{"id":"12.10","title":"द्वादश स्कन्ध · अध्याय 10","part":"द्वादश स्कन्ध","heading":"अथ दशमोऽध्यायः","topics":["मार्कण्डेयजीको भगवान् शंकरका वरदान"],"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/10/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 12.10.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/10/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[958,964]},"verses":[{"id":"12.10.1","number":1,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/10/1/","page":958,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["स एवमनुभूयेदं नारायणविनिर्मितम्।","वैभवं योगमायायास्तमेव शरणं ययौ॥ १"],"iast":["sa evamanubhūyedaṃ nārāyaṇavinirmitam|","vaibhavaṃ yogamāyāyāstameva śaraṇaṃ yayau|| 1"],"meaning":"सूतजी कहते हैं—शौनकादि ऋषियो! मार्कण्डेय मुनिने इस प्रकार नारायण-निर्मित योगमाया-वैभवका अनुभव किया। अब यह निश्‍चय करके कि इस मायासे मुक्त होनेके लिये मायापति भगवान्‌की शरण ही एकमात्र उपाय है, उन्हींकी शरणमें स्थित हो गये॥ १॥"},{"id":"12.10.2","number":2,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/10/2/","page":958,"speaker":"मार्कण्डेय उवाच","sanskrit":["प्रपन्‍नोऽस्म्यङ्‌घ्रिमूलं ते प्रपन्‍नाभयदं हरे।","यन्माययापि विबुधा मुह्यन्ति ज्ञानकाशया॥ २"],"iast":["prapanno'smyaṅghrimūlaṃ te prapannābhayadaṃ hare|","yanmāyayāpi vibudhā muhyanti jñānakāśayā|| 2"],"meaning":"मार्कण्डेयजीने मन-ही-मन कहा—प्रभो! आपकी माया वास्तवमें प्रतीतिमात्र होनेपर भी सत्य ज्ञानके समान प्रकाशित होती है और बड़े-बड़े विद्वान् भी उसके खेलोंमें मोहित हो जाते हैं। आपके श्रीचरणकमल ही शरणागतोंको सब प्रकारसे अभयदान करते हैं। इसलिये मैंने उन्हींकी शरण ग्रहण की है॥ २॥"},{"id":"12.10.3","number":3,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/10/3/","page":959,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["तमेवं निभृतात्मानं वृषेण दिवि पर्यटन्।","रुद्राण्या भगवान् रुद्रो ददर्श स्वगणैर्वृतः॥ ३"],"iast":["tamevaṃ nibhṛtātmānaṃ vṛṣeṇa divi paryaṭan|","rudrāṇyā bhagavān rudro dadarśa svagaṇairvṛtaḥ|| 3"],"meaning":"सूतजी कहते हैं—मार्कण्डेयजी इस प्रकार शरणागतिकी भावनामें तन्मय हो रहे थे। उसी समय भगवान् शंकर भगवती पार्वतीजीके साथ नन्दीपर सवार होकर आकाशमार्गसे विचरण करते हुए उधर आ निकले और मार्कण्डेयजीको उसी अवस्थामें देखा। उनके साथ बहुत-से गण भी थे॥ ३॥"},{"id":"12.10.4","number":4,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/10/4/","page":959,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["अथोमा तमृषिं वीक्ष्य गिरिशं समभाषत।","पश्येमं भगवन् विप्रं निभृतात्मेन्द्रियाशयम्॥ ४"],"iast":["athomā tamṛṣiṃ vīkṣya giriśaṃ samabhāṣata|","paśyemaṃ bhagavan vipraṃ nibhṛtātmendriyāśayam|| 4"],"meaning":"जब भगवती पार्वतीने मार्कण्डेय मुनिको ध्यानकी अवस्थामें देखा, तब उनका हृदय वात्सल्य-स्नेहसे उमड़ आया। उन्होंने शंकरजीसे कहा—‘भगवन्! तनिक इस ब्राह्मणकी ओर तो देखिये। जैसे तूफान शान्त हो जानेपर समुद्रकी लहरें और मछलियाँ शान्त हो जाती हैं और समुद्र धीर-गम्भीर हो जाता है, वैसे ही इस ब्राह्मणका शरीर, इन्द्रिय और अन्तःकरण शान्त हो रहा है। समस्त सिद्धियोंके दाता आप ही हैं। इसलिये कृपा करके आप इस ब्राह्मणकी तपस्याका प्रत्यक्ष फल दीजिये’॥ ४-५॥","meaning_covers":[4,5]},{"id":"12.10.5","number":5,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/10/5/","page":959,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["निभृतोदझषव्रातं वातापाये यथार्णवम्।","कुर्वस्य तपसः साक्षात् संसिद्धिं सिद्धिदो भवान्॥ ५"],"iast":["nibhṛtodajhaṣavrātaṃ vātāpāye yathārṇavam|","kurvasya tapasaḥ sākṣāt saṃsiddhiṃ siddhido bhavān|| 5"],"meaning":"जब भगवती पार्वतीने मार्कण्डेय मुनिको ध्यानकी अवस्थामें देखा, तब उनका हृदय वात्सल्य-स्नेहसे उमड़ आया। उन्होंने शंकरजीसे कहा—‘भगवन्! तनिक इस ब्राह्मणकी ओर तो देखिये। जैसे तूफान शान्त हो जानेपर समुद्रकी लहरें और मछलियाँ शान्त हो जाती हैं और समुद्र धीर-गम्भीर हो जाता है, वैसे ही इस ब्राह्मणका शरीर, इन्द्रिय और अन्तःकरण शान्त हो रहा है। समस्त सिद्धियोंके दाता आप ही हैं। इसलिये कृपा करके आप इस ब्राह्मणकी तपस्याका प्रत्यक्ष फल दीजिये’॥ ४-५॥","meaning_covers":[4,5]},{"id":"12.10.6","number":6,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/10/6/","page":959,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["नैवेच्छत्याशिषः क्वापि ब्रह्मर्षिर्मोक्षमप्युत।","भक्तिं परां भगवति लब्धवान् पुरुषेऽव्यये॥ ६"],"iast":["naivecchatyāśiṣaḥ kvāpi brahmarṣirmokṣamapyuta|","bhaktiṃ parāṃ bhagavati labdhavān puruṣe'vyaye|| 6"],"meaning":"भगवान् शंकरने कहा—देवि! ये ब्रह्मर्षि लोक अथवा परलोककी कोई भी वस्तु नहीं चाहते। और तो क्या, इनके मनमें कभी मोक्षकी भी आकांक्षा नहीं होती। इसका कारण यह है कि घट-घटवासी अविनाशी भगवान्‌के चरणकमलोंमें इन्हें परम भक्ति प्राप्त हो चुकी है॥ ६॥"},{"id":"12.10.7","number":7,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/10/7/","page":959,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["अथापि संवदिष्यामो भवान्येतेन साधुना।","अयं हि परमो लाभो नृणां साधुसमागमः॥ ७"],"iast":["athāpi saṃvadiṣyāmo bhavānyetena sādhunā|","ayaṃ hi paramo lābho nṛṇāṃ sādhusamāgamaḥ|| 7"],"meaning":"प्रिये! यद्यपि इन्हें हमारी कोई आवश्यकता नहीं है, फिर भी मैं इनके साथ बातचीत करूँगा; क्योंकि ये महात्मा पुरुष हैं। जीवमात्रके लिये सबसे बड़े लाभकी बात यही है कि संत पुरुषोंका समागम प्राप्त हो॥ ७॥"},{"id":"12.10.8","number":8,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/10/8/","page":959,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["इत्युक्त्वा तमुपेयाय भगवान् स सतां गतिः।","ईशानः सर्वविद्यानामीश्‍वरः सर्वदेहिनाम्॥ ८"],"iast":["ityuktvā tamupeyāya bhagavān sa satāṃ gatiḥ|","īśānaḥ sarvavidyānāmīśvaraḥ sarvadehinām|| 8"],"meaning":"सूतजी कहते हैं—शौनकजी! भगवान् शंकर समस्त विद्याओंके प्रवर्तक और सारे प्राणियोंके हृदयमें विराजमान अन्तर्यामी प्रभु हैं। जगत‍्के जितने भी संत हैं, उनके एकमात्र आश्रय और आदर्श भी वही हैं। भगवती पार्वतीसे इस प्रकार कहकर भगवान् शंकर मार्कण्डेय मुनिके पास गये॥ ८॥"},{"id":"12.10.9","number":9,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/10/9/","page":959,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["तयोरागमनं साक्षादीशयोर्जगदात्मनोः।","न वेद रुद्धधीवृत्तिरात्मानं विश्‍वमेव च॥ ९"],"iast":["tayorāgamanaṃ sākṣādīśayorjagadātmanoḥ|","na veda ruddhadhīvṛttirātmānaṃ viśvameva ca|| 9"],"meaning":"उस समय मार्कण्डेय मुनिकी समस्त मनोवृत्तियाँ भगवद्भावमें तन्मय थीं। उन्हें अपने शरीर और जगत‍्का बिलकुल पता न था। इसलिये उस समय वे यह भी न जान सके कि मेरे सामने सारे विश्‍वके आत्मा स्वयं भगवान् गौरी-शंकर पधारे हुए हैं॥ ९॥"},{"id":"12.10.10","number":10,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/10/10/","page":960,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["भगवांस्तदभिज्ञाय गिरीशो योगमायया।","आविशत्तद्गुहाकाशं वायुश्छिद्रमिवेश्‍वरः॥ १०"],"iast":["bhagavāṃstadabhijñāya girīśo yogamāyayā|","āviśattadguhākāśaṃ vāyuśchidramiveśvaraḥ|| 10"],"meaning":"शौनकजी! सर्वशक्तिमान् भगवान् कैलासपतिसे यह बात छिपी न रही कि मार्कण्डेय मुनि इस समय किस अवस्थामें हैं। इसलिये जैसे वायु अवकाशके स्थानमें अनायास ही प्रवेश कर जाती है, वैसे ही वे अपनी योगमायासे मार्कण्डेय मुनिके हृदयाकाशमें प्रवेश कर गये॥ १०॥"},{"id":"12.10.11","number":11,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/10/11/","page":960,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["आत्मन्यपि शिवं प्राप्तं तडित्पिंगजटाधरम्।","त्र्यक्षं दशभुजं प्रांशुमुद्यन्तमिव भास्करम्॥ ११"],"iast":["ātmanyapi śivaṃ prāptaṃ taḍitpiṃgajaṭādharam|","tryakṣaṃ daśabhujaṃ prāṃśumudyantamiva bhāskaram|| 11"],"meaning":"मार्कण्डेय मुनिने देखा कि उनके हृदयमें तो भगवान् शंकरके दर्शन हो रहे हैं। शंकरजीके सिरपर बिजलीके समान चमकीली पीली-पीली जटाएँ शोभायमान हो रही हैं। तीन नेत्र हैं और दस भुजाएँ। लम्बा-तगड़ा शरीर उदयकालीन सूर्यके समान तेजस्वी है॥ ११॥"},{"id":"12.10.12","number":12,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/10/12/","page":960,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["व्याघ्रचर्माम्बरधरं शूलखट्वांगचर्मभिः।","अक्षमालाडमरुककपालासिधनुः सह॥ १२"],"iast":["vyāghracarmāmbaradharaṃ śūlakhaṭvāṃgacarmabhiḥ|","akṣamālāḍamarukakapālāsidhanuḥ saha|| 12"],"meaning":"शरीरपर बाघम्बर धारण किये हुए हैं और हाथोंमें शूल, खट्वांग, ढाल, रुद्राक्ष-माला, डमरू, खप्पर, तलवार और धनुष लिये हैं॥ १२॥"},{"id":"12.10.13","number":13,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/10/13/","page":960,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["बिभ्राणं सहसा भातं विचक्ष्य हृदि विस्मितः।","किमिदं कुत एवेति समाधेर्विरतो मुनिः॥ १३"],"iast":["bibhrāṇaṃ sahasā bhātaṃ vicakṣya hṛdi vismitaḥ|","kimidaṃ kuta eveti samādhervirato muniḥ|| 13"],"meaning":"मार्कण्डेय मुनि अपने हृदयमें अकस्मात् भगवान् शंकरका यह रूप देखकर विस्मित हो गये। ‘यह क्या है? कहाँसे आया?’ इस प्रकारकी वृत्तियोंका उदय हो जानेसे उन्होंने अपनी समाधि खोल दी॥ १३॥"},{"id":"12.10.14","number":14,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/10/14/","page":960,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["नेत्रे उन्मील्य ददृशे सगणं सोमयाऽऽगतम्।","रुद्रं त्रिलोकैकगुरुं ननाम शिरसा मुनिः॥ १४"],"iast":["netre unmīlya dadṛśe sagaṇaṃ somayā''gatam|","rudraṃ trilokaikaguruṃ nanāma śirasā muniḥ|| 14"],"meaning":"जब उन्होंने आँखें खोलीं, तब देखा कि तीनों लोकोंके एकमात्र गुरु भगवान् शंकर श्रीपार्वतीजी तथा अपने गणोंके साथ पधारे हुए हैं। उन्होंने उनके चरणोंमें माथा टेककर प्रणाम किया॥ १४॥"},{"id":"12.10.15","number":15,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/10/15/","page":960,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["तस्मै सपर्यां व्यदधात् सगणाय सहोमया।","स्वागतासनपाद्यार्घ्यगन्धस्रग्धूपदीपकैः॥ १५"],"iast":["tasmai saparyāṃ vyadadhāt sagaṇāya sahomayā|","svāgatāsanapādyārghyagandhasragdhūpadīpakaiḥ|| 15"],"meaning":"तदनन्तर मार्कण्डेय मुनिने स्वागत, आसन, पाद्य, अर्घ्य, गन्ध, पुष्पमाला, धूप और दीप आदि उपचारोंसे भगवान् शंकर, भगवती पार्वती और उनके गणोंकी पूजा की॥ १५॥"},{"id":"12.10.16","number":16,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/10/16/","page":960,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["आह चात्मानुभावेन पूर्णकामस्य ते विभो।","करवाम किमीशान येनेदं निर्वृतं जगत्॥ १६"],"iast":["āha cātmānubhāvena pūrṇakāmasya te vibho|","karavāma kimīśāna yenedaṃ nirvṛtaṃ jagat|| 16"],"meaning":"इसके पश्‍चात् मार्कण्डेय मुनि उनसे कहने लगे—‘सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान् प्रभो! आप अपनी आत्मानुभूति और महिमासे ही पूर्णकाम हैं। आपकी शान्ति और सुखसे ही सारे जगत‍्में सुख-शान्तिका विस्तार हो रहा है, ऐसी अवस्थामें मैं आपकी क्या सेवा करूँ?॥ १६॥"},{"id":"12.10.17","number":17,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/10/17/","page":960,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["नमः शिवाय शान्ताय सत्त्वाय प्रमृडाय च।","रजोजुषेऽप्यघोराय नमस्तुभ्यं तमोजुषे॥ १७"],"iast":["namaḥ śivāya śāntāya sattvāya pramṛḍāya ca|","rajojuṣe'pyaghorāya namastubhyaṃ tamojuṣe|| 17"],"meaning":"मैं आपके त्रिगुणातीत सदाशिव स्वरूपको और सत्त्वगुणसे युक्त शान्त-स्वरूपको नमस्कार करता हूँ। मैं आपके रजोगुणयुक्त सर्वप्रवर्तकस्वरूप एवं तमोगुणयुक्त अघोरस्वरूपको नमस्कार करता हूँ’॥ १७॥"},{"id":"12.10.18","number":18,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/10/18/","page":961,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["परितुष्टः प्रसन्‍नात्मा प्रहसंस्तमभाषत॥ १८"],"iast":["parituṣṭaḥ prasannātmā prahasaṃstamabhāṣata|| 18"],"meaning":"सूतजी कहते हैं—शौनकजी! जब मार्कण्डेय मुनिने संतोंके परम आश्रय देवाधिदेव भगवान् शंकरकी इस प्रकार स्तुति की, तब वे उनपर अत्यन्त सन्तुष्ट हुए और बड़े प्रसन्‍नचित्तसे हँसते हुए कहने लगे॥ १८॥"},{"id":"12.10.19","number":19,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/10/19/","page":961,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["वरं वृणीष्व नः कामं वरदेशा वयं त्रयः।","अमोघं दर्शनं येषां मर्त्यो यद् विन्दतेऽमृतम्॥ १९"],"iast":["varaṃ vṛṇīṣva naḥ kāmaṃ varadeśā vayaṃ trayaḥ|","amoghaṃ darśanaṃ yeṣāṃ martyo yad vindate'mṛtam|| 19"],"meaning":"भगवान् शंकरने कहा—मार्कण्डेयजी! ब्रह्मा, विष्णु तथा मैं—हम तीनों ही वरदाताओंके स्वामी हैं, हमलोगोंका दर्शन कभी व्यर्थ नहीं जाता। हमलोगोंसे ही मरणशील मनुष्य भी अमृतत्वकी प्राप्ति कर लेता है। इसलिये तुम्हारी जो इच्छा हो, वही वर मुझसे माँग लो॥ १९॥"},{"id":"12.10.20","number":20,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/10/20/","page":961,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["ब्राह्मणाः साधवः शान्ता निःसंगा भूतवत्सलाः।","एकान्तभक्ता अस्मासु निर्वैराः समदर्शिनः॥ २०"],"iast":["brāhmaṇāḥ sādhavaḥ śāntā niḥsaṃgā bhūtavatsalāḥ|","ekāntabhaktā asmāsu nirvairāḥ samadarśinaḥ|| 20"],"meaning":"ब्राह्मण स्वभावसे ही परोपकारी, शान्तचित्त एवं अनासक्त होते हैं। वे किसीके साथ वैरभाव नहीं रखते और समदर्शी होनेपर भी प्राणियोंका कष्ट देखकर उसके निवारणके लिये पूरे हृदयसे जुट जाते हैं। उनकी सबसे बड़ी विशेषता तो यह होती है कि वे हमारे अनन्य प्रेमी एवं भक्त होते हैं॥ २०॥"},{"id":"12.10.21","number":21,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/10/21/","page":961,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["सलोका लोकपालास्तान् वन्दन्त्यर्चन्त्युपासते।","अहं च भगवान् ब्रह्मा स्वयं च हरिरीश्‍वरः॥ २१"],"iast":["salokā lokapālāstān vandantyarcantyupāsate|","ahaṃ ca bhagavān brahmā svayaṃ ca harirīśvaraḥ|| 21"],"meaning":"सारे लोक और लोकपाल ऐसे ब्राह्मणोंकी वन्दना, पूजा और उपासना किया करते हैं। केवल वे ही क्यों; मैं, भगवान् ब्रह्मा तथा स्वयं साक्षात् ईश्‍वर विष्णु भी उनकी सेवामें संल‌ग्‍न रहते हैं॥ २१॥"},{"id":"12.10.22","number":22,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/10/22/","page":961,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["न ते मय्यच्युतेऽजे च भिदामण्वपि चक्षते।","नात्मनश्‍च जनस्यापि तद् युष्मान् वयमीमहि॥ २२"],"iast":["na te mayyacyute'je ca bhidāmaṇvapi cakṣate|","nātmanaśca janasyāpi tad yuṣmān vayamīmahi|| 22"],"meaning":"ऐसे शान्त महापुरुष मुझमें, विष्णुभगवान्‌में, ब्रह्मामें, अपनेमें और सब जीवोंमें अणुमात्र भी भेद नहीं देखते। सदा-सर्वदा, सर्वत्र और सर्वथा एकरस आत्माका ही दर्शन करते हैं। इसलिये हम तुम्हारे-जैसे महात्माओंकी स्तुति और सेवा करते हैं॥ २२॥"},{"id":"12.10.23","number":23,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/10/23/","page":961,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["न ह्यम्मयानि तीर्थानि न देवाश्‍चेतनोज्झिताः।","ते पुनन्त्युरुकालेन यूयं दर्शनमात्रतः॥ २३"],"iast":["na hyammayāni tīrthāni na devāścetanojjhitāḥ|","te punantyurukālena yūyaṃ darśanamātrataḥ|| 23"],"meaning":"मार्कण्डेयजी! केवल जलमय तीर्थ ही तीर्थ नहीं होते तथा केवल जड मूर्तियाँ ही देवता नहीं होतीं। सबसे बड़े तीर्थ और देवता तो तुम्हारे-जैसे संत हैं; क्योंकि वे तीर्थ और देवता बहुत दिनोंमें पवित्र करते हैं, परन्तु तुमलोग दर्शनमात्रसे ही पवित्र कर देते हो॥ २३॥"},{"id":"12.10.24","number":24,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/10/24/","page":961,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["ब्राह्मणेभ्यो नमस्यामो येऽस्मद्रूपं त्रयीमयम्।","बिभ्रत्यात्मसमाधानतपःस्वाध्यायसंयमैः॥ २४"],"iast":["brāhmaṇebhyo namasyāmo ye'smadrūpaṃ trayīmayam|","bibhratyātmasamādhānatapaḥsvādhyāyasaṃyamaiḥ|| 24"],"meaning":"हमलोग तो ब्राह्मणोंको ही नमस्कार करते हैं; क्योंकि वे चित्तकी एकाग्रता, तपस्या, स्वाध्याय, धारणा, ध्यान और समाधिके द्वारा हमारे वेदमय शरीरको धारण करते हैं॥ २४॥"},{"id":"12.10.25","number":25,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/10/25/","page":961,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["श्रवणाद् दर्शनाद् वापि महापातकिनोऽपि वः।","शुध्येरन्‍नन्त्यजाश्‍चापि किमु सम्भाषणादिभिः॥ २५"],"iast":["śravaṇād darśanād vāpi mahāpātakino'pi vaḥ|","śudhyerannantyajāścāpi kimu sambhāṣaṇādibhiḥ|| 25"],"meaning":"मार्कण्डेयजी! बड़े-बड़े महापापी और अन्त्यज भी तुम्हारे-जैसे महापुरुषोंके चरित्रश्रवण और दर्शनसे ही शुद्ध हो जाते हैं; फिर वे तुमलोगोंके सम्भाषण और सहवास आदिसे शुद्ध हो जायँ, इसमें तो कहना ही क्या है॥ २५॥"},{"id":"12.10.26","number":26,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/10/26/","page":962,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["इति चन्द्रललामस्य धर्मगुह्योपबृंहितम्।","वचोऽमृतायनमृषिर्नातृप्यत् कर्णयोः पिबन्॥ २६"],"iast":["iti candralalāmasya dharmaguhyopabṛṃhitam|","vaco'mṛtāyanamṛṣirnātṛpyat karṇayoḥ piban|| 26"],"meaning":"सूतजी कहते हैं—शौनकादि ऋषियो! चन्द्रभूषण भगवान् शंकरकी एक-एक बात धर्मके गुप्ततम रहस्यसे परिपूर्ण थी। उसके एक-एक अक्षरमें अमृतका समुद्र भरा हुआ था। मार्कण्डेय मुनि अपने कानोंके द्वारा पूरी तन्मयताके साथ उसका पान करते रहे; परन्तु उन्हें तृप्ति न हुई॥ २६॥"},{"id":"12.10.27","number":27,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/10/27/","page":962,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["स चिरं मायया विष्णोर्भ्रामितः कर्शितो भृशम्।","शिववागमृतध्वस्तक्लेशपुंजस्तमब्रवीत्॥ २७"],"iast":["sa ciraṃ māyayā viṣṇorbhrāmitaḥ karśito bhṛśam|","śivavāgamṛtadhvastakleśapuṃjastamabravīt|| 27"],"meaning":"वे चिरकालतक विष्णुभगवान्‌की मायासे भटक चुके थे और बहुत थके हुए भी थे। भगवान् शिवकी कल्याणी वाणीका अमृतपान करनेसे उनके सारे क्लेश नष्ट हो गये। उन्होंने भगवान् शंकरसे इस प्रकार कहा॥ २७॥"},{"id":"12.10.28","number":28,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/10/28/","page":962,"speaker":"ऋषिरुवाच","sanskrit":["अहो ईश्‍वरलीलेयं दुर्विभाव्या शरीरिणाम्।","यन्‍नमन्तीशितव्यानि स्तुवन्ति जगदीश्‍वराः॥ २८"],"iast":["aho īśvaralīleyaṃ durvibhāvyā śarīriṇām|","yannamantīśitavyāni stuvanti jagadīśvarāḥ|| 28"],"meaning":"मार्कण्डेयजीने कहा—सचमुच सर्वशक्तिमान् भगवान्‌की यह लीला सभी प्राणियोंकी समझके परे है। भला, देखो तो सही—ये सारे जगत‍्के स्वामी होकर भी अपने अधीन रहनेवाले मेरे-जैसे जीवोंकी वन्दना और स्तुति करते हैं॥ २८॥"},{"id":"12.10.29","number":29,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/10/29/","page":962,"speaker":"ऋषिरुवाच","sanskrit":["धर्मं ग्राहयितुं प्रायः प्रवक्तारश्‍च देहिनाम्।","आचरन्त्यनुमोदन्ते क्रियमाणं स्तुवन्ति च॥ २९"],"iast":["dharmaṃ grāhayituṃ prāyaḥ pravaktāraśca dehinām|","ācarantyanumodante kriyamāṇaṃ stuvanti ca|| 29"],"meaning":"धर्मके प्रवचनकार प्रायः प्राणियोंको धर्मका रहस्य और स्वरूप समझानेके लिये उसका आचरण और अनुमोदन करते हैं तथा कोई धर्मका आचरण करता है तो उसकी प्रशंसा भी करते हैं॥ २९॥"},{"id":"12.10.30","number":30,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/10/30/","page":962,"speaker":"ऋषिरुवाच","sanskrit":["नैतावता भगवतः स्वमायामयवृत्तिभिः।","न दुष्येतानुभावस्तैर्मायिनः कुहकं यथा॥ ३०"],"iast":["naitāvatā bhagavataḥ svamāyāmayavṛttibhiḥ|","na duṣyetānubhāvastairmāyinaḥ kuhakaṃ yathā|| 30"],"meaning":"जैसे जादूगर अनेकों खेल दिखलाता है और उन खेलोंसे उसके प्रभावमें कोई अन्तर नहीं पड़ता, वैसे ही आप अपनी स्वजनमोहिनी मायाकी वृत्तियोंको स्वीकार करके किसीकी वन्दना-स्तुति आदि करते हैं तो केवल इस कामके द्वारा आपकी महिमामें कोई त्रुटि नहीं आती॥ ३०॥"},{"id":"12.10.31","number":31,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/10/31/","page":962,"speaker":"ऋषिरुवाच","sanskrit":["सृष्ट्वेदं मनसा विश्‍वमात्मनानुप्रविश्य यः।","गुणैः कुर्वद्भिराभाति कर्तेव स्वप्नदृग् यथा॥ ३१"],"iast":["sṛṣṭvedaṃ manasā viśvamātmanānupraviśya yaḥ|","guṇaiḥ kurvadbhirābhāti karteva svapnadṛg yathā|| 31"],"meaning":"आपने स्वप्नद्रष्टाके समान अपने मनसे ही सम्पूर्ण विश्‍वकी सृष्टि की है और इसमें स्वयं प्रवेश करके कर्ता न होनेपर भी कर्म करनेवाले गुणोंके द्वारा कर्ताके समान प्रतीत होते हैं॥ ३१॥"},{"id":"12.10.32","number":32,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/10/32/","page":962,"speaker":"ऋषिरुवाच","sanskrit":["तस्मै नमो भगवते त्रिगुणाय गुणात्मने।","केवलायाद्वितीयाय गुरवे ब्रह्ममूर्तये॥ ३२"],"iast":["tasmai namo bhagavate triguṇāya guṇātmane|","kevalāyādvitīyāya gurave brahmamūrtaye|| 32"],"meaning":"भगवन्! आप त्रिगुणस्वरूप होनेपर भी उनके परे उनकी आत्माके रूपमें स्थित हैं। आप ही समस्त ज्ञानके मूल, केवल, अद्वितीय ब्रह्मस्वरूप हैं। मैं आपको नमस्कार करता हूँ॥ ३२॥"},{"id":"12.10.33","number":33,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/10/33/","page":962,"speaker":"ऋषिरुवाच","sanskrit":["कं वृणे नु परं भूमन् वरं त्वद् वरदर्शनात्।","यद्दर्शनात् पूर्णकामः सत्यकामः पुमान् भवेत्॥ ३३"],"iast":["kaṃ vṛṇe nu paraṃ bhūman varaṃ tvad varadarśanāt|","yaddarśanāt pūrṇakāmaḥ satyakāmaḥ pumān bhavet|| 33"],"meaning":"अनन्त! आपके श्रेष्ठ दर्शनसे बढ़कर ऐसी और कौन-सी वस्तु है, जिसे मैं वरदानके रूपमें माँगूँ? मनुष्य आपके दर्शनसे ही पूर्णकाम और सत्यसंकल्प हो जाता है॥ ३३॥"},{"id":"12.10.34","number":34,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/10/34/","page":963,"speaker":"ऋषिरुवाच","sanskrit":["वरमेकं वृणेऽथापि पूर्णात् कामाभिवर्षणात्।","भगवत्यच्युतां भक्तिं तत्परेषु तथा त्वयि॥ ३४"],"iast":["varamekaṃ vṛṇe'thāpi pūrṇāt kāmābhivarṣaṇāt|","bhagavatyacyutāṃ bhaktiṃ tatpareṣu tathā tvayi|| 34"],"meaning":"आप स्वयं तो पूर्ण हैं ही, अपने भक्तोंकी भी समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाले हैं। इसलिये मैं आपका दर्शन प्राप्त कर लेनेपर भी एक वर और माँगता हूँ। वह यह कि भगवान्‌में, उनके शरणागत भक्तोंमें और आपमें मेरी अविचल भक्ति सदा-सर्वदा बनी रहे॥ ३४॥"},{"id":"12.10.35","number":35,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/10/35/","page":963,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["इत्यर्चितोऽभिष्टुतश्‍च मुनिना सूक्तया गिरा।","तमाह भगवाञ्छर्वः शर्वया चाभिनन्दितः॥ ३५"],"iast":["ityarcito'bhiṣṭutaśca muninā sūktayā girā|","tamāha bhagavāñcharvaḥ śarvayā cābhinanditaḥ|| 35"],"meaning":"सूतजी कहते हैं—शौनकजी! जब मार्कण्डेय मुनिने सुमधुर वाणीसे इस प्रकार भगवान् शंकरकी स्तुति और पूजा की, तब उन्होंने भगवती पार्वतीकी प्रसाद-प्रेरणासे यह बात कही॥ ३५॥"},{"id":"12.10.36","number":36,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/10/36/","page":963,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["कामो महर्षे सर्वोऽयं भक्तिमांस्त्वमधोक्षजे।","आकल्पान्ताद् यशः पुण्यमजरामरता तथा॥ ३६"],"iast":["kāmo maharṣe sarvo'yaṃ bhaktimāṃstvamadhokṣaje|","ākalpāntād yaśaḥ puṇyamajarāmaratā tathā|| 36"],"meaning":"महर्षे! तुम्हारी सारी कामनाएँ पूर्ण हों। इन्द्रियातीत परमात्मामें तुम्हारी अनन्य भक्ति सदा-सर्वदा बनी रहे। कल्पपर्यन्त तुम्हारा पवित्र यश फैले और तुम अजर एवं अमर हो जाओ॥ ३६॥"},{"id":"12.10.37","number":37,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/10/37/","page":963,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["ज्ञानं त्रैकालिकं ब्रह्मन् विज्ञानं च विरक्तिमत्।","ब्रह्मवर्चस्विनो भूयात् पुराणाचार्यतास्तु ते॥ ३७"],"iast":["jñānaṃ traikālikaṃ brahman vijñānaṃ ca viraktimat|","brahmavarcasvino bhūyāt purāṇācāryatāstu te|| 37"],"meaning":"ब्रह्मन्! तुम्हारा ब्रह्मतेज तो सर्वदा अक्षुण्ण रहेगा ही। तुम्हें भूत, भविष्य और वर्तमानके समस्त विशेष ज्ञानोंका एक अधिष्ठानरूप ज्ञान और वैराग्ययुक्त स्वरूपस्थितिकी प्राप्ति हो जाय। तुम्हें पुराणका आचार्यत्व भी प्राप्त हो॥ ३७॥"},{"id":"12.10.38","number":38,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/10/38/","page":963,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["एवं वरान् स मुनये दत्त्वागात्त्र्यक्ष ईश्‍वरः।","देव्यै तत्कर्म कथयन्‍ननुभूतं पुरामुना॥ ३८"],"iast":["evaṃ varān sa munaye dattvāgāttryakṣa īśvaraḥ|","devyai tatkarma kathayannanubhūtaṃ purāmunā|| 38"],"meaning":"सूतजी कहते हैं—शौनकजी! इस प्रकार त्रिलोचन भगवान् शंकर मार्कण्डेय मुनिको वर देकर भगवती पार्वतीसे मार्कण्डेय मुनिकी तपस्या और उनके प्रलयसम्बन्धी अनुभवोंका वर्णन करते हुए वहाँसे चले गये॥ ३८॥"},{"id":"12.10.39","number":39,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/10/39/","page":963,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["सोऽप्यवाप्तमहायोगमहिमा भार्गवोत्तमः।","विचरत्यधुनाप्यद्धा हरावेकान्ततां गतः॥ ३९"],"iast":["so'pyavāptamahāyogamahimā bhārgavottamaḥ|","vicaratyadhunāpyaddhā harāvekāntatāṃ gataḥ|| 39"],"meaning":"भृगुवंशशिरोमणि मार्कण्डेय मुनिको उनके महायोगका परम फल प्राप्त हो गया। वे भगवान्‌के अनन्यप्रेमी हो गये। अब भी वे भक्तिभावभरित हृदयसे पृथ्वीपर विचरण किया करते हैं॥ ३९॥"},{"id":"12.10.40","number":40,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/10/40/","page":963,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["अनुवर्णितमेतत्ते मार्कण्डेयस्य धीमतः।","अनुभूतं भगवतो मायावैभवमद्भुतम्॥ ४०"],"iast":["anuvarṇitametatte mārkaṇḍeyasya dhīmataḥ|","anubhūtaṃ bhagavato māyāvaibhavamadbhutam|| 40"],"meaning":"परम ज्ञानसम्पन्‍न मार्कण्डेय मुनिने भगवान्‌की योगमायासे जिस अद्भुत लीलाका अनुभव किया था, वह मैंने आपलोगोंको सुना दिया॥ ४०॥"},{"id":"12.10.41","number":41,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/10/41/","page":963,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["एतत् केचिदविद्वांसो मायासंसृतिमात्मनः।","अनाद्यावर्तितं नॄणां कादाचित्कं प्रचक्षते॥ ४१"],"iast":["etat kecidavidvāṃso māyāsaṃsṛtimātmanaḥ|","anādyāvartitaṃ nṝṇāṃ kādācitkaṃ pracakṣate|| 41"],"meaning":"शौनकजी! यह जो मार्कण्डेयजीने अनेक कल्पोंका—सृष्टि-प्रलयोंका अनुभव किया, वह भगवान्‌की मायाका ही वैभव था, तात्कालिक था और उन्हींके लिये था, सर्वसाधारणके लिये नहीं। कोई-कोई इस मायाकी रचनाको न जानकर अनादिकालसे बार-बार होनेवाले सृष्टि-प्रलय ही इसको भी बतलाते हैं। (इसलिये आपको यह शंका नहीं करनी चाहिये कि इसी कल्पके हमारे पूर्वज मार्कण्डेयजीकी आयु इतनी लम्बी कैसे हो गयी?)॥ ४१॥"},{"id":"12.10.42","number":42,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/10/42/","page":964,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["य एवमेतद् भृगुवर्य वर्णितं","रथांगपाणेरनुभावभावितम् ।","संश्रावयेत् संशृणुयादु तावुभौ","तयोर्न कर्माशयसंसृतिर्भवेत्॥ ४२"],"iast":["ya evametad bhṛguvarya varṇitaṃ","rathāṃgapāṇeranubhāvabhāvitam |","saṃśrāvayet saṃśṛṇuyādu tāvubhau","tayorna karmāśayasaṃsṛtirbhavet|| 42"],"meaning":"भृगुवंशशिरोमणे! मैंने आपको यह जो मार्कण्डेय-चरित्र सुनाया है, वह भगवान् चक्रपाणिके प्रभाव और महिमासे भरपूर है। जो इसका श्रवण एवं कीर्तन करते हैं, वे दोनों ही कर्म-वासनाओंके कारण प्राप्त होनेवाले आवागमनके चक्करसे सर्वदाके लिये छूट जाते हैं॥ ४२॥"}],"text":[{"b":43014,"kind":"adhyaya_heading","page":958,"text":"अथ दशमोऽध्यायः"},{"b":43015,"kind":"topic_heading","page":958,"text":"मार्कण्डेयजीको भगवान् शंकरका वरदान"},{"b":43016,"kind":"topic_heading","page":958,"text":"सूत उवाच"},{"b":43017,"kind":"sanskrit_shloka","page":958,"verses":["12.10.1"],"text":"स एवमनुभूयेदं नारायणविनिर्मितम्।"},{"b":43018,"kind":"sanskrit_shloka","page":958,"verses":["12.10.1"],"text":"वैभवं योगमायायास्तमेव शरणं ययौ॥ १"},{"b":43019,"kind":"hindi_commentary","page":958,"explains":["12.10.1"],"text":"सूतजी कहते हैं—शौनकादि ऋषियो! मार्कण्डेय मुनिने इस प्रकार नारायण-निर्मित योगमाया-वैभवका अनुभव किया। अब यह निश्‍चय करके कि इस मायासे मुक्त होनेके लिये मायापति भगवान्‌की शरण ही एकमात्र उपाय है, उन्हींकी शरणमें स्थित हो गये॥ १॥"},{"b":43020,"kind":"topic_heading","page":958,"text":"मार्कण्डेय उवाच"},{"b":43021,"kind":"sanskrit_shloka","page":958,"verses":["12.10.2"],"text":"प्रपन्‍नोऽस्म्यङ्‌घ्रिमूलं ते प्रपन्‍नाभयदं हरे।"},{"b":43022,"kind":"sanskrit_shloka","page":958,"verses":["12.10.2"],"text":"यन्माययापि विबुधा मुह्यन्ति ज्ञानकाशया॥ २"},{"b":43023,"kind":"hindi_commentary","page":958,"explains":["12.10.2"],"text":"मार्कण्डेयजीने मन-ही-मन कहा—प्रभो! आपकी माया वास्तवमें प्रतीतिमात्र होनेपर भी सत्य ज्ञानके समान प्रकाशित होती है और बड़े-बड़े विद्वान् भी उसके खेलोंमें मोहित हो जाते हैं। आपके श्रीचरणकमल ही शरणागतोंको सब प्रकारसे अभयदान करते हैं। इसलिये मैंने उन्हींकी शरण ग्रहण की है॥ २॥"},{"b":43024,"kind":"topic_heading","page":958,"text":"सूत उवाच"},{"b":43025,"kind":"sanskrit_shloka","page":959,"verses":["12.10.3"],"text":"तमेवं निभृतात्मानं वृषेण दिवि पर्यटन्।"},{"b":43026,"kind":"sanskrit_shloka","page":959,"verses":["12.10.3"],"text":"रुद्राण्या भगवान् रुद्रो ददर्श स्वगणैर्वृतः॥ ३"},{"b":43027,"kind":"sanskrit_shloka","page":959,"verses":["12.10.4"],"text":"अथोमा तमृषिं वीक्ष्य गिरिशं समभाषत।"},{"b":43028,"kind":"sanskrit_shloka","page":959,"verses":["12.10.4"],"text":"पश्येमं भगवन् विप्रं निभृतात्मेन्द्रियाशयम्॥ ४"},{"b":43029,"kind":"sanskrit_shloka","page":959,"verses":["12.10.5"],"text":"निभृतोदझषव्रातं वातापाये यथार्णवम्।"},{"b":43030,"kind":"sanskrit_shloka","page":959,"verses":["12.10.5"],"text":"कुर्वस्य तपसः साक्षात् संसिद्धिं सिद्धिदो भवान्॥ ५"},{"b":43031,"kind":"hindi_commentary","page":959,"explains":["12.10.3","12.10.4","12.10.5"],"text":"सूतजी कहते हैं—मार्कण्डेयजी इस प्रकार शरणागतिकी भावनामें तन्मय हो रहे थे। उसी समय भगवान् शंकर भगवती पार्वतीजीके साथ नन्दीपर सवार होकर आकाशमार्गसे विचरण करते हुए उधर आ निकले और मार्कण्डेयजीको उसी अवस्थामें देखा। उनके साथ बहुत-से गण भी थे॥ ३॥ जब भगवती पार्वतीने मार्कण्डेय मुनिको ध्यानकी अवस्थामें देखा, तब उनका हृदय वात्सल्य-स्नेहसे उमड़ आया। उन्होंने शंकरजीसे कहा—‘भगवन्! तनिक इस ब्राह्मणकी ओर तो देखिये। जैसे तूफान शान्त हो जानेपर समुद्रकी लहरें और मछलियाँ शान्त हो जाती हैं और समुद्र धीर-गम्भीर हो जाता है, वैसे ही इस ब्राह्मणका शरीर, इन्द्रिय और अन्तःकरण शान्त हो रहा है। समस्त सिद्धियोंके दाता आप ही हैं। इसलिये कृपा करके आप इस ब्राह्मणकी तपस्याका प्रत्यक्ष फल दीजिये’॥ ४-५॥"},{"b":43032,"kind":"topic_heading","page":959,"text":"श्रीभगवानुवाच"},{"b":43033,"kind":"sanskrit_shloka","page":959,"verses":["12.10.6"],"text":"नैवेच्छत्याशिषः क्वापि ब्रह्मर्षिर्मोक्षमप्युत।"},{"b":43034,"kind":"sanskrit_shloka","page":959,"verses":["12.10.6"],"text":"भक्तिं परां भगवति लब्धवान् पुरुषेऽव्यये॥ ६"},{"b":43035,"kind":"sanskrit_shloka","page":959,"verses":["12.10.7"],"text":"अथापि संवदिष्यामो भवान्येतेन साधुना।"},{"b":43036,"kind":"sanskrit_shloka","page":959,"verses":["12.10.7"],"text":"अयं हि परमो लाभो नृणां साधुसमागमः॥ ७"},{"b":43037,"kind":"hindi_commentary","page":959,"explains":["12.10.6","12.10.7"],"text":"भगवान् शंकरने कहा—देवि! ये ब्रह्मर्षि लोक अथवा परलोककी कोई भी वस्तु नहीं चाहते। और तो क्या, इनके मनमें कभी मोक्षकी भी आकांक्षा नहीं होती। इसका कारण यह है कि घट-घटवासी अविनाशी भगवान्‌के चरणकमलोंमें इन्हें परम भक्ति प्राप्त हो चुकी है॥ ६॥ प्रिये! यद्यपि इन्हें हमारी कोई आवश्यकता नहीं है, फिर भी मैं इनके साथ बातचीत करूँगा; क्योंकि ये महात्मा पुरुष हैं। जीवमात्रके लिये सबसे बड़े लाभकी बात यही है कि संत पुरुषोंका समागम प्राप्त हो॥ ७॥"},{"b":43038,"kind":"topic_heading","page":958,"text":"सूत उवाच"},{"b":43039,"kind":"sanskrit_shloka","page":959,"verses":["12.10.8"],"text":"इत्युक्त्वा तमुपेयाय भगवान् स सतां गतिः।"},{"b":43040,"kind":"sanskrit_shloka","page":959,"verses":["12.10.8"],"text":"ईशानः सर्वविद्यानामीश्‍वरः सर्वदेहिनाम्॥ ८"},{"b":43041,"kind":"sanskrit_shloka","page":959,"verses":["12.10.9"],"text":"तयोरागमनं साक्षादीशयोर्जगदात्मनोः।"},{"b":43042,"kind":"sanskrit_shloka","page":959,"verses":["12.10.9"],"text":"न वेद रुद्धधीवृत्तिरात्मानं विश्‍वमेव च॥ ९"},{"b":43043,"kind":"hindi_commentary","page":959,"explains":["12.10.8","12.10.9"],"text":"सूतजी कहते हैं—शौनकजी! भगवान् शंकर समस्त विद्याओंके प्रवर्तक और सारे प्राणियोंके हृदयमें विराजमान अन्तर्यामी प्रभु हैं। जगत‍्के जितने भी संत हैं, उनके एकमात्र आश्रय और आदर्श भी वही हैं। भगवती पार्वतीसे इस प्रकार कहकर भगवान् शंकर मार्कण्डेय मुनिके पास गये॥ ८॥ उस समय मार्कण्डेय मुनिकी समस्त मनोवृत्तियाँ भगवद्भावमें तन्मय थीं। उन्हें अपने शरीर और जगत‍्का बिलकुल पता न था। इसलिये उस समय वे यह भी न जान सके कि मेरे सामने सारे विश्‍वके आत्मा स्वयं भगवान् गौरी-शंकर पधारे हुए हैं॥ ९॥"},{"b":43044,"kind":"sanskrit_shloka","page":960,"verses":["12.10.10"],"text":"भगवांस्तदभिज्ञाय गिरीशो योगमायया।"},{"b":43045,"kind":"sanskrit_shloka","page":960,"verses":["12.10.10"],"text":"आविशत्तद्गुहाकाशं वायुश्छिद्रमिवेश्‍वरः॥ १०"},{"b":43046,"kind":"sanskrit_shloka","page":960,"verses":["12.10.11"],"text":"आत्मन्यपि शिवं प्राप्तं तडित्पिंगजटाधरम्।"},{"b":43047,"kind":"sanskrit_shloka","page":960,"verses":["12.10.11"],"text":"त्र्यक्षं दशभुजं प्रांशुमुद्यन्तमिव भास्करम्॥ ११"},{"b":43048,"kind":"sanskrit_shloka","page":960,"verses":["12.10.12"],"text":"व्याघ्रचर्माम्बरधरं शूलखट्वांगचर्मभिः।"},{"b":43049,"kind":"sanskrit_shloka","page":960,"verses":["12.10.12"],"text":"अक्षमालाडमरुककपालासिधनुः सह॥ १२"},{"b":43050,"kind":"sanskrit_shloka","page":960,"verses":["12.10.13"],"text":"बिभ्राणं सहसा भातं विचक्ष्य हृदि विस्मितः।"},{"b":43051,"kind":"sanskrit_shloka","page":960,"verses":["12.10.13"],"text":"किमिदं कुत एवेति समाधेर्विरतो मुनिः॥ १३"},{"b":43052,"kind":"sanskrit_shloka","page":960,"verses":["12.10.14"],"text":"नेत्रे उन्मील्य ददृशे सगणं सोमयाऽऽगतम्।"},{"b":43053,"kind":"sanskrit_shloka","page":960,"verses":["12.10.14"],"text":"रुद्रं त्रिलोकैकगुरुं ननाम शिरसा मुनिः॥ १४"},{"b":43054,"kind":"sanskrit_shloka","page":960,"verses":["12.10.15"],"text":"तस्मै सपर्यां व्यदधात् सगणाय सहोमया।"},{"b":43055,"kind":"sanskrit_shloka","page":960,"verses":["12.10.15"],"text":"स्वागतासनपाद्यार्घ्यगन्धस्रग्धूपदीपकैः॥ १५"},{"b":43056,"kind":"sanskrit_shloka","page":960,"verses":["12.10.16"],"text":"आह चात्मानुभावेन पूर्णकामस्य ते विभो।"},{"b":43057,"kind":"sanskrit_shloka","page":960,"verses":["12.10.16"],"text":"करवाम किमीशान येनेदं निर्वृतं जगत्॥ १६"},{"b":43058,"kind":"sanskrit_shloka","page":960,"verses":["12.10.17"],"text":"नमः शिवाय शान्ताय सत्त्वाय प्रमृडाय च।"},{"b":43059,"kind":"sanskrit_shloka","page":960,"verses":["12.10.17"],"text":"रजोजुषेऽप्यघोराय नमस्तुभ्यं तमोजुषे॥ १७"},{"b":43060,"kind":"hindi_translation","page":960,"explains":["12.10.10","12.10.11","12.10.12","12.10.13","12.10.14","12.10.15","12.10.16","12.10.17"],"text":"शौनकजी! सर्वशक्तिमान् भगवान् कैलासपतिसे यह बात छिपी न रही कि मार्कण्डेय मुनि इस समय किस अवस्थामें हैं। इसलिये जैसे वायु अवकाशके स्थानमें अनायास ही प्रवेश कर जाती है, वैसे ही वे अपनी योगमायासे मार्कण्डेय मुनिके हृदयाकाशमें प्रवेश कर गये॥ १०॥ मार्कण्डेय मुनिने देखा कि उनके हृदयमें तो भगवान् शंकरके दर्शन हो रहे हैं। शंकरजीके सिरपर बिजलीके समान चमकीली पीली-पीली जटाएँ शोभायमान हो रही हैं। तीन नेत्र हैं और दस भुजाएँ। लम्बा-तगड़ा शरीर उदयकालीन सूर्यके समान तेजस्वी है॥ ११॥ शरीरपर बाघम्बर धारण किये हुए हैं और हाथोंमें शूल, खट्वांग, ढाल, रुद्राक्ष-माला, डमरू, खप्पर, तलवार और धनुष लिये हैं॥ १२॥ मार्कण्डेय मुनि अपने हृदयमें अकस्मात् भगवान् शंकरका यह रूप देखकर विस्मित हो गये। ‘यह क्या है? कहाँसे आया?’ इस प्रकारकी वृत्तियोंका उदय हो जानेसे उन्होंने अपनी समाधि खोल दी॥ १३॥ जब उन्होंने आँखें खोलीं, तब देखा कि तीनों लोकोंके एकमात्र गुरु भगवान् शंकर श्रीपार्वतीजी तथा अपने गणोंके साथ पधारे हुए हैं। उन्होंने उनके चरणोंमें माथा टेककर प्रणाम किया॥ १४॥ तदनन्तर मार्कण्डेय मुनिने स्वागत, आसन, पाद्य, अर्घ्य, गन्ध, पुष्पमाला, धूप और दीप आदि उपचारोंसे भगवान् शंकर, भगवती पार्वती और उनके गणोंकी पूजा की॥ १५॥ इसके पश्‍चात् मार्कण्डेय मुनि उनसे कहने लगे—‘सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान् प्रभो! आप अपनी आत्मानुभूति और महिमासे ही पूर्णकाम हैं। आपकी शान्ति और सुखसे ही सारे जगत‍्में सुख-शान्तिका विस्तार हो रहा है, ऐसी अवस्थामें मैं आपकी क्या सेवा करूँ?॥ १६॥ मैं आपके त्रिगुणातीत सदाशिव स्वरूपको और सत्त्वगुणसे युक्त शान्त-स्वरूपको नमस्कार करता हूँ। मैं आपके रजोगुणयुक्त सर्वप्रवर्तकस्वरूप एवं तमोगुणयुक्त अघोरस्वरूपको नमस्कार करता हूँ’॥ १७॥"},{"b":43061,"kind":"topic_heading","page":961,"text":"सूत उवाच"},{"b":43062,"kind":"topic_heading","page":961,"text":"एवं स्तुतः स भगवानादिदेवः सतां गतिः।"},{"b":43063,"kind":"topic_heading","page":961,"verses":["12.10.18"],"text":"परितुष्टः प्रसन्‍नात्मा प्रहसंस्तमभाषत॥ १८"},{"b":43064,"kind":"hindi_commentary","page":961,"explains":["12.10.18"],"text":"सूतजी कहते हैं—शौनकजी! जब मार्कण्डेय मुनिने संतोंके परम आश्रय देवाधिदेव भगवान् शंकरकी इस प्रकार स्तुति की, तब वे उनपर अत्यन्त सन्तुष्ट हुए और बड़े प्रसन्‍नचित्तसे हँसते हुए कहने लगे॥ १८॥"},{"b":43065,"kind":"topic_heading","page":961,"text":"श्रीभगवानुवाच"},{"b":43066,"kind":"sanskrit_shloka","page":961,"verses":["12.10.19"],"text":"वरं वृणीष्व नः कामं वरदेशा वयं त्रयः।"},{"b":43067,"kind":"sanskrit_shloka","page":961,"verses":["12.10.19"],"text":"अमोघं दर्शनं येषां मर्त्यो यद् विन्दतेऽमृतम्॥ १९"},{"b":43068,"kind":"sanskrit_shloka","page":961,"verses":["12.10.20"],"text":"ब्राह्मणाः साधवः शान्ता निःसंगा भूतवत्सलाः।"},{"b":43069,"kind":"sanskrit_shloka","page":961,"verses":["12.10.20"],"text":"एकान्तभक्ता अस्मासु निर्वैराः समदर्शिनः॥ २०"},{"b":43070,"kind":"sanskrit_shloka","page":961,"verses":["12.10.21"],"text":"सलोका लोकपालास्तान् वन्दन्त्यर्चन्त्युपासते।"},{"b":43071,"kind":"sanskrit_shloka","page":961,"verses":["12.10.21"],"text":"अहं च भगवान् ब्रह्मा स्वयं च हरिरीश्‍वरः॥ २१"},{"b":43072,"kind":"sanskrit_shloka","page":961,"verses":["12.10.22"],"text":"न ते मय्यच्युतेऽजे च भिदामण्वपि चक्षते।"},{"b":43073,"kind":"sanskrit_shloka","page":961,"verses":["12.10.22"],"text":"नात्मनश्‍च जनस्यापि तद् युष्मान् वयमीमहि॥ २२"},{"b":43074,"kind":"sanskrit_shloka","page":961,"verses":["12.10.23"],"text":"न ह्यम्मयानि तीर्थानि न देवाश्‍चेतनोज्झिताः।"},{"b":43075,"kind":"sanskrit_shloka","page":961,"verses":["12.10.23"],"text":"ते पुनन्त्युरुकालेन यूयं दर्शनमात्रतः॥ २३"},{"b":43076,"kind":"sanskrit_shloka","page":961,"verses":["12.10.24"],"text":"ब्राह्मणेभ्यो नमस्यामो येऽस्मद्रूपं त्रयीमयम्।"},{"b":43077,"kind":"sanskrit_shloka","page":961,"verses":["12.10.24"],"text":"बिभ्रत्यात्मसमाधानतपःस्वाध्यायसंयमैः॥ २४"},{"b":43078,"kind":"sanskrit_shloka","page":961,"verses":["12.10.25"],"text":"श्रवणाद् दर्शनाद् वापि महापातकिनोऽपि वः।"},{"b":43079,"kind":"sanskrit_shloka","page":961,"verses":["12.10.25"],"text":"शुध्येरन्‍नन्त्यजाश्‍चापि किमु सम्भाषणादिभिः॥ २५"},{"b":43080,"kind":"hindi_commentary","page":961,"explains":["12.10.19","12.10.20","12.10.21","12.10.22","12.10.23","12.10.24","12.10.25"],"text":"भगवान् शंकरने कहा—मार्कण्डेयजी! ब्रह्मा, विष्णु तथा मैं—हम तीनों ही वरदाताओंके स्वामी हैं, हमलोगोंका दर्शन कभी व्यर्थ नहीं जाता। हमलोगोंसे ही मरणशील मनुष्य भी अमृतत्वकी प्राप्ति कर लेता है। इसलिये तुम्हारी जो इच्छा हो, वही वर मुझसे माँग लो॥ १९॥ ब्राह्मण स्वभावसे ही परोपकारी, शान्तचित्त एवं अनासक्त होते हैं। वे किसीके साथ वैरभाव नहीं रखते और समदर्शी होनेपर भी प्राणियोंका कष्ट देखकर उसके निवारणके लिये पूरे हृदयसे जुट जाते हैं। उनकी सबसे बड़ी विशेषता तो यह होती है कि वे हमारे अनन्य प्रेमी एवं भक्त होते हैं॥ २०॥ सारे लोक और लोकपाल ऐसे ब्राह्मणोंकी वन्दना, पूजा और उपासना किया करते हैं। केवल वे ही क्यों; मैं, भगवान् ब्रह्मा तथा स्वयं साक्षात् ईश्‍वर विष्णु भी उनकी सेवामें संल‌ग्‍न रहते हैं॥ २१॥ ऐसे शान्त महापुरुष मुझमें, विष्णुभगवान्‌में, ब्रह्मामें, अपनेमें और सब जीवोंमें अणुमात्र भी भेद नहीं देखते। सदा-सर्वदा, सर्वत्र और सर्वथा एकरस आत्माका ही दर्शन करते हैं। इसलिये हम तुम्हारे-जैसे महात्माओंकी स्तुति और सेवा करते हैं॥ २२॥ मार्कण्डेयजी! केवल जलमय तीर्थ ही तीर्थ नहीं होते तथा केवल जड मूर्तियाँ ही देवता नहीं होतीं। सबसे बड़े तीर्थ और देवता तो तुम्हारे-जैसे संत हैं; क्योंकि वे तीर्थ और देवता बहुत दिनोंमें पवित्र करते हैं, परन्तु तुमलोग दर्शनमात्रसे ही पवित्र कर देते हो॥ २३॥ हमलोग तो ब्राह्मणोंको ही नमस्कार करते हैं; क्योंकि वे चित्तकी एकाग्रता, तपस्या, स्वाध्याय, धारणा, ध्यान और समाधिके द्वारा हमारे वेदमय शरीरको धारण करते हैं॥ २४॥ मार्कण्डेयजी! बड़े-बड़े महापापी और अन्त्यज भी तुम्हारे-जैसे महापुरुषोंके चरित्रश्रवण और दर्शनसे ही शुद्ध हो जाते हैं; फिर वे तुमलोगोंके सम्भाषण और सहवास आदिसे शुद्ध हो जायँ, इसमें तो कहना ही क्या है॥ २५॥"},{"b":43081,"kind":"topic_heading","page":961,"text":"सूत उवाच"},{"b":43082,"kind":"sanskrit_shloka","page":962,"verses":["12.10.26"],"text":"इति चन्द्रललामस्य धर्मगुह्योपबृंहितम्।"},{"b":43083,"kind":"sanskrit_shloka","page":962,"verses":["12.10.26"],"text":"वचोऽमृतायनमृषिर्नातृप्यत् कर्णयोः पिबन्॥ २६"},{"b":43084,"kind":"sanskrit_shloka","page":962,"verses":["12.10.27"],"text":"स चिरं मायया विष्णोर्भ्रामितः कर्शितो भृशम्।"},{"b":43085,"kind":"sanskrit_shloka","page":962,"verses":["12.10.27"],"text":"शिववागमृतध्वस्तक्लेशपुंजस्तमब्रवीत्॥ २७"},{"b":43086,"kind":"hindi_commentary","page":962,"explains":["12.10.26","12.10.27"],"text":"सूतजी कहते हैं—शौनकादि ऋषियो! चन्द्रभूषण भगवान् शंकरकी एक-एक बात धर्मके गुप्ततम रहस्यसे परिपूर्ण थी। उसके एक-एक अक्षरमें अमृतका समुद्र भरा हुआ था। मार्कण्डेय मुनि अपने कानोंके द्वारा पूरी तन्मयताके साथ उसका पान करते रहे; परन्तु उन्हें तृप्ति न हुई॥ २६॥ वे चिरकालतक विष्णुभगवान्‌की मायासे भटक चुके थे और बहुत थके हुए भी थे। भगवान् शिवकी कल्याणी वाणीका अमृतपान करनेसे उनके सारे क्लेश नष्ट हो गये। उन्होंने भगवान् शंकरसे इस प्रकार कहा॥ २७॥"},{"b":43087,"kind":"topic_heading","page":962,"text":"ऋषिरुवाच"},{"b":43088,"kind":"sanskrit_shloka","page":962,"verses":["12.10.28"],"text":"अहो ईश्‍वरलीलेयं दुर्विभाव्या शरीरिणाम्।"},{"b":43089,"kind":"sanskrit_shloka","page":962,"verses":["12.10.28"],"text":"यन्‍नमन्तीशितव्यानि स्तुवन्ति जगदीश्‍वराः॥ २८"},{"b":43090,"kind":"sanskrit_shloka","page":962,"verses":["12.10.29"],"text":"धर्मं ग्राहयितुं प्रायः प्रवक्तारश्‍च देहिनाम्।"},{"b":43091,"kind":"sanskrit_shloka","page":962,"verses":["12.10.29"],"text":"आचरन्त्यनुमोदन्ते क्रियमाणं स्तुवन्ति च॥ २९"},{"b":43092,"kind":"sanskrit_shloka","page":962,"verses":["12.10.30"],"text":"नैतावता भगवतः स्वमायामयवृत्तिभिः।"},{"b":43093,"kind":"sanskrit_shloka","page":962,"verses":["12.10.30"],"text":"न दुष्येतानुभावस्तैर्मायिनः कुहकं यथा॥ ३०"},{"b":43094,"kind":"sanskrit_shloka","page":962,"verses":["12.10.31"],"text":"सृष्ट्वेदं मनसा विश्‍वमात्मनानुप्रविश्य यः।"},{"b":43095,"kind":"sanskrit_shloka","page":962,"verses":["12.10.31"],"text":"गुणैः कुर्वद्भिराभाति कर्तेव स्वप्नदृग् यथा॥ ३१"},{"b":43096,"kind":"hindi_commentary","page":962,"explains":["12.10.28","12.10.29","12.10.30","12.10.31"],"text":"मार्कण्डेयजीने कहा—सचमुच सर्वशक्तिमान् भगवान्‌की यह लीला सभी प्राणियोंकी समझके परे है। भला, देखो तो सही—ये सारे जगत‍्के स्वामी होकर भी अपने अधीन रहनेवाले मेरे-जैसे जीवोंकी वन्दना और स्तुति करते हैं॥ २८॥ धर्मके प्रवचनकार प्रायः प्राणियोंको धर्मका रहस्य और स्वरूप समझानेके लिये उसका आचरण और अनुमोदन करते हैं तथा कोई धर्मका आचरण करता है तो उसकी प्रशंसा भी करते हैं॥ २९॥ जैसे जादूगर अनेकों खेल दिखलाता है और उन खेलोंसे उसके प्रभावमें कोई अन्तर नहीं पड़ता, वैसे ही आप अपनी स्वजनमोहिनी मायाकी वृत्तियोंको स्वीकार करके किसीकी वन्दना-स्तुति आदि करते हैं तो केवल इस कामके द्वारा आपकी महिमामें कोई त्रुटि नहीं आती॥ ३०॥ आपने स्वप्नद्रष्टाके समान अपने मनसे ही सम्पूर्ण विश्‍वकी सृष्टि की है और इसमें स्वयं प्रवेश करके कर्ता न होनेपर भी कर्म करनेवाले गुणोंके द्वारा कर्ताके समान प्रतीत होते हैं॥ ३१॥"},{"b":43097,"kind":"sanskrit_shloka","page":962,"verses":["12.10.32"],"text":"तस्मै नमो भगवते त्रिगुणाय गुणात्मने।"},{"b":43098,"kind":"sanskrit_shloka","page":962,"verses":["12.10.32"],"text":"केवलायाद्वितीयाय गुरवे ब्रह्ममूर्तये॥ ३२"},{"b":43099,"kind":"sanskrit_shloka","page":962,"verses":["12.10.33"],"text":"कं वृणे नु परं भूमन् वरं त्वद् वरदर्शनात्।"},{"b":43100,"kind":"sanskrit_shloka","page":962,"verses":["12.10.33"],"text":"यद्दर्शनात् पूर्णकामः सत्यकामः पुमान् भवेत्॥ ३३"},{"b":43101,"kind":"sanskrit_shloka","page":963,"verses":["12.10.34"],"text":"वरमेकं वृणेऽथापि पूर्णात् कामाभिवर्षणात्।"},{"b":43102,"kind":"sanskrit_shloka","page":963,"verses":["12.10.34"],"text":"भगवत्यच्युतां भक्तिं तत्परेषु तथा त्वयि॥ ३४"},{"b":43103,"kind":"hindi_translation","page":962,"explains":["12.10.32","12.10.33","12.10.34"],"text":"भगवन्! आप त्रिगुणस्वरूप होनेपर भी उनके परे उनकी आत्माके रूपमें स्थित हैं। आप ही समस्त ज्ञानके मूल, केवल, अद्वितीय ब्रह्मस्वरूप हैं। मैं आपको नमस्कार करता हूँ॥ ३२॥ अनन्त! आपके श्रेष्ठ दर्शनसे बढ़कर ऐसी और कौन-सी वस्तु है, जिसे मैं वरदानके रूपमें माँगूँ? मनुष्य आपके दर्शनसे ही पूर्णकाम और सत्यसंकल्प हो जाता है॥ ३३॥ आप स्वयं तो पूर्ण हैं ही, अपने भक्तोंकी भी समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाले हैं। इसलिये मैं आपका दर्शन प्राप्त कर लेनेपर भी एक वर और माँगता हूँ। वह यह कि भगवान्‌में, उनके शरणागत भक्तोंमें और आपमें मेरी अविचल भक्ति सदा-सर्वदा बनी रहे॥ ३४॥"},{"b":43104,"kind":"topic_heading","page":962,"text":"सूत उवाच"},{"b":43105,"kind":"sanskrit_shloka","page":963,"verses":["12.10.35"],"text":"इत्यर्चितोऽभिष्टुतश्‍च मुनिना सूक्तया गिरा।"},{"b":43106,"kind":"sanskrit_shloka","page":963,"verses":["12.10.35"],"text":"तमाह भगवाञ्छर्वः शर्वया चाभिनन्दितः॥ ३५"},{"b":43107,"kind":"sanskrit_shloka","page":963,"verses":["12.10.36"],"text":"कामो महर्षे सर्वोऽयं भक्तिमांस्त्वमधोक्षजे।"},{"b":43108,"kind":"sanskrit_shloka","page":963,"verses":["12.10.36"],"text":"आकल्पान्ताद् यशः पुण्यमजरामरता तथा॥ ३६"},{"b":43109,"kind":"sanskrit_shloka","page":963,"verses":["12.10.37"],"text":"ज्ञानं त्रैकालिकं ब्रह्मन् विज्ञानं च विरक्तिमत्।"},{"b":43110,"kind":"sanskrit_shloka","page":963,"verses":["12.10.37"],"text":"ब्रह्मवर्चस्विनो भूयात् पुराणाचार्यतास्तु ते॥ ३७"},{"b":43111,"kind":"hindi_commentary","page":963,"explains":["12.10.35","12.10.36","12.10.37"],"text":"सूतजी कहते हैं—शौनकजी! जब मार्कण्डेय मुनिने सुमधुर वाणीसे इस प्रकार भगवान् शंकरकी स्तुति और पूजा की, तब उन्होंने भगवती पार्वतीकी प्रसाद-प्रेरणासे यह बात कही॥ ३५॥ महर्षे! तुम्हारी सारी कामनाएँ पूर्ण हों। इन्द्रियातीत परमात्मामें तुम्हारी अनन्य भक्ति सदा-सर्वदा बनी रहे। कल्पपर्यन्त तुम्हारा पवित्र यश फैले और तुम अजर एवं अमर हो जाओ॥ ३६॥ ब्रह्मन्! तुम्हारा ब्रह्मतेज तो सर्वदा अक्षुण्ण रहेगा ही। तुम्हें भूत, भविष्य और वर्तमानके समस्त विशेष ज्ञानोंका एक अधिष्ठानरूप ज्ञान और वैराग्ययुक्त स्वरूपस्थितिकी प्राप्ति हो जाय। तुम्हें पुराणका आचार्यत्व भी प्राप्त हो॥ ३७॥"},{"b":43112,"kind":"topic_heading","page":963,"text":"सूत उवाच"},{"b":43113,"kind":"sanskrit_shloka","page":963,"verses":["12.10.38"],"text":"एवं वरान् स मुनये दत्त्वागात्त्र्यक्ष ईश्‍वरः।"},{"b":43114,"kind":"sanskrit_shloka","page":963,"verses":["12.10.38"],"text":"देव्यै तत्कर्म कथयन्‍ननुभूतं पुरामुना॥ ३८"},{"b":43115,"kind":"sanskrit_shloka","page":963,"verses":["12.10.39"],"text":"सोऽप्यवाप्तमहायोगमहिमा भार्गवोत्तमः।"},{"b":43116,"kind":"sanskrit_shloka","page":963,"verses":["12.10.39"],"text":"विचरत्यधुनाप्यद्धा हरावेकान्ततां गतः॥ ३९"},{"b":43117,"kind":"sanskrit_shloka","page":963,"verses":["12.10.40"],"text":"अनुवर्णितमेतत्ते मार्कण्डेयस्य धीमतः।"},{"b":43118,"kind":"sanskrit_shloka","page":963,"verses":["12.10.40"],"text":"अनुभूतं भगवतो मायावैभवमद्भुतम्॥ ४०"},{"b":43119,"kind":"sanskrit_shloka","page":963,"verses":["12.10.41"],"text":"एतत् केचिदविद्वांसो मायासंसृतिमात्मनः।"},{"b":43120,"kind":"sanskrit_shloka","page":963,"verses":["12.10.41"],"text":"अनाद्यावर्तितं नॄणां कादाचित्कं प्रचक्षते॥ ४१"},{"b":43121,"kind":"hindi_commentary","page":963,"explains":["12.10.38","12.10.39","12.10.40","12.10.41"],"text":"सूतजी कहते हैं—शौनकजी! इस प्रकार त्रिलोचन भगवान् शंकर मार्कण्डेय मुनिको वर देकर भगवती पार्वतीसे मार्कण्डेय मुनिकी तपस्या और उनके प्रलयसम्बन्धी अनुभवोंका वर्णन करते हुए वहाँसे चले गये॥ ३८॥ भृगुवंशशिरोमणि मार्कण्डेय मुनिको उनके महायोगका परम फल प्राप्त हो गया। वे भगवान्‌के अनन्यप्रेमी हो गये। अब भी वे भक्तिभावभरित हृदयसे पृथ्वीपर विचरण किया करते हैं॥ ३९॥ परम ज्ञानसम्पन्‍न मार्कण्डेय मुनिने भगवान्‌की योगमायासे जिस अद्भुत लीलाका अनुभव किया था, वह मैंने आपलोगोंको सुना दिया॥ ४०॥ शौनकजी! यह जो मार्कण्डेयजीने अनेक कल्पोंका—सृष्टि-प्रलयोंका अनुभव किया, वह भगवान्‌की मायाका ही वैभव था, तात्कालिक था और उन्हींके लिये था, सर्वसाधारणके लिये नहीं। कोई-कोई इस मायाकी रचनाको न जानकर अनादिकालसे बार-बार होनेवाले सृष्टि-प्रलय ही इसको भी बतलाते हैं। (इसलिये आपको यह शंका नहीं करनी चाहिये कि इसी कल्पके हमारे पूर्वज मार्कण्डेयजीकी आयु इतनी लम्बी कैसे हो गयी?)॥ ४१॥"},{"b":43122,"kind":"sanskrit_shloka","page":964,"verses":["12.10.42"],"text":"य एवमेतद् भृगुवर्य वर्णितं"},{"b":43123,"kind":"sanskrit_shloka","page":964,"verses":["12.10.42"],"text":"रथांगपाणेरनुभावभावितम् ।"},{"b":43124,"kind":"sanskrit_shloka","page":964,"verses":["12.10.42"],"text":"संश्रावयेत् संशृणुयादु तावुभौ"},{"b":43125,"kind":"sanskrit_shloka","page":964,"verses":["12.10.42"],"text":"तयोर्न कर्माशयसंसृतिर्भवेत्॥ ४२"},{"b":43126,"kind":"hindi_translation","page":964,"explains":["12.10.42"],"text":"भृगुवंशशिरोमणे! मैंने आपको यह जो मार्कण्डेय-चरित्र सुनाया है, वह भगवान् चक्रपाणिके प्रभाव और महिमासे भरपूर है। जो इसका श्रवण एवं कीर्तन करते हैं, वे दोनों ही कर्म-वासनाओंके कारण प्राप्त होनेवाले आवागमनके चक्करसे सर्वदाके लिये छूट जाते हैं॥ ४२॥"},{"b":43127,"kind":"hindi_translation","page":964,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां द्वादशस्कन्धे दशमोऽध्यायः॥ १०॥"}],"notes":[{"id":"v2:433","mark":"१","page":960,"after_verse":"12.10.11","text":"त्र्यक्षमष्टभुजम्।"},{"id":"v2:434","mark":"२","page":960,"after_verse":"12.10.12","text":"तोमरैः।"},{"id":"v2:435","mark":"३","page":960,"after_verse":"12.10.14","text":"विलोक्यैक०।"},{"id":"v2:436","mark":"४","page":960,"after_verse":"12.10.15","text":"प्राचीन प्रतिमें ‘तस्मै......सहोमया’ इस श्‍लोकार्धके स्थानमें ‘विमुच्यात्मसमाधानं तपसा नियमैर्यमैः’ ऐसा पाठ है। इसके सिवा वर्तमान प्रतिमें जो २५वीं संख्याका ‘श्रवणाद्दर्शना.......किन्‍नु सम्भाषणादिभिः’ यह श्‍लोक है। इसको वहाँ न पढ़कर यहाँ ही (‘विमुच्या.....यमैः’ इसके बाद) पढ़ा गया है। इसके पश्‍चात् ‘स्वागतासन......’ इत्यादि श्‍लोकोंका पाठ है।"},{"id":"v2:437","mark":"५","page":960,"after_verse":"12.10.17","text":"देवाय नित्याय प्रमृ०।"}],"corrections":{"count":5,"list":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/shuddhi/"}}