{"id":"11.3","title":"एकादश स्कन्ध · अध्याय 3","part":"एकादश स्कन्ध","heading":"अथ तृतीयोऽध्यायः","topics":["माया, मायासे पार होनेके उपाय तथा ब्रह्म और कर्मयोगका निरूपण"],"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 11.3.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[721,731]},"verses":[{"id":"11.3.1","number":1,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/1/","page":721,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["परस्य विष्णोरीशस्य मायिनामपि मोहिनीम्।","मायां वेदितुमिच्छामो भगवन्तो ब्रुवन्तु नः॥ १"],"iast":["parasya viṣṇorīśasya māyināmapi mohinīm|","māyāṃ veditumicchāmo bhagavanto bruvantu naḥ|| 1"],"meaning":"राजा निमिने पूछा—भगवन्! सर्वशक्तिमान् परमकारण विष्णुभगवान्‌की माया बड़े-बड़े मायावियोंको भी मोहित कर देती है, उसे कोई पहचान नहीं पाता; (और आप कहते हैं कि भक्त उसे देखा करता है।) अतः अब मैं उस मायाका स्वरूप जानना चाहता हूँ, आपलोग कृपा करके बतलाइये॥ १॥"},{"id":"11.3.2","number":2,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/2/","page":722,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["नानुतृप्ये जुषन् युष्मद्वचो हरिकथामृतम्।","संसारतापनिस्तप्तो मर्त्यस्तत्तापभेषजम्॥ २"],"iast":["nānutṛpye juṣan yuṣmadvaco harikathāmṛtam|","saṃsāratāpanistapto martyastattāpabheṣajam|| 2"],"meaning":"योगीश्‍वरो! मैं एक मृत्युका शिकार मनुष्य हूँ। संसारके तरह-तरहके तापोंने मुझे बहुत दिनोंसे तपा रखा है। आपलोग जो भगवत्कथारूप अमृतका पान करा रहे हैं, वह उन तापोंको मिटानेकी एकमात्र ओषधि है; इसलिये मैं आपलोगोंकी इस वाणीका सेवन करते-करते तृप्त नहीं होता। आप कृपया और कहिये॥ २॥"},{"id":"11.3.3","number":3,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/3/","page":722,"speaker":"अन्तरिक्ष उवाच","sanskrit":["एभिर्भूतानि भूतात्मा महाभूतैर्महाभुज।","ससर्जोच्चावचान्याद्यः स्वमात्रात्मप्रसिद्धये॥ ३"],"iast":["ebhirbhūtāni bhūtātmā mahābhūtairmahābhuja|","sasarjoccāvacānyādyaḥ svamātrātmaprasiddhaye|| 3"],"meaning":"अब तीसरे योगीश्‍वर अन्तरिक्षजीने कहा—राजन्! (भगवान्‌की माया स्वरूपतः अनिर्वचनीय है, इसलिये उसके कार्योंके द्वारा ही उसका निरूपण होता है।) आदि-पुरुष परमात्मा जिस शक्तिसे सम्पूर्ण भूतोंके कारण बनते हैं और उनके विषय-भोग तथा मोक्षकी सिद्धिके लिये अथवा अपने उपासकोंकी उत्कृष्ट सिद्धिके लिये स्वनिर्मित पंचभूतोंके द्वारा नाना प्रकारके देव, मनुष्य आदि शरीरोंकी सृष्टि करते हैं, उसीको माया कहते हैं॥ ३॥"},{"id":"11.3.4","number":4,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/4/","page":722,"speaker":"अन्तरिक्ष उवाच","sanskrit":["एवं सृष्टानि भूतानि प्रविष्टः पंचधातुभिः।","एकधा दशधाऽऽत्मानं विभजंजुषते गुणान्॥ ४"],"iast":["evaṃ sṛṣṭāni bhūtāni praviṣṭaḥ paṃcadhātubhiḥ|","ekadhā daśadhā''tmānaṃ vibhajaṃjuṣate guṇān|| 4"],"meaning":"इस प्रकार पंचमहाभूतोंके द्वारा बने हुए प्राणि-शरीरोंमें उन्होंने अन्तर्यामीरूपसे प्रवेश किया और अपनेको ही पहले एक मनके रूपमें और इसके बाद पाँच ज्ञानेन्द्रिय तथा पाँच कर्मेन्द्रिय—इन दस रूपोंमें विभक्त कर दिया तथा उन्हींके द्वारा विषयोंका भोग कराने लगे॥ ४॥"},{"id":"11.3.5","number":5,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/5/","page":722,"speaker":"अन्तरिक्ष उवाच","sanskrit":["गुणैर्गुणान् स भुंजान आत्मप्रद्योतितैः प्रभुः।","मन्यमान इदं सृष्टमात्मानमिह सज्जते॥ ५"],"iast":["guṇairguṇān sa bhuṃjāna ātmapradyotitaiḥ prabhuḥ|","manyamāna idaṃ sṛṣṭamātmānamiha sajjate|| 5"],"meaning":"वह देहाभिमानी जीव अन्तर्यामीके द्वारा प्रकाशित इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंका भोग करता है और इस पंचभूतोंके द्वारा निर्मित शरीरको आत्मा—अपना स्वरूप मानकर उसीमें आसक्त हो जाता है। (यह भगवान्‌की माया है)॥ ५॥"},{"id":"11.3.6","number":6,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/6/","page":722,"speaker":"अन्तरिक्ष उवाच","sanskrit":["कर्माणि कर्मभिः कुर्वन् सनिमित्तानि देहभृत्।","तत्तत् कर्मफलं गृह्णन् भ्रमतीह सुखेतरम्॥ ६"],"iast":["karmāṇi karmabhiḥ kurvan sanimittāni dehabhṛt|","tattat karmaphalaṃ gṛhṇan bhramatīha sukhetaram|| 6"],"meaning":"अब वह कर्मेन्द्रियोंसे सकाम कर्म करता है और उनके अनुसार शुभ कर्मका फल सुख और अशुभ कर्मका फल दुःख भोग करने लगता है और शरीरधारी होकर इस संसारमें भटकने लगता है। यह भगवान्‌की माया है॥ ६॥"},{"id":"11.3.7","number":7,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/7/","page":722,"speaker":"अन्तरिक्ष उवाच","sanskrit":["इत्थं कर्मगतीर्गच्छन् बह्वभद्रवहाः पुमान्।","आभूतसम्प्लवात् सर्गप्रलयावश्‍नुतेऽवशः॥ ७"],"iast":["itthaṃ karmagatīrgacchan bahvabhadravahāḥ pumān|","ābhūtasamplavāt sargapralayāvaśnute'vaśaḥ|| 7"],"meaning":"इस प्रकार यह जीव ऐसी अनेक अमंगलमय कर्मगतियोंको, उनके फलोंको प्राप्त होता है और महाभूतोंके प्रलयपर्यन्त विवश होकर जन्मके बाद मृत्यु और मृत्युके बाद जन्मको प्राप्त होता रहता है—यह भगवान्‌की माया है॥ ७॥"},{"id":"11.3.8","number":8,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/8/","page":723,"speaker":"अन्तरिक्ष उवाच","sanskrit":["धातूपप्लव आसन्‍ने व्यक्तं द्रव्यगुणात्मकम्।","अनादिनिधनः कालो ह्यव्यक्तायापकर्षति॥ ८"],"iast":["dhātūpaplava āsanne vyaktaṃ dravyaguṇātmakam|","anādinidhanaḥ kālo hyavyaktāyāpakarṣati|| 8"],"meaning":"जब पंचभूतोंके प्रलयका समय आता है, तब अनादि और अनन्त काल स्थूल तथा सूक्ष्म द्रव्य एवं गुणरूप इस समस्त व्यक्त सृष्टिको अव्यक्तकी ओर, उसके मूल कारणकी ओर खींचता है—यह भगवान्‌की माया है॥ ८॥"},{"id":"11.3.9","number":9,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/9/","page":723,"speaker":"अन्तरिक्ष उवाच","sanskrit":["शतवर्षा ह्यनावृष्टिर्भविष्यत्युल्बणा भुवि।","तत्कालोपचितोष्णार्को लोकांस्त्रीन् प्रतपिष्यति॥ ९"],"iast":["śatavarṣā hyanāvṛṣṭirbhaviṣyatyulbaṇā bhuvi|","tatkālopacitoṣṇārko lokāṃstrīn pratapiṣyati|| 9"],"meaning":"उस समय पृथ्वीपर लगातार सौ वर्षतक भयंकर सूखा पड़ता है, वर्षा बिलकुल नहीं होती; प्रलयकालकी शक्तिसे सूर्यकी उष्णता और भी बढ़ जाती है तथा वे तीनों लोकोंको तपाने लगते हैं—यह भगवान्‌की माया है॥ ९॥"},{"id":"11.3.10","number":10,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/10/","page":723,"speaker":"अन्तरिक्ष उवाच","sanskrit":["पातालतलमारभ्य संकर्षणमुखानलः।","दहन्‍नूर्ध्वशिखो विष्वग् वर्धते वायुनेरितः॥ १०"],"iast":["pātālatalamārabhya saṃkarṣaṇamukhānalaḥ|","dahannūrdhvaśikho viṣvag vardhate vāyuneritaḥ|| 10"],"meaning":"उस समय शेषनाग—संकर्षणके मुँहसे आगकी प्रचण्ड लपटें निकलती हैं और वायुकी प्रेरणासे वे लपटें पाताललोकसे जलाना आरम्भ करती हैं तथा और भी ऊँची-ऊँची होकर चारों ओर फैल जाती हैं—यह भगवान्‌की माया है॥ १०॥"},{"id":"11.3.11","number":11,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/11/","page":723,"speaker":"अन्तरिक्ष उवाच","sanskrit":["सांवर्तको मेघगणो वर्षति स्म शतं समाः।","धाराभिर्हस्तिहस्ताभिर्लीयते सलिले विराट्॥ ११"],"iast":["sāṃvartako meghagaṇo varṣati sma śataṃ samāḥ|","dhārābhirhastihastābhirlīyate salile virāṭ|| 11"],"meaning":"इसके बाद प्रलयकालीन सांवर्तक मेघगण हाथीकी सूँडके समान मोटी-मोटी धाराओंसे सौ वर्षतक बरसता रहता है। उससे यह विराट् ब्रह्माण्ड जलमें डूब जाता है—यह भगवान्‌की माया है॥ ११॥"},{"id":"11.3.12","number":12,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/12/","page":723,"speaker":"अन्तरिक्ष उवाच","sanskrit":["ततो विराजमुत्सृज्य वैराजः पुरुषो नृप।","अव्यक्तं विशते सूक्ष्मं निरिन्धन इवानलः॥ १२"],"iast":["tato virājamutsṛjya vairājaḥ puruṣo nṛpa|","avyaktaṃ viśate sūkṣmaṃ nirindhana ivānalaḥ|| 12"],"meaning":"राजन्! उस समय जैसे बिना ईंधनके आग बुझ जाती है, वैसे ही विराट् पुरुष ब्रह्मा अपने ब्रह्माण्ड-शरीरको छोड़कर सूक्ष्मस्वरूप अव्यक्तमें लीन हो जाते हैं—यह भगवान्‌की माया है॥ १२॥"},{"id":"11.3.13","number":13,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/13/","page":723,"speaker":"अन्तरिक्ष उवाच","sanskrit":["वायुना हृतगन्धा भूः सलिलत्वाय कल्पते।","सलिलं तद‍्धृतरसं ज्योतिष्ट्वायोपकल्पते॥ १३"],"iast":["vāyunā hṛtagandhā bhūḥ salilatvāya kalpate|","salilaṃ taddhṛtarasaṃ jyotiṣṭvāyopakalpate|| 13"],"meaning":"वायु पृथ्वीकी गन्ध खींच लेती है, जिससे वह जलके रूपमें हो जाती है और जब वही वायु जलके रसको खींच लेती है, तब वह जल अपना कारण अग्‍नि बन जाता है—यह भगवान्‌की माया है॥ १३॥"},{"id":"11.3.14","number":14,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/14/","page":723,"speaker":"अन्तरिक्ष उवाच","sanskrit":["हृतरूपं तु तमसा वायौ ज्योतिः प्रलीयते।","हृतस्पर्शोऽवकाशेन वायुर्नभसि लीयते॥ १४"],"iast":["hṛtarūpaṃ tu tamasā vāyau jyotiḥ pralīyate|","hṛtasparśo'vakāśena vāyurnabhasi līyate|| 14"],"meaning":"जब अन्धकार अग्‍निका रूप छीन लेता है, तब वह अग्‍नि वायुमें लीन हो जाती है और जब अवकाशरूप आकाश वायुकी स्पर्श-शक्ति छीन लेता है, तब वह आकाशमें लीन हो जाता है—यह भगवान्‌की माया है॥ १४॥"},{"id":"11.3.15","number":15,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/15/","page":723,"speaker":"अन्तरिक्ष उवाच","sanskrit":["कालात्मना हृतगुणं नभ आत्मनि लीयते।","इन्द्रियाणि मनो बुद्धिः सह वैकारिकैर्नृप।","प्रविशन्ति ह्यहंकारं स्वगुणैरहमात्मनि॥ १५"],"iast":["kālātmanā hṛtaguṇaṃ nabha ātmani līyate|","indriyāṇi mano buddhiḥ saha vaikārikairnṛpa|","praviśanti hyahaṃkāraṃ svaguṇairahamātmani|| 15"],"meaning":"राजन्! तदनन्तर कालरूप ईश्‍वर आकाशके शब्द गुणको हरण कर लेता है जिससे वह तामस अहंकारमें लीन हो जाता है। इन्द्रियाँ और बुद्धि राजस अहंकारमें लीन होती हैं। मन सात्त्विक अहंकारसे उत्पन्‍न देवताओंके साथ सात्त्विक अहंकारमें प्रवेश कर जाता है तथा अपने तीन प्रकारके कार्योंके साथ अहंकार महत्तत्त्वमें लीन हो जाता है। महत्तत्त्व प्रकृतिमें और प्रकृति ब्रह्ममें लीन होती है। फिर इसीके उलटे क्रमसे सृष्टि होती है—यह भगवान्‌की माया है॥ १५॥"},{"id":"11.3.16","number":16,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/16/","page":724,"speaker":"अन्तरिक्ष उवाच","sanskrit":["एषा माया भगवतः सर्गस्थित्यन्तकारिणी।","त्रिवर्णा वर्णितास्माभिः किं भूयः श्रोतुमिच्छसि॥ १६"],"iast":["eṣā māyā bhagavataḥ sargasthityantakāriṇī|","trivarṇā varṇitāsmābhiḥ kiṃ bhūyaḥ śrotumicchasi|| 16"],"meaning":"यह सृष्टि, स्थिति और संहार करनेवाली त्रिगुणमयी माया है। इसका हमने आपसे वर्णन किया। अब आप और क्या सुनना चाहते हैं?॥ १६॥"},{"id":"11.3.17","number":17,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/17/","page":724,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["यथैतामैश्‍वरीं मायां दुस्तरामकृतात्मभिः।","तरन्त्यंजः स्थूलधियो महर्ष इदमुच्यताम्॥ १७"],"iast":["yathaitāmaiśvarīṃ māyāṃ dustarāmakṛtātmabhiḥ|","tarantyaṃjaḥ sthūladhiyo maharṣa idamucyatām|| 17"],"meaning":"राजा निमिने पूछा—महर्षिजी! इस भगवान्‌की मायाको पार करना उन लोगोंके लिये तो बहुत ही कठिन है, जो अपने मनको वशमें नहीं कर पाये हैं। अब आप कृपा करके यह बताइये कि जो लोग शरीर आदिमें आत्मबुद्धि रखते हैं तथा जिनकी समझ मोटी है, वे भी अनायास ही इसे कैसे पार कर सकते हैं?॥ १७॥"},{"id":"11.3.18","number":18,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/18/","page":724,"speaker":"प्रबुद्ध उवाच","sanskrit":["कर्माण्यारभमाणानां दुःखहत्यै सुखाय च।","पश्येत् पाकविपर्यासं मिथुनीचारिणां नृणाम्॥ १८"],"iast":["karmāṇyārabhamāṇānāṃ duḥkhahatyai sukhāya ca|","paśyet pākaviparyāsaṃ mithunīcāriṇāṃ nṛṇām|| 18"],"meaning":"अब चौथे योगीश्‍वर प्रबुद्धजी बोले—राजन्! स्त्री-पुरुष-सम्बन्ध आदि बन्धनोंमें बँधे हुए संसारी मनुष्य सुखकी प्राप्ति और दुःखकी निवृत्तिके लिये बड़े-बड़े कर्म करते रहते हैं। जो पुरुष मायाके पार जाना चाहता है, उसको विचार करना चाहिये कि उनके कर्मोंका फल किस प्रकार विपरीत होता जाता है। वे सुखके बदले दुःख पाते हैं और दुःख-निवृत्तिके स्थानपर दिनोंदिन दुःख बढ़ता ही जाता है॥ १८॥"},{"id":"11.3.19","number":19,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/19/","page":724,"speaker":"प्रबुद्ध उवाच","sanskrit":["नित्यार्तिदेन वित्तेन दुर्लभेनात्ममृत्युना।","गृहापत्याप्तपशुभिः का प्रीतिः साधितैश्‍चलैः॥ १९"],"iast":["nityārtidena vittena durlabhenātmamṛtyunā|","gṛhāpatyāptapaśubhiḥ kā prītiḥ sādhitaiścalaiḥ|| 19"],"meaning":"एक धनको ही लो। इससे दिन-पर-दिन दुःख बढ़ता ही है, इसको पाना भी कठिन है और यदि किसी प्रकार मिल भी जाय तो आत्माके लिये तो यह मृत्युस्वरूप ही है। जो इसकी उलझनोंमें पड़ जाता है, वह अपने-आपको भूल जाता है। इसी प्रकार घर, पुत्र, स्वजन-सम्बन्धी, पशुधन आदि भी अनित्य और नाशवान् ही हैं; यदि कोई इन्हें जुटा भी ले तो इनसे क्या सुख-शान्ति मिल सकती है?॥ १९॥"},{"id":"11.3.20","number":20,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/20/","page":724,"speaker":"प्रबुद्ध उवाच","sanskrit":["एवं लोकं परं विद्यान्‍नश्‍वरं कर्मनिर्मितम्।","सतुल्यातिशयध्वंसं यथा मण्डलवर्तिनाम्॥ २०"],"iast":["evaṃ lokaṃ paraṃ vidyānnaśvaraṃ karmanirmitam|","satulyātiśayadhvaṃsaṃ yathā maṇḍalavartinām|| 20"],"meaning":"इसी प्रकार जो मनुष्य मायासे पार जाना चाहता है, उसे यह भी समझ लेना चाहिये कि मरनेके बाद प्राप्त होनेवाले लोक-परलोक भी ऐसे ही नाशवान् हैं। क्योंकि इस लोककी वस्तुओंके समान वे भी कुछ सीमित कर्मोंके सीमित फलमात्र हैं। वहाँ भी पृथ्वीके छोटे-छोटे राजाओंके समान बराबरवालोंसे होड़ अथवा लाग-डाँट रहती है, अधिक ऐश्‍वर्य और सुखवालोंके प्रति छिद्रान्वेषण तथा ईर्ष्या-द्वेषका भाव रहता है, कम सुख और ऐश्‍वर्यवालोंके प्रति घृणा रहती है एवं कर्मोंका फल पूरा हो जानेपर वहाँसे पतन तो होता ही है। उसका नाश निश्‍चित है। नाशका भय वहाँ भी नहीं छूट पाता॥ २०॥"},{"id":"11.3.21","number":21,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/21/","page":725,"speaker":"प्रबुद्ध उवाच","sanskrit":["तस्माद् गुरुं प्रपद्येत जिज्ञासुः श्रेय उत्तमम्।","शाब्दे परे च निष्णातं ब्रह्मण्युपशमाश्रयम्॥ २१"],"iast":["tasmād guruṃ prapadyeta jijñāsuḥ śreya uttamam|","śābde pare ca niṣṇātaṃ brahmaṇyupaśamāśrayam|| 21"],"meaning":"इसलिये जो परम कल्याणका जिज्ञासु हो, उसे गुरुदेवकी शरण लेनी चाहिये। गुरुदेव ऐसे हों, जो शब्दब्रह्म—वेदोंके पारदर्शी विद्वान् हों, जिससे वे ठीक-ठीक समझा सकें; और साथ ही परब्रह्ममें परिनिष्ठित तत्त्वज्ञानी भी हों, ताकि अपने अनुभवके द्वारा प्राप्त हुई रहस्यकी बातोंको बता सकें। उनका चित्त शान्त हो, व्यवहारके प्रपंचमें विशेष प्रवृत्त न हो॥ २१॥"},{"id":"11.3.22","number":22,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/22/","page":725,"speaker":"प्रबुद्ध उवाच","sanskrit":["तत्र भागवतान् धर्मान् शिक्षेद् गुर्वात्मदैवतः।","अमाययानुवृत्त्या यैस्तुष्येदात्माऽऽत्मदो हरिः॥ २२"],"iast":["tatra bhāgavatān dharmān śikṣed gurvātmadaivataḥ|","amāyayānuvṛttyā yaistuṣyedātmā''tmado hariḥ|| 22"],"meaning":"जिज्ञासुको चाहिये कि गुरुको ही अपना परम प्रियतम आत्मा और इष्टदेव माने। उनकी निष्कपटभावसे सेवा करे और उनके पास रहकर भागवतधर्मकी—भगवान्‌को प्राप्त करानेवाले भक्ति-भावके साधनोंकी क्रियात्मक शिक्षा ग्रहण करे। इन्हीं साधनोंसे सर्वात्मा एवं भक्तको अपने आत्माका दान करनेवाले भगवान् प्रसन्‍न होते हैं॥ २२॥"},{"id":"11.3.23","number":23,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/23/","page":725,"speaker":"प्रबुद्ध उवाच","sanskrit":["सर्वतो मनसोऽसंगमादौ संगं च साधुषु।","दयां मैत्रीं प्रश्रयं च भूतेष्वद्धा यथोचितम्॥ २३"],"iast":["sarvato manaso'saṃgamādau saṃgaṃ ca sādhuṣu|","dayāṃ maitrīṃ praśrayaṃ ca bhūteṣvaddhā yathocitam|| 23"],"meaning":"पहले शरीर, सन्तान आदिमें मनकी अनासक्ति सीखे। फिर भगवान्‌के भक्तोंसे प्रेम कैसा करना चाहिये—यह सीखे। इसके पश्‍चात् प्राणियोंके प्रति यथायोग्य दया, मैत्री और विनयकी निष्कपट भावसे शिक्षा ग्रहण करे॥ २३॥"},{"id":"11.3.24","number":24,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/24/","page":725,"speaker":"प्रबुद्ध उवाच","sanskrit":["शौचं तपस्तितिक्षां च मौनं स्वाध्यायमार्जवम्।","ब्रह्मचर्यमहिंसां च समत्वं द्वन्द्वसंज्ञयोः॥ २४"],"iast":["śaucaṃ tapastitikṣāṃ ca maunaṃ svādhyāyamārjavam|","brahmacaryamahiṃsāṃ ca samatvaṃ dvandvasaṃjñayoḥ|| 24"],"meaning":"मिट्टी, जल आदिसे बाह्य शरीरकी पवित्रता, छल-कपट आदिके त्यागसे भीतरकी पवित्रता, अपने धर्मका अनुष्ठान, सहनशक्ति, मौन, स्वाध्याय, सरलता, ब्रह्मचर्य, अहिंसा तथा शीत-उष्ण, सुख-दुःख आदि द्वन्द्वोंमें हर्ष-विषादसे रहित होना सीखे॥ २४॥"},{"id":"11.3.25","number":25,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/25/","page":725,"speaker":"प्रबुद्ध उवाच","sanskrit":["सर्वत्रात्मेश्‍वरान्वीक्षां कैवल्यमनिकेतताम्।","विविक्तचीरवसनं सन्तोषं येन केनचित्॥ २५"],"iast":["sarvatrātmeśvarānvīkṣāṃ kaivalyamaniketatām|","viviktacīravasanaṃ santoṣaṃ yena kenacit|| 25"],"meaning":"सर्वत्र अर्थात् समस्त देश, काल और वस्तुओंमें चेतनरूपसे आत्मा और नियन्तारूपसे ईश्‍वरको देखना, एकान्तसेवन, ‘यही मेरा घर है’—ऐसा भाव न रखना, गृहस्थ हो तो पवित्र वस्त्र पहनना और त्यागी हो तो फटे-पुराने पवित्र चिथड़े, जो कुछ प्रारब्धके अनुसार मिल जाय, उसीमें सन्तोष करना सीखे॥ २५॥"},{"id":"11.3.26","number":26,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/26/","page":726,"speaker":"प्रबुद्ध उवाच","sanskrit":["श्रद्धां भागवते शास्त्रेऽनिन्दामन्यत्र चापि हि।","मनोवाक्कर्मदण्डं च सत्यं शमदमावपि॥ २६"],"iast":["śraddhāṃ bhāgavate śāstre'nindāmanyatra cāpi hi|","manovākkarmadaṇḍaṃ ca satyaṃ śamadamāvapi|| 26"],"meaning":"भगवान्‌की प्राप्तिका मार्ग बतलानेवाले शास्त्रोंमें श्रद्धा और दूसरे किसी भी शास्त्रकी निन्दा न करना, प्राणायामके द्वारा मनका, मौनके द्वारा वाणीका और वासनाहीनताके अभ्याससे कर्मोंका संयम करना, सत्य बोलना, इन्द्रियोंको अपने-अपने गोलकोंमें स्थिर रखना और मनको कहीं बाहर न जाने देना सीखे॥ २६॥"},{"id":"11.3.27","number":27,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/27/","page":726,"speaker":"प्रबुद्ध उवाच","sanskrit":["श्रवणं कीर्तनं ध्यानं हरेरद्भुतकर्मणः।","जन्मकर्मगुणानां च तदर्थेऽखिलचेष्टितम्॥ २७"],"iast":["śravaṇaṃ kīrtanaṃ dhyānaṃ hareradbhutakarmaṇaḥ|","janmakarmaguṇānāṃ ca tadarthe'khilaceṣṭitam|| 27"],"meaning":"राजन्! भगवान्‌की लीलाएँ अद्भुत हैं। उनके जन्म, कर्म और गुण दिव्य हैं। उन्हींका श्रवण, कीर्तन और ध्यान करना तथा शरीरसे जितनी भी चेष्टाएँ हों, सब भगवान्‌के लिये करना सीखे॥ २७॥"},{"id":"11.3.28","number":28,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/28/","page":726,"speaker":"प्रबुद्ध उवाच","sanskrit":["इष्टं दत्तं तपो जप्तं वृत्तं यच्चात्मनः प्रियम्।","दारान् सुतान् गृहान् प्राणान् यत् परस्मै निवेदनम्॥ २८"],"iast":["iṣṭaṃ dattaṃ tapo japtaṃ vṛttaṃ yaccātmanaḥ priyam|","dārān sutān gṛhān prāṇān yat parasmai nivedanam|| 28"],"meaning":"यज्ञ, दान, तप अथवा जप, सदाचारका पालन और स्त्री, पुत्र, घर, अपना जीवन, प्राण तथा जो कुछ अपनेको प्रिय लगता हो—सब-का-सब भगवान्‌के चरणोंमें निवेदन करना उन्हें सौंप देना सीखे॥ २८॥"},{"id":"11.3.29","number":29,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/29/","page":726,"speaker":"प्रबुद्ध उवाच","sanskrit":["एवं कृष्णात्मनाथेषु मनुष्येषु च सौहृदम्।","परिचर्यां चोभयत्र महत्सु नृषु साधुषु॥ २९"],"iast":["evaṃ kṛṣṇātmanātheṣu manuṣyeṣu ca sauhṛdam|","paricaryāṃ cobhayatra mahatsu nṛṣu sādhuṣu|| 29"],"meaning":"जिन संत पुरुषोंने सच्चिदानन्दस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णका अपने आत्मा और स्वामीके रूपमें साक्षात्कार कर लिया हो, उनसे प्रेम और स्थावर, जंगम दोनों प्रकारके प्राणियोंकी सेवा; विशेष करके मनुष्योंकी, मनुष्योंमें भी परोपकारी सज्जनोंकी और उनमें भी भगवत्प्रेमी संतोंकी करना सीखे॥ २९॥"},{"id":"11.3.30","number":30,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/30/","page":726,"speaker":"प्रबुद्ध उवाच","sanskrit":["परस्परानुकथनं पावनं भगवद्यशः।","मिथो रतिर्मिथस्तुष्टिर्निवृत्तिर्मिथ आत्मनः॥ ३०"],"iast":["parasparānukathanaṃ pāvanaṃ bhagavadyaśaḥ|","mitho ratirmithastuṣṭirnivṛttirmitha ātmanaḥ|| 30"],"meaning":"भगवान्‌के परम पावन यशके सम्बन्धमें ही एक-दूसरेसे बातचीत करना और इस प्रकारके साधकोंका इकट्ठे होकर आपसमें प्रेम करना, आपसमें सन्तुष्ट रहना और प्रपंचसे निवृत्त होकर आपसमें ही आध्यात्मिक शान्तिका अनुभव करना सीखे॥ ३०॥"},{"id":"11.3.31","number":31,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/31/","page":726,"speaker":"प्रबुद्ध उवाच","sanskrit":["स्मरन्तः स्मारयन्तश्‍च मिथोऽघौघहरं हरिम्।","भक्त्या संजातया भक्त्या बिभ्रत्युत्पुलकां तनुम्॥ ३१"],"iast":["smarantaḥ smārayantaśca mitho'ghaughaharaṃ harim|","bhaktyā saṃjātayā bhaktyā bibhratyutpulakāṃ tanum|| 31"],"meaning":"राजन्! श्रीकृष्ण राशि-राशि पापोंको एक क्षणमें भस्म कर देते हैं। सब उन्हींका स्मरण करें और एक-दूसरेको स्मरण करावें। इस प्रकार साधन-भक्तिका अनुष्ठान करते-करते प्रेम-भक्तिका उदय हो जाता है और वे प्रेमोद्रेकसे पुलकित-शरीर धारण करते हैं॥ ३१॥"},{"id":"11.3.32","number":32,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/32/","page":727,"speaker":"प्रबुद्ध उवाच","sanskrit":["क्वचिद् रुदन्त्यच्युतचिन्तया क्वचि-","द्धसन्ति नन्दन्ति वदन्त्यलौकिकाः।","नृत्यन्ति गायन्त्यनुशीलयन्त्यजं","भवन्ति तूष्णीं परमेत्य निर्वृताः॥ ३२"],"iast":["kvacid rudantyacyutacintayā kvaci-","ddhasanti nandanti vadantyalaukikāḥ|","nṛtyanti gāyantyanuśīlayantyajaṃ","bhavanti tūṣṇīṃ parametya nirvṛtāḥ|| 32"],"meaning":"उनके हृदयकी बड़ी विलक्षण स्थिति होती है। कभी-कभी वे इस प्रकार चिन्ता करने लगते हैं कि अबतक भगवान् नहीं मिले, क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, किसे पूछूँ, कौन मुझे उनकी प्राप्ति करावे? इस तरह सोचते-सोचते वे रोने लगते हैं तो कभी भगवान्‌की लीलाकी स्फूर्ति हो जानेसे ऐसा देखकर कि परमैश्‍वर्यशाली भगवान् गोपियोंके डरसे छिपे हुए हैं, खिलखिलाकर हँसने लगते हैं। कभी-कभी उनके प्रेम और दर्शनकी अनुभूतिसे आनन्दम‌ग्‍न हो जाते हैं तो कभी लोकातीत भावमें स्थित होकर भगवान्‌के साथ बातचीत करने लगते हैं। कभी मानो उन्हें सुना रहे हों, इस प्रकार उनके गुणोंका गान छेड़ देते हैं और कभी नाच-नाचकर उन्हें रिझाने लगते हैं। कभी-कभी उन्हें अपने पास न पाकर इधर-उधर ढूँढ़ने लगते हैं तो कभी-कभी उनसे एक होकर, उनकी सन्‍निधिमें स्थित होकर परम शान्तिका अनुभव करते और चुप हो जाते हैं॥ ३२॥"},{"id":"11.3.33","number":33,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/33/","page":727,"speaker":"प्रबुद्ध उवाच","sanskrit":["इति भागवतान् धर्मान् शिक्षन् भक्त्या तदुत्थया।","नारायणपरो मायामंजस्तरति दुस्तराम्॥ ३३"],"iast":["iti bhāgavatān dharmān śikṣan bhaktyā tadutthayā|","nārāyaṇaparo māyāmaṃjastarati dustarām|| 33"],"meaning":"राजन्! जो इस प्रकार भागवतधर्मोंकी शिक्षा ग्रहण करता है, उसे उनके द्वारा प्रेम-भक्तिकी प्राप्ति हो जाती है और वह भगवान् नारायणके परायण होकर उस मायाको अनायास ही पार कर जाता है, जिसके पंजेसे निकलना बहुत ही कठिन है॥ ३३॥"},{"id":"11.3.34","number":34,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/34/","page":727,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["नारायणाभिधानस्य ब्रह्मणः परमात्मनः।","निष्ठामर्हथ नो वक्तुं यूयं हि ब्रह्मवित्तमाः॥ ३४"],"iast":["nārāyaṇābhidhānasya brahmaṇaḥ paramātmanaḥ|","niṣṭhāmarhatha no vaktuṃ yūyaṃ hi brahmavittamāḥ|| 34"],"meaning":"राजा निमिने पूछा—महर्षियो! आपलोग परमात्माका वास्तविक स्वरूप जाननेवालोंमें सर्वश्रेष्ठ हैं। इसलिये मुझे यह बतलाइये कि जिस परब्रह्म परमात्माका ‘नारायण’ नामसे वर्णन किया जाता है, उनका स्वरूप क्या है?॥ ३४॥"},{"id":"11.3.35","number":35,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/35/","page":727,"speaker":"पिप्पलायन उवाच","sanskrit":["स्थित्युद्भवप्रलयहेतुरहेतुरस्य","यत् स्वप्नजागरसुषुप्तिषु सद् बहिश्‍च।","देहेन्द्रियासुहृदयानि चरन्ति येन","संजीवितानि तदवेहि परं नरेन्द्र॥ ३५"],"iast":["sthityudbhavapralayaheturaheturasya","yat svapnajāgarasuṣuptiṣu sad bahiśca|","dehendriyāsuhṛdayāni caranti yena","saṃjīvitāni tadavehi paraṃ narendra|| 35"],"meaning":"अब पाँचवें योगीश्‍वर पिप्पलायनजीने कहा—राजन्! जो इस संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका निमित्त-कारण और उपादान-कारण दोनों ही है, बननेवाला भी है और बनानेवाला भी—परन्तु स्वयं कारणरहित है; जो स्वप्न, जाग्रत् और सुषुप्ति अवस्थाओंमें उनके साक्षीके रूपमें विद्यमान रहता है और उनके अतिरिक्त समाधिमें भी ज्यों-का-त्यों एकरस रहता है; जिसकी सत्तासे ही सत्ता-वान् होकर शरीर, इन्द्रिय, प्राण और अन्तःकरण अपना-अपना काम करनेमें समर्थ होते हैं, उसी परम सत्य वस्तुको आप ‘नारायण’ समझिये॥ ३५॥"},{"id":"11.3.36","number":36,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/36/","page":728,"speaker":"पिप्पलायन उवाच","sanskrit":["नैतन्मनो विशति वागुत चक्षुरात्मा","प्राणेन्द्रियाणि च यथानलमर्चिषः स्वाः।","शब्दोऽपि बोधकनिषेधतयाऽऽत्ममूल-","मर्थोक्तमाह यदृते न निषेधसिद्धिः॥ ३६"],"iast":["naitanmano viśati vāguta cakṣurātmā","prāṇendriyāṇi ca yathānalamarciṣaḥ svāḥ|","śabdo'pi bodhakaniṣedhatayā''tmamūla-","marthoktamāha yadṛte na niṣedhasiddhiḥ|| 36"],"meaning":"जैसे चिनगारियाँ न तो अग्‍निको प्रकाशित ही कर सकती हैं और न जला ही सकती हैं, वैसे ही उस परमतत्त्वमें—आत्मस्वरूपमें न तो मनकी गति है और न वाणीकी, नेत्र उसे देख नहीं सकते और बुद्धि सोच नहीं सकती, प्राण और इन्द्रियाँ तो उसके पासतक नहीं फटक पातीं। ‘नेति-नेति’—इत्यादि श्रुतियोंके शब्द भी वह यह है—इस रूपमें उसका वर्णन नहीं करते, बल्कि उसको बोध करानेवाले जितने भी साधन हैं, उनका निषेध करके तात्पर्यरूपसे अपना मूल—निषेधका मूल लक्षित करा देते हैं; क्योंकि यदि निषेधके आधारकी, आत्माकी सत्ता न हो तो निषेध कौन कर रहा है, निषेधकी वृत्ति किसमें है—इन प्रश्‍नोंका कोई उत्तर ही न रहे, निषेधकी ही सिद्धि न हो॥ ३६॥"},{"id":"11.3.37","number":37,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/37/","page":728,"speaker":"पिप्पलायन उवाच","sanskrit":["सत्त्वं रजस्तम इति त्रिवृदेकमादौ","सूत्रं महानहमिति प्रवदन्ति जीवम्।","ज्ञानक्रियार्थफलरूपतयोरुशक्ति","ब्रह्मैव भाति सदसच्च तयोः परं यत्॥ ३७"],"iast":["sattvaṃ rajastama iti trivṛdekamādau","sūtraṃ mahānahamiti pravadanti jīvam|","jñānakriyārthaphalarūpatayoruśakti","brahmaiva bhāti sadasacca tayoḥ paraṃ yat|| 37"],"meaning":"जब सृष्टि नहीं थी, तब केवल एक वही था। सृष्टिका निरूपण करनेके लिये उसीको त्रिगुण (सत्त्व-रज-तम)-मयी प्रकृति कहकर वर्णन किया गया। फिर उसीको ज्ञानप्रधान होनेसे महत्तत्त्व, क्रियाप्रधान होनेसे सूत्रात्मा और जीवकी उपाधि होनेसे अहंकारके रूपमें वर्णन किया गया। वास्तवमें जितनी भी शक्तियाँ हैं—चाहे वे इन्द्रियोंके अधिष्ठातृ-देवताओंके रूपमें हों, चाहे इन्द्रियोंके, उनके विषयोंके अथवा विषयोंके प्रकाशके रूपमें हों—सब-का-सब वह ब्रह्म ही है; क्योंकि ब्रह्मकी शक्ति अनन्त है। कहाँतक कहूँ? जो कुछ दृश्य-अदृश्य, कार्य-कारण, सत्य और असत्य है—सब कुछ ब्रह्म है। इनसे परे जो कुछ है, वह भी ब्रह्म ही है॥ ३७॥"},{"id":"11.3.38","number":38,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/38/","page":728,"speaker":"पिप्पलायन उवाच","sanskrit":["नात्मा जजान न मरिष्यति नैधतेऽसौ","न क्षीयते सवनविद् व्यभिचारिणां हि।","सर्वत्र शश्‍वदनपाय्युपलब्धिमात्रं","प्राणो यथेन्द्रियबलेन विकल्पितं सत्॥ ३८"],"iast":["nātmā jajāna na mariṣyati naidhate'sau","na kṣīyate savanavid vyabhicāriṇāṃ hi|","sarvatra śaśvadanapāyyupalabdhimātraṃ","prāṇo yathendriyabalena vikalpitaṃ sat|| 38"],"meaning":"वह ब्रह्मस्वरूप आत्मा न तो कभी जन्म लेता है और न मरता है। वह न तो बढ़ता है और न घटता ही है। जितने भी परिवर्तनशील पदार्थ हैं—चाहे वे क्रिया, संकल्प और उनके अभावके रूपमें ही क्यों न हों—सबकी भूत, भविष्यत् और वर्तमान सत्ताका वह साक्षी है। सबमें है। देश, काल और वस्तुसे अपरिच्छिन्‍न है, अविनाशी है। वह उपलब्धि करनेवाला अथवा उपलब्धिका विषय नहीं है। केवल उपलब्धिस्वरूप—ज्ञानस्वरूप है। जैसे प्राण तो एक ही रहता है, परन्तु स्थानभेदसे उसके अनेक नाम हो जाते हैं—वैसे ही ज्ञान एक होनेपर भी इन्द्रियोंके सहयोगसे उसमें अनेकताकी कल्पना हो जाती है॥ ३८॥"},{"id":"11.3.39","number":39,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/39/","page":729,"speaker":"पिप्पलायन उवाच","sanskrit":["अण्डेषु पेशिषु तरुष्वविनिश्‍चितेषु","प्राणो हि जीवमुपधावति तत्र तत्र।","सन्‍ने यदिन्द्रियगणेऽहमि च प्रसुप्ते","कूटस्थ आशयमृते तदनुस्मृतिर्नः॥ ३९"],"iast":["aṇḍeṣu peśiṣu taruṣvaviniściteṣu","prāṇo hi jīvamupadhāvati tatra tatra|","sanne yadindriyagaṇe'hami ca prasupte","kūṭastha āśayamṛte tadanusmṛtirnaḥ|| 39"],"meaning":"जगत‍्में चार प्रकारके जीव होते हैं—अंडा फोड़कर पैदा होनेवाले पक्षी-साँप आदि, नालमें बँधे पैदा होनेवाले पशु-मनुष्य, धरती फोड़कर निकलनेवाले वृक्ष-वनस्पति और पसीनेसे उत्पन्‍न होनेवाले खटमल आदि। इन सभी जीव-शरीरोंमें प्राणशक्ति जीवके पीछे लगी रहती है। शरीरोंके भिन्‍न-भिन्‍न होनेपर भी प्राण एक ही रहता है। सुषुप्ति-अवस्थामें जब इन्द्रियाँ निश्‍चेष्ट हो जाती हैं, अहंकार भी सो जाता है—लीन हो जाता है, अर्थात् लिंगशरीर नहीं रहता, उस समय यदि कूटस्थ आत्मा भी न हो तो इस बातकी पीछेसे स्मृति ही कैसे हो कि मैं सुखसे सोया था। पीछे होनेवाली यह स्मृति ही उस समय आत्माके अस्तित्वको प्रमाणित करती है॥ ३९॥"},{"id":"11.3.40","number":40,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/40/","page":729,"speaker":"पिप्पलायन उवाच","sanskrit":["यर्ह्यब्जनाभचरणैषणयोरुभक्त्या","चेतोमलानि विधमेद् गुणकर्मजानि।","तस्मिन् विशुद्ध उपलभ्यत आत्मतत्त्वं","साक्षाद् यथामलदृशोः सवितृप्रकाशः॥ ४०"],"iast":["yarhyabjanābhacaraṇaiṣaṇayorubhaktyā","cetomalāni vidhamed guṇakarmajāni|","tasmin viśuddha upalabhyata ātmatattvaṃ","sākṣād yathāmaladṛśoḥ savitṛprakāśaḥ|| 40"],"meaning":"जब भगवान् कमलनाभके चरण-कमलोंको प्राप्त करनेकी इच्छासे तीव्र भक्ति की जाती है तब वह भक्ति ही अग्‍निकी भाँति गुण और कर्मोंसे उत्पन्‍न हुए चित्तके सारे मलोंको जला डालती है। जब चित्त शुद्ध हो जाता है, तब आत्मतत्त्वका साक्षात्कार हो जाता है—जैसे नेत्रोंके निर्विकार हो जानेपर सूर्यके प्रकाशकी प्रत्यक्ष अनुभूति होने लगती है॥ ४०॥"},{"id":"11.3.41","number":41,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/41/","page":729,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["कर्मयोगं वदत नः पुरुषो येन संस्कृतः।","विधूयेहाशु कर्माणि नैष्कर्म्यं विन्दते परम्॥ ४१"],"iast":["karmayogaṃ vadata naḥ puruṣo yena saṃskṛtaḥ|","vidhūyehāśu karmāṇi naiṣkarmyaṃ vindate param|| 41"],"meaning":"राजा निमिने पूछा—योगीश्‍वरो! अब आपलोग हमें कर्मयोगका उपदेश कीजिये, जिसके द्वारा शुद्ध होकर मनुष्य शीघ्रातिशीघ्र परम नैष्कर्म्य अर्थात् कर्तृत्व, कर्म और कर्मफलकी निवृत्ति करनेवाला ज्ञान प्राप्त करता है॥ ४१॥"},{"id":"11.3.42","number":42,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/42/","page":729,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["एवं प्रश्‍नमृषीन् पूर्वमपृच्छं पितुरन्तिके।","नाब्रुवन् ब्रह्मणः पुत्रास्तत्र कारणमुच्यताम्॥ ४२"],"iast":["evaṃ praśnamṛṣīn pūrvamapṛcchaṃ piturantike|","nābruvan brahmaṇaḥ putrāstatra kāraṇamucyatām|| 42"],"meaning":"एक बार यही प्रश्‍न मैंने अपने पिता महाराज इक्ष्वाकुके सामने ब्रह्माजीके मानस पुत्र सनकादि ऋषियोंसे पूछा था, परन्तु उन्होंने सर्वज्ञ होनेपर भी मेरे प्रश्‍नका उत्तर न दिया। इसका क्या कारण था? कृपा करके मुझे बतलाइये॥ ४२॥"},{"id":"11.3.43","number":43,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/43/","page":729,"speaker":"आविर्होत्र उवाच","sanskrit":["कर्माकर्मविकर्मेति वेदवादो न लौकिकः।","वेदस्य चेश्‍वरात्मत्वात् तत्र मुह्यन्ति सूरयः॥ ४३"],"iast":["karmākarmavikarmeti vedavādo na laukikaḥ|","vedasya ceśvarātmatvāt tatra muhyanti sūrayaḥ|| 43"],"meaning":"अब छठे योगीश्‍वर आविर्होत्रजीने कहा—राजन्! कर्म (शास्त्रविहित), अकर्म (निषिद्ध) और विकर्म (विहितका उल्लंघन)—ये तीनों एकमात्र वेदके द्वारा जाने जाते हैं, इनकी व्यवस्था लौकिक रीतिसे नहीं होती। वेद अपौरुषेय हैं—ईश्‍वररूप हैं; इसलिये उनके तात्पर्यका निश्‍चय करना बहुत कठिन है। इसीसे बड़े-बड़े विद्वान् भी उनके अभिप्रायका निर्णय करनेमें भूल कर बैठते हैं। (इसीसे तुम्हारे बचपनकी ओर देखकर—तुम्हें अनधिकारी समझकर सनकादि ऋषियोंने तुम्हारे प्रश्‍नका उत्तर नहीं दिया)॥ ४३॥"},{"id":"11.3.44","number":44,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/44/","page":730,"speaker":"आविर्होत्र उवाच","sanskrit":["परोक्षवादो वेदोऽयं बालानामनुशासनम्।","कर्ममोक्षाय कर्माणि विधत्ते ह्यगदं यथा॥ ४४"],"iast":["parokṣavādo vedo'yaṃ bālānāmanuśāsanam|","karmamokṣāya karmāṇi vidhatte hyagadaṃ yathā|| 44"],"meaning":"यह वेद परोक्षवादात्मक है। यह कर्मोंकी निवृत्तिके लिये कर्मका विधान करता है, जैसे बालकको मिठाई आदिका लालच देकर औषध खिलाते हैं, वैसे ही यह अनभिज्ञोंको स्वर्ग आदिका प्रलोभन देकर श्रेष्ठ कर्ममें प्रवृत्त करता है॥ ४४॥"},{"id":"11.3.45","number":45,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/45/","page":730,"speaker":"आविर्होत्र उवाच","sanskrit":["नाचरेद् यस्तु वेदोक्तं स्वयमज्ञोऽजितेन्द्रियः।","विकर्मणा ह्यधर्मेण मृत्योर्मृत्युमुपैति सः॥ ४५"],"iast":["nācared yastu vedoktaṃ svayamajño'jitendriyaḥ|","vikarmaṇā hyadharmeṇa mṛtyormṛtyumupaiti saḥ|| 45"],"meaning":"जिसका अज्ञान निवृत्त नहीं हुआ है, जिसकी इन्द्रियाँ वशमें नहीं हैं, वह यदि मनमाने ढंगसे वेदोक्त कर्मोंका परित्याग कर देता है, तो वह विहित कर्मोंका आचरण न करनेके कारण विकर्मरूप अधर्म ही करता है। इसलिये वह मृत्युके बाद फिर मृत्युको प्राप्त होता है॥ ४५॥"},{"id":"11.3.46","number":46,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/46/","page":730,"speaker":"आविर्होत्र उवाच","sanskrit":["वेदोक्तमेव कुर्वाणो निःसंगोऽर्पितमीश्‍वरे।","नैष्कर्म्यां लभते सिद्धिं रोचनार्था फलश्रुतिः॥ ४६"],"iast":["vedoktameva kurvāṇo niḥsaṃgo'rpitamīśvare|","naiṣkarmyāṃ labhate siddhiṃ rocanārthā phalaśrutiḥ|| 46"],"meaning":"इसलिये फलकी अभिलाषा छोड़कर और विश्‍वात्मा भगवान्‌को समर्पित कर जो वेदोक्त कर्मका ही अनुष्ठान करता है, उसे कर्मोंकी निवृत्तिसे प्राप्त होनेवाली ज्ञानरूप सिद्धि मिल जाती है। जो वेदोंमें स्वर्गादिरूप फलका वर्णन है, उसका तात्पर्य फलकी सत्यतामें नहीं है, वह तो कर्मोंमें रुचि उत्पन्‍न करानेके लिये है॥ ४६॥"},{"id":"11.3.47","number":47,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/47/","page":730,"speaker":"आविर्होत्र उवाच","sanskrit":["य आशु हृदयग्रन्थिं निर्जिहीर्षुः परात्मनः।","विधिनोपचरेद् देवं तन्त्रोक्तेन च केशवम्॥ ४७"],"iast":["ya āśu hṛdayagranthiṃ nirjihīrṣuḥ parātmanaḥ|","vidhinopacared devaṃ tantroktena ca keśavam|| 47"],"meaning":"राजन्! जो पुरुष चाहता है कि शीघ्र-से-शीघ्र मेरे ब्रह्मस्वरूप आत्माकी हृदय-ग्रन्थि—मैं और मेरेकी कल्पित गाँठ खुल जाय, उसे चाहिये कि वह वैदिक और तान्त्रिक दोनों ही पद्धतियोंसे भगवान्‌की आराधना करे॥ ४७॥"},{"id":"11.3.48","number":48,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/48/","page":730,"speaker":"आविर्होत्र उवाच","sanskrit":["लब्धानुग्रह आचार्यात् तेन सन्दर्शितागमः।","महापुरुषमभ्यर्चेन्मूर्त्याभिमतयाऽऽत्मनः ॥ ४८"],"iast":["labdhānugraha ācāryāt tena sandarśitāgamaḥ|","mahāpuruṣamabhyarcenmūrtyābhimatayā''tmanaḥ || 48"],"meaning":"पहले सेवा आदिके द्वारा गुरुदेवकी दीक्षा प्राप्त करे, फिर उनके द्वारा अनुष्ठानकी विधि सीखे; अपनेको भगवान्‌की जो मूर्ति प्रिय लगे, अभीष्ट जान पड़े, उसीके द्वारा पुरुषोत्तम भगवान्‌की पूजा करे॥ ४८॥"},{"id":"11.3.49","number":49,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/49/","page":730,"speaker":"आविर्होत्र उवाच","sanskrit":["शुचिः सम्मुखमासीनः प्राणसंयमनादिभिः।","पिण्डं विशोध्य संन्यासकृतरक्षोऽर्चयेद्धरिम्॥ ४९"],"iast":["śuciḥ sammukhamāsīnaḥ prāṇasaṃyamanādibhiḥ|","piṇḍaṃ viśodhya saṃnyāsakṛtarakṣo'rcayeddharim|| 49"],"meaning":"पहले स्नानादिसे शरीर और सन्तोष आदिसे अन्तःकरणको शुद्ध करे, इसके बाद भगवान्‌की मूर्तिके सामने बैठकर प्राणायाम आदिके द्वारा भूतशुद्धि—नाडी-शोधन करे, तत्पश्‍चात् विधिपूर्वक मन्त्र, देवता आदिके न्याससे अंगरक्षा करके भगवान्‌की पूजा करे॥ ४९॥"},{"id":"11.3.50","number":50,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/50/","page":731,"speaker":"आविर्होत्र उवाच","sanskrit":["अर्चादौ हृदये चापि यथालब्धोपचारकैः।","द्रव्यक्षित्यात्मलिंगानि निष्पाद्य प्रोक्ष्य चासनम्॥ ५०"],"iast":["arcādau hṛdaye cāpi yathālabdhopacārakaiḥ|","dravyakṣityātmaliṃgāni niṣpādya prokṣya cāsanam|| 50"],"meaning":"पहले पुष्प आदि पदार्थोंका जन्तु आदि निकालकर, पृथ्वीको सम्मार्जन आदिसे, अपनेको अव्यग्र होकर और भगवान्‌की मूर्तिको पहलेहीकी पूजाके लगे हुए पदार्थोंके क्षालन आदिसे पूजाके योग्य बनाकर फिर आसनपर मन्त्रोच्चारणपूर्वक जल छिड़ककर पाद्य, अर्घ्य आदि पात्रोंको स्थापित करे। तदनन्तर एकाग्रचित्त होकर हृदयमें भगवान्‌का ध्यान करके फिर उसे सामनेकी श्रीमूर्तिमें चिन्तन करे। तदनन्तर हृदय, सिर, शिखा (हृदयाय नमः, शिरसे स्वाहा) इत्यादि मन्त्रोंसे न्यास करे और अपने इष्टदेवके मूलमन्त्रके द्वारा देश, काल आदिके अनुकूल प्राप्त पूजा-सामग्रीसे प्रतिमा आदिमें अथवा हृदयमें भगवान्‌की पूजा करे॥ ५०-५१॥","meaning_covers":[50,51]},{"id":"11.3.51","number":51,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/51/","page":731,"speaker":"आविर्होत्र उवाच","sanskrit":["पाद्यादीनुपकल्प्याथ सन्‍निधाप्य समाहितः।","हृदादिभिः कृतन्यासो मूलमन्त्रेण चार्चयेत्॥ ५१"],"iast":["pādyādīnupakalpyātha sannidhāpya samāhitaḥ|","hṛdādibhiḥ kṛtanyāso mūlamantreṇa cārcayet|| 51"],"meaning":"पहले पुष्प आदि पदार्थोंका जन्तु आदि निकालकर, पृथ्वीको सम्मार्जन आदिसे, अपनेको अव्यग्र होकर और भगवान्‌की मूर्तिको पहलेहीकी पूजाके लगे हुए पदार्थोंके क्षालन आदिसे पूजाके योग्य बनाकर फिर आसनपर मन्त्रोच्चारणपूर्वक जल छिड़ककर पाद्य, अर्घ्य आदि पात्रोंको स्थापित करे। तदनन्तर एकाग्रचित्त होकर हृदयमें भगवान्‌का ध्यान करके फिर उसे सामनेकी श्रीमूर्तिमें चिन्तन करे। तदनन्तर हृदय, सिर, शिखा (हृदयाय नमः, शिरसे स्वाहा) इत्यादि मन्त्रोंसे न्यास करे और अपने इष्टदेवके मूलमन्त्रके द्वारा देश, काल आदिके अनुकूल प्राप्त पूजा-सामग्रीसे प्रतिमा आदिमें अथवा हृदयमें भगवान्‌की पूजा करे॥ ५०-५१॥","meaning_covers":[50,51]},{"id":"11.3.52","number":52,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/52/","page":731,"speaker":"आविर्होत्र उवाच","sanskrit":["सांगोपांगां सपार्षदां तां तां मूर्तिं स्वमन्त्रतः।","पाद्यार्घ्याचमनीयाद्यैः स्नानवासोविभूषणैः॥ ५२"],"iast":["sāṃgopāṃgāṃ sapārṣadāṃ tāṃ tāṃ mūrtiṃ svamantrataḥ|","pādyārghyācamanīyādyaiḥ snānavāsovibhūṣaṇaiḥ|| 52"],"meaning":"अपने-अपने उपास्यदेवके विग्रहकी हृदयादि अंग, आयुधादि उपांग और पार्षदोंसहित उसके मूलमन्त्रद्वारा पाद्य, अर्घ्य, आचमन, मधुपर्क, स्नान, वस्त्र, आभूषण, गन्ध, पुष्प, दधि-अक्षतके तिलक, माला, धूप, दीप और नैवेद्य आदिसे विधिवत् पूजा करे तथा फिर स्तोत्रोंद्वारा स्तुति करके सपरिवार भगवान् श्रीहरिको नमस्कार करे॥ ५२-५३॥","meaning_covers":[52,53]},{"id":"11.3.53","number":53,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/53/","page":731,"speaker":"आविर्होत्र उवाच","sanskrit":["गन्धमाल्याक्षतस्रग्भिर्धूपदीपोपहारकैः ।","सांगं सम्पूज्य विधिवत् स्तवैः स्तुत्वा नमेद्धरिम्॥ ५३"],"iast":["gandhamālyākṣatasragbhirdhūpadīpopahārakaiḥ |","sāṃgaṃ sampūjya vidhivat stavaiḥ stutvā nameddharim|| 53"],"meaning":"अपने-अपने उपास्यदेवके विग्रहकी हृदयादि अंग, आयुधादि उपांग और पार्षदोंसहित उसके मूलमन्त्रद्वारा पाद्य, अर्घ्य, आचमन, मधुपर्क, स्नान, वस्त्र, आभूषण, गन्ध, पुष्प, दधि-अक्षतके तिलक, माला, धूप, दीप और नैवेद्य आदिसे विधिवत् पूजा करे तथा फिर स्तोत्रोंद्वारा स्तुति करके सपरिवार भगवान् श्रीहरिको नमस्कार करे॥ ५२-५३॥","meaning_covers":[52,53]},{"id":"11.3.54","number":54,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/54/","page":731,"speaker":"आविर्होत्र उवाच","sanskrit":["आत्मानं तन्मयं ध्यायन् मूर्तिं सम्पूजयेद्धरेः।","शेषामाधाय शिरसि स्वधाम्‍न्युद्वास्य सत्कृतम्॥ ५४"],"iast":["ātmānaṃ tanmayaṃ dhyāyan mūrtiṃ sampūjayeddhareḥ|","śeṣāmādhāya śirasi svadhāmnyudvāsya satkṛtam|| 54"],"meaning":"अपने-आपको भगवन्मय ध्यान करते हुए ही भगवान्‌की मूर्तिका पूजन करना चाहिये। निर्माल्यको अपने सिरपर रखे और आदरके साथ भगवद्विग्रहको यथास्थान स्थापित कर पूजा समाप्त करनी चाहिये॥ ५४॥"},{"id":"11.3.55","number":55,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/3/55/","page":731,"speaker":"आविर्होत्र उवाच","sanskrit":["एवम‌ग्‍न्यर्कतोयादावतिथौ हृदये च यः।","यजतीश्‍वरमात्मानमचिरान्मुच्यते हि सः॥ ५५"],"iast":["evamagnyarkatoyādāvatithau hṛdaye ca yaḥ|","yajatīśvaramātmānamacirānmucyate hi saḥ|| 55"],"meaning":"इस प्रकार जो पुरुष अग्‍नि, सूर्य, जल, अतिथि और अपने हृदयमें आत्मरूप श्रीहरिकी पूजा करता है, वह शीघ्र ही मुक्त हो जाता है॥ ५५॥"}],"text":[{"b":38532,"kind":"adhyaya_heading","page":721,"text":"अथ तृतीयोऽध्यायः"},{"b":38533,"kind":"topic_heading","page":721,"text":"माया, मायासे पार होनेके उपाय तथा ब्रह्म और कर्मयोगका निरूपण"},{"b":38534,"kind":"topic_heading","page":721,"text":"राजोवाच"},{"b":38535,"kind":"sanskrit_shloka","page":721,"verses":["11.3.1"],"text":"परस्य विष्णोरीशस्य मायिनामपि मोहिनीम्।"},{"b":38536,"kind":"sanskrit_shloka","page":721,"verses":["11.3.1"],"text":"मायां वेदितुमिच्छामो भगवन्तो ब्रुवन्तु नः॥ १"},{"b":38537,"kind":"hindi_commentary","page":721,"explains":["11.3.1"],"text":"राजा निमिने पूछा—भगवन्! सर्वशक्तिमान् परमकारण विष्णुभगवान्‌की माया बड़े-बड़े मायावियोंको भी मोहित कर देती है, उसे कोई पहचान नहीं पाता; (और आप कहते हैं कि भक्त उसे देखा करता है।) अतः अब मैं उस मायाका स्वरूप जानना चाहता हूँ, आपलोग कृपा करके बतलाइये॥ १॥"},{"b":38538,"kind":"sanskrit_shloka","page":722,"verses":["11.3.2"],"text":"नानुतृप्ये जुषन् युष्मद्वचो हरिकथामृतम्।"},{"b":38539,"kind":"sanskrit_shloka","page":722,"verses":["11.3.2"],"text":"संसारतापनिस्तप्तो मर्त्यस्तत्तापभेषजम्॥ २"},{"b":38540,"kind":"hindi_translation","page":722,"explains":["11.3.2"],"text":"योगीश्‍वरो! मैं एक मृत्युका शिकार मनुष्य हूँ। संसारके तरह-तरहके तापोंने मुझे बहुत दिनोंसे तपा रखा है। आपलोग जो भगवत्कथारूप अमृतका पान करा रहे हैं, वह उन तापोंको मिटानेकी एकमात्र ओषधि है; इसलिये मैं आपलोगोंकी इस वाणीका सेवन करते-करते तृप्त नहीं होता। आप कृपया और कहिये॥ २॥"},{"b":38541,"kind":"topic_heading","page":722,"text":"अन्तरिक्ष उवाच"},{"b":38542,"kind":"sanskrit_shloka","page":722,"verses":["11.3.3"],"text":"एभिर्भूतानि भूतात्मा महाभूतैर्महाभुज।"},{"b":38543,"kind":"sanskrit_shloka","page":722,"verses":["11.3.3"],"text":"ससर्जोच्चावचान्याद्यः स्वमात्रात्मप्रसिद्धये॥ ३"},{"b":38544,"kind":"hindi_commentary","page":722,"explains":["11.3.3"],"text":"अब तीसरे योगीश्‍वर अन्तरिक्षजीने कहा—राजन्! (भगवान्‌की माया स्वरूपतः अनिर्वचनीय है, इसलिये उसके कार्योंके द्वारा ही उसका निरूपण होता है।) आदि-पुरुष परमात्मा जिस शक्तिसे सम्पूर्ण भूतोंके कारण बनते हैं और उनके विषय-भोग तथा मोक्षकी सिद्धिके लिये अथवा अपने उपासकोंकी उत्कृष्ट सिद्धिके लिये स्वनिर्मित पंचभूतोंके द्वारा नाना प्रकारके देव, मनुष्य आदि शरीरोंकी सृष्टि करते हैं, उसीको माया कहते हैं॥ ३॥"},{"b":38545,"kind":"sanskrit_shloka","page":722,"verses":["11.3.4"],"text":"एवं सृष्टानि भूतानि प्रविष्टः पंचधातुभिः।"},{"b":38546,"kind":"sanskrit_shloka","page":722,"verses":["11.3.4"],"text":"एकधा दशधाऽऽत्मानं विभजंजुषते गुणान्॥ ४"},{"b":38547,"kind":"hindi_commentary","page":722,"explains":["11.3.4"],"text":"इस प्रकार पंचमहाभूतोंके द्वारा बने हुए प्राणि-शरीरोंमें उन्होंने अन्तर्यामीरूपसे प्रवेश किया और अपनेको ही पहले एक मनके रूपमें और इसके बाद पाँच ज्ञानेन्द्रिय तथा पाँच कर्मेन्द्रिय—इन दस रूपोंमें विभक्त कर दिया तथा उन्हींके द्वारा विषयोंका भोग कराने लगे॥ ४॥"},{"b":38548,"kind":"sanskrit_shloka","page":722,"verses":["11.3.5"],"text":"गुणैर्गुणान् स भुंजान आत्मप्रद्योतितैः प्रभुः।"},{"b":38549,"kind":"sanskrit_shloka","page":722,"verses":["11.3.5"],"text":"मन्यमान इदं सृष्टमात्मानमिह सज्जते॥ ५"},{"b":38550,"kind":"hindi_commentary","page":722,"explains":["11.3.5"],"text":"वह देहाभिमानी जीव अन्तर्यामीके द्वारा प्रकाशित इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंका भोग करता है और इस पंचभूतोंके द्वारा निर्मित शरीरको आत्मा—अपना स्वरूप मानकर उसीमें आसक्त हो जाता है। (यह भगवान्‌की माया है)॥ ५॥"},{"b":38551,"kind":"sanskrit_shloka","page":722,"verses":["11.3.6"],"text":"कर्माणि कर्मभिः कुर्वन् सनिमित्तानि देहभृत्।"},{"b":38552,"kind":"sanskrit_shloka","page":722,"verses":["11.3.6"],"text":"तत्तत् कर्मफलं गृह्णन् भ्रमतीह सुखेतरम्॥ ६"},{"b":38553,"kind":"hindi_commentary","page":722,"explains":["11.3.6"],"text":"अब वह कर्मेन्द्रियोंसे सकाम कर्म करता है और उनके अनुसार शुभ कर्मका फल सुख और अशुभ कर्मका फल दुःख भोग करने लगता है और शरीरधारी होकर इस संसारमें भटकने लगता है। यह भगवान्‌की माया है॥ ६॥"},{"b":38554,"kind":"sanskrit_shloka","page":722,"verses":["11.3.7"],"text":"इत्थं कर्मगतीर्गच्छन् बह्वभद्रवहाः पुमान्।"},{"b":38555,"kind":"sanskrit_shloka","page":722,"verses":["11.3.7"],"text":"आभूतसम्प्लवात् सर्गप्रलयावश्‍नुतेऽवशः॥ ७"},{"b":38556,"kind":"hindi_commentary","page":722,"explains":["11.3.7"],"text":"इस प्रकार यह जीव ऐसी अनेक अमंगलमय कर्मगतियोंको, उनके फलोंको प्राप्त होता है और महाभूतोंके प्रलयपर्यन्त विवश होकर जन्मके बाद मृत्यु और मृत्युके बाद जन्मको प्राप्त होता रहता है—यह भगवान्‌की माया है॥ ७॥"},{"b":38557,"kind":"sanskrit_shloka","page":723,"verses":["11.3.8"],"text":"धातूपप्लव आसन्‍ने व्यक्तं द्रव्यगुणात्मकम्।"},{"b":38558,"kind":"sanskrit_shloka","page":723,"verses":["11.3.8"],"text":"अनादिनिधनः कालो ह्यव्यक्तायापकर्षति॥ ८"},{"b":38559,"kind":"sanskrit_shloka","page":723,"verses":["11.3.9"],"text":"शतवर्षा ह्यनावृष्टिर्भविष्यत्युल्बणा भुवि।"},{"b":38560,"kind":"sanskrit_shloka","page":723,"verses":["11.3.9"],"text":"तत्कालोपचितोष्णार्को लोकांस्त्रीन् प्रतपिष्यति॥ ९"},{"b":38561,"kind":"sanskrit_shloka","page":723,"verses":["11.3.10"],"text":"पातालतलमारभ्य संकर्षणमुखानलः।"},{"b":38562,"kind":"sanskrit_shloka","page":723,"verses":["11.3.10"],"text":"दहन्‍नूर्ध्वशिखो विष्वग् वर्धते वायुनेरितः॥ १०"},{"b":38563,"kind":"sanskrit_shloka","page":723,"verses":["11.3.11"],"text":"सांवर्तको मेघगणो वर्षति स्म शतं समाः।"},{"b":38564,"kind":"sanskrit_shloka","page":723,"verses":["11.3.11"],"text":"धाराभिर्हस्तिहस्ताभिर्लीयते सलिले विराट्॥ ११"},{"b":38565,"kind":"sanskrit_shloka","page":723,"verses":["11.3.12"],"text":"ततो विराजमुत्सृज्य वैराजः पुरुषो नृप।"},{"b":38566,"kind":"sanskrit_shloka","page":723,"verses":["11.3.12"],"text":"अव्यक्तं विशते सूक्ष्मं निरिन्धन इवानलः॥ १२"},{"b":38567,"kind":"sanskrit_shloka","page":723,"verses":["11.3.13"],"text":"वायुना हृतगन्धा भूः सलिलत्वाय कल्पते।"},{"b":38568,"kind":"sanskrit_shloka","page":723,"verses":["11.3.13"],"text":"सलिलं तद‍्धृतरसं ज्योतिष्ट्वायोपकल्पते॥ १३"},{"b":38569,"kind":"sanskrit_shloka","page":723,"verses":["11.3.14"],"text":"हृतरूपं तु तमसा वायौ ज्योतिः प्रलीयते।"},{"b":38570,"kind":"sanskrit_shloka","page":723,"verses":["11.3.14"],"text":"हृतस्पर्शोऽवकाशेन वायुर्नभसि लीयते॥ १४"},{"b":38571,"kind":"sanskrit_shloka","page":723,"verses":["11.3.15"],"text":"कालात्मना हृतगुणं नभ आत्मनि लीयते।"},{"b":38572,"kind":"sanskrit_shloka","page":723,"verses":["11.3.15"],"text":"इन्द्रियाणि मनो बुद्धिः सह वैकारिकैर्नृप।"},{"b":38573,"kind":"sanskrit_shloka","page":723,"verses":["11.3.15"],"text":"प्रविशन्ति ह्यहंकारं स्वगुणैरहमात्मनि॥ १५"},{"b":38574,"kind":"hindi_commentary","page":723,"explains":["11.3.8","11.3.9","11.3.10","11.3.11","11.3.12","11.3.13","11.3.14","11.3.15"],"text":"जब पंचभूतोंके प्रलयका समय आता है, तब अनादि और अनन्त काल स्थूल तथा सूक्ष्म द्रव्य एवं गुणरूप इस समस्त व्यक्त सृष्टिको अव्यक्तकी ओर, उसके मूल कारणकी ओर खींचता है—यह भगवान्‌की माया है॥ ८॥ उस समय पृथ्वीपर लगातार सौ वर्षतक भयंकर सूखा पड़ता है, वर्षा बिलकुल नहीं होती; प्रलयकालकी शक्तिसे सूर्यकी उष्णता और भी बढ़ जाती है तथा वे तीनों लोकोंको तपाने लगते हैं—यह भगवान्‌की माया है॥ ९॥ उस समय शेषनाग—संकर्षणके मुँहसे आगकी प्रचण्ड लपटें निकलती हैं और वायुकी प्रेरणासे वे लपटें पाताललोकसे जलाना आरम्भ करती हैं तथा और भी ऊँची-ऊँची होकर चारों ओर फैल जाती हैं—यह भगवान्‌की माया है॥ १०॥ इसके बाद प्रलयकालीन सांवर्तक मेघगण हाथीकी सूँडके समान मोटी-मोटी धाराओंसे सौ वर्षतक बरसता रहता है। उससे यह विराट् ब्रह्माण्ड जलमें डूब जाता है—यह भगवान्‌की माया है॥ ११॥ राजन्! उस समय जैसे बिना ईंधनके आग बुझ जाती है, वैसे ही विराट् पुरुष ब्रह्मा अपने ब्रह्माण्ड-शरीरको छोड़कर सूक्ष्मस्वरूप अव्यक्तमें लीन हो जाते हैं—यह भगवान्‌की माया है॥ १२॥ वायु पृथ्वीकी गन्ध खींच लेती है, जिससे वह जलके रूपमें हो जाती है और जब वही वायु जलके रसको खींच लेती है, तब वह जल अपना कारण अग्‍नि बन जाता है—यह भगवान्‌की माया है॥ १३॥ जब अन्धकार अग्‍निका रूप छीन लेता है, तब वह अग्‍नि वायुमें लीन हो जाती है और जब अवकाशरूप आकाश वायुकी स्पर्श-शक्ति छीन लेता है, तब वह आकाशमें लीन हो जाता है—यह भगवान्‌की माया है॥ १४॥ राजन्! तदनन्तर कालरूप ईश्‍वर आकाशके शब्द गुणको हरण कर लेता है जिससे वह तामस अहंकारमें लीन हो जाता है। इन्द्रियाँ और बुद्धि राजस अहंकारमें लीन होती हैं। मन सात्त्विक अहंकारसे उत्पन्‍न देवताओंके साथ सात्त्विक अहंकारमें प्रवेश कर जाता है तथा अपने तीन प्रकारके कार्योंके साथ अहंकार महत्तत्त्वमें लीन हो जाता है। महत्तत्त्व प्रकृतिमें और प्रकृति ब्रह्ममें लीन होती है। फिर इसीके उलटे क्रमसे सृष्टि होती है—यह भगवान्‌की माया है॥ १५॥"},{"b":38575,"kind":"sanskrit_shloka","page":724,"verses":["11.3.16"],"text":"एषा माया भगवतः सर्गस्थित्यन्तकारिणी।"},{"b":38576,"kind":"sanskrit_shloka","page":724,"verses":["11.3.16"],"text":"त्रिवर्णा वर्णितास्माभिः किं भूयः श्रोतुमिच्छसि॥ १६"},{"b":38577,"kind":"hindi_translation","page":724,"explains":["11.3.16"],"text":"यह सृष्टि, स्थिति और संहार करनेवाली त्रिगुणमयी माया है। इसका हमने आपसे वर्णन किया। अब आप और क्या सुनना चाहते हैं?॥ १६॥"},{"b":38578,"kind":"topic_heading","page":724,"text":"राजोवाच"},{"b":38579,"kind":"sanskrit_shloka","page":724,"verses":["11.3.17"],"text":"यथैतामैश्‍वरीं मायां दुस्तरामकृतात्मभिः।"},{"b":38580,"kind":"sanskrit_shloka","page":724,"verses":["11.3.17"],"text":"तरन्त्यंजः स्थूलधियो महर्ष इदमुच्यताम्॥ १७"},{"b":38581,"kind":"hindi_commentary","page":724,"explains":["11.3.17"],"text":"राजा निमिने पूछा—महर्षिजी! इस भगवान्‌की मायाको पार करना उन लोगोंके लिये तो बहुत ही कठिन है, जो अपने मनको वशमें नहीं कर पाये हैं। अब आप कृपा करके यह बताइये कि जो लोग शरीर आदिमें आत्मबुद्धि रखते हैं तथा जिनकी समझ मोटी है, वे भी अनायास ही इसे कैसे पार कर सकते हैं?॥ १७॥"},{"b":38582,"kind":"topic_heading","page":724,"text":"प्रबुद्ध उवाच"},{"b":38583,"kind":"sanskrit_shloka","page":724,"verses":["11.3.18"],"text":"कर्माण्यारभमाणानां दुःखहत्यै सुखाय च।"},{"b":38584,"kind":"sanskrit_shloka","page":724,"verses":["11.3.18"],"text":"पश्येत् पाकविपर्यासं मिथुनीचारिणां नृणाम्॥ १८"},{"b":38585,"kind":"sanskrit_shloka","page":724,"verses":["11.3.19"],"text":"नित्यार्तिदेन वित्तेन दुर्लभेनात्ममृत्युना।"},{"b":38586,"kind":"sanskrit_shloka","page":724,"verses":["11.3.19"],"text":"गृहापत्याप्तपशुभिः का प्रीतिः साधितैश्‍चलैः॥ १९"},{"b":38587,"kind":"sanskrit_shloka","page":724,"verses":["11.3.20"],"text":"एवं लोकं परं विद्यान्‍नश्‍वरं कर्मनिर्मितम्।"},{"b":38588,"kind":"sanskrit_shloka","page":724,"verses":["11.3.20"],"text":"सतुल्यातिशयध्वंसं यथा मण्डलवर्तिनाम्॥ २०"},{"b":38589,"kind":"hindi_commentary","page":724,"explains":["11.3.18","11.3.19","11.3.20"],"text":"अब चौथे योगीश्‍वर प्रबुद्धजी बोले—राजन्! स्त्री-पुरुष-सम्बन्ध आदि बन्धनोंमें बँधे हुए संसारी मनुष्य सुखकी प्राप्ति और दुःखकी निवृत्तिके लिये बड़े-बड़े कर्म करते रहते हैं। जो पुरुष मायाके पार जाना चाहता है, उसको विचार करना चाहिये कि उनके कर्मोंका फल किस प्रकार विपरीत होता जाता है। वे सुखके बदले दुःख पाते हैं और दुःख-निवृत्तिके स्थानपर दिनोंदिन दुःख बढ़ता ही जाता है॥ १८॥ एक धनको ही लो। इससे दिन-पर-दिन दुःख बढ़ता ही है, इसको पाना भी कठिन है और यदि किसी प्रकार मिल भी जाय तो आत्माके लिये तो यह मृत्युस्वरूप ही है। जो इसकी उलझनोंमें पड़ जाता है, वह अपने-आपको भूल जाता है। इसी प्रकार घर, पुत्र, स्वजन-सम्बन्धी, पशुधन आदि भी अनित्य और नाशवान् ही हैं; यदि कोई इन्हें जुटा भी ले तो इनसे क्या सुख-शान्ति मिल सकती है?॥ १९॥ इसी प्रकार जो मनुष्य मायासे पार जाना चाहता है, उसे यह भी समझ लेना चाहिये कि मरनेके बाद प्राप्त होनेवाले लोक-परलोक भी ऐसे ही नाशवान् हैं। क्योंकि इस लोककी वस्तुओंके समान वे भी कुछ सीमित कर्मोंके सीमित फलमात्र हैं। वहाँ भी पृथ्वीके छोटे-छोटे राजाओंके समान बराबरवालोंसे होड़ अथवा लाग-डाँट रहती है, अधिक ऐश्‍वर्य और सुखवालोंके प्रति छिद्रान्वेषण तथा ईर्ष्या-द्वेषका भाव रहता है, कम सुख और ऐश्‍वर्यवालोंके प्रति घृणा रहती है एवं कर्मोंका फल पूरा हो जानेपर वहाँसे पतन तो होता ही है। उसका नाश निश्‍चित है। नाशका भय वहाँ भी नहीं छूट पाता॥ २०॥"},{"b":38590,"kind":"sanskrit_shloka","page":725,"verses":["11.3.21"],"text":"तस्माद् गुरुं प्रपद्येत जिज्ञासुः श्रेय उत्तमम्।"},{"b":38591,"kind":"sanskrit_shloka","page":725,"verses":["11.3.21"],"text":"शाब्दे परे च निष्णातं ब्रह्मण्युपशमाश्रयम्॥ २१"},{"b":38592,"kind":"hindi_translation","page":725,"explains":["11.3.21"],"text":"इसलिये जो परम कल्याणका जिज्ञासु हो, उसे गुरुदेवकी शरण लेनी चाहिये। गुरुदेव ऐसे हों, जो शब्दब्रह्म—वेदोंके पारदर्शी विद्वान् हों, जिससे वे ठीक-ठीक समझा सकें; और साथ ही परब्रह्ममें परिनिष्ठित तत्त्वज्ञानी भी हों, ताकि अपने अनुभवके द्वारा प्राप्त हुई रहस्यकी बातोंको बता सकें। उनका चित्त शान्त हो, व्यवहारके प्रपंचमें विशेष प्रवृत्त न हो॥ २१॥"},{"b":38593,"kind":"sanskrit_shloka","page":725,"verses":["11.3.22"],"text":"तत्र भागवतान् धर्मान् शिक्षेद् गुर्वात्मदैवतः।"},{"b":38594,"kind":"sanskrit_shloka","page":725,"verses":["11.3.22"],"text":"अमाययानुवृत्त्या यैस्तुष्येदात्माऽऽत्मदो हरिः॥ २२"},{"b":38595,"kind":"hindi_translation","page":725,"explains":["11.3.22"],"text":"जिज्ञासुको चाहिये कि गुरुको ही अपना परम प्रियतम आत्मा और इष्टदेव माने। उनकी निष्कपटभावसे सेवा करे और उनके पास रहकर भागवतधर्मकी—भगवान्‌को प्राप्त करानेवाले भक्ति-भावके साधनोंकी क्रियात्मक शिक्षा ग्रहण करे। इन्हीं साधनोंसे सर्वात्मा एवं भक्तको अपने आत्माका दान करनेवाले भगवान् प्रसन्‍न होते हैं॥ २२॥"},{"b":38596,"kind":"sanskrit_shloka","page":725,"verses":["11.3.23"],"text":"सर्वतो मनसोऽसंगमादौ संगं च साधुषु।"},{"b":38597,"kind":"sanskrit_shloka","page":725,"verses":["11.3.23"],"text":"दयां मैत्रीं प्रश्रयं च भूतेष्वद्धा यथोचितम्॥ २३"},{"b":38598,"kind":"hindi_translation","page":725,"explains":["11.3.23"],"text":"पहले शरीर, सन्तान आदिमें मनकी अनासक्ति सीखे। फिर भगवान्‌के भक्तोंसे प्रेम कैसा करना चाहिये—यह सीखे। इसके पश्‍चात् प्राणियोंके प्रति यथायोग्य दया, मैत्री और विनयकी निष्कपट भावसे शिक्षा ग्रहण करे॥ २३॥"},{"b":38599,"kind":"sanskrit_shloka","page":725,"verses":["11.3.24"],"text":"शौचं तपस्तितिक्षां च मौनं स्वाध्यायमार्जवम्।"},{"b":38600,"kind":"sanskrit_shloka","page":725,"verses":["11.3.24"],"text":"ब्रह्मचर्यमहिंसां च समत्वं द्वन्द्वसंज्ञयोः॥ २४"},{"b":38601,"kind":"hindi_translation","page":725,"explains":["11.3.24"],"text":"मिट्टी, जल आदिसे बाह्य शरीरकी पवित्रता, छल-कपट आदिके त्यागसे भीतरकी पवित्रता, अपने धर्मका अनुष्ठान, सहनशक्ति, मौन, स्वाध्याय, सरलता, ब्रह्मचर्य, अहिंसा तथा शीत-उष्ण, सुख-दुःख आदि द्वन्द्वोंमें हर्ष-विषादसे रहित होना सीखे॥ २४॥"},{"b":38602,"kind":"sanskrit_shloka","page":725,"verses":["11.3.25"],"text":"सर्वत्रात्मेश्‍वरान्वीक्षां कैवल्यमनिकेतताम्।"},{"b":38603,"kind":"sanskrit_shloka","page":725,"verses":["11.3.25"],"text":"विविक्तचीरवसनं सन्तोषं येन केनचित्॥ २५"},{"b":38604,"kind":"hindi_commentary","page":725,"explains":["11.3.25"],"text":"सर्वत्र अर्थात् समस्त देश, काल और वस्तुओंमें चेतनरूपसे आत्मा और नियन्तारूपसे ईश्‍वरको देखना, एकान्तसेवन, ‘यही मेरा घर है’—ऐसा भाव न रखना, गृहस्थ हो तो पवित्र वस्त्र पहनना और त्यागी हो तो फटे-पुराने पवित्र चिथड़े, जो कुछ प्रारब्धके अनुसार मिल जाय, उसीमें सन्तोष करना सीखे॥ २५॥"},{"b":38605,"kind":"sanskrit_shloka","page":726,"verses":["11.3.26"],"text":"श्रद्धां भागवते शास्त्रेऽनिन्दामन्यत्र चापि हि।"},{"b":38606,"kind":"sanskrit_shloka","page":726,"verses":["11.3.26"],"text":"मनोवाक्कर्मदण्डं च सत्यं शमदमावपि॥ २६"},{"b":38607,"kind":"hindi_commentary","page":726,"explains":["11.3.26"],"text":"भगवान्‌की प्राप्तिका मार्ग बतलानेवाले शास्त्रोंमें श्रद्धा और दूसरे किसी भी शास्त्रकी निन्दा न करना, प्राणायामके द्वारा मनका, मौनके द्वारा वाणीका और वासनाहीनताके अभ्याससे कर्मोंका संयम करना, सत्य बोलना, इन्द्रियोंको अपने-अपने गोलकोंमें स्थिर रखना और मनको कहीं बाहर न जाने देना सीखे॥ २६॥"},{"b":38608,"kind":"sanskrit_shloka","page":726,"verses":["11.3.27"],"text":"श्रवणं कीर्तनं ध्यानं हरेरद्भुतकर्मणः।"},{"b":38609,"kind":"sanskrit_shloka","page":726,"verses":["11.3.27"],"text":"जन्मकर्मगुणानां च तदर्थेऽखिलचेष्टितम्॥ २७"},{"b":38610,"kind":"hindi_translation","page":726,"explains":["11.3.27"],"text":"राजन्! भगवान्‌की लीलाएँ अद्भुत हैं। उनके जन्म, कर्म और गुण दिव्य हैं। उन्हींका श्रवण, कीर्तन और ध्यान करना तथा शरीरसे जितनी भी चेष्टाएँ हों, सब भगवान्‌के लिये करना सीखे॥ २७॥"},{"b":38611,"kind":"sanskrit_shloka","page":726,"verses":["11.3.28"],"text":"इष्टं दत्तं तपो जप्तं वृत्तं यच्चात्मनः प्रियम्।"},{"b":38612,"kind":"sanskrit_shloka","page":726,"verses":["11.3.28"],"text":"दारान् सुतान् गृहान् प्राणान् यत् परस्मै निवेदनम्॥ २८"},{"b":38613,"kind":"hindi_translation","page":726,"explains":["11.3.28"],"text":"यज्ञ, दान, तप अथवा जप, सदाचारका पालन और स्त्री, पुत्र, घर, अपना जीवन, प्राण तथा जो कुछ अपनेको प्रिय लगता हो—सब-का-सब भगवान्‌के चरणोंमें निवेदन करना उन्हें सौंप देना सीखे॥ २८॥"},{"b":38614,"kind":"sanskrit_shloka","page":726,"verses":["11.3.29"],"text":"एवं कृष्णात्मनाथेषु मनुष्येषु च सौहृदम्।"},{"b":38615,"kind":"sanskrit_shloka","page":726,"verses":["11.3.29"],"text":"परिचर्यां चोभयत्र महत्सु नृषु साधुषु॥ २९"},{"b":38616,"kind":"hindi_translation","page":726,"explains":["11.3.29"],"text":"जिन संत पुरुषोंने सच्चिदानन्दस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णका अपने आत्मा और स्वामीके रूपमें साक्षात्कार कर लिया हो, उनसे प्रेम और स्थावर, जंगम दोनों प्रकारके प्राणियोंकी सेवा; विशेष करके मनुष्योंकी, मनुष्योंमें भी परोपकारी सज्जनोंकी और उनमें भी भगवत्प्रेमी संतोंकी करना सीखे॥ २९॥"},{"b":38617,"kind":"sanskrit_shloka","page":726,"verses":["11.3.30"],"text":"परस्परानुकथनं पावनं भगवद्यशः।"},{"b":38618,"kind":"sanskrit_shloka","page":726,"verses":["11.3.30"],"text":"मिथो रतिर्मिथस्तुष्टिर्निवृत्तिर्मिथ आत्मनः॥ ३०"},{"b":38619,"kind":"hindi_translation","page":726,"explains":["11.3.30"],"text":"भगवान्‌के परम पावन यशके सम्बन्धमें ही एक-दूसरेसे बातचीत करना और इस प्रकारके साधकोंका इकट्ठे होकर आपसमें प्रेम करना, आपसमें सन्तुष्ट रहना और प्रपंचसे निवृत्त होकर आपसमें ही आध्यात्मिक शान्तिका अनुभव करना सीखे॥ ३०॥"},{"b":38620,"kind":"sanskrit_shloka","page":726,"verses":["11.3.31"],"text":"स्मरन्तः स्मारयन्तश्‍च मिथोऽघौघहरं हरिम्।"},{"b":38621,"kind":"sanskrit_shloka","page":726,"verses":["11.3.31"],"text":"भक्त्या संजातया भक्त्या बिभ्रत्युत्पुलकां तनुम्॥ ३१"},{"b":38622,"kind":"hindi_translation","page":726,"explains":["11.3.31"],"text":"राजन्! श्रीकृष्ण राशि-राशि पापोंको एक क्षणमें भस्म कर देते हैं। सब उन्हींका स्मरण करें और एक-दूसरेको स्मरण करावें। इस प्रकार साधन-भक्तिका अनुष्ठान करते-करते प्रेम-भक्तिका उदय हो जाता है और वे प्रेमोद्रेकसे पुलकित-शरीर धारण करते हैं॥ ३१॥"},{"b":38623,"kind":"hindi_commentary","page":727,"verses":["11.3.32"],"text":"क्वचिद् रुदन्त्यच्युतचिन्तया क्वचि-"},{"b":38624,"kind":"sanskrit_shloka","page":727,"verses":["11.3.32"],"text":"द्धसन्ति नन्दन्ति वदन्त्यलौकिकाः।"},{"b":38625,"kind":"hindi_commentary","page":727,"verses":["11.3.32"],"text":"नृत्यन्ति गायन्त्यनुशीलयन्त्यजं"},{"b":38626,"kind":"sanskrit_shloka","page":727,"verses":["11.3.32"],"text":"भवन्ति तूष्णीं परमेत्य निर्वृताः॥ ३२"},{"b":38627,"kind":"sanskrit_shloka","page":727,"verses":["11.3.33"],"text":"इति भागवतान् धर्मान् शिक्षन् भक्त्या तदुत्थया।"},{"b":38628,"kind":"sanskrit_shloka","page":727,"verses":["11.3.33"],"text":"नारायणपरो मायामंजस्तरति दुस्तराम्॥ ३३"},{"b":38629,"kind":"hindi_translation","page":727,"explains":["11.3.32","11.3.33"],"text":"उनके हृदयकी बड़ी विलक्षण स्थिति होती है। कभी-कभी वे इस प्रकार चिन्ता करने लगते हैं कि अबतक भगवान् नहीं मिले, क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, किसे पूछूँ, कौन मुझे उनकी प्राप्ति करावे? इस तरह सोचते-सोचते वे रोने लगते हैं तो कभी भगवान्‌की लीलाकी स्फूर्ति हो जानेसे ऐसा देखकर कि परमैश्‍वर्यशाली भगवान् गोपियोंके डरसे छिपे हुए हैं, खिलखिलाकर हँसने लगते हैं। कभी-कभी उनके प्रेम और दर्शनकी अनुभूतिसे आनन्दम‌ग्‍न हो जाते हैं तो कभी लोकातीत भावमें स्थित होकर भगवान्‌के साथ बातचीत करने लगते हैं। कभी मानो उन्हें सुना रहे हों, इस प्रकार उनके गुणोंका गान छेड़ देते हैं और कभी नाच-नाचकर उन्हें रिझाने लगते हैं। कभी-कभी उन्हें अपने पास न पाकर इधर-उधर ढूँढ़ने लगते हैं तो कभी-कभी उनसे एक होकर, उनकी सन्‍निधिमें स्थित होकर परम शान्तिका अनुभव करते और चुप हो जाते हैं॥ ३२॥ राजन्! जो इस प्रकार भागवतधर्मोंकी शिक्षा ग्रहण करता है, उसे उनके द्वारा प्रेम-भक्तिकी प्राप्ति हो जाती है और वह भगवान् नारायणके परायण होकर उस मायाको अनायास ही पार कर जाता है, जिसके पंजेसे निकलना बहुत ही कठिन है॥ ३३॥"},{"b":38630,"kind":"topic_heading","page":727,"text":"राजोवाच"},{"b":38631,"kind":"sanskrit_shloka","page":727,"verses":["11.3.34"],"text":"नारायणाभिधानस्य ब्रह्मणः परमात्मनः।"},{"b":38632,"kind":"sanskrit_shloka","page":727,"verses":["11.3.34"],"text":"निष्ठामर्हथ नो वक्तुं यूयं हि ब्रह्मवित्तमाः॥ ३४"},{"b":38633,"kind":"hindi_translation","page":727,"explains":["11.3.34"],"text":"राजा निमिने पूछा—महर्षियो! आपलोग परमात्माका वास्तविक स्वरूप जाननेवालोंमें सर्वश्रेष्ठ हैं। इसलिये मुझे यह बतलाइये कि जिस परब्रह्म परमात्माका ‘नारायण’ नामसे वर्णन किया जाता है, उनका स्वरूप क्या है?॥ ३४॥"},{"b":38634,"kind":"topic_heading","page":727,"text":"पिप्पलायन उवाच"},{"b":38635,"kind":"hindi_commentary","page":727,"verses":["11.3.35"],"text":"स्थित्युद्भवप्रलयहेतुरहेतुरस्य"},{"b":38636,"kind":"sanskrit_shloka","page":727,"verses":["11.3.35"],"text":"यत् स्वप्नजागरसुषुप्तिषु सद् बहिश्‍च।"},{"b":38637,"kind":"hindi_commentary","page":727,"verses":["11.3.35"],"text":"देहेन्द्रियासुहृदयानि चरन्ति येन"},{"b":38638,"kind":"sanskrit_shloka","page":727,"verses":["11.3.35"],"text":"संजीवितानि तदवेहि परं नरेन्द्र॥ ३५"},{"b":38639,"kind":"hindi_commentary","page":728,"verses":["11.3.36"],"text":"नैतन्मनो विशति वागुत चक्षुरात्मा"},{"b":38640,"kind":"sanskrit_shloka","page":728,"verses":["11.3.36"],"text":"प्राणेन्द्रियाणि च यथानलमर्चिषः स्वाः।"},{"b":38641,"kind":"hindi_commentary","page":728,"verses":["11.3.36"],"text":"शब्दोऽपि बोधकनिषेधतयाऽऽत्ममूल-"},{"b":38642,"kind":"sanskrit_shloka","page":728,"verses":["11.3.36"],"text":"मर्थोक्तमाह यदृते न निषेधसिद्धिः॥ ३६"},{"b":38643,"kind":"hindi_commentary","page":728,"verses":["11.3.37"],"text":"सत्त्वं रजस्तम इति त्रिवृदेकमादौ"},{"b":38644,"kind":"sanskrit_shloka","page":728,"verses":["11.3.37"],"text":"सूत्रं महानहमिति प्रवदन्ति जीवम्।"},{"b":38645,"kind":"hindi_commentary","page":728,"verses":["11.3.37"],"text":"ज्ञानक्रियार्थफलरूपतयोरुशक्ति"},{"b":38646,"kind":"sanskrit_shloka","page":728,"verses":["11.3.37"],"text":"ब्रह्मैव भाति सदसच्च तयोः परं यत्॥ ३७"},{"b":38647,"kind":"hindi_commentary","page":728,"verses":["11.3.38"],"text":"नात्मा जजान न मरिष्यति नैधतेऽसौ"},{"b":38648,"kind":"sanskrit_shloka","page":728,"verses":["11.3.38"],"text":"न क्षीयते सवनविद् व्यभिचारिणां हि।"},{"b":38649,"kind":"hindi_commentary","page":728,"verses":["11.3.38"],"text":"सर्वत्र शश्‍वदनपाय्युपलब्धिमात्रं"},{"b":38650,"kind":"sanskrit_shloka","page":728,"verses":["11.3.38"],"text":"प्राणो यथेन्द्रियबलेन विकल्पितं सत्॥ ३८"},{"b":38651,"kind":"hindi_commentary","page":727,"explains":["11.3.35","11.3.36","11.3.37","11.3.38"],"text":"अब पाँचवें योगीश्‍वर पिप्पलायनजीने कहा—राजन्! जो इस संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका निमित्त-कारण और उपादान-कारण दोनों ही है, बननेवाला भी है और बनानेवाला भी—परन्तु स्वयं कारणरहित है; जो स्वप्न, जाग्रत् और सुषुप्ति अवस्थाओंमें उनके साक्षीके रूपमें विद्यमान रहता है और उनके अतिरिक्त समाधिमें भी ज्यों-का-त्यों एकरस रहता है; जिसकी सत्तासे ही सत्ता-वान् होकर शरीर, इन्द्रिय, प्राण और अन्तःकरण अपना-अपना काम करनेमें समर्थ होते हैं, उसी परम सत्य वस्तुको आप ‘नारायण’ समझिये॥ ३५॥ जैसे चिनगारियाँ न तो अग्‍निको प्रकाशित ही कर सकती हैं और न जला ही सकती हैं, वैसे ही उस परमतत्त्वमें—आत्मस्वरूपमें न तो मनकी गति है और न वाणीकी, नेत्र उसे देख नहीं सकते और बुद्धि सोच नहीं सकती, प्राण और इन्द्रियाँ तो उसके पासतक नहीं फटक पातीं। ‘नेति-नेति’—इत्यादि श्रुतियोंके शब्द भी वह यह है—इस रूपमें उसका वर्णन नहीं करते, बल्कि उसको बोध करानेवाले जितने भी साधन हैं, उनका निषेध करके तात्पर्यरूपसे अपना मूल—निषेधका मूल लक्षित करा देते हैं; क्योंकि यदि निषेधके आधारकी, आत्माकी सत्ता न हो तो निषेध कौन कर रहा है, निषेधकी वृत्ति किसमें है—इन प्रश्‍नोंका कोई उत्तर ही न रहे, निषेधकी ही सिद्धि न हो॥ ३६॥ जब सृष्टि नहीं थी, तब केवल एक वही था। सृष्टिका निरूपण करनेके लिये उसीको त्रिगुण (सत्त्व-रज-तम)-मयी प्रकृति कहकर वर्णन किया गया। फिर उसीको ज्ञानप्रधान होनेसे महत्तत्त्व, क्रियाप्रधान होनेसे सूत्रात्मा और जीवकी उपाधि होनेसे अहंकारके रूपमें वर्णन किया गया। वास्तवमें जितनी भी शक्तियाँ हैं—चाहे वे इन्द्रियोंके अधिष्ठातृ-देवताओंके रूपमें हों, चाहे इन्द्रियोंके, उनके विषयोंके अथवा विषयोंके प्रकाशके रूपमें हों—सब-का-सब वह ब्रह्म ही है; क्योंकि ब्रह्मकी शक्ति अनन्त है। कहाँतक कहूँ? जो कुछ दृश्य-अदृश्य, कार्य-कारण, सत्य और असत्य है—सब कुछ ब्रह्म है। इनसे परे जो कुछ है, वह भी ब्रह्म ही है॥ ३७॥ वह ब्रह्मस्वरूप आत्मा न तो कभी जन्म लेता है और न मरता है। वह न तो बढ़ता है और न घटता ही है। जितने भी परिवर्तनशील पदार्थ हैं—चाहे वे क्रिया, संकल्प और उनके अभावके रूपमें ही क्यों न हों—सबकी भूत, भविष्यत् और वर्तमान सत्ताका वह साक्षी है। सबमें है। देश, काल और वस्तुसे अपरिच्छिन्‍न है, अविनाशी है। वह उपलब्धि करनेवाला अथवा उपलब्धिका विषय नहीं है। केवल उपलब्धिस्वरूप—ज्ञानस्वरूप है। जैसे प्राण तो एक ही रहता है, परन्तु स्थानभेदसे उसके अनेक नाम हो जाते हैं—वैसे ही ज्ञान एक होनेपर भी इन्द्रियोंके सहयोगसे उसमें अनेकताकी कल्पना हो जाती है॥ ३८॥"},{"b":38652,"kind":"hindi_commentary","page":729,"verses":["11.3.39"],"text":"अण्डेषु पेशिषु तरुष्वविनिश्‍चितेषु"},{"b":38653,"kind":"sanskrit_shloka","page":729,"verses":["11.3.39"],"text":"प्राणो हि जीवमुपधावति तत्र तत्र।"},{"b":38654,"kind":"hindi_commentary","page":729,"verses":["11.3.39"],"text":"सन्‍ने यदिन्द्रियगणेऽहमि च प्रसुप्ते"},{"b":38655,"kind":"sanskrit_shloka","page":729,"verses":["11.3.39"],"text":"कूटस्थ आशयमृते तदनुस्मृतिर्नः॥ ३९"},{"b":38656,"kind":"hindi_commentary","page":729,"verses":["11.3.40"],"text":"यर्ह्यब्जनाभचरणैषणयोरुभक्त्या"},{"b":38657,"kind":"sanskrit_shloka","page":729,"verses":["11.3.40"],"text":"चेतोमलानि विधमेद् गुणकर्मजानि।"},{"b":38658,"kind":"hindi_commentary","page":729,"verses":["11.3.40"],"text":"तस्मिन् विशुद्ध उपलभ्यत आत्मतत्त्वं"},{"b":38659,"kind":"sanskrit_shloka","page":729,"verses":["11.3.40"],"text":"साक्षाद् यथामलदृशोः सवितृप्रकाशः॥ ४०"},{"b":38660,"kind":"hindi_translation","page":729,"explains":["11.3.39","11.3.40"],"text":"जगत‍्में चार प्रकारके जीव होते हैं—अंडा फोड़कर पैदा होनेवाले पक्षी-साँप आदि, नालमें बँधे पैदा होनेवाले पशु-मनुष्य, धरती फोड़कर निकलनेवाले वृक्ष-वनस्पति और पसीनेसे उत्पन्‍न होनेवाले खटमल आदि। इन सभी जीव-शरीरोंमें प्राणशक्ति जीवके पीछे लगी रहती है। शरीरोंके भिन्‍न-भिन्‍न होनेपर भी प्राण एक ही रहता है। सुषुप्ति-अवस्थामें जब इन्द्रियाँ निश्‍चेष्ट हो जाती हैं, अहंकार भी सो जाता है—लीन हो जाता है, अर्थात् लिंगशरीर नहीं रहता, उस समय यदि कूटस्थ आत्मा भी न हो तो इस बातकी पीछेसे स्मृति ही कैसे हो कि मैं सुखसे सोया था। पीछे होनेवाली यह स्मृति ही उस समय आत्माके अस्तित्वको प्रमाणित करती है॥ ३९॥ जब भगवान् कमलनाभके चरण-कमलोंको प्राप्त करनेकी इच्छासे तीव्र भक्ति की जाती है तब वह भक्ति ही अग्‍निकी भाँति गुण और कर्मोंसे उत्पन्‍न हुए चित्तके सारे मलोंको जला डालती है। जब चित्त शुद्ध हो जाता है, तब आत्मतत्त्वका साक्षात्कार हो जाता है—जैसे नेत्रोंके निर्विकार हो जानेपर सूर्यके प्रकाशकी प्रत्यक्ष अनुभूति होने लगती है॥ ४०॥"},{"b":38661,"kind":"topic_heading","page":729,"text":"राजोवाच"},{"b":38662,"kind":"sanskrit_shloka","page":729,"verses":["11.3.41"],"text":"कर्मयोगं वदत नः पुरुषो येन संस्कृतः।"},{"b":38663,"kind":"sanskrit_shloka","page":729,"verses":["11.3.41"],"text":"विधूयेहाशु कर्माणि नैष्कर्म्यं विन्दते परम्॥ ४१"},{"b":38664,"kind":"sanskrit_shloka","page":729,"verses":["11.3.42"],"text":"एवं प्रश्‍नमृषीन् पूर्वमपृच्छं पितुरन्तिके।"},{"b":38665,"kind":"sanskrit_shloka","page":729,"verses":["11.3.42"],"text":"नाब्रुवन् ब्रह्मणः पुत्रास्तत्र कारणमुच्यताम्॥ ४२"},{"b":38666,"kind":"hindi_commentary","page":729,"explains":["11.3.41","11.3.42"],"text":"राजा निमिने पूछा—योगीश्‍वरो! अब आपलोग हमें कर्मयोगका उपदेश कीजिये, जिसके द्वारा शुद्ध होकर मनुष्य शीघ्रातिशीघ्र परम नैष्कर्म्य अर्थात् कर्तृत्व, कर्म और कर्मफलकी निवृत्ति करनेवाला ज्ञान प्राप्त करता है॥ ४१॥ एक बार यही प्रश्‍न मैंने अपने पिता महाराज इक्ष्वाकुके सामने ब्रह्माजीके मानस पुत्र सनकादि ऋषियोंसे पूछा था, परन्तु उन्होंने सर्वज्ञ होनेपर भी मेरे प्रश्‍नका उत्तर न दिया। इसका क्या कारण था? कृपा करके मुझे बतलाइये॥ ४२॥"},{"b":38667,"kind":"topic_heading","page":729,"text":"आविर्होत्र उवाच"},{"b":38668,"kind":"sanskrit_shloka","page":729,"verses":["11.3.43"],"text":"कर्माकर्मविकर्मेति वेदवादो न लौकिकः।"},{"b":38669,"kind":"sanskrit_shloka","page":729,"verses":["11.3.43"],"text":"वेदस्य चेश्‍वरात्मत्वात् तत्र मुह्यन्ति सूरयः॥ ४३"},{"b":38670,"kind":"hindi_commentary","page":729,"explains":["11.3.43"],"text":"अब छठे योगीश्‍वर आविर्होत्रजीने कहा—राजन्! कर्म (शास्त्रविहित), अकर्म (निषिद्ध) और विकर्म (विहितका उल्लंघन)—ये तीनों एकमात्र वेदके द्वारा जाने जाते हैं, इनकी व्यवस्था लौकिक रीतिसे नहीं होती। वेद अपौरुषेय हैं—ईश्‍वररूप हैं; इसलिये उनके तात्पर्यका निश्‍चय करना बहुत कठिन है। इसीसे बड़े-बड़े विद्वान् भी उनके अभिप्रायका निर्णय करनेमें भूल कर बैठते हैं। (इसीसे तुम्हारे बचपनकी ओर देखकर—तुम्हें अनधिकारी समझकर सनकादि ऋषियोंने तुम्हारे प्रश्‍नका उत्तर नहीं दिया)॥ ४३॥"},{"b":38671,"kind":"sanskrit_shloka","page":730,"verses":["11.3.44"],"text":"परोक्षवादो वेदोऽयं बालानामनुशासनम्।"},{"b":38672,"kind":"sanskrit_shloka","page":730,"verses":["11.3.44"],"text":"कर्ममोक्षाय कर्माणि विधत्ते ह्यगदं यथा॥ ४४"},{"b":38673,"kind":"hindi_translation","page":729,"explains":["11.3.44"],"text":"यह वेद परोक्षवादात्मक है। यह कर्मोंकी निवृत्तिके लिये कर्मका विधान करता है, जैसे बालकको मिठाई आदिका लालच देकर औषध खिलाते हैं, वैसे ही यह अनभिज्ञोंको स्वर्ग आदिका प्रलोभन देकर श्रेष्ठ कर्ममें प्रवृत्त करता है॥ ४४॥"},{"b":38674,"kind":"sanskrit_shloka","page":730,"verses":["11.3.45"],"text":"नाचरेद् यस्तु वेदोक्तं स्वयमज्ञोऽजितेन्द्रियः।"},{"b":38675,"kind":"sanskrit_shloka","page":730,"verses":["11.3.45"],"text":"विकर्मणा ह्यधर्मेण मृत्योर्मृत्युमुपैति सः॥ ४५"},{"b":38676,"kind":"hindi_translation","page":730,"explains":["11.3.45"],"text":"जिसका अज्ञान निवृत्त नहीं हुआ है, जिसकी इन्द्रियाँ वशमें नहीं हैं, वह यदि मनमाने ढंगसे वेदोक्त कर्मोंका परित्याग कर देता है, तो वह विहित कर्मोंका आचरण न करनेके कारण विकर्मरूप अधर्म ही करता है। इसलिये वह मृत्युके बाद फिर मृत्युको प्राप्त होता है॥ ४५॥"},{"b":38677,"kind":"sanskrit_shloka","page":730,"verses":["11.3.46"],"text":"वेदोक्तमेव कुर्वाणो निःसंगोऽर्पितमीश्‍वरे।"},{"b":38678,"kind":"sanskrit_shloka","page":730,"verses":["11.3.46"],"text":"नैष्कर्म्यां लभते सिद्धिं रोचनार्था फलश्रुतिः॥ ४६"},{"b":38679,"kind":"hindi_translation","page":730,"explains":["11.3.46"],"text":"इसलिये फलकी अभिलाषा छोड़कर और विश्‍वात्मा भगवान्‌को समर्पित कर जो वेदोक्त कर्मका ही अनुष्ठान करता है, उसे कर्मोंकी निवृत्तिसे प्राप्त होनेवाली ज्ञानरूप सिद्धि मिल जाती है। जो वेदोंमें स्वर्गादिरूप फलका वर्णन है, उसका तात्पर्य फलकी सत्यतामें नहीं है, वह तो कर्मोंमें रुचि उत्पन्‍न करानेके लिये है॥ ४६॥"},{"b":38680,"kind":"sanskrit_shloka","page":730,"verses":["11.3.47"],"text":"य आशु हृदयग्रन्थिं निर्जिहीर्षुः परात्मनः।"},{"b":38681,"kind":"sanskrit_shloka","page":730,"verses":["11.3.47"],"text":"विधिनोपचरेद् देवं तन्त्रोक्तेन च केशवम्॥ ४७"},{"b":38682,"kind":"hindi_translation","page":730,"explains":["11.3.47"],"text":"राजन्! जो पुरुष चाहता है कि शीघ्र-से-शीघ्र मेरे ब्रह्मस्वरूप आत्माकी हृदय-ग्रन्थि—मैं और मेरेकी कल्पित गाँठ खुल जाय, उसे चाहिये कि वह वैदिक और तान्त्रिक दोनों ही पद्धतियोंसे भगवान्‌की आराधना करे॥ ४७॥"},{"b":38683,"kind":"sanskrit_shloka","page":730,"verses":["11.3.48"],"text":"लब्धानुग्रह आचार्यात् तेन सन्दर्शितागमः।"},{"b":38684,"kind":"sanskrit_shloka","page":730,"verses":["11.3.48"],"text":"महापुरुषमभ्यर्चेन्मूर्त्याभिमतयाऽऽत्मनः ॥ ४८"},{"b":38685,"kind":"hindi_translation","page":730,"explains":["11.3.48"],"text":"पहले सेवा आदिके द्वारा गुरुदेवकी दीक्षा प्राप्त करे, फिर उनके द्वारा अनुष्ठानकी विधि सीखे; अपनेको भगवान्‌की जो मूर्ति प्रिय लगे, अभीष्ट जान पड़े, उसीके द्वारा पुरुषोत्तम भगवान्‌की पूजा करे॥ ४८॥"},{"b":38686,"kind":"sanskrit_shloka","page":730,"verses":["11.3.49"],"text":"शुचिः सम्मुखमासीनः प्राणसंयमनादिभिः।"},{"b":38687,"kind":"sanskrit_shloka","page":730,"verses":["11.3.49"],"text":"पिण्डं विशोध्य संन्यासकृतरक्षोऽर्चयेद्धरिम्॥ ४९"},{"b":38688,"kind":"hindi_translation","page":730,"explains":["11.3.49"],"text":"पहले स्नानादिसे शरीर और सन्तोष आदिसे अन्तःकरणको शुद्ध करे, इसके बाद भगवान्‌की मूर्तिके सामने बैठकर प्राणायाम आदिके द्वारा भूतशुद्धि—नाडी-शोधन करे, तत्पश्‍चात् विधिपूर्वक मन्त्र, देवता आदिके न्याससे अंगरक्षा करके भगवान्‌की पूजा करे॥ ४९॥"},{"b":38689,"kind":"sanskrit_shloka","page":731,"verses":["11.3.50"],"text":"अर्चादौ हृदये चापि यथालब्धोपचारकैः।"},{"b":38690,"kind":"sanskrit_shloka","page":731,"verses":["11.3.50"],"text":"द्रव्यक्षित्यात्मलिंगानि निष्पाद्य प्रोक्ष्य चासनम्॥ ५०"},{"b":38691,"kind":"sanskrit_shloka","page":731,"verses":["11.3.51"],"text":"पाद्यादीनुपकल्प्याथ सन्‍निधाप्य समाहितः।"},{"b":38692,"kind":"sanskrit_shloka","page":731,"verses":["11.3.51"],"text":"हृदादिभिः कृतन्यासो मूलमन्त्रेण चार्चयेत्॥ ५१"},{"b":38693,"kind":"hindi_translation","page":731,"explains":["11.3.50","11.3.51"],"text":"पहले पुष्प आदि पदार्थोंका जन्तु आदि निकालकर, पृथ्वीको सम्मार्जन आदिसे, अपनेको अव्यग्र होकर और भगवान्‌की मूर्तिको पहलेहीकी पूजाके लगे हुए पदार्थोंके क्षालन आदिसे पूजाके योग्य बनाकर फिर आसनपर मन्त्रोच्चारणपूर्वक जल छिड़ककर पाद्य, अर्घ्य आदि पात्रोंको स्थापित करे। तदनन्तर एकाग्रचित्त होकर हृदयमें भगवान्‌का ध्यान करके फिर उसे सामनेकी श्रीमूर्तिमें चिन्तन करे। तदनन्तर हृदय, सिर, शिखा (हृदयाय नमः, शिरसे स्वाहा) इत्यादि मन्त्रोंसे न्यास करे और अपने इष्टदेवके मूलमन्त्रके द्वारा देश, काल आदिके अनुकूल प्राप्त पूजा-सामग्रीसे प्रतिमा आदिमें अथवा हृदयमें भगवान्‌की पूजा करे॥ ५०-५१॥"},{"b":38694,"kind":"sanskrit_shloka","page":731,"verses":["11.3.52"],"text":"सांगोपांगां सपार्षदां तां तां मूर्तिं स्वमन्त्रतः।"},{"b":38695,"kind":"sanskrit_shloka","page":731,"verses":["11.3.52"],"text":"पाद्यार्घ्याचमनीयाद्यैः स्नानवासोविभूषणैः॥ ५२"},{"b":38696,"kind":"sanskrit_shloka","page":731,"verses":["11.3.53"],"text":"गन्धमाल्याक्षतस्रग्भिर्धूपदीपोपहारकैः ।"},{"b":38697,"kind":"sanskrit_shloka","page":731,"verses":["11.3.53"],"text":"सांगं सम्पूज्य विधिवत् स्तवैः स्तुत्वा नमेद्धरिम्॥ ५३"},{"b":38698,"kind":"hindi_translation","page":731,"explains":["11.3.52","11.3.53"],"text":"अपने-अपने उपास्यदेवके विग्रहकी हृदयादि अंग, आयुधादि उपांग और पार्षदोंसहित उसके मूलमन्त्रद्वारा पाद्य, अर्घ्य, आचमन, मधुपर्क, स्नान, वस्त्र, आभूषण, गन्ध, पुष्प, दधि-अक्षतके तिलक, माला, धूप, दीप और नैवेद्य आदिसे विधिवत् पूजा करे तथा फिर स्तोत्रोंद्वारा स्तुति करके सपरिवार भगवान् श्रीहरिको नमस्कार करे॥ ५२-५३॥"},{"b":38699,"kind":"sanskrit_shloka","page":731,"verses":["11.3.54"],"text":"आत्मानं तन्मयं ध्यायन् मूर्तिं सम्पूजयेद्धरेः।"},{"b":38700,"kind":"sanskrit_shloka","page":731,"verses":["11.3.54"],"text":"शेषामाधाय शिरसि स्वधाम्‍न्युद्वास्य सत्कृतम्॥ ५४"},{"b":38701,"kind":"hindi_translation","page":731,"explains":["11.3.54"],"text":"अपने-आपको भगवन्मय ध्यान करते हुए ही भगवान्‌की मूर्तिका पूजन करना चाहिये। निर्माल्यको अपने सिरपर रखे और आदरके साथ भगवद्विग्रहको यथास्थान स्थापित कर पूजा समाप्त करनी चाहिये॥ ५४॥"},{"b":38702,"kind":"sanskrit_shloka","page":731,"verses":["11.3.55"],"text":"एवम‌ग्‍न्यर्कतोयादावतिथौ हृदये च यः।"},{"b":38703,"kind":"sanskrit_shloka","page":731,"verses":["11.3.55"],"text":"यजतीश्‍वरमात्मानमचिरान्मुच्यते हि सः॥ ५५"},{"b":38704,"kind":"hindi_translation","page":731,"explains":["11.3.55"],"text":"इस प्रकार जो पुरुष अग्‍नि, सूर्य, जल, अतिथि और अपने हृदयमें आत्मरूप श्रीहरिकी पूजा करता है, वह शीघ्र ही मुक्त हो जाता है॥ ५५॥"},{"b":38705,"kind":"hindi_translation","page":731,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे तृतीयोऽध्यायः॥ ३॥"}],"notes":[{"id":"v2:376","mark":"*","page":730,"after_verse":"11.3.44","text":"जिसमें शब्दार्थ कुछ और मालूम दे और तात्पर्यार्थ कुछ और हो—उसे परोक्षवाद कहते हैं।"},{"id":"v2:377","mark":"*","page":731,"after_verse":"11.3.53","text":"विष्णुभगवान्‌की पूजामें अक्षतोंका प्रयोग केवल तिलकालंकारमें ही करना चाहिये, पूजामें नहीं—‘नाक्षतैरर्चयेद् विष्णुं न केतक्या महेश्‍वरम्।’"}],"corrections":{"count":3,"list":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/shuddhi/"}}