{"id":"11.25","title":"एकादश स्कन्ध · अध्याय 25","part":"एकादश स्कन्ध","heading":"अथ पञ्चविंशोऽध्यायः","topics":["तीनों गुणोंकी वृत्तियोंका निरूपण"],"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/25/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 11.25.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/25/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[866,871]},"verses":[{"id":"11.25.1","number":1,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/25/1/","page":866,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["गुणानामसमिश्राणां पुमान् येन यथा भवेत्।","तन्मे पुरुषवर्येदमुपधारय शंसतः॥ १"],"iast":["guṇānāmasamiśrāṇāṃ pumān yena yathā bhavet|","tanme puruṣavaryedamupadhāraya śaṃsataḥ|| 1"],"meaning":"भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—पुरुषप्रवर उद्धवजी! प्रत्येक व्यक्तिमें अलग-अलग गुणोंका प्रकाश होता है। उनके कारण प्राणियोंके स्वभावमें भी भेद हो जाता है। अब मैं बतलाता हूँ कि किस गुणसे कैसा-कैसा स्वभाव बनता है। तुम सावधानीसे सुनो॥ १॥"},{"id":"11.25.2","number":2,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/25/2/","page":867,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["शमो दमस्तितिक्षेक्षा तपः सत्यं दया स्मृतिः।","तुष्टिस्त्यागोऽस्पृहा श्रद्धा ह्रीर्दयादिः स्वनिर्वृतिः॥ २"],"iast":["śamo damastitikṣekṣā tapaḥ satyaṃ dayā smṛtiḥ|","tuṣṭistyāgo'spṛhā śraddhā hrīrdayādiḥ svanirvṛtiḥ|| 2"],"meaning":"सत्त्वगुणकी वृत्तियाँ हैं—शम (मनःसंयम), दम (इन्द्रियनिग्रह), तितिक्षा (सहिष्णुता), विवेक, तप, सत्य, दया, स्मृति, सन्तोष, त्याग, विषयोंके प्रति अनिच्छा, श्रद्धा, लज्जा (पाप करनेमें स्वाभाविक संकोच), आत्मरति, दान, विनय और सरलता आदि॥ २॥"},{"id":"11.25.3","number":3,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/25/3/","page":867,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["काम ईहा मदस्तृष्णा स्तम्भ आशीर्भिदा सुखम्।","मदोत्साहो यशःप्रीतिर्हास्यं वीर्यं बलोद्यमः॥ ३"],"iast":["kāma īhā madastṛṣṇā stambha āśīrbhidā sukham|","madotsāho yaśaḥprītirhāsyaṃ vīryaṃ balodyamaḥ|| 3"],"meaning":"रजोगुणकी वृत्तियाँ हैं—इच्छा, प्रयत्‍न, घमंड, तृष्णा (असन्तोष), ऐंठ या अकड़, देवताओंसे धन आदिकी याचना, भेदबुद्धि, विषयभोग, युद्धादिके लिये मदजनित उत्साह, अपने यशमें प्रेम, हास्य, पराक्रम और हठपूर्वक उद्योग करना आदि॥ ३॥"},{"id":"11.25.4","number":4,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/25/4/","page":867,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["क्रोधो लोभोऽनृतं हिंसा याच्ञा दम्भः क्लमः कलिः।","शोकमोहौ विषादार्ती निद्राऽऽशा भीरनुद्यमः॥ ४"],"iast":["krodho lobho'nṛtaṃ hiṃsā yācñā dambhaḥ klamaḥ kaliḥ|","śokamohau viṣādārtī nidrā''śā bhīranudyamaḥ|| 4"],"meaning":"तमोगुणकी वृत्तियाँ हैं—क्रोध (असहिष्णुता), लोभ, मिथ्याभाषण, हिंसा, याचना, पाखण्ड, श्रम, कलह, शोक, मोह, विषाद, दीनता, निद्रा, आशा, भय और अकर्मण्यता आदि॥ ४॥"},{"id":"11.25.5","number":5,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/25/5/","page":867,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["सत्त्वस्य रजसश्‍चैतास्तमसश्‍चानुपूर्वशः।","वृत्तयो वर्णितप्रायाः सन्‍निपातमथो शृणु॥ ५"],"iast":["sattvasya rajasaścaitāstamasaścānupūrvaśaḥ|","vṛttayo varṇitaprāyāḥ sannipātamatho śṛṇu|| 5"],"meaning":"इस प्रकार क्रमसे सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुणकी अधिकांश वृत्तियोंका पृथक्-पृथक् वर्णन किया गया। अब उनके मेलसे होनेवाली वृत्तियोंका वर्णन सुनो॥ ५॥"},{"id":"11.25.6","number":6,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/25/6/","page":867,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["सन्‍निपातस्त्वहमिति ममेत्युद्धव या मतिः।","व्यवहारः सन्‍निपातो मनोमात्रेन्द्रियासुभिः॥ ६"],"iast":["sannipātastvahamiti mametyuddhava yā matiḥ|","vyavahāraḥ sannipāto manomātrendriyāsubhiḥ|| 6"],"meaning":"उद्धवजी! ‘मैं हूँ और यह मेरा है’ इस प्रकारकी बुद्धिमें तीनों गुणोंका मिश्रण है। जिन मन, शब्दादि विषय, इन्द्रिय और प्राणोंके कारण पूर्वोक्त वृत्तियोंका उदय होता है, वे सब-के-सब सात्त्विक, राजस और तामस हैं॥ ६॥"},{"id":"11.25.7","number":7,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/25/7/","page":867,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["धर्मे चार्थे च कामे च यदासौ परिनिष्ठितः।","गुणानां सन्‍निकर्षोऽयं श्रद्धारतिधनावहः॥ ७"],"iast":["dharme cārthe ca kāme ca yadāsau pariniṣṭhitaḥ|","guṇānāṃ sannikarṣo'yaṃ śraddhāratidhanāvahaḥ|| 7"],"meaning":"जब मनुष्य धर्म, अर्थ और काममें संल‌ग्‍न रहता है, तब उसे सत्त्वगुणसे श्रद्धा, रजोगुणसे रति और तमोगुणसे धनकी प्राप्ति होती है। यह भी गुणोंका मिश्रण ही है॥ ७॥"},{"id":"11.25.8","number":8,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/25/8/","page":867,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["प्रवृत्तिलक्षणे निष्ठा पुमान् यर्हि गृहाश्रमे।","स्वधर्मे चानुतिष्ठेत गुणानां समितिर्हि सा॥ ८"],"iast":["pravṛttilakṣaṇe niṣṭhā pumān yarhi gṛhāśrame|","svadharme cānutiṣṭheta guṇānāṃ samitirhi sā|| 8"],"meaning":"जिस समय मनुष्य सकाम कर्म, गृहस्थाश्रम और स्वधर्माचरणमें अधिक प्रीति रखता है, उस समय भी उसमें तीनों गुणोंका मेल ही समझना चाहिये॥ ८॥"},{"id":"11.25.9","number":9,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/25/9/","page":867,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["पुरुषं सत्त्वसंयुक्तमनुमीयाच्छमादिभिः।","कामादिभी रजोयुक्तं क्रोधाद्यैस्तमसा युतम्॥ ९"],"iast":["puruṣaṃ sattvasaṃyuktamanumīyācchamādibhiḥ|","kāmādibhī rajoyuktaṃ krodhādyaistamasā yutam|| 9"],"meaning":"मानसिक शान्ति और जितेन्द्रियता आदि गुणोंसे सत्त्वगुणी पुरुषकी, कामना आदिसे रजोगुणी पुरुषकी और क्रोध-हिंसा आदिसे तमोगुणी पुरुषकी पहचान करे॥ ९॥"},{"id":"11.25.10","number":10,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/25/10/","page":867,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["यदा भजति मां भक्त्या निरपेक्षः स्वकर्मभिः।","तं सत्त्वप्रकृतिं विद्यात् पुरुषं स्त्रियमेव वा॥ १०"],"iast":["yadā bhajati māṃ bhaktyā nirapekṣaḥ svakarmabhiḥ|","taṃ sattvaprakṛtiṃ vidyāt puruṣaṃ striyameva vā|| 10"],"meaning":"पुरुष हो, चाहे स्त्री—जब वह निष्काम होकर अपने नित्य-नैमित्तिक कर्मोंद्वारा मेरी आराधना करे, तब उसे सत्त्वगुणी जानना चाहिये॥ १०॥"},{"id":"11.25.11","number":11,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/25/11/","page":868,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["यदा आशिष आशास्य मां भजेत स्वकर्मभिः।","तं रजःप्रकृतिं विद्याद्धिंसामाशास्य तामसम्॥ ११"],"iast":["yadā āśiṣa āśāsya māṃ bhajeta svakarmabhiḥ|","taṃ rajaḥprakṛtiṃ vidyāddhiṃsāmāśāsya tāmasam|| 11"],"meaning":"सकामभावसे अपने कर्मोंके द्वारा मेरा भजन-पूजन करनेवाला रजोगुणी है और जो अपने शत्रुकी मृत्यु आदिके लिये मेरा भजन-पूजन करे, उसे तमोगुणी समझना चाहिये॥ ११॥"},{"id":"11.25.12","number":12,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/25/12/","page":868,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["सत्त्वं रजस्तम इति गुणा जीवस्य नैव मे।","चित्तजा यैस्तु भूतानां सज्जमानो निबध्यते॥ १२"],"iast":["sattvaṃ rajastama iti guṇā jīvasya naiva me|","cittajā yaistu bhūtānāṃ sajjamāno nibadhyate|| 12"],"meaning":"सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंका कारण जीवका चित्त है। उनसे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है। इन्हीं गुणोंके द्वारा जीव शरीर अथवा धन आदिमें आसक्त होकर बन्धनमें पड़ जाता है॥ १२॥"},{"id":"11.25.13","number":13,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/25/13/","page":868,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["यदेतरौ जयेत् सत्त्वं भास्वरं विशदं शिवम्।","तदा सुखेन युज्येत धर्मज्ञानादिभिः पुमान्॥ १३"],"iast":["yadetarau jayet sattvaṃ bhāsvaraṃ viśadaṃ śivam|","tadā sukhena yujyeta dharmajñānādibhiḥ pumān|| 13"],"meaning":"सत्त्वगुण प्रकाशक, निर्मल और शान्त है। जिस समय वह रजोगुण और तमोगुणको दबाकर बढ़ता है, उस समय पुरुष सुख, धर्म और ज्ञान आदिका भाजन हो जाता है॥ १३॥"},{"id":"11.25.14","number":14,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/25/14/","page":868,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["यदा जयेत्तमः सत्त्वं रजः संगं भिदा चलम्।","तदा दुःखेन युज्येत कर्मणा यशसा श्रिया॥ १४"],"iast":["yadā jayettamaḥ sattvaṃ rajaḥ saṃgaṃ bhidā calam|","tadā duḥkhena yujyeta karmaṇā yaśasā śriyā|| 14"],"meaning":"रजोगुण भेदबुद्धिका कारण है। उसका स्वभाव है आसक्ति और प्रवृत्ति। जिस समय तमोगुण और सत्त्वगुणको दबाकर रजोगुण बढ़ता है, उस समय मनुष्य दुःख, कर्म, यश और लक्ष्मीसे सम्पन्‍न होता है॥ १४॥"},{"id":"11.25.15","number":15,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/25/15/","page":868,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["यदा जयेद् रजः सत्त्वं तमो मूढं लयं जडम्।","युज्येत शोकमोहाभ्यां निद्रया हिंसयाऽऽशया॥ १५"],"iast":["yadā jayed rajaḥ sattvaṃ tamo mūḍhaṃ layaṃ jaḍam|","yujyeta śokamohābhyāṃ nidrayā hiṃsayā''śayā|| 15"],"meaning":"तमोगुणका स्वरूप है अज्ञान। उसका स्वभाव है आलस्य और बुद्धिकी मूढ़ता। जब वह बढ़कर सत्त्वगुण और रजोगुणको दबा लेता है, तब प्राणी तरह-तरहकी आशाएँ करता है, शोक-मोहमें पड़ जाता है, हिंसा करने लगता है अथवा निद्रा-आलस्यके वशीभूत होकर पड़ रहता है॥ १५॥"},{"id":"11.25.16","number":16,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/25/16/","page":868,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["यदा चित्तं प्रसीदेत इन्द्रियाणां च निर्वृतिः।","देहेऽभयं मनोऽसंगं तत् सत्त्वं विद्धि मत्पदम्॥ १६"],"iast":["yadā cittaṃ prasīdeta indriyāṇāṃ ca nirvṛtiḥ|","dehe'bhayaṃ mano'saṃgaṃ tat sattvaṃ viddhi matpadam|| 16"],"meaning":"जब चित्त प्रसन्‍न हो, इन्द्रियाँ शान्त हों, देह निर्भय हो और मनमें आसक्ति न हो, तब सत्त्वगुणकी वृद्धि समझनी चाहिये। सत्त्वगुण मेरी प्राप्तिका साधन है॥ १६॥"},{"id":"11.25.17","number":17,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/25/17/","page":868,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["विकुर्वन् क्रियया चाधीरनिर्वृत्तिश्‍च चेतसाम्।","गात्रास्वास्थ्यं मनो भ्रान्तं रज एतैर्निशामय॥ १७"],"iast":["vikurvan kriyayā cādhīranirvṛttiśca cetasām|","gātrāsvāsthyaṃ mano bhrāntaṃ raja etairniśāmaya|| 17"],"meaning":"जब काम करते-करते जीवकी बुद्धि चंचल, ज्ञानेन्द्रियाँ असन्तुष्ट, कर्मेन्द्रियाँ विकारयुक्त, मन भ्रान्त और शरीर अस्वस्थ हो जाय, तब समझना चाहिये कि रजोगुण जोर पकड़ रहा है॥ १७॥"},{"id":"11.25.18","number":18,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/25/18/","page":868,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["सीदच्चित्तं विलीयेत चेतसो ग्रहणेऽक्षमम्।","मनो नष्टं तमो ग्लानिस्तमस्तदुपधारय॥ १८"],"iast":["sīdaccittaṃ vilīyeta cetaso grahaṇe'kṣamam|","mano naṣṭaṃ tamo glānistamastadupadhāraya|| 18"],"meaning":"जब चित्त ज्ञानेन्द्रियोंके द्वारा शब्दादि विषयोंको ठीक-ठीक समझनेमें असमर्थ हो जाय और खिन्‍न होकर लीन होने लगे, मन सूना-सा हो जाय तथा अज्ञान और विषादकी वृद्धि हो, तब समझना चाहिये कि तमोगुण वृद्धिपर है॥ १८॥"},{"id":"11.25.19","number":19,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/25/19/","page":868,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["एधमाने गुणे सत्त्वे देवानां बलमेधते।","असुराणां च रजसि तमस्युद्धव रक्षसाम्॥ १९"],"iast":["edhamāne guṇe sattve devānāṃ balamedhate|","asurāṇāṃ ca rajasi tamasyuddhava rakṣasām|| 19"],"meaning":"उद्धवजी! सत्त्वगुणके बढ़नेपर देवताओंका, रजोगुणके बढ़नेपर असुरोंका और तमोगुणके बढ़नेपर राक्षसोंका बल बढ़ जाता है। (वृत्तियोंमें भी क्रमशः सत्त्वादि गुणोंकी अधिकता होनेपर देवत्व, असुरत्व और राक्षसत्व-प्रधान निवृत्ति, प्रवृत्ति अथवा मोहकी प्रधानता हो जाती है)॥ १९॥"},{"id":"11.25.20","number":20,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/25/20/","page":869,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["सत्त्वाज्जागरणं विद्याद् रजसा स्वप्नमादिशेत्।","प्रस्वापं तमसा जन्तोस्तुरीयं त्रिषु सन्ततम्॥ २०"],"iast":["sattvājjāgaraṇaṃ vidyād rajasā svapnamādiśet|","prasvāpaṃ tamasā jantosturīyaṃ triṣu santatam|| 20"],"meaning":"सत्त्वगुणसे जाग्रत्-अवस्था, रजोगुणसे स्वप्नावस्था और तमोगुणसे सुषुप्ति-अवस्था होती है। तुरीय इन तीनोंमें एक-सा व्याप्त रहता है। वही शुद्ध और एकरस आत्मा है॥ २०॥"},{"id":"11.25.21","number":21,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/25/21/","page":869,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["उपर्युपरि गच्छन्ति सत्त्वेन ब्राह्मणा जनाः।","तमसाधोऽध आमुख्याद् रजसान्तरचारिणः॥ २१"],"iast":["uparyupari gacchanti sattvena brāhmaṇā janāḥ|","tamasādho'dha āmukhyād rajasāntaracāriṇaḥ|| 21"],"meaning":"वेदोंके अभ्यासमें तत्पर ब्राह्मण सत्त्वगुणके द्वारा उत्तरोत्तर ऊपरके लोकोंमें जाते हैं। तमोगुणसे जीवोंको वृक्षादिपर्यन्त अधोगति प्राप्त होती है और रजोगुणसे मनुष्य-शरीर मिलता है॥ २१॥"},{"id":"11.25.22","number":22,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/25/22/","page":869,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["सत्त्वे प्रलीनाः स्वर्यान्ति नरलोकं रजोलयाः।","तमोलयास्तु निरयं यान्ति मामेव निर्गुणाः॥ २२"],"iast":["sattve pralīnāḥ svaryānti naralokaṃ rajolayāḥ|","tamolayāstu nirayaṃ yānti māmeva nirguṇāḥ|| 22"],"meaning":"जिसकी मृत्यु सत्त्वगुणोंकी वृद्धिके समय होती है, उसे स्वर्गकी प्राप्ति होती है; जिसकी रजोगुणकी वृद्धिके समय होती है, उसे मनुष्य-लोक मिलता है और जो तमोगुणकी वृद्धिके समय मरता है, उसे नरककी प्राप्ति होती है। परन्तु जो पुरुष त्रिगुणातीत—जीवन्मुक्त हो गये हैं, उन्हें मेरी ही प्राप्ति होती है॥ २२॥"},{"id":"11.25.23","number":23,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/25/23/","page":869,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["मदर्पणं निष्फलं वा सात्त्विकं निजकर्म तत्।","राजसं फलसंकल्पं हिंसाप्रायादि तामसम्॥ २३"],"iast":["madarpaṇaṃ niṣphalaṃ vā sāttvikaṃ nijakarma tat|","rājasaṃ phalasaṃkalpaṃ hiṃsāprāyādi tāmasam|| 23"],"meaning":"जब अपने धर्मका आचरण मुझे समर्पित करके अथवा निष्कामभावसे किया जाता है तब वह सात्त्विक होता है। जिस कर्मके अनुष्ठानमें किसी फलकी कामना रहती है, वह राजसिक होता है और जिस कर्ममें किसीको सताने अथवा दिखाने आदिका भाव रहता है, वह तामसिक होता है॥ २३॥"},{"id":"11.25.24","number":24,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/25/24/","page":869,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["कैवल्यं सात्त्विकं ज्ञानं रजो वैकल्पिकं च यत्।","प्राकृतं तामसं ज्ञानं मन्‍निष्ठं निर्गुणं स्मृतम्॥ २४"],"iast":["kaivalyaṃ sāttvikaṃ jñānaṃ rajo vaikalpikaṃ ca yat|","prākṛtaṃ tāmasaṃ jñānaṃ manniṣṭhaṃ nirguṇaṃ smṛtam|| 24"],"meaning":"शुद्ध आत्माका ज्ञान सात्त्विक है। उसको कर्ता-भोक्ता समझना राजस ज्ञान है और उसे शरीर समझना तो सर्वथा तामसिक है। इन तीनोंसे विलक्षण मेरे स्वरूपका वास्तविक ज्ञान निर्गुण ज्ञान है॥ २४॥"},{"id":"11.25.25","number":25,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/25/25/","page":869,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["वनं तु सात्त्विको वासो ग्रामो राजस उच्यते।","तामसं द्यूतसदनं मन्‍निकेतं तु निर्गुणम्॥ २५"],"iast":["vanaṃ tu sāttviko vāso grāmo rājasa ucyate|","tāmasaṃ dyūtasadanaṃ manniketaṃ tu nirguṇam|| 25"],"meaning":"वनमें रहना सात्त्विक निवास है, गाँवमें रहना राजस है और जूआघरमें रहना तामसिक है। इन सबसे बढ़कर मेरे मन्दिरमें रहना निर्गुण निवास है॥ २५॥"},{"id":"11.25.26","number":26,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/25/26/","page":869,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["सात्त्विकः कारकोऽसंगी रागान्धो राजसः स्मृतः।","तामसः स्मृतिविभ्रष्टो निर्गुणो मदपाश्रयः॥ २६"],"iast":["sāttvikaḥ kārako'saṃgī rāgāndho rājasaḥ smṛtaḥ|","tāmasaḥ smṛtivibhraṣṭo nirguṇo madapāśrayaḥ|| 26"],"meaning":"अनासक्तभावसे कर्म करनेवाला सात्त्विक है, रागान्ध होकर कर्म करनेवाला राजसिक है और पूर्वापर विचारसे रहित होकर करनेवाला तामसिक है। इनके अतिरिक्त जो पुरुष केवल मेरी शरणमें रहकर बिना अहंकारके कर्म करता है, वह निर्गुण कर्ता है॥ २६॥"},{"id":"11.25.27","number":27,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/25/27/","page":869,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["सात्त्विक्याध्यात्मिकी श्रद्धा कर्मश्रद्धा तु राजसी।","तामस्यधर्मे या श्रद्धा मत्सेवायां तु निर्गुणा॥ २७"],"iast":["sāttvikyādhyātmikī śraddhā karmaśraddhā tu rājasī|","tāmasyadharme yā śraddhā matsevāyāṃ tu nirguṇā|| 27"],"meaning":"आत्मज्ञानविषयक श्रद्धा सात्त्विक श्रद्धा है, कर्मविषयक श्रद्धा राजस है और जो श्रद्धा अधर्ममें होती है, वह तामस है तथा मेरी सेवामें जो श्रद्धा है, वह निर्गुण श्रद्धा है॥ २७॥"},{"id":"11.25.28","number":28,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/25/28/","page":870,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["पथ्यं पूतमनायस्तमाहार्यं सात्त्विकं स्मृतम्।","राजसं चेन्द्रियप्रेष्ठं तामसं चार्तिदाशुचि॥ २८"],"iast":["pathyaṃ pūtamanāyastamāhāryaṃ sāttvikaṃ smṛtam|","rājasaṃ cendriyapreṣṭhaṃ tāmasaṃ cārtidāśuci|| 28"],"meaning":"आरोग्यदायक, पवित्र और अनायास प्राप्त भोजन सात्त्विक है। रसनेन्द्रियको रुचिकर और स्वादकी दृष्टिसे युक्त आहार राजस है तथा दुःखदायी और अपवित्र आहार तामस है॥ २८॥"},{"id":"11.25.29","number":29,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/25/29/","page":870,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["सात्त्विकं सुखमात्मोत्थं विषयोत्थं तु राजसम्।","तामसं मोहदैन्योत्थं निर्गुणं मदपाश्रयम्॥ २९"],"iast":["sāttvikaṃ sukhamātmotthaṃ viṣayotthaṃ tu rājasam|","tāmasaṃ mohadainyotthaṃ nirguṇaṃ madapāśrayam|| 29"],"meaning":"अन्तर्मुखतासे—आत्मचिन्तनसे प्राप्त होनेवाला सुख सात्त्विक है। बहिर्मुखतासे—विषयोंसे प्राप्त होनेवाला राजस है तथा अज्ञान और दीनतासे प्राप्त होनेवाला सुख तामस है और जो सुख मुझसे मिलता है, वह तो गुणातीत और अप्राकृत है॥ २९॥"},{"id":"11.25.30","number":30,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/25/30/","page":870,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["द्रव्यं देशः फलं कालो ज्ञानं कर्म च कारकः।","श्रद्धावस्थाऽऽकृतिर्निष्ठा त्रैगुण्यः सर्व एव हि॥ ३०"],"iast":["dravyaṃ deśaḥ phalaṃ kālo jñānaṃ karma ca kārakaḥ|","śraddhāvasthā''kṛtirniṣṭhā traiguṇyaḥ sarva eva hi|| 30"],"meaning":"उद्धवजी! द्रव्य (वस्तु), देश (स्थान), फल, काल, ज्ञान, कर्म, कर्ता, श्रद्धा, अवस्था, देव-मनुष्य-तिर्यगादि शरीर और निष्ठा—सभी त्रिगुणात्मक हैं॥ ३०॥"},{"id":"11.25.31","number":31,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/25/31/","page":870,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["सर्वे गुणमया भावाः पुरुषाव्यक्तधिष्ठिताः।","दृष्टं श्रुतमनुध्यातं बुद्ध्या वा पुरुषर्षभ॥ ३१"],"iast":["sarve guṇamayā bhāvāḥ puruṣāvyaktadhiṣṭhitāḥ|","dṛṣṭaṃ śrutamanudhyātaṃ buddhyā vā puruṣarṣabha|| 31"],"meaning":"नररत्‍न! पुरुष और प्रकृतिके आश्रित जितने भी भाव हैं, सभी गुणमय हैं—वे चाहे नेत्रादि इन्द्रियोंसे अनुभव किये हुए हों, शास्त्रोंके द्वारा लोक-लोकान्तरोंके सम्बन्धमें सुने गये हों अथवा बुद्धिके द्वारा सोचे-विचारे गये हों॥ ३१॥"},{"id":"11.25.32","number":32,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/25/32/","page":870,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["एताः संसृतयः पुंसो गुणकर्मनिबन्धनाः।","येनेमे निर्जिताः सौम्य गुणा जीवेन चित्तजाः।","भक्तियोगेन मन्‍निष्ठो मद्भावाय प्रपद्यते॥ ३२"],"iast":["etāḥ saṃsṛtayaḥ puṃso guṇakarmanibandhanāḥ|","yeneme nirjitāḥ saumya guṇā jīvena cittajāḥ|","bhaktiyogena manniṣṭho madbhāvāya prapadyate|| 32"],"meaning":"जीवको जितनी भी योनियाँ अथवा गतियाँ प्राप्त होती हैं, वे सब उनके गुणों और कर्मोंके अनुसार ही होती हैं। हे सौम्य! सब-के-सब गुण चित्तसे ही सम्बन्ध रखते हैं (इसलिये जीव उन्हें अनायास ही जीत सकता है) जो जीव उनपर विजय प्राप्त कर लेता है, वह भक्तियोगके द्वारा मुझमें ही परिनिष्ठित हो जाता है और अन्ततः मेरा वास्तविक स्वरूप, जिसे मोक्ष भी कहते हैं, प्राप्त कर लेता है॥ ३२॥"},{"id":"11.25.33","number":33,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/25/33/","page":870,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["तस्माद् देहमिमं लब्ध्वा ज्ञानविज्ञानसम्भवम्।","गुणसंगं विनिर्धूय मां भजन्तु विचक्षणाः॥ ३३"],"iast":["tasmād dehamimaṃ labdhvā jñānavijñānasambhavam|","guṇasaṃgaṃ vinirdhūya māṃ bhajantu vicakṣaṇāḥ|| 33"],"meaning":"यह मनुष्यशरीर बहुत ही दुर्लभ है। इसी शरीरमें तत्त्वज्ञान और उसमें निष्ठारूप विज्ञानकी प्राप्ति सम्भव है; इसलिये इसे पाकर बुद्धिमान् पुरुषोंको गुणोंकी आसक्ति हटाकर मेरा भजन करना चाहिये॥ ३३॥"},{"id":"11.25.34","number":34,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/25/34/","page":870,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["निःसंगो मां भजेद् विद्वानप्रमत्तो जितेन्द्रियः।","रजस्तमश्‍चाभिजयेत् सत्त्वसंसेवया मुनिः॥ ३४"],"iast":["niḥsaṃgo māṃ bhajed vidvānapramatto jitendriyaḥ|","rajastamaścābhijayet sattvasaṃsevayā muniḥ|| 34"],"meaning":"विचारशील पुरुषको चाहिये कि बड़ी सावधानीसे सत्त्वगुणके सेवनसे रजोगुण और तमोगुणको जीत ले, इन्द्रियोंको वशमें कर ले और मेरे स्वरूपको समझकर मेरे भजनमें लग जाय। आसक्तिको लेशमात्र भी न रहने दे॥ ३४॥"},{"id":"11.25.35","number":35,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/25/35/","page":870,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["सत्त्वं चाभिजयेद् युक्तो नैरपेक्ष्येण शान्तधीः।","सम्पद्यते गुणैर्मुक्तो जीवो जीवं विहाय माम्॥ ३५"],"iast":["sattvaṃ cābhijayed yukto nairapekṣyeṇa śāntadhīḥ|","sampadyate guṇairmukto jīvo jīvaṃ vihāya mām|| 35"],"meaning":"योगयुक्तिसे चित्तवृत्तियोंको शान्त करके निरपेक्षताके द्वारा सत्त्वगुणपर भी विजय प्राप्त कर ले। इस प्रकार गुणोंसे मुक्त होकर जीव अपने जीवभावको छोड़ देता है और मुझसे एक हो जाता है॥ ३५॥"},{"id":"11.25.36","number":36,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/25/36/","page":871,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["जीवो जीवविनिर्मुक्तो गुणैश्‍चाशयसम्भवैः।","मयैव ब्रह्मणा पूर्णो न बहिर्नान्तरश्‍चरेत्॥ ३६"],"iast":["jīvo jīvavinirmukto guṇaiścāśayasambhavaiḥ|","mayaiva brahmaṇā pūrṇo na bahirnāntaraścaret|| 36"],"meaning":"जीव लिंगशरीररूप अपनी उपाधि जीवत्वसे तथा अन्तःकरणमें उदय होनेवाली सत्त्वादि गुणोंकी वृत्तियोंसे मुक्त होकर मुझ ब्रह्मकी अनुभूतिसे एकत्वदर्शनसे पूर्ण हो जाता है और वह फिर बाह्य अथवा आन्तरिक किसी भी विषयमें नहीं जाता॥ ३६॥"}],"text":[{"b":41193,"kind":"adhyaya_heading","page":866,"text":"अथ पञ्चविंशोऽध्यायः"},{"b":41194,"kind":"topic_heading","page":866,"text":"तीनों गुणोंकी वृत्तियोंका निरूपण"},{"b":41195,"kind":"topic_heading","page":866,"text":"श्रीभगवानुवाच"},{"b":41196,"kind":"sanskrit_shloka","page":866,"verses":["11.25.1"],"text":"गुणानामसमिश्राणां पुमान् येन यथा भवेत्।"},{"b":41197,"kind":"sanskrit_shloka","page":866,"verses":["11.25.1"],"text":"तन्मे पुरुषवर्येदमुपधारय शंसतः॥ १"},{"b":41198,"kind":"sanskrit_shloka","page":867,"verses":["11.25.2"],"text":"शमो दमस्तितिक्षेक्षा तपः सत्यं दया स्मृतिः।"},{"b":41199,"kind":"sanskrit_shloka","page":867,"verses":["11.25.2"],"text":"तुष्टिस्त्यागोऽस्पृहा श्रद्धा ह्रीर्दयादिः स्वनिर्वृतिः॥ २"},{"b":41200,"kind":"sanskrit_shloka","page":867,"verses":["11.25.3"],"text":"काम ईहा मदस्तृष्णा स्तम्भ आशीर्भिदा सुखम्।"},{"b":41201,"kind":"sanskrit_shloka","page":867,"verses":["11.25.3"],"text":"मदोत्साहो यशःप्रीतिर्हास्यं वीर्यं बलोद्यमः॥ ३"},{"b":41202,"kind":"sanskrit_shloka","page":867,"verses":["11.25.4"],"text":"क्रोधो लोभोऽनृतं हिंसा याच्ञा दम्भः क्लमः कलिः।"},{"b":41203,"kind":"sanskrit_shloka","page":867,"verses":["11.25.4"],"text":"शोकमोहौ विषादार्ती निद्राऽऽशा भीरनुद्यमः॥ ४"},{"b":41204,"kind":"sanskrit_shloka","page":867,"verses":["11.25.5"],"text":"सत्त्वस्य रजसश्‍चैतास्तमसश्‍चानुपूर्वशः।"},{"b":41205,"kind":"sanskrit_shloka","page":867,"verses":["11.25.5"],"text":"वृत्तयो वर्णितप्रायाः सन्‍निपातमथो शृणु॥ ५"},{"b":41206,"kind":"sanskrit_shloka","page":867,"verses":["11.25.6"],"text":"सन्‍निपातस्त्वहमिति ममेत्युद्धव या मतिः।"},{"b":41207,"kind":"sanskrit_shloka","page":867,"verses":["11.25.6"],"text":"व्यवहारः सन्‍निपातो मनोमात्रेन्द्रियासुभिः॥ ६"},{"b":41208,"kind":"sanskrit_shloka","page":867,"verses":["11.25.7"],"text":"धर्मे चार्थे च कामे च यदासौ परिनिष्ठितः।"},{"b":41209,"kind":"sanskrit_shloka","page":867,"verses":["11.25.7"],"text":"गुणानां सन्‍निकर्षोऽयं श्रद्धारतिधनावहः॥ ७"},{"b":41210,"kind":"sanskrit_shloka","page":867,"verses":["11.25.8"],"text":"प्रवृत्तिलक्षणे निष्ठा पुमान् यर्हि गृहाश्रमे।"},{"b":41211,"kind":"sanskrit_shloka","page":867,"verses":["11.25.8"],"text":"स्वधर्मे चानुतिष्ठेत गुणानां समितिर्हि सा॥ ८"},{"b":41212,"kind":"hindi_commentary","page":866,"explains":["11.25.1","11.25.2","11.25.3","11.25.4","11.25.5","11.25.6","11.25.7","11.25.8"],"text":"भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—पुरुषप्रवर उद्धवजी! प्रत्येक व्यक्तिमें अलग-अलग गुणोंका प्रकाश होता है। उनके कारण प्राणियोंके स्वभावमें भी भेद हो जाता है। अब मैं बतलाता हूँ कि किस गुणसे कैसा-कैसा स्वभाव बनता है। तुम सावधानीसे सुनो॥ १॥ सत्त्वगुणकी वृत्तियाँ हैं—शम (मनःसंयम), दम (इन्द्रियनिग्रह), तितिक्षा (सहिष्णुता), विवेक, तप, सत्य, दया, स्मृति, सन्तोष, त्याग, विषयोंके प्रति अनिच्छा, श्रद्धा, लज्जा (पाप करनेमें स्वाभाविक संकोच), आत्मरति, दान, विनय और सरलता आदि॥ २॥ रजोगुणकी वृत्तियाँ हैं—इच्छा, प्रयत्‍न, घमंड, तृष्णा (असन्तोष), ऐंठ या अकड़, देवताओंसे धन आदिकी याचना, भेदबुद्धि, विषयभोग, युद्धादिके लिये मदजनित उत्साह, अपने यशमें प्रेम, हास्य, पराक्रम और हठपूर्वक उद्योग करना आदि॥ ३॥ तमोगुणकी वृत्तियाँ हैं—क्रोध (असहिष्णुता), लोभ, मिथ्याभाषण, हिंसा, याचना, पाखण्ड, श्रम, कलह, शोक, मोह, विषाद, दीनता, निद्रा, आशा, भय और अकर्मण्यता आदि॥ ४॥ इस प्रकार क्रमसे सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुणकी अधिकांश वृत्तियोंका पृथक्-पृथक् वर्णन किया गया। अब उनके मेलसे होनेवाली वृत्तियोंका वर्णन सुनो॥ ५॥ उद्धवजी! ‘मैं हूँ और यह मेरा है’ इस प्रकारकी बुद्धिमें तीनों गुणोंका मिश्रण है। जिन मन, शब्दादि विषय, इन्द्रिय और प्राणोंके कारण पूर्वोक्त वृत्तियोंका उदय होता है, वे सब-के-सब सात्त्विक, राजस और तामस हैं॥ ६॥ जब मनुष्य धर्म, अर्थ और काममें संल‌ग्‍न रहता है, तब उसे सत्त्वगुणसे श्रद्धा, रजोगुणसे रति और तमोगुणसे धनकी प्राप्ति होती है। यह भी गुणोंका मिश्रण ही है॥ ७॥ जिस समय मनुष्य सकाम कर्म, गृहस्थाश्रम और स्वधर्माचरणमें अधिक प्रीति रखता है, उस समय भी उसमें तीनों गुणोंका मेल ही समझना चाहिये॥ ८॥"},{"b":41213,"kind":"sanskrit_shloka","page":867,"verses":["11.25.9"],"text":"पुरुषं सत्त्वसंयुक्तमनुमीयाच्छमादिभिः।"},{"b":41214,"kind":"sanskrit_shloka","page":867,"verses":["11.25.9"],"text":"कामादिभी रजोयुक्तं क्रोधाद्यैस्तमसा युतम्॥ ९"},{"b":41215,"kind":"sanskrit_shloka","page":867,"verses":["11.25.10"],"text":"यदा भजति मां भक्त्या निरपेक्षः स्वकर्मभिः।"},{"b":41216,"kind":"sanskrit_shloka","page":867,"verses":["11.25.10"],"text":"तं सत्त्वप्रकृतिं विद्यात् पुरुषं स्त्रियमेव वा॥ १०"},{"b":41217,"kind":"sanskrit_shloka","page":868,"verses":["11.25.11"],"text":"यदा आशिष आशास्य मां भजेत स्वकर्मभिः।"},{"b":41218,"kind":"sanskrit_shloka","page":868,"verses":["11.25.11"],"text":"तं रजःप्रकृतिं विद्याद्धिंसामाशास्य तामसम्॥ ११"},{"b":41219,"kind":"sanskrit_shloka","page":868,"verses":["11.25.12"],"text":"सत्त्वं रजस्तम इति गुणा जीवस्य नैव मे।"},{"b":41220,"kind":"sanskrit_shloka","page":868,"verses":["11.25.12"],"text":"चित्तजा यैस्तु भूतानां सज्जमानो निबध्यते॥ १२"},{"b":41221,"kind":"sanskrit_shloka","page":868,"verses":["11.25.13"],"text":"यदेतरौ जयेत् सत्त्वं भास्वरं विशदं शिवम्।"},{"b":41222,"kind":"sanskrit_shloka","page":868,"verses":["11.25.13"],"text":"तदा सुखेन युज्येत धर्मज्ञानादिभिः पुमान्॥ १३"},{"b":41223,"kind":"sanskrit_shloka","page":868,"verses":["11.25.14"],"text":"यदा जयेत्तमः सत्त्वं रजः संगं भिदा चलम्।"},{"b":41224,"kind":"sanskrit_shloka","page":868,"verses":["11.25.14"],"text":"तदा दुःखेन युज्येत कर्मणा यशसा श्रिया॥ १४"},{"b":41225,"kind":"sanskrit_shloka","page":868,"verses":["11.25.15"],"text":"यदा जयेद् रजः सत्त्वं तमो मूढं लयं जडम्।"},{"b":41226,"kind":"sanskrit_shloka","page":868,"verses":["11.25.15"],"text":"युज्येत शोकमोहाभ्यां निद्रया हिंसयाऽऽशया॥ १५"},{"b":41227,"kind":"sanskrit_shloka","page":868,"verses":["11.25.16"],"text":"यदा चित्तं प्रसीदेत इन्द्रियाणां च निर्वृतिः।"},{"b":41228,"kind":"sanskrit_shloka","page":868,"verses":["11.25.16"],"text":"देहेऽभयं मनोऽसंगं तत् सत्त्वं विद्धि मत्पदम्॥ १६"},{"b":41229,"kind":"sanskrit_shloka","page":868,"verses":["11.25.17"],"text":"विकुर्वन् क्रियया चाधीरनिर्वृत्तिश्‍च चेतसाम्।"},{"b":41230,"kind":"sanskrit_shloka","page":868,"verses":["11.25.17"],"text":"गात्रास्वास्थ्यं मनो भ्रान्तं रज एतैर्निशामय॥ १७"},{"b":41231,"kind":"hindi_commentary","page":867,"explains":["11.25.9","11.25.10","11.25.11","11.25.12","11.25.13","11.25.14","11.25.15","11.25.16","11.25.17"],"text":"मानसिक शान्ति और जितेन्द्रियता आदि गुणोंसे सत्त्वगुणी पुरुषकी, कामना आदिसे रजोगुणी पुरुषकी और क्रोध-हिंसा आदिसे तमोगुणी पुरुषकी पहचान करे॥ ९॥ पुरुष हो, चाहे स्त्री—जब वह निष्काम होकर अपने नित्य-नैमित्तिक कर्मोंद्वारा मेरी आराधना करे, तब उसे सत्त्वगुणी जानना चाहिये॥ १०॥ सकामभावसे अपने कर्मोंके द्वारा मेरा भजन-पूजन करनेवाला रजोगुणी है और जो अपने शत्रुकी मृत्यु आदिके लिये मेरा भजन-पूजन करे, उसे तमोगुणी समझना चाहिये॥ ११॥ सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंका कारण जीवका चित्त है। उनसे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है। इन्हीं गुणोंके द्वारा जीव शरीर अथवा धन आदिमें आसक्त होकर बन्धनमें पड़ जाता है॥ १२॥ सत्त्वगुण प्रकाशक, निर्मल और शान्त है। जिस समय वह रजोगुण और तमोगुणको दबाकर बढ़ता है, उस समय पुरुष सुख, धर्म और ज्ञान आदिका भाजन हो जाता है॥ १३॥ रजोगुण भेदबुद्धिका कारण है। उसका स्वभाव है आसक्ति और प्रवृत्ति। जिस समय तमोगुण और सत्त्वगुणको दबाकर रजोगुण बढ़ता है, उस समय मनुष्य दुःख, कर्म, यश और लक्ष्मीसे सम्पन्‍न होता है॥ १४॥ तमोगुणका स्वरूप है अज्ञान। उसका स्वभाव है आलस्य और बुद्धिकी मूढ़ता। जब वह बढ़कर सत्त्वगुण और रजोगुणको दबा लेता है, तब प्राणी तरह-तरहकी आशाएँ करता है, शोक-मोहमें पड़ जाता है, हिंसा करने लगता है अथवा निद्रा-आलस्यके वशीभूत होकर पड़ रहता है॥ १५॥ जब चित्त प्रसन्‍न हो, इन्द्रियाँ शान्त हों, देह निर्भय हो और मनमें आसक्ति न हो, तब सत्त्वगुणकी वृद्धि समझनी चाहिये। सत्त्वगुण मेरी प्राप्तिका साधन है॥ १६॥ जब काम करते-करते जीवकी बुद्धि चंचल, ज्ञानेन्द्रियाँ असन्तुष्ट, कर्मेन्द्रियाँ विकारयुक्त, मन भ्रान्त और शरीर अस्वस्थ हो जाय, तब समझना चाहिये कि रजोगुण जोर पकड़ रहा है॥ १७॥"},{"b":41232,"kind":"sanskrit_shloka","page":868,"verses":["11.25.18"],"text":"सीदच्चित्तं विलीयेत चेतसो ग्रहणेऽक्षमम्।"},{"b":41233,"kind":"sanskrit_shloka","page":868,"verses":["11.25.18"],"text":"मनो नष्टं तमो ग्लानिस्तमस्तदुपधारय॥ १८"},{"b":41234,"kind":"hindi_commentary","page":868,"explains":["11.25.18"],"text":"जब चित्त ज्ञानेन्द्रियोंके द्वारा शब्दादि विषयोंको ठीक-ठीक समझनेमें असमर्थ हो जाय और खिन्‍न होकर लीन होने लगे, मन सूना-सा हो जाय तथा अज्ञान और विषादकी वृद्धि हो, तब समझना चाहिये कि तमोगुण वृद्धिपर है॥ १८॥"},{"b":41235,"kind":"sanskrit_shloka","page":868,"verses":["11.25.19"],"text":"एधमाने गुणे सत्त्वे देवानां बलमेधते।"},{"b":41236,"kind":"sanskrit_shloka","page":868,"verses":["11.25.19"],"text":"असुराणां च रजसि तमस्युद्धव रक्षसाम्॥ १९"},{"b":41237,"kind":"sanskrit_shloka","page":869,"verses":["11.25.20"],"text":"सत्त्वाज्जागरणं विद्याद् रजसा स्वप्नमादिशेत्।"},{"b":41238,"kind":"sanskrit_shloka","page":869,"verses":["11.25.20"],"text":"प्रस्वापं तमसा जन्तोस्तुरीयं त्रिषु सन्ततम्॥ २०"},{"b":41239,"kind":"sanskrit_shloka","page":869,"verses":["11.25.21"],"text":"उपर्युपरि गच्छन्ति सत्त्वेन ब्राह्मणा जनाः।"},{"b":41240,"kind":"sanskrit_shloka","page":869,"verses":["11.25.21"],"text":"तमसाधोऽध आमुख्याद् रजसान्तरचारिणः॥ २१"},{"b":41241,"kind":"sanskrit_shloka","page":869,"verses":["11.25.22"],"text":"सत्त्वे प्रलीनाः स्वर्यान्ति नरलोकं रजोलयाः।"},{"b":41242,"kind":"sanskrit_shloka","page":869,"verses":["11.25.22"],"text":"तमोलयास्तु निरयं यान्ति मामेव निर्गुणाः॥ २२"},{"b":41243,"kind":"sanskrit_shloka","page":869,"verses":["11.25.23"],"text":"मदर्पणं निष्फलं वा सात्त्विकं निजकर्म तत्।"},{"b":41244,"kind":"sanskrit_shloka","page":869,"verses":["11.25.23"],"text":"राजसं फलसंकल्पं हिंसाप्रायादि तामसम्॥ २३"},{"b":41245,"kind":"sanskrit_shloka","page":869,"verses":["11.25.24"],"text":"कैवल्यं सात्त्विकं ज्ञानं रजो वैकल्पिकं च यत्।"},{"b":41246,"kind":"sanskrit_shloka","page":869,"verses":["11.25.24"],"text":"प्राकृतं तामसं ज्ञानं मन्‍निष्ठं निर्गुणं स्मृतम्॥ २४"},{"b":41247,"kind":"sanskrit_shloka","page":869,"verses":["11.25.25"],"text":"वनं तु सात्त्विको वासो ग्रामो राजस उच्यते।"},{"b":41248,"kind":"sanskrit_shloka","page":869,"verses":["11.25.25"],"text":"तामसं द्यूतसदनं मन्‍निकेतं तु निर्गुणम्॥ २५"},{"b":41249,"kind":"sanskrit_shloka","page":869,"verses":["11.25.26"],"text":"सात्त्विकः कारकोऽसंगी रागान्धो राजसः स्मृतः।"},{"b":41250,"kind":"sanskrit_shloka","page":869,"verses":["11.25.26"],"text":"तामसः स्मृतिविभ्रष्टो निर्गुणो मदपाश्रयः॥ २६"},{"b":41251,"kind":"sanskrit_shloka","page":869,"verses":["11.25.27"],"text":"सात्त्विक्याध्यात्मिकी श्रद्धा कर्मश्रद्धा तु राजसी।"},{"b":41252,"kind":"sanskrit_shloka","page":869,"verses":["11.25.27"],"text":"तामस्यधर्मे या श्रद्धा मत्सेवायां तु निर्गुणा॥ २७"},{"b":41253,"kind":"hindi_commentary","page":868,"explains":["11.25.19","11.25.20","11.25.21","11.25.22","11.25.23","11.25.24","11.25.25","11.25.26","11.25.27"],"text":"उद्धवजी! सत्त्वगुणके बढ़नेपर देवताओंका, रजोगुणके बढ़नेपर असुरोंका और तमोगुणके बढ़नेपर राक्षसोंका बल बढ़ जाता है। (वृत्तियोंमें भी क्रमशः सत्त्वादि गुणोंकी अधिकता होनेपर देवत्व, असुरत्व और राक्षसत्व-प्रधान निवृत्ति, प्रवृत्ति अथवा मोहकी प्रधानता हो जाती है)॥ १९॥ सत्त्वगुणसे जाग्रत्-अवस्था, रजोगुणसे स्वप्नावस्था और तमोगुणसे सुषुप्ति-अवस्था होती है। तुरीय इन तीनोंमें एक-सा व्याप्त रहता है। वही शुद्ध और एकरस आत्मा है॥ २०॥ वेदोंके अभ्यासमें तत्पर ब्राह्मण सत्त्वगुणके द्वारा उत्तरोत्तर ऊपरके लोकोंमें जाते हैं। तमोगुणसे जीवोंको वृक्षादिपर्यन्त अधोगति प्राप्त होती है और रजोगुणसे मनुष्य-शरीर मिलता है॥ २१॥ जिसकी मृत्यु सत्त्वगुणोंकी वृद्धिके समय होती है, उसे स्वर्गकी प्राप्ति होती है; जिसकी रजोगुणकी वृद्धिके समय होती है, उसे मनुष्य-लोक मिलता है और जो तमोगुणकी वृद्धिके समय मरता है, उसे नरककी प्राप्ति होती है। परन्तु जो पुरुष त्रिगुणातीत—जीवन्मुक्त हो गये हैं, उन्हें मेरी ही प्राप्ति होती है॥ २२॥ जब अपने धर्मका आचरण मुझे समर्पित करके अथवा निष्कामभावसे किया जाता है तब वह सात्त्विक होता है। जिस कर्मके अनुष्ठानमें किसी फलकी कामना रहती है, वह राजसिक होता है और जिस कर्ममें किसीको सताने अथवा दिखाने आदिका भाव रहता है, वह तामसिक होता है॥ २३॥ शुद्ध आत्माका ज्ञान सात्त्विक है। उसको कर्ता-भोक्ता समझना राजस ज्ञान है और उसे शरीर समझना तो सर्वथा तामसिक है। इन तीनोंसे विलक्षण मेरे स्वरूपका वास्तविक ज्ञान निर्गुण ज्ञान है॥ २४॥ वनमें रहना सात्त्विक निवास है, गाँवमें रहना राजस है और जूआघरमें रहना तामसिक है। इन सबसे बढ़कर मेरे मन्दिरमें रहना निर्गुण निवास है॥ २५॥ अनासक्तभावसे कर्म करनेवाला सात्त्विक है, रागान्ध होकर कर्म करनेवाला राजसिक है और पूर्वापर विचारसे रहित होकर करनेवाला तामसिक है। इनके अतिरिक्त जो पुरुष केवल मेरी शरणमें रहकर बिना अहंकारके कर्म करता है, वह निर्गुण कर्ता है॥ २६॥ आत्मज्ञानविषयक श्रद्धा सात्त्विक श्रद्धा है, कर्मविषयक श्रद्धा राजस है और जो श्रद्धा अधर्ममें होती है, वह तामस है तथा मेरी सेवामें जो श्रद्धा है, वह निर्गुण श्रद्धा है॥ २७॥"},{"b":41254,"kind":"sanskrit_shloka","page":870,"verses":["11.25.28"],"text":"पथ्यं पूतमनायस्तमाहार्यं सात्त्विकं स्मृतम्।"},{"b":41255,"kind":"sanskrit_shloka","page":870,"verses":["11.25.28"],"text":"राजसं चेन्द्रियप्रेष्ठं तामसं चार्तिदाशुचि॥ २८"},{"b":41256,"kind":"sanskrit_shloka","page":870,"verses":["11.25.29"],"text":"सात्त्विकं सुखमात्मोत्थं विषयोत्थं तु राजसम्।"},{"b":41257,"kind":"sanskrit_shloka","page":870,"verses":["11.25.29"],"text":"तामसं मोहदैन्योत्थं निर्गुणं मदपाश्रयम्॥ २९"},{"b":41258,"kind":"hindi_commentary","page":870,"explains":["11.25.28","11.25.29"],"text":"आरोग्यदायक, पवित्र और अनायास प्राप्त भोजन सात्त्विक है। रसनेन्द्रियको रुचिकर और स्वादकी दृष्टिसे युक्त आहार राजस है तथा दुःखदायी और अपवित्र आहार तामस है॥ २८॥ अन्तर्मुखतासे—आत्मचिन्तनसे प्राप्त होनेवाला सुख सात्त्विक है। बहिर्मुखतासे—विषयोंसे प्राप्त होनेवाला राजस है तथा अज्ञान और दीनतासे प्राप्त होनेवाला सुख तामस है और जो सुख मुझसे मिलता है, वह तो गुणातीत और अप्राकृत है॥ २९॥"},{"b":41259,"kind":"sanskrit_shloka","page":870,"verses":["11.25.30"],"text":"द्रव्यं देशः फलं कालो ज्ञानं कर्म च कारकः।"},{"b":41260,"kind":"sanskrit_shloka","page":870,"verses":["11.25.30"],"text":"श्रद्धावस्थाऽऽकृतिर्निष्ठा त्रैगुण्यः सर्व एव हि॥ ३०"},{"b":41261,"kind":"sanskrit_shloka","page":870,"verses":["11.25.31"],"text":"सर्वे गुणमया भावाः पुरुषाव्यक्तधिष्ठिताः।"},{"b":41262,"kind":"sanskrit_shloka","page":870,"verses":["11.25.31"],"text":"दृष्टं श्रुतमनुध्यातं बुद्ध्या वा पुरुषर्षभ॥ ३१"},{"b":41263,"kind":"sanskrit_shloka","page":870,"verses":["11.25.32"],"text":"एताः संसृतयः पुंसो गुणकर्मनिबन्धनाः।"},{"b":41264,"kind":"sanskrit_shloka","page":870,"verses":["11.25.32"],"text":"येनेमे निर्जिताः सौम्य गुणा जीवेन चित्तजाः।"},{"b":41265,"kind":"sanskrit_shloka","page":870,"verses":["11.25.32"],"text":"भक्तियोगेन मन्‍निष्ठो मद्भावाय प्रपद्यते॥ ३२"},{"b":41266,"kind":"sanskrit_shloka","page":870,"verses":["11.25.33"],"text":"तस्माद् देहमिमं लब्ध्वा ज्ञानविज्ञानसम्भवम्।"},{"b":41267,"kind":"sanskrit_shloka","page":870,"verses":["11.25.33"],"text":"गुणसंगं विनिर्धूय मां भजन्तु विचक्षणाः॥ ३३"},{"b":41268,"kind":"sanskrit_shloka","page":870,"verses":["11.25.34"],"text":"निःसंगो मां भजेद् विद्वानप्रमत्तो जितेन्द्रियः।"},{"b":41269,"kind":"sanskrit_shloka","page":870,"verses":["11.25.34"],"text":"रजस्तमश्‍चाभिजयेत् सत्त्वसंसेवया मुनिः॥ ३४"},{"b":41270,"kind":"sanskrit_shloka","page":870,"verses":["11.25.35"],"text":"सत्त्वं चाभिजयेद् युक्तो नैरपेक्ष्येण शान्तधीः।"},{"b":41271,"kind":"sanskrit_shloka","page":870,"verses":["11.25.35"],"text":"सम्पद्यते गुणैर्मुक्तो जीवो जीवं विहाय माम्॥ ३५"},{"b":41272,"kind":"sanskrit_shloka","page":871,"verses":["11.25.36"],"text":"जीवो जीवविनिर्मुक्तो गुणैश्‍चाशयसम्भवैः।"},{"b":41273,"kind":"sanskrit_shloka","page":871,"verses":["11.25.36"],"text":"मयैव ब्रह्मणा पूर्णो न बहिर्नान्तरश्‍चरेत्॥ ३६"},{"b":41274,"kind":"hindi_commentary","page":870,"explains":["11.25.30","11.25.31","11.25.32","11.25.33","11.25.34","11.25.35","11.25.36"],"text":"उद्धवजी! द्रव्य (वस्तु), देश (स्थान), फल, काल, ज्ञान, कर्म, कर्ता, श्रद्धा, अवस्था, देव-मनुष्य-तिर्यगादि शरीर और निष्ठा—सभी त्रिगुणात्मक हैं॥ ३०॥ नररत्‍न! पुरुष और प्रकृतिके आश्रित जितने भी भाव हैं, सभी गुणमय हैं—वे चाहे नेत्रादि इन्द्रियोंसे अनुभव किये हुए हों, शास्त्रोंके द्वारा लोक-लोकान्तरोंके सम्बन्धमें सुने गये हों अथवा बुद्धिके द्वारा सोचे-विचारे गये हों॥ ३१॥ जीवको जितनी भी योनियाँ अथवा गतियाँ प्राप्त होती हैं, वे सब उनके गुणों और कर्मोंके अनुसार ही होती हैं। हे सौम्य! सब-के-सब गुण चित्तसे ही सम्बन्ध रखते हैं (इसलिये जीव उन्हें अनायास ही जीत सकता है) जो जीव उनपर विजय प्राप्त कर लेता है, वह भक्तियोगके द्वारा मुझमें ही परिनिष्ठित हो जाता है और अन्ततः मेरा वास्तविक स्वरूप, जिसे मोक्ष भी कहते हैं, प्राप्त कर लेता है॥ ३२॥ यह मनुष्यशरीर बहुत ही दुर्लभ है। इसी शरीरमें तत्त्वज्ञान और उसमें निष्ठारूप विज्ञानकी प्राप्ति सम्भव है; इसलिये इसे पाकर बुद्धिमान् पुरुषोंको गुणोंकी आसक्ति हटाकर मेरा भजन करना चाहिये॥ ३३॥ विचारशील पुरुषको चाहिये कि बड़ी सावधानीसे सत्त्वगुणके सेवनसे रजोगुण और तमोगुणको जीत ले, इन्द्रियोंको वशमें कर ले और मेरे स्वरूपको समझकर मेरे भजनमें लग जाय। आसक्तिको लेशमात्र भी न रहने दे॥ ३४॥ योगयुक्तिसे चित्तवृत्तियोंको शान्त करके निरपेक्षताके द्वारा सत्त्वगुणपर भी विजय प्राप्त कर ले। इस प्रकार गुणोंसे मुक्त होकर जीव अपने जीवभावको छोड़ देता है और मुझसे एक हो जाता है॥ ३५॥ जीव लिंगशरीररूप अपनी उपाधि जीवत्वसे तथा अन्तःकरणमें उदय होनेवाली सत्त्वादि गुणोंकी वृत्तियोंसे मुक्त होकर मुझ ब्रह्मकी अनुभूतिसे एकत्वदर्शनसे पूर्ण हो जाता है और वह फिर बाह्य अथवा आन्तरिक किसी भी विषयमें नहीं जाता॥ ३६॥"},{"b":41275,"kind":"hindi_commentary","page":871,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे पञ्चविंशोऽध्यायः"},{"b":41276,"kind":"hindi_translation","page":871,"text":"॥ २५॥"}],"notes":[],"corrections":{"count":1,"list":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/shuddhi/"}}