{"id":"4.14","title":"चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 14","part":"चतुर्थ स्कन्ध","heading":"अथ चतुर्दशोऽध्यायः","topics":["राजा वेनकी कथा"],"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/14/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 4.14.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/14/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":1,"pages":[478,482]},"verses":[{"id":"4.14.1","number":1,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/14/1/","page":478,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["भृग्वादयस्ते मुनयो लोकानां क्षेमदर्शिनः।","गोप्तर्यसति वै नॄणां पश्यन्तः पशुसाम्यताम्॥ १"],"iast":["bhṛgvādayaste munayo lokānāṃ kṣemadarśinaḥ|","goptaryasati vai nṝṇāṃ paśyantaḥ paśusāmyatām|| 1"],"meaning":"श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—वीरवर विदुरजी! सभी लोकोंकी कुशल चाहनेवाले भृगु आदि मुनियोंने देखा कि अंगके चले जानेसे अब पृथ्वीकी रक्षा करनेवाला कोई नहीं रह गया है, सब लोग पशुओंके समान उच्छृंखल होते जा रहे हैं॥ १॥"},{"id":"4.14.2","number":2,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/14/2/","page":478,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["वीर मातरमाहूय सुनीथां ब्रह्मवादिनः।","प्रकृत्यसम्मतं वेनमभ्यषिञ्चन् पतिं भुवः॥ २"],"iast":["vīra mātaramāhūya sunīthāṃ brahmavādinaḥ|","prakṛtyasammataṃ venamabhyaṣiñcan patiṃ bhuvaḥ|| 2"],"meaning":"तब उन्होंने माता सुनीथाकी सम्मतिसे, मन्त्रियोंके सहमत न होनेपर भी वेनको भूमण्डलके राजपदपर अभिषिक्त कर दिया॥ २॥"},{"id":"4.14.3","number":3,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/14/3/","page":478,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["श्रुत्वा नृपासनगतं वेनमत्युग्रशासनम्।","निलिल्युर्दस्यवः सद्यः सर्पत्रस्ता इवाखवः॥ ३"],"iast":["śrutvā nṛpāsanagataṃ venamatyugraśāsanam|","nililyurdasyavaḥ sadyaḥ sarpatrastā ivākhavaḥ|| 3"],"meaning":"वेन बड़ा कठोर शासक था। जब चोर-डाकुओंने सुना कि वही राजसिंहासनपर बैठा है, तब सर्पसे डरे हुए चूहोंके समान वे सब तुरंत ही जहाँ-तहाँ छिप गये॥ ३॥"},{"id":"4.14.4","number":4,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/14/4/","page":478,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["स आरूढनृपस्थान उन्‍नद्धोऽष्टविभूतिभिः।","अवमेने महाभागान् स्तब्धः सम्भावितः स्वतः॥ ४"],"iast":["sa ārūḍhanṛpasthāna unnaddho'ṣṭavibhūtibhiḥ|","avamene mahābhāgān stabdhaḥ sambhāvitaḥ svataḥ|| 4"],"meaning":"राज्यासन पानेपर वेन आठों लोकपालोंकी ऐश्‍वर्यकलाके कारण उन्मत्त हो गया और अभिमानवश अपनेको ही सबसे बड़ा मानकर महापुरुषोंका अपमान करने लगा॥ ४॥"},{"id":"4.14.5","number":5,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/14/5/","page":478,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["एवं मदान्ध उत्सिक्तो निरङ्कुश इव द्विपः।","पर्यटन् रथमास्थाय कम्पयन्‍निव रोदसी॥ ५"],"iast":["evaṃ madāndha utsikto niraṅkuśa iva dvipaḥ|","paryaṭan rathamāsthāya kampayanniva rodasī|| 5"],"meaning":"वह ऐश्‍वर्यमदसे अंधा हो रथपर चढ़कर निरंकुश गजराजके समान पृथ्वी और आकाशको कँपाता हुआ सर्वत्र विचरने लगा॥ ५॥"},{"id":"4.14.6","number":6,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/14/6/","page":478,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["न यष्टव्यं न दातव्यं न होतव्यं द्विजाः क्‍वचित्।","इति न्यवारयद्धर्मं भेरीघोषेण सर्वशः॥ ६"],"iast":["na yaṣṭavyaṃ na dātavyaṃ na hotavyaṃ dvijāḥ kvacit|","iti nyavārayaddharmaṃ bherīghoṣeṇa sarvaśaḥ|| 6"],"meaning":"‘कोई भी द्विजातिय वर्णका पुरुष कभी किसी प्रकारका यज्ञ, दान और हवन न करे’ अपने राज्यमें यह ढिंढोरा पिटवाकर उसने सारे धर्म-कर्म बंद करवा दिये॥ ६॥"},{"id":"4.14.7","number":7,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/14/7/","page":478,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["वेनस्यावेक्ष्य मुनयो दुर्वृत्तस्य विचेष्टितम्।","विमृश्य लोकव्यसनं कृपयोचुः स्म सत्रिणः॥ ७"],"iast":["venasyāvekṣya munayo durvṛttasya viceṣṭitam|","vimṛśya lokavyasanaṃ kṛpayocuḥ sma satriṇaḥ|| 7"],"meaning":"दुष्ट वेनका ऐसा अत्याचार देख सारे ऋषि-मुनि एकत्र हुए और संसारपर संकट आया समझकर करुणावश आपसमें कहने लगे॥ ७॥"},{"id":"4.14.8","number":8,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/14/8/","page":478,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["अहो उभयतः प्राप्तं लोकस्य व्यसनं महत्।","दारुण्युभयतो दीप्ते इव तस्करपालयोः॥ ८"],"iast":["aho ubhayataḥ prāptaṃ lokasya vyasanaṃ mahat|","dāruṇyubhayato dīpte iva taskarapālayoḥ|| 8"],"meaning":"‘अहो! जैसे दोनों ओर जलती हुई लकड़ीके बीचमें रहनेवाले चींटी आदि जीव महान् संकटमें पड़ जाते हैं, वैसे ही इस समय सारी प्रजा एक ओर राजाके और दूसरी ओर चोर-डाकुओंके अत्याचारसे महान् संकटमें पड़ रही है॥ ८॥"},{"id":"4.14.9","number":9,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/14/9/","page":479,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["अराजकभयादेष कृतो राजातदर्हणः।","ततोऽप्यासीद्भयं त्वद्य कथं स्यात्स्वस्ति देहिनाम्॥ ९"],"iast":["arājakabhayādeṣa kṛto rājātadarhaṇaḥ|","tato'pyāsīdbhayaṃ tvadya kathaṃ syātsvasti dehinām|| 9"],"meaning":"हमने अराजकताके भयसे ही अयोग्य होनेपर भी वेनको राजा बनाया था; किन्तु अब उससे भी प्रजाको भय हो गया। ऐसी अवस्थामें प्रजाको किस प्रकार सुख-शान्ति मिल सकती है?॥ ९॥"},{"id":"4.14.10","number":10,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/14/10/","page":479,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["अहेरिव पयःपोषः पोषकस्याप्यनर्थभृत्।","वेनः प्रकृत्यैव खलः सुनीथागर्भसम्भवः॥ १०"],"iast":["aheriva payaḥpoṣaḥ poṣakasyāpyanarthabhṛt|","venaḥ prakṛtyaiva khalaḥ sunīthāgarbhasambhavaḥ|| 10"],"meaning":"सुनीथाकी कोखसे उत्पन्‍न हुआ यह वेन स्वभावसे ही दुष्ट है। परन्तु साँपको दूध पिलानेके समान इसको पालना, पालनेवालोंके लिये अनर्थका कारण हो गया॥ १०॥"},{"id":"4.14.11","number":11,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/14/11/","page":479,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["निरूपितः प्रजापालः स जिघांसति वै प्रजाः।","तथापि सान्त्वयेमामुं नास्मांस्तत्पातकं स्पृशेत्॥ ११"],"iast":["nirūpitaḥ prajāpālaḥ sa jighāṃsati vai prajāḥ|","tathāpi sāntvayemāmuṃ nāsmāṃstatpātakaṃ spṛśet|| 11"],"meaning":"हमने इसे प्रजाकी रक्षा करनेके लिये नियुक्त किया था, यह आज उसीको नष्ट करनेपर तुला हुआ है। इतना सब होनेपर भी हमें इसे समझाना अवश्य चाहिये; ऐसा करनेसे इसके किये हुए पाप हमें स्पर्श नहीं करेंगे॥ ११॥"},{"id":"4.14.12","number":12,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/14/12/","page":479,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["तद्विद्वद्भिरसद‍्वृत्तो वेनोऽस्माभिः कृतो नृपः।","सान्त्वितो यदि नो वाचं न ग्रहीष्यत्यधर्मकृत्॥ १२"],"iast":["tadvidvadbhirasadvṛtto veno'smābhiḥ kṛto nṛpaḥ|","sāntvito yadi no vācaṃ na grahīṣyatyadharmakṛt|| 12"],"meaning":"हमने जान-बूझकर दुराचारी वेनको राजा बनाया था। किन्तु यदि समझानेपर भी यह हमारी बात नहीं मानेगा, तो लोकके धिक्कारसे दग्ध हुए इस दुष्टको हम अपने तेजसे भस्म कर देंगे।’ ऐसा विचार करके मुनिलोग वेनके पास गये और अपने क्रोधको छिपाकर उसे प्रिय वचनोंसे समझाते हुए इस प्रकार कहने लगे॥ १२-१३॥","meaning_covers":[12,13]},{"id":"4.14.13","number":13,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/14/13/","page":479,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["लोकधिक्कारसन्दग्धं दहिष्यामः स्वतेजसा।","एवमध्यवसायैनं मुनयो गूढमन्यवः।","उपव्रज्याब्रुवन् वेनं सान्त्वयित्वा च सामभिः॥ १३"],"iast":["lokadhikkārasandagdhaṃ dahiṣyāmaḥ svatejasā|","evamadhyavasāyainaṃ munayo gūḍhamanyavaḥ|","upavrajyābruvan venaṃ sāntvayitvā ca sāmabhiḥ|| 13"],"meaning":"हमने जान-बूझकर दुराचारी वेनको राजा बनाया था। किन्तु यदि समझानेपर भी यह हमारी बात नहीं मानेगा, तो लोकके धिक्कारसे दग्ध हुए इस दुष्टको हम अपने तेजसे भस्म कर देंगे।’ ऐसा विचार करके मुनिलोग वेनके पास गये और अपने क्रोधको छिपाकर उसे प्रिय वचनोंसे समझाते हुए इस प्रकार कहने लगे॥ १२-१३॥","meaning_covers":[12,13]},{"id":"4.14.14","number":14,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/14/14/","page":479,"speaker":"मुनय ऊचुः","sanskrit":["नृपवर्य निबोधैतद्यत्ते विज्ञापयाम भोः।","आयुःश्रीबलकीर्तीनां तव तात विवर्धनम्॥ १४"],"iast":["nṛpavarya nibodhaitadyatte vijñāpayāma bhoḥ|","āyuḥśrībalakīrtīnāṃ tava tāta vivardhanam|| 14"],"meaning":"मुनियोंने कहा—राजन्! हम आपसे जो बात कहते हैं, उसपर ध्यान दीजिये। इससे आपकी आयु, श्री, बल और कीर्तिकी वृद्धि होगी॥ १४॥"},{"id":"4.14.15","number":15,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/14/15/","page":479,"speaker":"मुनय ऊचुः","sanskrit":["धर्म आचरितः पुंसां वाङ्मनःकायबुद्धिभिः।","लोकान् विशोकान् वितरत्यथानन्त्यमसंगिनाम्॥ १५"],"iast":["dharma ācaritaḥ puṃsāṃ vāṅmanaḥkāyabuddhibhiḥ|","lokān viśokān vitaratyathānantyamasaṃginām|| 15"],"meaning":"तात! यदि मनुष्य मन, वाणी, शरीर और बुद्धिसे धर्मका आचरण करे, तो उसे स्वर्गादि शोकरहित लोकोंकी प्राप्ति होती है। यदि उसका निष्कामभाव हो, तब तो वही धर्म उसे अनन्त मोक्षपदपर पहुँचा देता है॥ १५॥"},{"id":"4.14.16","number":16,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/14/16/","page":479,"speaker":"मुनय ऊचुः","sanskrit":["स ते मा विनशेद्वीर प्रजानां क्षेमलक्षणः।","यस्मिन् विनष्टे नृपतिरैश्‍वर्यादवरोहति॥ १६"],"iast":["sa te mā vinaśedvīra prajānāṃ kṣemalakṣaṇaḥ|","yasmin vinaṣṭe nṛpatiraiśvaryādavarohati|| 16"],"meaning":"इसलिये वीरवर! प्रजाका कल्याणरूप वह धर्म आपके कारण नष्ट नहीं होना चाहिये। धर्मके नष्ट होनेसे राजा भी ऐश्‍वर्यसे च्युत हो जाता है॥ १६॥"},{"id":"4.14.17","number":17,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/14/17/","page":479,"speaker":"मुनय ऊचुः","sanskrit":["राजन्‍नसाध्वमात्येभ्यश्चोरादिभ्यः प्रजा नृपः।","रक्षन् यथा बलिं गृह्णन्‍निह प्रेत्य च मोदते॥ १७"],"iast":["rājannasādhvamātyebhyaścorādibhyaḥ prajā nṛpaḥ|","rakṣan yathā baliṃ gṛhṇanniha pretya ca modate|| 17"],"meaning":"जो राजा दुष्ट मन्त्री और चोर आदिसे अपनी प्रजाकी रक्षा करते हुए न्यायानुकूल कर लेता है, वह इस लोकमें और परलोकमें दोनों जगह सुख पाता है॥ १७॥"},{"id":"4.14.18","number":18,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/14/18/","page":479,"speaker":"मुनय ऊचुः","sanskrit":["यस्य राष्ट्रे पुरे चैव भगवान् यज्ञपूरुषः।","इज्यते स्वेन धर्मेण जनैर्वर्णाश्रमान्वितैः॥ १८"],"iast":["yasya rāṣṭre pure caiva bhagavān yajñapūruṣaḥ|","ijyate svena dharmeṇa janairvarṇāśramānvitaiḥ|| 18"],"meaning":"जिसके राज्य अथवा नगरमें वर्णाश्रम-धर्मोंका पालन करनेवाले पुरुष स्वधर्मपालनके द्वारा भगवान् यज्ञपुरुषकी आराधना करते हैं, महाभाग! अपनी आज्ञाका पालन करनेवाले उस राजासे भगवान् प्रसन्‍न रहते हैं; क्योंकि वे ही सारे विश्‍वकी आत्मा तथा सम्पूर्ण भूतोंके रक्षक हैं॥ १८-१९॥","meaning_covers":[18,19]},{"id":"4.14.19","number":19,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/14/19/","page":479,"speaker":"मुनय ऊचुः","sanskrit":["तस्य राज्ञो महाभाग भगवान् भूतभावनः।","परितुष्यति विश्वात्मा तिष्ठतो निजशासने॥ १९"],"iast":["tasya rājño mahābhāga bhagavān bhūtabhāvanaḥ|","parituṣyati viśvātmā tiṣṭhato nijaśāsane|| 19"],"meaning":"जिसके राज्य अथवा नगरमें वर्णाश्रम-धर्मोंका पालन करनेवाले पुरुष स्वधर्मपालनके द्वारा भगवान् यज्ञपुरुषकी आराधना करते हैं, महाभाग! अपनी आज्ञाका पालन करनेवाले उस राजासे भगवान् प्रसन्‍न रहते हैं; क्योंकि वे ही सारे विश्‍वकी आत्मा तथा सम्पूर्ण भूतोंके रक्षक हैं॥ १८-१९॥","meaning_covers":[18,19]},{"id":"4.14.20","number":20,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/14/20/","page":480,"speaker":"मुनय ऊचुः","sanskrit":["तस्मिंस्तुष्टे किमप्राप्यं जगतामीश्‍वरेश्‍वरे।","लोकाः सपाला ह्येतस्मै हरन्ति बलिमादृताः॥ २०"],"iast":["tasmiṃstuṣṭe kimaprāpyaṃ jagatāmīśvareśvare|","lokāḥ sapālā hyetasmai haranti balimādṛtāḥ|| 20"],"meaning":"भगवान् ब्रह्मादि जगदीश्‍वरोंके भी ईश्‍वर हैं, उनके प्रसन्‍न होनेपर कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं रह जाती। तभी तो इन्द्रादि लोकपालोंके सहित समस्त लोक उन्हें बड़े आदरसे पूजोपहार समर्पण करते हैं॥ २०॥"},{"id":"4.14.21","number":21,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/14/21/","page":480,"speaker":"मुनय ऊचुः","sanskrit":["तं सर्वलोकामरयज्ञसंग्रहं","त्रयीमयं द्रव्यमयं तपोमयम्।","यज्ञैर्विचित्रैर्यजतो भवाय ते","राजन् स्वदेशाननुरोद्धुमर्हसि॥ २१"],"iast":["taṃ sarvalokāmarayajñasaṃgrahaṃ","trayīmayaṃ dravyamayaṃ tapomayam|","yajñairvicitrairyajato bhavāya te","rājan svadeśānanuroddhumarhasi|| 21"],"meaning":"राजन्! भगवान् श्रीहरि समस्त लोक, लोकपाल और यज्ञोंके नियन्ता हैं; वे वेदत्रयीरूप, द्रव्यरूप और तपःस्वरूप हैं। इसलिये आपके जो देशवासी आपकी उन्‍नतिके लिये अनेक प्रकारके यज्ञोंसे भगवान्‌का यजन करते हैं, आपको उनके अनुकूल ही रहना चाहिये॥ २१॥"},{"id":"4.14.22","number":22,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/14/22/","page":480,"speaker":"मुनय ऊचुः","sanskrit":["यज्ञेन युष्मद्विषये द्विजातिभि-","र्वितायमानेन सुराः कला हरेः।","स्विष्टाः सुतुष्टाः प्रदिशन्ति वाञ्छितं","तद्धेलनं नार्हसि वीर चेष्टितुम्॥ २२"],"iast":["yajñena yuṣmadviṣaye dvijātibhi-","rvitāyamānena surāḥ kalā hareḥ|","sviṣṭāḥ sutuṣṭāḥ pradiśanti vāñchitaṃ","taddhelanaṃ nārhasi vīra ceṣṭitum|| 22"],"meaning":"जब आपके राज्यमें ब्राह्मणलोग यज्ञोंका अनुष्ठान करेंगे, तब उनकी पूजासे प्रसन्‍न होकर भगवान्‌के अंशस्वरूप देवता आपको मनचाहा फल देंगे। अतः वीरवर! आपको यज्ञादि धर्मानुष्ठान बंद करके देवताओंका तिरस्कार नहीं करना चाहिये॥ २२॥"},{"id":"4.14.23","number":23,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/14/23/","page":480,"speaker":"वेन उवाच","sanskrit":["बालिशा बत यूयं वा अधर्मे धर्ममानिनः।","ये वृत्तिदं पतिं हित्वा जारं पतिमुपासते॥ २३"],"iast":["bāliśā bata yūyaṃ vā adharme dharmamāninaḥ|","ye vṛttidaṃ patiṃ hitvā jāraṃ patimupāsate|| 23"],"meaning":"वेनने कहा—तुमलोग बड़े मूर्ख हो! खेद है, तुमने अधर्ममें ही धर्मबुद्धि कर रखी है। तभी तो तुम जीविका देनेवाले मुझ साक्षात् पतिको छोड़कर किसी दूसरे जारपतिकी उपासना करते हो॥ २३॥"},{"id":"4.14.24","number":24,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/14/24/","page":480,"speaker":"वेन उवाच","sanskrit":["अवजानन्त्यमी मूढा नृपरूपिणमीश्‍वरम्।","नानुविन्दन्ति ते भद्रमिह लोके परत्र च॥ २४"],"iast":["avajānantyamī mūḍhā nṛparūpiṇamīśvaram|","nānuvindanti te bhadramiha loke paratra ca|| 24"],"meaning":"जो लोग मूर्खतावश राजारूप परमेश्‍वरका अनादर करते हैं, उन्हें न तो इस लोकमें सुख मिलता है और न परलोकमें ही॥ २४॥"},{"id":"4.14.25","number":25,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/14/25/","page":480,"speaker":"वेन उवाच","sanskrit":["को यज्ञपुरुषो नाम यत्र वो भक्तिरीदृशी।","भर्तृस्नेहविदूराणां यथा जारे कुयोषिताम्॥ २५"],"iast":["ko yajñapuruṣo nāma yatra vo bhaktirīdṛśī|","bhartṛsnehavidūrāṇāṃ yathā jāre kuyoṣitām|| 25"],"meaning":"अरे! जिसमें तुमलोगोंकी इतनी भक्ति है, वह यज्ञपुरुष है कौन? यह तो ऐसी ही बात हुई जैसे कुलटा स्त्रियाँ अपने विवाहित पतिसे प्रेम न करके किसी परपुरुषमें आसक्त हो जायँ॥ २५॥"},{"id":"4.14.26","number":26,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/14/26/","page":480,"speaker":"वेन उवाच","sanskrit":["विष्णुर्विरिञ्चो गिरिश इन्द्रो वायुर्यमो रविः।","पर्जन्यो धनदः सोमः क्षितिरग्‍निरपाम्पतिः॥ २६"],"iast":["viṣṇurviriñco giriśa indro vāyuryamo raviḥ|","parjanyo dhanadaḥ somaḥ kṣitiragnirapāmpatiḥ|| 26"],"meaning":"विष्णु, ब्रह्मा, महादेव, इन्द्र, वायु, यम, सूर्य, मेघ, कुबेर, चन्द्रमा, पृथ्वी, अग्‍नि और वरुण तथा इनके अतिरिक्त जो दूसरे वर और शाप देनेमें समर्थ देवता हैं, वे सब-के-सब राजाके शरीरमें रहते हैं; इसलिये राजा सर्वदेवमय है और देवता उसके अंशमात्र हैं॥ २६-२७॥","meaning_covers":[26,27]},{"id":"4.14.27","number":27,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/14/27/","page":480,"speaker":"वेन उवाच","sanskrit":["एते चान्ये च विबुधाः प्रभवो वरशापयोः।","देहे भवन्ति नृपतेः सर्वदेवमयो नृपः॥ २७"],"iast":["ete cānye ca vibudhāḥ prabhavo varaśāpayoḥ|","dehe bhavanti nṛpateḥ sarvadevamayo nṛpaḥ|| 27"],"meaning":"विष्णु, ब्रह्मा, महादेव, इन्द्र, वायु, यम, सूर्य, मेघ, कुबेर, चन्द्रमा, पृथ्वी, अग्‍नि और वरुण तथा इनके अतिरिक्त जो दूसरे वर और शाप देनेमें समर्थ देवता हैं, वे सब-के-सब राजाके शरीरमें रहते हैं; इसलिये राजा सर्वदेवमय है और देवता उसके अंशमात्र हैं॥ २६-२७॥","meaning_covers":[26,27]},{"id":"4.14.28","number":28,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/14/28/","page":480,"speaker":"वेन उवाच","sanskrit":["तस्मान्मां कर्मभिर्विप्रा यजध्वं गतमत्सराः।","बलिं च मह्यं हरत मत्तोऽन्यः कोऽग्रभुक् पुमान्॥ २८"],"iast":["tasmānmāṃ karmabhirviprā yajadhvaṃ gatamatsarāḥ|","baliṃ ca mahyaṃ harata matto'nyaḥ ko'grabhuk pumān|| 28"],"meaning":"इसलिये ब्राह्मणो! तुम मत्सरता छोड़कर अपने सभी कर्मोंद्वारा एक मेरा ही पूजन करो और मुझीको बलि समर्पण करो। भला मेरे सिवा और कौन अग्रपूजाका अधिकारी हो सकता है॥ २८॥"},{"id":"4.14.29","number":29,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/14/29/","page":481,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["इत्थं विपर्ययमतिः पापीयानुत्पथं गतः।","अनुनीयमानस्तद्याच्ञां न चक्रे भ्रष्टमंगलः॥ २९"],"iast":["itthaṃ viparyayamatiḥ pāpīyānutpathaṃ gataḥ|","anunīyamānastadyācñāṃ na cakre bhraṣṭamaṃgalaḥ|| 29"],"meaning":"श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—इस प्रकार विपरीत बुद्धि होनेके कारण वह अत्यन्त पापी और कुमार्गगामी हो गया था। उसका पुण्य क्षीण हो चुका था, इसलिये मुनियोंके बहुत विनयपूर्वक प्रार्थना करनेपर भी उसने उनकी बातपर ध्यान न दिया॥ २९॥"},{"id":"4.14.30","number":30,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/14/30/","page":481,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["इति तेऽसत्कृतास्तेन द्विजाः पण्डितमानिना।","भग्नायां भव्ययाच्ञायां तस्मै विदुर चुक्रुधुः॥ ३०"],"iast":["iti te'satkṛtāstena dvijāḥ paṇḍitamāninā|","bhagnāyāṃ bhavyayācñāyāṃ tasmai vidura cukrudhuḥ|| 30"],"meaning":"कल्याणरूप विदुरजी! अपनेको बड़ा बुद्धिमान् समझनेवाले वेनने जब उन मुनियोंका इस प्रकार अपमान किया, तब अपनी माँगको व्यर्थ हुई देख वे उसपर अत्यन्त कुपित हो गये॥ ३०॥"},{"id":"4.14.31","number":31,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/14/31/","page":481,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["हन्यतां हन्यतामेष पापः प्रकृतिदारुणः।","जीवञ्जगदसावाशु कुरुते भस्मसाद् ध्रुवम्॥ ३१"],"iast":["hanyatāṃ hanyatāmeṣa pāpaḥ prakṛtidāruṇaḥ|","jīvañjagadasāvāśu kurute bhasmasād dhruvam|| 31"],"meaning":"‘मार डालो! इस स्वभावसे ही दुष्ट पापीको मार डालो! यह यदि जीता रह गया तो कुछ ही दिनोंमें संसारको अवश्य भस्म कर डालेगा॥ ३१॥"},{"id":"4.14.32","number":32,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/14/32/","page":481,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["नायमर्हत्यसद‍्वृत्तो नरदेववरासनम्।","योऽधियज्ञपतिं विष्णुं विनिन्दत्यनपत्रपः॥ ३२"],"iast":["nāyamarhatyasadvṛtto naradevavarāsanam|","yo'dhiyajñapatiṃ viṣṇuṃ vinindatyanapatrapaḥ|| 32"],"meaning":"यह दुराचारी किसी प्रकार राजसिंहासनके योग्य नहीं है, क्योंकि यह निर्लज्ज साक्षात् यज्ञपति श्रीविष्णुभगवान्‌की निन्दा करता है॥ ३२॥"},{"id":"4.14.33","number":33,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/14/33/","page":481,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["को वैनं परिचक्षीत वेनमेकमृतेऽशुभम्।","प्राप्त ईदृशमैश्‍वर्यं यदनुग्रहभाजनः॥ ३३"],"iast":["ko vainaṃ paricakṣīta venamekamṛte'śubham|","prāpta īdṛśamaiśvaryaṃ yadanugrahabhājanaḥ|| 33"],"meaning":"अहो! जिनकी कृपासे इसे ऐसा ऐश्‍वर्य मिला, उन श्रीहरिकी निन्दा अभागे वेनको छोड़कर और कौन कर सकता है’?॥ ३३॥"},{"id":"4.14.34","number":34,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/14/34/","page":481,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["इत्थं व्यवसिता हन्तुमृषयो रूढमन्यवः।","निजघ्नुर्हुङ्कृतैर्वेनं हतमच्युतनिन्दया॥ ३४"],"iast":["itthaṃ vyavasitā hantumṛṣayo rūḍhamanyavaḥ|","nijaghnurhuṅkṛtairvenaṃ hatamacyutanindayā|| 34"],"meaning":"इस प्रकार अपने छिपे हुए क्रोधको प्रकट कर उन्होंने उसे मारनेका निश्‍चय कर लिया। वह तो भगवान्‌की निन्दा करनेके कारण पहले ही मर चुका था, इसलिये केवल हुंकारोंसे ही उन्होंने उसका काम तमाम कर दिया॥ ३४॥"},{"id":"4.14.35","number":35,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/14/35/","page":481,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["ऋषिभिः स्वाश्रमपदं गते पुत्रकलेवरम्।","सुनीथा पालयामास विद्यायोगेन शोचती॥ ३५"],"iast":["ṛṣibhiḥ svāśramapadaṃ gate putrakalevaram|","sunīthā pālayāmāsa vidyāyogena śocatī|| 35"],"meaning":"जब मुनिगण अपने-अपने आश्रमोंको चले गये, तब इधर वेनकी शोकाकुला माता सुनीथा मन्त्रादिके बलसे तथा अन्य युक्तियोंसे अपने पुत्रके शवकी रक्षा करने लगी॥ ३५॥"},{"id":"4.14.36","number":36,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/14/36/","page":481,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["एकदा मुनयस्ते तु सरस्वत्सलिलाप्लुताः।","हुत्वाग्नीन् सत्कथाश्‍चक्रुरुपविष्टाः सरित्तटे॥ ३६"],"iast":["ekadā munayaste tu sarasvatsalilāplutāḥ|","hutvāgnīn satkathāścakrurupaviṣṭāḥ sarittaṭe|| 36"],"meaning":"एक दिन वे मुनिगण सरस्वतीके पवित्र जलमें स्नान कर अग्‍निहोत्रसे निवृत्त हो नदीके तीरपर बैठे हुए हरिचर्चा कर रहे थे॥ ३६॥"},{"id":"4.14.37","number":37,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/14/37/","page":481,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["वीक्ष्योत्थितांस्तदोत्पातानाहुर्लोकभयङ्करान्।","अप्यभद्रमनाथाया दस्युभ्यो न भवेद्भुवः॥ ३७"],"iast":["vīkṣyotthitāṃstadotpātānāhurlokabhayaṅkarān|","apyabhadramanāthāyā dasyubhyo na bhavedbhuvaḥ|| 37"],"meaning":"उन दिनों लोकोंमें आतंक फैलानेवाले बहुत-से उपद्रव होते देखकर वे आपसमें कहने लगे, ‘आजकल पृथ्वीका कोई रक्षक नहीं है; इसलिये चोर-डाकुओंके कारण उसका कुछ अमंगल तो नहीं होनेवाला है?’॥ ३७॥"},{"id":"4.14.38","number":38,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/14/38/","page":481,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["एवं मृशन्त ऋषयो धावतां सर्वतोदिशम्।","पांसुः समुत्थितो भूरिश्चोराणामभिलुम्पताम्॥ ३८"],"iast":["evaṃ mṛśanta ṛṣayo dhāvatāṃ sarvatodiśam|","pāṃsuḥ samutthito bhūriścorāṇāmabhilumpatām|| 38"],"meaning":"ऋषिलोग ऐसा विचार कर ही रहे थे कि उन्होंने सब दिशाओंमें धावा करनेवाले चोरों और डाकुओंके कारण उठी हुई बड़ी भारी धूल देखी॥ ३८॥"},{"id":"4.14.39","number":39,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/14/39/","page":482,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["तदुपद्रवमाज्ञाय लोकस्य वसु लुम्पताम्।","भर्तर्युपरते तस्मिन्‍नन्योन्यं च जिघांसताम्॥ ३९"],"iast":["tadupadravamājñāya lokasya vasu lumpatām|","bhartaryuparate tasminnanyonyaṃ ca jighāṃsatām|| 39"],"meaning":"देखते ही वे समझ गये कि राजा वेनके मर जानेके कारण देशमें अराजकता फैल गयी है, राज्य शक्तिहीन हो गया है और चोर-डाकू बढ़ गये हैं; यह सारा उपद्रव लोगोंका धन लूटनेवाले तथा एक-दूसरेके खूनके प्यासे लुटेरोंका ही है। अपने तेजसे अथवा तपोबलसे लोगोंको ऐसी कुप्रवृत्तिसे रोकनेमें समर्थ होनेपर भी ऐसा करनेमें हिंसादि दोष देखकर उन्होंने इसका कोई निवारण नहीं किया॥ ३९-४०॥","meaning_covers":[39,40]},{"id":"4.14.40","number":40,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/14/40/","page":482,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["चोरप्रायं जनपदं हीनसत्त्वमराजकम्।","लोकान्‍नावारयञ्छक्ता अपि तद्दोषदर्शिनः॥ ४०"],"iast":["coraprāyaṃ janapadaṃ hīnasattvamarājakam|","lokānnāvārayañchaktā api taddoṣadarśinaḥ|| 40"],"meaning":"देखते ही वे समझ गये कि राजा वेनके मर जानेके कारण देशमें अराजकता फैल गयी है, राज्य शक्तिहीन हो गया है और चोर-डाकू बढ़ गये हैं; यह सारा उपद्रव लोगोंका धन लूटनेवाले तथा एक-दूसरेके खूनके प्यासे लुटेरोंका ही है। अपने तेजसे अथवा तपोबलसे लोगोंको ऐसी कुप्रवृत्तिसे रोकनेमें समर्थ होनेपर भी ऐसा करनेमें हिंसादि दोष देखकर उन्होंने इसका कोई निवारण नहीं किया॥ ३९-४०॥","meaning_covers":[39,40]},{"id":"4.14.41","number":41,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/14/41/","page":482,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["ब्राह्मणः समदृक् शान्तो दीनानां समुपेक्षकः।","स्रवते ब्रह्म तस्यापि भिन्‍नभाण्डात्पयो यथा॥ ४१"],"iast":["brāhmaṇaḥ samadṛk śānto dīnānāṃ samupekṣakaḥ|","sravate brahma tasyāpi bhinnabhāṇḍātpayo yathā|| 41"],"meaning":"फिर सोचा कि ‘ब्राह्मण यदि समदर्शी और शान्तस्वभाव भी हो तो भी दीनोंकी उपेक्षा करनेसे उसका तप उसी प्रकार नष्ट हो जाता है जैसे फूटे हुए घड़ेमेंसे जल बह जाता है॥ ४१॥"},{"id":"4.14.42","number":42,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/14/42/","page":482,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["नाङ्गस्य वंशो राजर्षेरेष संस्थातुमर्हति।","अमोघवीर्या हि नृपा वंशेऽस्मिन् केशवाश्रयाः॥ ४२"],"iast":["nāṅgasya vaṃśo rājarṣereṣa saṃsthātumarhati|","amoghavīryā hi nṛpā vaṃśe'smin keśavāśrayāḥ|| 42"],"meaning":"फिर राजर्षि अंगका वंश भी नष्ट नहीं होना चाहिये, क्योंकि इसमें अनेक अमोघ-शक्ति और भगवत्परायण राजा हो चुके हैं’॥ ४२॥"},{"id":"4.14.43","number":43,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/14/43/","page":482,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["विनिश्चित्यैवमृषयो विपन्‍नस्य महीपतेः।","ममन्थुरूरुं तरसा तत्रासीद‍्बाहुको नरः॥ ४३"],"iast":["viniścityaivamṛṣayo vipannasya mahīpateḥ|","mamanthurūruṃ tarasā tatrāsīdbāhuko naraḥ|| 43"],"meaning":"ऐसा निश्‍चय कर उन्होंने मृत राजाकी जाँघको बड़े जोरसे मथा तो उसमेंसे एक बौना पुरुष उत्पन्‍न हुआ॥ ४३॥"},{"id":"4.14.44","number":44,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/14/44/","page":482,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["काककृष्णोऽतिह्रस्वांगो ह्रस्वबाहुर्महाहनुः।","ह्रस्वपान्‍निम्ननासाग्रो रक्ताक्षस्ताम्रमूर्धजः॥ ४४"],"iast":["kākakṛṣṇo'tihrasvāṃgo hrasvabāhurmahāhanuḥ|","hrasvapānnimnanāsāgro raktākṣastāmramūrdhajaḥ|| 44"],"meaning":"वह कौएके समान काला था; उसके सभी अंग और खासकर भुजाएँ बहुत छोटी थीं, जबड़े बहुत बड़े, टाँगे छोटी, नाक चपटी, नेत्र लाल और केश ताँबेके-से रंगके थे॥ ४४॥"},{"id":"4.14.45","number":45,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/14/45/","page":482,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["तं तु तेऽवनतं दीनं किं करोमीति वादिनम्।","निषीदेत्यब्रुवंस्तात स निषादस्ततोऽभवत्॥ ४५"],"iast":["taṃ tu te'vanataṃ dīnaṃ kiṃ karomīti vādinam|","niṣīdetyabruvaṃstāta sa niṣādastato'bhavat|| 45"],"meaning":"उसने बड़ी दीनता और नम्रभावसे पूछा कि ‘मैं क्या करूँ?’ तो ऋषियोंने कहा—‘निषीद (बैठ जा)।’ इसीसे वह ‘निषाद’ कहलाया॥ ४५॥"},{"id":"4.14.46","number":46,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/14/46/","page":482,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["तस्य वंश्यास्तु नैषादा गिरिकाननगोचराः।","येनाहरज्जायमानो वेनकल्मषमुल्बणम्॥ ४६"],"iast":["tasya vaṃśyāstu naiṣādā girikānanagocarāḥ|","yenāharajjāyamāno venakalmaṣamulbaṇam|| 46"],"meaning":"उसने जन्म लेते ही राजा वेनके भयंकर पापोंको अपने ऊपर ले लिया, इसीलिये उसके वंशधर नैषाद भी हिंसा, लूट-पाट आदि पापकर्मोंमें रत रहते हैं; अतः वे गाँव और नगरमें न टिककर वन और पर्वतोंमें ही निवास करते हैं॥ ४६॥"}],"text":[{"b":11636,"kind":"adhyaya_heading","page":478,"text":"अथ चतुर्दशोऽध्यायः"},{"b":11637,"kind":"topic_heading","page":478,"text":"राजा वेनकी कथा"},{"b":11638,"kind":"topic_heading","page":478,"text":"मैत्रेय उवाच"},{"b":11639,"kind":"sanskrit_shloka","page":478,"verses":["4.14.1"],"text":"भृग्वादयस्ते मुनयो लोकानां क्षेमदर्शिनः।"},{"b":11640,"kind":"sanskrit_shloka","page":478,"verses":["4.14.1"],"text":"गोप्तर्यसति वै नॄणां पश्यन्तः पशुसाम्यताम्॥ १"},{"b":11641,"kind":"sanskrit_shloka","page":478,"verses":["4.14.2"],"text":"वीर मातरमाहूय सुनीथां ब्रह्मवादिनः।"},{"b":11642,"kind":"sanskrit_shloka","page":478,"verses":["4.14.2"],"text":"प्रकृत्यसम्मतं वेनमभ्यषिञ्चन् पतिं भुवः॥ २"},{"b":11643,"kind":"sanskrit_shloka","page":478,"verses":["4.14.3"],"text":"श्रुत्वा नृपासनगतं वेनमत्युग्रशासनम्।"},{"b":11644,"kind":"sanskrit_shloka","page":478,"verses":["4.14.3"],"text":"निलिल्युर्दस्यवः सद्यः सर्पत्रस्ता इवाखवः॥ ३"},{"b":11645,"kind":"sanskrit_shloka","page":478,"verses":["4.14.4"],"text":"स आरूढनृपस्थान उन्‍नद्धोऽष्टविभूतिभिः।"},{"b":11646,"kind":"sanskrit_shloka","page":478,"verses":["4.14.4"],"text":"अवमेने महाभागान् स्तब्धः सम्भावितः स्वतः॥ ४"},{"b":11647,"kind":"sanskrit_shloka","page":478,"verses":["4.14.5"],"text":"एवं मदान्ध उत्सिक्तो निरङ्कुश इव द्विपः।"},{"b":11648,"kind":"sanskrit_shloka","page":478,"verses":["4.14.5"],"text":"पर्यटन् रथमास्थाय कम्पयन्‍निव रोदसी॥ ५"},{"b":11649,"kind":"sanskrit_shloka","page":478,"verses":["4.14.6"],"text":"न यष्टव्यं न दातव्यं न होतव्यं द्विजाः क्‍वचित्।"},{"b":11650,"kind":"sanskrit_shloka","page":478,"verses":["4.14.6"],"text":"इति न्यवारयद्धर्मं भेरीघोषेण सर्वशः॥ ६"},{"b":11651,"kind":"hindi_commentary","page":478,"explains":["4.14.1","4.14.2","4.14.3","4.14.4","4.14.5","4.14.6"],"text":"श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—वीरवर विदुरजी! सभी लोकोंकी कुशल चाहनेवाले भृगु आदि मुनियोंने देखा कि अंगके चले जानेसे अब पृथ्वीकी रक्षा करनेवाला कोई नहीं रह गया है, सब लोग पशुओंके समान उच्छृंखल होते जा रहे हैं॥ १॥ तब उन्होंने माता सुनीथाकी सम्मतिसे, मन्त्रियोंके सहमत न होनेपर भी वेनको भूमण्डलके राजपदपर अभिषिक्त कर दिया॥ २॥ वेन बड़ा कठोर शासक था। जब चोर-डाकुओंने सुना कि वही राजसिंहासनपर बैठा है, तब सर्पसे डरे हुए चूहोंके समान वे सब तुरंत ही जहाँ-तहाँ छिप गये॥ ३॥ राज्यासन पानेपर वेन आठों लोकपालोंकी ऐश्‍वर्यकलाके कारण उन्मत्त हो गया और अभिमानवश अपनेको ही सबसे बड़ा मानकर महापुरुषोंका अपमान करने लगा॥ ४॥ वह ऐश्‍वर्यमदसे अंधा हो रथपर चढ़कर निरंकुश गजराजके समान पृथ्वी और आकाशको कँपाता हुआ सर्वत्र विचरने लगा॥ ५॥ ‘कोई भी द्विजातिय वर्णका पुरुष कभी किसी प्रकारका यज्ञ, दान और हवन न करे’ अपने राज्यमें यह ढिंढोरा पिटवाकर उसने सारे धर्म-कर्म बंद करवा दिये॥ ६॥"},{"b":11652,"kind":"sanskrit_shloka","page":478,"verses":["4.14.7"],"text":"वेनस्यावेक्ष्य मुनयो दुर्वृत्तस्य विचेष्टितम्।"},{"b":11653,"kind":"sanskrit_shloka","page":478,"verses":["4.14.7"],"text":"विमृश्य लोकव्यसनं कृपयोचुः स्म सत्रिणः॥ ७"},{"b":11654,"kind":"sanskrit_shloka","page":478,"verses":["4.14.8"],"text":"अहो उभयतः प्राप्तं लोकस्य व्यसनं महत्।"},{"b":11655,"kind":"sanskrit_shloka","page":478,"verses":["4.14.8"],"text":"दारुण्युभयतो दीप्ते इव तस्करपालयोः॥ ८"},{"b":11656,"kind":"sanskrit_shloka","page":479,"verses":["4.14.9"],"text":"अराजकभयादेष कृतो राजातदर्हणः।"},{"b":11657,"kind":"sanskrit_shloka","page":479,"verses":["4.14.9"],"text":"ततोऽप्यासीद्भयं त्वद्य कथं स्यात्स्वस्ति देहिनाम्॥ ९"},{"b":11658,"kind":"sanskrit_shloka","page":479,"verses":["4.14.10"],"text":"अहेरिव पयःपोषः पोषकस्याप्यनर्थभृत्।"},{"b":11659,"kind":"sanskrit_shloka","page":479,"verses":["4.14.10"],"text":"वेनः प्रकृत्यैव खलः सुनीथागर्भसम्भवः॥ १०"},{"b":11660,"kind":"sanskrit_shloka","page":479,"verses":["4.14.11"],"text":"निरूपितः प्रजापालः स जिघांसति वै प्रजाः।"},{"b":11661,"kind":"sanskrit_shloka","page":479,"verses":["4.14.11"],"text":"तथापि सान्त्वयेमामुं नास्मांस्तत्पातकं स्पृशेत्॥ ११"},{"b":11662,"kind":"sanskrit_shloka","page":479,"verses":["4.14.12"],"text":"तद्विद्वद्भिरसद‍्वृत्तो वेनोऽस्माभिः कृतो नृपः।"},{"b":11663,"kind":"sanskrit_shloka","page":479,"verses":["4.14.12"],"text":"सान्त्वितो यदि नो वाचं न ग्रहीष्यत्यधर्मकृत्॥ १२"},{"b":11664,"kind":"sanskrit_shloka","page":479,"verses":["4.14.13"],"text":"लोकधिक्कारसन्दग्धं दहिष्यामः स्वतेजसा।"},{"b":11665,"kind":"sanskrit_shloka","page":479,"verses":["4.14.13"],"text":"एवमध्यवसायैनं मुनयो गूढमन्यवः।"},{"b":11666,"kind":"sanskrit_shloka","page":479,"verses":["4.14.13"],"text":"उपव्रज्याब्रुवन् वेनं सान्त्वयित्वा च सामभिः॥ १३"},{"b":11667,"kind":"hindi_commentary","page":478,"explains":["4.14.7","4.14.8","4.14.9","4.14.10","4.14.11","4.14.12","4.14.13"],"text":"दुष्ट वेनका ऐसा अत्याचार देख सारे ऋषि-मुनि एकत्र हुए और संसारपर संकट आया समझकर करुणावश आपसमें कहने लगे॥ ७॥ ‘अहो! जैसे दोनों ओर जलती हुई लकड़ीके बीचमें रहनेवाले चींटी आदि जीव महान् संकटमें पड़ जाते हैं, वैसे ही इस समय सारी प्रजा एक ओर राजाके और दूसरी ओर चोर-डाकुओंके अत्याचारसे महान् संकटमें पड़ रही है॥ ८॥ हमने अराजकताके भयसे ही अयोग्य होनेपर भी वेनको राजा बनाया था; किन्तु अब उससे भी प्रजाको भय हो गया। ऐसी अवस्थामें प्रजाको किस प्रकार सुख-शान्ति मिल सकती है?॥ ९॥ सुनीथाकी कोखसे उत्पन्‍न हुआ यह वेन स्वभावसे ही दुष्ट है। परन्तु साँपको दूध पिलानेके समान इसको पालना, पालनेवालोंके लिये अनर्थका कारण हो गया॥ १०॥ हमने इसे प्रजाकी रक्षा करनेके लिये नियुक्त किया था, यह आज उसीको नष्ट करनेपर तुला हुआ है। इतना सब होनेपर भी हमें इसे समझाना अवश्य चाहिये; ऐसा करनेसे इसके किये हुए पाप हमें स्पर्श नहीं करेंगे॥ ११॥ हमने जान-बूझकर दुराचारी वेनको राजा बनाया था। किन्तु यदि समझानेपर भी यह हमारी बात नहीं मानेगा, तो लोकके धिक्कारसे दग्ध हुए इस दुष्टको हम अपने तेजसे भस्म कर देंगे।’ ऐसा विचार करके मुनिलोग वेनके पास गये और अपने क्रोधको छिपाकर उसे प्रिय वचनोंसे समझाते हुए इस प्रकार कहने लगे॥ १२-१३॥"},{"b":11668,"kind":"topic_heading","page":479,"text":"मुनय ऊचुः"},{"b":11669,"kind":"sanskrit_shloka","page":479,"verses":["4.14.14"],"text":"नृपवर्य निबोधैतद्यत्ते विज्ञापयाम भोः।"},{"b":11670,"kind":"sanskrit_shloka","page":479,"verses":["4.14.14"],"text":"आयुःश्रीबलकीर्तीनां तव तात विवर्धनम्॥ १४"},{"b":11671,"kind":"sanskrit_shloka","page":479,"verses":["4.14.15"],"text":"धर्म आचरितः पुंसां वाङ्मनःकायबुद्धिभिः।"},{"b":11672,"kind":"sanskrit_shloka","page":479,"verses":["4.14.15"],"text":"लोकान् विशोकान् वितरत्यथानन्त्यमसंगिनाम्॥ १५"},{"b":11673,"kind":"sanskrit_shloka","page":479,"verses":["4.14.16"],"text":"स ते मा विनशेद्वीर प्रजानां क्षेमलक्षणः।"},{"b":11674,"kind":"sanskrit_shloka","page":479,"verses":["4.14.16"],"text":"यस्मिन् विनष्टे नृपतिरैश्‍वर्यादवरोहति॥ १६"},{"b":11675,"kind":"sanskrit_shloka","page":479,"verses":["4.14.17"],"text":"राजन्‍नसाध्वमात्येभ्यश्चोरादिभ्यः प्रजा नृपः।"},{"b":11676,"kind":"sanskrit_shloka","page":479,"verses":["4.14.17"],"text":"रक्षन् यथा बलिं गृह्णन्‍निह प्रेत्य च मोदते॥ १७"},{"b":11677,"kind":"sanskrit_shloka","page":479,"verses":["4.14.18"],"text":"यस्य राष्ट्रे पुरे चैव भगवान् यज्ञपूरुषः।"},{"b":11678,"kind":"sanskrit_shloka","page":479,"verses":["4.14.18"],"text":"इज्यते स्वेन धर्मेण जनैर्वर्णाश्रमान्वितैः॥ १८"},{"b":11679,"kind":"sanskrit_shloka","page":479,"verses":["4.14.19"],"text":"तस्य राज्ञो महाभाग भगवान् भूतभावनः।"},{"b":11680,"kind":"sanskrit_shloka","page":479,"verses":["4.14.19"],"text":"परितुष्यति विश्वात्मा तिष्ठतो निजशासने॥ १९"},{"b":11681,"kind":"hindi_commentary","page":479,"explains":["4.14.14","4.14.15","4.14.16","4.14.17","4.14.18","4.14.19"],"text":"मुनियोंने कहा—राजन्! हम आपसे जो बात कहते हैं, उसपर ध्यान दीजिये। इससे आपकी आयु, श्री, बल और कीर्तिकी वृद्धि होगी॥ १४॥ तात! यदि मनुष्य मन, वाणी, शरीर और बुद्धिसे धर्मका आचरण करे, तो उसे स्वर्गादि शोकरहित लोकोंकी प्राप्ति होती है। यदि उसका निष्कामभाव हो, तब तो वही धर्म उसे अनन्त मोक्षपदपर पहुँचा देता है॥ १५॥ इसलिये वीरवर! प्रजाका कल्याणरूप वह धर्म आपके कारण नष्ट नहीं होना चाहिये। धर्मके नष्ट होनेसे राजा भी ऐश्‍वर्यसे च्युत हो जाता है॥ १६॥ जो राजा दुष्ट मन्त्री और चोर आदिसे अपनी प्रजाकी रक्षा करते हुए न्यायानुकूल कर लेता है, वह इस लोकमें और परलोकमें दोनों जगह सुख पाता है॥ १७॥ जिसके राज्य अथवा नगरमें वर्णाश्रम-धर्मोंका पालन करनेवाले पुरुष स्वधर्मपालनके द्वारा भगवान् यज्ञपुरुषकी आराधना करते हैं, महाभाग! अपनी आज्ञाका पालन करनेवाले उस राजासे भगवान् प्रसन्‍न रहते हैं; क्योंकि वे ही सारे विश्‍वकी आत्मा तथा सम्पूर्ण भूतोंके रक्षक हैं॥ १८-१९॥"},{"b":11682,"kind":"sanskrit_shloka","page":480,"verses":["4.14.20"],"text":"तस्मिंस्तुष्टे किमप्राप्यं जगतामीश्‍वरेश्‍वरे।"},{"b":11683,"kind":"sanskrit_shloka","page":480,"verses":["4.14.20"],"text":"लोकाः सपाला ह्येतस्मै हरन्ति बलिमादृताः॥ २०"},{"b":11684,"kind":"sanskrit_shloka","page":480,"verses":["4.14.21"],"text":"तं सर्वलोकामरयज्ञसंग्रहं"},{"b":11685,"kind":"sanskrit_shloka","page":480,"verses":["4.14.21"],"text":"त्रयीमयं द्रव्यमयं तपोमयम्।"},{"b":11686,"kind":"sanskrit_shloka","page":480,"verses":["4.14.21"],"text":"यज्ञैर्विचित्रैर्यजतो भवाय ते"},{"b":11687,"kind":"sanskrit_shloka","page":480,"verses":["4.14.21"],"text":"राजन् स्वदेशाननुरोद्धुमर्हसि॥ २१"},{"b":11688,"kind":"sanskrit_shloka","page":480,"verses":["4.14.22"],"text":"यज्ञेन युष्मद्विषये द्विजातिभि-"},{"b":11689,"kind":"sanskrit_shloka","page":480,"verses":["4.14.22"],"text":"र्वितायमानेन सुराः कला हरेः।"},{"b":11690,"kind":"sanskrit_shloka","page":480,"verses":["4.14.22"],"text":"स्विष्टाः सुतुष्टाः प्रदिशन्ति वाञ्छितं"},{"b":11691,"kind":"sanskrit_shloka","page":480,"verses":["4.14.22"],"text":"तद्धेलनं नार्हसि वीर चेष्टितुम्॥ २२"},{"b":11692,"kind":"hindi_commentary","page":480,"explains":["4.14.20","4.14.21","4.14.22"],"text":"भगवान् ब्रह्मादि जगदीश्‍वरोंके भी ईश्‍वर हैं, उनके प्रसन्‍न होनेपर कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं रह जाती। तभी तो इन्द्रादि लोकपालोंके सहित समस्त लोक उन्हें बड़े आदरसे पूजोपहार समर्पण करते हैं॥ २०॥ राजन्! भगवान् श्रीहरि समस्त लोक, लोकपाल और यज्ञोंके नियन्ता हैं; वे वेदत्रयीरूप, द्रव्यरूप और तपःस्वरूप हैं। इसलिये आपके जो देशवासी आपकी उन्‍नतिके लिये अनेक प्रकारके यज्ञोंसे भगवान्‌का यजन करते हैं, आपको उनके अनुकूल ही रहना चाहिये॥ २१॥ जब आपके राज्यमें ब्राह्मणलोग यज्ञोंका अनुष्ठान करेंगे, तब उनकी पूजासे प्रसन्‍न होकर भगवान्‌के अंशस्वरूप देवता आपको मनचाहा फल देंगे। अतः वीरवर! आपको यज्ञादि धर्मानुष्ठान बंद करके देवताओंका तिरस्कार नहीं करना चाहिये॥ २२॥"},{"b":11693,"kind":"topic_heading","page":480,"text":"वेन उवाच"},{"b":11694,"kind":"sanskrit_shloka","page":480,"verses":["4.14.23"],"text":"बालिशा बत यूयं वा अधर्मे धर्ममानिनः।"},{"b":11695,"kind":"sanskrit_shloka","page":480,"verses":["4.14.23"],"text":"ये वृत्तिदं पतिं हित्वा जारं पतिमुपासते॥ २३"},{"b":11696,"kind":"sanskrit_shloka","page":480,"verses":["4.14.24"],"text":"अवजानन्त्यमी मूढा नृपरूपिणमीश्‍वरम्।"},{"b":11697,"kind":"sanskrit_shloka","page":480,"verses":["4.14.24"],"text":"नानुविन्दन्ति ते भद्रमिह लोके परत्र च॥ २४"},{"b":11698,"kind":"sanskrit_shloka","page":480,"verses":["4.14.25"],"text":"को यज्ञपुरुषो नाम यत्र वो भक्तिरीदृशी।"},{"b":11699,"kind":"sanskrit_shloka","page":480,"verses":["4.14.25"],"text":"भर्तृस्नेहविदूराणां यथा जारे कुयोषिताम्॥ २५"},{"b":11700,"kind":"sanskrit_shloka","page":480,"verses":["4.14.26"],"text":"विष्णुर्विरिञ्चो गिरिश इन्द्रो वायुर्यमो रविः।"},{"b":11701,"kind":"sanskrit_shloka","page":480,"verses":["4.14.26"],"text":"पर्जन्यो धनदः सोमः क्षितिरग्‍निरपाम्पतिः॥ २६"},{"b":11702,"kind":"sanskrit_shloka","page":480,"verses":["4.14.27"],"text":"एते चान्ये च विबुधाः प्रभवो वरशापयोः।"},{"b":11703,"kind":"sanskrit_shloka","page":480,"verses":["4.14.27"],"text":"देहे भवन्ति नृपतेः सर्वदेवमयो नृपः॥ २७"},{"b":11704,"kind":"sanskrit_shloka","page":480,"verses":["4.14.28"],"text":"तस्मान्मां कर्मभिर्विप्रा यजध्वं गतमत्सराः।"},{"b":11705,"kind":"sanskrit_shloka","page":480,"verses":["4.14.28"],"text":"बलिं च मह्यं हरत मत्तोऽन्यः कोऽग्रभुक् पुमान्॥ २८"},{"b":11706,"kind":"hindi_commentary","page":480,"explains":["4.14.23","4.14.24","4.14.25","4.14.26","4.14.27","4.14.28"],"text":"वेनने कहा—तुमलोग बड़े मूर्ख हो! खेद है, तुमने अधर्ममें ही धर्मबुद्धि कर रखी है। तभी तो तुम जीविका देनेवाले मुझ साक्षात् पतिको छोड़कर किसी दूसरे जारपतिकी उपासना करते हो॥ २३॥ जो लोग मूर्खतावश राजारूप परमेश्‍वरका अनादर करते हैं, उन्हें न तो इस लोकमें सुख मिलता है और न परलोकमें ही॥ २४॥ अरे! जिसमें तुमलोगोंकी इतनी भक्ति है, वह यज्ञपुरुष है कौन? यह तो ऐसी ही बात हुई जैसे कुलटा स्त्रियाँ अपने विवाहित पतिसे प्रेम न करके किसी परपुरुषमें आसक्त हो जायँ॥ २५॥ विष्णु, ब्रह्मा, महादेव, इन्द्र, वायु, यम, सूर्य, मेघ, कुबेर, चन्द्रमा, पृथ्वी, अग्‍नि और वरुण तथा इनके अतिरिक्त जो दूसरे वर और शाप देनेमें समर्थ देवता हैं, वे सब-के-सब राजाके शरीरमें रहते हैं; इसलिये राजा सर्वदेवमय है और देवता उसके अंशमात्र हैं॥ २६-२७॥ इसलिये ब्राह्मणो! तुम मत्सरता छोड़कर अपने सभी कर्मोंद्वारा एक मेरा ही पूजन करो और मुझीको बलि समर्पण करो। भला मेरे सिवा और कौन अग्रपूजाका अधिकारी हो सकता है॥ २८॥"},{"b":11707,"kind":"topic_heading","page":481,"text":"मैत्रेय उवाच"},{"b":11708,"kind":"sanskrit_shloka","page":481,"verses":["4.14.29"],"text":"इत्थं विपर्ययमतिः पापीयानुत्पथं गतः।"},{"b":11709,"kind":"sanskrit_shloka","page":481,"verses":["4.14.29"],"text":"अनुनीयमानस्तद्याच्ञां न चक्रे भ्रष्टमंगलः॥ २९"},{"b":11710,"kind":"sanskrit_shloka","page":481,"verses":["4.14.30"],"text":"इति तेऽसत्कृतास्तेन द्विजाः पण्डितमानिना।"},{"b":11711,"kind":"sanskrit_shloka","page":481,"verses":["4.14.30"],"text":"भग्नायां भव्ययाच्ञायां तस्मै विदुर चुक्रुधुः॥ ३०"},{"b":11712,"kind":"sanskrit_shloka","page":481,"verses":["4.14.31"],"text":"हन्यतां हन्यतामेष पापः प्रकृतिदारुणः।"},{"b":11713,"kind":"sanskrit_shloka","page":481,"verses":["4.14.31"],"text":"जीवञ्जगदसावाशु कुरुते भस्मसाद् ध्रुवम्॥ ३१"},{"b":11714,"kind":"sanskrit_shloka","page":481,"verses":["4.14.32"],"text":"नायमर्हत्यसद‍्वृत्तो नरदेववरासनम्।"},{"b":11715,"kind":"sanskrit_shloka","page":481,"verses":["4.14.32"],"text":"योऽधियज्ञपतिं विष्णुं विनिन्दत्यनपत्रपः॥ ३२"},{"b":11716,"kind":"sanskrit_shloka","page":481,"verses":["4.14.33"],"text":"को वैनं परिचक्षीत वेनमेकमृतेऽशुभम्।"},{"b":11717,"kind":"sanskrit_shloka","page":481,"verses":["4.14.33"],"text":"प्राप्त ईदृशमैश्‍वर्यं यदनुग्रहभाजनः॥ ३३"},{"b":11718,"kind":"hindi_commentary","page":481,"explains":["4.14.29","4.14.30","4.14.31","4.14.32","4.14.33"],"text":"श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—इस प्रकार विपरीत बुद्धि होनेके कारण वह अत्यन्त पापी और कुमार्गगामी हो गया था। उसका पुण्य क्षीण हो चुका था, इसलिये मुनियोंके बहुत विनयपूर्वक प्रार्थना करनेपर भी उसने उनकी बातपर ध्यान न दिया॥ २९॥ कल्याणरूप विदुरजी! अपनेको बड़ा बुद्धिमान् समझनेवाले वेनने जब उन मुनियोंका इस प्रकार अपमान किया, तब अपनी माँगको व्यर्थ हुई देख वे उसपर अत्यन्त कुपित हो गये॥ ३०॥ ‘मार डालो! इस स्वभावसे ही दुष्ट पापीको मार डालो! यह यदि जीता रह गया तो कुछ ही दिनोंमें संसारको अवश्य भस्म कर डालेगा॥ ३१॥ यह दुराचारी किसी प्रकार राजसिंहासनके योग्य नहीं है, क्योंकि यह निर्लज्ज साक्षात् यज्ञपति श्रीविष्णुभगवान्‌की निन्दा करता है॥ ३२॥ अहो! जिनकी कृपासे इसे ऐसा ऐश्‍वर्य मिला, उन श्रीहरिकी निन्दा अभागे वेनको छोड़कर और कौन कर सकता है’?॥ ३३॥"},{"b":11719,"kind":"sanskrit_shloka","page":481,"verses":["4.14.34"],"text":"इत्थं व्यवसिता हन्तुमृषयो रूढमन्यवः।"},{"b":11720,"kind":"sanskrit_shloka","page":481,"verses":["4.14.34"],"text":"निजघ्नुर्हुङ्कृतैर्वेनं हतमच्युतनिन्दया॥ ३४"},{"b":11721,"kind":"sanskrit_shloka","page":481,"verses":["4.14.35"],"text":"ऋषिभिः स्वाश्रमपदं गते पुत्रकलेवरम्।"},{"b":11722,"kind":"sanskrit_shloka","page":481,"verses":["4.14.35"],"text":"सुनीथा पालयामास विद्यायोगेन शोचती॥ ३५"},{"b":11723,"kind":"hindi_translation","page":481,"explains":["4.14.34","4.14.35"],"text":"इस प्रकार अपने छिपे हुए क्रोधको प्रकट कर उन्होंने उसे मारनेका निश्‍चय कर लिया। वह तो भगवान्‌की निन्दा करनेके कारण पहले ही मर चुका था, इसलिये केवल हुंकारोंसे ही उन्होंने उसका काम तमाम कर दिया॥ ३४॥ जब मुनिगण अपने-अपने आश्रमोंको चले गये, तब इधर वेनकी शोकाकुला माता सुनीथा मन्त्रादिके बलसे तथा अन्य युक्तियोंसे अपने पुत्रके शवकी रक्षा करने लगी॥ ३५॥"},{"b":11724,"kind":"sanskrit_shloka","page":481,"verses":["4.14.36"],"text":"एकदा मुनयस्ते तु सरस्वत्सलिलाप्लुताः।"},{"b":11725,"kind":"sanskrit_shloka","page":481,"verses":["4.14.36"],"text":"हुत्वाग्नीन् सत्कथाश्‍चक्रुरुपविष्टाः सरित्तटे॥ ३६"},{"b":11726,"kind":"sanskrit_shloka","page":481,"verses":["4.14.37"],"text":"वीक्ष्योत्थितांस्तदोत्पातानाहुर्लोकभयङ्करान्।"},{"b":11727,"kind":"sanskrit_shloka","page":481,"verses":["4.14.37"],"text":"अप्यभद्रमनाथाया दस्युभ्यो न भवेद्भुवः॥ ३७"},{"b":11728,"kind":"sanskrit_shloka","page":481,"verses":["4.14.38"],"text":"एवं मृशन्त ऋषयो धावतां सर्वतोदिशम्।"},{"b":11729,"kind":"sanskrit_shloka","page":481,"verses":["4.14.38"],"text":"पांसुः समुत्थितो भूरिश्चोराणामभिलुम्पताम्॥ ३८"},{"b":11730,"kind":"hindi_translation","page":481,"explains":["4.14.36","4.14.37","4.14.38"],"text":"एक दिन वे मुनिगण सरस्वतीके पवित्र जलमें स्नान कर अग्‍निहोत्रसे निवृत्त हो नदीके तीरपर बैठे हुए हरिचर्चा कर रहे थे॥ ३६॥ उन दिनों लोकोंमें आतंक फैलानेवाले बहुत-से उपद्रव होते देखकर वे आपसमें कहने लगे, ‘आजकल पृथ्वीका कोई रक्षक नहीं है; इसलिये चोर-डाकुओंके कारण उसका कुछ अमंगल तो नहीं होनेवाला है?’॥ ३७॥ ऋषिलोग ऐसा विचार कर ही रहे थे कि उन्होंने सब दिशाओंमें धावा करनेवाले चोरों और डाकुओंके कारण उठी हुई बड़ी भारी धूल देखी॥ ३८॥"},{"b":11731,"kind":"sanskrit_shloka","page":482,"verses":["4.14.39"],"text":"तदुपद्रवमाज्ञाय लोकस्य वसु लुम्पताम्।"},{"b":11732,"kind":"sanskrit_shloka","page":482,"verses":["4.14.39"],"text":"भर्तर्युपरते तस्मिन्‍नन्योन्यं च जिघांसताम्॥ ३९"},{"b":11733,"kind":"sanskrit_shloka","page":482,"verses":["4.14.40"],"text":"चोरप्रायं जनपदं हीनसत्त्वमराजकम्।"},{"b":11734,"kind":"sanskrit_shloka","page":482,"verses":["4.14.40"],"text":"लोकान्‍नावारयञ्छक्ता अपि तद्दोषदर्शिनः॥ ४०"},{"b":11735,"kind":"sanskrit_shloka","page":482,"verses":["4.14.41"],"text":"ब्राह्मणः समदृक् शान्तो दीनानां समुपेक्षकः।"},{"b":11736,"kind":"sanskrit_shloka","page":482,"verses":["4.14.41"],"text":"स्रवते ब्रह्म तस्यापि भिन्‍नभाण्डात्पयो यथा॥ ४१"},{"b":11737,"kind":"sanskrit_shloka","page":482,"verses":["4.14.42"],"text":"नाङ्गस्य वंशो राजर्षेरेष संस्थातुमर्हति।"},{"b":11738,"kind":"sanskrit_shloka","page":482,"verses":["4.14.42"],"text":"अमोघवीर्या हि नृपा वंशेऽस्मिन् केशवाश्रयाः॥ ४२"},{"b":11739,"kind":"sanskrit_shloka","page":482,"verses":["4.14.43"],"text":"विनिश्चित्यैवमृषयो विपन्‍नस्य महीपतेः।"},{"b":11740,"kind":"sanskrit_shloka","page":482,"verses":["4.14.43"],"text":"ममन्थुरूरुं तरसा तत्रासीद‍्बाहुको नरः॥ ४३"},{"b":11741,"kind":"sanskrit_shloka","page":482,"verses":["4.14.44"],"text":"काककृष्णोऽतिह्रस्वांगो ह्रस्वबाहुर्महाहनुः।"},{"b":11742,"kind":"sanskrit_shloka","page":482,"verses":["4.14.44"],"text":"ह्रस्वपान्‍निम्ननासाग्रो रक्ताक्षस्ताम्रमूर्धजः॥ ४४"},{"b":11743,"kind":"sanskrit_shloka","page":482,"verses":["4.14.45"],"text":"तं तु तेऽवनतं दीनं किं करोमीति वादिनम्।"},{"b":11744,"kind":"sanskrit_shloka","page":482,"verses":["4.14.45"],"text":"निषीदेत्यब्रुवंस्तात स निषादस्ततोऽभवत्॥ ४५"},{"b":11745,"kind":"sanskrit_shloka","page":482,"verses":["4.14.46"],"text":"तस्य वंश्यास्तु नैषादा गिरिकाननगोचराः।"},{"b":11746,"kind":"sanskrit_shloka","page":482,"verses":["4.14.46"],"text":"येनाहरज्जायमानो वेनकल्मषमुल्बणम्॥ ४६"},{"b":11747,"kind":"hindi_commentary","page":482,"explains":["4.14.39","4.14.40","4.14.41","4.14.42","4.14.43","4.14.44","4.14.45","4.14.46"],"text":"देखते ही वे समझ गये कि राजा वेनके मर जानेके कारण देशमें अराजकता फैल गयी है, राज्य शक्तिहीन हो गया है और चोर-डाकू बढ़ गये हैं; यह सारा उपद्रव लोगोंका धन लूटनेवाले तथा एक-दूसरेके खूनके प्यासे लुटेरोंका ही है। अपने तेजसे अथवा तपोबलसे लोगोंको ऐसी कुप्रवृत्तिसे रोकनेमें समर्थ होनेपर भी ऐसा करनेमें हिंसादि दोष देखकर उन्होंने इसका कोई निवारण नहीं किया॥ ३९-४०॥ फिर सोचा कि ‘ब्राह्मण यदि समदर्शी और शान्तस्वभाव भी हो तो भी दीनोंकी उपेक्षा करनेसे उसका तप उसी प्रकार नष्ट हो जाता है जैसे फूटे हुए घड़ेमेंसे जल बह जाता है॥ ४१॥ फिर राजर्षि अंगका वंश भी नष्ट नहीं होना चाहिये, क्योंकि इसमें अनेक अमोघ-शक्ति और भगवत्परायण राजा हो चुके हैं’॥ ४२॥ ऐसा निश्‍चय कर उन्होंने मृत राजाकी जाँघको बड़े जोरसे मथा तो उसमेंसे एक बौना पुरुष उत्पन्‍न हुआ॥ ४३॥ वह कौएके समान काला था; उसके सभी अंग और खासकर भुजाएँ बहुत छोटी थीं, जबड़े बहुत बड़े, टाँगे छोटी, नाक चपटी, नेत्र लाल और केश ताँबेके-से रंगके थे॥ ४४॥ उसने बड़ी दीनता और नम्रभावसे पूछा कि ‘मैं क्या करूँ?’ तो ऋषियोंने कहा—‘निषीद (बैठ जा)।’ इसीसे वह ‘निषाद’ कहलाया॥ ४५॥ उसने जन्म लेते ही राजा वेनके भयंकर पापोंको अपने ऊपर ले लिया, इसीलिये उसके वंशधर नैषाद भी हिंसा, लूट-पाट आदि पापकर्मोंमें रत रहते हैं; अतः वे गाँव और नगरमें न टिककर वन और पर्वतोंमें ही निवास करते हैं॥ ४६॥"},{"b":11748,"kind":"hindi_translation","page":482,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे पृथुचरिते निषादोत्पत्तिर्नाम चतुर्दशोऽध्यायः॥ १४॥"}],"notes":[{"id":"v1:504","mark":"१","page":480,"after_verse":"4.14.23","text":"प्रा० पा०—वै।"},{"id":"v1:505","mark":"१","page":481,"after_verse":"4.14.29","text":"प्रा० पा०—भेजे।"},{"id":"v1:506","mark":"२","page":481,"after_verse":"4.14.32","text":"प्रा० पा०—देवं।"},{"id":"v1:507","mark":"३","page":481,"after_verse":"4.14.33","text":"प्रा० पा०—तं।"},{"id":"v1:508","mark":"४","page":481,"after_verse":"4.14.33","text":"प्रा० 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