{"id":"2.3","title":"द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 3","part":"द्वितीय स्कन्ध","heading":"अथ तृतीयोऽध्यायः","topics":["कामनाओंके अनुसार विभिन्‍न देवताओंकी उपासना तथा भगवद्भक्तिके प्राधान्यका निरूपण"],"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/3/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 2.3.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/3/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":1,"pages":[192,195]},"verses":[{"id":"2.3.1","number":1,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/3/1/","page":192,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवमेतन्‍निगदितं पृष्टवान् यद्भवान् मम।","नृणां यन्म्रियमाणानां मनुष्येषु मनीषिणाम्॥ १"],"iast":["evametannigaditaṃ pṛṣṭavān yadbhavān mama|","nṛṇāṃ yanmriyamāṇānāṃ manuṣyeṣu manīṣiṇām|| 1"],"meaning":"श्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित्! तुमने मुझसे जो पूछा था कि मरते समय बुद्धिमान् मनुष्यको क्या करना चाहिये, उसका उत्तर मैंने तुम्हें दे दिया॥ १॥"},{"id":"2.3.2","number":2,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/3/2/","page":192,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ब्रह्मवर्चसकामस्तु यजेत ब्रह्मणस्पतिम्।","इन्द्रमिन्द्रियकामस्तु प्रजाकामः प्रजापतीन्॥ २"],"iast":["brahmavarcasakāmastu yajeta brahmaṇaspatim|","indramindriyakāmastu prajākāmaḥ prajāpatīn|| 2"],"meaning":"जो ब्रह्मतेजका इच्छुक हो वह बृहस्पतिकी; जिसे इन्द्रियोंकी विशेष शक्तिकी कामना हो वह इन्द्रकी और जिसे सन्तानकी लालसा हो वह प्रजापतियोंकी उपासना करे॥ २॥"},{"id":"2.3.3","number":3,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/3/3/","page":192,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["देवीं मायां तु श्रीकामस्तेजस्कामो विभावसुम्।","वसुकामो वसून् रुद्रान् वीर्यकामोऽथ वीर्यवान्॥ ३"],"iast":["devīṃ māyāṃ tu śrīkāmastejaskāmo vibhāvasum|","vasukāmo vasūn rudrān vīryakāmo'tha vīryavān|| 3"],"meaning":"जिसे लक्ष्मी चाहिये वह मायादेवीकी, जिसे तेज चाहिये वह अग्‍निकी, जिसे धन चाहिये वह वसुओंकी और जिस प्रभावशाली पुरुषको वीरताकी चाह हो उसे रुद्रोंकी उपासना करनी चाहिये॥ ३॥"},{"id":"2.3.4","number":4,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/3/4/","page":192,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अन्‍नाद्यकामस्त्वदितिं स्वर्गकामोऽदितेः सुतान्।","विश्वान्देवान् राज्यकामः साध्यान्संसाधको विशाम्॥ ४"],"iast":["annādyakāmastvaditiṃ svargakāmo'diteḥ sutān|","viśvāndevān rājyakāmaḥ sādhyānsaṃsādhako viśām|| 4"],"meaning":"जिसे बहुत अन्‍न प्राप्त करनेकी इच्छा हो वह अदितिका; जिसे स्वर्गकी कामना हो वह अदितिके पुत्र देवताओंका, जिसे राज्यकी अभिलाषा हो वह विश्वेदेवोंका और जो प्रजाको अपने अनुकूल बनानेकी इच्छा रखता हो उसे साध्य देवताओंका आराधन करना चाहिये॥ ४॥"},{"id":"2.3.5","number":5,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/3/5/","page":193,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["आयुष्कामोऽश्विनौ देवौ पुष्टिकाम इलां यजेत्।","प्रतिष्ठाकामः पुरुषो रोदसी लोकमातरौ॥ ५"],"iast":["āyuṣkāmo'śvinau devau puṣṭikāma ilāṃ yajet|","pratiṣṭhākāmaḥ puruṣo rodasī lokamātarau|| 5"],"meaning":"आयुकी इच्छासे अश्विनीकुमारोंका, पुष्टिकी इच्छासे पृथ्वीका और प्रतिष्ठाकी चाह हो तो लोक-माता पृथ्वी और द्यौ (आकाश)-का सेवन करना चाहिये॥ ५॥"},{"id":"2.3.6","number":6,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/3/6/","page":193,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["रूपाभिकामो गन्धर्वान् स्त्रीकामोऽप्सरउर्वशीम्।","आधिपत्यकामः सर्वेषां यजेत परमेष्ठिनम्॥ ६"],"iast":["rūpābhikāmo gandharvān strīkāmo'psaraürvaśīm|","ādhipatyakāmaḥ sarveṣāṃ yajeta parameṣṭhinam|| 6"],"meaning":"सौन्दर्यकी चाहसे गन्धर्वोंकी, पत्नीकी प्राप्तिके लिये उर्वशी अप्सराकी और सबका स्वामी बननेके लिये ब्रह्माकी आराधना करनी चाहिये॥ ६॥"},{"id":"2.3.7","number":7,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/3/7/","page":193,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यज्ञं यजेद् यशस्कामः कोशकामः प्रचेतसम्।","विद्याकामस्तु गिरिशं दाम्पत्यार्थ उमां सतीम्॥ ७"],"iast":["yajñaṃ yajed yaśaskāmaḥ kośakāmaḥ pracetasam|","vidyākāmastu giriśaṃ dāmpatyārtha umāṃ satīm|| 7"],"meaning":"जिसे यशकी इच्छा हो वह यज्ञपुरुषकी, जिसे खजानेकी लालसा हो वह वरुणकी; विद्या प्राप्त करनेकी आकांक्षा हो तो भगवान् शंकरकी और पति-पत्नीमें परस्पर प्रेम बनाये रखनेके लिये पार्वतीजीकी उपासना करनी चाहिये॥ ७॥"},{"id":"2.3.8","number":8,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/3/8/","page":193,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["धर्मार्थ उत्तमश्लोकं तन्तुं तन्वन् पितॄन् यजेत्।","रक्षाकामः पुण्यजनानोजस्कामो मरुद्गणान्॥ ८"],"iast":["dharmārtha uttamaślokaṃ tantuṃ tanvan pitṝn yajet|","rakṣākāmaḥ puṇyajanānojaskāmo marudgaṇān|| 8"],"meaning":"धर्म-उपार्जन करनेके लिये विष्णुभगवान्‌की, वंशपरम्पराकी रक्षाके लिये पितरोंकी, बाधाओंसे बचनेके लिये यक्षोंकी और बलवान् होनेके लिये मरुद्गणोंकी आराधना करनी चाहिये ॥ ८॥"},{"id":"2.3.9","number":9,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/3/9/","page":193,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["राज्यकामो मनून् देवान् निर्ऋतिं त्वभिचरन् यजेत्।","कामकामो यजेत् सोममकामः पुरुषं परम् ॥ ९"],"iast":["rājyakāmo manūn devān nir:ṛtiṃ tvabhicaran yajet|","kāmakāmo yajet somamakāmaḥ puruṣaṃ param || 9"],"meaning":"राज्यके लिये मन्वन्तरोंके अधिपति देवोंको, अभिचारके लिये निर्ऋतिको, भोगोंके लिये चन्द्रमाको और निष्कामता प्राप्त करनेके लिये परम पुरुष नारायणको भजना चाहिये॥ ९॥"},{"id":"2.3.10","number":10,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/3/10/","page":193,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अकामः सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधीः।","तीव्रेण भक्तियोगेन यजेत पुरुषं परम्॥ १०"],"iast":["akāmaḥ sarvakāmo vā mokṣakāma udāradhīḥ|","tīvreṇa bhaktiyogena yajeta puruṣaṃ param|| 10"],"meaning":"और जो बुद्धिमान् पुरुष है—वह चाहे निष्काम हो, समस्त कामनाओंसे युक्त हो अथवा मोक्ष चाहता हो—उसे तो तीव्र भक्तियोगके द्वारा केवल पुरुषोत्तम भगवान्‌की ही आराधना करनी चाहिये॥ १०॥"},{"id":"2.3.11","number":11,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/3/11/","page":193,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एतावानेव यजतामिह निःश्रेयसोदयः।","भगवत्यचलो भावो यद् भागवतसङ्गतः॥ ११"],"iast":["etāvāneva yajatāmiha niḥśreyasodayaḥ|","bhagavatyacalo bhāvo yad bhāgavatasaṅgataḥ|| 11"],"meaning":"जितने भी उपासक हैं, उनका सबसे बड़ा हित इसीमें है कि वे भगवान्‌के प्रेमी भक्तोंका संग करके भगवान्‌में अविचल प्रेम प्राप्त कर लें॥ ११॥"},{"id":"2.3.12","number":12,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/3/12/","page":193,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ज्ञानं यदा प्रतिनिवृत्तगुणोर्मिचक्र-","मात्मप्रसाद उत यत्र गुणेष्वसङ्गः।","कैवल्यसम्मतपथस्त्वथ भक्तियोगः","को निर्वृतो हरिकथासु रतिं न कुर्यात्॥ १२"],"iast":["jñānaṃ yadā pratinivṛttaguṇormicakra-","mātmaprasāda uta yatra guṇeṣvasaṅgaḥ|","kaivalyasammatapathastvatha bhaktiyogaḥ","ko nirvṛto harikathāsu ratiṃ na kuryāt|| 12"],"meaning":"ऐसे पुरुषोंके सत्संगमें जो भगवान्‌की लीला-कथाएँ होती हैं, उनसे उस दुर्लभ ज्ञानकी प्राप्ति होती है जिससे संसार-सागरकी त्रिगुणमयी तरंगमालाओंके थपेड़े शान्त हो जाते हैं, हृदय शुद्ध होकर आनन्दका अनुभव होने लगता है, इन्द्रियोंके विषयोंमें आसक्ति नहीं रहती, कैवल्यमोक्षका सर्वसम्मत मार्ग भक्तियोग प्राप्त हो जाता है। भगवान्‌की ऐसी रसमयी कथाओंका चस्का लग जानेपर भला कौन ऐसा है, जो उनमें प्रेम न करे॥ १२॥"},{"id":"2.3.13","number":13,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/3/13/","page":193,"speaker":"शौनक उवाच","sanskrit":["इत्यभिव्याहृतं राजा निशम्य भरतर्षभः।","किमन्यत्पृष्टवान् भूयो वैयासकिमृषिं कविम्॥ १३"],"iast":["ityabhivyāhṛtaṃ rājā niśamya bharatarṣabhaḥ|","kimanyatpṛṣṭavān bhūyo vaiyāsakimṛṣiṃ kavim|| 13"],"meaning":"शौनकजीने कहा—सूतजी! राजा परीक्षित‍्ने शुकदेवजीकी यह बात सुनकर उनसे और क्या पूछा? वे तो सर्वज्ञ होनेके साथ-ही-साथ मधुर वर्णन करनेमें भी बड़े निपुण थे॥ १३॥"},{"id":"2.3.14","number":14,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/3/14/","page":194,"speaker":"शौनक उवाच","sanskrit":["एतच्छुश्रूषतां विद्वन् सूत नोऽर्हसि भाषितुम्।","कथा हरिकथोदर्काः सतां स्युः सदसि ध्रुवम्॥ १४"],"iast":["etacchuśrūṣatāṃ vidvan sūta no'rhasi bhāṣitum|","kathā harikathodarkāḥ satāṃ syuḥ sadasi dhruvam|| 14"],"meaning":"सूतजी! आप तो सब कुछ जानते हैं, हमलोग उनकी वह बातचीत बड़े प्रेमसे सुनना चाहते हैं, आप कृपा करके अवश्य सुनाइये। क्योंकि संतोंकी सभामें ऐसी ही बातें होती हैं जिनका पर्यवसान भगवान्‌की रसमयी लीला-कथामें ही होता है॥ १४॥"},{"id":"2.3.15","number":15,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/3/15/","page":194,"speaker":"शौनक उवाच","sanskrit":["स वै भागवतो राजा पाण्डवेयो महारथः।","बालक्रीडनकैः क्रीडन् कृष्णक्रीडां य आददे॥ १५"],"iast":["sa vai bhāgavato rājā pāṇḍaveyo mahārathaḥ|","bālakrīḍanakaiḥ krīḍan kṛṣṇakrīḍāṃ ya ādade|| 15"],"meaning":"पाण्डुनन्दन महारथी राजा परीक्षित् बड़े भगवद्भक्त थे। बाल्यावस्थामें खिलौनोंसे खेलते समय भी वे श्रीकृष्णलीलाका ही रस लेते थे॥ १५॥"},{"id":"2.3.16","number":16,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/3/16/","page":194,"speaker":"शौनक उवाच","sanskrit":["वैयासकिश्‍च भगवान् वासुदेवपरायणः।","उरुगायगुणोदाराः सतां स्युर्हि समागमे॥ १६"],"iast":["vaiyāsakiśca bhagavān vāsudevaparāyaṇaḥ|","urugāyaguṇodārāḥ satāṃ syurhi samāgame|| 16"],"meaning":"भगवन्मय श्रीशुकदेवजी भी जन्मसे ही भगवत्परायण हैं। ऐसे संतोंके सत्संगमें भगवान्‌के मंगलमय गुणोंकी दिव्य चर्चा अवश्य ही हुई होगी॥ १६॥"},{"id":"2.3.17","number":17,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/3/17/","page":194,"speaker":"शौनक उवाच","sanskrit":["आयुर्हरति वै पुंसामुद्यन्‍नस्तं च यन्‍नसौ।","तस्यर्ते यत्क्षणो नीत उत्तमश्लोकवार्तया॥ १७"],"iast":["āyurharati vai puṃsāmudyannastaṃ ca yannasau|","tasyarte yatkṣaṇo nīta uttamaślokavārtayā|| 17"],"meaning":"जिसका समय भगवान् श्रीकृष्णके गुणोंके गान अथवा श्रवणमें व्यतीत हो रहा है, उसके अतिरिक्त सभी मनुष्योंकी आयु व्यर्थ जा रही है। ये भगवान् सूर्य प्रतिदिन अपने उदय और अस्तसे उनकी आयु छीनते जा रहे हैं॥ १७॥"},{"id":"2.3.18","number":18,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/3/18/","page":194,"speaker":"शौनक उवाच","sanskrit":["तरवः किं न जीवन्ति भस्त्राः किं न श्‍वसन्त्युत।","न खादन्ति न मेहन्ति किं ग्रामपशवोऽपरे॥ १८"],"iast":["taravaḥ kiṃ na jīvanti bhastrāḥ kiṃ na śvasantyuta|","na khādanti na mehanti kiṃ grāmapaśavo'pare|| 18"],"meaning":"क्या वृक्ष नहीं जीते? क्या लुहारकी धौंकनी साँस नहीं लेती? गाँवके अन्य पालतू पशु क्या मनुष्य—पशुकी ही तरह खाते-पीते या मैथुन नहीं करते?॥ १८॥"},{"id":"2.3.19","number":19,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/3/19/","page":194,"speaker":"शौनक उवाच","sanskrit":["श्‍वविड्वराहोष्ट्रखरैः संस्तुतः पुरुषः पशुः।","न यत्कर्णपथोपेतो जातु नाम गदाग्रजः॥ १९"],"iast":["śvaviḍvarāhoṣṭrakharaiḥ saṃstutaḥ puruṣaḥ paśuḥ|","na yatkarṇapathopeto jātu nāma gadāgrajaḥ|| 19"],"meaning":"जिसके कानमें भगवान् श्रीकृष्णकी लीला-कथा कभी नहीं पड़ी, वह नर पशु, कुत्ते, ग्रामसूकर, ऊँट और गधेसे भी गया बीता है॥ १९॥"},{"id":"2.3.20","number":20,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/3/20/","page":194,"speaker":"शौनक उवाच","sanskrit":["बिले बतोरुक्रमविक्रमान् ये","न शृण्वतः कर्णपुटे नरस्य।","जिह्वासती दार्दुरिकेव सूत","न चोपगायत्युरुगायगाथाः॥ २०"],"iast":["bile batorukramavikramān ye","na śṛṇvataḥ karṇapuṭe narasya|","jihvāsatī dārdurikeva sūta","na copagāyatyurugāyagāthāḥ|| 20"],"meaning":"सूतजी! जो मनुष्य भगवान् श्रीकृष्णकी कथा कभी नहीं सुनता, उसके कान बिलके समान हैं। जो जीभ भगवान्‌की लीलाओंका गायन नहीं करती, वह मेढककी जीभके समान टर्र-टर्र करनेवाली है; उसका तो न रहना ही अच्छा है॥ २०॥"},{"id":"2.3.21","number":21,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/3/21/","page":194,"speaker":"शौनक उवाच","sanskrit":["भारः परं पट्टकिरीटजुष्ट-","मप्युत्तमाङ्गं न नमेन्मुकुन्दम्।","शावौ करौ नो कुरुतः सपर्यां","हरेर्लसत्काञ्चनकङ्कणौ वा॥ २१"],"iast":["bhāraḥ paraṃ paṭṭakirīṭajuṣṭa-","mapyuttamāṅgaṃ na namenmukundam|","śāvau karau no kurutaḥ saparyāṃ","harerlasatkāñcanakaṅkaṇau vā|| 21"],"meaning":"जो सिर कभी भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंमें झुकता नहीं, वह रेशमी वस्त्रसे सुसज्जित और मुकुटसे युक्त होनेपर भी बोझामात्र ही है। जो हाथ भगवान्‌की सेवा-पूजा नहीं करते, वे सोनेके कंगनसे भूषित होनेपर भी मुर्देके हाथ हैं॥ २१॥"},{"id":"2.3.22","number":22,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/3/22/","page":194,"speaker":"शौनक उवाच","sanskrit":["बर्हायिते ते नयने नराणां","लिङ्गानि विष्णोर्न निरीक्षतो ये।","पादौ नृणां तौ द्रुमजन्मभाजौ","क्षेत्राणि नानुव्रजतो हरेर्यौ॥ २२"],"iast":["barhāyite te nayane narāṇāṃ","liṅgāni viṣṇorna nirīkṣato ye|","pādau nṛṇāṃ tau drumajanmabhājau","kṣetrāṇi nānuvrajato hareryau|| 22"],"meaning":"जो आँखें भगवान्‌की याद दिलानेवाली मूर्ति, तीर्थ, नदी आदिका दर्शन नहीं करतीं, वे मोरोंकी पाँखमें बने हुए आँखोंके चिह्नके समान निरर्थक हैं। मनुष्योंके वे पैर चलनेकी शक्ति रखनेपर भी न चलनेवाले पेड़ों-जैसे ही हैं, जो भगवान्‌की लीला-स्थलियोंकी यात्रा नहीं करते॥ २२॥"},{"id":"2.3.23","number":23,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/3/23/","page":195,"speaker":"शौनक उवाच","sanskrit":["जीवञ्छवो भागवताङ्‌घ्रिरेणुं","न जातु मर्त्योऽभिलभेत यस्तु।","श्रीविष्णुपद्या मनुजस्तुलस्याः","श्‍वसञ्छवो यस्तु न वेद गन्धम्॥ २३"],"iast":["jīvañchavo bhāgavatāṅghrireṇuṃ","na jātu martyo'bhilabheta yastu|","śrīviṣṇupadyā manujastulasyāḥ","śvasañchavo yastu na veda gandham|| 23"],"meaning":"जिस मनुष्यने भगवत्प्रेमी संतोंके चरणोंकी धूल कभी सिरपर नहीं चढ़ायी, वह जीता हुआ भी मुर्दा है। जिस मनुष्यने भगवान्‌के चरणोंपर चढ़ी हुई तुलसीकी सुगन्ध लेकर उसकी सराहना नहीं की, वह श्वास लेता हुआ भी श्वासरहित शव है॥ २३॥"},{"id":"2.3.24","number":24,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/3/24/","page":195,"speaker":"शौनक उवाच","sanskrit":["तदश्मसारं हृदयं बतेदं","यद् गृह्यमाणैर्हरिनामधेयैः।","न विक्रियेताथ यदा विकारो","नेत्रे जलं गात्ररुहेषु हर्षः॥ २४"],"iast":["tadaśmasāraṃ hṛdayaṃ batedaṃ","yad gṛhyamāṇairharināmadheyaiḥ|","na vikriyetātha yadā vikāro","netre jalaṃ gātraruheṣu harṣaḥ|| 24"],"meaning":"सूतजी! वह हृदय नहीं लोहा है, जो भगवान्‌के मंगलमय नामोंका श्रवण-कीर्तन करनेपर भी पिघलकर उन्हींकी ओर बह नहीं जाता। जिस समय हृदय पिघल जाता है, उस समय नेत्रोंमें आँसू छलकने लगते हैं और शरीरका रोम-रोम खिल उठता है॥ २४॥"},{"id":"2.3.25","number":25,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/3/25/","page":195,"speaker":"शौनक उवाच","sanskrit":["अथाभिधेह्यङ्ग मनोऽनुकूलं","प्रभाषसे भागवतप्रधानः।","यदाह वैयासकिरात्मविद्या-","विशारदो नृपतिं साधु पृष्टः॥ २५"],"iast":["athābhidhehyaṅga mano'nukūlaṃ","prabhāṣase bhāgavatapradhānaḥ|","yadāha vaiyāsakirātmavidyā-","viśārado nṛpatiṃ sādhu pṛṣṭaḥ|| 25"],"meaning":"प्रिय सूतजी! आपकी वाणी हमारे हृदयको मधुरतासे भर देती है। इसलिये भगवान्‌के परम भक्त, आत्मविद्या-विशारद श्रीशुकदेवजीने परीक्षित‍्के सुन्दर प्रश्न करनेपर जो कुछ कहा, वह संवाद आप कृपा करके हमलोगोंको सुनाइये॥ २५॥"}],"text":[{"b":4388,"kind":"adhyaya_heading","page":192,"text":"अथ तृतीयोऽध्यायः"},{"b":4389,"kind":"topic_heading","page":192,"text":"कामनाओंके अनुसार विभिन्‍न देवताओंकी उपासना तथा भगवद्भक्तिके प्राधान्यका निरूपण"},{"b":4390,"kind":"topic_heading","page":192,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":4391,"kind":"sanskrit_shloka","page":192,"verses":["2.3.1"],"text":"एवमेतन्‍निगदितं पृष्टवान् यद्भवान् मम।"},{"b":4392,"kind":"sanskrit_shloka","page":192,"verses":["2.3.1"],"text":"नृणां यन्म्रियमाणानां मनुष्येषु मनीषिणाम्॥ १"},{"b":4393,"kind":"sanskrit_shloka","page":192,"verses":["2.3.2"],"text":"ब्रह्मवर्चसकामस्तु यजेत ब्रह्मणस्पतिम्।"},{"b":4394,"kind":"sanskrit_shloka","page":192,"verses":["2.3.2"],"text":"इन्द्रमिन्द्रियकामस्तु प्रजाकामः प्रजापतीन्॥ २"},{"b":4395,"kind":"sanskrit_shloka","page":192,"verses":["2.3.3"],"text":"देवीं मायां तु श्रीकामस्तेजस्कामो विभावसुम्।"},{"b":4396,"kind":"sanskrit_shloka","page":192,"verses":["2.3.3"],"text":"वसुकामो वसून् रुद्रान् वीर्यकामोऽथ वीर्यवान्॥ ३"},{"b":4397,"kind":"sanskrit_shloka","page":192,"verses":["2.3.4"],"text":"अन्‍नाद्यकामस्त्वदितिं स्वर्गकामोऽदितेः सुतान्।"},{"b":4398,"kind":"sanskrit_shloka","page":192,"verses":["2.3.4"],"text":"विश्वान्देवान् राज्यकामः साध्यान्संसाधको विशाम्॥ ४"},{"b":4399,"kind":"hindi_commentary","page":192,"explains":["2.3.1","2.3.2","2.3.3","2.3.4"],"text":"श्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित्! तुमने मुझसे जो पूछा था कि मरते समय बुद्धिमान् मनुष्यको क्या करना चाहिये, उसका उत्तर मैंने तुम्हें दे दिया॥ १॥ जो ब्रह्मतेजका इच्छुक हो वह बृहस्पतिकी; जिसे इन्द्रियोंकी विशेष शक्तिकी कामना हो वह इन्द्रकी और जिसे सन्तानकी लालसा हो वह प्रजापतियोंकी उपासना करे॥ २॥ जिसे लक्ष्मी चाहिये वह मायादेवीकी, जिसे तेज चाहिये वह अग्‍निकी, जिसे धन चाहिये वह वसुओंकी और जिस प्रभावशाली पुरुषको वीरताकी चाह हो उसे रुद्रोंकी उपासना करनी चाहिये॥ ३॥ जिसे बहुत अन्‍न प्राप्त करनेकी इच्छा हो वह अदितिका; जिसे स्वर्गकी कामना हो वह अदितिके पुत्र देवताओंका, जिसे राज्यकी अभिलाषा हो वह विश्वेदेवोंका और जो प्रजाको अपने अनुकूल बनानेकी इच्छा रखता हो उसे साध्य देवताओंका आराधन करना चाहिये॥ ४॥"},{"b":4400,"kind":"sanskrit_shloka","page":193,"verses":["2.3.5"],"text":"आयुष्कामोऽश्विनौ देवौ पुष्टिकाम इलां यजेत्।"},{"b":4401,"kind":"sanskrit_shloka","page":193,"verses":["2.3.5"],"text":"प्रतिष्ठाकामः पुरुषो रोदसी लोकमातरौ॥ ५"},{"b":4402,"kind":"sanskrit_shloka","page":193,"verses":["2.3.6"],"text":"रूपाभिकामो गन्धर्वान् स्त्रीकामोऽप्सरउर्वशीम्।"},{"b":4403,"kind":"sanskrit_shloka","page":193,"verses":["2.3.6"],"text":"आधिपत्यकामः सर्वेषां यजेत परमेष्ठिनम्॥ ६"},{"b":4404,"kind":"sanskrit_shloka","page":193,"verses":["2.3.7"],"text":"यज्ञं यजेद् यशस्कामः कोशकामः प्रचेतसम्।"},{"b":4405,"kind":"sanskrit_shloka","page":193,"verses":["2.3.7"],"text":"विद्याकामस्तु गिरिशं दाम्पत्यार्थ उमां सतीम्॥ ७"},{"b":4406,"kind":"sanskrit_shloka","page":193,"verses":["2.3.8"],"text":"धर्मार्थ उत्तमश्लोकं तन्तुं तन्वन् पितॄन् यजेत्।"},{"b":4407,"kind":"sanskrit_shloka","page":193,"verses":["2.3.8"],"text":"रक्षाकामः पुण्यजनानोजस्कामो मरुद्गणान्॥ ८"},{"b":4408,"kind":"sanskrit_shloka","page":193,"verses":["2.3.9"],"text":"राज्यकामो मनून् देवान् निर्ऋतिं त्वभिचरन् यजेत्।"},{"b":4409,"kind":"sanskrit_shloka","page":193,"verses":["2.3.9"],"text":"कामकामो यजेत् सोममकामः पुरुषं परम् ॥ ९"},{"b":4410,"kind":"sanskrit_shloka","page":193,"verses":["2.3.10"],"text":"अकामः सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधीः।"},{"b":4411,"kind":"sanskrit_shloka","page":193,"verses":["2.3.10"],"text":"तीव्रेण भक्तियोगेन यजेत पुरुषं परम्॥ १०"},{"b":4412,"kind":"sanskrit_shloka","page":193,"verses":["2.3.11"],"text":"एतावानेव यजतामिह निःश्रेयसोदयः।"},{"b":4413,"kind":"sanskrit_shloka","page":193,"verses":["2.3.11"],"text":"भगवत्यचलो भावो यद् भागवतसङ्गतः॥ ११"},{"b":4414,"kind":"sanskrit_shloka","page":193,"verses":["2.3.12"],"text":"ज्ञानं यदा प्रतिनिवृत्तगुणोर्मिचक्र-"},{"b":4415,"kind":"sanskrit_shloka","page":193,"verses":["2.3.12"],"text":"मात्मप्रसाद उत यत्र गुणेष्वसङ्गः।"},{"b":4416,"kind":"sanskrit_shloka","page":193,"verses":["2.3.12"],"text":"कैवल्यसम्मतपथस्त्वथ भक्तियोगः"},{"b":4417,"kind":"sanskrit_shloka","page":193,"verses":["2.3.12"],"text":"को निर्वृतो हरिकथासु रतिं न कुर्यात्॥ १२"},{"b":4418,"kind":"hindi_commentary","page":192,"explains":["2.3.5","2.3.6","2.3.7","2.3.8","2.3.9","2.3.10","2.3.11","2.3.12"],"text":"आयुकी इच्छासे अश्विनीकुमारोंका, पुष्टिकी इच्छासे पृथ्वीका और प्रतिष्ठाकी चाह हो तो लोक-माता पृथ्वी और द्यौ (आकाश)-का सेवन करना चाहिये॥ ५॥ सौन्दर्यकी चाहसे गन्धर्वोंकी, पत्नीकी प्राप्तिके लिये उर्वशी अप्सराकी और सबका स्वामी बननेके लिये ब्रह्माकी आराधना करनी चाहिये॥ ६॥ जिसे यशकी इच्छा हो वह यज्ञपुरुषकी, जिसे खजानेकी लालसा हो वह वरुणकी; विद्या प्राप्त करनेकी आकांक्षा हो तो भगवान् शंकरकी और पति-पत्नीमें परस्पर प्रेम बनाये रखनेके लिये पार्वतीजीकी उपासना करनी चाहिये॥ ७॥ धर्म-उपार्जन करनेके लिये विष्णुभगवान्‌की, वंशपरम्पराकी रक्षाके लिये पितरोंकी, बाधाओंसे बचनेके लिये यक्षोंकी और बलवान् होनेके लिये मरुद्गणोंकी आराधना करनी चाहिये ॥ ८॥ राज्यके लिये मन्वन्तरोंके अधिपति देवोंको, अभिचारके लिये निर्ऋतिको, भोगोंके लिये चन्द्रमाको और निष्कामता प्राप्त करनेके लिये परम पुरुष नारायणको भजना चाहिये॥ ९॥ और जो बुद्धिमान् पुरुष है—वह चाहे निष्काम हो, समस्त कामनाओंसे युक्त हो अथवा मोक्ष चाहता हो—उसे तो तीव्र भक्तियोगके द्वारा केवल पुरुषोत्तम भगवान्‌की ही आराधना करनी चाहिये॥ १०॥ जितने भी उपासक हैं, उनका सबसे बड़ा हित इसीमें है कि वे भगवान्‌के प्रेमी भक्तोंका संग करके भगवान्‌में अविचल प्रेम प्राप्त कर लें॥ ११॥ ऐसे पुरुषोंके सत्संगमें जो भगवान्‌की लीला-कथाएँ होती हैं, उनसे उस दुर्लभ ज्ञानकी प्राप्ति होती है जिससे संसार-सागरकी त्रिगुणमयी तरंगमालाओंके थपेड़े शान्त हो जाते हैं, हृदय शुद्ध होकर आनन्दका अनुभव होने लगता है, इन्द्रियोंके विषयोंमें आसक्ति नहीं रहती, कैवल्यमोक्षका सर्वसम्मत मार्ग भक्तियोग प्राप्त हो जाता है। भगवान्‌की ऐसी रसमयी कथाओंका चस्का लग जानेपर भला कौन ऐसा है, जो उनमें प्रेम न करे॥ १२॥"},{"b":4419,"kind":"topic_heading","page":193,"text":"शौनक उवाच"},{"b":4420,"kind":"sanskrit_shloka","page":193,"verses":["2.3.13"],"text":"इत्यभिव्याहृतं राजा निशम्य भरतर्षभः।"},{"b":4421,"kind":"sanskrit_shloka","page":193,"verses":["2.3.13"],"text":"किमन्यत्पृष्टवान् भूयो वैयासकिमृषिं कविम्॥ १३"},{"b":4422,"kind":"hindi_commentary","page":193,"explains":["2.3.13"],"text":"शौनकजीने कहा—सूतजी! राजा परीक्षित‍्ने शुकदेवजीकी यह बात सुनकर उनसे और क्या पूछा? वे तो सर्वज्ञ होनेके साथ-ही-साथ मधुर वर्णन करनेमें भी बड़े निपुण थे॥ १३॥"},{"b":4423,"kind":"sanskrit_shloka","page":194,"verses":["2.3.14"],"text":"एतच्छुश्रूषतां विद्वन् सूत नोऽर्हसि भाषितुम्।"},{"b":4424,"kind":"sanskrit_shloka","page":194,"verses":["2.3.14"],"text":"कथा हरिकथोदर्काः सतां स्युः सदसि ध्रुवम्॥ १४"},{"b":4425,"kind":"sanskrit_shloka","page":194,"verses":["2.3.15"],"text":"स वै भागवतो राजा पाण्डवेयो महारथः।"},{"b":4426,"kind":"sanskrit_shloka","page":194,"verses":["2.3.15"],"text":"बालक्रीडनकैः क्रीडन् कृष्णक्रीडां य आददे॥ १५"},{"b":4427,"kind":"sanskrit_shloka","page":194,"verses":["2.3.16"],"text":"वैयासकिश्‍च भगवान् वासुदेवपरायणः।"},{"b":4428,"kind":"sanskrit_shloka","page":194,"verses":["2.3.16"],"text":"उरुगायगुणोदाराः सतां स्युर्हि समागमे॥ १६"},{"b":4429,"kind":"sanskrit_shloka","page":194,"verses":["2.3.17"],"text":"आयुर्हरति वै पुंसामुद्यन्‍नस्तं च यन्‍नसौ।"},{"b":4430,"kind":"sanskrit_shloka","page":194,"verses":["2.3.17"],"text":"तस्यर्ते यत्क्षणो नीत उत्तमश्लोकवार्तया॥ १७"},{"b":4431,"kind":"sanskrit_shloka","page":194,"verses":["2.3.18"],"text":"तरवः किं न जीवन्ति भस्त्राः किं न श्‍वसन्त्युत।"},{"b":4432,"kind":"sanskrit_shloka","page":194,"verses":["2.3.18"],"text":"न खादन्ति न मेहन्ति किं ग्रामपशवोऽपरे॥ १८"},{"b":4433,"kind":"sanskrit_shloka","page":194,"verses":["2.3.19"],"text":"श्‍वविड्वराहोष्ट्रखरैः संस्तुतः पुरुषः पशुः।"},{"b":4434,"kind":"sanskrit_shloka","page":194,"verses":["2.3.19"],"text":"न यत्कर्णपथोपेतो जातु नाम गदाग्रजः॥ १९"},{"b":4435,"kind":"hindi_commentary","page":194,"explains":["2.3.14","2.3.15","2.3.16","2.3.17","2.3.18","2.3.19"],"text":"सूतजी! आप तो सब कुछ जानते हैं, हमलोग उनकी वह बातचीत बड़े प्रेमसे सुनना चाहते हैं, आप कृपा करके अवश्य सुनाइये। क्योंकि संतोंकी सभामें ऐसी ही बातें होती हैं जिनका पर्यवसान भगवान्‌की रसमयी लीला-कथामें ही होता है॥ १४॥ पाण्डुनन्दन महारथी राजा परीक्षित् बड़े भगवद्भक्त थे। बाल्यावस्थामें खिलौनोंसे खेलते समय भी वे श्रीकृष्णलीलाका ही रस लेते थे॥ १५॥ भगवन्मय श्रीशुकदेवजी भी जन्मसे ही भगवत्परायण हैं। ऐसे संतोंके सत्संगमें भगवान्‌के मंगलमय गुणोंकी दिव्य चर्चा अवश्य ही हुई होगी॥ १६॥ जिसका समय भगवान् श्रीकृष्णके गुणोंके गान अथवा श्रवणमें व्यतीत हो रहा है, उसके अतिरिक्त सभी मनुष्योंकी आयु व्यर्थ जा रही है। ये भगवान् सूर्य प्रतिदिन अपने उदय और अस्तसे उनकी आयु छीनते जा रहे हैं॥ १७॥ क्या वृक्ष नहीं जीते? क्या लुहारकी धौंकनी साँस नहीं लेती? गाँवके अन्य पालतू पशु क्या मनुष्य—पशुकी ही तरह खाते-पीते या मैथुन नहीं करते?॥ १८॥ जिसके कानमें भगवान् श्रीकृष्णकी लीला-कथा कभी नहीं पड़ी, वह नर पशु, कुत्ते, ग्रामसूकर, ऊँट और गधेसे भी गया बीता है॥ १९॥"},{"b":4436,"kind":"sanskrit_shloka","page":194,"verses":["2.3.20"],"text":"बिले बतोरुक्रमविक्रमान् ये"},{"b":4437,"kind":"sanskrit_shloka","page":194,"verses":["2.3.20"],"text":"न शृण्वतः कर्णपुटे नरस्य।"},{"b":4438,"kind":"sanskrit_shloka","page":194,"verses":["2.3.20"],"text":"जिह्वासती दार्दुरिकेव सूत"},{"b":4439,"kind":"sanskrit_shloka","page":194,"verses":["2.3.20"],"text":"न चोपगायत्युरुगायगाथाः॥ २०"},{"b":4440,"kind":"sanskrit_shloka","page":194,"verses":["2.3.21"],"text":"भारः परं पट्टकिरीटजुष्ट-"},{"b":4441,"kind":"sanskrit_shloka","page":194,"verses":["2.3.21"],"text":"मप्युत्तमाङ्गं न नमेन्मुकुन्दम्।"},{"b":4442,"kind":"sanskrit_shloka","page":194,"verses":["2.3.21"],"text":"शावौ करौ नो कुरुतः सपर्यां"},{"b":4443,"kind":"sanskrit_shloka","page":194,"verses":["2.3.21"],"text":"हरेर्लसत्काञ्चनकङ्कणौ वा॥ २१"},{"b":4444,"kind":"sanskrit_shloka","page":194,"verses":["2.3.22"],"text":"बर्हायिते ते नयने नराणां"},{"b":4445,"kind":"sanskrit_shloka","page":194,"verses":["2.3.22"],"text":"लिङ्गानि विष्णोर्न निरीक्षतो ये।"},{"b":4446,"kind":"sanskrit_shloka","page":194,"verses":["2.3.22"],"text":"पादौ नृणां तौ द्रुमजन्मभाजौ"},{"b":4447,"kind":"sanskrit_shloka","page":194,"verses":["2.3.22"],"text":"क्षेत्राणि नानुव्रजतो हरेर्यौ॥ २२"},{"b":4448,"kind":"hindi_commentary","page":194,"explains":["2.3.20","2.3.21","2.3.22"],"text":"सूतजी! जो मनुष्य भगवान् श्रीकृष्णकी कथा कभी नहीं सुनता, उसके कान बिलके समान हैं। जो जीभ भगवान्‌की लीलाओंका गायन नहीं करती, वह मेढककी जीभके समान टर्र-टर्र करनेवाली है; उसका तो न रहना ही अच्छा है॥ २०॥ जो सिर कभी भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंमें झुकता नहीं, वह रेशमी वस्त्रसे सुसज्जित और मुकुटसे युक्त होनेपर भी बोझामात्र ही है। जो हाथ भगवान्‌की सेवा-पूजा नहीं करते, वे सोनेके कंगनसे भूषित होनेपर भी मुर्देके हाथ हैं॥ २१॥ जो आँखें भगवान्‌की याद दिलानेवाली मूर्ति, तीर्थ, नदी आदिका दर्शन नहीं करतीं, वे मोरोंकी पाँखमें बने हुए आँखोंके चिह्नके समान निरर्थक हैं। मनुष्योंके वे पैर चलनेकी शक्ति रखनेपर भी न चलनेवाले पेड़ों-जैसे ही हैं, जो भगवान्‌की लीला-स्थलियोंकी यात्रा नहीं करते॥ २२॥"},{"b":4449,"kind":"sanskrit_shloka","page":195,"verses":["2.3.23"],"text":"जीवञ्छवो भागवताङ्‌घ्रिरेणुं"},{"b":4450,"kind":"sanskrit_shloka","page":195,"verses":["2.3.23"],"text":"न जातु मर्त्योऽभिलभेत यस्तु।"},{"b":4451,"kind":"sanskrit_shloka","page":195,"verses":["2.3.23"],"text":"श्रीविष्णुपद्या मनुजस्तुलस्याः"},{"b":4452,"kind":"sanskrit_shloka","page":195,"verses":["2.3.23"],"text":"श्‍वसञ्छवो यस्तु न वेद गन्धम्॥ २३"},{"b":4453,"kind":"sanskrit_shloka","page":195,"verses":["2.3.24"],"text":"तदश्मसारं हृदयं बतेदं"},{"b":4454,"kind":"sanskrit_shloka","page":195,"verses":["2.3.24"],"text":"यद् गृह्यमाणैर्हरिनामधेयैः।"},{"b":4455,"kind":"sanskrit_shloka","page":195,"verses":["2.3.24"],"text":"न विक्रियेताथ यदा विकारो"},{"b":4456,"kind":"sanskrit_shloka","page":195,"verses":["2.3.24"],"text":"नेत्रे जलं गात्ररुहेषु हर्षः॥ २४"},{"b":4457,"kind":"sanskrit_shloka","page":195,"verses":["2.3.25"],"text":"अथाभिधेह्यङ्ग मनोऽनुकूलं"},{"b":4458,"kind":"sanskrit_shloka","page":195,"verses":["2.3.25"],"text":"प्रभाषसे भागवतप्रधानः।"},{"b":4459,"kind":"sanskrit_shloka","page":195,"verses":["2.3.25"],"text":"यदाह वैयासकिरात्मविद्या-"},{"b":4460,"kind":"sanskrit_shloka","page":195,"verses":["2.3.25"],"text":"विशारदो नृपतिं साधु पृष्टः॥ २५"},{"b":4461,"kind":"hindi_commentary","page":195,"explains":["2.3.23","2.3.24","2.3.25"],"text":"जिस मनुष्यने भगवत्प्रेमी संतोंके चरणोंकी धूल कभी सिरपर नहीं चढ़ायी, वह जीता हुआ भी मुर्दा है। जिस मनुष्यने भगवान्‌के चरणोंपर चढ़ी हुई तुलसीकी सुगन्ध लेकर उसकी सराहना नहीं की, वह श्वास लेता हुआ भी श्वासरहित शव है॥ २३॥ सूतजी! वह हृदय नहीं लोहा है, जो भगवान्‌के मंगलमय नामोंका श्रवण-कीर्तन करनेपर भी पिघलकर उन्हींकी ओर बह नहीं जाता। जिस समय हृदय पिघल जाता है, उस समय नेत्रोंमें आँसू छलकने लगते हैं और शरीरका रोम-रोम खिल उठता है॥ २४॥ प्रिय सूतजी! आपकी वाणी हमारे हृदयको मधुरतासे भर देती है। इसलिये भगवान्‌के परम भक्त, आत्मविद्या-विशारद श्रीशुकदेवजीने परीक्षित‍्के सुन्दर प्रश्न करनेपर जो कुछ कहा, वह संवाद आप कृपा करके हमलोगोंको सुनाइये॥ २५॥"},{"b":4462,"kind":"hindi_translation","page":195,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे तृतीयोऽध्यायः॥ ३॥"}],"notes":[],"corrections":{"count":17,"list":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/shuddhi/"}}