{"id":"2.10","title":"द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 10","part":"द्वितीय स्कन्ध","heading":"अथ दशमोऽध्यायः","topics":["भागवतके दस लक्षण"],"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/10/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 2.10.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/10/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":1,"pages":[227,234]},"verses":[{"id":"2.10.1","number":1,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/10/1/","page":228,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अत्र सर्गो विसर्गश्‍च स्थानं पोषणमूतयः।","मन्वन्तरेशानुकथा निरोधो मुक्तिराश्रयः॥ १"],"iast":["atra sargo visargaśca sthānaṃ poṣaṇamūtayaḥ|","manvantareśānukathā nirodho muktirāśrayaḥ|| 1"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! इस भागवतपुराणमें सर्ग, विसर्ग, स्थान, पोषण, ऊति, मन्वन्तर, ईशानुकथा, निरोध, मुक्ति और आश्रय—इन दस विषयोंका वर्णन है॥ १॥"},{"id":"2.10.2","number":2,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/10/2/","page":228,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["दशमस्य विशुद्ध्यर्थं नवानामिह लक्षणम्।","वर्णयन्ति महात्मानः श्रुतेनार्थेन चाञ्जसा॥ २"],"iast":["daśamasya viśuddhyarthaṃ navānāmiha lakṣaṇam|","varṇayanti mahātmānaḥ śrutenārthena cāñjasā|| 2"],"meaning":"इनमें जो दसवाँ आश्रय-तत्त्व है, उसीका ठीक-ठीक निश्‍चय करनेके लिये कहीं श्रुतिसे, कहीं तात्पर्यसे और कहीं दोनोंके अनुकूल अनुभवसे महात्माओंने अन्य नौ विषयोंका बड़ी सुगम रीतिसे वर्णन किया है॥ २॥"},{"id":"2.10.3","number":3,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/10/3/","page":228,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["भूतमात्रेन्द्रियधियां जन्म सर्ग उदाहृतः।","ब्रह्मणो गुणवैषम्याद् विसर्गः पौरुषः स्मृतः॥ ३"],"iast":["bhūtamātrendriyadhiyāṃ janma sarga udāhṛtaḥ|","brahmaṇo guṇavaiṣamyād visargaḥ pauruṣaḥ smṛtaḥ|| 3"],"meaning":"ईश्‍वरकी प्रेरणासे गुणोंमें क्षोभ होकर रूपान्तर होनेसे जो आकाशादि पंचभूत, शब्दादि तन्मात्राएँ, इन्द्रियाँ, अहंकार और महत्तत्त्वकी उत्पत्ति होती है, उसको ‘सर्ग’ कहते हैं। उस विराट् पुरुषसे उत्पन्‍न ब्रह्माजीके द्वारा जो विभिन्‍न चराचर सृष्टियोंका निर्माण होता है, उसका नाम है ‘विसर्ग’॥ ३॥"},{"id":"2.10.4","number":4,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/10/4/","page":228,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स्थितिर्वैकुण्ठविजयः पोषणं तदनुग्रहः।","मन्वन्तराणि सद्धर्म ऊतयः कर्मवासनाः॥ ४"],"iast":["sthitirvaikuṇṭhavijayaḥ poṣaṇaṃ tadanugrahaḥ|","manvantarāṇi saddharma ūtayaḥ karmavāsanāḥ|| 4"],"meaning":"प्रतिपद नाशकी ओर बढ़नेवाली सृष्टिको एक मर्यादामें स्थिर रखनेसे भगवान् विष्णुकी जो श्रेष्ठता सिद्ध होती है, उसका नाम ‘स्थान’ है। अपने द्वारा सुरक्षित सृष्टिमें भक्तोंके ऊपर उनकी जो कृपा होती है, उसका नाम है ‘पोषण’। मन्वन्तरोंके अधिपति जो भगवद्भक्ति और प्रजापालनरूप शुद्ध धर्मका अनुष्ठान करते हैं, उसे ‘मन्वन्तर’ कहते हैं। जीवोंकी वे वासनाएँ, जो कर्मके द्वारा उन्हें बन्धनमें डाल देती हैं, ‘ऊति’ नामसे कही जाती हैं॥ ४॥"},{"id":"2.10.5","number":5,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/10/5/","page":228,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अवतारानुचरितं हरेश्‍चास्यानुवर्तिनाम्।","सतामीशकथाः प्रोक्ता नानाख्यानोपबृंहिताः॥ ५"],"iast":["avatārānucaritaṃ hareścāsyānuvartinām|","satāmīśakathāḥ proktā nānākhyānopabṛṃhitāḥ|| 5"],"meaning":"भगवान्‌के विभिन्‍न अवतारोंके और उनके प्रेमी भक्तोंकी विविध आख्यानोंसे युक्त गाथाएँ ‘ईशकथा’ हैं॥ ५॥"},{"id":"2.10.6","number":6,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/10/6/","page":228,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["निरोधोऽस्यानुशयनमात्मनः सह शक्तिभिः।","मुक्तिर्हित्वान्यथारूपं स्वरूपेण व्यवस्थितिः॥ ६"],"iast":["nirodho'syānuśayanamātmanaḥ saha śaktibhiḥ|","muktirhitvānyathārūpaṃ svarūpeṇa vyavasthitiḥ|| 6"],"meaning":"जब भगवान् योगनिद्रा स्वीकार करके शयन करते हैं, तब इस जीवका अपनी उपाधियोंके साथ उनमें लीन हो जाना ‘निरोध’ है। अज्ञानकल्पित कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदि अनात्मभावका परित्याग करके अपने वास्तविक स्वरूप परमात्मामें स्थित होना ही ‘मुक्ति’ है॥ ६॥"},{"id":"2.10.7","number":7,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/10/7/","page":228,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["आभासश्‍च निरोधश्‍च यतश्चाध्यवसीयते।","स आश्रयः परं ब्रह्म परमात्मेति शब्द्यते॥ ७"],"iast":["ābhāsaśca nirodhaśca yataścādhyavasīyate|","sa āśrayaḥ paraṃ brahma paramātmeti śabdyate|| 7"],"meaning":"परीक्षित्! इस चराचर जगत‍्की उत्पत्ति और प्रलय जिस तत्त्वसे प्रकाशित होते हैं, वह परम ब्रह्म ही आश्रय’ है। शास्त्रोंमें उसीको परमात्मा कहा गया है॥ ७॥"},{"id":"2.10.8","number":8,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/10/8/","page":229,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["योऽध्यात्मिकोऽयं पुरुषः सोऽसावेवाधिदैविकः।","यस्तत्रोभयविच्छेदः पुरुषो ह्याधिभौतिकः॥ ८"],"iast":["yo'dhyātmiko'yaṃ puruṣaḥ so'sāvevādhidaivikaḥ|","yastatrobhayavicchedaḥ puruṣo hyādhibhautikaḥ|| 8"],"meaning":"जो नेत्र आदि इन्द्रियोंका अभिमानी द्रष्टा जीव है, वही इन्द्रियोंके अधिष्ठातृदेवता सूर्य आदिके रूपमें भी है और जो नेत्रगोलक आदिसे युक्त दृश्य देह है, वही उन दोनोंको अलग-अलग करता है॥ ८॥"},{"id":"2.10.9","number":9,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/10/9/","page":229,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एकमेकतराभावे यदा नोपलभामहे।","त्रितयं तत्र यो वेद स आत्मा स्वाश्रयाश्रयः॥ ९"],"iast":["ekamekatarābhāve yadā nopalabhāmahe|","tritayaṃ tatra yo veda sa ātmā svāśrayāśrayaḥ|| 9"],"meaning":"इन तीनोंमें यदि एकका भी अभाव हो जाय तो दूसरे दोकी उपलब्धि नहीं हो सकती। अतः जो इन तीनोंको जानता है, वह परमात्मा ही सबका अधिष्ठान ‘आश्रय’ तत्त्व है। उसका आश्रय वह स्वयं ही है, दूसरा कोई नहीं॥ ९॥"},{"id":"2.10.10","number":10,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/10/10/","page":229,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["पुरुषोऽण्डं विनिर्भिद्य यदासौ स विनिर्गतः।","आत्मनोऽयनमन्विच्छन्‍नपोऽस्राक्षीच्छुचिः शुचीः॥ १०"],"iast":["puruṣo'ṇḍaṃ vinirbhidya yadāsau sa vinirgataḥ|","ātmano'yanamanvicchannapo'srākṣīcchuciḥ śucīḥ|| 10"],"meaning":"जब पूर्वोक्त विराट् पुरुष ब्रह्माण्डको फोड़कर निकला, तब वह अपने रहनेका स्थान ढूँढने लगा और स्थानकी इच्छासे उस शुद्ध-संकल्प पुरुषने अत्यन्त पवित्र जलकी सृष्टि की॥ १०॥"},{"id":"2.10.11","number":11,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/10/11/","page":229,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तास्ववात्सीत् स्वसृष्टासु सहस्रपरिवत्सरान्।","तेन नारायणो नाम यदापः पुरुषोद्भवाः॥ ११"],"iast":["tāsvavātsīt svasṛṣṭāsu sahasraparivatsarān|","tena nārāyaṇo nāma yadāpaḥ puruṣodbhavāḥ|| 11"],"meaning":"विराट् पुरुषरूप ‘नर’ से उत्पन्‍न होनेके कारण ही जलका नाम ‘नार’ पड़ा और उस अपने उत्पन्‍न किये हुए ‘नार’ में वह पुरुष एक हजार वर्षोंतक रहा, इसीसे उसका नाम ‘नारायण’ हुआ॥ ११॥"},{"id":"2.10.12","number":12,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/10/12/","page":229,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["द्रव्यं कर्म च कालश्‍च स्वभावो जीव एव च।","यदनुग्रहतः सन्ति न सन्ति यदुपेक्षया॥ १२"],"iast":["dravyaṃ karma ca kālaśca svabhāvo jīva eva ca|","yadanugrahataḥ santi na santi yadupekṣayā|| 12"],"meaning":"उन नारायणभगवान्‌की कृपासे ही द्रव्य, कर्म, काल, स्वभाव और जीव आदिकी सत्ता है। उनके उपेक्षा कर देनेपर और किसीका अस्तित्व नहीं रहता॥ १२॥"},{"id":"2.10.13","number":13,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/10/13/","page":229,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एको नानात्वमन्विच्छन् योगतल्पात् समुत्थितः।","वीर्यं हिरण्मयं देवो मायया व्यसृजत् त्रिधा॥ १३"],"iast":["eko nānātvamanvicchan yogatalpāt samutthitaḥ|","vīryaṃ hiraṇmayaṃ devo māyayā vyasṛjat tridhā|| 13"],"meaning":"उन अद्वितीय भगवान् नारायणने योगनिद्रासे जगकर अनेक होनेकी इच्छा की। तब अपनी मायासे उन्होंने अखिल ब्रह्माण्डके बीजस्वरूप अपने सुवर्णमय वीर्यको तीन भागोंमें विभक्त कर दिया—अधिदैव, अध्यात्म और अधिभूत। परीक्षित्! विराट् पुरुषका एक ही वीर्य तीन भागोंमें कैसे विभक्त हुआ, सो सुनो॥ १३-१४॥","meaning_covers":[13,14]},{"id":"2.10.14","number":14,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/10/14/","page":229,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अधिदैवमथाध्यात्ममधिभूतमिति प्रभुः।","यथैकं पौरुषं वीर्यं त्रिधाभिद्यत तच्छृणु॥ १४"],"iast":["adhidaivamathādhyātmamadhibhūtamiti prabhuḥ|","yathaikaṃ pauruṣaṃ vīryaṃ tridhābhidyata tacchṛṇu|| 14"],"meaning":"उन अद्वितीय भगवान् नारायणने योगनिद्रासे जगकर अनेक होनेकी इच्छा की। तब अपनी मायासे उन्होंने अखिल ब्रह्माण्डके बीजस्वरूप अपने सुवर्णमय वीर्यको तीन भागोंमें विभक्त कर दिया—अधिदैव, अध्यात्म और अधिभूत। परीक्षित्! विराट् पुरुषका एक ही वीर्य तीन भागोंमें कैसे विभक्त हुआ, सो सुनो॥ १३-१४॥","meaning_covers":[13,14]},{"id":"2.10.15","number":15,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/10/15/","page":229,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अन्तःशरीर आकाशात् पुरुषस्य विचेष्टतः।","ओजः सहो बलं जज्ञे ततः प्राणो महानसुः॥ १५"],"iast":["antaḥśarīra ākāśāt puruṣasya viceṣṭataḥ|","ojaḥ saho balaṃ jajñe tataḥ prāṇo mahānasuḥ|| 15"],"meaning":"विराट् पुरुषके हिलने-डोलनेपर उनके शरीरमें रहनेवाले आकाशसे इन्द्रियबल, मनोबल और शरीरबलकी उत्पत्ति हुई। उनसे इन सबका राजा प्राण उत्पन्‍न हुआ॥ १५॥"},{"id":"2.10.16","number":16,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/10/16/","page":229,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अनुप्राणन्ति यं प्राणाः प्राणन्तं सर्वजन्तुषु।","अपानन्तमपानन्ति नरदेवमिवानुगाः॥ १६"],"iast":["anuprāṇanti yaṃ prāṇāḥ prāṇantaṃ sarvajantuṣu|","apānantamapānanti naradevamivānugāḥ|| 16"],"meaning":"जैसे सेवक अपने स्वामी राजाके पीछे-पीछे चलते हैं, वैसे ही सबके शरीरोंमें प्राणके प्रबल रहनेपर ही सारी इन्द्रियाँ प्रबल रहती हैं और जब वह सुस्त पड़ जाता है, तब सारी इन्द्रियाँ भी सुस्त हो जाती हैं॥ १६॥"},{"id":"2.10.17","number":17,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/10/17/","page":230,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["प्राणेन क्षिपता क्षुत् तृडन्तरा जायते प्रभोः।","पिपासतो जक्षतश्‍च प्राङ्मुखं निरभिद्यत॥ १७"],"iast":["prāṇena kṣipatā kṣut tṛḍantarā jāyate prabhoḥ|","pipāsato jakṣataśca prāṅmukhaṃ nirabhidyata|| 17"],"meaning":"जब प्राण जोरसे आने-जाने लगा, तब विराट् पुरुषको भूख-प्यासका अनुभव हुआ। खाने-पीनेकी इच्छा करते ही सबसे पहले उनके शरीरमें मुख प्रकट हुआ॥ १७॥"},{"id":"2.10.18","number":18,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/10/18/","page":230,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["मुखतस्तालु निर्भिन्‍नं जिह्वा तत्रोपजायते।","ततो नानारसो जज्ञे जिह्वया योऽधिगम्यते॥ १८"],"iast":["mukhatastālu nirbhinnaṃ jihvā tatropajāyate|","tato nānāraso jajñe jihvayā yo'dhigamyate|| 18"],"meaning":"मुखसे तालु और तालुसे रसनेन्द्रिय प्रकट हुई। इसके बाद अनेकों प्रकारके रस उत्पन्‍न हुए, जिन्हें रसना ग्रहण करती है॥ १८॥"},{"id":"2.10.19","number":19,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/10/19/","page":230,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["विवक्षोर्मुखतो भूम्नो वह्निर्वाग् व्याहृतं तयोः।","जले वै तस्य सुचिरं निरोधः समजायत॥ १९"],"iast":["vivakṣormukhato bhūmno vahnirvāg vyāhṛtaṃ tayoḥ|","jale vai tasya suciraṃ nirodhaḥ samajāyata|| 19"],"meaning":"जब उनकी इच्छा बोलनेकी हुई तब वाक्-इन्द्रिय, उसके अधिष्ठातृदेवता अग्‍नि और उनका विषय बोलना—ये तीनों प्रकट हुए। इसके बाद बहुत दिनोंतक उस जलमें ही वे रुके रहे॥ १९॥"},{"id":"2.10.20","number":20,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/10/20/","page":230,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["नासिके निरभिद्येतां दोधूयति नभस्वति।","तत्र वायुर्गन्धवहो घ्राणो नसि जिघृक्षतः॥ २०"],"iast":["nāsike nirabhidyetāṃ dodhūyati nabhasvati|","tatra vāyurgandhavaho ghrāṇo nasi jighṛkṣataḥ|| 20"],"meaning":"श्वासके वेगसे नासिका-छिद्र प्रकट हो गये। जब उन्हें सूँघनेकी इच्छा हुई, तब उनकी नाक घ्राणेन्द्रिय आकर बैठ गयी और उसके देवता गन्धको फैलानेवाले वायुदेव प्रकट हुए॥ २०॥"},{"id":"2.10.21","number":21,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/10/21/","page":230,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यदाऽऽत्मनि निरालोकमात्मानं च दिदृक्षतः।","निर्भिन्‍ने ह्यक्षिणी तस्य ज्योतिश्‍चक्षुर्गुणग्रहः॥ २१"],"iast":["yadā''tmani nirālokamātmānaṃ ca didṛkṣataḥ|","nirbhinne hyakṣiṇī tasya jyotiścakṣurguṇagrahaḥ|| 21"],"meaning":"पहले उनके शरीरमें प्रकाश नहीं था; फिर जब उन्हें अपनेको तथा दूसरी वस्तुओंको देखनेकी इच्छा हुई, तब नेत्रोंके छिद्र, उनका अधिष्ठाता सूर्य और नेत्रेन्द्रिय प्रकट हो गये। इन्हींसे रूपका ग्रहण होने लगा॥ २१॥"},{"id":"2.10.22","number":22,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/10/22/","page":230,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["बोध्यमानस्य ऋषिभिरात्मनस्तज्जिघृक्षतः।","कर्णौ च निरभिद्येतां दिशः श्रोत्रं गुणग्रहः॥ २२"],"iast":["bodhyamānasya ṛṣibhirātmanastajjighṛkṣataḥ|","karṇau ca nirabhidyetāṃ diśaḥ śrotraṃ guṇagrahaḥ|| 22"],"meaning":"जब वेदरूप ऋषि विराट् पुरुषको स्तुतियोंके द्वारा जगाने लगे, तब उन्हें सुननेकी इच्छा हुई। उसी समय कान, उनकी अधिष्ठातृदेवता दिशाएँ और श्रोत्रेन्द्रिय प्रकट हुई। इसीसे शब्द सुनायी पड़ता है॥ २२॥"},{"id":"2.10.23","number":23,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/10/23/","page":230,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["वस्तुनो मृदुकाठिन्यलघुगुर्वोष्णशीतताम्।","जिघृक्षतस्त्वङ् निर्भिन्‍ना तस्यां रोममहीरुहाः।","तत्र चान्तर्बहिर्वातस्त्वचा लब्धगुणो वृतः॥ २३"],"iast":["vastuno mṛdukāṭhinyalaghugurvoṣṇaśītatām|","jighṛkṣatastvaṅ nirbhinnā tasyāṃ romamahīruhāḥ|","tatra cāntarbahirvātastvacā labdhaguṇo vṛtaḥ|| 23"],"meaning":"जब उन्होंने वस्तुओंकी कोमलता, कठिनता, हलकापन, भारीपन, उष्णता और शीतलता आदि जाननी चाही तब उनके शरीरमें चर्म प्रकट हुआ। पृथ्वीमेंसे जैसे वृक्ष निकल आते हैं, उसी प्रकार उस चर्ममें रोएँ पैदा हुए और उसके भीतर-बाहर रहनेवाला वायु भी प्रकट हो गया। स्पर्श ग्रहण करनेवाली त्वचा-इन्द्रिय भी साथ-ही-साथ शरीरमें चारों ओर लिपट गयी और उससे उन्हें स्पर्शका अनुभव होने लगा॥ २३॥"},{"id":"2.10.24","number":24,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/10/24/","page":230,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["हस्तौ रुरुहतुस्तस्य नानाकर्मचिकीर्षया।","तयोस्तु बलमिन्द्रश्‍च आदानमुभयाश्रयम्॥ २४"],"iast":["hastau ruruhatustasya nānākarmacikīrṣayā|","tayostu balamindraśca ādānamubhayāśrayam|| 24"],"meaning":"जब उन्हें अनेकों प्रकारके कर्म करनेकी इच्छा हुई, तब उनके हाथ उग आये। उन हाथोंमें ग्रहण करनेकी शक्ति हस्तेन्द्रिय तथा उनके अधिदेवता इन्द्र प्रकट हुए और दोनोंके आश्रयसे होनेवाला ग्रहणरूप कर्म भी प्रकट हो गया॥ २४॥"},{"id":"2.10.25","number":25,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/10/25/","page":231,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["गतिं जिगीषतः पादौ रुरुहातेऽभिकामिकाम्।","पद‍्भ्यां यज्ञः स्वयं हव्यं कर्मभिः क्रियते नृभिः॥ २५"],"iast":["gatiṃ jigīṣataḥ pādau ruruhāte'bhikāmikām|","padbhyāṃ yajñaḥ svayaṃ havyaṃ karmabhiḥ kriyate nṛbhiḥ|| 25"],"meaning":"जब उन्हें अभीष्ट स्थानपर जानेकी इच्छा हुई, तब उनके शरीरमें पैर उग आये। चरणोंके साथ ही चरण-इन्द्रियके अधिष्ठातारूपमें वहाँ स्वयं यज्ञपुरुष भगवान् विष्णु स्थित हो गये और उन्हींमें चलनारूप कर्म प्रकट हुआ। मनुष्य इसी चरणेन्द्रियसे चलकर यज्ञ-सामग्री एकत्र करते हैं॥ २५॥"},{"id":"2.10.26","number":26,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/10/26/","page":231,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["निरभिद्यत शिश्नो वै प्रजानन्दामृतार्थिनः।","उपस्थ आसीत् कामानां प्रियं तदुभयाश्रयम्॥ २६"],"iast":["nirabhidyata śiśno vai prajānandāmṛtārthinaḥ|","upastha āsīt kāmānāṃ priyaṃ tadubhayāśrayam|| 26"],"meaning":"सन्तान, रति और स्वर्ग-भोगकी कामना होनेपर विराट् पुरुषके शरीरमें लिंगकी उत्पत्ति हुई। उसमें उपस्थेन्द्रिय और प्रजापति देवता तथा इन दोनोंके आश्रय रहनेवाले कामसुखका आविर्भाव हुआ॥ २६॥"},{"id":"2.10.27","number":27,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/10/27/","page":231,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["उत्सिसृक्षोर्धातुमलं निरभिद्यत वै गुदम्।","ततः पायुस्ततो मित्र उत्सर्ग उभयाश्रयः॥ २७"],"iast":["utsisṛkṣordhātumalaṃ nirabhidyata vai gudam|","tataḥ pāyustato mitra utsarga ubhayāśrayaḥ|| 27"],"meaning":"जब उन्हें मलत्यागकी इच्छा हुई, तब गुदाद्वार प्रकट हुआ। तत्पश्चात् उसमें पायु-इन्द्रिय और मित्र-देवता उत्पन्‍न हुए। इन्हीं दोनोंके द्वारा मलत्यागकी क्रिया सम्पन्‍न होती है॥ २७॥"},{"id":"2.10.28","number":28,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/10/28/","page":231,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["आसिसृप्सोः पुरः पुर्या नाभिद्वारमपानतः।","तत्रापानस्ततो मृत्युः पृथक्त्वमुभयाश्रयम्॥ २८"],"iast":["āsisṛpsoḥ puraḥ puryā nābhidvāramapānataḥ|","tatrāpānastato mṛtyuḥ pṛthaktvamubhayāśrayam|| 28"],"meaning":"अपानमार्गद्वारा एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जानेकी इच्छा होनेपर नाभिद्वार प्रकट हुआ। उससे अपान और मृत्यु देवता प्रकट हुए। इन दोनोंके आश्रयसे ही प्राण और अपानका बिछोह यानी मृत्यु होती है॥ २८॥"},{"id":"2.10.29","number":29,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/10/29/","page":231,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["आदित्सोरन्‍नपानानामासन् कुक्ष्यन्त्रनाडयः।","नद्यः समुद्राश्‍च तयोस्तुष्टिः पुष्टिस्तदाश्रये॥ २९"],"iast":["āditsorannapānānāmāsan kukṣyantranāḍayaḥ|","nadyaḥ samudrāśca tayostuṣṭiḥ puṣṭistadāśraye|| 29"],"meaning":"जब विराट् पुरुषको अन्‍न-जल ग्रहण करनेकी इच्छा हुई, तब कोख, आँतें और नाड़ियाँ उत्पन्‍न हुईं। साथ ही कुक्षिके देवता समुद्र, नाड़ियोंके देवता नदियाँ एवं तुष्टि और पुष्टि—ये दोनों उनके आश्रित विषय उत्पन्‍न हुए॥ २९॥"},{"id":"2.10.30","number":30,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/10/30/","page":231,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["निदिध्यासोरात्ममायां हृदयं निरभिद्यत।","ततो मनस्ततश्‍चन्द्रः सङ्कल्पः काम एव च॥ ३०"],"iast":["nididhyāsorātmamāyāṃ hṛdayaṃ nirabhidyata|","tato manastataścandraḥ saṅkalpaḥ kāma eva ca|| 30"],"meaning":"जब उन्होंने अपनी मायापर विचार करना चाहा, तब हृदयकी उत्पत्ति हुई। उससे मनरूप इन्द्रिय और मनसे उसका देवता चन्द्रमा तथा विषय, कामना और संकल्प प्रकट हुए॥ ३०॥"},{"id":"2.10.31","number":31,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/10/31/","page":231,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["त्वक्चर्ममांसरुधिरमेदोमज्जास्थिधातवः ।","भूम्यप्तेजोमयाः सप्त प्राणो व्योमाम्बुवायुभिः॥ ३१"],"iast":["tvakcarmamāṃsarudhiramedomajjāsthidhātavaḥ |","bhūmyaptejomayāḥ sapta prāṇo vyomāmbuvāyubhiḥ|| 31"],"meaning":"विराट् पुरुषके शरीरमें पृथ्वी, जल और तेजसे सात धातुएँ प्रकट हुईं—त्वचा, चर्म, मांस, रुधिर, मेद, मज्जा और अस्थि। इसी प्रकार आकाश, जल और वायुसे प्राणोंकी उत्पत्ति हुई॥ ३१॥"},{"id":"2.10.32","number":32,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/10/32/","page":231,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["गुणात्मकानीन्द्रियाणि भूतादिप्रभवा गुणाः।","मनः सर्वविकारात्मा बुद्धिर्विज्ञानरूपिणी॥ ३२"],"iast":["guṇātmakānīndriyāṇi bhūtādiprabhavā guṇāḥ|","manaḥ sarvavikārātmā buddhirvijñānarūpiṇī|| 32"],"meaning":"श्रोत्रादि सब इन्द्रियाँ शब्दादि विषयोंको ग्रहण करनेवाली हैं। वे विषय अहंकारसे उत्पन्‍न हुए हैं। मन सब विकारोंका उत्पत्तिस्थान है और बुद्धि समस्त पदार्थोंका बोध करानेवाली है॥ ३२॥"},{"id":"2.10.33","number":33,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/10/33/","page":232,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एतद्भगवतो रूपं स्थूलं ते व्याहृतं मया।","मह्यादिभिश्चावरणैरष्टभिर्बहिरावृतम् ॥ ३३"],"iast":["etadbhagavato rūpaṃ sthūlaṃ te vyāhṛtaṃ mayā|","mahyādibhiścāvaraṇairaṣṭabhirbahirāvṛtam || 33"],"meaning":"मैंने भगवान्‌के इस स्थूलरूपका वर्णन तुम्हें सुनाया है। यह बाहरकी ओरसे पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, अहंकार, महत्तत्त्व और प्रकृति—इन आठ आवरणोंसे घिरा हुआ है॥ ३३॥"},{"id":"2.10.34","number":34,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/10/34/","page":232,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अतः परं सूक्ष्मतममव्यक्तं निर्विशेषणम्।","अनादिमध्यनिधनं नित्यं वाङ्मनसः परम्॥ ३४"],"iast":["ataḥ paraṃ sūkṣmatamamavyaktaṃ nirviśeṣaṇam|","anādimadhyanidhanaṃ nityaṃ vāṅmanasaḥ param|| 34"],"meaning":"इससे परे भगवान्‌का अत्यन्त सूक्ष्मरूप है। वह अव्यक्त, निर्विशेष, आदि, मध्य और अन्तसे रहित एवं नित्य है। वाणी और मनकी वहाँतक पहुँच नहीं है॥ ३४॥"},{"id":"2.10.35","number":35,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/10/35/","page":232,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अमुनी भगवद्रूपे मया ते अनुवर्णिते।","उभे अपि न गृह्णन्ति मायासृष्टे विपश्चितः॥ ३५"],"iast":["amunī bhagavadrūpe mayā te anuvarṇite|","ubhe api na gṛhṇanti māyāsṛṣṭe vipaścitaḥ|| 35"],"meaning":"मैंने तुम्हें भगवान्‌के स्थूल और सूक्ष्म—व्यक्त और अव्यक्त जिन दो रूपोंका वर्णन सुनाया है, ये दोनों ही भगवान्‌की मायाके द्वारा रचित हैं। इसलिये विद्वान् पुरुष इन दोनोंको ही स्वीकार नहीं करते॥ ३५॥"},{"id":"2.10.36","number":36,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/10/36/","page":232,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स वाच्यवाचकतया भगवान् ब्रह्मरूपधृक्।","नामरूपक्रिया धत्ते सकर्माकर्मकः परः॥ ३६"],"iast":["sa vācyavācakatayā bhagavān brahmarūpadhṛk|","nāmarūpakriyā dhatte sakarmākarmakaḥ paraḥ|| 36"],"meaning":"वास्तवमें भगवान् निष्क्रिय हैं। अपनी शक्तिसे ही वे सक्रिय बनते हैं। फिर तो वे ब्रह्माका या विराट्रूप धारण करके वाच्य और वाचक—शब्द और उसके अर्थके रूपमें प्रकट होते हैं और अनेकों नाम, रूप तथा क्रियाएँ स्वीकार करते हैं॥ ३६॥"},{"id":"2.10.37","number":37,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/10/37/","page":232,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["प्रजापतीन्मनून् देवानृषीन् पितृगणान् पृथक्।","सिद्धचारणगन्धर्वान् विद्याध्रासुरगुह्यकान्॥ ३७"],"iast":["prajāpatīnmanūn devānṛṣīn pitṛgaṇān pṛthak|","siddhacāraṇagandharvān vidyādhrāsuraguhyakān|| 37"],"meaning":"परीक्षित्! प्रजापति, मनु, देवता, ऋषि, पितर, सिद्ध, चारण, गन्धर्व, विद्याधर, असुर, यक्ष, किन्‍नर,अप्सराएँ, नाग, सर्प, किम्पुरुष, उरग, मातृकाएँ, राक्षस, पिशाच, प्रेत, भूत, विनायक, कूष्माण्ड, उन्माद, वेताल, यातुधान, ग्रह, पक्षी, मृग, पशु, वृक्ष, पर्वत, सरीसृप इत्यादि जितने भी संसारमें नाम-रूप हैं, सब भगवान्‌के ही हैं॥ ३७—३९॥","meaning_covers":[37,39]},{"id":"2.10.38","number":38,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/10/38/","page":232,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["किन्‍नराप्सरसो नागान् सर्पान् किम्पुरुषोरगान्।","मातॄ रक्षःपिशाचांश्‍च प्रेतभूतविनायकान्॥ ३८"],"iast":["kinnarāpsaraso nāgān sarpān kimpuruṣoragān|","mātṝ rakṣaḥpiśācāṃśca pretabhūtavināyakān|| 38"],"meaning":"परीक्षित्! प्रजापति, मनु, देवता, ऋषि, पितर, सिद्ध, चारण, गन्धर्व, विद्याधर, असुर, यक्ष, किन्‍नर,अप्सराएँ, नाग, सर्प, किम्पुरुष, उरग, मातृकाएँ, राक्षस, पिशाच, प्रेत, भूत, विनायक, कूष्माण्ड, उन्माद, वेताल, यातुधान, ग्रह, पक्षी, मृग, पशु, वृक्ष, पर्वत, सरीसृप इत्यादि जितने भी संसारमें नाम-रूप हैं, सब भगवान्‌के ही हैं॥ ३७—३९॥","meaning_covers":[37,39]},{"id":"2.10.39","number":39,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/10/39/","page":232,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कूष्माण्डोन्मादवेतालान् यातुधानान् ग्रहानपि।","खगान्मृगान् पशून् वृक्षान् गिरीन्‍नृप सरीसृपान्॥ ३९"],"iast":["kūṣmāṇḍonmādavetālān yātudhānān grahānapi|","khagānmṛgān paśūn vṛkṣān girīnnṛpa sarīsṛpān|| 39"],"meaning":"परीक्षित्! प्रजापति, मनु, देवता, ऋषि, पितर, सिद्ध, चारण, गन्धर्व, विद्याधर, असुर, यक्ष, किन्‍नर,अप्सराएँ, नाग, सर्प, किम्पुरुष, उरग, मातृकाएँ, राक्षस, पिशाच, प्रेत, भूत, विनायक, कूष्माण्ड, उन्माद, वेताल, यातुधान, ग्रह, पक्षी, मृग, पशु, वृक्ष, पर्वत, सरीसृप इत्यादि जितने भी संसारमें नाम-रूप हैं, सब भगवान्‌के ही हैं॥ ३७—३९॥","meaning_covers":[37,39]},{"id":"2.10.40","number":40,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/10/40/","page":232,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["द्विविधाश्‍चतुर्विधा येऽन्ये जलस्थलनभौकसः।","कुशलाकुशला मिश्राः कर्मणां गतयस्त्विमाः॥ ४०"],"iast":["dvividhāścaturvidhā ye'nye jalasthalanabhaukasaḥ|","kuśalākuśalā miśrāḥ karmaṇāṃ gatayastvimāḥ|| 40"],"meaning":"संसारमें चर और अचर भेदसे दो प्रकारके तथा जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज भेदसे चार प्रकारके जितने भी जलचर, थलचर तथा आकाशचारी प्राणी हैं, सब-के-सब शुभ-अशुभ और मिश्रित कर्मोंके तदनुरूप फल हैं ॥ ४०॥"},{"id":"2.10.41","number":41,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/10/41/","page":232,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सत्त्वं रजस्तम इति तिस्रः सुरनृनारकाः।","तत्राप्येकैकशो राजन् भिद्यन्ते गतयस्त्रिधा।","यदैकैकतरोऽन्याभ्यां स्वभाव उपहन्यते॥ ४१"],"iast":["sattvaṃ rajastama iti tisraḥ suranṛnārakāḥ|","tatrāpyekaikaśo rājan bhidyante gatayastridhā|","yadaikaikataro'nyābhyāṃ svabhāva upahanyate|| 41"],"meaning":"सत्त्वकी प्रधानतासे देवता, रजोगुणकी प्रधानतासे मनुष्य और तमोगुणकी प्रधानतासे नारकीय योनियाँ मिलती हैं। इन गुणोंमें भी जब एक गुण दूसरे दो गुणोंसे अभिभूत हो जाता है, तब प्रत्येक गतिके तीन-तीन भेद और हो जाते हैं।॥ ४१॥"},{"id":"2.10.42","number":42,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/10/42/","page":233,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स एवेदं जगद्धाता भगवान् धर्मरूपधृक्।","पुष्णाति स्थापयन् विश्‍वं तिर्यङ्नरसुरात्मभिः॥ ४२"],"iast":["sa evedaṃ jagaddhātā bhagavān dharmarūpadhṛk|","puṣṇāti sthāpayan viśvaṃ tiryaṅnarasurātmabhiḥ|| 42"],"meaning":"वे भगवान् जगत‍्के धारण-पोषणके लिये धर्ममय विष्णुरूप स्वीकार करके देवता, मनुष्य और पशु, पक्षी आदि रूपोंमें अवतार लेते हैं तथा विश्‍वका पालन-पोषण करते हैं॥ ४२॥"},{"id":"2.10.43","number":43,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/10/43/","page":233,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ततः कालाग्‍निरुद्रात्मा यत्सृष्टमिदमात्मनः।","संनियच्छति कालेन घनानीकमिवानिलः॥ ४३"],"iast":["tataḥ kālāgnirudrātmā yatsṛṣṭamidamātmanaḥ|","saṃniyacchati kālena ghanānīkamivānilaḥ|| 43"],"meaning":"प्रलयका समय आनेपर वे ही भगवान् अपने बनाये हुए इस विश्‍वको कालाग्‍निस्वरूप रुद्रका रूप ग्रहण करके अपनेमें वैसे ही लीन कर लेते हैं, जैसे वायु मेघमालाको॥ ४३॥"},{"id":"2.10.44","number":44,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/10/44/","page":233,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इत्थंभावेन कथितो भगवान् भगवत्तमः।","नेत्थंभावेन हि परं द्रष्टुमर्हन्ति सूरयः॥ ४४"],"iast":["itthaṃbhāvena kathito bhagavān bhagavattamaḥ|","netthaṃbhāvena hi paraṃ draṣṭumarhanti sūrayaḥ|| 44"],"meaning":"परीक्षित्! महात्माओंने अचिन्त्यैश्‍वर्य भगवान्‌का इसी प्रकार वर्णन किया है। परन्तु तत्त्वज्ञानी पुरुषोंको केवल इस सृष्टि, पालन और प्रलय करनेवाले रूपमें ही उनका दर्शन नहीं करना चाहिये; क्योंकि वे तो इससे परे भी हैं॥ ४४॥"},{"id":"2.10.45","number":45,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/10/45/","page":233,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["नास्य कर्मणि जन्मादौ परस्यानुविधीयते।","कर्तृत्वप्रतिषेधार्थं माययारोपितं हि तत्॥ ४५"],"iast":["nāsya karmaṇi janmādau parasyānuvidhīyate|","kartṛtvapratiṣedhārthaṃ māyayāropitaṃ hi tat|| 45"],"meaning":"सृष्टिकी रचना आदि कर्मोंका निरूपण करके पूर्ण परमात्मासे कर्म या कर्तापनका सम्बन्ध नहीं जोड़ा गया है। वह तो मायासे आरोपित होनेके कारण कर्तृत्वका निषेध करनेके लिये ही है॥ ४५॥"},{"id":"2.10.46","number":46,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/10/46/","page":233,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अयं तु ब्रह्मणः कल्पः सविकल्प उदाहृतः।","विधिः साधारणो यत्र सर्गाः प्राकृतवैकृताः॥ ४६"],"iast":["ayaṃ tu brahmaṇaḥ kalpaḥ savikalpa udāhṛtaḥ|","vidhiḥ sādhāraṇo yatra sargāḥ prākṛtavaikṛtāḥ|| 46"],"meaning":"यह मैंने ब्रह्माजीके महाकल्पका अवान्तर कल्पोंके साथ वर्णन किया है। सब कल्पोंमें सृष्टिक्रम एक-सा ही है। अन्तर है तो केवल इतना ही कि महाकल्पके प्रारम्भमें प्रकृतिसे क्रमशः महत्तत्त्वादिकी उत्पत्ति होती है और कल्पोंके प्रारम्भमें प्राकृत सृष्टि तो ज्यों-की-त्यों रहती ही है, चराचर प्राणियोंकी वैकृत सृष्टि नवीन रूपसे होती है॥ ४६॥"},{"id":"2.10.47","number":47,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/10/47/","page":233,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["परिमाणं च कालस्य कल्पलक्षणविग्रहम्।","यथा पुरस्ताद‍्व्याख्यास्ये पाद्मं कल्पमथो शृणु॥ ४७"],"iast":["parimāṇaṃ ca kālasya kalpalakṣaṇavigraham|","yathā purastādvyākhyāsye pādmaṃ kalpamatho śṛṇu|| 47"],"meaning":"परीक्षित्! कालका परिमाण, कल्प और उसके अन्तर्गत मन्वन्तरोंका वर्णन आगे चलकर करेंगे। अब तुम पाद्मकल्पका वर्णन सावधान होकर सुनो॥ ४७॥"},{"id":"2.10.48","number":48,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/10/48/","page":233,"speaker":"शौनक उवाच","sanskrit":["यदाह नो भवान् सूत क्षत्ता भागवतोत्तमः।","चचार तीर्थानि भुवस्त्यक्‍त्वा बन्धून् सुदुस्त्यजान्॥ ४८"],"iast":["yadāha no bhavān sūta kṣattā bhāgavatottamaḥ|","cacāra tīrthāni bhuvastyaktvā bandhūn sudustyajān|| 48"],"meaning":"शौनकजीने पूछा—सूतजी! आपने हमलोगोंसे कहा था कि भगवान्‌के परम भक्त विदुरजीने अपने अति दुस्त्यज कुटुम्बियोंको भी छोड़कर पृथ्वीके विभिन्‍न तीर्थोंमें विचरण किया था॥ ४८॥"},{"id":"2.10.49","number":49,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/10/49/","page":234,"speaker":"शौनक उवाच","sanskrit":["कुत्र कौषारवेस्तस्य संवादोऽध्यात्मसंश्रितः।","यद्वा स भगवांस्तस्मै पृष्टस्तत्त्वमुवाच ह॥ ४९"],"iast":["kutra kauṣāravestasya saṃvādo'dhyātmasaṃśritaḥ|","yadvā sa bhagavāṃstasmai pṛṣṭastattvamuvāca ha|| 49"],"meaning":"उस यात्रामें मैत्रेय ऋषिके साथ अध्यात्मके सम्बन्धमें उनकी बातचीत कहाँ हुई तथा मैत्रेयजीने उनके प्रश्न करनेपर किस तत्त्वका उपदेश किया?॥ ४९॥"},{"id":"2.10.50","number":50,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/10/50/","page":234,"speaker":"शौनक उवाच","sanskrit":["ब्रूहि नस्तदिदं सौम्य विदुरस्य विचेष्टितम्।","बन्धुत्यागनिमित्तं च तथैवागतवान् पुनः॥ ५०"],"iast":["brūhi nastadidaṃ saumya vidurasya viceṣṭitam|","bandhutyāganimittaṃ ca tathaivāgatavān punaḥ|| 50"],"meaning":"सूतजी! आपका स्वभाव बड़ा सौम्य है। आप विदुरजीका वह चरित्र हमें सुनाइये। उन्होंने अपने भाई-बन्धुओंको क्यों छोड़ा और फिर उनके पास क्यों लौट आये?॥ ५०॥"},{"id":"2.10.51","number":51,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/10/51/","page":234,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["राज्ञा परीक्षिता पृष्टो यदवोचन्महामुनिः।","तद्वोऽभिधास्ये शृणुत राज्ञः प्रश्नानुसारतः॥ ५१"],"iast":["rājñā parīkṣitā pṛṣṭo yadavocanmahāmuniḥ|","tadvo'bhidhāsye śṛṇuta rājñaḥ praśnānusārataḥ|| 51"],"meaning":"सूतजीने कहा—शौनकादि ऋषियो! राजा परीक्षित‍्ने भी यही बात पूछी थी। उनके प्रश्नोंके उत्तरमें श्रीशुकदेवजी महाराजने जो कुछ कहा था, वही मैं आपलोगोंसे कहता हूँ। सावधान होकर सुनिये॥ ५१॥"}],"text":[{"b":5228,"kind":"adhyaya_heading","page":228,"text":"अथ दशमोऽध्यायः"},{"b":5229,"kind":"topic_heading","page":228,"text":"भागवतके दस लक्षण"},{"b":5230,"kind":"topic_heading","page":227,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":5231,"kind":"sanskrit_shloka","page":228,"verses":["2.10.1"],"text":"अत्र सर्गो विसर्गश्‍च स्थानं पोषणमूतयः।"},{"b":5232,"kind":"sanskrit_shloka","page":228,"verses":["2.10.1"],"text":"मन्वन्तरेशानुकथा निरोधो मुक्तिराश्रयः॥ १"},{"b":5233,"kind":"sanskrit_shloka","page":228,"verses":["2.10.2"],"text":"दशमस्य विशुद्ध्यर्थं नवानामिह लक्षणम्।"},{"b":5234,"kind":"sanskrit_shloka","page":228,"verses":["2.10.2"],"text":"वर्णयन्ति महात्मानः श्रुतेनार्थेन चाञ्जसा॥ २"},{"b":5235,"kind":"sanskrit_shloka","page":228,"verses":["2.10.3"],"text":"भूतमात्रेन्द्रियधियां जन्म सर्ग उदाहृतः।"},{"b":5236,"kind":"sanskrit_shloka","page":228,"verses":["2.10.3"],"text":"ब्रह्मणो गुणवैषम्याद् विसर्गः पौरुषः स्मृतः॥ ३"},{"b":5237,"kind":"sanskrit_shloka","page":228,"verses":["2.10.4"],"text":"स्थितिर्वैकुण्ठविजयः पोषणं तदनुग्रहः।"},{"b":5238,"kind":"sanskrit_shloka","page":228,"verses":["2.10.4"],"text":"मन्वन्तराणि सद्धर्म ऊतयः कर्मवासनाः॥ ४"},{"b":5239,"kind":"sanskrit_shloka","page":228,"verses":["2.10.5"],"text":"अवतारानुचरितं हरेश्‍चास्यानुवर्तिनाम्।"},{"b":5240,"kind":"sanskrit_shloka","page":228,"verses":["2.10.5"],"text":"सतामीशकथाः प्रोक्ता नानाख्यानोपबृंहिताः॥ ५"},{"b":5241,"kind":"sanskrit_shloka","page":228,"verses":["2.10.6"],"text":"निरोधोऽस्यानुशयनमात्मनः सह शक्तिभिः।"},{"b":5242,"kind":"sanskrit_shloka","page":228,"verses":["2.10.6"],"text":"मुक्तिर्हित्वान्यथारूपं स्वरूपेण व्यवस्थितिः॥ ६"},{"b":5243,"kind":"sanskrit_shloka","page":228,"verses":["2.10.7"],"text":"आभासश्‍च निरोधश्‍च यतश्चाध्यवसीयते।"},{"b":5244,"kind":"sanskrit_shloka","page":228,"verses":["2.10.7"],"text":"स आश्रयः परं ब्रह्म परमात्मेति शब्द्यते॥ ७"},{"b":5245,"kind":"hindi_commentary","page":228,"explains":["2.10.1","2.10.2","2.10.3","2.10.4","2.10.5","2.10.6","2.10.7"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! इस भागवतपुराणमें सर्ग, विसर्ग, स्थान, पोषण, ऊति, मन्वन्तर, ईशानुकथा, निरोध, मुक्ति और आश्रय—इन दस विषयोंका वर्णन है॥ १॥ इनमें जो दसवाँ आश्रय-तत्त्व है, उसीका ठीक-ठीक निश्‍चय करनेके लिये कहीं श्रुतिसे, कहीं तात्पर्यसे और कहीं दोनोंके अनुकूल अनुभवसे महात्माओंने अन्य नौ विषयोंका बड़ी सुगम रीतिसे वर्णन किया है॥ २॥ ईश्‍वरकी प्रेरणासे गुणोंमें क्षोभ होकर रूपान्तर होनेसे जो आकाशादि पंचभूत, शब्दादि तन्मात्राएँ, इन्द्रियाँ, अहंकार और महत्तत्त्वकी उत्पत्ति होती है, उसको ‘सर्ग’ कहते हैं। उस विराट् पुरुषसे उत्पन्‍न ब्रह्माजीके द्वारा जो विभिन्‍न चराचर सृष्टियोंका निर्माण होता है, उसका नाम है ‘विसर्ग’॥ ३॥ प्रतिपद नाशकी ओर बढ़नेवाली सृष्टिको एक मर्यादामें स्थिर रखनेसे भगवान् विष्णुकी जो श्रेष्ठता सिद्ध होती है, उसका नाम ‘स्थान’ है। अपने द्वारा सुरक्षित सृष्टिमें भक्तोंके ऊपर उनकी जो कृपा होती है, उसका नाम है ‘पोषण’। मन्वन्तरोंके अधिपति जो भगवद्भक्ति और प्रजापालनरूप शुद्ध धर्मका अनुष्ठान करते हैं, उसे ‘मन्वन्तर’ कहते हैं। जीवोंकी वे वासनाएँ, जो कर्मके द्वारा उन्हें बन्धनमें डाल देती हैं, ‘ऊति’ नामसे कही जाती हैं॥ ४॥ भगवान्‌के विभिन्‍न अवतारोंके और उनके प्रेमी भक्तोंकी विविध आख्यानोंसे युक्त गाथाएँ ‘ईशकथा’ हैं॥ ५॥ जब भगवान् योगनिद्रा स्वीकार करके शयन करते हैं, तब इस जीवका अपनी उपाधियोंके साथ उनमें लीन हो जाना ‘निरोध’ है। अज्ञानकल्पित कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदि अनात्मभावका परित्याग करके अपने वास्तविक स्वरूप परमात्मामें स्थित होना ही ‘मुक्ति’ है॥ ६॥ परीक्षित्! इस चराचर जगत‍्की उत्पत्ति और प्रलय जिस तत्त्वसे प्रकाशित होते हैं, वह परम ब्रह्म ही आश्रय’ है। शास्त्रोंमें उसीको परमात्मा कहा गया है॥ ७॥"},{"b":5246,"kind":"sanskrit_shloka","page":229,"verses":["2.10.8"],"text":"योऽध्यात्मिकोऽयं पुरुषः सोऽसावेवाधिदैविकः।"},{"b":5247,"kind":"sanskrit_shloka","page":229,"verses":["2.10.8"],"text":"यस्तत्रोभयविच्छेदः पुरुषो ह्याधिभौतिकः॥ ८"},{"b":5248,"kind":"sanskrit_shloka","page":229,"verses":["2.10.9"],"text":"एकमेकतराभावे यदा नोपलभामहे।"},{"b":5249,"kind":"sanskrit_shloka","page":229,"verses":["2.10.9"],"text":"त्रितयं तत्र यो वेद स आत्मा स्वाश्रयाश्रयः॥ ९"},{"b":5250,"kind":"hindi_commentary","page":229,"explains":["2.10.8","2.10.9"],"text":"जो नेत्र आदि इन्द्रियोंका अभिमानी द्रष्टा जीव है, वही इन्द्रियोंके अधिष्ठातृदेवता सूर्य आदिके रूपमें भी है और जो नेत्रगोलक आदिसे युक्त दृश्य देह है, वही उन दोनोंको अलग-अलग करता है॥ ८॥ इन तीनोंमें यदि एकका भी अभाव हो जाय तो दूसरे दोकी उपलब्धि नहीं हो सकती। अतः जो इन तीनोंको जानता है, वह परमात्मा ही सबका अधिष्ठान ‘आश्रय’ तत्त्व है। उसका आश्रय वह स्वयं ही है, दूसरा कोई नहीं॥ ९॥"},{"b":5251,"kind":"sanskrit_shloka","page":229,"verses":["2.10.10"],"text":"पुरुषोऽण्डं विनिर्भिद्य यदासौ स विनिर्गतः।"},{"b":5252,"kind":"sanskrit_shloka","page":229,"verses":["2.10.10"],"text":"आत्मनोऽयनमन्विच्छन्‍नपोऽस्राक्षीच्छुचिः शुचीः॥ १०"},{"b":5253,"kind":"sanskrit_shloka","page":229,"verses":["2.10.11"],"text":"तास्ववात्सीत् स्वसृष्टासु सहस्रपरिवत्सरान्।"},{"b":5254,"kind":"sanskrit_shloka","page":229,"verses":["2.10.11"],"text":"तेन नारायणो नाम यदापः पुरुषोद्भवाः॥ ११"},{"b":5255,"kind":"sanskrit_shloka","page":229,"verses":["2.10.12"],"text":"द्रव्यं कर्म च कालश्‍च स्वभावो जीव एव च।"},{"b":5256,"kind":"sanskrit_shloka","page":229,"verses":["2.10.12"],"text":"यदनुग्रहतः सन्ति न सन्ति यदुपेक्षया॥ १२"},{"b":5257,"kind":"sanskrit_shloka","page":229,"verses":["2.10.13"],"text":"एको नानात्वमन्विच्छन् योगतल्पात् समुत्थितः।"},{"b":5258,"kind":"sanskrit_shloka","page":229,"verses":["2.10.13"],"text":"वीर्यं हिरण्मयं देवो मायया व्यसृजत् त्रिधा॥ १३"},{"b":5259,"kind":"sanskrit_shloka","page":229,"verses":["2.10.14"],"text":"अधिदैवमथाध्यात्ममधिभूतमिति प्रभुः।"},{"b":5260,"kind":"sanskrit_shloka","page":229,"verses":["2.10.14"],"text":"यथैकं पौरुषं वीर्यं त्रिधाभिद्यत तच्छृणु॥ १४"},{"b":5261,"kind":"hindi_commentary","page":229,"explains":["2.10.10","2.10.11","2.10.12","2.10.13","2.10.14"],"text":"जब पूर्वोक्त विराट् पुरुष ब्रह्माण्डको फोड़कर निकला, तब वह अपने रहनेका स्थान ढूँढने लगा और स्थानकी इच्छासे उस शुद्ध-संकल्प पुरुषने अत्यन्त पवित्र जलकी सृष्टि की॥ १०॥ विराट् पुरुषरूप ‘नर’ से उत्पन्‍न होनेके कारण ही जलका नाम ‘नार’ पड़ा और उस अपने उत्पन्‍न किये हुए ‘नार’ में वह पुरुष एक हजार वर्षोंतक रहा, इसीसे उसका नाम ‘नारायण’ हुआ॥ ११॥ उन नारायणभगवान्‌की कृपासे ही द्रव्य, कर्म, काल, स्वभाव और जीव आदिकी सत्ता है। उनके उपेक्षा कर देनेपर और किसीका अस्तित्व नहीं रहता॥ १२॥ उन अद्वितीय भगवान् नारायणने योगनिद्रासे जगकर अनेक होनेकी इच्छा की। तब अपनी मायासे उन्होंने अखिल ब्रह्माण्डके बीजस्वरूप अपने सुवर्णमय वीर्यको तीन भागोंमें विभक्त कर दिया—अधिदैव, अध्यात्म और अधिभूत। परीक्षित्! विराट् पुरुषका एक ही वीर्य तीन भागोंमें कैसे विभक्त हुआ, सो सुनो॥ १३-१४॥"},{"b":5262,"kind":"sanskrit_shloka","page":229,"verses":["2.10.15"],"text":"अन्तःशरीर आकाशात् पुरुषस्य विचेष्टतः।"},{"b":5263,"kind":"sanskrit_shloka","page":229,"verses":["2.10.15"],"text":"ओजः सहो बलं जज्ञे ततः प्राणो महानसुः॥ १५"},{"b":5264,"kind":"sanskrit_shloka","page":229,"verses":["2.10.16"],"text":"अनुप्राणन्ति यं प्राणाः प्राणन्तं सर्वजन्तुषु।"},{"b":5265,"kind":"sanskrit_shloka","page":229,"verses":["2.10.16"],"text":"अपानन्तमपानन्ति नरदेवमिवानुगाः॥ १६"},{"b":5266,"kind":"hindi_commentary","page":229,"explains":["2.10.15","2.10.16"],"text":"विराट् पुरुषके हिलने-डोलनेपर उनके शरीरमें रहनेवाले आकाशसे इन्द्रियबल, मनोबल और शरीरबलकी उत्पत्ति हुई। उनसे इन सबका राजा प्राण उत्पन्‍न हुआ॥ १५॥ जैसे सेवक अपने स्वामी राजाके पीछे-पीछे चलते हैं, वैसे ही सबके शरीरोंमें प्राणके प्रबल रहनेपर ही सारी इन्द्रियाँ प्रबल रहती हैं और जब वह सुस्त पड़ जाता है, तब सारी इन्द्रियाँ भी सुस्त हो जाती हैं॥ १६॥"},{"b":5267,"kind":"sanskrit_shloka","page":230,"verses":["2.10.17"],"text":"प्राणेन क्षिपता क्षुत् तृडन्तरा जायते प्रभोः।"},{"b":5268,"kind":"sanskrit_shloka","page":230,"verses":["2.10.17"],"text":"पिपासतो जक्षतश्‍च प्राङ्मुखं निरभिद्यत॥ १७"},{"b":5269,"kind":"sanskrit_shloka","page":230,"verses":["2.10.18"],"text":"मुखतस्तालु निर्भिन्‍नं जिह्वा तत्रोपजायते।"},{"b":5270,"kind":"sanskrit_shloka","page":230,"verses":["2.10.18"],"text":"ततो नानारसो जज्ञे जिह्वया योऽधिगम्यते॥ १८"},{"b":5271,"kind":"sanskrit_shloka","page":230,"verses":["2.10.19"],"text":"विवक्षोर्मुखतो भूम्नो वह्निर्वाग् व्याहृतं तयोः।"},{"b":5272,"kind":"sanskrit_shloka","page":230,"verses":["2.10.19"],"text":"जले वै तस्य सुचिरं निरोधः समजायत॥ १९"},{"b":5273,"kind":"sanskrit_shloka","page":230,"verses":["2.10.20"],"text":"नासिके निरभिद्येतां दोधूयति नभस्वति।"},{"b":5274,"kind":"sanskrit_shloka","page":230,"verses":["2.10.20"],"text":"तत्र वायुर्गन्धवहो घ्राणो नसि जिघृक्षतः॥ २०"},{"b":5275,"kind":"sanskrit_shloka","page":230,"verses":["2.10.21"],"text":"यदाऽऽत्मनि निरालोकमात्मानं च दिदृक्षतः।"},{"b":5276,"kind":"sanskrit_shloka","page":230,"verses":["2.10.21"],"text":"निर्भिन्‍ने ह्यक्षिणी तस्य ज्योतिश्‍चक्षुर्गुणग्रहः॥ २१"},{"b":5277,"kind":"sanskrit_shloka","page":230,"verses":["2.10.22"],"text":"बोध्यमानस्य ऋषिभिरात्मनस्तज्जिघृक्षतः।"},{"b":5278,"kind":"sanskrit_shloka","page":230,"verses":["2.10.22"],"text":"कर्णौ च निरभिद्येतां दिशः श्रोत्रं गुणग्रहः॥ २२"},{"b":5279,"kind":"sanskrit_shloka","page":230,"verses":["2.10.23"],"text":"वस्तुनो मृदुकाठिन्यलघुगुर्वोष्णशीतताम्।"},{"b":5280,"kind":"sanskrit_shloka","page":230,"verses":["2.10.23"],"text":"जिघृक्षतस्त्वङ् निर्भिन्‍ना तस्यां रोममहीरुहाः।"},{"b":5281,"kind":"sanskrit_shloka","page":230,"verses":["2.10.23"],"text":"तत्र चान्तर्बहिर्वातस्त्वचा लब्धगुणो वृतः॥ २३"},{"b":5282,"kind":"sanskrit_shloka","page":230,"verses":["2.10.24"],"text":"हस्तौ रुरुहतुस्तस्य नानाकर्मचिकीर्षया।"},{"b":5283,"kind":"sanskrit_shloka","page":230,"verses":["2.10.24"],"text":"तयोस्तु बलमिन्द्रश्‍च आदानमुभयाश्रयम्॥ २४"},{"b":5284,"kind":"hindi_commentary","page":230,"explains":["2.10.17","2.10.18","2.10.19","2.10.20","2.10.21","2.10.22","2.10.23","2.10.24"],"text":"जब प्राण जोरसे आने-जाने लगा, तब विराट् पुरुषको भूख-प्यासका अनुभव हुआ। खाने-पीनेकी इच्छा करते ही सबसे पहले उनके शरीरमें मुख प्रकट हुआ॥ १७॥ मुखसे तालु और तालुसे रसनेन्द्रिय प्रकट हुई। इसके बाद अनेकों प्रकारके रस उत्पन्‍न हुए, जिन्हें रसना ग्रहण करती है॥ १८॥ जब उनकी इच्छा बोलनेकी हुई तब वाक्-इन्द्रिय, उसके अधिष्ठातृदेवता अग्‍नि और उनका विषय बोलना—ये तीनों प्रकट हुए। इसके बाद बहुत दिनोंतक उस जलमें ही वे रुके रहे॥ १९॥ श्वासके वेगसे नासिका-छिद्र प्रकट हो गये। जब उन्हें सूँघनेकी इच्छा हुई, तब उनकी नाक घ्राणेन्द्रिय आकर बैठ गयी और उसके देवता गन्धको फैलानेवाले वायुदेव प्रकट हुए॥ २०॥ पहले उनके शरीरमें प्रकाश नहीं था; फिर जब उन्हें अपनेको तथा दूसरी वस्तुओंको देखनेकी इच्छा हुई, तब नेत्रोंके छिद्र, उनका अधिष्ठाता सूर्य और नेत्रेन्द्रिय प्रकट हो गये। इन्हींसे रूपका ग्रहण होने लगा॥ २१॥ जब वेदरूप ऋषि विराट् पुरुषको स्तुतियोंके द्वारा जगाने लगे, तब उन्हें सुननेकी इच्छा हुई। उसी समय कान, उनकी अधिष्ठातृदेवता दिशाएँ और श्रोत्रेन्द्रिय प्रकट हुई। इसीसे शब्द सुनायी पड़ता है॥ २२॥ जब उन्होंने वस्तुओंकी कोमलता, कठिनता, हलकापन, भारीपन, उष्णता और शीतलता आदि जाननी चाही तब उनके शरीरमें चर्म प्रकट हुआ। पृथ्वीमेंसे जैसे वृक्ष निकल आते हैं, उसी प्रकार उस चर्ममें रोएँ पैदा हुए और उसके भीतर-बाहर रहनेवाला वायु भी प्रकट हो गया। स्पर्श ग्रहण करनेवाली त्वचा-इन्द्रिय भी साथ-ही-साथ शरीरमें चारों ओर लिपट गयी और उससे उन्हें स्पर्शका अनुभव होने लगा॥ २३॥ जब उन्हें अनेकों प्रकारके कर्म करनेकी इच्छा हुई, तब उनके हाथ उग आये। उन हाथोंमें ग्रहण करनेकी शक्ति हस्तेन्द्रिय तथा उनके अधिदेवता इन्द्र प्रकट हुए और दोनोंके आश्रयसे होनेवाला ग्रहणरूप कर्म भी प्रकट हो गया॥ २४॥"},{"b":5285,"kind":"sanskrit_shloka","page":231,"verses":["2.10.25"],"text":"गतिं जिगीषतः पादौ रुरुहातेऽभिकामिकाम्।"},{"b":5286,"kind":"sanskrit_shloka","page":231,"verses":["2.10.25"],"text":"पद‍्भ्यां यज्ञः स्वयं हव्यं कर्मभिः क्रियते नृभिः॥ २५"},{"b":5287,"kind":"sanskrit_shloka","page":231,"verses":["2.10.26"],"text":"निरभिद्यत शिश्नो वै प्रजानन्दामृतार्थिनः।"},{"b":5288,"kind":"sanskrit_shloka","page":231,"verses":["2.10.26"],"text":"उपस्थ आसीत् कामानां प्रियं तदुभयाश्रयम्॥ २६"},{"b":5289,"kind":"sanskrit_shloka","page":231,"verses":["2.10.27"],"text":"उत्सिसृक्षोर्धातुमलं निरभिद्यत वै गुदम्।"},{"b":5290,"kind":"sanskrit_shloka","page":231,"verses":["2.10.27"],"text":"ततः पायुस्ततो मित्र उत्सर्ग उभयाश्रयः॥ २७"},{"b":5291,"kind":"sanskrit_shloka","page":231,"verses":["2.10.28"],"text":"आसिसृप्सोः पुरः पुर्या नाभिद्वारमपानतः।"},{"b":5292,"kind":"sanskrit_shloka","page":231,"verses":["2.10.28"],"text":"तत्रापानस्ततो मृत्युः पृथक्त्वमुभयाश्रयम्॥ २८"},{"b":5293,"kind":"sanskrit_shloka","page":231,"verses":["2.10.29"],"text":"आदित्सोरन्‍नपानानामासन् कुक्ष्यन्त्रनाडयः।"},{"b":5294,"kind":"sanskrit_shloka","page":231,"verses":["2.10.29"],"text":"नद्यः समुद्राश्‍च तयोस्तुष्टिः पुष्टिस्तदाश्रये॥ २९"},{"b":5295,"kind":"sanskrit_shloka","page":231,"verses":["2.10.30"],"text":"निदिध्यासोरात्ममायां हृदयं निरभिद्यत।"},{"b":5296,"kind":"sanskrit_shloka","page":231,"verses":["2.10.30"],"text":"ततो मनस्ततश्‍चन्द्रः सङ्कल्पः काम एव च॥ ३०"},{"b":5297,"kind":"sanskrit_shloka","page":231,"verses":["2.10.31"],"text":"त्वक्चर्ममांसरुधिरमेदोमज्जास्थिधातवः ।"},{"b":5298,"kind":"sanskrit_shloka","page":231,"verses":["2.10.31"],"text":"भूम्यप्तेजोमयाः सप्त प्राणो व्योमाम्बुवायुभिः॥ ३१"},{"b":5299,"kind":"sanskrit_shloka","page":231,"verses":["2.10.32"],"text":"गुणात्मकानीन्द्रियाणि भूतादिप्रभवा गुणाः।"},{"b":5300,"kind":"sanskrit_shloka","page":231,"verses":["2.10.32"],"text":"मनः सर्वविकारात्मा बुद्धिर्विज्ञानरूपिणी॥ ३२"},{"b":5301,"kind":"hindi_commentary","page":231,"explains":["2.10.25","2.10.26","2.10.27","2.10.28","2.10.29","2.10.30","2.10.31","2.10.32"],"text":"जब उन्हें अभीष्ट स्थानपर जानेकी इच्छा हुई, तब उनके शरीरमें पैर उग आये। चरणोंके साथ ही चरण-इन्द्रियके अधिष्ठातारूपमें वहाँ स्वयं यज्ञपुरुष भगवान् विष्णु स्थित हो गये और उन्हींमें चलनारूप कर्म प्रकट हुआ। मनुष्य इसी चरणेन्द्रियसे चलकर यज्ञ-सामग्री एकत्र करते हैं॥ २५॥ सन्तान, रति और स्वर्ग-भोगकी कामना होनेपर विराट् पुरुषके शरीरमें लिंगकी उत्पत्ति हुई। उसमें उपस्थेन्द्रिय और प्रजापति देवता तथा इन दोनोंके आश्रय रहनेवाले कामसुखका आविर्भाव हुआ॥ २६॥ जब उन्हें मलत्यागकी इच्छा हुई, तब गुदाद्वार प्रकट हुआ। तत्पश्चात् उसमें पायु-इन्द्रिय और मित्र-देवता उत्पन्‍न हुए। इन्हीं दोनोंके द्वारा मलत्यागकी क्रिया सम्पन्‍न होती है॥ २७॥ अपानमार्गद्वारा एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जानेकी इच्छा होनेपर नाभिद्वार प्रकट हुआ। उससे अपान और मृत्यु देवता प्रकट हुए। इन दोनोंके आश्रयसे ही प्राण और अपानका बिछोह यानी मृत्यु होती है॥ २८॥ जब विराट् पुरुषको अन्‍न-जल ग्रहण करनेकी इच्छा हुई, तब कोख, आँतें और नाड़ियाँ उत्पन्‍न हुईं। साथ ही कुक्षिके देवता समुद्र, नाड़ियोंके देवता नदियाँ एवं तुष्टि और पुष्टि—ये दोनों उनके आश्रित विषय उत्पन्‍न हुए॥ २९॥ जब उन्होंने अपनी मायापर विचार करना चाहा, तब हृदयकी उत्पत्ति हुई। उससे मनरूप इन्द्रिय और मनसे उसका देवता चन्द्रमा तथा विषय, कामना और संकल्प प्रकट हुए॥ ३०॥ विराट् पुरुषके शरीरमें पृथ्वी, जल और तेजसे सात धातुएँ प्रकट हुईं—त्वचा, चर्म, मांस, रुधिर, मेद, मज्जा और अस्थि। इसी प्रकार आकाश, जल और वायुसे प्राणोंकी उत्पत्ति हुई॥ ३१॥ श्रोत्रादि सब इन्द्रियाँ शब्दादि विषयोंको ग्रहण करनेवाली हैं। वे विषय अहंकारसे उत्पन्‍न हुए हैं। मन सब विकारोंका उत्पत्तिस्थान है और बुद्धि समस्त पदार्थोंका बोध करानेवाली है॥ ३२॥"},{"b":5302,"kind":"sanskrit_shloka","page":232,"verses":["2.10.33"],"text":"एतद्भगवतो रूपं स्थूलं ते व्याहृतं मया।"},{"b":5303,"kind":"sanskrit_shloka","page":232,"verses":["2.10.33"],"text":"मह्यादिभिश्चावरणैरष्टभिर्बहिरावृतम् ॥ ३३"},{"b":5304,"kind":"hindi_commentary","page":232,"explains":["2.10.33"],"text":"मैंने भगवान्‌के इस स्थूलरूपका वर्णन तुम्हें सुनाया है। यह बाहरकी ओरसे पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, अहंकार, महत्तत्त्व और प्रकृति—इन आठ आवरणोंसे घिरा हुआ है॥ ३३॥"},{"b":5305,"kind":"sanskrit_shloka","page":232,"verses":["2.10.34"],"text":"अतः परं सूक्ष्मतममव्यक्तं निर्विशेषणम्।"},{"b":5306,"kind":"sanskrit_shloka","page":232,"verses":["2.10.34"],"text":"अनादिमध्यनिधनं नित्यं वाङ्मनसः परम्॥ ३४"},{"b":5307,"kind":"hindi_commentary","page":232,"explains":["2.10.34"],"text":"इससे परे भगवान्‌का अत्यन्त सूक्ष्मरूप है। वह अव्यक्त, निर्विशेष, आदि, मध्य और अन्तसे रहित एवं नित्य है। वाणी और मनकी वहाँतक पहुँच नहीं है॥ ३४॥"},{"b":5308,"kind":"sanskrit_shloka","page":232,"verses":["2.10.35"],"text":"अमुनी भगवद्रूपे मया ते अनुवर्णिते।"},{"b":5309,"kind":"sanskrit_shloka","page":232,"verses":["2.10.35"],"text":"उभे अपि न गृह्णन्ति मायासृष्टे विपश्चितः॥ ३५"},{"b":5310,"kind":"hindi_commentary","page":232,"explains":["2.10.35"],"text":"मैंने तुम्हें भगवान्‌के स्थूल और सूक्ष्म—व्यक्त और अव्यक्त जिन दो रूपोंका वर्णन सुनाया है, ये दोनों ही भगवान्‌की मायाके द्वारा रचित हैं। इसलिये विद्वान् पुरुष इन दोनोंको ही स्वीकार नहीं करते॥ ३५॥"},{"b":5311,"kind":"sanskrit_shloka","page":232,"verses":["2.10.36"],"text":"स वाच्यवाचकतया भगवान् ब्रह्मरूपधृक्।"},{"b":5312,"kind":"sanskrit_shloka","page":232,"verses":["2.10.36"],"text":"नामरूपक्रिया धत्ते सकर्माकर्मकः परः॥ ३६"},{"b":5313,"kind":"hindi_commentary","page":232,"explains":["2.10.36"],"text":"वास्तवमें भगवान् निष्क्रिय हैं। अपनी शक्तिसे ही वे सक्रिय बनते हैं। फिर तो वे ब्रह्माका या विराट्रूप धारण करके वाच्य और वाचक—शब्द और उसके अर्थके रूपमें प्रकट होते हैं और अनेकों नाम, रूप तथा क्रियाएँ स्वीकार करते हैं॥ ३६॥"},{"b":5314,"kind":"sanskrit_shloka","page":232,"verses":["2.10.37"],"text":"प्रजापतीन्मनून् देवानृषीन् पितृगणान् पृथक्।"},{"b":5315,"kind":"sanskrit_shloka","page":232,"verses":["2.10.37"],"text":"सिद्धचारणगन्धर्वान् विद्याध्रासुरगुह्यकान्॥ ३७"},{"b":5316,"kind":"sanskrit_shloka","page":232,"verses":["2.10.38"],"text":"किन्‍नराप्सरसो नागान् सर्पान् किम्पुरुषोरगान्।"},{"b":5317,"kind":"sanskrit_shloka","page":232,"verses":["2.10.38"],"text":"मातॄ रक्षःपिशाचांश्‍च प्रेतभूतविनायकान्॥ ३८"},{"b":5318,"kind":"sanskrit_shloka","page":232,"verses":["2.10.39"],"text":"कूष्माण्डोन्मादवेतालान् यातुधानान् ग्रहानपि।"},{"b":5319,"kind":"sanskrit_shloka","page":232,"verses":["2.10.39"],"text":"खगान्मृगान् पशून् वृक्षान् गिरीन्‍नृप सरीसृपान्॥ ३९"},{"b":5320,"kind":"hindi_commentary","page":232,"explains":["2.10.37","2.10.38","2.10.39"],"text":"परीक्षित्! प्रजापति, मनु, देवता, ऋषि, पितर, सिद्ध, चारण, गन्धर्व, विद्याधर, असुर, यक्ष, किन्‍नर,अप्सराएँ, नाग, सर्प, किम्पुरुष, उरग, मातृकाएँ, राक्षस, पिशाच, प्रेत, भूत, विनायक, कूष्माण्ड, उन्माद, वेताल, यातुधान, ग्रह, पक्षी, मृग, पशु, वृक्ष, पर्वत, सरीसृप इत्यादि जितने भी संसारमें नाम-रूप हैं, सब भगवान्‌के ही हैं॥ ३७—३९॥"},{"b":5321,"kind":"sanskrit_shloka","page":232,"verses":["2.10.40"],"text":"द्विविधाश्‍चतुर्विधा येऽन्ये जलस्थलनभौकसः।"},{"b":5322,"kind":"sanskrit_shloka","page":232,"verses":["2.10.40"],"text":"कुशलाकुशला मिश्राः कर्मणां गतयस्त्विमाः॥ ४०"},{"b":5323,"kind":"hindi_commentary","page":232,"explains":["2.10.40"],"text":"संसारमें चर और अचर भेदसे दो प्रकारके तथा जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज भेदसे चार प्रकारके जितने भी जलचर, थलचर तथा आकाशचारी प्राणी हैं, सब-के-सब शुभ-अशुभ और मिश्रित कर्मोंके तदनुरूप फल हैं ॥ ४०॥"},{"b":5324,"kind":"sanskrit_shloka","page":232,"verses":["2.10.41"],"text":"सत्त्वं रजस्तम इति तिस्रः सुरनृनारकाः।"},{"b":5325,"kind":"sanskrit_shloka","page":232,"verses":["2.10.41"],"text":"तत्राप्येकैकशो राजन् भिद्यन्ते गतयस्त्रिधा।"},{"b":5326,"kind":"sanskrit_shloka","page":232,"verses":["2.10.41"],"text":"यदैकैकतरोऽन्याभ्यां स्वभाव उपहन्यते॥ ४१"},{"b":5327,"kind":"hindi_commentary","page":232,"explains":["2.10.41"],"text":"सत्त्वकी प्रधानतासे देवता, रजोगुणकी प्रधानतासे मनुष्य और तमोगुणकी प्रधानतासे नारकीय योनियाँ मिलती हैं। इन गुणोंमें भी जब एक गुण दूसरे दो गुणोंसे अभिभूत हो जाता है, तब प्रत्येक गतिके तीन-तीन भेद और हो जाते हैं।॥ ४१॥"},{"b":5328,"kind":"sanskrit_shloka","page":233,"verses":["2.10.42"],"text":"स एवेदं जगद्धाता भगवान् धर्मरूपधृक्।"},{"b":5329,"kind":"sanskrit_shloka","page":233,"verses":["2.10.42"],"text":"पुष्णाति स्थापयन् विश्‍वं तिर्यङ्नरसुरात्मभिः॥ ४२"},{"b":5330,"kind":"hindi_commentary","page":233,"explains":["2.10.42"],"text":"वे भगवान् जगत‍्के धारण-पोषणके लिये धर्ममय विष्णुरूप स्वीकार करके देवता, मनुष्य और पशु, पक्षी आदि रूपोंमें अवतार लेते हैं तथा विश्‍वका पालन-पोषण करते हैं॥ ४२॥"},{"b":5331,"kind":"sanskrit_shloka","page":233,"verses":["2.10.43"],"text":"ततः कालाग्‍निरुद्रात्मा यत्सृष्टमिदमात्मनः।"},{"b":5332,"kind":"sanskrit_shloka","page":233,"verses":["2.10.43"],"text":"संनियच्छति कालेन घनानीकमिवानिलः॥ ४३"},{"b":5333,"kind":"hindi_commentary","page":233,"explains":["2.10.43"],"text":"प्रलयका समय आनेपर वे ही भगवान् अपने बनाये हुए इस विश्‍वको कालाग्‍निस्वरूप रुद्रका रूप ग्रहण करके अपनेमें वैसे ही लीन कर लेते हैं, जैसे वायु मेघमालाको॥ ४३॥"},{"b":5334,"kind":"sanskrit_shloka","page":233,"verses":["2.10.44"],"text":"इत्थंभावेन कथितो भगवान् भगवत्तमः।"},{"b":5335,"kind":"sanskrit_shloka","page":233,"verses":["2.10.44"],"text":"नेत्थंभावेन हि परं द्रष्टुमर्हन्ति सूरयः॥ ४४"},{"b":5336,"kind":"hindi_commentary","page":233,"explains":["2.10.44"],"text":"परीक्षित्! महात्माओंने अचिन्त्यैश्‍वर्य भगवान्‌का इसी प्रकार वर्णन किया है। परन्तु तत्त्वज्ञानी पुरुषोंको केवल इस सृष्टि, पालन और प्रलय करनेवाले रूपमें ही उनका दर्शन नहीं करना चाहिये; क्योंकि वे तो इससे परे भी हैं॥ ४४॥"},{"b":5337,"kind":"sanskrit_shloka","page":233,"verses":["2.10.45"],"text":"नास्य कर्मणि जन्मादौ परस्यानुविधीयते।"},{"b":5338,"kind":"sanskrit_shloka","page":233,"verses":["2.10.45"],"text":"कर्तृत्वप्रतिषेधार्थं माययारोपितं हि तत्॥ ४५"},{"b":5339,"kind":"hindi_commentary","page":233,"explains":["2.10.45"],"text":"सृष्टिकी रचना आदि कर्मोंका निरूपण करके पूर्ण परमात्मासे कर्म या कर्तापनका सम्बन्ध नहीं जोड़ा गया है। वह तो मायासे आरोपित होनेके कारण कर्तृत्वका निषेध करनेके लिये ही है॥ ४५॥"},{"b":5340,"kind":"sanskrit_shloka","page":233,"verses":["2.10.46"],"text":"अयं तु ब्रह्मणः कल्पः सविकल्प उदाहृतः।"},{"b":5341,"kind":"sanskrit_shloka","page":233,"verses":["2.10.46"],"text":"विधिः साधारणो यत्र सर्गाः प्राकृतवैकृताः॥ ४६"},{"b":5342,"kind":"sanskrit_shloka","page":233,"verses":["2.10.47"],"text":"परिमाणं च कालस्य कल्पलक्षणविग्रहम्।"},{"b":5343,"kind":"sanskrit_shloka","page":233,"verses":["2.10.47"],"text":"यथा पुरस्ताद‍्व्याख्यास्ये पाद्मं कल्पमथो शृणु॥ ४७"},{"b":5344,"kind":"hindi_commentary","page":233,"explains":["2.10.46","2.10.47"],"text":"यह मैंने ब्रह्माजीके महाकल्पका अवान्तर कल्पोंके साथ वर्णन किया है। सब कल्पोंमें सृष्टिक्रम एक-सा ही है। अन्तर है तो केवल इतना ही कि महाकल्पके प्रारम्भमें प्रकृतिसे क्रमशः महत्तत्त्वादिकी उत्पत्ति होती है और कल्पोंके प्रारम्भमें प्राकृत सृष्टि तो ज्यों-की-त्यों रहती ही है, चराचर प्राणियोंकी वैकृत सृष्टि नवीन रूपसे होती है॥ ४६॥ परीक्षित्! कालका परिमाण, कल्प और उसके अन्तर्गत मन्वन्तरोंका वर्णन आगे चलकर करेंगे। अब तुम पाद्मकल्पका वर्णन सावधान होकर सुनो॥ ४७॥"},{"b":5345,"kind":"topic_heading","page":233,"text":"शौनक उवाच"},{"b":5346,"kind":"sanskrit_shloka","page":233,"verses":["2.10.48"],"text":"यदाह नो भवान् सूत क्षत्ता भागवतोत्तमः।"},{"b":5347,"kind":"sanskrit_shloka","page":233,"verses":["2.10.48"],"text":"चचार तीर्थानि भुवस्त्यक्‍त्वा बन्धून् सुदुस्त्यजान्॥ ४८"},{"b":5348,"kind":"hindi_commentary","page":233,"explains":["2.10.48"],"text":"शौनकजीने पूछा—सूतजी! आपने हमलोगोंसे कहा था कि भगवान्‌के परम भक्त विदुरजीने अपने अति दुस्त्यज कुटुम्बियोंको भी छोड़कर पृथ्वीके विभिन्‍न तीर्थोंमें विचरण किया था॥ ४८॥"},{"b":5349,"kind":"sanskrit_shloka","page":234,"verses":["2.10.49"],"text":"कुत्र कौषारवेस्तस्य संवादोऽध्यात्मसंश्रितः।"},{"b":5350,"kind":"sanskrit_shloka","page":234,"verses":["2.10.49"],"text":"यद्वा स भगवांस्तस्मै पृष्टस्तत्त्वमुवाच ह॥ ४९"},{"b":5351,"kind":"sanskrit_shloka","page":234,"verses":["2.10.50"],"text":"ब्रूहि नस्तदिदं सौम्य विदुरस्य विचेष्टितम्।"},{"b":5352,"kind":"sanskrit_shloka","page":234,"verses":["2.10.50"],"text":"बन्धुत्यागनिमित्तं च तथैवागतवान् पुनः॥ ५०"},{"b":5353,"kind":"hindi_commentary","page":234,"explains":["2.10.49","2.10.50"],"text":"उस यात्रामें मैत्रेय ऋषिके साथ अध्यात्मके सम्बन्धमें उनकी बातचीत कहाँ हुई तथा मैत्रेयजीने उनके प्रश्न करनेपर किस तत्त्वका उपदेश किया?॥ ४९॥ सूतजी! आपका स्वभाव बड़ा सौम्य है। आप विदुरजीका वह चरित्र हमें सुनाइये। उन्होंने अपने भाई-बन्धुओंको क्यों छोड़ा और फिर उनके पास क्यों लौट आये?॥ ५०॥"},{"b":5354,"kind":"topic_heading","page":234,"text":"सूत उवाच"},{"b":5355,"kind":"sanskrit_shloka","page":234,"verses":["2.10.51"],"text":"राज्ञा परीक्षिता पृष्टो यदवोचन्महामुनिः।"},{"b":5356,"kind":"sanskrit_shloka","page":234,"verses":["2.10.51"],"text":"तद्वोऽभिधास्ये शृणुत राज्ञः प्रश्नानुसारतः॥ ५१"},{"b":5357,"kind":"hindi_commentary","page":234,"explains":["2.10.51"],"text":"सूतजीने कहा—शौनकादि ऋषियो! राजा परीक्षित‍्ने भी यही बात पूछी थी। उनके प्रश्नोंके उत्तरमें श्रीशुकदेवजी महाराजने जो कुछ कहा था, वही मैं आपलोगोंसे कहता हूँ। सावधान होकर सुनिये॥ ५१॥"},{"b":5358,"kind":"hindi_translation","page":234,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे वैयासिक्यामष्टादशसाहस्र्यां पारमहंस्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे पुरुषसंस्थानुवर्णनं नाम दशमोऽध्यायः॥ १०॥"},{"b":5359,"kind":"hindi_commentary","page":234,"text":"॥ इति द्वितीयः स्कन्धः समाप्तः॥"},{"b":5360,"kind":"hindi_commentary","page":234,"text":"ॐ ॐ ॐ"}],"notes":[{"id":"v1:262","mark":"१","page":228,"after_verse":"2.10.5","text":"प्रा० पा०—नुवर्णितम्।"},{"id":"v1:263","mark":"२","page":228,"after_verse":"2.10.7","text":"प्रा० पा०—तपस्तद् यत्र गीयते।"},{"id":"v1:264","mark":"३","page":228,"after_verse":"2.10.7","text":"प्रा० पा०—जप्यते।"},{"id":"v1:265","mark":"१","page":229,"after_verse":"2.10.8","text":"प्रा० पा०—स स्मृतो।"},{"id":"v1:266","mark":"२","page":229,"after_verse":"2.10.10","text":"प्रा० पा०—विसर्गतः।"},{"id":"v1:267","mark":"३","page":229,"after_verse":"2.10.15","text":"प्रा० पा०—तेजस्ततः।"},{"id":"v1:268","mark":"१","page":230,"after_verse":"2.10.17","text":"प्रा० पा०—विभोः।"},{"id":"v1:269","mark":"२","page":230,"after_verse":"2.10.19","text":"प्रा० पा०—सुचिरं तस्य।"},{"id":"v1:270","mark":"३","page":230,"after_verse":"2.10.21","text":"प्रा० पा०—अक्षिणी।"},{"id":"v1:271","mark":"४","page":230,"after_verse":"2.10.24","text":"प्रा० पा०—बलवानिन्द्र आदा०।"},{"id":"v1:272","mark":"१","page":231,"after_verse":"2.10.25","text":"प्रा० पा०—त्रिभिः।"},{"id":"v1:273","mark":"२","page":231,"after_verse":"2.10.30","text":"प्रा० पा०—मनश्‍चन्द्र इति।"},{"id":"v1:274","mark":"३","page":231,"after_verse":"2.10.32","text":"प्रा० पा०—भूतात्म०।"},{"id":"v1:275","mark":"१","page":232,"after_verse":"2.10.38","text":"प्रा० पा०—मातृरक्षः०।"},{"id":"v1:276","mark":"२","page":232,"after_verse":"2.10.40","text":"प्रा० पा०—कुशलाकुशलमिश्राणां।"},{"id":"v1:277","mark":"१","page":233,"after_verse":"2.10.42","text":"प्रा० पा०—सुरादिभिः।"},{"id":"v1:278","mark":"२","page":233,"after_verse":"2.10.43","text":"प्रा० पा०—तत्काले।"},{"id":"v1:279","mark":"३","page":233,"after_verse":"2.10.47","text":"प्रा० पा०—कल्पमिमं।"},{"id":"v1:280","mark":"४","page":233,"after_verse":"2.10.48","text":"प्रा० पा०—कृत्स्नं च दुस्त्यजम्।"}],"corrections":{"count":5,"list":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/shuddhi/"}}