{"id":"11.23","title":"एकादश स्कन्ध · अध्याय 23","part":"एकादश स्कन्ध","heading":"अथ त्रयोविंशोऽध्यायः","topics":["एक तितिक्षु ब्राह्मणका इतिहास"],"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 11.23.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[855,863]},"verses":[{"id":"11.23.1","number":1,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/1/","page":855,"speaker":"बादरायणिरुवाच","sanskrit":["स एवमाशंसित उद्धवेन","भागवतमुख्येन दाशार्हमुख्यः।","सभाजयन् भृत्यवचो मुकुन्द-","स्तमाबभाषे श्रवणीयवीर्यः॥ १"],"iast":["sa evamāśaṃsita uddhavena","bhāgavatamukhyena dāśārhamukhyaḥ|","sabhājayan bhṛtyavaco mukunda-","stamābabhāṣe śravaṇīyavīryaḥ|| 1"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! वास्तवमें भगवान्‌की लीलाकथा ही श्रवण करनेयोग्य है। वे ही प्रेम और मुक्तिके दाता हैं। जब उनके परमप्रेमी भक्त उद्धवजीने इस प्रकार प्रार्थना की, तब यदुवंशविभूषण श्रीभगवान्‌ने उनके प्रश्‍नकी प्रशंसा करके उनसे इस प्रकार कहा—॥ १॥"},{"id":"11.23.2","number":2,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/2/","page":855,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["बार्हस्पत्य स वै नात्र साधुर्वै दुर्जनेरितैः।","दुरुक्तैर्भिन्‍नमात्मानं यः समाधातुमीश्‍वरः॥ २"],"iast":["bārhaspatya sa vai nātra sādhurvai durjaneritaiḥ|","duruktairbhinnamātmānaṃ yaḥ samādhātumīśvaraḥ|| 2"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्णने कहा—देवगुरु बृहस्पतिके शिष्य उद्धवजी! इस संसारमें प्रायः ऐसे संत पुरुष नहीं मिलते, जो दुर्जनोंकी कटुवाणीसे बिंधे हुए अपने हृदयको सँभाल सकें॥ २॥"},{"id":"11.23.3","number":3,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/3/","page":855,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["न तथा तप्यते विद्धः पुमान् बाणैः सुमर्मगैः।","यथा तुदन्ति मर्मस्था ह्यसतां परुषेषवः॥ ३"],"iast":["na tathā tapyate viddhaḥ pumān bāṇaiḥ sumarmagaiḥ|","yathā tudanti marmasthā hyasatāṃ paruṣeṣavaḥ|| 3"],"meaning":"मनुष्यका हृदय मर्मभेदी बाणोंसे बिंधनेपर भी उतनी पीडाका अनुभव नहीं करता, जितनी पीडा उसे दुष्टजनोंके मर्मान्तक एवं कठोर वाग्बाण पहुँचाते हैं॥ ३॥"},{"id":"11.23.4","number":4,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/4/","page":855,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["कथयन्ति महत्पुण्यमितिहासमिहोद्धव।","तमहं वर्णयिष्यामि निबोध सुसमाहितः॥ ४"],"iast":["kathayanti mahatpuṇyamitihāsamihoddhava|","tamahaṃ varṇayiṣyāmi nibodha susamāhitaḥ|| 4"],"meaning":"उद्धवजी! इस विषयमें महात्मालोग एक बड़ा पवित्र प्राचीन इतिहास कहा करते हैं; मैं वही तुम्हें सुनाऊँगा, तुम मन लगाकर उसे सुनो॥ ४॥"},{"id":"11.23.5","number":5,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/5/","page":855,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["केनचिद् भिक्षुणा गीतं परिभूतेन दुर्जनैः।","स्मरता धृतियुक्तेन विपाकं निजकर्मणाम्॥ ५"],"iast":["kenacid bhikṣuṇā gītaṃ paribhūtena durjanaiḥ|","smaratā dhṛtiyuktena vipākaṃ nijakarmaṇām|| 5"],"meaning":"एक भिक्षुकको दुष्टोंने बहुत सताया था। उस समय भी उसने अपना धैर्य न छोड़ा और उसे अपने पूर्वजन्मके कर्मोंका फल समझकर कुछ अपने मानसिक उद्गार प्रकट किये थे। उन्हींका इस इतिहासमें वर्णन है॥ ५॥"},{"id":"11.23.6","number":6,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/6/","page":855,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["अवन्तिषु द्विजः कश्‍चिदासीदाढ्यतमः श्रिया।","वार्तावृत्तिः कदर्यस्तु कामी लुब्धोऽतिकोपनः॥ ६"],"iast":["avantiṣu dvijaḥ kaścidāsīdāḍhyatamaḥ śriyā|","vārtāvṛttiḥ kadaryastu kāmī lubdho'tikopanaḥ|| 6"],"meaning":"प्राचीन समयकी बात है, उज्जैनमें एक ब्राह्मण रहता था। उसने खेती-व्यापार आदि करके बहुत-सी धन-सम्पत्ति इकट्ठी कर ली थी। वह बहुत ही कृपण, कामी और लोभी था। क्रोध तो उसे बात-बातमें आ जाया करता था॥ ६॥"},{"id":"11.23.7","number":7,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/7/","page":855,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["ज्ञातयोऽतिथयस्तस्य वाङ्मात्रेणापि नार्चिताः।","शून्यावसथ आत्मापि काले कामैरनर्चितः॥ ७"],"iast":["jñātayo'tithayastasya vāṅmātreṇāpi nārcitāḥ|","śūnyāvasatha ātmāpi kāle kāmairanarcitaḥ|| 7"],"meaning":"उसने अपने जाति-बन्धु और अतिथियोंको कभी मीठी बातसे भी प्रसन्‍न नहीं किया, खिलाने-पिलानेकी तो बात ही क्या है। वह धर्म-कर्मसे रीते घरमें रहता और स्वयं भी अपनी धन-सम्पत्तिके द्वारा समयपर अपने शरीरको भी सुखी नहीं करता था॥ ७॥"},{"id":"11.23.8","number":8,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/8/","page":855,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["दुःशीलस्य कदर्यस्य द्रुह्यन्ते पुत्रबान्धवाः।","दारा दुहितरो भृत्या विषण्णा नाचरन् प्रियम्॥ ८"],"iast":["duḥśīlasya kadaryasya druhyante putrabāndhavāḥ|","dārā duhitaro bhṛtyā viṣaṇṇā nācaran priyam|| 8"],"meaning":"उसकी कृपणता और बुरे स्वभावके कारण उसके बेटे-बेटी, भाई-बन्धु, नौकर-चाकर और पत्‍नी आदि सभी दुःखी रहते और मन-ही-मन उसका अनिष्टचिन्तन किया करते थे। कोई भी उसके मनको प्रिय लगनेवाला व्यवहार नहीं करता था॥ ८॥"},{"id":"11.23.9","number":9,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/9/","page":856,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["तस्यैवं यक्षवित्तस्य च्युतस्योभयलोकतः।","धर्मकामविहीनस्य चुक्रुधुः पंचभागिनः॥ ९"],"iast":["tasyaivaṃ yakṣavittasya cyutasyobhayalokataḥ|","dharmakāmavihīnasya cukrudhuḥ paṃcabhāginaḥ|| 9"],"meaning":"वह लोक-परलोक दोनोंसे ही गिर गया था। बस, यक्षोंके समान धनकी रखवाली करता रहता था। उस धनसे वह न तो धर्म कमाता था और न भोग ही भोगता था। बहुत दिनोंतक इस प्रकार जीवन बितानेसे उसपर पंचमहायज्ञके भागी देवता बिगड़ उठे॥ ९॥"},{"id":"11.23.10","number":10,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/10/","page":856,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["तदवध्यानविस्रस्तपुण्यस्कन्धस्य भूरिद।","अर्थोऽप्यगच्छन्‍निधनं बह्वायासपरिश्रमः॥ १०"],"iast":["tadavadhyānavisrastapuṇyaskandhasya bhūrida|","artho'pyagacchannidhanaṃ bahvāyāsapariśramaḥ|| 10"],"meaning":"उदार उद्धवजी! पंचमहायज्ञके भागियोंके तिरस्कारसे उसके पूर्व-पुण्योंका सहारा—जिसके बलसे अबतक धन टिका हुआ था—जाता रहा और जिसे उसने बड़े उद्योग और परिश्रमसे इकट्ठा किया था, वह धन उसकी आँखोंके सामने ही नष्ट-भ्रष्ट हो गया॥ १०॥"},{"id":"11.23.11","number":11,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/11/","page":856,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["ज्ञातयो जगृहुः किंचित् किंचिद् दस्यव उद्धव।","दैवतः कालतः किंचिद् ब्रह्मबन्धोर्नृपार्थिवात्॥ ११"],"iast":["jñātayo jagṛhuḥ kiṃcit kiṃcid dasyava uddhava|","daivataḥ kālataḥ kiṃcid brahmabandhornṛpārthivāt|| 11"],"meaning":"उस नीच ब्राह्मणका कुछ धन तो उसके कुटुम्बियोंने ही छीन लिया, कुछ चोर चुरा ले गये। कुछ आग लग जाने आदि दैवी कोपसे नष्ट हो गया, कुछ समयके फेरसे मारा गया। कुछ साधारण मनुष्योंने ले लिया और बचा-खुचा कर और दण्डके रूपमें शासकोंने हड़प लिया॥ ११॥"},{"id":"11.23.12","number":12,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/12/","page":856,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["स एवं द्रविणे नष्टे धर्मकामविवर्जितः।","उपेक्षितश्‍च स्वजनैश्‍चिन्तामाप दुरत्ययाम्॥ १२"],"iast":["sa evaṃ draviṇe naṣṭe dharmakāmavivarjitaḥ|","upekṣitaśca svajanaiścintāmāpa duratyayām|| 12"],"meaning":"उद्धवजी! इस प्रकार उसकी सारी सम्पत्ति जाती रही। न तो उसने धर्म ही कमाया और न भोग ही भोगे। इधर उसके सगे-सम्बन्धियोंने भी उसकी ओरसे मुँह मोड़ लिया। अब उसे बड़ी भयानक चिन्ताने घेर लिया॥ १२॥"},{"id":"11.23.13","number":13,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/13/","page":856,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["तस्यैवं ध्यायतो दीर्घं नष्टरायस्तपस्विनः।","खिद्यतो बाष्पकण्ठस्य निर्वेदः सुमहानभूत्॥ १३"],"iast":["tasyaivaṃ dhyāyato dīrghaṃ naṣṭarāyastapasvinaḥ|","khidyato bāṣpakaṇṭhasya nirvedaḥ sumahānabhūt|| 13"],"meaning":"धनके नाशसे उसके हृदयमें बड़ी जलन हुई। उसका मन खेदसे भर गया। आँसुओंके कारण गला रुँध गया। परन्तु इस तरह चिन्ता करते-करते ही उसके मनमें संसारके प्रति महान् दुःखबुद्धि और उत्कट वैराग्यका उदय हो गया॥ १३॥"},{"id":"11.23.14","number":14,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/14/","page":856,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["स चाहेदमहो कष्टं वृथाऽऽत्मा मेऽनुतापितः।","न धर्माय न कामाय यस्यार्थायास ईदृशः॥ १४"],"iast":["sa cāhedamaho kaṣṭaṃ vṛthā''tmā me'nutāpitaḥ|","na dharmāya na kāmāya yasyārthāyāsa īdṛśaḥ|| 14"],"meaning":"अब वह ब्राह्मण मन-ही-मन कहने लगा—‘हाय! हाय!! बड़े खेदकी बात है, मैंने इतने दिनोंतक अपनेको व्यर्थ ही इस प्रकार सताया। जिस धनके लिये मैंने सरतोड़ परिश्रम किया, वह न तो धर्मकर्ममें लगा और न मेरे सुखभोगके ही काम आया॥ १४॥"},{"id":"11.23.15","number":15,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/15/","page":856,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["प्रायेणार्थाः कदर्याणां न सुखाय कदाचन।","इह चात्मोपतापाय मृतस्य नरकाय च॥ १५"],"iast":["prāyeṇārthāḥ kadaryāṇāṃ na sukhāya kadācana|","iha cātmopatāpāya mṛtasya narakāya ca|| 15"],"meaning":"प्रायः देखा जाता है कि कृपण पुरुषोंको धनसे कभी सुख नहीं मिलता। इस लोकमें तो वे धन कमाने और रक्षाकी चिन्तासे जलते रहते हैं और मरनेपर धर्म न करनेके कारण नरकमें जाते हैं॥ १५॥"},{"id":"11.23.16","number":16,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/16/","page":857,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["यशो यशस्विनां शुद्धं श्‍लाघ्या ये गुणिनां गुणाः।","लोभः स्वल्पोऽपि तान् हन्ति श्‍वित्रो रूपमिवेप्सितम्॥ १६"],"iast":["yaśo yaśasvināṃ śuddhaṃ ślāghyā ye guṇināṃ guṇāḥ|","lobhaḥ svalpo'pi tān hanti śvitro rūpamivepsitam|| 16"],"meaning":"जैसे थोड़ा-सा भी कोढ़ सर्वांगसुन्दर स्वरूपको बिगाड़ देता है, वैसे ही तनिक-सा भी लोभ यशस्वियोंके शुद्ध यश और गुणियोंके प्रशंसनीय गुणोंपर पानी फेर देता है॥ १६॥"},{"id":"11.23.17","number":17,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/17/","page":857,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["अर्थस्य साधने सिद्धे उत्कर्षे रक्षणे व्यये।","नाशोपभोग आयासस्त्रासश्‍चिन्ता भ्रमो नृणाम्॥ १७"],"iast":["arthasya sādhane siddhe utkarṣe rakṣaṇe vyaye|","nāśopabhoga āyāsastrāsaścintā bhramo nṛṇām|| 17"],"meaning":"धन कमानेमें, कमा लेनेपर उसको बढ़ाने, रखने एवं खर्च करनेमें तथा उसके नाश और उपभोगमें—जहाँ देखो वहीं निरन्तर परिश्रम, भय, चिन्ता और भ्रमका ही सामना करना पड़ता है॥ १७॥"},{"id":"11.23.18","number":18,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/18/","page":857,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["स्तेयं हिंसानृतं दम्भः कामः क्रोधः स्मयो मदः।","भेदो वैरमविश्‍वासः संस्पर्धा व्यसनानि च॥ १८"],"iast":["steyaṃ hiṃsānṛtaṃ dambhaḥ kāmaḥ krodhaḥ smayo madaḥ|","bhedo vairamaviśvāsaḥ saṃspardhā vyasanāni ca|| 18"],"meaning":"चोरी, हिंसा, झूठ बोलना, दम्भ, काम, क्रोध, गर्व, अहंकार, भेदबुद्धि, वैर, अविश्‍वास, स्पर्द्धा, लम्पटता, जूआ और शराब—ये पन्द्रह अनर्थ मनुष्योंमें धनके कारण ही माने गये हैं। इसलिये कल्याणकामी पुरुषको चाहिये कि स्वार्थ एवं परमार्थके विरोधी अर्थनामधारी अनर्थको दूरसे ही छोड़ दे॥ १८-१९॥","meaning_covers":[18,19]},{"id":"11.23.19","number":19,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/19/","page":857,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["एते पंचदशानर्था ह्यर्थमूला मता नृणाम्।","तस्मादनर्थमर्थाख्यं श्रेयोऽर्थी दूरतस्त्यजेत्॥ १९"],"iast":["ete paṃcadaśānarthā hyarthamūlā matā nṛṇām|","tasmādanarthamarthākhyaṃ śreyo'rthī dūratastyajet|| 19"],"meaning":"चोरी, हिंसा, झूठ बोलना, दम्भ, काम, क्रोध, गर्व, अहंकार, भेदबुद्धि, वैर, अविश्‍वास, स्पर्द्धा, लम्पटता, जूआ और शराब—ये पन्द्रह अनर्थ मनुष्योंमें धनके कारण ही माने गये हैं। इसलिये कल्याणकामी पुरुषको चाहिये कि स्वार्थ एवं परमार्थके विरोधी अर्थनामधारी अनर्थको दूरसे ही छोड़ दे॥ १८-१९॥","meaning_covers":[18,19]},{"id":"11.23.20","number":20,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/20/","page":857,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["भिद्यन्ते भ्रातरो दाराः पितरः सुहृदस्तथा।","एकास्निग्धाः काकिणिना सद्यः सर्वेऽरयः कृताः॥ २०"],"iast":["bhidyante bhrātaro dārāḥ pitaraḥ suhṛdastathā|","ekāsnigdhāḥ kākiṇinā sadyaḥ sarve'rayaḥ kṛtāḥ|| 20"],"meaning":"भाई-बन्धु, स्त्री-पुत्र, माता-पिता, सगे-सम्बन्धी—जो स्नेहबन्धनसे बँधकर बिलकुल एक हुए रहते हैं—सब-के-सब कौड़ीके कारण इतने फट जाते हैं कि तुरंत एक-दूसरेके शत्रु बन जाते हैं॥ २०॥"},{"id":"11.23.21","number":21,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/21/","page":857,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["अर्थेनाल्पीयसा ह्येते संरब्धा दीप्तमन्यवः।","त्यजन्त्याशु स्पृधो घ्नन्ति सहसोत्सृज्य सौहृदम्॥ २१"],"iast":["arthenālpīyasā hyete saṃrabdhā dīptamanyavaḥ|","tyajantyāśu spṛdho ghnanti sahasotsṛjya sauhṛdam|| 21"],"meaning":"ये लोग थोड़े-से धनके लिये भी क्षुब्ध और क्रुद्ध हो जाते हैं। बात-की-बातमें सौहार्द-सम्बन्ध छोड़ देते हैं, लाग-डाँट रखने लगते हैं और एकाएक प्राण लेने-देनेपर उतारू हो जाते हैं। यहाँतक कि एक-दूसरेका सर्वनाश कर डालते हैं॥ २१॥"},{"id":"11.23.22","number":22,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/22/","page":857,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["लब्ध्वा जन्मामरप्रार्थ्यं मानुष्यं तद् द्विजाग्र्‌यताम्।","तदनादृत्य ये स्वार्थं घ्नन्ति यान्त्यशुभां गतिम्॥ २२"],"iast":["labdhvā janmāmaraprārthyaṃ mānuṣyaṃ tad dvijāgryatām|","tadanādṛtya ye svārthaṃ ghnanti yāntyaśubhāṃ gatim|| 22"],"meaning":"देवताओंके भी प्रार्थनीय मनुष्य-जन्मको और उसमें भी श्रेष्ठ ब्राह्मण-शरीर प्राप्त करके जो उसका अनादर करते हैं और अपने सच्चे स्वार्थ-परमार्थका नाश करते हैं, वे अशुभ गतिको प्राप्त होते हैं॥ २२॥"},{"id":"11.23.23","number":23,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/23/","page":857,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["स्वर्गापवर्गयोर्द्वारं प्राप्य लोकमिमं पुमान्।","द्रविणे कोऽनुषज्जेत मर्त्योऽनर्थस्य धामनि॥ २३"],"iast":["svargāpavargayordvāraṃ prāpya lokamimaṃ pumān|","draviṇe ko'nuṣajjeta martyo'narthasya dhāmani|| 23"],"meaning":"यह मनुष्य-शरीर मोक्ष और स्वर्गका द्वार है, इसको पाकर भी ऐसा कौन बुद्धिमान् मनुष्य है जो अनर्थोंके धाम धनके चक्करमें फँसा रहे॥ २३॥"},{"id":"11.23.24","number":24,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/24/","page":857,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["देवर्षिपितृभूतानि ज्ञातीन् बन्धूंश्‍च भागिनः।","असंविभज्य चात्मानं यक्षवित्तः पतत्यधः॥ २४"],"iast":["devarṣipitṛbhūtāni jñātīn bandhūṃśca bhāginaḥ|","asaṃvibhajya cātmānaṃ yakṣavittaḥ patatyadhaḥ|| 24"],"meaning":"जो मनुष्य देवता, ऋषि, पितर, प्राणी, जाति-भाई, कुटुम्बी और धनके दूसरे भागीदारोंको उनका भाग देकर सन्तुष्ट नहीं रखता और न स्वयं ही उसका उपभोग करता है, वह यक्षके समान धनकी रखवाली करनेवाला कृपण तो अवश्य ही अधोगतिको प्राप्त होता है॥ २४॥"},{"id":"11.23.25","number":25,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/25/","page":858,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["व्यर्थयार्थेहया वित्तं प्रमत्तस्य वयो बलम्।","कुशला येन सिध्यन्ति जरठः किं नु साधये॥ २५"],"iast":["vyarthayārthehayā vittaṃ pramattasya vayo balam|","kuśalā yena sidhyanti jaraṭhaḥ kiṃ nu sādhaye|| 25"],"meaning":"मैं अपने कर्तव्यसे च्युत हो गया हूँ। मैंने प्रमादमें अपनी आयु, धन और बल-पौरुष खो दिये। विवेकीलोग जिन साधनोंसे मोक्षतक प्राप्त कर लेते हैं, उन्हींको मैंने धन इकट्ठा करनेकी व्यर्थ चेष्टामें खो दिया। अब बुढ़ापेमें मैं कौन-सा साधन करूँगा॥ २५॥"},{"id":"11.23.26","number":26,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/26/","page":858,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["कस्मात् संक्लिश्यते विद्वान् व्यर्थयार्थेहयासकृत्।","कस्यचिन्मायया नूनं लोकोऽयं सुविमोहितः॥ २६"],"iast":["kasmāt saṃkliśyate vidvān vyarthayārthehayāsakṛt|","kasyacinmāyayā nūnaṃ loko'yaṃ suvimohitaḥ|| 26"],"meaning":"मुझे मालूम नहीं होता कि बड़े-बड़े विद्वान् भी धनकी व्यर्थ तृष्णासे निरन्तर क्यों दुःखी रहते हैं? हो-न-हो, अवश्य ही यह संसार किसीकी मायासे अत्यन्त मोहित हो रहा है॥ २६॥"},{"id":"11.23.27","number":27,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/27/","page":858,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["किं धनैर्धनदैर्वा किं कामैर्वा कामदैरुत।","मृत्युना ग्रस्यमानस्य कर्मभिर्वोत जन्मदैः॥ २७"],"iast":["kiṃ dhanairdhanadairvā kiṃ kāmairvā kāmadairuta|","mṛtyunā grasyamānasya karmabhirvota janmadaiḥ|| 27"],"meaning":"यह मनुष्य-शरीर कालके विकराल गालमें पड़ा हुआ है। इसको धनसे, धन देनेवाले देवताओं और लोगोंसे, भोगवासनाओं और उनको पूर्ण करनेवालोंसे तथा पुनः-पुनः जन्म-मृत्युके चक्करमें डालनेवाले सकाम कर्मोंसे लाभ ही क्या है?॥ २७॥"},{"id":"11.23.28","number":28,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/28/","page":858,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["नूनं मे भगवांस्तुष्टः सर्वदेवमयो हरिः।","येन नीतो दशामेतां निर्वेदश्‍चात्मनः प्लवः॥ २८"],"iast":["nūnaṃ me bhagavāṃstuṣṭaḥ sarvadevamayo hariḥ|","yena nīto daśāmetāṃ nirvedaścātmanaḥ plavaḥ|| 28"],"meaning":"इसमें सन्देह नहीं कि सर्वदेवस्वरूप भगवान् मुझपर प्रसन्‍न हैं। तभी तो उन्होंने मुझे इस दशामें पहुँचाया है और मुझे जगत‍्के प्रति यह दुःख-बुद्धि और वैराग्य दिया है। वस्तुतः वैराग्य ही इस संसार-सागरसे पार होनेके लिये नौकाके समान है॥ २८॥"},{"id":"11.23.29","number":29,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/29/","page":858,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["सोऽहं कालावशेषेण शोषयिष्येऽङ्गमात्मनः।","अप्रमत्तोऽखिलस्वार्थे यदि स्यात् सिद्ध आत्मनि॥ २९"],"iast":["so'haṃ kālāvaśeṣeṇa śoṣayiṣye'ṅgamātmanaḥ|","apramatto'khilasvārthe yadi syāt siddha ātmani|| 29"],"meaning":"मैं अब ऐसी अवस्थामें पहुँच गया हूँ। यदि मेरी आयु शेष हो तो मैं आत्मलाभमें ही सन्तुष्ट रहकर अपने परमार्थके सम्बन्धमें सावधान हो जाऊँगा और अब जो समय बच रहा है, उसमें अपने शरीरको तपस्याके द्वारा सुखा डालूँगा॥ २९॥"},{"id":"11.23.30","number":30,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/30/","page":858,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["तत्र मामनुमोदेरन् देवास्त्रिभुवनेश्‍वराः।","मुहूर्तेन ब्रह्मलोकं खट्वांगः समसाधयत्॥ ३०"],"iast":["tatra māmanumoderan devāstribhuvaneśvarāḥ|","muhūrtena brahmalokaṃ khaṭvāṃgaḥ samasādhayat|| 30"],"meaning":"तीनों लोकोंके स्वामी देवगण मेरे इस संकल्पका अनुमोदन करें। अभी निराश होनेकी कोई बात नहीं है, क्योंकि राजा खट्वांगने तो दो घड़ीमें ही भगवद्धामकी प्राप्ति कर ली थी॥ ३०॥"},{"id":"11.23.31","number":31,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/31/","page":858,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["इत्यभिप्रेत्य मनसा ह्यावन्त्यो द्विजसत्तमः।","उन्मुच्य हृदयग्रन्थीन् शान्तो भिक्षुरभून्मुनिः॥ ३१"],"iast":["ityabhipretya manasā hyāvantyo dvijasattamaḥ|","unmucya hṛdayagranthīn śānto bhikṣurabhūnmuniḥ|| 31"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—उद्धवजी! उस उज्जैननिवासी ब्राह्मणने मन-ही-मन इस प्रकार निश्‍चय करके ‘मैं’ और ‘मेरे’ पनकी गाँठ खोल दी। इसके बाद वह शान्त होकर मौनी संन्यासी हो गया॥ ३१॥"},{"id":"11.23.32","number":32,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/32/","page":858,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["स चचार महीमेतां संयतात्मेन्द्रियानिलः।","भिक्षार्थं नगरग्रामानसंगोऽलक्षितोऽविशत्॥ ३२"],"iast":["sa cacāra mahīmetāṃ saṃyatātmendriyānilaḥ|","bhikṣārthaṃ nagaragrāmānasaṃgo'lakṣito'viśat|| 32"],"meaning":"अब उसके चित्तमें किसी भी स्थान, वस्तु या व्यक्तिके प्रति आसक्ति न रही। उसने अपने मन, इन्द्रिय और प्राणोंको वशमें कर लिया। वह पृथ्वीपर स्वच्छन्दरूपसे विचरने लगा। वह भिक्षाके लिये नगर और गाँवोंमें जाता अवश्य था, परन्तु इस प्रकार जाता था कि कोई उसे पहचान न पाता था॥ ३२॥"},{"id":"11.23.33","number":33,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/33/","page":859,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["तं वै प्रवयसं भिक्षुमवधूतमसज्जनाः।","दृष्ट्वा पर्यभवन् भद्र बह्वीभिः परिभूतिभिः॥ ३३"],"iast":["taṃ vai pravayasaṃ bhikṣumavadhūtamasajjanāḥ|","dṛṣṭvā paryabhavan bhadra bahvībhiḥ paribhūtibhiḥ|| 33"],"meaning":"उद्धवजी! वह भिक्षुक अवधूत बहुत बूढ़ा हो गया था। दुष्ट उसे देखते ही टूट पड़ते और तरह-तरहसे उसका तिरस्कार करके उसे तंग करते॥ ३३॥"},{"id":"11.23.34","number":34,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/34/","page":859,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["केचित्त्रिवेणुं जगृहुरेके पात्रं कमण्डलुम्।","पीठं चैकेऽक्षसूत्रं च कन्थां चीराणि केचन॥ ३४"],"iast":["kecittriveṇuṃ jagṛhureke pātraṃ kamaṇḍalum|","pīṭhaṃ caike'kṣasūtraṃ ca kanthāṃ cīrāṇi kecana|| 34"],"meaning":"कोई उसका दण्ड छीन लेता, तो कोई भिक्षापात्र ही झटक ले जाता। कोई कमण्डलु उठा ले जाता तो कोई आसन, रुद्राक्षमाला और कन्था ही लेकर भाग जाता। कोई तो उसकी लँगोटी और वस्त्रको ही इधर-उधर डाल देते॥ ३४॥"},{"id":"11.23.35","number":35,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/35/","page":859,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["प्रदाय च पुनस्तानि दर्शितान्याददुर्मुनेः।","अन्‍नं च भैक्ष्यसम्पन्‍नं भुंजानस्य सरित्तटे॥ ३५"],"iast":["pradāya ca punastāni darśitānyādadurmuneḥ|","annaṃ ca bhaikṣyasampannaṃ bhuṃjānasya sarittaṭe|| 35"],"meaning":"कोई-कोई वे वस्तुएँ देकर और कोई दिखला-दिखलाकर फिर छीन लेते। जब वह अवधूत मधुकरी माँगकर लाता और बाहर नदी-तटपर भोजन करने बैठता, तो पापी लोग कभी उसके सिरपर मूत देते, तो कभी थूक देते। वे लोग उस मौनी अवधूतको तरह-तरहसे बोलनेके लिये विवश करते और जब वह इसपर भी न बोलता तो उसे पीटते॥ ३५-३६॥","meaning_covers":[35,36]},{"id":"11.23.36","number":36,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/36/","page":859,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["मूत्रयन्ति च पापिष्ठाः ष्ठीवन्त्यस्य च मूर्धनि।","यतवाचं वाचयन्ति ताडयन्ति न वक्ति चेत्॥ ३६"],"iast":["mūtrayanti ca pāpiṣṭhāḥ ṣṭhīvantyasya ca mūrdhani|","yatavācaṃ vācayanti tāḍayanti na vakti cet|| 36"],"meaning":"कोई-कोई वे वस्तुएँ देकर और कोई दिखला-दिखलाकर फिर छीन लेते। जब वह अवधूत मधुकरी माँगकर लाता और बाहर नदी-तटपर भोजन करने बैठता, तो पापी लोग कभी उसके सिरपर मूत देते, तो कभी थूक देते। वे लोग उस मौनी अवधूतको तरह-तरहसे बोलनेके लिये विवश करते और जब वह इसपर भी न बोलता तो उसे पीटते॥ ३५-३६॥","meaning_covers":[35,36]},{"id":"11.23.37","number":37,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/37/","page":859,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["तर्जयन्त्यपरे वाग्भिः स्तेनोऽयमिति वादिनः।","बध्नन्ति रज्ज्वा तं केचिद् बध्यतां बध्यतामिति॥ ३७"],"iast":["tarjayantyapare vāgbhiḥ steno'yamiti vādinaḥ|","badhnanti rajjvā taṃ kecid badhyatāṃ badhyatāmiti|| 37"],"meaning":"कोई उसे चोर कहकर डाँटने-डपटने लगता। कोई कहता ‘इसे बाँध लो, बाँध लो’ और फिर उसे रस्सीसे बाँधने लगते॥ ३७॥"},{"id":"11.23.38","number":38,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/38/","page":859,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["क्षिपन्त्येकेऽवजानन्त एष धर्मध्वजः शठः।","क्षीणवित्त इमां वृत्तिमग्रहीत् स्वजनोज्झितः॥ ३८"],"iast":["kṣipantyeke'vajānanta eṣa dharmadhvajaḥ śaṭhaḥ|","kṣīṇavitta imāṃ vṛttimagrahīt svajanojjhitaḥ|| 38"],"meaning":"कोई उसका तिरस्कार करके इस प्रकार ताना कसते कि ‘देखो-देखो, अब इस कृपणने धर्मका ढोंग रचा है। धन-सम्पत्ति जाती रही, स्त्री-पुत्रोंने घरसे निकाल दिया; तब इसने भीख माँगनेका रोजगार लिया है॥ ३८॥"},{"id":"11.23.39","number":39,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/39/","page":859,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["अहो एष महासारो धृतिमान् गिरिराडिव।","मौनेन साधयत्यर्थं बकवद् दृढनिश्‍चयः॥ ३९"],"iast":["aho eṣa mahāsāro dhṛtimān girirāḍiva|","maunena sādhayatyarthaṃ bakavad dṛḍhaniścayaḥ|| 39"],"meaning":"ओहो! देखो तो सही, यह मोटा-तगड़ा भिखारी धैर्यमें बड़े भारी पर्वतके समान है। यह मौन रहकर अपना काम बनाना चाहता है। सचमुच यह बगुलेसे भी बढ़कर ढोंगी और दृढ़निश्‍चयी है’॥ ३९॥"},{"id":"11.23.40","number":40,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/40/","page":859,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["इत्येके विहसन्त्येनमेके दुर्वातयन्ति च।","तं बबन्धुर्निरुरुधुर्यथा क्रीडनकं द्विजम्॥ ४०"],"iast":["ityeke vihasantyenameke durvātayanti ca|","taṃ babandhurnirurudhuryathā krīḍanakaṃ dvijam|| 40"],"meaning":"कोई उस अवधूतकी हँसी उड़ाता, तो कोई उसपर अधोवायु छोड़ता। जैसे लोग तोता-मैना आदि पालतू पक्षियोंको बाँध लेते या पिंजड़ेमें बंद कर लेते हैं, वैसे ही उसे भी वे लोग बाँध देते और घरोंमें बंद कर देते॥ ४०॥"},{"id":"11.23.41","number":41,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/41/","page":859,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["एवं स भौतिकं दुःखं दैविकं दैहिकं च यत्।","भोक्तव्यमात्मनो दिष्टं प्राप्तं प्राप्तमबुध्यत॥ ४१"],"iast":["evaṃ sa bhautikaṃ duḥkhaṃ daivikaṃ daihikaṃ ca yat|","bhoktavyamātmano diṣṭaṃ prāptaṃ prāptamabudhyata|| 41"],"meaning":"किन्तु वह सब कुछ चुपचाप सह लेता। उसे कभी ज्वर आदिके कारण दैहिक पीड़ा सहनी पड़ती, कभी गरमी-सर्दी आदिसे दैवी कष्ट उठाना पड़ता और कभी दुर्जन लोग अपमान आदिके द्वारा उसे भौतिक पीड़ा पहुँचाते; परन्तु भिक्षुकके मनमें इससे कोई विकार न होता। वह समझता कि यह सब मेरे पूर्वजन्मके कर्मोंका फल है और इसे मुझे अवश्य भोगना पड़ेगा॥ ४१॥"},{"id":"11.23.42","number":42,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/42/","page":860,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["परिभूत इमां गाथामगायत नराधमैः।","पातयद्भिः स्वधर्मस्थो धृतिमास्थाय सात्त्विकीम्॥ ४२"],"iast":["paribhūta imāṃ gāthāmagāyata narādhamaiḥ|","pātayadbhiḥ svadharmastho dhṛtimāsthāya sāttvikīm|| 42"],"meaning":"यद्यपि नीच मनुष्य तरह-तरहके तिरस्कार करके उसे उसके धर्मसे गिरानेकी चेष्टा किया करते, फिर भी वह बड़ी दृढ़तासे अपने धर्ममें स्थिर रहता और सात्त्विक धैर्यका आश्रय लेकर कभी-कभी ऐसे उद्गार प्रकट किया करता॥ ४२॥"},{"id":"11.23.43","number":43,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/43/","page":860,"speaker":"द्विज उवाच","sanskrit":["नायं जनो मे सुखदुःखहेतु-","र्न देवताऽऽत्मा ग्रहकर्मकालाः।","मनः परं कारणमामनन्ति","संसारचक्रं परिवर्तयेद् यत्॥ ४३"],"iast":["nāyaṃ jano me sukhaduḥkhahetu-","rna devatā''tmā grahakarmakālāḥ|","manaḥ paraṃ kāraṇamāmananti","saṃsāracakraṃ parivartayed yat|| 43"],"meaning":"ब्राह्मण कहता—मेरे सुख अथवा दुःखका कारण न ये मनुष्य हैं, न देवता हैं, न आत्मा है और न ग्रह, कर्म एवं काल आदि ही हैं। श्रुतियाँ और महात्माजन मनको ही इसका परम कारण बताते हैं और मन ही इस सारे संसार-चक्रको चला रहा है॥ ४३॥"},{"id":"11.23.44","number":44,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/44/","page":860,"speaker":"द्विज उवाच","sanskrit":["मनो गुणान् वै सृजते बलीय-","स्ततश्‍च कर्माणि विलक्षणानि।","शुक्लानि कृष्णान्यथ लोहितानि","तेभ्यः सवर्णाः सृतयो भवन्ति॥ ४४"],"iast":["mano guṇān vai sṛjate balīya-","stataśca karmāṇi vilakṣaṇāni|","śuklāni kṛṣṇānyatha lohitāni","tebhyaḥ savarṇāḥ sṛtayo bhavanti|| 44"],"meaning":"सचमुच यह मन बहुत बलवान् है। इसीने विषयों, उनके कारण गुणों और उनसे सम्बन्ध रखनेवाली वृत्तियोंकी सृष्टि की है। उन वृत्तियोंके अनुसार ही सात्त्विक, राजस और तामस—अनेकों प्रकारके कर्म होते हैं और कर्मोंके अनुसार ही जीवकी विविध गतियाँ होती हैं॥ ४४॥"},{"id":"11.23.45","number":45,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/45/","page":860,"speaker":"द्विज उवाच","sanskrit":["अनीह आत्मा मनसा समीहता","हिरण्मयो मत्सख उद्विचष्टे।","मनः स्वलिंगं परिगृह्य कामान्","जुषन् निबद्धो गुणसंगतोऽसौ॥ ४५"],"iast":["anīha ātmā manasā samīhatā","hiraṇmayo matsakha udvicaṣṭe|","manaḥ svaliṃgaṃ parigṛhya kāmān","juṣan nibaddho guṇasaṃgato'sau|| 45"],"meaning":"मन ही समस्त चेष्टाएँ करता है। उसके साथ रहनेपर भी आत्मा निष्क्रिय ही है। वह ज्ञानशक्तिप्रधान है, मुझ जीवका सनातन सखा है और अपने अलुप्त ज्ञानसे सब कुछ देखता रहता है। मनके द्वारा ही उसकी अभिव्यक्ति होती है। जब वह मनको स्वीकार करके उसके द्वारा विषयोंका भोक्ता बन बैठता है, तब कर्मोंके साथ आसक्ति होनेके कारण वह उनसे बँध जाता है॥ ४५॥"},{"id":"11.23.46","number":46,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/46/","page":860,"speaker":"द्विज उवाच","sanskrit":["दानं स्वधर्मो नियमो यमश्‍च","श्रुतं च कर्माणि च सद्व्रतानि।","सर्वे मनोनिग्रहलक्षणान्ताः","परो हि योगो मनसः समाधिः॥ ४६"],"iast":["dānaṃ svadharmo niyamo yamaśca","śrutaṃ ca karmāṇi ca sadvratāni|","sarve manonigrahalakṣaṇāntāḥ","paro hi yogo manasaḥ samādhiḥ|| 46"],"meaning":"दान, अपने धर्मका पालन, नियम, यम, वेदाध्ययन, सत्कर्म और ब्रह्मचर्यादि श्रेष्ठ व्रत—इन सबका अन्तिम फल यही है कि मन एकाग्र हो जाय, भगवान्‌में लग जाय। मनका समाहित हो जाना ही परम योग है॥ ४६॥"},{"id":"11.23.47","number":47,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/47/","page":860,"speaker":"द्विज उवाच","sanskrit":["समाहितं यस्य मनः प्रशान्तं","दानादिभिः किं वद तस्य कृत्यम्।","असंयतं यस्य मनो विनश्यद्","दानादिभिश्‍चेदपरं किमेभिः॥ ४७"],"iast":["samāhitaṃ yasya manaḥ praśāntaṃ","dānādibhiḥ kiṃ vada tasya kṛtyam|","asaṃyataṃ yasya mano vinaśyad","dānādibhiścedaparaṃ kimebhiḥ|| 47"],"meaning":"जिसका मन शान्त और समाहित है, उसे दान आदि समस्त सत्कर्मोंका फल प्राप्त हो चुका है। अब उनसे कुछ लेना बाकी नहीं है। और जिसका मन चंचल है अथवा आलस्यसे अभिभूत हो रहा है, उसको इन दानादि शुभकर्मोंसे अबतक कोई लाभ नहीं हुआ॥ ४७॥"},{"id":"11.23.48","number":48,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/48/","page":860,"speaker":"द्विज उवाच","sanskrit":["मनोवशेऽन्ये ह्यभवन् स्म देवा","मनश्‍च नान्यस्य वशं समेति।","भीष्मो हि देवः सहसः सहीयान्","युञ्ज्याद् वशे तं स हि देवदेवः॥ ४८"],"iast":["manovaśe'nye hyabhavan sma devā","manaśca nānyasya vaśaṃ sameti|","bhīṣmo hi devaḥ sahasaḥ sahīyān","yuñjyād vaśe taṃ sa hi devadevaḥ|| 48"],"meaning":"सभी इन्द्रियाँ मनके वशमें हैं। मन किसी भी इन्द्रियके वशमें नहीं है। यह मन बलवान्से भी बलवान्, अत्यन्त भयंकर देव है। जो इसको अपने वशमें कर लेता है, वही देव-देव—इन्द्रियोंका विजेता है॥ ४८॥"},{"id":"11.23.49","number":49,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/49/","page":861,"speaker":"द्विज उवाच","sanskrit":["तं दुर्जयं शत्रुमसह्यवेग-","मरुन्तुदं तन्‍न विजित्य केचित्।","कुर्वन्त्यसद्विग्रहमत्र मर्त्यै-","र्मित्राण्युदासीनरिपून् विमूढाः॥ ४९"],"iast":["taṃ durjayaṃ śatrumasahyavega-","maruntudaṃ tanna vijitya kecit|","kurvantyasadvigrahamatra martyai-","rmitrāṇyudāsīnaripūn vimūḍhāḥ|| 49"],"meaning":"सचमुच मन बहुत बड़ा शत्रु है। इसका आक्रमण असह्य है। यह बाहरी शरीरको ही नहीं, हृदयादि मर्मस्थानोंको भी बेधता रहता है। इसे जीतना बहुत ही कठिन है। मनुष्योंको चाहिये कि सबसे पहले इसी शत्रुपर विजय प्राप्त करे; परन्तु होता है यह कि मूर्ख लोग इसे तो जीतनेका प्रयत्‍न करते नहीं, दूसरे मनुष्योंसे झूठमूठ झगड़ा-बखेड़ा करते रहते हैं और इस जगत‍्के लोगोंको ही मित्र-शत्रु-उदासीन बना लेते हैं॥ ४९॥"},{"id":"11.23.50","number":50,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/50/","page":861,"speaker":"द्विज उवाच","sanskrit":["देहं मनोमात्रमिमं गृहीत्वा","ममाहमित्यन्धधियो मनुष्याः।","एषोऽहमन्योऽयमिति भ्रमेण","दुरन्तपारे तमसि भ्रमन्ति॥ ५०"],"iast":["dehaṃ manomātramimaṃ gṛhītvā","mamāhamityandhadhiyo manuṣyāḥ|","eṣo'hamanyo'yamiti bhrameṇa","durantapāre tamasi bhramanti|| 50"],"meaning":"साधारणतः मनुष्योंकी बुद्धि अंधी हो रही है। तभी तो वे इस मनःकल्पित शरीरको ‘मैं’ और ‘मेरा’ मान बैठते हैं और फिर इस भ्रमके फंदेमें फँस जाते हैं कि ‘यह मैं हूँ और यह दूसरा।’ इसका परिणाम यह होता है कि वे इस अनन्त अज्ञानान्धकारमें ही भटकते रहते हैं॥ ५०॥"},{"id":"11.23.51","number":51,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/51/","page":861,"speaker":"द्विज उवाच","sanskrit":["जनस्तु हेतुः सुखदुःखयोश्‍चेत्","किमात्मनश्‍चात्र ह भौमयोस्तत्।","जिह्वां क्‍वचित् संदशति स्वदद्भि-","स्तद्वेदनायां कतमाय कुप्येत्॥ ५१"],"iast":["janastu hetuḥ sukhaduḥkhayoścet","kimātmanaścātra ha bhaumayostat|","jihvāṃ kvacit saṃdaśati svadadbhi-","stadvedanāyāṃ katamāya kupyet|| 51"],"meaning":"यदि मान लें कि मनुष्य ही सुख-दुःखका कारण है, तो भी उनसे आत्माका क्या सम्बन्ध? क्योंकि सुख-दुःख पहुँचानेवाला भी मिट्टीका शरीर है और भोगनेवाला भी। कभी भोजन आदिके समय यदि अपने दाँतोंसे ही अपनी जीभ कट जाय और उससे पीड़ा होने लगे, तो मनुष्य किसपर क्रोध करेगा?॥ ५१॥"},{"id":"11.23.52","number":52,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/52/","page":861,"speaker":"द्विज उवाच","sanskrit":["दुःखस्य हेतुर्यदि देवतास्तु","किमात्मनस्तत्र विकारयोस्तत्।","यदंगमंगेन निहन्यते क्‍वचित्","क्रुध्येत कस्मै पुरुषः स्वदेहे॥ ५२"],"iast":["duḥkhasya heturyadi devatāstu","kimātmanastatra vikārayostat|","yadaṃgamaṃgena nihanyate kvacit","krudhyeta kasmai puruṣaḥ svadehe|| 52"],"meaning":"यदि ऐसा मान लें कि देवता ही दुःखके कारण हैं तो भी इस दुःखसे आत्माकी क्या हानि? क्योंकि यदि दुःखके कारण देवता हैं, तो इन्द्रियाभिमानी देवताओंके रूपमें उनके भोक्ता भी तो वे ही हैं। और देवता सभी शरीरोंमें एक हैं; जो देवता एक शरीरमें हैं; वे ही दूसरेमें भी हैं। ऐसी दशामें यदि अपने ही शरीरके किसी एक अंगसे दूसरे अंगको चोट लग जाय तो भला, किसपर क्रोध किया जायगा?॥ ५२॥"},{"id":"11.23.53","number":53,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/53/","page":861,"speaker":"द्विज उवाच","sanskrit":["आत्मा यदि स्यात् सुखदुःखहेतुः","किमन्यतस्तत्र निजस्वभावः।","न ह्यात्मनोऽन्यद् यदि तन्मृषा स्यात्","क्रुध्येत कस्मान्‍न सुखं न दुःखम्॥ ५३"],"iast":["ātmā yadi syāt sukhaduḥkhahetuḥ","kimanyatastatra nijasvabhāvaḥ|","na hyātmano'nyad yadi tanmṛṣā syāt","krudhyeta kasmānna sukhaṃ na duḥkham|| 53"],"meaning":"यदि ऐसा मानें कि आत्मा ही सुख-दुःखका कारण है तो वह तो अपना आप ही है, कोई दूसरा नहीं; क्योंकि आत्मासे भिन्‍न कुछ और है ही नहीं। यदि दूसरा कुछ प्रतीत होता है तो वह मिथ्या है। इसलिये न सुख है, न दुःख; फिर क्रोध कैसा? क्रोधका निमित्त ही क्या?॥ ५३॥"},{"id":"11.23.54","number":54,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/54/","page":861,"speaker":"द्विज उवाच","sanskrit":["ग्रहा निमित्तं सुखदुःखयोश्‍चेत्","किमात्मनोऽजस्य जनस्य ते वै।","ग्रहैर्ग्रहस्यैव वदन्ति पीडां","क्रुध्येत कस्मै पुरुषस्ततोऽन्यः॥ ५४"],"iast":["grahā nimittaṃ sukhaduḥkhayoścet","kimātmano'jasya janasya te vai|","grahairgrahasyaiva vadanti pīḍāṃ","krudhyeta kasmai puruṣastato'nyaḥ|| 54"],"meaning":"यदि ग्रहोंको सुख-दुःखका निमित्त मानें, तो उनसे भी अजन्मा आत्माकी क्या हानि? उनका प्रभाव भी जन्म-मृत्युशील शरीरपर ही होता है। ग्रहोंकी पीड़ा तो उनका प्रभाव ग्रहण करनेवाले शरीरको ही होती है और आत्मा उन ग्रहों और शरीरोंसे सर्वथा परे है। तब भला वह किसपर क्रोध करे?॥ ५४॥"},{"id":"11.23.55","number":55,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/55/","page":862,"speaker":"द्विज उवाच","sanskrit":["कर्मास्तु हेतुः सुखदुःखयोश्‍चेत्","किमात्मनस्तद्धि जडाजडत्वे।","देहस्त्वचित् पुरुषोऽयं सुपर्णः","क्रुध्येत कस्मै न हि कर्ममूलम्॥ ५५"],"iast":["karmāstu hetuḥ sukhaduḥkhayoścet","kimātmanastaddhi jaḍājaḍatve|","dehastvacit puruṣo'yaṃ suparṇaḥ","krudhyeta kasmai na hi karmamūlam|| 55"],"meaning":"यदि कर्मोंको ही सुख-दुःखका कारण मानें, तो उनसे आत्माका क्या प्रयोजन? क्योंकि वे तो एक पदार्थके जड और चेतन—उभयरूप होनेपर ही हो सकते हैं। (जो वस्तु विकारयुक्त और अपना हिताहित जाननेवाली होती है, उसीसे कर्म हो सकते हैं; अतः वह विकारयुक्त होनेके कारण जड होनी चाहिये और हिताहितका ज्ञान रखनेके कारण चेतन।) किन्तु देह तो अचेतन है और उसमें पक्षीरूपसे रहनेवाला आत्मा सर्वथा निर्विकार और साक्षीमात्र है। इस प्रकार कर्मोंका तो कोई आधार ही सिद्ध नहीं होता। फिर क्रोध किसपर करें?॥ ५५॥"},{"id":"11.23.56","number":56,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/56/","page":862,"speaker":"द्विज उवाच","sanskrit":["कालस्तु हेतुः सुखदुःखयोश्‍चेत्","किमात्मनस्तत्र तदात्मकोऽसौ।","ना‌ग्‍नेर्हि तापो न हिमस्य तत् स्यात्","क्रुध्येत कस्मै न परस्य द्वन्द्वम्॥ ५६"],"iast":["kālastu hetuḥ sukhaduḥkhayoścet","kimātmanastatra tadātmako'sau|","nāgnerhi tāpo na himasya tat syāt","krudhyeta kasmai na parasya dvandvam|| 56"],"meaning":"यदि ऐसा मानें कि काल ही सुख-दुःखका कारण है, तो आत्मापर उसका क्या प्रभाव? क्योंकि काल तो आत्मस्वरूप ही है। जैसे आग आगको नहीं जला सकती और बर्फ बर्फको नहीं गला सकता, वैसे ही आत्मस्वरूप काल अपने आत्माको ही सुख-दुःख नहीं पहुँचा सकता। फिर किसपर क्रोध किया जाय? आत्मा शीत-उष्ण, सुख-दुःख आदि द्वन्द्वोंसे सर्वथा अतीत है॥ ५६॥"},{"id":"11.23.57","number":57,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/57/","page":862,"speaker":"द्विज उवाच","sanskrit":["न केनचित् क्वापि कथंचनास्य","द्वन्द्वोपरागः परतः परस्य।","यथाहमः संसृतिरूपिणः स्या-","देवं प्रबुद्धो न बिभेति भूतैः॥ ५७"],"iast":["na kenacit kvāpi kathaṃcanāsya","dvandvoparāgaḥ parataḥ parasya|","yathāhamaḥ saṃsṛtirūpiṇaḥ syā-","devaṃ prabuddho na bibheti bhūtaiḥ|| 57"],"meaning":"आत्मा प्रकृतिके स्वरूप, धर्म, कार्य, लेश, सम्बन्ध और गन्धसे भी रहित है। उसे कभी कहीं किसीके द्वारा किसी भी प्रकारसे द्वन्द्वका स्पर्श ही नहीं होता। वह तो जन्म-मृत्युके चक्रमें भटकनेवाले अहंकारको ही होता है। जो इस बातको जान लेता है, वह फिर किसी भी भयके निमित्तसे भयभीत नहीं होता॥ ५७॥"},{"id":"11.23.58","number":58,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/58/","page":862,"speaker":"द्विज उवाच","sanskrit":["एतां स आस्थाय परात्मनिष्ठा-","मध्यासितां पूर्वतमैर्महर्षिभिः।","अहं तरिष्यामि दुरन्तपारं","तमो मुकुन्दाङ्‌घ्रिनिषेवयैव॥ ५८"],"iast":["etāṃ sa āsthāya parātmaniṣṭhā-","madhyāsitāṃ pūrvatamairmaharṣibhiḥ|","ahaṃ tariṣyāmi durantapāraṃ","tamo mukundāṅghriniṣevayaiva|| 58"],"meaning":"बड़े-बड़े प्राचीन ऋषि-मुनियोंने इस परमात्मनिष्ठाका आश्रय ग्रहण किया है। मैं भी इसीका आश्रय ग्रहण करूँगा और मुक्ति तथा प्रेमके दाता भगवान्‌के चरणकमलोंकी सेवाके द्वारा ही इस दुरन्त अज्ञानसागरको अनायास ही पार कर लूँगा॥ ५८॥"},{"id":"11.23.59","number":59,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/59/","page":862,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["निर्विद्य नष्टद्रविणो गतक्लमः","प्रव्रज्य गां पर्यटमान इत्थम्।","निराकृतोऽसद्भिरपि स्वधर्मा-","दकम्पितोऽमुं मुनिराह गाथाम्॥ ५९"],"iast":["nirvidya naṣṭadraviṇo gataklamaḥ","pravrajya gāṃ paryaṭamāna ittham|","nirākṛto'sadbhirapi svadharmā-","dakampito'muṃ munirāha gāthām|| 59"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—उद्धवजी! उस ब्राह्मणका धन क्या नष्ट हुआ, उसका सारा क्लेश ही दूर हो गया। अब वह संसारसे विरक्त हो गया था और संन्यास लेकर पृथ्वीमें स्वच्छन्द विचर रहा था। यद्यपि दुष्टोंने उसे बहुत सताया, फिर भी वह अपने धर्ममें अटल रहा, तनिक भी विचलित न हुआ। उस समय वह मौनी अवधूत मन-ही-मन इस प्रकारका गीत गाया करता था॥ ५९॥"},{"id":"11.23.60","number":60,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/60/","page":863,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["सुखदुःखप्रदो नान्यः पुरुषस्यात्मविभ्रमः।","मित्रोदासीनरिपवः संसारस्तमसः कृतः॥ ६०"],"iast":["sukhaduḥkhaprado nānyaḥ puruṣasyātmavibhramaḥ|","mitrodāsīnaripavaḥ saṃsārastamasaḥ kṛtaḥ|| 60"],"meaning":"उद्धवजी! इस संसारमें मनुष्यको कोई दूसरा सुख या दुःख नहीं देता, यह तो उसके चित्तका भ्रममात्र है। यह सारा संसार और इसके भीतर मित्र, उदासीन और शत्रुके भेद अज्ञानकल्पित हैं॥ ६०॥"},{"id":"11.23.61","number":61,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/61/","page":863,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["तस्मात् सर्वात्मना तात निगृहाण मनो धिया।","मय्यावेशितया युक्त एतावान् योगसंग्रहः॥ ६१"],"iast":["tasmāt sarvātmanā tāta nigṛhāṇa mano dhiyā|","mayyāveśitayā yukta etāvān yogasaṃgrahaḥ|| 61"],"meaning":"इसलिये प्यारे उद्धव! अपनी वृत्तियोंको मुझमें तन्मय कर दो और इस प्रकार अपनी सारी शक्ति लगाकर मनको वशमें कर लो और फिर मुझमें ही नित्ययुक्त होकर स्थित हो जाओ। बस, सारे योगसाधनका इतना ही सार-संग्रह है॥ ६१॥"},{"id":"11.23.62","number":62,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/23/62/","page":863,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["य एतां भिक्षुणा गीतां ब्रह्मनिष्ठां समाहितः।","धारयञ्छ्रावयञ्छृण्वन् द्वन्द्वैर्नैवाभिभूयते॥ ६२"],"iast":["ya etāṃ bhikṣuṇā gītāṃ brahmaniṣṭhāṃ samāhitaḥ|","dhārayañchrāvayañchṛṇvan dvandvairnaivābhibhūyate|| 62"],"meaning":"यह भिक्षुकका गीत क्या है, मूर्तिमान् ब्रह्मज्ञान-निष्ठा ही है। जो पुरुष एकाग्रचित्तसे इसे सुनता, सुनाता और धारण करता है वह कभी सुख-दुःखादि द्वन्द्वोंके वशमें नहीं होता। उनके बीचमें भी वह सिंहके समान दहाड़ता रहता है॥ ६२॥"}],"text":[{"b":40946,"kind":"adhyaya_heading","page":855,"text":"अथ त्रयोविंशोऽध्यायः"},{"b":40947,"kind":"topic_heading","page":855,"text":"एक तितिक्षु ब्राह्मणका इतिहास"},{"b":40948,"kind":"topic_heading","page":855,"text":"बादरायणिरुवाच"},{"b":40949,"kind":"hindi_commentary","page":855,"verses":["11.23.1"],"text":"स एवमाशंसित उद्धवेन"},{"b":40950,"kind":"sanskrit_shloka","page":855,"verses":["11.23.1"],"text":"भागवतमुख्येन दाशार्हमुख्यः।"},{"b":40951,"kind":"hindi_commentary","page":855,"verses":["11.23.1"],"text":"सभाजयन् भृत्यवचो मुकुन्द-"},{"b":40952,"kind":"hindi_commentary","page":855,"verses":["11.23.1"],"text":"स्तमाबभाषे श्रवणीयवीर्यः॥ १"},{"b":40953,"kind":"hindi_translation","page":855,"explains":["11.23.1"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! वास्तवमें भगवान्‌की लीलाकथा ही श्रवण करनेयोग्य है। वे ही प्रेम और मुक्तिके दाता हैं। जब उनके परमप्रेमी भक्त उद्धवजीने इस प्रकार प्रार्थना की, तब यदुवंशविभूषण श्रीभगवान्‌ने उनके प्रश्‍नकी प्रशंसा करके उनसे इस प्रकार कहा—॥ १॥"},{"b":40954,"kind":"topic_heading","page":855,"text":"श्रीभगवानुवाच"},{"b":40955,"kind":"sanskrit_shloka","page":855,"verses":["11.23.2"],"text":"बार्हस्पत्य स वै नात्र साधुर्वै दुर्जनेरितैः।"},{"b":40956,"kind":"sanskrit_shloka","page":855,"verses":["11.23.2"],"text":"दुरुक्तैर्भिन्‍नमात्मानं यः समाधातुमीश्‍वरः॥ २"},{"b":40957,"kind":"sanskrit_shloka","page":855,"verses":["11.23.3"],"text":"न तथा तप्यते विद्धः पुमान् बाणैः सुमर्मगैः।"},{"b":40958,"kind":"sanskrit_shloka","page":855,"verses":["11.23.3"],"text":"यथा तुदन्ति मर्मस्था ह्यसतां परुषेषवः॥ ३"},{"b":40959,"kind":"sanskrit_shloka","page":855,"verses":["11.23.4"],"text":"कथयन्ति महत्पुण्यमितिहासमिहोद्धव।"},{"b":40960,"kind":"sanskrit_shloka","page":855,"verses":["11.23.4"],"text":"तमहं वर्णयिष्यामि निबोध सुसमाहितः॥ ४"},{"b":40961,"kind":"sanskrit_shloka","page":855,"verses":["11.23.5"],"text":"केनचिद् भिक्षुणा गीतं परिभूतेन दुर्जनैः।"},{"b":40962,"kind":"sanskrit_shloka","page":855,"verses":["11.23.5"],"text":"स्मरता धृतियुक्तेन विपाकं निजकर्मणाम्॥ ५"},{"b":40963,"kind":"hindi_commentary","page":855,"explains":["11.23.2","11.23.3","11.23.4","11.23.5"],"text":"भगवान् श्रीकृष्णने कहा—देवगुरु बृहस्पतिके शिष्य उद्धवजी! इस संसारमें प्रायः ऐसे संत पुरुष नहीं मिलते, जो दुर्जनोंकी कटुवाणीसे बिंधे हुए अपने हृदयको सँभाल सकें॥ २॥ मनुष्यका हृदय मर्मभेदी बाणोंसे बिंधनेपर भी उतनी पीडाका अनुभव नहीं करता, जितनी पीडा उसे दुष्टजनोंके मर्मान्तक एवं कठोर वाग्बाण पहुँचाते हैं॥ ३॥ उद्धवजी! इस विषयमें महात्मालोग एक बड़ा पवित्र प्राचीन इतिहास कहा करते हैं; मैं वही तुम्हें सुनाऊँगा, तुम मन लगाकर उसे सुनो॥ ४॥ एक भिक्षुकको दुष्टोंने बहुत सताया था। उस समय भी उसने अपना धैर्य न छोड़ा और उसे अपने पूर्वजन्मके कर्मोंका फल समझकर कुछ अपने मानसिक उद्गार प्रकट किये थे। उन्हींका इस इतिहासमें वर्णन है॥ ५॥"},{"b":40964,"kind":"sanskrit_shloka","page":855,"verses":["11.23.6"],"text":"अवन्तिषु द्विजः कश्‍चिदासीदाढ्यतमः श्रिया।"},{"b":40965,"kind":"sanskrit_shloka","page":855,"verses":["11.23.6"],"text":"वार्तावृत्तिः कदर्यस्तु कामी लुब्धोऽतिकोपनः॥ ६"},{"b":40966,"kind":"sanskrit_shloka","page":855,"verses":["11.23.7"],"text":"ज्ञातयोऽतिथयस्तस्य वाङ्मात्रेणापि नार्चिताः।"},{"b":40967,"kind":"sanskrit_shloka","page":855,"verses":["11.23.7"],"text":"शून्यावसथ आत्मापि काले कामैरनर्चितः॥ ७"},{"b":40968,"kind":"sanskrit_shloka","page":855,"verses":["11.23.8"],"text":"दुःशीलस्य कदर्यस्य द्रुह्यन्ते पुत्रबान्धवाः।"},{"b":40969,"kind":"sanskrit_shloka","page":855,"verses":["11.23.8"],"text":"दारा दुहितरो भृत्या विषण्णा नाचरन् प्रियम्॥ ८"},{"b":40970,"kind":"sanskrit_shloka","page":856,"verses":["11.23.9"],"text":"तस्यैवं यक्षवित्तस्य च्युतस्योभयलोकतः।"},{"b":40971,"kind":"sanskrit_shloka","page":856,"verses":["11.23.9"],"text":"धर्मकामविहीनस्य चुक्रुधुः पंचभागिनः॥ ९"},{"b":40972,"kind":"sanskrit_shloka","page":856,"verses":["11.23.10"],"text":"तदवध्यानविस्रस्तपुण्यस्कन्धस्य भूरिद।"},{"b":40973,"kind":"sanskrit_shloka","page":856,"verses":["11.23.10"],"text":"अर्थोऽप्यगच्छन्‍निधनं बह्वायासपरिश्रमः॥ १०"},{"b":40974,"kind":"sanskrit_shloka","page":856,"verses":["11.23.11"],"text":"ज्ञातयो जगृहुः किंचित् किंचिद् दस्यव उद्धव।"},{"b":40975,"kind":"sanskrit_shloka","page":856,"verses":["11.23.11"],"text":"दैवतः कालतः किंचिद् ब्रह्मबन्धोर्नृपार्थिवात्॥ ११"},{"b":40976,"kind":"sanskrit_shloka","page":856,"verses":["11.23.12"],"text":"स एवं द्रविणे नष्टे धर्मकामविवर्जितः।"},{"b":40977,"kind":"sanskrit_shloka","page":856,"verses":["11.23.12"],"text":"उपेक्षितश्‍च स्वजनैश्‍चिन्तामाप दुरत्ययाम्॥ १२"},{"b":40978,"kind":"sanskrit_shloka","page":856,"verses":["11.23.13"],"text":"तस्यैवं ध्यायतो दीर्घं नष्टरायस्तपस्विनः।"},{"b":40979,"kind":"sanskrit_shloka","page":856,"verses":["11.23.13"],"text":"खिद्यतो बाष्पकण्ठस्य निर्वेदः सुमहानभूत्॥ १३"},{"b":40980,"kind":"hindi_commentary","page":855,"explains":["11.23.6","11.23.7","11.23.8","11.23.9","11.23.10","11.23.11","11.23.12","11.23.13"],"text":"प्राचीन समयकी बात है, उज्जैनमें एक ब्राह्मण रहता था। उसने खेती-व्यापार आदि करके बहुत-सी धन-सम्पत्ति इकट्ठी कर ली थी। वह बहुत ही कृपण, कामी और लोभी था। क्रोध तो उसे बात-बातमें आ जाया करता था॥ ६॥ उसने अपने जाति-बन्धु और अतिथियोंको कभी मीठी बातसे भी प्रसन्‍न नहीं किया, खिलाने-पिलानेकी तो बात ही क्या है। वह धर्म-कर्मसे रीते घरमें रहता और स्वयं भी अपनी धन-सम्पत्तिके द्वारा समयपर अपने शरीरको भी सुखी नहीं करता था॥ ७॥ उसकी कृपणता और बुरे स्वभावके कारण उसके बेटे-बेटी, भाई-बन्धु, नौकर-चाकर और पत्‍नी आदि सभी दुःखी रहते और मन-ही-मन उसका अनिष्टचिन्तन किया करते थे। कोई भी उसके मनको प्रिय लगनेवाला व्यवहार नहीं करता था॥ ८॥ वह लोक-परलोक दोनोंसे ही गिर गया था। बस, यक्षोंके समान धनकी रखवाली करता रहता था। उस धनसे वह न तो धर्म कमाता था और न भोग ही भोगता था। बहुत दिनोंतक इस प्रकार जीवन बितानेसे उसपर पंचमहायज्ञके भागी देवता बिगड़ उठे॥ ९॥ उदार उद्धवजी! पंचमहायज्ञके भागियोंके तिरस्कारसे उसके पूर्व-पुण्योंका सहारा—जिसके बलसे अबतक धन टिका हुआ था—जाता रहा और जिसे उसने बड़े उद्योग और परिश्रमसे इकट्ठा किया था, वह धन उसकी आँखोंके सामने ही नष्ट-भ्रष्ट हो गया॥ १०॥ उस नीच ब्राह्मणका कुछ धन तो उसके कुटुम्बियोंने ही छीन लिया, कुछ चोर चुरा ले गये। कुछ आग लग जाने आदि दैवी कोपसे नष्ट हो गया, कुछ समयके फेरसे मारा गया। कुछ साधारण मनुष्योंने ले लिया और बचा-खुचा कर और दण्डके रूपमें शासकोंने हड़प लिया॥ ११॥ उद्धवजी! इस प्रकार उसकी सारी सम्पत्ति जाती रही। न तो उसने धर्म ही कमाया और न भोग ही भोगे। इधर उसके सगे-सम्बन्धियोंने भी उसकी ओरसे मुँह मोड़ लिया। अब उसे बड़ी भयानक चिन्ताने घेर लिया॥ १२॥ धनके नाशसे उसके हृदयमें बड़ी जलन हुई। उसका मन खेदसे भर गया। आँसुओंके कारण गला रुँध गया। परन्तु इस तरह चिन्ता करते-करते ही उसके मनमें संसारके प्रति महान् दुःखबुद्धि और उत्कट वैराग्यका उदय हो गया॥ १३॥"},{"b":40981,"kind":"sanskrit_shloka","page":856,"verses":["11.23.14"],"text":"स चाहेदमहो कष्टं वृथाऽऽत्मा मेऽनुतापितः।"},{"b":40982,"kind":"sanskrit_shloka","page":856,"verses":["11.23.14"],"text":"न धर्माय न कामाय यस्यार्थायास ईदृशः॥ १४"},{"b":40983,"kind":"sanskrit_shloka","page":856,"verses":["11.23.15"],"text":"प्रायेणार्थाः कदर्याणां न सुखाय कदाचन।"},{"b":40984,"kind":"sanskrit_shloka","page":856,"verses":["11.23.15"],"text":"इह चात्मोपतापाय मृतस्य नरकाय च॥ १५"},{"b":40985,"kind":"sanskrit_shloka","page":857,"verses":["11.23.16"],"text":"यशो यशस्विनां शुद्धं श्‍लाघ्या ये गुणिनां गुणाः।"},{"b":40986,"kind":"sanskrit_shloka","page":857,"verses":["11.23.16"],"text":"लोभः स्वल्पोऽपि तान् हन्ति श्‍वित्रो रूपमिवेप्सितम्॥ १६"},{"b":40987,"kind":"sanskrit_shloka","page":857,"verses":["11.23.17"],"text":"अर्थस्य साधने सिद्धे उत्कर्षे रक्षणे व्यये।"},{"b":40988,"kind":"sanskrit_shloka","page":857,"verses":["11.23.17"],"text":"नाशोपभोग आयासस्त्रासश्‍चिन्ता भ्रमो नृणाम्॥ १७"},{"b":40989,"kind":"sanskrit_shloka","page":857,"verses":["11.23.18"],"text":"स्तेयं हिंसानृतं दम्भः कामः क्रोधः स्मयो मदः।"},{"b":40990,"kind":"sanskrit_shloka","page":857,"verses":["11.23.18"],"text":"भेदो वैरमविश्‍वासः संस्पर्धा व्यसनानि च॥ १८"},{"b":40991,"kind":"sanskrit_shloka","page":857,"verses":["11.23.19"],"text":"एते पंचदशानर्था ह्यर्थमूला मता नृणाम्।"},{"b":40992,"kind":"sanskrit_shloka","page":857,"verses":["11.23.19"],"text":"तस्मादनर्थमर्थाख्यं श्रेयोऽर्थी दूरतस्त्यजेत्॥ १९"},{"b":40993,"kind":"sanskrit_shloka","page":857,"verses":["11.23.20"],"text":"भिद्यन्ते भ्रातरो दाराः पितरः सुहृदस्तथा।"},{"b":40994,"kind":"sanskrit_shloka","page":857,"verses":["11.23.20"],"text":"एकास्निग्धाः काकिणिना सद्यः सर्वेऽरयः कृताः॥ २०"},{"b":40995,"kind":"sanskrit_shloka","page":857,"verses":["11.23.21"],"text":"अर्थेनाल्पीयसा ह्येते संरब्धा दीप्तमन्यवः।"},{"b":40996,"kind":"sanskrit_shloka","page":857,"verses":["11.23.21"],"text":"त्यजन्त्याशु स्पृधो घ्नन्ति सहसोत्सृज्य सौहृदम्॥ २१"},{"b":40997,"kind":"sanskrit_shloka","page":857,"verses":["11.23.22"],"text":"लब्ध्वा जन्मामरप्रार्थ्यं मानुष्यं तद् द्विजाग्र्‌यताम्।"},{"b":40998,"kind":"sanskrit_shloka","page":857,"verses":["11.23.22"],"text":"तदनादृत्य ये स्वार्थं घ्नन्ति यान्त्यशुभां गतिम्॥ २२"},{"b":40999,"kind":"sanskrit_shloka","page":857,"verses":["11.23.23"],"text":"स्वर्गापवर्गयोर्द्वारं प्राप्य लोकमिमं पुमान्।"},{"b":41000,"kind":"sanskrit_shloka","page":857,"verses":["11.23.23"],"text":"द्रविणे कोऽनुषज्जेत मर्त्योऽनर्थस्य धामनि॥ २३"},{"b":41001,"kind":"sanskrit_shloka","page":857,"verses":["11.23.24"],"text":"देवर्षिपितृभूतानि ज्ञातीन् बन्धूंश्‍च भागिनः।"},{"b":41002,"kind":"sanskrit_shloka","page":857,"verses":["11.23.24"],"text":"असंविभज्य चात्मानं यक्षवित्तः पतत्यधः॥ २४"},{"b":41003,"kind":"sanskrit_shloka","page":858,"verses":["11.23.25"],"text":"व्यर्थयार्थेहया वित्तं प्रमत्तस्य वयो बलम्।"},{"b":41004,"kind":"sanskrit_shloka","page":858,"verses":["11.23.25"],"text":"कुशला येन सिध्यन्ति जरठः किं नु साधये॥ २५"},{"b":41005,"kind":"sanskrit_shloka","page":858,"verses":["11.23.26"],"text":"कस्मात् संक्लिश्यते विद्वान् व्यर्थयार्थेहयासकृत्।"},{"b":41006,"kind":"sanskrit_shloka","page":858,"verses":["11.23.26"],"text":"कस्यचिन्मायया नूनं लोकोऽयं सुविमोहितः॥ २६"},{"b":41007,"kind":"sanskrit_shloka","page":858,"verses":["11.23.27"],"text":"किं धनैर्धनदैर्वा किं कामैर्वा कामदैरुत।"},{"b":41008,"kind":"sanskrit_shloka","page":858,"verses":["11.23.27"],"text":"मृत्युना ग्रस्यमानस्य कर्मभिर्वोत जन्मदैः॥ २७"},{"b":41009,"kind":"hindi_commentary","page":856,"explains":["11.23.14","11.23.15","11.23.16","11.23.17","11.23.18","11.23.19","11.23.20","11.23.21","11.23.22","11.23.23","11.23.24","11.23.25","11.23.26","11.23.27"],"text":"अब वह ब्राह्मण मन-ही-मन कहने लगा—‘हाय! हाय!! बड़े खेदकी बात है, मैंने इतने दिनोंतक अपनेको व्यर्थ ही इस प्रकार सताया। जिस धनके लिये मैंने सरतोड़ परिश्रम किया, वह न तो धर्मकर्ममें लगा और न मेरे सुखभोगके ही काम आया॥ १४॥ प्रायः देखा जाता है कि कृपण पुरुषोंको धनसे कभी सुख नहीं मिलता। इस लोकमें तो वे धन कमाने और रक्षाकी चिन्तासे जलते रहते हैं और मरनेपर धर्म न करनेके कारण नरकमें जाते हैं॥ १५॥ जैसे थोड़ा-सा भी कोढ़ सर्वांगसुन्दर स्वरूपको बिगाड़ देता है, वैसे ही तनिक-सा भी लोभ यशस्वियोंके शुद्ध यश और गुणियोंके प्रशंसनीय गुणोंपर पानी फेर देता है॥ १६॥ धन कमानेमें, कमा लेनेपर उसको बढ़ाने, रखने एवं खर्च करनेमें तथा उसके नाश और उपभोगमें—जहाँ देखो वहीं निरन्तर परिश्रम, भय, चिन्ता और भ्रमका ही सामना करना पड़ता है॥ १७॥ चोरी, हिंसा, झूठ बोलना, दम्भ, काम, क्रोध, गर्व, अहंकार, भेदबुद्धि, वैर, अविश्‍वास, स्पर्द्धा, लम्पटता, जूआ और शराब—ये पन्द्रह अनर्थ मनुष्योंमें धनके कारण ही माने गये हैं। इसलिये कल्याणकामी पुरुषको चाहिये कि स्वार्थ एवं परमार्थके विरोधी अर्थनामधारी अनर्थको दूरसे ही छोड़ दे॥ १८-१९॥ भाई-बन्धु, स्त्री-पुत्र, माता-पिता, सगे-सम्बन्धी—जो स्नेहबन्धनसे बँधकर बिलकुल एक हुए रहते हैं—सब-के-सब कौड़ीके कारण इतने फट जाते हैं कि तुरंत एक-दूसरेके शत्रु बन जाते हैं॥ २०॥ ये लोग थोड़े-से धनके लिये भी क्षुब्ध और क्रुद्ध हो जाते हैं। बात-की-बातमें सौहार्द-सम्बन्ध छोड़ देते हैं, लाग-डाँट रखने लगते हैं और एकाएक प्राण लेने-देनेपर उतारू हो जाते हैं। यहाँतक कि एक-दूसरेका सर्वनाश कर डालते हैं॥ २१॥ देवताओंके भी प्रार्थनीय मनुष्य-जन्मको और उसमें भी श्रेष्ठ ब्राह्मण-शरीर प्राप्त करके जो उसका अनादर करते हैं और अपने सच्चे स्वार्थ-परमार्थका नाश करते हैं, वे अशुभ गतिको प्राप्त होते हैं॥ २२॥ यह मनुष्य-शरीर मोक्ष और स्वर्गका द्वार है, इसको पाकर भी ऐसा कौन बुद्धिमान् मनुष्य है जो अनर्थोंके धाम धनके चक्करमें फँसा रहे॥ २३॥ जो मनुष्य देवता, ऋषि, पितर, प्राणी, जाति-भाई, कुटुम्बी और धनके दूसरे भागीदारोंको उनका भाग देकर सन्तुष्ट नहीं रखता और न स्वयं ही उसका उपभोग करता है, वह यक्षके समान धनकी रखवाली करनेवाला कृपण तो अवश्य ही अधोगतिको प्राप्त होता है॥ २४॥ मैं अपने कर्तव्यसे च्युत हो गया हूँ। मैंने प्रमादमें अपनी आयु, धन और बल-पौरुष खो दिये। विवेकीलोग जिन साधनोंसे मोक्षतक प्राप्त कर लेते हैं, उन्हींको मैंने धन इकट्ठा करनेकी व्यर्थ चेष्टामें खो दिया। अब बुढ़ापेमें मैं कौन-सा साधन करूँगा॥ २५॥ मुझे मालूम नहीं होता कि बड़े-बड़े विद्वान् भी धनकी व्यर्थ तृष्णासे निरन्तर क्यों दुःखी रहते हैं? हो-न-हो, अवश्य ही यह संसार किसीकी मायासे अत्यन्त मोहित हो रहा है॥ २६॥ यह मनुष्य-शरीर कालके विकराल गालमें पड़ा हुआ है। इसको धनसे, धन देनेवाले देवताओं और लोगोंसे, भोगवासनाओं और उनको पूर्ण करनेवालोंसे तथा पुनः-पुनः जन्म-मृत्युके चक्करमें डालनेवाले सकाम कर्मोंसे लाभ ही क्या है?॥ २७॥"},{"b":41010,"kind":"sanskrit_shloka","page":858,"verses":["11.23.28"],"text":"नूनं मे भगवांस्तुष्टः सर्वदेवमयो हरिः।"},{"b":41011,"kind":"sanskrit_shloka","page":858,"verses":["11.23.28"],"text":"येन नीतो दशामेतां निर्वेदश्‍चात्मनः प्लवः॥ २८"},{"b":41012,"kind":"sanskrit_shloka","page":858,"verses":["11.23.29"],"text":"सोऽहं कालावशेषेण शोषयिष्येऽङ्गमात्मनः।"},{"b":41013,"kind":"sanskrit_shloka","page":858,"verses":["11.23.29"],"text":"अप्रमत्तोऽखिलस्वार्थे यदि स्यात् सिद्ध आत्मनि॥ २९"},{"b":41014,"kind":"sanskrit_shloka","page":858,"verses":["11.23.30"],"text":"तत्र मामनुमोदेरन् देवास्त्रिभुवनेश्‍वराः।"},{"b":41015,"kind":"sanskrit_shloka","page":858,"verses":["11.23.30"],"text":"मुहूर्तेन ब्रह्मलोकं खट्वांगः समसाधयत्॥ ३०"},{"b":41016,"kind":"hindi_translation","page":858,"explains":["11.23.28","11.23.29","11.23.30"],"text":"इसमें सन्देह नहीं कि सर्वदेवस्वरूप भगवान् मुझपर प्रसन्‍न हैं। तभी तो उन्होंने मुझे इस दशामें पहुँचाया है और मुझे जगत‍्के प्रति यह दुःख-बुद्धि और वैराग्य दिया है। वस्तुतः वैराग्य ही इस संसार-सागरसे पार होनेके लिये नौकाके समान है॥ २८॥ मैं अब ऐसी अवस्थामें पहुँच गया हूँ। यदि मेरी आयु शेष हो तो मैं आत्मलाभमें ही सन्तुष्ट रहकर अपने परमार्थके सम्बन्धमें सावधान हो जाऊँगा और अब जो समय बच रहा है, उसमें अपने शरीरको तपस्याके द्वारा सुखा डालूँगा॥ २९॥ तीनों लोकोंके स्वामी देवगण मेरे इस संकल्पका अनुमोदन करें। अभी निराश होनेकी कोई बात नहीं है, क्योंकि राजा खट्वांगने तो दो घड़ीमें ही भगवद्धामकी प्राप्ति कर ली थी॥ ३०॥"},{"b":41017,"kind":"topic_heading","page":858,"text":"श्रीभगवानुवाच"},{"b":41018,"kind":"sanskrit_shloka","page":858,"verses":["11.23.31"],"text":"इत्यभिप्रेत्य मनसा ह्यावन्त्यो द्विजसत्तमः।"},{"b":41019,"kind":"sanskrit_shloka","page":858,"verses":["11.23.31"],"text":"उन्मुच्य हृदयग्रन्थीन् शान्तो भिक्षुरभून्मुनिः॥ ३१"},{"b":41020,"kind":"sanskrit_shloka","page":858,"verses":["11.23.32"],"text":"स चचार महीमेतां संयतात्मेन्द्रियानिलः।"},{"b":41021,"kind":"sanskrit_shloka","page":858,"verses":["11.23.32"],"text":"भिक्षार्थं नगरग्रामानसंगोऽलक्षितोऽविशत्॥ ३२"},{"b":41022,"kind":"sanskrit_shloka","page":859,"verses":["11.23.33"],"text":"तं वै प्रवयसं भिक्षुमवधूतमसज्जनाः।"},{"b":41023,"kind":"sanskrit_shloka","page":859,"verses":["11.23.33"],"text":"दृष्ट्वा पर्यभवन् भद्र बह्वीभिः परिभूतिभिः॥ ३३"},{"b":41024,"kind":"sanskrit_shloka","page":859,"verses":["11.23.34"],"text":"केचित्त्रिवेणुं जगृहुरेके पात्रं कमण्डलुम्।"},{"b":41025,"kind":"sanskrit_shloka","page":859,"verses":["11.23.34"],"text":"पीठं चैकेऽक्षसूत्रं च कन्थां चीराणि केचन॥ ३४"},{"b":41026,"kind":"sanskrit_shloka","page":859,"verses":["11.23.35"],"text":"प्रदाय च पुनस्तानि दर्शितान्याददुर्मुनेः।"},{"b":41027,"kind":"sanskrit_shloka","page":859,"verses":["11.23.35"],"text":"अन्‍नं च भैक्ष्यसम्पन्‍नं भुंजानस्य सरित्तटे॥ ३५"},{"b":41028,"kind":"sanskrit_shloka","page":859,"verses":["11.23.36"],"text":"मूत्रयन्ति च पापिष्ठाः ष्ठीवन्त्यस्य च मूर्धनि।"},{"b":41029,"kind":"sanskrit_shloka","page":859,"verses":["11.23.36"],"text":"यतवाचं वाचयन्ति ताडयन्ति न वक्ति चेत्॥ ३६"},{"b":41030,"kind":"sanskrit_shloka","page":859,"verses":["11.23.37"],"text":"तर्जयन्त्यपरे वाग्भिः स्तेनोऽयमिति वादिनः।"},{"b":41031,"kind":"sanskrit_shloka","page":859,"verses":["11.23.37"],"text":"बध्नन्ति रज्ज्वा तं केचिद् बध्यतां बध्यतामिति॥ ३७"},{"b":41032,"kind":"sanskrit_shloka","page":859,"verses":["11.23.38"],"text":"क्षिपन्त्येकेऽवजानन्त एष धर्मध्वजः शठः।"},{"b":41033,"kind":"sanskrit_shloka","page":859,"verses":["11.23.38"],"text":"क्षीणवित्त इमां वृत्तिमग्रहीत् स्वजनोज्झितः॥ ३८"},{"b":41034,"kind":"sanskrit_shloka","page":859,"verses":["11.23.39"],"text":"अहो एष महासारो धृतिमान् गिरिराडिव।"},{"b":41035,"kind":"sanskrit_shloka","page":859,"verses":["11.23.39"],"text":"मौनेन साधयत्यर्थं बकवद् दृढनिश्‍चयः॥ ३९"},{"b":41036,"kind":"sanskrit_shloka","page":859,"verses":["11.23.40"],"text":"इत्येके विहसन्त्येनमेके दुर्वातयन्ति च।"},{"b":41037,"kind":"sanskrit_shloka","page":859,"verses":["11.23.40"],"text":"तं बबन्धुर्निरुरुधुर्यथा क्रीडनकं द्विजम्॥ ४०"},{"b":41038,"kind":"sanskrit_shloka","page":859,"verses":["11.23.41"],"text":"एवं स भौतिकं दुःखं दैविकं दैहिकं च यत्।"},{"b":41039,"kind":"sanskrit_shloka","page":859,"verses":["11.23.41"],"text":"भोक्तव्यमात्मनो दिष्टं प्राप्तं प्राप्तमबुध्यत॥ ४१"},{"b":41040,"kind":"sanskrit_shloka","page":860,"verses":["11.23.42"],"text":"परिभूत इमां गाथामगायत नराधमैः।"},{"b":41041,"kind":"sanskrit_shloka","page":860,"verses":["11.23.42"],"text":"पातयद्भिः स्वधर्मस्थो धृतिमास्थाय सात्त्विकीम्॥ ४२"},{"b":41042,"kind":"hindi_commentary","page":858,"explains":["11.23.31","11.23.32","11.23.33","11.23.34","11.23.35","11.23.36","11.23.37","11.23.38","11.23.39","11.23.40","11.23.41","11.23.42"],"text":"भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—उद्धवजी! उस उज्जैननिवासी ब्राह्मणने मन-ही-मन इस प्रकार निश्‍चय करके ‘मैं’ और ‘मेरे’ पनकी गाँठ खोल दी। इसके बाद वह शान्त होकर मौनी संन्यासी हो गया॥ ३१॥ अब उसके चित्तमें किसी भी स्थान, वस्तु या व्यक्तिके प्रति आसक्ति न रही। उसने अपने मन, इन्द्रिय और प्राणोंको वशमें कर लिया। वह पृथ्वीपर स्वच्छन्दरूपसे विचरने लगा। वह भिक्षाके लिये नगर और गाँवोंमें जाता अवश्य था, परन्तु इस प्रकार जाता था कि कोई उसे पहचान न पाता था॥ ३२॥ उद्धवजी! वह भिक्षुक अवधूत बहुत बूढ़ा हो गया था। दुष्ट उसे देखते ही टूट पड़ते और तरह-तरहसे उसका तिरस्कार करके उसे तंग करते॥ ३३॥ कोई उसका दण्ड छीन लेता, तो कोई भिक्षापात्र ही झटक ले जाता। कोई कमण्डलु उठा ले जाता तो कोई आसन, रुद्राक्षमाला और कन्था ही लेकर भाग जाता। कोई तो उसकी लँगोटी और वस्त्रको ही इधर-उधर डाल देते॥ ३४॥ कोई-कोई वे वस्तुएँ देकर और कोई दिखला-दिखलाकर फिर छीन लेते। जब वह अवधूत मधुकरी माँगकर लाता और बाहर नदी-तटपर भोजन करने बैठता, तो पापी लोग कभी उसके सिरपर मूत देते, तो कभी थूक देते। वे लोग उस मौनी अवधूतको तरह-तरहसे बोलनेके लिये विवश करते और जब वह इसपर भी न बोलता तो उसे पीटते॥ ३५-३६॥ कोई उसे चोर कहकर डाँटने-डपटने लगता। कोई कहता ‘इसे बाँध लो, बाँध लो’ और फिर उसे रस्सीसे बाँधने लगते॥ ३७॥ कोई उसका तिरस्कार करके इस प्रकार ताना कसते कि ‘देखो-देखो, अब इस कृपणने धर्मका ढोंग रचा है। धन-सम्पत्ति जाती रही, स्त्री-पुत्रोंने घरसे निकाल दिया; तब इसने भीख माँगनेका रोजगार लिया है॥ ३८॥ ओहो! देखो तो सही, यह मोटा-तगड़ा भिखारी धैर्यमें बड़े भारी पर्वतके समान है। यह मौन रहकर अपना काम बनाना चाहता है। सचमुच यह बगुलेसे भी बढ़कर ढोंगी और दृढ़निश्‍चयी है’॥ ३९॥ कोई उस अवधूतकी हँसी उड़ाता, तो कोई उसपर अधोवायु छोड़ता। जैसे लोग तोता-मैना आदि पालतू पक्षियोंको बाँध लेते या पिंजड़ेमें बंद कर लेते हैं, वैसे ही उसे भी वे लोग बाँध देते और घरोंमें बंद कर देते॥ ४०॥ किन्तु वह सब कुछ चुपचाप सह लेता। उसे कभी ज्वर आदिके कारण दैहिक पीड़ा सहनी पड़ती, कभी गरमी-सर्दी आदिसे दैवी कष्ट उठाना पड़ता और कभी दुर्जन लोग अपमान आदिके द्वारा उसे भौतिक पीड़ा पहुँचाते; परन्तु भिक्षुकके मनमें इससे कोई विकार न होता। वह समझता कि यह सब मेरे पूर्वजन्मके कर्मोंका फल है और इसे मुझे अवश्य भोगना पड़ेगा॥ ४१॥ यद्यपि नीच मनुष्य तरह-तरहके तिरस्कार करके उसे उसके धर्मसे गिरानेकी चेष्टा किया करते, फिर भी वह बड़ी दृढ़तासे अपने धर्ममें स्थिर रहता और सात्त्विक धैर्यका आश्रय लेकर कभी-कभी ऐसे उद्गार प्रकट किया करता॥ ४२॥"},{"b":41043,"kind":"topic_heading","page":860,"text":"द्विज उवाच"},{"b":41044,"kind":"hindi_commentary","page":860,"verses":["11.23.43"],"text":"नायं जनो मे सुखदुःखहेतु-"},{"b":41045,"kind":"sanskrit_shloka","page":860,"verses":["11.23.43"],"text":"र्न देवताऽऽत्मा ग्रहकर्मकालाः।"},{"b":41046,"kind":"hindi_commentary","page":860,"verses":["11.23.43"],"text":"मनः परं कारणमामनन्ति"},{"b":41047,"kind":"sanskrit_shloka","page":860,"verses":["11.23.43"],"text":"संसारचक्रं परिवर्तयेद् यत्॥ ४३"},{"b":41048,"kind":"hindi_commentary","page":860,"verses":["11.23.44"],"text":"मनो गुणान् वै सृजते बलीय-"},{"b":41049,"kind":"sanskrit_shloka","page":860,"verses":["11.23.44"],"text":"स्ततश्‍च कर्माणि विलक्षणानि।"},{"b":41050,"kind":"hindi_commentary","page":860,"verses":["11.23.44"],"text":"शुक्लानि कृष्णान्यथ लोहितानि"},{"b":41051,"kind":"sanskrit_shloka","page":860,"verses":["11.23.44"],"text":"तेभ्यः सवर्णाः सृतयो भवन्ति॥ ४४"},{"b":41052,"kind":"hindi_commentary","page":860,"verses":["11.23.45"],"text":"अनीह आत्मा मनसा समीहता"},{"b":41053,"kind":"sanskrit_shloka","page":860,"verses":["11.23.45"],"text":"हिरण्मयो मत्सख उद्विचष्टे।"},{"b":41054,"kind":"hindi_commentary","page":860,"verses":["11.23.45"],"text":"मनः स्वलिंगं परिगृह्य कामान्"},{"b":41055,"kind":"sanskrit_shloka","page":860,"verses":["11.23.45"],"text":"जुषन् निबद्धो गुणसंगतोऽसौ॥ ४५"},{"b":41056,"kind":"hindi_commentary","page":860,"explains":["11.23.43","11.23.44","11.23.45"],"text":"ब्राह्मण कहता—मेरे सुख अथवा दुःखका कारण न ये मनुष्य हैं, न देवता हैं, न आत्मा है और न ग्रह, कर्म एवं काल आदि ही हैं। श्रुतियाँ और महात्माजन मनको ही इसका परम कारण बताते हैं और मन ही इस सारे संसार-चक्रको चला रहा है॥ ४३॥ सचमुच यह मन बहुत बलवान् है। इसीने विषयों, उनके कारण गुणों और उनसे सम्बन्ध रखनेवाली वृत्तियोंकी सृष्टि की है। उन वृत्तियोंके अनुसार ही सात्त्विक, राजस और तामस—अनेकों प्रकारके कर्म होते हैं और कर्मोंके अनुसार ही जीवकी विविध गतियाँ होती हैं॥ ४४॥ मन ही समस्त चेष्टाएँ करता है। उसके साथ रहनेपर भी आत्मा निष्क्रिय ही है। वह ज्ञानशक्तिप्रधान है, मुझ जीवका सनातन सखा है और अपने अलुप्त ज्ञानसे सब कुछ देखता रहता है। मनके द्वारा ही उसकी अभिव्यक्ति होती है। जब वह मनको स्वीकार करके उसके द्वारा विषयोंका भोक्ता बन बैठता है, तब कर्मोंके साथ आसक्ति होनेके कारण वह उनसे बँध जाता है॥ ४५॥"},{"b":41057,"kind":"hindi_commentary","page":860,"verses":["11.23.46"],"text":"दानं स्वधर्मो नियमो यमश्‍च"},{"b":41058,"kind":"sanskrit_shloka","page":860,"verses":["11.23.46"],"text":"श्रुतं च कर्माणि च सद्व्रतानि।"},{"b":41059,"kind":"hindi_commentary","page":860,"verses":["11.23.46"],"text":"सर्वे मनोनिग्रहलक्षणान्ताः"},{"b":41060,"kind":"sanskrit_shloka","page":860,"verses":["11.23.46"],"text":"परो हि योगो मनसः समाधिः॥ ४६"},{"b":41061,"kind":"hindi_commentary","page":860,"verses":["11.23.47"],"text":"समाहितं यस्य मनः प्रशान्तं"},{"b":41062,"kind":"sanskrit_shloka","page":860,"verses":["11.23.47"],"text":"दानादिभिः किं वद तस्य कृत्यम्।"},{"b":41063,"kind":"hindi_commentary","page":860,"verses":["11.23.47"],"text":"असंयतं यस्य मनो विनश्यद्"},{"b":41064,"kind":"sanskrit_shloka","page":860,"verses":["11.23.47"],"text":"दानादिभिश्‍चेदपरं किमेभिः॥ ४७"},{"b":41065,"kind":"hindi_commentary","page":860,"verses":["11.23.48"],"text":"मनोवशेऽन्ये ह्यभवन् स्म देवा"},{"b":41066,"kind":"sanskrit_shloka","page":860,"verses":["11.23.48"],"text":"मनश्‍च नान्यस्य वशं समेति।"},{"b":41067,"kind":"hindi_commentary","page":860,"verses":["11.23.48"],"text":"भीष्मो हि देवः सहसः सहीयान्"},{"b":41068,"kind":"sanskrit_shloka","page":860,"verses":["11.23.48"],"text":"युञ्ज्याद् वशे तं स हि देवदेवः॥ ४८"},{"b":41069,"kind":"hindi_commentary","page":861,"verses":["11.23.49"],"text":"तं दुर्जयं शत्रुमसह्यवेग-"},{"b":41070,"kind":"sanskrit_shloka","page":861,"verses":["11.23.49"],"text":"मरुन्तुदं तन्‍न विजित्य केचित्।"},{"b":41071,"kind":"hindi_commentary","page":861,"verses":["11.23.49"],"text":"कुर्वन्त्यसद्विग्रहमत्र मर्त्यै-"},{"b":41072,"kind":"sanskrit_shloka","page":861,"verses":["11.23.49"],"text":"र्मित्राण्युदासीनरिपून् विमूढाः॥ ४९"},{"b":41073,"kind":"hindi_commentary","page":861,"verses":["11.23.50"],"text":"देहं मनोमात्रमिमं गृहीत्वा"},{"b":41074,"kind":"sanskrit_shloka","page":861,"verses":["11.23.50"],"text":"ममाहमित्यन्धधियो मनुष्याः।"},{"b":41075,"kind":"hindi_commentary","page":861,"verses":["11.23.50"],"text":"एषोऽहमन्योऽयमिति भ्रमेण"},{"b":41076,"kind":"sanskrit_shloka","page":861,"verses":["11.23.50"],"text":"दुरन्तपारे तमसि भ्रमन्ति॥ ५०"},{"b":41077,"kind":"hindi_commentary","page":860,"explains":["11.23.46","11.23.47","11.23.48","11.23.49","11.23.50"],"text":"दान, अपने धर्मका पालन, नियम, यम, वेदाध्ययन, सत्कर्म और ब्रह्मचर्यादि श्रेष्ठ व्रत—इन सबका अन्तिम फल यही है कि मन एकाग्र हो जाय, भगवान्‌में लग जाय। मनका समाहित हो जाना ही परम योग है॥ ४६॥ जिसका मन शान्त और समाहित है, उसे दान आदि समस्त सत्कर्मोंका फल प्राप्त हो चुका है। अब उनसे कुछ लेना बाकी नहीं है। और जिसका मन चंचल है अथवा आलस्यसे अभिभूत हो रहा है, उसको इन दानादि शुभकर्मोंसे अबतक कोई लाभ नहीं हुआ॥ ४७॥ सभी इन्द्रियाँ मनके वशमें हैं। मन किसी भी इन्द्रियके वशमें नहीं है। यह मन बलवान्से भी बलवान्, अत्यन्त भयंकर देव है। जो इसको अपने वशमें कर लेता है, वही देव-देव—इन्द्रियोंका विजेता है॥ ४८॥ सचमुच मन बहुत बड़ा शत्रु है। इसका आक्रमण असह्य है। यह बाहरी शरीरको ही नहीं, हृदयादि मर्मस्थानोंको भी बेधता रहता है। इसे जीतना बहुत ही कठिन है। मनुष्योंको चाहिये कि सबसे पहले इसी शत्रुपर विजय प्राप्त करे; परन्तु होता है यह कि मूर्ख लोग इसे तो जीतनेका प्रयत्‍न करते नहीं, दूसरे मनुष्योंसे झूठमूठ झगड़ा-बखेड़ा करते रहते हैं और इस जगत‍्के लोगोंको ही मित्र-शत्रु-उदासीन बना लेते हैं॥ ४९॥ साधारणतः मनुष्योंकी बुद्धि अंधी हो रही है। तभी तो वे इस मनःकल्पित शरीरको ‘मैं’ और ‘मेरा’ मान बैठते हैं और फिर इस भ्रमके फंदेमें फँस जाते हैं कि ‘यह मैं हूँ और यह दूसरा।’ इसका परिणाम यह होता है कि वे इस अनन्त अज्ञानान्धकारमें ही भटकते रहते हैं॥ ५०॥"},{"b":41078,"kind":"hindi_commentary","page":861,"verses":["11.23.51"],"text":"जनस्तु हेतुः सुखदुःखयोश्‍चेत्"},{"b":41079,"kind":"sanskrit_shloka","page":861,"verses":["11.23.51"],"text":"किमात्मनश्‍चात्र ह भौमयोस्तत्।"},{"b":41080,"kind":"hindi_commentary","page":861,"verses":["11.23.51"],"text":"जिह्वां क्‍वचित् संदशति स्वदद्भि-"},{"b":41081,"kind":"sanskrit_shloka","page":861,"verses":["11.23.51"],"text":"स्तद्वेदनायां कतमाय कुप्येत्॥ ५१"},{"b":41082,"kind":"hindi_commentary","page":861,"verses":["11.23.52"],"text":"दुःखस्य हेतुर्यदि देवतास्तु"},{"b":41083,"kind":"sanskrit_shloka","page":861,"verses":["11.23.52"],"text":"किमात्मनस्तत्र विकारयोस्तत्।"},{"b":41084,"kind":"hindi_commentary","page":861,"verses":["11.23.52"],"text":"यदंगमंगेन निहन्यते क्‍वचित्"},{"b":41085,"kind":"sanskrit_shloka","page":861,"verses":["11.23.52"],"text":"क्रुध्येत कस्मै पुरुषः स्वदेहे॥ ५२"},{"b":41086,"kind":"hindi_commentary","page":861,"verses":["11.23.53"],"text":"आत्मा यदि स्यात् सुखदुःखहेतुः"},{"b":41087,"kind":"sanskrit_shloka","page":861,"verses":["11.23.53"],"text":"किमन्यतस्तत्र निजस्वभावः।"},{"b":41088,"kind":"hindi_commentary","page":861,"verses":["11.23.53"],"text":"न ह्यात्मनोऽन्यद् यदि तन्मृषा स्यात्"},{"b":41089,"kind":"sanskrit_shloka","page":861,"verses":["11.23.53"],"text":"क्रुध्येत कस्मान्‍न सुखं न दुःखम्॥ ५३"},{"b":41090,"kind":"hindi_commentary","page":861,"verses":["11.23.54"],"text":"ग्रहा निमित्तं सुखदुःखयोश्‍चेत्"},{"b":41091,"kind":"sanskrit_shloka","page":861,"verses":["11.23.54"],"text":"किमात्मनोऽजस्य जनस्य ते वै।"},{"b":41092,"kind":"hindi_commentary","page":862,"verses":["11.23.54"],"text":"ग्रहैर्ग्रहस्यैव वदन्ति पीडां"},{"b":41093,"kind":"sanskrit_shloka","page":862,"verses":["11.23.54"],"text":"क्रुध्येत कस्मै पुरुषस्ततोऽन्यः॥ ५४"},{"b":41094,"kind":"hindi_commentary","page":862,"verses":["11.23.55"],"text":"कर्मास्तु हेतुः सुखदुःखयोश्‍चेत्"},{"b":41095,"kind":"sanskrit_shloka","page":862,"verses":["11.23.55"],"text":"किमात्मनस्तद्धि जडाजडत्वे।"},{"b":41096,"kind":"hindi_commentary","page":862,"verses":["11.23.55"],"text":"देहस्त्वचित् पुरुषोऽयं सुपर्णः"},{"b":41097,"kind":"sanskrit_shloka","page":862,"verses":["11.23.55"],"text":"क्रुध्येत कस्मै न हि कर्ममूलम्॥ ५५"},{"b":41098,"kind":"hindi_commentary","page":862,"verses":["11.23.56"],"text":"कालस्तु हेतुः सुखदुःखयोश्‍चेत्"},{"b":41099,"kind":"sanskrit_shloka","page":862,"verses":["11.23.56"],"text":"किमात्मनस्तत्र तदात्मकोऽसौ।"},{"b":41100,"kind":"hindi_commentary","page":862,"verses":["11.23.56"],"text":"ना‌ग्‍नेर्हि तापो न हिमस्य तत् स्यात्"},{"b":41101,"kind":"sanskrit_shloka","page":862,"verses":["11.23.56"],"text":"क्रुध्येत कस्मै न परस्य द्वन्द्वम्॥ ५६"},{"b":41102,"kind":"hindi_commentary","page":862,"verses":["11.23.57"],"text":"न केनचित् क्वापि कथंचनास्य"},{"b":41103,"kind":"sanskrit_shloka","page":862,"verses":["11.23.57"],"text":"द्वन्द्वोपरागः परतः परस्य।"},{"b":41104,"kind":"hindi_commentary","page":862,"verses":["11.23.57"],"text":"यथाहमः संसृतिरूपिणः स्या-"},{"b":41105,"kind":"sanskrit_shloka","page":862,"verses":["11.23.57"],"text":"देवं प्रबुद्धो न बिभेति भूतैः॥ ५७"},{"b":41106,"kind":"hindi_commentary","page":862,"verses":["11.23.58"],"text":"एतां स आस्थाय परात्मनिष्ठा-"},{"b":41107,"kind":"sanskrit_shloka","page":862,"verses":["11.23.58"],"text":"मध्यासितां पूर्वतमैर्महर्षिभिः।"},{"b":41108,"kind":"hindi_commentary","page":862,"verses":["11.23.58"],"text":"अहं तरिष्यामि दुरन्तपारं"},{"b":41109,"kind":"sanskrit_shloka","page":862,"verses":["11.23.58"],"text":"तमो मुकुन्दाङ्‌घ्रिनिषेवयैव॥ ५८"},{"b":41110,"kind":"hindi_commentary","page":861,"explains":["11.23.51","11.23.52","11.23.53","11.23.54","11.23.55","11.23.56","11.23.57","11.23.58"],"text":"यदि मान लें कि मनुष्य ही सुख-दुःखका कारण है, तो भी उनसे आत्माका क्या सम्बन्ध? क्योंकि सुख-दुःख पहुँचानेवाला भी मिट्टीका शरीर है और भोगनेवाला भी। कभी भोजन आदिके समय यदि अपने दाँतोंसे ही अपनी जीभ कट जाय और उससे पीड़ा होने लगे, तो मनुष्य किसपर क्रोध करेगा?॥ ५१॥ यदि ऐसा मान लें कि देवता ही दुःखके कारण हैं तो भी इस दुःखसे आत्माकी क्या हानि? क्योंकि यदि दुःखके कारण देवता हैं, तो इन्द्रियाभिमानी देवताओंके रूपमें उनके भोक्ता भी तो वे ही हैं। और देवता सभी शरीरोंमें एक हैं; जो देवता एक शरीरमें हैं; वे ही दूसरेमें भी हैं। ऐसी दशामें यदि अपने ही शरीरके किसी एक अंगसे दूसरे अंगको चोट लग जाय तो भला, किसपर क्रोध किया जायगा?॥ ५२॥ यदि ऐसा मानें कि आत्मा ही सुख-दुःखका कारण है तो वह तो अपना आप ही है, कोई दूसरा नहीं; क्योंकि आत्मासे भिन्‍न कुछ और है ही नहीं। यदि दूसरा कुछ प्रतीत होता है तो वह मिथ्या है। इसलिये न सुख है, न दुःख; फिर क्रोध कैसा? क्रोधका निमित्त ही क्या?॥ ५३॥ यदि ग्रहोंको सुख-दुःखका निमित्त मानें, तो उनसे भी अजन्मा आत्माकी क्या हानि? उनका प्रभाव भी जन्म-मृत्युशील शरीरपर ही होता है। ग्रहोंकी पीड़ा तो उनका प्रभाव ग्रहण करनेवाले शरीरको ही होती है और आत्मा उन ग्रहों और शरीरोंसे सर्वथा परे है। तब भला वह किसपर क्रोध करे?॥ ५४॥ यदि कर्मोंको ही सुख-दुःखका कारण मानें, तो उनसे आत्माका क्या प्रयोजन? क्योंकि वे तो एक पदार्थके जड और चेतन—उभयरूप होनेपर ही हो सकते हैं। (जो वस्तु विकारयुक्त और अपना हिताहित जाननेवाली होती है, उसीसे कर्म हो सकते हैं; अतः वह विकारयुक्त होनेके कारण जड होनी चाहिये और हिताहितका ज्ञान रखनेके कारण चेतन।) किन्तु देह तो अचेतन है और उसमें पक्षीरूपसे रहनेवाला आत्मा सर्वथा निर्विकार और साक्षीमात्र है। इस प्रकार कर्मोंका तो कोई आधार ही सिद्ध नहीं होता। फिर क्रोध किसपर करें?॥ ५५॥ यदि ऐसा मानें कि काल ही सुख-दुःखका कारण है, तो आत्मापर उसका क्या प्रभाव? क्योंकि काल तो आत्मस्वरूप ही है। जैसे आग आगको नहीं जला सकती और बर्फ बर्फको नहीं गला सकता, वैसे ही आत्मस्वरूप काल अपने आत्माको ही सुख-दुःख नहीं पहुँचा सकता। फिर किसपर क्रोध किया जाय? आत्मा शीत-उष्ण, सुख-दुःख आदि द्वन्द्वोंसे सर्वथा अतीत है॥ ५६॥ आत्मा प्रकृतिके स्वरूप, धर्म, कार्य, लेश, सम्बन्ध और गन्धसे भी रहित है। उसे कभी कहीं किसीके द्वारा किसी भी प्रकारसे द्वन्द्वका स्पर्श ही नहीं होता। वह तो जन्म-मृत्युके चक्रमें भटकनेवाले अहंकारको ही होता है। जो इस बातको जान लेता है, वह फिर किसी भी भयके निमित्तसे भयभीत नहीं होता॥ ५७॥ बड़े-बड़े प्राचीन ऋषि-मुनियोंने इस परमात्मनिष्ठाका आश्रय ग्रहण किया है। मैं भी इसीका आश्रय ग्रहण करूँगा और मुक्ति तथा प्रेमके दाता भगवान्‌के चरणकमलोंकी सेवाके द्वारा ही इस दुरन्त अज्ञानसागरको अनायास ही पार कर लूँगा॥ ५८॥"},{"b":41111,"kind":"topic_heading","page":862,"text":"श्रीभगवानुवाच"},{"b":41112,"kind":"hindi_commentary","page":862,"verses":["11.23.59"],"text":"निर्विद्य नष्टद्रविणो गतक्लमः"},{"b":41113,"kind":"sanskrit_shloka","page":862,"verses":["11.23.59"],"text":"प्रव्रज्य गां पर्यटमान इत्थम्।"},{"b":41114,"kind":"hindi_commentary","page":863,"verses":["11.23.59"],"text":"निराकृतोऽसद्भिरपि स्वधर्मा-"},{"b":41115,"kind":"sanskrit_shloka","page":863,"verses":["11.23.59"],"text":"दकम्पितोऽमुं मुनिराह गाथाम्॥ ५९"},{"b":41116,"kind":"sanskrit_shloka","page":863,"verses":["11.23.60"],"text":"सुखदुःखप्रदो नान्यः पुरुषस्यात्मविभ्रमः।"},{"b":41117,"kind":"sanskrit_shloka","page":863,"verses":["11.23.60"],"text":"मित्रोदासीनरिपवः संसारस्तमसः कृतः॥ ६०"},{"b":41118,"kind":"sanskrit_shloka","page":863,"verses":["11.23.61"],"text":"तस्मात् सर्वात्मना तात निगृहाण मनो धिया।"},{"b":41119,"kind":"sanskrit_shloka","page":863,"verses":["11.23.61"],"text":"मय्यावेशितया युक्त एतावान् योगसंग्रहः॥ ६१"},{"b":41120,"kind":"sanskrit_shloka","page":863,"verses":["11.23.62"],"text":"य एतां भिक्षुणा गीतां ब्रह्मनिष्ठां समाहितः।"},{"b":41121,"kind":"sanskrit_shloka","page":863,"verses":["11.23.62"],"text":"धारयञ्छ्रावयञ्छृण्वन् द्वन्द्वैर्नैवाभिभूयते॥ ६२"},{"b":41122,"kind":"hindi_commentary","page":862,"explains":["11.23.59","11.23.60","11.23.61","11.23.62"],"text":"भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—उद्धवजी! उस ब्राह्मणका धन क्या नष्ट हुआ, उसका सारा क्लेश ही दूर हो गया। अब वह संसारसे विरक्त हो गया था और संन्यास लेकर पृथ्वीमें स्वच्छन्द विचर रहा था। यद्यपि दुष्टोंने उसे बहुत सताया, फिर भी वह अपने धर्ममें अटल रहा, तनिक भी विचलित न हुआ। उस समय वह मौनी अवधूत मन-ही-मन इस प्रकारका गीत गाया करता था॥ ५९॥ उद्धवजी! इस संसारमें मनुष्यको कोई दूसरा सुख या दुःख नहीं देता, यह तो उसके चित्तका भ्रममात्र है। यह सारा संसार और इसके भीतर मित्र, उदासीन और शत्रुके भेद अज्ञानकल्पित हैं॥ ६०॥ इसलिये प्यारे उद्धव! अपनी वृत्तियोंको मुझमें तन्मय कर दो और इस प्रकार अपनी सारी शक्ति लगाकर मनको वशमें कर लो और फिर मुझमें ही नित्ययुक्त होकर स्थित हो जाओ। बस, सारे योगसाधनका इतना ही सार-संग्रह है॥ ६१॥ यह भिक्षुकका गीत क्या है, मूर्तिमान् ब्रह्मज्ञान-निष्ठा ही है। जो पुरुष एकाग्रचित्तसे इसे सुनता, सुनाता और धारण करता है वह कभी सुख-दुःखादि द्वन्द्वोंके वशमें नहीं होता। उनके बीचमें भी वह सिंहके समान दहाड़ता रहता है॥ ६२॥"},{"b":41123,"kind":"hindi_commentary","page":863,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे त्रयोविंशोऽध्यायः"},{"b":41124,"kind":"hindi_translation","page":863,"text":"॥ २३॥"}],"notes":[],"corrections":{"count":1,"list":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/shuddhi/"}}