,"verses":["11.11.6"],"text":"मन्यो निरन्‍नोऽपि बलेन भूयान्॥ ६"},{"b":39610,"kind":"hindi_commentary","page":782,"verses":["11.11.7"],"text":"आत्मानमन्यं च स वेद विद्वा-"},{"b":39611,"kind":"sanskrit_shloka","page":782,"verses":["11.11.7"],"text":"नपिप्पलादो न तु पिप्पलादः।"},{"b":39612,"kind":"hindi_commentary","page":782,"verses":["11.11.7"],"text":"योऽविद्यया युक् स तु नित्यबद्धो"},{"b":39613,"kind":"hindi_commentary","page":782,"verses":["11.11.7"],"text":"विद्यामयो यः स तु नित्यमुक्तः॥ ७"},{"b":39614,"kind":"sanskrit_shloka","page":782,"verses":["11.11.8"],"text":"देहस्थोऽपि न देहस्थो विद्वान् स्वप्नाद् यथोत्थितः।"},{"b":39615,"kind":"sanskrit_shloka","page":782,"verses":["11.11.8"],"text":"अदेहस्थोऽपि देहस्थः कुमतिः स्वप्नदृग् यथा॥ ८"},{"b":39616,"kind":"sanskrit_shloka","page":782,"verses":["11.11.9"],"text":"इन्द्रियैरिन्द्रियार्थेषु गुणैरपि गुणेषु च।"},{"b":39617,"kind":"sanskrit_shloka","page":782,"verses":["11.11.9"],"text":"गृह्यमाणेष्वहंकुर्यान्‍न विद्वान् यस्त्वविक्रियः॥ ९"},{"b":39618,"kind":"sanskrit_shloka","page":782,"verses":["11.11.10"],"text":"दैवाधीने शरीरेऽस्मिन् गुणभाव्येन कर्मणा।"},{"b":39619,"kind":"sanskrit_shloka","page":782,"verses":["11.11.10"],"text":"वर्तमानोऽबुधस्तत्र कर्तास्मीति निबद्ध्यते॥ १०"},{"b":39620,"kind":"hindi_commentary","page":781,"explains":["11.11.1","11.11.2","11.11.3","11.11.4","11.11.5","11.11.6","11.11.7","11.11.8","11.11.9","11.11.10"],"text":"भगवान् श्रीकृष्णने कहा—प्यारे उद्धव! आत्मा बद्ध है या मुक्त है, इस प्रकारकी व्याख्या या व्यवहार मेरे अधीन रहनेवाले सत्त्वादि गुणोंकी उपाधिसे ही होता है। वस्तुतः—तत्त्वदृष्टिसे नहीं। सभी गुण माया-मूलक हैं—इन्द्रजाल हैं—जादूके खेलके समान हैं। इसलिये न मेरा मोक्ष है, न तो मेरा बन्धन ही है॥ १॥ जैसे स्वप्न बुद्धिका विवर्त है—उसमें बिना हुए ही भासता है—मिथ्या है, वैसे ही शोक-मोह, सुख-दुःख, शरीरकी उत्पत्ति और मृत्यु—यह सब संसारका बखेड़ा माया (अविद्या) के कारण प्रतीत होनेपर भी वास्तविक नहीं है॥ २॥ उद्धव! शरीरधारियोंको मुक्तिका अनुभव करानेवाली आत्मविद्या और बन्धनका अनुभव करानेवाली अविद्या—ये दोनों ही मेरी अनादि शक्तियाँ हैं। मेरी मायासे ही इनकी रचना हुई है। इनका कोई वास्तविक अस्तित्व नहीं है॥ ३॥ भाई! तुम तो स्वयं बड़े बुद्धिमान् हो, विचार करो—जीव तो एक ही है। वह व्यवहारके लिये ही मेरे अंशके रूपमें कल्पित हुआ है, वस्तुतः मेरा स्वरूप ही है। आत्मज्ञानसे सम्पन्‍न होनेपर उसे मुक्त कहते हैं और आत्माका ज्ञान न होनेसे बद्ध। और यह अज्ञान अनादि होनेसे बन्धन भी अनादि कहलाता है॥ ४॥ इस प्रकार मुझ एक ही धर्मीमें रहनेपर भी जो शोक और आनन्दरूप विरुद्ध धर्मवाले जान पड़ते हैं, उन बद्ध और मुक्त जीवका भेद मैं बतलाता हूँ॥ ५॥ (वह भेद दो प्रकारका है—एक तो नित्यमुक्त ईश्‍वरसे जीवका भेद, और दूसरा मुक्त-बद्ध जीवका भेद। पहला सुनो)—जीव और ईश्‍वर बद्ध और मुक्तके भेदसे भिन्‍न-भिन्‍न होनेपर भी एक ही शरीरमें नियन्ता और नियन्त्रितके रूपसे स्थित हैं। ऐसा समझो कि शरीर एक वृक्ष है, इसमें हृदयका घोंसला बनाकर जीव और ईश्‍वर नामके दो पक्षी रहते हैं। वे दोनों चेतन होनेके कारण समान हैं और कभी न बिछुड़नेके कारण सखा हैं। इनके निवास करनेका कारण केवल लीला ही है। इतनी समानता होनेपर भी जीव तो शरीररूप वृक्षके फल सुख-दुःख आदि भोगता है, परन्तु ईश्‍वर उन्हें न भोगकर कर्मफल सुख-दुःख आदिसे असंग और उनका साक्षीमात्र रहता है। अभोक्ता होनेपर भी ईश्‍वरकी यह विलक्षणता है कि वह ज्ञान, ऐश्‍वर्य, आनन्द और सामर्थ्य आदिमें भोक्ता जीवसे बढ़कर है॥ ६॥ साथ ही एक यह भी विलक्षणता है कि अभोक्ता ईश्‍वर तो अपने वास्तविक स्वरूप और इसके अतिरिक्त जगत‍्को भी जानता है, परन्तु भोक्ता जीव न अपने वास्तविक रूपको जानता है और न अपनेसे अतिरिक्तको! इन दोनोंमें जीव तो अविद्यासे युक्त होनेके कारण नित्यबद्ध है और ईश्‍वर विद्यास्वरूप होनेके कारण नित्यमुक्त है॥ ७॥ प्यारे उद्धव! ज्ञानसम्पन्‍न पुरुष भी मुक्त ही है; जैसे स्वप्न टूट जानेपर जगा हुआ पुरुष स्वप्नके स्मर्यमाण शरीरसे कोई सम्बन्ध नहीं रखता, वैसे ही ज्ञानी पुरुष सूक्ष्म और स्थूलशरीरमें रहनेपर भी उनसे किसी प्रकारका सम्बन्ध नहीं रखता, परन्तु अज्ञानी पुरुष वास्तवमें शरीरसे कोई सम्बन्ध न रखनेपर भी अज्ञानके कारण शरीरमें ही स्थित रहता है, जैसे स्वप्न देखनेवाला पुरुष स्वप्न देखते समय स्वाप्निक शरीरमें बँध जाता है॥ ८॥ व्यवहारादिमें इन्द्रियाँ शब्द-स्पर्शादि विषयोंको ग्रहण करती हैं; क्योंकि यह तो नियम ही है कि गुण ही गुणको ग्रहण करते हैं, आत्मा नहीं। इसलिये जिसने अपने निर्विकार आत्मस्वरूपको समझ लिया है, वह उन विषयोंके ग्रहण-त्यागमें किसी प्रकारका अभिमान नहीं करता॥ ९॥ यह शरीर प्रारब्धके अधीन है। इससे शारीरिक और मानसिक जितने भी कर्म होते हैं, सब गुणोंकी प्रेरणासे ही होते हैं। अज्ञानी पुरुष झूठमूठ अपनेको उन ग्रहण-त्याग आदि कर्मोंका कर्ता मान बैठता है और इसी अभिमानके कारण वह बँध जाता है॥ १०॥"},{"b":39621,"kind":"sanskrit_shloka","page":782,"verses":["11.11.11"],"text":"एवं विरक्तः शयने आसनाटनमज्जने।"},{"b":39622,"kind":"sanskrit_shloka","page":782,"verses":["11.11.11"],"text":"दर्शनस्पर्शनघ्राणभोजनश्रवणादिषु ॥ ११"},{"b":39623,"kind":"sanskrit_shloka","page":783,"verses":["11.11.12"],"text":"न तथा बद्ध्यते विद्वांस्तत्र तत्रादयन् गुणान्।"},{"b":39624,"kind":"sanskrit_shloka","page":783,"verses":["11.11.12"],"text":"प्रकृतिस्थोऽप्यसंसक्तो यथा खं सवितानिलः॥ १२"},{"b":39625,"kind":"sanskrit_shloka","page":783,"verses":["11.11.13"],"text":"वैशारद्येक्षयासंगशितया छिन्‍नसंशयः।"},{"b":39626,"kind":"sanskrit_shloka","page":783,"verses":["11.11.13"],"text":"प्रतिबुद्ध इव स्वप्नान्‍नानात्वाद् विनिवर्तते॥ १३"},{"b":39627,"kind":"sanskrit_shloka","page":783,"verses":["11.11.14"],"text":"यस्य स्युर्वीतसंकल्पाः प्राणेन्द्रियमनोधियाम्।"},{"b":39628,"kind":"sanskrit_shloka","page":783,"verses":["11.11.14"],"text":"वृत्तयः स विनिर्मुक्तो देहस्थोऽपि हि तद्गुणैः॥ १४"},{"b":39629,"kind":"hindi_commentary","page":782,"explains":["11.11.11","11.11.12","11.11.13","11.11.14"],"text":"प्यारे उद्धव! पूर्वोक्त पद्धतिसे विचार करके विवेकी पुरुष समस्त विषयोंसे विरक्त रहता है और सोने-बैठने, घूमने-फिरने, नहाने, देखने, छूने, सूँघने, खाने और सुनने आदि क्रियाओंमें अपनेको कर्ता नहीं मानता, बल्कि गुणोंको ही कर्ता मानता है। गुण ही सभी कर्मोंके कर्ता-भोक्ता हैं—ऐसा जानकर विद्वान् पुरुष कर्मवासना और फलोंसे नहीं बँधते। वे प्रकृतिमें रहकर भी वैसे ही असंग रहते हैं, जैसे स्पर्श आदिसे आकाश, जलकी आर्द्रता आदिसे सूर्य और गन्ध आदिसे वायु। उनकी विमल बुद्धिकी तलवार असंग-भावनाकी सानसे और भी तीखी हो जाती है, और वे उससे अपने सारे संशय-सन्देहोंको काट-कूटकर फेंक देते हैं। जैसे कोई स्वप्नसे जाग उठा हो, उसी प्रकार वे इस भेदबुद्धिके भ्रमसे मुक्त हो जाते हैं॥ ११—१३॥ जिनके प्राण, इन्द्रिय, मन और बुद्धिकी समस्त चेष्टाएँ बिना संकल्पके होती हैं, वे देहमें स्थित रहकर भी उसके गुणोंसे मुक्त हैं॥ १४॥"},{"b":39630,"kind":"sanskrit_shloka","page":783,"verses":["11.11.15"],"text":"यस्यात्मा हिंस्यते हिंस्रैर्येन किंचिद् यदृच्छया।"},{"b":39631,"kind":"sanskrit_shloka","page":783,"verses":["11.11.15"],"text":"अर्च्यते वा क्‍वचित्तत्र न व्यतिक्रियते बुधः॥ १५"},{"b":39632,"kind":"sanskrit_shloka","page":783,"verses":["11.11.16"],"text":"न स्तुवीत न निन्देत कुर्वतः साध्वसाधु वा।"},{"b":39633,"kind":"sanskrit_shloka","page":783,"verses":["11.11.16"],"text":"वदतो गुणदोषाभ्यां वर्जितः समदृङ्मुनिः॥ १६"},{"b":39634,"kind":"sanskrit_shloka","page":783,"verses":["11.11.17"],"text":"न कुर्यान्‍न वदेत् किंचिन्‍न ध्यायेत् साध्वसाधु वा।"},{"b":39635,"kind":"sanskrit_shloka","page":783,"verses":["11.11.17"],"text":"आत्मारामोऽनया वृत्त्या विचरेज्जडवन्मुनिः॥ १७"},{"b":39636,"kind":"hindi_commentary","page":783,"explains":["11.11.15","11.11.16","11.11.17"],"text":"उन तत्त्वज्ञ मुक्त पुरुषोंके शरीरको चाहे हिंसक लोग पीड़ा पहुँचायें और चाहे कभी कोई दैवयोगसे पूजा करने लगे—वे न तो किसीके सतानेसे दुःखी होते हैं और न पूजा करनेसे सुखी॥ १५॥ जो समदर्शी महात्मा गुण और दोषकी भेददृष्टिसे ऊपर उठ गये हैं, वे न तो अच्छे काम करनेवालेकी स्तुति करते हैं और न बुरे काम करनेवालेकी निन्दा; न वे किसीकी अच्छी बात सुनकर उसकी सराहना करते हैं और न बुरी बात सुनकर किसीको झिड़कते ही हैं॥ १६॥ जीवन्मुक्त पुरुष न तो कुछ भला या बुरा काम करते हैं, न कुछ भला या बुरा कहते हैं और न सोचते ही हैं। वे व्यवहारमें अपनी समान वृत्ति रखकर आत्मानन्दमें ही म‌ग्‍न रहते हैं और जडके समान मानो कोई मूर्ख हो इस प्रकार विचरण करते रहते हैं॥ १७॥"},{"b":39637,"kind":"sanskrit_shloka","page":783,"verses":["11.11.18"],"text":"शब्दब्रह्मणि निष्णातो न निष्णायात् परे यदि।"},{"b":39638,"kind":"sanskrit_shloka","page":783,"verses":["11.11.18"],"text":"श्रमस्तस्य श्रमफलो ह्यधेनुमिव रक्षतः॥ १८"},{"b":39639,"kind":"hindi_commentary","page":783,"verses":["11.11.19"],"text":"गां दुग्धदोहामसतीं च भार्यां"},{"b":39640,"kind":"sanskrit_shloka","page":783,"verses":["11.11.19"],"text":"देहं पराधीनमसत्प्रजां च।"},{"b":39641,"kind":"hindi_commentary","page":783,"verses":["11.11.19"],"text":"वित्तं त्वतीर्थीकृतमंग वाचं"},{"b":39642,"kind":"sanskrit_shloka","page":783,"verses":["11.11.19"],"text":"हीनां मया रक्षति दुःखदुःखी॥ १९"},{"b":39643,"kind":"hindi_commentary","page":783,"verses":["11.11.20"],"text":"यस्यां न मे पावनमंग कर्म"},{"b":39644,"kind":"sanskrit_shloka","page":783,"verses":["11.11.20"],"text":"स्थित्युद्भवप्राणनिरोधमस्य ।"},{"b":39645,"kind":"hindi_commentary","page":784,"verses":["11.11.20"],"text":"लीलावतारेप्सितजन्म वा स्याद्"},{"b":39646,"kind":"sanskrit_shloka","page":784,"verses":["11.11.20"],"text":"वन्ध्यां गिरं तां बिभृयान्‍न धीरः॥ २०"},{"b":39647,"kind":"hindi_translation","page":783,"explains":["11.11.18","11.11.19","11.11.20"],"text":"प्यारे उद्धव! जो पुरुष वेदोंका तो पारगामी विद्वान् हो, परन्तु परब्रह्मके ज्ञानसे शून्य हो, उसके परिश्रमका कोई फल नहीं है वह तो वैसा ही है, जैसे बिना दूधकी गायका पालनेवाला॥ १८॥ दूध न देनेवाली गाय, व्यभिचारिणी स्त्री, पराधीन शरीर, दुष्ट पुत्र, सत्पात्रके प्राप्त होनेपर भी दान न किया हुआ धन और मेरे गुणोंसे रहित वाणी व्यर्थ है। इन वस्तुओंकी रखवाली करनेवाला दुःख-पर-दुःख ही भोगता रहता है॥ १९॥ इसलिये उद्धव! जिस वाणीमें जगत‍्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयरूप मेरी लोकपावन लीलाका वर्णन न हो और लीलावतारोंमें भी मेरे लोकप्रिय राम-कृष्णादि अवतारोंका जिसमें यशोगान न हो, वह वाणी वन्ध्या है। बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि ऐसी वाणीका उच्चारण एवं श्रवण न करे॥ २०॥"},{"b":39648,"kind":"sanskrit_shloka","page":784,"verses":["11.11.21"],"text":"एवं जिज्ञासयापोह्य नानात्वभ्रममात्मनि।"},{"b":39649,"kind":"sanskrit_shloka","page":784,"verses":["11.11.21"],"text":"उपारमेत विरजं मनो मय्यर्प्य सर्वगे॥ २१"},{"b":39650,"kind":"sanskrit_shloka","page":784,"verses":["11.11.22"],"text":"यद्यनीशो धारयितुं मनो ब्रह्मणि निश्‍चलम्।"},{"b":39651,"kind":"sanskrit_shloka","page":784,"verses":["11.11.22"],"text":"मयि सर्वाणि कर्माणि निरपेक्षः समाचर॥ २२"},{"b":39652,"kind":"sanskrit_shloka","page":784,"verses":["11.11.23"],"text":"श्रद्धालुर्मे कथाः शृण्वन् सुभद्रा लोकपावनीः।"},{"b":39653,"kind":"sanskrit_shloka","page":784,"verses":["11.11.23"],"text":"गायन्‍ननुस्मरन् कर्म जन्म चाभिनयन् मुहुः॥ २३"},{"b":39654,"kind":"sanskrit_shloka","page":784,"verses":["11.11.24"],"text":"मदर्थे धर्मकामार्थानाचरन् मदपाश्रयः।"},{"b":39655,"kind":"sanskrit_shloka","page":784,"verses":["11.11.24"],"text":"लभते निश्‍चलां भक्तिं मय्युद्धव सनातने॥ २४"},{"b":39656,"kind":"hindi_commentary","page":784,"explains":["11.11.21","11.11.22","11.11.23","11.11.24"],"text":"प्रिय उद्धव! जैसा कि ऊपर वर्णन किया गया है, आत्मजिज्ञासा और विचारके द्वारा आत्मामें जो अनेकताका भ्रम है उसे दूर कर दे और मुझ सर्वव्यापी परमात्मामें अपना निर्मल मन लगा दे तथा संसारके व्यवहारोंसे उपराम हो जाय॥ २१॥ यदि तुम अपना मन परब्रह्ममें स्थिर न कर सको तो सारे कर्म निरपेक्ष होकर मेरे लिये ही करो॥ २२॥ मेरी कथाएँ समस्त लोकोंको पवित्र करनेवाली एवं कल्याणस्वरूपिणी हैं। श्रद्धाके साथ उन्हें सुनना चाहिये। बार-बार मेरे अवतार और लीलाओंका गान, स्मरण और अभिनय करना चाहिये॥ २३॥ मेरे आश्रित रहकर मेरे ही लिये धर्म, काम और अर्थका सेवन करना चाहिये। प्रिय उद्धव! जो ऐसा करता है, उसे मुझ अविनाशी पुरुषके प्रति अनन्य प्रेममयी भक्ति प्राप्त हो जाती है॥ २४॥"},{"b":39657,"kind":"sanskrit_shloka","page":784,"verses":["11.11.25"],"text":"सत्संगलब्धया भक्त्या मयि मां स उपासिता।"},{"b":39658,"kind":"sanskrit_shloka","page":784,"verses":["11.11.25"],"text":"स वै मे दर्शितं सद्भिरंजसा विन्दते पदम्॥ २५"},{"b":39659,"kind":"hindi_translation","page":784,"explains":["11.11.25"],"text":"भक्तिकी प्राप्ति सत्संगसे होती है; जिसे भक्ति प्राप्त हो जाती है वह मेरी उपासना करता है, मेरे सान्‍निध्यका अनुभव करता है। इस प्रकार जब उसका अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है, तब वह संतोंके उपदेशोंके अनुसार उनके द्वारा बताये हुए मेरे परमपदको—वास्तविक स्वरूपको सहजहीमें प्राप्त हो जाता है॥ २५॥"},{"b":39660,"kind":"topic_heading","page":784,"text":"उद्धव उवाच"},{"b":39661,"kind":"sanskrit_shloka","page":784,"verses":["11.11.26"],"text":"साधुस्तवोत्तमश्‍लोक मतः कीदृग्विधः प्रभो।"},{"b":39662,"kind":"sanskrit_shloka","page":784,"verses":["11.11.26"],"text":"भक्तिस्त्वय्युपयुज्येत कीदृशी सद्भिरादृता॥ २६"},{"b":39663,"kind":"sanskrit_shloka","page":784,"verses":["11.11.27"],"text":"एतन्मे पुरुषाध्यक्ष लोकाध्यक्ष जगत्प्रभो।"},{"b":39664,"kind":"sanskrit_shloka","page":784,"verses":["11.11.27"],"text":"प्रणतायानुरक्ताय प्रपन्‍नाय च कथ्यताम्॥ २७"},{"b":39665,"kind":"sanskrit_shloka","page":784,"verses":["11.11.28"],"text":"त्वं ब्रह्म परमं व्योम पुरुषः प्रकृतेः परः।"},{"b":39666,"kind":"sanskrit_shloka","page":784,"verses":["11.11.28"],"text":"अवतीर्णोऽसि भगवन् स्वेच्छोपात्तपृथग्वपुः॥ २८"},{"b":39667,"kind":"hindi_commentary","page":784,"explains":["11.11.26","11.11.27","11.11.28"],"text":"उद्धवजीने पूछा—भगवन्! बड़े-बड़े संत आपकी कीर्तिका गान करते हैं। आप कृपया बतलाइये कि आपके विचारसे संत पुरुषका क्या लक्षण है? आपके प्रति कैसी भक्ति करनी चाहिये, जिसका संतलोग आदर करते हैं?॥ २६॥ भगवन्! आप ही ब्रह्मा आदि श्रेष्ठ देवता, सत्यादि लोक और चराचर जगत‍्के स्वामी हैं। मैं आपका विनीत, प्रेमी और शरणागत भक्त हूँ। आप मुझे भक्ति और भक्तका रहस्य बतलाइये॥ २७॥ भगवन्! मैं जानता हूँ कि आप प्रकृतिसे परे पुरुषोत्तम एवं चिदाकाशस्वरूप ब्रह्म हैं। आपसे भिन्‍न कुछ भी नहीं है; फिर भी आपने लीलाके लिये स्वेच्छासे ही यह अलग शरीर धारण करके अवतार लिया है। इसलिये वास्तवमें आप ही भक्ति और भक्तका रहस्य बतला सकते हैं॥ २८॥"},{"b":39668,"kind":"topic_heading","page":785,"text":"श्रीभगवानुवाच"},{"b":39669,"kind":"sanskrit_shloka","page":785,"verses":["11.11.29"],"text":"कृपालुरकृतद्रोहस्तितिक्षुः सर्वदेहिनाम्।"},{"b":39670,"kind":"sanskrit_shloka","page":785,"verses":["11.11.29"],"text":"सत्यसारोऽनवद्यात्मा समः सर्वोपकारकः॥ २९"},{"b":39671,"kind":"sanskrit_shloka","page":785,"verses":["11.11.30"],"text":"कामैरहतधीर्दान्तो मृदुः शुचिरकिंचनः।"},{"b":39672,"kind":"sanskrit_shloka","page":785,"verses":["11.11.30"],"text":"अनीहो मितभुक् शान्तः स्थिरो मच्छरणो मुनिः॥ ३०"},{"b":39673,"kind":"sanskrit_shloka","page":785,"verses":["11.11.31"],"text":"अप्रमत्तो गभीरात्मा धृतिमांजितषड्गुणः।"},{"b":39674,"kind":"sanskrit_shloka","page":785,"verses":["11.11.31"],"text":"अमानी मानदः कल्पो मैत्रः कारुणिकः कविः॥ ३१"},{"b":39675,"kind":"hindi_commentary","page":785,"explains":["11.11.29","11.11.30","11.11.31"],"text":"भगवान् श्रीकृष्णने कहा—प्यारे उद्धव! मेरा भक्त कृपाकी मूर्ति होता है। वह किसी भी प्राणीसे वैरभाव नहीं रखता और घोर-से-घोर दुःख भी प्रसन्‍नतापूर्वक सहता है। उसके जीवनका सार है सत्य, और उसके मनमें किसी प्रकारकी पापवासना कभी नहीं आती। वह समदर्शी और सबका भला करनेवाला होता है॥ २९॥ उसकी बुद्धि कामनाओंसे कलुषित नहीं होती। वह संयमी, मधुरस्वभाव और पवित्र होता है। संग्रह-परिग्रहसे सर्वथा दूर रहता है। किसी भी वस्तुके लिये वह कोई चेष्टा नहीं करता। परिमित भोजन करता है और शान्त रहता है। उसकी बुद्धि स्थिर होती है। उसे केवल मेरा ही भरोसा होता है और वह आत्मतत्त्वके चिन्तनमें सदा संल‌ग्‍न रहता है॥ ३०॥ वह प्रमादरहित, गम्भीरस्वभाव और धैर्यवान् होता है। भूख-प्यास, शोक-मोह और जन्म-मृत्यु—ये छहों उसके वशमें रहते हैं। वह स्वयं तो कभी किसीसे किसी प्रकारका सम्मान नहीं चाहता, परन्तु दूसरोंका सम्मान करता रहता है। मेरे सम्बन्धकी बातें दूसरोंको समझानेमें बड़ा निपुण होता है और सभीके साथ मित्रताका व्यवहार करता है। उसके हृदयमें करुणा भरी होती है। मेरे तत्त्वका उसे यथार्थ ज्ञान होता है॥ ३१॥"},{"b":39676,"kind":"sanskrit_shloka","page":785,"verses":["11.11.32"],"text":"आज्ञायैवं गुणान् दोषान् मयाऽऽदिष्टानपि स्वकान्।"},{"b":39677,"kind":"sanskrit_shloka","page":785,"verses":["11.11.32"],"text":"धर्मान् सन्त्यज्य यः सर्वान् मां भजेत स सत्तमः॥ ३२"},{"b":39678,"kind":"sanskrit_shloka","page":785,"verses":["11.11.33"],"text":"ज्ञात्वाज्ञात्वाथ ये वै मां यावान् यश्‍चास्मि यादृशः।"},{"b":39679,"kind":"sanskrit_shloka","page":785,"verses":["11.11.33"],"text":"भजन्त्यनन्यभावेन ते मे भक्ततमा मताः॥ ३३"},{"b":39680,"kind":"hindi_commentary","page":785,"explains":["11.11.32","11.11.33"],"text":"प्रिय उद्धव! मैंने वेदों और शास्त्रोंके रूपमें मनुष्योंके धर्मका उपदेश किया है, उनके पालनसे अन्तःकरणशुद्धि आदि गुण और उल्लंघनसे नरकादि दुःख प्राप्त होते हैं; परन्तु मेरा जो भक्त उन्हें भी अपने ध्यान आदिमें विक्षेप समझकर त्याग देता है और केवल मेरे ही भजनमें लगा रहता है, वह परम संत है॥ ३२॥ मैं कौन हूँ, कितना बड़ा हूँ, कैसा हूँ—इन बातोंको जाने, चाहे न जाने; किन्तु जो अनन्यभावसे मेरा भजन करते हैं, वे मेरे विचारसे मेरे परम भक्त हैं॥ ३३॥"},{"b":39681,"kind":"sanskrit_shloka","page":785,"verses":["11.11.34"],"text":"मल्लिङ्गमद्भक्तजनदर्शनस्पर्शनार्चनम् ।"},{"b":39682,"kind":"sanskrit_shloka","page":785,"verses":["11.11.34"],"text":"परिचर्या स्तुतिः प्रह्वगुणकर्मानुकीर्तनम्॥ ३४"},{"b":39683,"kind":"sanskrit_shloka","page":786,"verses":["11.11.35"],"text":"मत्कथाश्रवणे श्रद्धा मदनुध्यानमुद्धव।"},{"b":39684,"kind":"sanskrit_shloka","page":786,"verses":["11.11.35"],"text":"सर्वलाभोपहरणं दास्येनात्मनिवेदनम्॥ ३५"},{"b":39685,"kind":"sanskrit_shloka","page":786,"verses":["11.11.36"],"text":"मज्जन्मकर्मकथनं मम पर्वानुमोदनम्।"},{"b":39686,"kind":"sanskrit_shloka","page":786,"verses":["11.11.36"],"text":"गीतताण्डववादित्रगोष्ठीभिर्मद‍्गृहोत्सवः॥ ३६"},{"b":39687,"kind":"sanskrit_shloka","page":786,"verses":["11.11.37"],"text":"यात्रा बलिविधानं च सर्ववार्षिकपर्वसु।"},{"b":39688,"kind":"sanskrit_shloka","page":786,"verses":["11.11.37"],"text":"वैदिकी तान्त्रिकी दीक्षा मदीयव्रतधारणम्॥ ३७"},{"b":39689,"kind":"sanskrit_shloka","page":786,"verses":["11.11.38"],"text":"ममार्चास्थापने श्रद्धा स्वतः संहत्य चोद्यमः।"},{"b":39690,"kind":"sanskrit_shloka","page":786,"verses":["11.11.38"],"text":"उद्यानोपवनाक्रीडपुरमन्दिरकर्मणि ॥ ३८"},{"b":39691,"kind":"sanskrit_shloka","page":786,"verses":["11.11.39"],"text":"सम्मार्जनोपलेपाभ्यां सेकमण्डलवर्तनैः।"},{"b":39692,"kind":"sanskrit_shloka","page":786,"verses":["11.11.39"],"text":"गृहशुश्रूषणं मह्यं दासवद् यदमायया॥ ३९"},{"b":39693,"kind":"sanskrit_shloka","page":786,"verses":["11.11.40"],"text":"अमानित्वमदम्भित्वं कृतस्यापरिकीर्तनम्।"},{"b":39694,"kind":"sanskrit_shloka","page":786,"verses":["11.11.40"],"text":"अपि दीपावलोकं मे नोपयुञ्ज्यान्‍निवेदितम्॥ ४०"},{"b":39695,"kind":"sanskrit_shloka","page":786,"verses":["11.11.41"],"text":"यद् यदिष्टतमं लोके यच्चातिप्रियमात्मनः।"},{"b":39696,"kind":"sanskrit_shloka","page":786,"verses":["11.11.41"],"text":"तत्तन्‍निवेदयेन्मह्यं तदानन्त्याय कल्पते॥ ४१"},{"b":39697,"kind":"hindi_commentary","page":785,"explains":["11.11.34","11.11.35","11.11.36","11.11.37","11.11.38","11.11.39","11.11.40","11.11.41"],"text":"प्यारे उद्धव! मेरी मूर्ति और मेरे भक्तजनोंका दर्शन, स्पर्श, पूजा, सेवा-शुश्रूषा, स्तुति और प्रणाम करे तथा मेरे गुण और कर्मोंका कीर्तन करे॥ ३४॥ उद्धव! मेरी कथा सुननेमें श्रद्धा रखे और निरन्तर मेरा ध्यान करता रहे। जो कुछ मिले, वह मुझे समर्पित कर दे और दास्यभावसे मुझे आत्मनिवेदन करे॥ ३५॥ मेरे दिव्य जन्म और कर्मोंकी चर्चा करे। जन्माष्टमी, रामनवमी आदि पर्वोंपर आनन्द मनावे और संगीत, नृत्य, बाजे और समाजोंद्वारा मेरे मन्दिरोंमें उत्सव करे-करावे॥ ३६॥ वार्षिक त्योहारोंके दिन मेरे स्थानोंकी यात्रा करे, जुलूस निकाले तथा विविध उपहारोंसे मेरी पूजा करे। वैदिक अथवा तान्त्रिक पद्धतिसे दीक्षा ग्रहण करे। मेरे व्रतोंका पालन करे॥ ३७॥ मन्दिरोंमें मेरी मूर्तियोंकी स्थापनामें श्रद्धा रखे। यदि यह काम अकेला न कर सके, तो औरोंके साथ मिलकर उद्योग करे। मेरे लिये पुष्पवाटिका, बगीचे, क्रीड़ाके स्थान, नगर और मन्दिर बनवावे॥ ३८॥ सेवककी भाँति श्रद्धाभक्तिके साथ निष्कपट भावसे मेरे मन्दिरोंकी सेवा-शुश्रूषा करे—झाड़े-बुहारे, लीपे-पोते, छिड़काव करे और तरह-तरहके चौक पूरे॥ ३९॥ अभिमान न करे, दम्भ न करे। साथ ही अपने शुभ कर्मोंका ढिंढोरा भी न पीटे। प्रिय उद्धव! मेरे चढ़ावेकी, अपने काममें लगानेकी बात तो दूर रही, मुझे समर्पित दीपकके प्रकाशसे भी अपना काम न ले। किसी दूसरे देवताकी चढ़ायी हुई वस्तु मुझे न चढ़ावे॥ ४०॥ संसारमें जो वस्तु अपनेको सबसे प्रिय, सबसे अभीष्ट जान पड़े वह मुझे समर्पित कर दे। ऐसा करनेसे वह वस्तु अनन्त फल देनेवाली हो जाती है॥ ४१॥"},{"b":39698,"kind":"sanskrit_shloka","page":786,"verses":["11.11.42"],"text":"सूर्योऽग्‍निर्ब्राह्मणो गावो वैष्णवः खं मरुज्जलम्।"},{"b":39699,"kind":"sanskrit_shloka","page":786,"verses":["11.11.42"],"text":"भूरात्मा सर्वभूतानि भद्र पूजापदानि मे॥ ४२"},{"b":39700,"kind":"sanskrit_shloka","page":786,"verses":["11.11.43"],"text":"सूर्ये तु विद्यया त्रय्या हविषा‌ग्‍नौ यजेत माम्।"},{"b":39701,"kind":"sanskrit_shloka","page":786,"verses":["11.11.43"],"text":"आतिथ्येन तु विप्राग्र्ये गोष्वंग यवसादिना॥ ४३"},{"b":39702,"kind":"hindi_commentary","page":786,"explains":["11.11.42","11.11.43"],"text":"भद्र! सूर्य, अग्‍नि, ब्राह्मण, गौ, वैष्णव, आकाश, वायु, जल, पृथ्वी, आत्मा और समस्त प्राणी—ये सब मेरी पूजाके स्थान हैं॥ ४२॥ प्यारे उद्धव! ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदके मन्त्रोंद्वारा सूर्यमें मेरी पूजा करनी चाहिये। हवनके द्वारा अग्‍निमें, आतिथ्यद्वारा श्रेष्ठ ब्राह्मणमें और हरी-हरी घास आदिके द्वारा गौमें मेरी पूजा करे॥ ४३॥"},{"b":39703,"kind":"sanskrit_shloka","page":786,"verses":["11.11.44"],"text":"वैष्णवे बन्धुसत्कृत्या हृदि खे ध्याननिष्ठया।"},{"b":39704,"kind":"sanskrit_shloka","page":786,"verses":["11.11.44"],"text":"वायौ मुख्यधिया तोये द्रव्यैस्तोयपुरस्कृतैः॥ ४४"},{"b":39705,"kind":"sanskrit_shloka","page":787,"verses":["11.11.45"],"text":"स्थण्डिले मन्त्रहृदयैर्भोगैरात्मानमात्मनि।"},{"b":39706,"kind":"sanskrit_shloka","page":787,"verses":["11.11.45"],"text":"क्षेत्रज्ञं सर्वभूतेषु समत्वेन यजेत माम्॥ ४५"},{"b":39707,"kind":"sanskrit_shloka","page":787,"verses":["11.11.46"],"text":"धिष्ण्येष्वेष्विति मद्रूपं शंखचक्रगदाम्बुजैः।"},{"b":39708,"kind":"sanskrit_shloka","page":787,"verses":["11.11.46"],"text":"युक्तं चतुर्भुजं शान्तं ध्यायन्‍नर्चेत् समाहितः॥ ४६"},{"b":39709,"kind":"sanskrit_shloka","page":787,"verses":["11.11.47"],"text":"इष्टापूर्तेन मामेवं यो यजेत समाहितः।"},{"b":39710,"kind":"sanskrit_shloka","page":787,"verses":["11.11.47"],"text":"लभते मयि सद्भक्तिं मत्स्मृतिः साधुसेवया॥ ४७"},{"b":39711,"kind":"sanskrit_shloka","page":787,"verses":["11.11.48"],"text":"प्रायेण भक्तियोगेन सत्संगेन विनोद्धव।"},{"b":39712,"kind":"sanskrit_shloka","page":787,"verses":["11.11.48"],"text":"नोपायो विद्यते सध्र्यङ् प्रायणं हि सतामहम्॥ ४८"},{"b":39713,"kind":"sanskrit_shloka","page":787,"verses":["11.11.49"],"text":"अथैतत् परमं गुह्यं शृण्वतो यदुनन्दन।"},{"b":39714,"kind":"sanskrit_shloka","page":787,"verses":["11.11.49"],"text":"सुगोप्यमपि वक्ष्यामि त्वं मे भृत्यः सुहृत् सखा॥ ४९"},{"b":39715,"kind":"hindi_commentary","page":786,"explains":["11.11.44","11.11.45","11.11.46","11.11.47","11.11.48","11.11.49"],"text":"भाई-बन्धुके समान सत्कारके द्वारा वैष्णवमें, निरन्तर ध्यानमें लगे रहनेसे हृदयाकाशमें, मुख्य प्राण समझनेसे वायुमें और जल-पुष्प आदि सामग्रियोंद्वारा जलमें मेरी आराधना की जाती है॥ ४४॥ गुप्त मन्त्रोंद्वारा न्यास करके मिट्टीकी वेदीमें, उपयुक्त भोगोंद्वारा आत्मामें और समदृष्टिद्वारा सम्पूर्ण प्राणियोंमें मेरी आराधना करनी चाहिये, क्योंकि मैं सभीमें क्षेत्रज्ञ आत्माके रूपसे स्थित हूँ॥ ४५॥ इन सभी स्थानोंमें शंख-चक्र-गदा-पद्म धारण किये चार भुजाओंवाले शान्तमूर्ति श्रीभगवान् विराजमान हैं, ऐसा ध्यान करते हुए एकाग्रताके साथ मेरी पूजा करनी चाहिये॥ ४६॥ इस प्रकार जो मनुष्य एकाग्र चित्तसे यज्ञ-यागादि इष्ट और कुआँ-बावली बनवाना आदि पूर्त्तकर्मोंके द्वारा मेरी पूजा करता है, उसे मेरी श्रेष्ठ भक्ति प्राप्त होती है तथा संत-पुरुषोंकी सेवा करनेसे मेरे स्वरूपका ज्ञान भी हो जाता है॥ ४७॥ प्यारे उद्धव! मेरा ऐसा निश्‍चय है कि सत्संग और भक्तियोग—इन दो साधनोंका एक साथ ही अनुष्ठान करते रहना चाहिये। प्रायः इन दोनोंके अतिरिक्त संसारसागरसे पार होनेका और कोई उपाय नहीं है, क्योंकि संतपुरुष मुझे अपना आश्रय मानते हैं और मैं सदा-सर्वदा उनके पास बना रहता हूँ॥ ४८॥ प्यारे उद्धव! अब मैं तुम्हें एक अत्यन्त गोपनीय परम रहस्यकी बात बतलाऊँगा; क्योंकि तुम मेरे प्रिय सेवक, हितैषी, सुहृद् और प्रेमी सखा हो; साथ ही सुननेके भी इच्छुक हो॥ ४९॥"},{"b":39716,"kind":"hindi_translation","page":787,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे एकादशोऽध्यायः॥ ११॥"}],"notes":[],"corrections":{"count":6,"list":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/shuddhi/"}}