{"id":"4.21","title":"चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 21","part":"चतुर्थ स्कन्ध","heading":"अथैकविंशोऽध्यायः","topics":["महाराज पृथुका अपनी प्रजाको उपदेश"],"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 4.21.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":1,"pages":[504,511]},"verses":[{"id":"4.21.1","number":1,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/1/","page":505,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["मौक्तिकैः कुसुमस्रग्भिर्दुकूलैः स्वर्णतोरणैः।","महासुरभिभिर्धूपैर्मण्डितं तत्र तत्र वै॥ १"],"iast":["mauktikaiḥ kusumasragbhirdukūlaiḥ svarṇatoraṇaiḥ|","mahāsurabhibhirdhūpairmaṇḍitaṃ tatra tatra vai|| 1"],"meaning":"श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! उस समय महाराज पृथुका नगर सर्वत्र मोतियोंकी लड़ियों, फूलोंकी मालाओं, रंग-बिरंगे वस्त्रों, सोनेके दरवाजों और अत्यन्त सुगन्धित धूपोंसे सुशोभित था॥ १॥"},{"id":"4.21.2","number":2,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/2/","page":505,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["चन्दनागुरुतोयार्द्ररथ्याचत्वरमार्गवत् ।","पुष्पाक्षतफलैस्तोक्मैर्लाजैरर्चिर्भिरर्चितम्॥ २"],"iast":["candanāgurutoyārdrarathyācatvaramārgavat |","puṣpākṣataphalaistokmairlājairarcirbhirarcitam|| 2"],"meaning":"उसकी गलियाँ, चौक और सड़कें चन्दन और अरगजेके जलसे सींच दी गयी थीं तथा उसे पुष्प, अक्षत, फल, यवांकुर, खील और दीपक आदि मांगलिक द्रव्योंसे सजाया गया था॥ २॥"},{"id":"4.21.3","number":3,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/3/","page":506,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["सवृन्दैः कदलीस्तम्भैः पूगपोतैः परिष्कृतम्।","तरुपल्लवमालाभिः सर्वतः समलंकृतम्॥ ३"],"iast":["savṛndaiḥ kadalīstambhaiḥ pūgapotaiḥ pariṣkṛtam|","tarupallavamālābhiḥ sarvataḥ samalaṃkṛtam|| 3"],"meaning":"वह ठौर-ठौरपर रखे हुए फल-फूलके गुच्छोंसे युक्त केलेके खंभों और सुपारीके पौधोंसे बड़ा ही मनोहर जान पड़ता था तथा सब ओर आम आदि वृक्षोंके नवीन पत्तोंकी बंदनवारोंसे विभूषित था॥ ३॥"},{"id":"4.21.4","number":4,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/4/","page":506,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["प्रजास्तं दीपबलिभिः सम्भृताशेषमंगलैः।","अभीयुर्मृष्टकन्याश्‍च मृष्टकुण्डलमण्डिताः॥ ४"],"iast":["prajāstaṃ dīpabalibhiḥ sambhṛtāśeṣamaṃgalaiḥ|","abhīyurmṛṣṭakanyāśca mṛṣṭakuṇḍalamaṇḍitāḥ|| 4"],"meaning":"जब महाराजने नगरमें प्रवेश किया, तब दीपक, उपहार और अनेक प्रकारकी मांगलिक सामग्री लिये हुए प्रजाजनोंने तथा मनोहर कुण्डलोंसे सुशोभित सुन्दरी कन्याओंने उनकी अगवानी की॥ ४॥"},{"id":"4.21.5","number":5,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/5/","page":506,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["शङ्खदुन्दुभिघोषेण ब्रह्मघोषेण चर्त्विजाम्।","विवेश भवनं वीरः स्तूयमानो गतस्मयः॥ ५"],"iast":["śaṅkhadundubhighoṣeṇa brahmaghoṣeṇa cartvijām|","viveśa bhavanaṃ vīraḥ stūyamāno gatasmayaḥ|| 5"],"meaning":"शंख और दुन्दुभि आदि बाजे बजने लगे, ऋत्विजगण वेदध्वनि करने लगे, वन्दीजनोंने स्तुतिगान आरम्भ कर दिया। यह सब देख और सुनकर भी उन्हें किसी प्रकारका अहंकार नहीं हुआ। इस प्रकार वीरवर पृथुने राजमहलमें प्रवेश किया॥ ५॥"},{"id":"4.21.6","number":6,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/6/","page":506,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["पूजितः पूजयामास तत्र तत्र महायशाः।","पौरांजानपदांस्तांस्तान् प्रीतः प्रियवरप्रदः॥ ६"],"iast":["pūjitaḥ pūjayāmāsa tatra tatra mahāyaśāḥ|","paurāṃjānapadāṃstāṃstān prītaḥ priyavarapradaḥ|| 6"],"meaning":"मार्गमें जहाँ-तहाँ पुरवासी और देशवासियोंने उनका अभिनन्दन किया। परम यशस्वी महाराजने भी उन्हें प्रसन्‍नतापूर्वक अभीष्ट वर देकर सन्तुष्ट किया॥ ६॥"},{"id":"4.21.7","number":7,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/7/","page":506,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["स एवमादीन्यनवद्यचेष्टितः","कर्माणि भूयांसि महान्महत्तमः।","कुर्वन् शशासावनिमण्डलं यशः","स्फीतं निधायारुरुहे परं पदम्॥ ७"],"iast":["sa evamādīnyanavadyaceṣṭitaḥ","karmāṇi bhūyāṃsi mahānmahattamaḥ|","kurvan śaśāsāvanimaṇḍalaṃ yaśaḥ","sphītaṃ nidhāyāruruhe paraṃ padam|| 7"],"meaning":"महाराज पृथु महापुरुष और सभीके पूजनीय थे। उन्होंने इसी प्रकारके अनेकों उदार कर्म करते हुए पृथ्वीका शासन किया और अन्तमें अपने विपुल यशका विस्तार कर भगवान्‌का परमपद प्राप्त किया॥ ७॥"},{"id":"4.21.8","number":8,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/8/","page":506,"speaker":"सूत उवाच","sanskrit":["तदादिराजस्य यशो विजृम्भितं","गुणैरशेषैर्गुणवत्सभाजितम् ।","क्षत्ता महाभागवतः सदस्पते","कौषारविं प्राह गृणन्तमर्चयन्॥ ८"],"iast":["tadādirājasya yaśo vijṛmbhitaṃ","guṇairaśeṣairguṇavatsabhājitam |","kṣattā mahābhāgavataḥ sadaspate","kauṣāraviṃ prāha gṛṇantamarcayan|| 8"],"meaning":"सूतजी कहते हैं—मुनिवर शौनकजी! इस प्रकार भगवान् मैत्रेयके मुखसे आदिराज पृथुका अनेक प्रकारके गुणोंसे सम्पन्‍न और गुणवानोंद्वारा प्रशंसित विस्तृत सुयश सुनकर परम भागवत विदुरजीने उनका अभिनन्दन करते हुए कहा॥ ८॥"},{"id":"4.21.9","number":9,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/9/","page":506,"speaker":"विदुर उवाच","sanskrit":["सोऽभिषिक्तः पृथुर्विप्रैर्लब्धाशेषसुरार्हणः।","बिभ्रत् स वैष्णवं तेजो बाह्वोर्याभ्यां दुदोह गाम्॥ ९"],"iast":["so'bhiṣiktaḥ pṛthurviprairlabdhāśeṣasurārhaṇaḥ|","bibhrat sa vaiṣṇavaṃ tejo bāhvoryābhyāṃ dudoha gām|| 9"],"meaning":"विदुरजी बोले—ब्रह्मन्! ब्राह्मणोंने पृथुका अभिषेक किया। समस्त देवताओंने उन्हें उपहार दिये। उन्होंने अपनी भुजाओंमें वैष्णव तेजको धारण किया और उससे पृथ्वीका दोहन किया॥ ९॥"},{"id":"4.21.10","number":10,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/10/","page":506,"speaker":"विदुर उवाच","sanskrit":["को न्वस्य कीर्तिं न शृणोत्यभिज्ञो","यद्विक्रमोच्छिष्टमशेषभूपाः ।","लोकाः सपाला उपजीवन्ति काम-","मद्यापि तन्मे वद कर्म शुद्धम्॥ १०"],"iast":["ko nvasya kīrtiṃ na śṛṇotyabhijño","yadvikramocchiṣṭamaśeṣabhūpāḥ |","lokāḥ sapālā upajīvanti kāma-","madyāpi tanme vada karma śuddham|| 10"],"meaning":"उनके उस पराक्रमके उच्छिष्टरूप विषयभोगोंसे ही आज भी सम्पूर्ण राजा तथा लोकपालोंके सहित समस्त लोक इच्छानुसार जीवन-निर्वाह करते हैं। भला, ऐसा कौन समझदार होगा जो उनकी पवित्र कीर्ति सुनना न चाहेगा। अतः अभी आप मुझे उनके कुछ और भी पवित्र चरित्र सुनाइये॥ १०॥"},{"id":"4.21.11","number":11,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/11/","page":507,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["गंगायमुनयोर्नद्योरन्तराक्षेत्रमावसन् ।","आरब्धानेव बुभुजे भोगान् पुण्यजिहासया॥ ११"],"iast":["gaṃgāyamunayornadyorantarākṣetramāvasan |","ārabdhāneva bubhuje bhogān puṇyajihāsayā|| 11"],"meaning":"श्रीमैत्रेयजीने कहा—साधुश्रेष्ठ विदुरजी! महाराज पृथु गंगा और यमुनाके मध्यवर्ती देशमें निवास कर अपने पुण्यकर्मोंके क्षयकी इच्छासे प्रारब्धवश प्राप्त हुए भोगोंको ही भोगते थे॥ ११॥"},{"id":"4.21.12","number":12,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/12/","page":507,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["सर्वत्रास्खलितादेशः सप्तद्वीपैकदण्डधृक्।","अन्यत्र ब्राह्मणकुलादन्यत्राच्युतगोत्रतः॥ १२"],"iast":["sarvatrāskhalitādeśaḥ saptadvīpaikadaṇḍadhṛk|","anyatra brāhmaṇakulādanyatrācyutagotrataḥ|| 12"],"meaning":"ब्राह्मणवंश और भगवान्‌के सम्बन्धी विष्णुभक्तोंको छोड़कर उनका सातों द्वीपोंके सभी पुरुषोंपर अखण्ड एवं अबाध शासन था॥ १२॥"},{"id":"4.21.13","number":13,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/13/","page":507,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["एकदाऽऽसीन्महासत्रदीक्षा तत्र दिवौकसाम्।","समाजो ब्रह्मर्षीणां च राजर्षीणां च सत्तम॥ १३"],"iast":["ekadā''sīnmahāsatradīkṣā tatra divaukasām|","samājo brahmarṣīṇāṃ ca rājarṣīṇāṃ ca sattama|| 13"],"meaning":"एक बार उन्होंने एक महासत्रकी दीक्षा ली; उस समय वहाँ देवताओं, ब्रह्मर्षियों और राजर्षियोंका बहुत बड़ा समाज एकत्र हुआ॥ १३॥"},{"id":"4.21.14","number":14,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/14/","page":507,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["तस्मिन्‍नर्हत्सु सर्वेषु स्वर्चितेषु यथार्हतः।","उत्थितः सदसो मध्ये ताराणामुडुराडिव॥ १४"],"iast":["tasminnarhatsu sarveṣu svarciteṣu yathārhataḥ|","utthitaḥ sadaso madhye tārāṇāmuḍurāḍiva|| 14"],"meaning":"उस समाजमें महाराज पृथुने उन पूजनीय अतिथियोंका यथायोग्य सत्कार किया और फिर उस सभामें, नक्षत्रमण्डलमें चन्द्रमाके समान खड़े हो गये॥ १४॥"},{"id":"4.21.15","number":15,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/15/","page":507,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["प्रांशुः पीनायतभुजो गौरः कञ्जारुणेक्षणः।","सुनासः सुमुखः सौम्यः पीनांसः सुद्विजस्मितः॥ १५"],"iast":["prāṃśuḥ pīnāyatabhujo gauraḥ kañjāruṇekṣaṇaḥ|","sunāsaḥ sumukhaḥ saumyaḥ pīnāṃsaḥ sudvijasmitaḥ|| 15"],"meaning":"उनका शरीर ऊँचा, भुजाएँ भरी और विशाल, रंग गोरा, नेत्र कमलके समान सुन्दर और अरुणवर्ण, नासिका सुघड़, मुख मनोहर, स्वरूप सौम्य, कंधे ऊँचे और मुसकानसे युक्त दन्तपंक्ति सुन्दर थी॥ १५॥"},{"id":"4.21.16","number":16,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/16/","page":507,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["व्यूढवक्षा बृहच्छ्रोणिर्वलिवल्गुदलोदरः।","आवर्तनाभिरोजस्वी कांचनोरुरुदग्रपात्॥ १६"],"iast":["vyūḍhavakṣā bṛhacchroṇirvalivalgudalodaraḥ|","āvartanābhirojasvī kāṃcanorurudagrapāt|| 16"],"meaning":"उनकी छाती चौड़ी, कमरका पिछला भाग स्थूल और उदर पीपलके पत्तेके समान सुडौल तथा बल पड़े हुए होनेसे और भी सुन्दर जान पड़ता था। नाभि भँवरके समान गम्भीर थी, शरीर तेजस्वी था, जंघाएँ सुवर्णके समान देदीप्यमान थीं तथा पैरोंके पंजे उभरे हुए थे॥ १६॥"},{"id":"4.21.17","number":17,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/17/","page":507,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["सूक्ष्मवक्रासितस्निग्धमूर्धजः कम्बुकन्धरः।","महाधने दुकूलाग्र्ये परिधायोपवीय च॥ १७"],"iast":["sūkṣmavakrāsitasnigdhamūrdhajaḥ kambukandharaḥ|","mahādhane dukūlāgrye paridhāyopavīya ca|| 17"],"meaning":"उनके बाल बारीक, घुँघराले, काले और चिकने थे; गरदन शंखके समान उतार-चढ़ाववाली तथा रेखाओंसे युक्त थी और वे उत्तम बहुमूल्य धोती पहने और वैसी ही चादर ओढ़े थे॥ १७॥"},{"id":"4.21.18","number":18,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/18/","page":507,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["व्यञ्जिताशेषगात्रश्रीर्नियमे न्यस्तभूषणः।","कृष्णाजिनधरः श्रीमान् कुशपाणिः कृतोचितः॥ १८"],"iast":["vyañjitāśeṣagātraśrīrniyame nyastabhūṣaṇaḥ|","kṛṣṇājinadharaḥ śrīmān kuśapāṇiḥ kṛtocitaḥ|| 18"],"meaning":"दीक्षाके नियमानुसार उन्होंने समस्त आभूषण उतार दिये थे; इसीसे उनके शरीरके अंग-प्रत्यंगकी शोभा अपने स्वाभाविक रूपमें स्पष्ट झलक रही थी। वे शरीरपर कृष्णमृगका चर्म और हाथोंमें कुशा धारण किये हुए थे। इससे उनके शरीरकी कान्ति और भी बढ़ गयी थी। वे अपने सारे नित्यकृत्य यथाविधि सम्पन्‍न कर चुके थे॥ १८॥"},{"id":"4.21.19","number":19,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/19/","page":507,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["शिशिरस्निग्धताराक्षः समैक्षत समन्ततः।","ऊचिवानिदमुर्वीशः सदः संहर्षयन्‍निव॥ १९"],"iast":["śiśirasnigdhatārākṣaḥ samaikṣata samantataḥ|","ūcivānidamurvīśaḥ sadaḥ saṃharṣayanniva|| 19"],"meaning":"राजा पृथुने मानो सारी सभाको हर्षसे सराबोर करते हुए अपने शीतल एवं स्नेहपूर्ण नेत्रोंसे चारों ओर देखा और फिर अपना भाषण प्रारम्भ किया॥ १९॥"},{"id":"4.21.20","number":20,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/20/","page":507,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["चारु चित्रपदं श्लक्ष्णं मृष्टं गूढमविक्लवम्।","सर्वेषामुपकारार्थं तदा अनुवदन्‍निव॥ २०"],"iast":["cāru citrapadaṃ ślakṣṇaṃ mṛṣṭaṃ gūḍhamaviklavam|","sarveṣāmupakārārthaṃ tadā anuvadanniva|| 20"],"meaning":"उनका भाषण अत्यन्त सुन्दर, विचित्र पदोंसे युक्त, स्पष्ट, मधुर, गम्भीर एवं निश्शंक था। मानो उस समय वे सबका उपकार करनेके लिये अपने अनुभवका ही अनुवाद कर रहे हों॥ २०॥"},{"id":"4.21.21","number":21,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/21/","page":508,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["सभ्याः शृणुत भद्रं वः साधवो य इहागताः।","सत्सु जिज्ञासुभिर्धर्ममावेद्यं स्वमनीषितम्॥ २१"],"iast":["sabhyāḥ śṛṇuta bhadraṃ vaḥ sādhavo ya ihāgatāḥ|","satsu jijñāsubhirdharmamāvedyaṃ svamanīṣitam|| 21"],"meaning":"राजा पृथुने कहा—सज्जनो! आपका कल्याण हो। आप महानुभाव, जो यहाँ पधारे हैं, मेरी प्रार्थना सुनें—जिज्ञासु पुरुषोंको चाहिये कि संत-समाजमें अपने निश्‍चयका निवेदन करें॥ २१॥"},{"id":"4.21.22","number":22,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/22/","page":508,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["अहं दण्डधरो राजा प्रजानामिह योजितः।","रक्षिता वृत्तिदः स्वेषु सेतुषु स्थापिता पृथक्॥ २२"],"iast":["ahaṃ daṇḍadharo rājā prajānāmiha yojitaḥ|","rakṣitā vṛttidaḥ sveṣu setuṣu sthāpitā pṛthak|| 22"],"meaning":"इस लोकमें मुझे प्रजाजनोंका शासन, उनकी रक्षा, उनकी आजीविकाका प्रबन्ध तथा उन्हें अलग-अलग अपनी मर्यादामें रखनेके लिये राजा बनाया गया है॥ २२॥"},{"id":"4.21.23","number":23,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/23/","page":508,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["तस्य मे तदनुष्ठानाद्यानाहुर्ब्रह्मवादिनः।","लोकाः स्युः कामसन्दोहा यस्य तुष्यति दिष्टदृक्॥ २३"],"iast":["tasya me tadanuṣṭhānādyānāhurbrahmavādinaḥ|","lokāḥ syuḥ kāmasandohā yasya tuṣyati diṣṭadṛk|| 23"],"meaning":"अतः इनका यथावत् पालन करनेसे मुझे उन्हीं मनोरथ पूर्ण करनेवाले लोकोंकी प्राप्ति होनी चाहिये, जो वेदवादी मुनियोंके मतानुसार सम्पूर्ण कर्मोंके साक्षी श्रीहरिके प्रसन्‍न होनेपर मिलते हैं॥ २३॥"},{"id":"4.21.24","number":24,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/24/","page":508,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["य उद्धरेत्करं राजा प्रजा धर्मेष्वशिक्षयन्।","प्रजानां शमलं भुङ्क्ते भगं च स्वं जहाति सः॥ २४"],"iast":["ya uddharetkaraṃ rājā prajā dharmeṣvaśikṣayan|","prajānāṃ śamalaṃ bhuṅkte bhagaṃ ca svaṃ jahāti saḥ|| 24"],"meaning":"जो राजा प्रजाको धर्ममार्गकी शिक्षा न देकर केवल उससे कर वसूल करनेमें लगा रहता है, वह केवल प्रजाके पापका ही भागी होता है और अपने ऐश्‍वर्यसे हाथ धो बैठता है॥ २४॥"},{"id":"4.21.25","number":25,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/25/","page":508,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["तत् प्रजा भर्तृपिण्डार्थं स्वार्थमेवानसूयवः।","कुरुताधोक्षजधियस्तर्हि मेऽनुग्रहः कृतः॥ २५"],"iast":["tat prajā bhartṛpiṇḍārthaṃ svārthamevānasūyavaḥ|","kurutādhokṣajadhiyastarhi me'nugrahaḥ kṛtaḥ|| 25"],"meaning":"अतः प्रिय प्रजाजन! अपने इस राजाका परलोकमें हित करनेके लिये आपलोग परस्पर दोषदृष्टि छोड़कर हृदयसे भगवान्‌को याद रखते हुए अपने-अपने कर्तव्यका पालन करते रहिये; क्योंकि आपका स्वार्थ भी इसीमें है और इस प्रकार मुझपर भी आपका बड़ा अनुग्रह होगा॥ २५॥"},{"id":"4.21.26","number":26,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/26/","page":508,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["यूयं तदनुमोदध्वं पितृदेवर्षयोऽमलाः।","कर्तुः शास्तुरनुज्ञातुस्तुल्यं यत्प्रेत्य तत्फलम्॥ २६"],"iast":["yūyaṃ tadanumodadhvaṃ pitṛdevarṣayo'malāḥ|","kartuḥ śāsturanujñātustulyaṃ yatpretya tatphalam|| 26"],"meaning":"विशुद्धचित्त देवता, पितर और महर्षिगण! आप भी मेरी इस प्रार्थनाका अनुमोदन कीजिये; क्योंकि कोई भी कर्म हो, मरनेके अनन्तर उसके कर्ता, उपदेष्टा और समर्थकको उसका समान फल मिलता है॥ २६॥"},{"id":"4.21.27","number":27,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/27/","page":508,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["अस्ति यज्ञपतिर्नाम केषाञ्चिदर्हसत्तमाः।","इहामुत्र च लक्ष्यन्ते ज्योत्स्नावत्यः क्‍वचिद्भुवः॥ २७"],"iast":["asti yajñapatirnāma keṣāñcidarhasattamāḥ|","ihāmutra ca lakṣyante jyotsnāvatyaḥ kvacidbhuvaḥ|| 27"],"meaning":"माननीय सज्जनो! किन्हीं श्रेष्ठ महानुभावोंके मतमें तो कर्मोंका फल देनेवाले भगवान् यज्ञपति ही हैं; क्योंकि इहलोक और परलोक दोनों ही जगह कोई-कोई शरीर बड़े तेजोमय देखे जाते हैं॥ २७॥"},{"id":"4.21.28","number":28,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/28/","page":508,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["मनोरुत्तानपादस्य ध्रुवस्यापि महीपतेः।","प्रियव्रतस्य राजर्षेरंगस्यास्मत्पितुः पितुः॥ २८"],"iast":["manoruttānapādasya dhruvasyāpi mahīpateḥ|","priyavratasya rājarṣeraṃgasyāsmatpituḥ pituḥ|| 28"],"meaning":"मनु, उत्तानपाद, महीपति ध्रुव, राजर्षि प्रियव्रत, हमारे दादा अंग तथा ब्रह्मा, शिव, प्रह्लाद, बलि और इसी कोटिके अन्यान्य महानुभावोंके मतमें तो धर्म-अर्थ-काम-मोक्षरूप चतुर्वर्ग तथा स्वर्ग और अपवर्गके स्वाधीन नियामक, कर्मफलदातारूपसे भगवान् गदाधरकी आवश्यकता है ही। इस विषयमें तो केवल मृत्युके दौहित्र वेन आदि कुछ शोचनीय और धर्मविमूढ़ लोगोंका ही मतभेद है। अतः उसका कोई विशेष महत्त्व नहीं हो सकता॥ २८—३०॥","meaning_covers":[28,30]},{"id":"4.21.29","number":29,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/29/","page":508,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["ईदृशानामथान्येषामजस्य च भवस्य च।","प्रह्रादस्य बलेश्चापि कृत्यमस्ति गदाभृता॥ २९"],"iast":["īdṛśānāmathānyeṣāmajasya ca bhavasya ca|","prahrādasya baleścāpi kṛtyamasti gadābhṛtā|| 29"],"meaning":"मनु, उत्तानपाद, महीपति ध्रुव, राजर्षि प्रियव्रत, हमारे दादा अंग तथा ब्रह्मा, शिव, प्रह्लाद, बलि और इसी कोटिके अन्यान्य महानुभावोंके मतमें तो धर्म-अर्थ-काम-मोक्षरूप चतुर्वर्ग तथा स्वर्ग और अपवर्गके स्वाधीन नियामक, कर्मफलदातारूपसे भगवान् गदाधरकी आवश्यकता है ही। इस विषयमें तो केवल मृत्युके दौहित्र वेन आदि कुछ शोचनीय और धर्मविमूढ़ लोगोंका ही मतभेद है। अतः उसका कोई विशेष महत्त्व नहीं हो सकता॥ २८—३०॥","meaning_covers":[28,30]},{"id":"4.21.30","number":30,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/30/","page":508,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["दौहित्रादीनृते मृत्योः शोच्यान् धर्मविमोहितान्।","वर्गस्वर्गापवर्गाणां प्रायेणैकात्म्यहेतुना॥ ३०"],"iast":["dauhitrādīnṛte mṛtyoḥ śocyān dharmavimohitān|","vargasvargāpavargāṇāṃ prāyeṇaikātmyahetunā|| 30"],"meaning":"मनु, उत्तानपाद, महीपति ध्रुव, राजर्षि प्रियव्रत, हमारे दादा अंग तथा ब्रह्मा, शिव, प्रह्लाद, बलि और इसी कोटिके अन्यान्य महानुभावोंके मतमें तो धर्म-अर्थ-काम-मोक्षरूप चतुर्वर्ग तथा स्वर्ग और अपवर्गके स्वाधीन नियामक, कर्मफलदातारूपसे भगवान् गदाधरकी आवश्यकता है ही। इस विषयमें तो केवल मृत्युके दौहित्र वेन आदि कुछ शोचनीय और धर्मविमूढ़ लोगोंका ही मतभेद है। अतः उसका कोई विशेष महत्त्व नहीं हो सकता॥ २८—३०॥","meaning_covers":[28,30]},{"id":"4.21.31","number":31,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/31/","page":509,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["यत्पादसेवाभिरुचिस्तपस्विना-","मशेषजन्मोपचितं मलं धियः।","सद्यः क्षिणोत्यन्वहमेधती सती","यथा पदांगुष्ठविनिःसृता सरित्॥ ३१"],"iast":["yatpādasevābhirucistapasvinā-","maśeṣajanmopacitaṃ malaṃ dhiyaḥ|","sadyaḥ kṣiṇotyanvahamedhatī satī","yathā padāṃguṣṭhaviniḥsṛtā sarit|| 31"],"meaning":"जिनके चरणकमलोंकी सेवाके लिये निरन्तर बढ़नेवाली अभिलाषा उन्हींके चरणनखसे निकली हुई गंगाजीके समान, संसारतापसे संतप्त जीवोंके समस्त जन्मोंके संचित मनोमलको तत्काल नष्ट कर देती है, जिनके चरणतलका आश्रय लेनेवाला पुरुष सब प्रकारके मानसिक दोषोंको धो डालता तथा वैराग्य और तत्त्वसाक्षात्काररूप बल पाकर फिर इस दुःखमय संसारचक्रमें नहीं पड़ता और जिनके चरणकमल सब प्रकारकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले हैं—उन प्रभुको आपलोग अपनी-अपनी आजीविकाके उपयोगी वर्णाश्रमोचित अध्यापनादि कर्मों तथा ध्यान-स्तुति-पूजादि मानसिक, वाचिक एवं शारीरिक क्रियाओंके द्वारा भजें। हृदयमें किसी प्रकारका कपट न रखें तथा यह निश्‍चय रखें कि हमें अपने-अपने अधिकारानुसार इसका फल अवश्य प्राप्त होगा॥ ३१—३३॥","meaning_covers":[31,33]},{"id":"4.21.32","number":32,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/32/","page":509,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["विनिर्धुताशेषमनोमलः पुमा-","नसंगविज्ञानविशेषवीर्यवान् ।","यदङ्‌घ्रिमूले कृतकेतनः पुन-","र्न संसृतिं क्लेशवहां प्रपद्यते॥ ३२"],"iast":["vinirdhutāśeṣamanomalaḥ pumā-","nasaṃgavijñānaviśeṣavīryavān |","yadaṅghrimūle kṛtaketanaḥ puna-","rna saṃsṛtiṃ kleśavahāṃ prapadyate|| 32"],"meaning":"जिनके चरणकमलोंकी सेवाके लिये निरन्तर बढ़नेवाली अभिलाषा उन्हींके चरणनखसे निकली हुई गंगाजीके समान, संसारतापसे संतप्त जीवोंके समस्त जन्मोंके संचित मनोमलको तत्काल नष्ट कर देती है, जिनके चरणतलका आश्रय लेनेवाला पुरुष सब प्रकारके मानसिक दोषोंको धो डालता तथा वैराग्य और तत्त्वसाक्षात्काररूप बल पाकर फिर इस दुःखमय संसारचक्रमें नहीं पड़ता और जिनके चरणकमल सब प्रकारकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले हैं—उन प्रभुको आपलोग अपनी-अपनी आजीविकाके उपयोगी वर्णाश्रमोचित अध्यापनादि कर्मों तथा ध्यान-स्तुति-पूजादि मानसिक, वाचिक एवं शारीरिक क्रियाओंके द्वारा भजें। हृदयमें किसी प्रकारका कपट न रखें तथा यह निश्‍चय रखें कि हमें अपने-अपने अधिकारानुसार इसका फल अवश्य प्राप्त होगा॥ ३१—३३॥","meaning_covers":[31,33]},{"id":"4.21.33","number":33,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/33/","page":509,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["तमेव यूयं भजतात्मवृत्तिभि-","र्मनोवचःकायगुणैः स्वकर्मभिः।","अमायिनः कामदुघाङ्‌घ्रिपङ्कजं","यथाधिकारावसितार्थसिद्धयः ॥ ३३"],"iast":["tameva yūyaṃ bhajatātmavṛttibhi-","rmanovacaḥkāyaguṇaiḥ svakarmabhiḥ|","amāyinaḥ kāmadughāṅghripaṅkajaṃ","yathādhikārāvasitārthasiddhayaḥ || 33"],"meaning":"जिनके चरणकमलोंकी सेवाके लिये निरन्तर बढ़नेवाली अभिलाषा उन्हींके चरणनखसे निकली हुई गंगाजीके समान, संसारतापसे संतप्त जीवोंके समस्त जन्मोंके संचित मनोमलको तत्काल नष्ट कर देती है, जिनके चरणतलका आश्रय लेनेवाला पुरुष सब प्रकारके मानसिक दोषोंको धो डालता तथा वैराग्य और तत्त्वसाक्षात्काररूप बल पाकर फिर इस दुःखमय संसारचक्रमें नहीं पड़ता और जिनके चरणकमल सब प्रकारकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले हैं—उन प्रभुको आपलोग अपनी-अपनी आजीविकाके उपयोगी वर्णाश्रमोचित अध्यापनादि कर्मों तथा ध्यान-स्तुति-पूजादि मानसिक, वाचिक एवं शारीरिक क्रियाओंके द्वारा भजें। हृदयमें किसी प्रकारका कपट न रखें तथा यह निश्‍चय रखें कि हमें अपने-अपने अधिकारानुसार इसका फल अवश्य प्राप्त होगा॥ ३१—३३॥","meaning_covers":[31,33]},{"id":"4.21.34","number":34,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/34/","page":509,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["असाविहानेकगुणोऽगुणोऽध्वरः","पृथग्विधद्रव्यगुणक्रियोक्तिभिः ।","सम्पद्यतेऽर्थाशयलिंगनामभि-","र्विशुद्धविज्ञानघनः स्वरूपतः॥ ३४"],"iast":["asāvihānekaguṇo'guṇo'dhvaraḥ","pṛthagvidhadravyaguṇakriyoktibhiḥ |","sampadyate'rthāśayaliṃganāmabhi-","rviśuddhavijñānaghanaḥ svarūpataḥ|| 34"],"meaning":"भगवान् स्वरूपतः विशुद्ध विज्ञानघन और समस्त विशेषणोंसे रहित हैं; किन्तु इस कर्ममार्गमें जौ-चावल आदि विविध द्रव्य, शुक्लादि गुण, अवघात (कूटना) आदि क्रिया एवं मन्त्रोंके द्वारा और अर्थ, आशय (संकल्प), लिंग (पदार्थ-शक्ति) तथा ज्योतिष्टोम आदि नामोंसे सम्पन्‍न होनेवाले, अनेक विशेषणयुक्त यज्ञके रूपमें प्रकाशित होते हैं॥ ३४॥"},{"id":"4.21.35","number":35,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/35/","page":509,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["प्रधानकालाशयधर्मसंग्रहे","शरीर एष प्रतिपद्य चेतनाम्।","क्रियाफलत्वेन विभुर्विभाव्यते","यथानलो दारुषु तद‍्गुणात्मकः॥ ३५"],"iast":["pradhānakālāśayadharmasaṃgrahe","śarīra eṣa pratipadya cetanām|","kriyāphalatvena vibhurvibhāvyate","yathānalo dāruṣu tadguṇātmakaḥ|| 35"],"meaning":"जिस प्रकार एक ही अग्‍नि भिन्‍न-भिन्‍न काष्ठोंमें उन्हींके आकारादिके अनुरूप भासती है, उसी प्रकार वे सर्वव्यापक प्रभु परमानन्दस्वरूप होते हुए भी प्रकृति, काल, वासना और अदृष्टसे उत्पन्‍न हुए शरीरमें विषयाकार बनी हुई बुद्धिमें स्थित होकर उन यज्ञ-यागादि क्रियाओंके फलरूपसे अनेक प्रकारके जान पड़ते हैं॥ ३५॥"},{"id":"4.21.36","number":36,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/36/","page":509,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["अहो ममामी वितरन्त्यनुग्रहं","हरिं गुरुं यज्ञभुजामधीश्‍वरम्।","स्वधर्मयोगेन यजन्ति मामका","निरन्तरं क्षोणितले दृढव्रताः॥ ३६"],"iast":["aho mamāmī vitarantyanugrahaṃ","hariṃ guruṃ yajñabhujāmadhīśvaram|","svadharmayogena yajanti māmakā","nirantaraṃ kṣoṇitale dṛḍhavratāḥ|| 36"],"meaning":"अहो! इस पृथ्वीतलपर मेरे जो प्रजाजन यज्ञ-भोक्ताओंके अधीश्‍वर सर्वगुरु श्रीहरिका एकनिष्ठभावसे अपने-अपने धर्मोंके द्वारा निरन्तर पूजन करते हैं, वे मुझपर बड़ी कृपा करते हैं॥ ३६॥"},{"id":"4.21.37","number":37,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/37/","page":509,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["मा जातु तेजः प्रभवेन्महर्द्धिभि-","स्तितिक्षया तपसा विद्यया च।","देदीप्यमानेऽजितदेवतानां","कुले स्वयं राजकुलाद् द्विजानाम्॥ ३७"],"iast":["mā jātu tejaḥ prabhavenmaharddhibhi-","stitikṣayā tapasā vidyayā ca|","dedīpyamāne'jitadevatānāṃ","kule svayaṃ rājakulād dvijānām|| 37"],"meaning":"सहनशीलता, तपस्या और ज्ञान इन विशिष्ट विभूतियोंके कारण वैष्णव और ब्राह्मणोंके वंश स्वभावतः ही उज्ज्वल होते हैं। उनपर राजकुलका तेज, धन, ऐश्‍वर्य आदि समृद्धियोंके कारण अपना प्रभाव न डाले॥ ३७॥"},{"id":"4.21.38","number":38,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/38/","page":510,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["ब्रह्मण्यदेवः पुरुषः पुरातनो","नित्यं हरिर्यच्चरणाभिवन्दनात्।","अवाप लक्ष्मीमनपायिनीं यशो","जगत्पवित्रं च महत्तमाग्रणीः॥ ३८"],"iast":["brahmaṇyadevaḥ puruṣaḥ purātano","nityaṃ hariryaccaraṇābhivandanāt|","avāpa lakṣmīmanapāyinīṃ yaśo","jagatpavitraṃ ca mahattamāgraṇīḥ|| 38"],"meaning":"ब्रह्मादि समस्त महापुरुषोंमें अग्रगण्य, ब्राह्मणभक्त, पुराणपुरुष श्रीहरिने भी निरन्तर इन्हींके चरणोंकी वन्दना करके अविचल लक्ष्मी और संसारको पवित्र करनेवाली कीर्ति प्राप्त की है॥ ३८॥"},{"id":"4.21.39","number":39,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/39/","page":510,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["यत्सेवयाशेषगुहाशयः स्वराड्","विप्रप्रियस्तुष्यति काममीश्‍वरः।","तदेव तद्धर्मपरैर्विनीतैः","सर्वात्मना ब्रह्मकुलं निषेव्यताम्॥ ३९"],"iast":["yatsevayāśeṣaguhāśayaḥ svarāḍ","viprapriyastuṣyati kāmamīśvaraḥ|","tadeva taddharmaparairvinītaiḥ","sarvātmanā brahmakulaṃ niṣevyatām|| 39"],"meaning":"आपलोग भगवान्‌के लोकसंग्रहरूप धर्मका पालन करनेवाले हैं तथा सर्वान्तर्यामी स्वयंप्रकाश ब्राह्मणप्रिय श्रीहरि विप्रवंशकी सेवा करनेसे ही परम सन्तुष्ट होते हैं, अतः आप सभीको सब प्रकारसे विनयपूर्वक ब्राह्मणकुलकी सेवा करनी चाहिये॥ ३९॥"},{"id":"4.21.40","number":40,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/40/","page":510,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["पुमाँल्लभेतानतिवेलमात्मनः","प्रसीदतोऽत्यन्तशमं स्वतः स्वयम्।","यन्‍नित्यसम्बन्धनिषेवया ततः","परं किमत्रास्ति मुखं हविर्भुजाम्॥ ४०"],"iast":["pumām̐llabhetānativelamātmanaḥ","prasīdato'tyantaśamaṃ svataḥ svayam|","yannityasambandhaniṣevayā tataḥ","paraṃ kimatrāsti mukhaṃ havirbhujām|| 40"],"meaning":"इनकी नित्य सेवा करनेसे शीघ्र ही चित्त शुद्ध हो जानेके कारण मनुष्य स्वयं ही (ज्ञान और अभ्यास आदिके बिना ही) परम शान्तिरूप मोक्ष प्राप्त कर लेता है। अतः लोकमें इन ब्राह्मणोंसे बढ़कर दूसरा कौन है जो हविष्यभोजी देवताओंका मुख हो सके?॥ ४०॥"},{"id":"4.21.41","number":41,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/41/","page":510,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["अश्नात्यनन्तः खलु तत्त्वकोविदैः","श्रद्धाहुतं यन्मुख इज्यनामभिः।","न वै तथा चेतनया बहिष्कृते","हुताशने पारमहंस्यपर्यगुः॥ ४१"],"iast":["aśnātyanantaḥ khalu tattvakovidaiḥ","śraddhāhutaṃ yanmukha ijyanāmabhiḥ|","na vai tathā cetanayā bahiṣkṛte","hutāśane pāramahaṃsyaparyaguḥ|| 41"],"meaning":"उपनिषदोंके ज्ञान-परक वचन एकमात्र जिनमें ही गतार्थ होते हैं, वे भगवान् अनन्त इन्द्रादि यज्ञीय देवताओंके नामसे तत्त्वज्ञानियोंद्वारा ब्राह्मणोंके मुखमें श्रद्धापूर्वक हवन किये हुए पदार्थको जैसे चावसे ग्रहण करते हैं, वैसे चेतनाशून्य अग्‍निमें होमे हुए द्रव्यको नहीं ग्रहण करते॥ ४१॥"},{"id":"4.21.42","number":42,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/42/","page":510,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["यद्ब्रह्म नित्यं विरजं सनातनं","श्रद्धातपोमंगलमौनसंयमैः ।","समाधिना बिभ्रति हार्थदृष्टये","यत्रेदमादर्श इवावभासते॥ ४२"],"iast":["yadbrahma nityaṃ virajaṃ sanātanaṃ","śraddhātapomaṃgalamaunasaṃyamaiḥ |","samādhinā bibhrati hārthadṛṣṭaye","yatredamādarśa ivāvabhāsate|| 42"],"meaning":"सभ्यगण! जिस प्रकार स्वच्छ दर्पणमें प्रतिबिम्बका भान होता है—उसी प्रकार जिससे इस सम्पूर्ण प्रपंचका ठीक-ठीक ज्ञान होता है, उस नित्य, शुद्ध और सनातन ब्रह्म (वेद)-को जो परमार्थ-तत्त्वकी उपलब्धिके लिये श्रद्धा, तप, मंगलमय आचरण, स्वाध्यायविरोधी वार्तालापके त्याग तथा संयम और समाधिके अभ्यासद्वारा धारण करते हैं, उन ब्राह्मणोंके चरणकमलोंकी धूलिको मैं आयुपर्यन्त अपने मुकुटपर धारण करूँ; क्योंकि उसे सर्वदा सिरपर चढ़ाते रहनेसे मनुष्यके सारे पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं और सम्पूर्ण गुण उसकी सेवा करने लगते हैं॥ ४२-४३॥","meaning_covers":[42,43]},{"id":"4.21.43","number":43,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/43/","page":510,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["तेषामहं पादसरोजरेणु-","मार्या वहेयाधिकिरीटमाऽऽयुः।","यं नित्यदा बिभ्रत आशु पापं","नश्यत्यमुं सर्वगुणा भजन्ति॥ ४३"],"iast":["teṣāmahaṃ pādasarojareṇu-","māryā vaheyādhikirīṭamā''yuḥ|","yaṃ nityadā bibhrata āśu pāpaṃ","naśyatyamuṃ sarvaguṇā bhajanti|| 43"],"meaning":"सभ्यगण! जिस प्रकार स्वच्छ दर्पणमें प्रतिबिम्बका भान होता है—उसी प्रकार जिससे इस सम्पूर्ण प्रपंचका ठीक-ठीक ज्ञान होता है, उस नित्य, शुद्ध और सनातन ब्रह्म (वेद)-को जो परमार्थ-तत्त्वकी उपलब्धिके लिये श्रद्धा, तप, मंगलमय आचरण, स्वाध्यायविरोधी वार्तालापके त्याग तथा संयम और समाधिके अभ्यासद्वारा धारण करते हैं, उन ब्राह्मणोंके चरणकमलोंकी धूलिको मैं आयुपर्यन्त अपने मुकुटपर धारण करूँ; क्योंकि उसे सर्वदा सिरपर चढ़ाते रहनेसे मनुष्यके सारे पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं और सम्पूर्ण गुण उसकी सेवा करने लगते हैं॥ ४२-४३॥","meaning_covers":[42,43]},{"id":"4.21.44","number":44,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/44/","page":510,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["गुणायनं शीलधनं कृतज्ञं","वृद्धाश्रयं संवृणतेऽनु सम्पदः।","प्रसीदतां ब्रह्मकुलं गवां च","जनार्दनः सानुचरश्‍च मह्यम्॥ ४४"],"iast":["guṇāyanaṃ śīladhanaṃ kṛtajñaṃ","vṛddhāśrayaṃ saṃvṛṇate'nu sampadaḥ|","prasīdatāṃ brahmakulaṃ gavāṃ ca","janārdanaḥ sānucaraśca mahyam|| 44"],"meaning":"उस गुणवान्, शीलसम्पन्‍न, कृतज्ञ और गुरुजनोंकी सेवा करनेवाले पुरुषके पास सारी सम्पदाएँ अपने-आप आ जाती हैं। अतः मेरी तो यही अभिलाषा है कि ब्राह्मणकुल, गोवंश और भक्तोंके सहित श्रीभगवान् मुझपर सदा प्रसन्‍न रहें॥ ४४॥"},{"id":"4.21.45","number":45,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/45/","page":511,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["इति ब्रुवाणं नृपतिं पितृदेवद्विजातयः।","तुष्टुवुर्हृष्टमनसः साधुवादेन साधवः॥ ४५"],"iast":["iti bruvāṇaṃ nṛpatiṃ pitṛdevadvijātayaḥ|","tuṣṭuvurhṛṣṭamanasaḥ sādhuvādena sādhavaḥ|| 45"],"meaning":"श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—महाराज पृथुका यह भाषण सुनकर देवता, पितर और ब्राह्मण आदि सभी साधुजन बड़े प्रसन्‍न हुए और ‘साधु! साधु!’ यों कहकर उनकी प्रशंसा करने लगे॥ ४५॥"},{"id":"4.21.46","number":46,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/46/","page":511,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["पुत्रेण जयते लोकानिति सत्यवती श्रुतिः।","ब्रह्मदण्डहतः पापो यद्वेनोऽत्यतरत्तमः॥ ४६"],"iast":["putreṇa jayate lokāniti satyavatī śrutiḥ|","brahmadaṇḍahataḥ pāpo yadveno'tyatarattamaḥ|| 46"],"meaning":"उन्होंने कहा, ‘पुत्रके द्वारा पिता पुण्यलोकोंको प्राप्त कर लेता है’ यह श्रुति यथार्थ है; पापी वेन ब्राह्मणोंके शापसे मारा गया था; फिर भी इनके पुण्यबलसे उसका नरकसे निस्तार हो गया॥ ४६॥"},{"id":"4.21.47","number":47,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/47/","page":511,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["हिरण्यकशिपुश्चापि भगवन्‍निन्दया तमः।","विविक्षुरत्यगात्सूनोः प्रह्रादस्यानुभावतः॥ ४७"],"iast":["hiraṇyakaśipuścāpi bhagavannindayā tamaḥ|","vivikṣuratyagātsūnoḥ prahrādasyānubhāvataḥ|| 47"],"meaning":"इसी प्रकार हिरण्यकशिपु भी भगवान्‌की निन्दा करनेके कारण नरकोंमें गिरनेवाला ही था कि अपने पुत्र प्रह्लादके प्रभावसे उन्हें पार कर गया॥ ४७॥"},{"id":"4.21.48","number":48,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/48/","page":511,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["वीरवर्य पितः पृथ्व्याः समाः संजीव शाश्‍वतीः।","यस्येदृश्यच्युते भक्तिः सर्वलोकैकभर्तरि॥ ४८"],"iast":["vīravarya pitaḥ pṛthvyāḥ samāḥ saṃjīva śāśvatīḥ|","yasyedṛśyacyute bhaktiḥ sarvalokaikabhartari|| 48"],"meaning":"वीरवर पृथुजी! आप तो पृथ्वीके पिता ही हैं और सब लोकोंके एकमात्र स्वामी श्रीहरिमें भी आपकी ऐसी अविचल भक्ति है, इसलिये आप अनन्त वर्षोंतक जीवित रहें॥ ४८॥"},{"id":"4.21.49","number":49,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/49/","page":511,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["अहो वयं ह्यद्य पवित्रकीर्ते","त्वयैव नाथेन मुकुन्दनाथाः।","य उत्तमश्लोकतमस्य विष्णो-","र्ब्रह्मण्यदेवस्य कथां व्यनक्ति॥ ४९"],"iast":["aho vayaṃ hyadya pavitrakīrte","tvayaiva nāthena mukundanāthāḥ|","ya uttamaślokatamasya viṣṇo-","rbrahmaṇyadevasya kathāṃ vyanakti|| 49"],"meaning":"आपका सुयश बड़ा पवित्र है; आप उदारकीर्ति ब्रह्मण्यदेव श्रीहरिकी कथाओंका प्रचार करते हैं। हमारा बड़ा सौभाग्य है; आज आपको अपने स्वामीके रूपमें पाकर हम अपनेको भगवान्‌के ही राज्यमें समझते हैं॥ ४९॥"},{"id":"4.21.50","number":50,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/50/","page":511,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["नात्यद्भुतमिदं नाथ तवाजीव्यानुशासनम्।","प्रजानुरागो महतां प्रकृतिः करुणात्मनाम्॥ ५०"],"iast":["nātyadbhutamidaṃ nātha tavājīvyānuśāsanam|","prajānurāgo mahatāṃ prakṛtiḥ karuṇātmanām|| 50"],"meaning":"स्वामिन्! अपने आश्रितोंको इस प्रकारका श्रेष्ठ उपदेश देना आपके लिये कोई आश्‍चर्यकी बात नहीं है; क्योंकि अपनी प्रजाके ऊपर प्रेम रखना तो करुणामय महापुरुषोंका स्वभाव ही होता है॥ ५०॥"},{"id":"4.21.51","number":51,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/51/","page":511,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["अद्य नस्तमसः पारस्त्वयोपासादितः प्रभो।","भ्राम्यतां नष्टदृष्टीनां कर्मभिर्दैवसंज्ञितैः॥ ५१"],"iast":["adya nastamasaḥ pārastvayopāsāditaḥ prabho|","bhrāmyatāṃ naṣṭadṛṣṭīnāṃ karmabhirdaivasaṃjñitaiḥ|| 51"],"meaning":"हमलोग प्रारब्धवश विवेकहीन होकर संसारारण्यमें भटक रहे थे; सो प्रभो! आज आपने हमें इस अज्ञानान्धकारके पार पहुँचा दिया॥ ५१॥"},{"id":"4.21.52","number":52,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/52/","page":511,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["नमो विवृद्धसत्त्वाय पुरुषाय महीयसे।","यो ब्रह्म क्षत्रमाविश्य बिभर्तीदं स्वतेजसा॥ ५२"],"iast":["namo vivṛddhasattvāya puruṣāya mahīyase|","yo brahma kṣatramāviśya bibhartīdaṃ svatejasā|| 52"],"meaning":"आप शुद्ध सत्त्वमय परमपुरुष हैं, जो ब्राह्मणजातिमें प्रविष्ट होकर क्षत्रियोंकी और क्षत्रियजातिमें प्रविष्ट होकर ब्राह्मणोंकी तथा दोनों जातियोंमें प्रतिष्ठित होकर सारे जगत‍्की रक्षा करते हैं। हमारा आपको नमस्कार है॥ ५२॥"}],"text":[{"b":12350,"kind":"adhyaya_heading","page":505,"text":"अथैकविंशोऽध्यायः"},{"b":12351,"kind":"topic_heading","page":505,"text":"महाराज पृथुका अपनी प्रजाको उपदेश"},{"b":12352,"kind":"topic_heading","page":504,"text":"मैत्रेय उवाच"},{"b":12353,"kind":"sanskrit_shloka","page":505,"verses":["4.21.1"],"text":"मौक्तिकैः कुसुमस्रग्भिर्दुकूलैः स्वर्णतोरणैः।"},{"b":12354,"kind":"sanskrit_shloka","page":505,"verses":["4.21.1"],"text":"महासुरभिभिर्धूपैर्मण्डितं तत्र तत्र वै॥ १"},{"b":12355,"kind":"sanskrit_shloka","page":505,"verses":["4.21.2"],"text":"चन्दनागुरुतोयार्द्ररथ्याचत्वरमार्गवत् ।"},{"b":12356,"kind":"sanskrit_shloka","page":505,"verses":["4.21.2"],"text":"पुष्पाक्षतफलैस्तोक्मैर्लाजैरर्चिर्भिरर्चितम्॥ २"},{"b":12357,"kind":"hindi_commentary","page":505,"explains":["4.21.1","4.21.2"],"text":"श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! उस समय महाराज पृथुका नगर सर्वत्र मोतियोंकी लड़ियों, फूलोंकी मालाओं, रंग-बिरंगे वस्त्रों, सोनेके दरवाजों और अत्यन्त सुगन्धित धूपोंसे सुशोभित था॥ १॥ उसकी गलियाँ, चौक और सड़कें चन्दन और अरगजेके जलसे सींच दी गयी थीं तथा उसे पुष्प, अक्षत, फल, यवांकुर, खील और दीपक आदि मांगलिक द्रव्योंसे सजाया गया था॥ २॥"},{"b":12358,"kind":"sanskrit_shloka","page":506,"verses":["4.21.3"],"text":"सवृन्दैः कदलीस्तम्भैः पूगपोतैः परिष्कृतम्।"},{"b":12359,"kind":"sanskrit_shloka","page":506,"verses":["4.21.3"],"text":"तरुपल्लवमालाभिः सर्वतः समलंकृतम्॥ ३"},{"b":12360,"kind":"sanskrit_shloka","page":506,"verses":["4.21.4"],"text":"प्रजास्तं दीपबलिभिः सम्भृताशेषमंगलैः।"},{"b":12361,"kind":"sanskrit_shloka","page":506,"verses":["4.21.4"],"text":"अभीयुर्मृष्टकन्याश्‍च मृष्टकुण्डलमण्डिताः॥ ४"},{"b":12362,"kind":"sanskrit_shloka","page":506,"verses":["4.21.5"],"text":"शङ्खदुन्दुभिघोषेण ब्रह्मघोषेण चर्त्विजाम्।"},{"b":12363,"kind":"sanskrit_shloka","page":506,"verses":["4.21.5"],"text":"विवेश भवनं वीरः स्तूयमानो गतस्मयः॥ ५"},{"b":12364,"kind":"sanskrit_shloka","page":506,"verses":["4.21.6"],"text":"पूजितः पूजयामास तत्र तत्र महायशाः।"},{"b":12365,"kind":"sanskrit_shloka","page":506,"verses":["4.21.6"],"text":"पौरांजानपदांस्तांस्तान् प्रीतः प्रियवरप्रदः॥ ६"},{"b":12366,"kind":"sanskrit_shloka","page":506,"verses":["4.21.7"],"text":"स एवमादीन्यनवद्यचेष्टितः"},{"b":12367,"kind":"sanskrit_shloka","page":506,"verses":["4.21.7"],"text":"कर्माणि भूयांसि महान्महत्तमः।"},{"b":12368,"kind":"sanskrit_shloka","page":506,"verses":["4.21.7"],"text":"कुर्वन् शशासावनिमण्डलं यशः"},{"b":12369,"kind":"sanskrit_shloka","page":506,"verses":["4.21.7"],"text":"स्फीतं निधायारुरुहे परं पदम्॥ ७"},{"b":12370,"kind":"hindi_commentary","page":506,"explains":["4.21.3","4.21.4","4.21.5","4.21.6","4.21.7"],"text":"वह ठौर-ठौरपर रखे हुए फल-फूलके गुच्छोंसे युक्त केलेके खंभों और सुपारीके पौधोंसे बड़ा ही मनोहर जान पड़ता था तथा सब ओर आम आदि वृक्षोंके नवीन पत्तोंकी बंदनवारोंसे विभूषित था॥ ३॥ जब महाराजने नगरमें प्रवेश किया, तब दीपक, उपहार और अनेक प्रकारकी मांगलिक सामग्री लिये हुए प्रजाजनोंने तथा मनोहर कुण्डलोंसे सुशोभित सुन्दरी कन्याओंने उनकी अगवानी की॥ ४॥ शंख और दुन्दुभि आदि बाजे बजने लगे, ऋत्विजगण वेदध्वनि करने लगे, वन्दीजनोंने स्तुतिगान आरम्भ कर दिया। यह सब देख और सुनकर भी उन्हें किसी प्रकारका अहंकार नहीं हुआ। इस प्रकार वीरवर पृथुने राजमहलमें प्रवेश किया॥ ५॥ मार्गमें जहाँ-तहाँ पुरवासी और देशवासियोंने उनका अभिनन्दन किया। परम यशस्वी महाराजने भी उन्हें प्रसन्‍नतापूर्वक अभीष्ट वर देकर सन्तुष्ट किया॥ ६॥ महाराज पृथु महापुरुष और सभीके पूजनीय थे। उन्होंने इसी प्रकारके अनेकों उदार कर्म करते हुए पृथ्वीका शासन किया और अन्तमें अपने विपुल यशका विस्तार कर भगवान्‌का परमपद प्राप्त किया॥ ७॥"},{"b":12371,"kind":"topic_heading","page":506,"text":"सूत उवाच"},{"b":12372,"kind":"sanskrit_shloka","page":506,"verses":["4.21.8"],"text":"तदादिराजस्य यशो विजृम्भितं"},{"b":12373,"kind":"sanskrit_shloka","page":506,"verses":["4.21.8"],"text":"गुणैरशेषैर्गुणवत्सभाजितम् ।"},{"b":12374,"kind":"sanskrit_shloka","page":506,"verses":["4.21.8"],"text":"क्षत्ता महाभागवतः सदस्पते"},{"b":12375,"kind":"sanskrit_shloka","page":506,"verses":["4.21.8"],"text":"कौषारविं प्राह गृणन्तमर्चयन्॥ ८"},{"b":12376,"kind":"hindi_commentary","page":506,"explains":["4.21.8"],"text":"सूतजी कहते हैं—मुनिवर शौनकजी! इस प्रकार भगवान् मैत्रेयके मुखसे आदिराज पृथुका अनेक प्रकारके गुणोंसे सम्पन्‍न और गुणवानोंद्वारा प्रशंसित विस्तृत सुयश सुनकर परम भागवत विदुरजीने उनका अभिनन्दन करते हुए कहा॥ ८॥"},{"b":12377,"kind":"topic_heading","page":506,"text":"विदुर उवाच"},{"b":12378,"kind":"sanskrit_shloka","page":506,"verses":["4.21.9"],"text":"सोऽभिषिक्तः पृथुर्विप्रैर्लब्धाशेषसुरार्हणः।"},{"b":12379,"kind":"sanskrit_shloka","page":506,"verses":["4.21.9"],"text":"बिभ्रत् स वैष्णवं तेजो बाह्वोर्याभ्यां दुदोह गाम्॥ ९"},{"b":12380,"kind":"sanskrit_shloka","page":506,"verses":["4.21.10"],"text":"को न्वस्य कीर्तिं न शृणोत्यभिज्ञो"},{"b":12381,"kind":"sanskrit_shloka","page":506,"verses":["4.21.10"],"text":"यद्विक्रमोच्छिष्टमशेषभूपाः ।"},{"b":12382,"kind":"sanskrit_shloka","page":506,"verses":["4.21.10"],"text":"लोकाः सपाला उपजीवन्ति काम-"},{"b":12383,"kind":"sanskrit_shloka","page":506,"verses":["4.21.10"],"text":"मद्यापि तन्मे वद कर्म शुद्धम्॥ १०"},{"b":12384,"kind":"hindi_commentary","page":506,"explains":["4.21.9","4.21.10"],"text":"विदुरजी बोले—ब्रह्मन्! ब्राह्मणोंने पृथुका अभिषेक किया। समस्त देवताओंने उन्हें उपहार दिये। उन्होंने अपनी भुजाओंमें वैष्णव तेजको धारण किया और उससे पृथ्वीका दोहन किया॥ ९॥ उनके उस पराक्रमके उच्छिष्टरूप विषयभोगोंसे ही आज भी सम्पूर्ण राजा तथा लोकपालोंके सहित समस्त लोक इच्छानुसार जीवन-निर्वाह करते हैं। भला, ऐसा कौन समझदार होगा जो उनकी पवित्र कीर्ति सुनना न चाहेगा। अतः अभी आप मुझे उनके कुछ और भी पवित्र चरित्र सुनाइये॥ १०॥"},{"b":12385,"kind":"topic_heading","page":505,"text":"मैत्रेय उवाच"},{"b":12386,"kind":"sanskrit_shloka","page":507,"verses":["4.21.11"],"text":"गंगायमुनयोर्नद्योरन्तराक्षेत्रमावसन् ।"},{"b":12387,"kind":"sanskrit_shloka","page":507,"verses":["4.21.11"],"text":"आरब्धानेव बुभुजे भोगान् पुण्यजिहासया॥ ११"},{"b":12388,"kind":"sanskrit_shloka","page":507,"verses":["4.21.12"],"text":"सर्वत्रास्खलितादेशः सप्तद्वीपैकदण्डधृक्।"},{"b":12389,"kind":"sanskrit_shloka","page":507,"verses":["4.21.12"],"text":"अन्यत्र ब्राह्मणकुलादन्यत्राच्युतगोत्रतः॥ १२"},{"b":12390,"kind":"sanskrit_shloka","page":507,"verses":["4.21.13"],"text":"एकदाऽऽसीन्महासत्रदीक्षा तत्र दिवौकसाम्।"},{"b":12391,"kind":"sanskrit_shloka","page":507,"verses":["4.21.13"],"text":"समाजो ब्रह्मर्षीणां च राजर्षीणां च सत्तम॥ १३"},{"b":12392,"kind":"sanskrit_shloka","page":507,"verses":["4.21.14"],"text":"तस्मिन्‍नर्हत्सु सर्वेषु स्वर्चितेषु यथार्हतः।"},{"b":12393,"kind":"sanskrit_shloka","page":507,"verses":["4.21.14"],"text":"उत्थितः सदसो मध्ये ताराणामुडुराडिव॥ १४"},{"b":12394,"kind":"sanskrit_shloka","page":507,"verses":["4.21.15"],"text":"प्रांशुः पीनायतभुजो गौरः कञ्जारुणेक्षणः।"},{"b":12395,"kind":"sanskrit_shloka","page":507,"verses":["4.21.15"],"text":"सुनासः सुमुखः सौम्यः पीनांसः सुद्विजस्मितः॥ १५"},{"b":12396,"kind":"sanskrit_shloka","page":507,"verses":["4.21.16"],"text":"व्यूढवक्षा बृहच्छ्रोणिर्वलिवल्गुदलोदरः।"},{"b":12397,"kind":"sanskrit_shloka","page":507,"verses":["4.21.16"],"text":"आवर्तनाभिरोजस्वी कांचनोरुरुदग्रपात्॥ १६"},{"b":12398,"kind":"sanskrit_shloka","page":507,"verses":["4.21.17"],"text":"सूक्ष्मवक्रासितस्निग्धमूर्धजः कम्बुकन्धरः।"},{"b":12399,"kind":"sanskrit_shloka","page":507,"verses":["4.21.17"],"text":"महाधने दुकूलाग्र्ये परिधायोपवीय च॥ १७"},{"b":12400,"kind":"sanskrit_shloka","page":507,"verses":["4.21.18"],"text":"व्यञ्जिताशेषगात्रश्रीर्नियमे न्यस्तभूषणः।"},{"b":12401,"kind":"sanskrit_shloka","page":507,"verses":["4.21.18"],"text":"कृष्णाजिनधरः श्रीमान् कुशपाणिः कृतोचितः॥ १८"},{"b":12402,"kind":"sanskrit_shloka","page":507,"verses":["4.21.19"],"text":"शिशिरस्निग्धताराक्षः समैक्षत समन्ततः।"},{"b":12403,"kind":"sanskrit_shloka","page":507,"verses":["4.21.19"],"text":"ऊचिवानिदमुर्वीशः सदः संहर्षयन्‍निव॥ १९"},{"b":12404,"kind":"sanskrit_shloka","page":507,"verses":["4.21.20"],"text":"चारु चित्रपदं श्लक्ष्णं मृष्टं गूढमविक्लवम्।"},{"b":12405,"kind":"sanskrit_shloka","page":507,"verses":["4.21.20"],"text":"सर्वेषामुपकारार्थं तदा अनुवदन्‍निव॥ २०"},{"b":12406,"kind":"hindi_commentary","page":507,"explains":["4.21.11","4.21.12","4.21.13","4.21.14","4.21.15","4.21.16","4.21.17","4.21.18","4.21.19","4.21.20"],"text":"श्रीमैत्रेयजीने कहा—साधुश्रेष्ठ विदुरजी! महाराज पृथु गंगा और यमुनाके मध्यवर्ती देशमें निवास कर अपने पुण्यकर्मोंके क्षयकी इच्छासे प्रारब्धवश प्राप्त हुए भोगोंको ही भोगते थे॥ ११॥ ब्राह्मणवंश और भगवान्‌के सम्बन्धी विष्णुभक्तोंको छोड़कर उनका सातों द्वीपोंके सभी पुरुषोंपर अखण्ड एवं अबाध शासन था॥ १२॥ एक बार उन्होंने एक महासत्रकी दीक्षा ली; उस समय वहाँ देवताओं, ब्रह्मर्षियों और राजर्षियोंका बहुत बड़ा समाज एकत्र हुआ॥ १३॥ उस समाजमें महाराज पृथुने उन पूजनीय अतिथियोंका यथायोग्य सत्कार किया और फिर उस सभामें, नक्षत्रमण्डलमें चन्द्रमाके समान खड़े हो गये॥ १४॥ उनका शरीर ऊँचा, भुजाएँ भरी और विशाल, रंग गोरा, नेत्र कमलके समान सुन्दर और अरुणवर्ण, नासिका सुघड़, मुख मनोहर, स्वरूप सौम्य, कंधे ऊँचे और मुसकानसे युक्त दन्तपंक्ति सुन्दर थी॥ १५॥ उनकी छाती चौड़ी, कमरका पिछला भाग स्थूल और उदर पीपलके पत्तेके समान सुडौल तथा बल पड़े हुए होनेसे और भी सुन्दर जान पड़ता था। नाभि भँवरके समान गम्भीर थी, शरीर तेजस्वी था, जंघाएँ सुवर्णके समान देदीप्यमान थीं तथा पैरोंके पंजे उभरे हुए थे॥ १६॥ उनके बाल बारीक, घुँघराले, काले और चिकने थे; गरदन शंखके समान उतार-चढ़ाववाली तथा रेखाओंसे युक्त थी और वे उत्तम बहुमूल्य धोती पहने और वैसी ही चादर ओढ़े थे॥ १७॥ दीक्षाके नियमानुसार उन्होंने समस्त आभूषण उतार दिये थे; इसीसे उनके शरीरके अंग-प्रत्यंगकी शोभा अपने स्वाभाविक रूपमें स्पष्ट झलक रही थी। वे शरीरपर कृष्णमृगका चर्म और हाथोंमें कुशा धारण किये हुए थे। इससे उनके शरीरकी कान्ति और भी बढ़ गयी थी। वे अपने सारे नित्यकृत्य यथाविधि सम्पन्‍न कर चुके थे॥ १८॥ राजा पृथुने मानो सारी सभाको हर्षसे सराबोर करते हुए अपने शीतल एवं स्नेहपूर्ण नेत्रोंसे चारों ओर देखा और फिर अपना भाषण प्रारम्भ किया॥ १९॥ उनका भाषण अत्यन्त सुन्दर, विचित्र पदोंसे युक्त, स्पष्ट, मधुर, गम्भीर एवं निश्शंक था। मानो उस समय वे सबका उपकार करनेके लिये अपने अनुभवका ही अनुवाद कर रहे हों॥ २०॥"},{"b":12407,"kind":"topic_heading","page":508,"text":"राजोवाच"},{"b":12408,"kind":"sanskrit_shloka","page":508,"verses":["4.21.21"],"text":"सभ्याः शृणुत भद्रं वः साधवो य इहागताः।"},{"b":12409,"kind":"sanskrit_shloka","page":508,"verses":["4.21.21"],"text":"सत्सु जिज्ञासुभिर्धर्ममावेद्यं स्वमनीषितम्॥ २१"},{"b":12410,"kind":"sanskrit_shloka","page":508,"verses":["4.21.22"],"text":"अहं दण्डधरो राजा प्रजानामिह योजितः।"},{"b":12411,"kind":"sanskrit_shloka","page":508,"verses":["4.21.22"],"text":"रक्षिता वृत्तिदः स्वेषु सेतुषु स्थापिता पृथक्॥ २२"},{"b":12412,"kind":"sanskrit_shloka","page":508,"verses":["4.21.23"],"text":"तस्य मे तदनुष्ठानाद्यानाहुर्ब्रह्मवादिनः।"},{"b":12413,"kind":"sanskrit_shloka","page":508,"verses":["4.21.23"],"text":"लोकाः स्युः कामसन्दोहा यस्य तुष्यति दिष्टदृक्॥ २३"},{"b":12414,"kind":"sanskrit_shloka","page":508,"verses":["4.21.24"],"text":"य उद्धरेत्करं राजा प्रजा धर्मेष्वशिक्षयन्।"},{"b":12415,"kind":"sanskrit_shloka","page":508,"verses":["4.21.24"],"text":"प्रजानां शमलं भुङ्क्ते भगं च स्वं जहाति सः॥ २४"},{"b":12416,"kind":"sanskrit_shloka","page":508,"verses":["4.21.25"],"text":"तत् प्रजा भर्तृपिण्डार्थं स्वार्थमेवानसूयवः।"},{"b":12417,"kind":"sanskrit_shloka","page":508,"verses":["4.21.25"],"text":"कुरुताधोक्षजधियस्तर्हि मेऽनुग्रहः कृतः॥ २५"},{"b":12418,"kind":"sanskrit_shloka","page":508,"verses":["4.21.26"],"text":"यूयं तदनुमोदध्वं पितृदेवर्षयोऽमलाः।"},{"b":12419,"kind":"sanskrit_shloka","page":508,"verses":["4.21.26"],"text":"कर्तुः शास्तुरनुज्ञातुस्तुल्यं यत्प्रेत्य तत्फलम्॥ २६"},{"b":12420,"kind":"sanskrit_shloka","page":508,"verses":["4.21.27"],"text":"अस्ति यज्ञपतिर्नाम केषाञ्चिदर्हसत्तमाः।"},{"b":12421,"kind":"sanskrit_shloka","page":508,"verses":["4.21.27"],"text":"इहामुत्र च लक्ष्यन्ते ज्योत्स्नावत्यः क्‍वचिद्भुवः॥ २७"},{"b":12422,"kind":"sanskrit_shloka","page":508,"verses":["4.21.28"],"text":"मनोरुत्तानपादस्य ध्रुवस्यापि महीपतेः।"},{"b":12423,"kind":"sanskrit_shloka","page":508,"verses":["4.21.28"],"text":"प्रियव्रतस्य राजर्षेरंगस्यास्मत्पितुः पितुः॥ २८"},{"b":12424,"kind":"sanskrit_shloka","page":508,"verses":["4.21.29"],"text":"ईदृशानामथान्येषामजस्य च भवस्य च।"},{"b":12425,"kind":"sanskrit_shloka","page":508,"verses":["4.21.29"],"text":"प्रह्रादस्य बलेश्चापि कृत्यमस्ति गदाभृता॥ २९"},{"b":12426,"kind":"sanskrit_shloka","page":508,"verses":["4.21.30"],"text":"दौहित्रादीनृते मृत्योः शोच्यान् धर्मविमोहितान्।"},{"b":12427,"kind":"sanskrit_shloka","page":508,"verses":["4.21.30"],"text":"वर्गस्वर्गापवर्गाणां प्रायेणैकात्म्यहेतुना॥ ३०"},{"b":12428,"kind":"hindi_commentary","page":508,"explains":["4.21.21","4.21.22","4.21.23","4.21.24","4.21.25","4.21.26","4.21.27","4.21.28","4.21.29","4.21.30"],"text":"राजा पृथुने कहा—सज्जनो! आपका कल्याण हो। आप महानुभाव, जो यहाँ पधारे हैं, मेरी प्रार्थना सुनें—जिज्ञासु पुरुषोंको चाहिये कि संत-समाजमें अपने निश्‍चयका निवेदन करें॥ २१॥ इस लोकमें मुझे प्रजाजनोंका शासन, उनकी रक्षा, उनकी आजीविकाका प्रबन्ध तथा उन्हें अलग-अलग अपनी मर्यादामें रखनेके लिये राजा बनाया गया है॥ २२॥ अतः इनका यथावत् पालन करनेसे मुझे उन्हीं मनोरथ पूर्ण करनेवाले लोकोंकी प्राप्ति होनी चाहिये, जो वेदवादी मुनियोंके मतानुसार सम्पूर्ण कर्मोंके साक्षी श्रीहरिके प्रसन्‍न होनेपर मिलते हैं॥ २३॥ जो राजा प्रजाको धर्ममार्गकी शिक्षा न देकर केवल उससे कर वसूल करनेमें लगा रहता है, वह केवल प्रजाके पापका ही भागी होता है और अपने ऐश्‍वर्यसे हाथ धो बैठता है॥ २४॥ अतः प्रिय प्रजाजन! अपने इस राजाका परलोकमें हित करनेके लिये आपलोग परस्पर दोषदृष्टि छोड़कर हृदयसे भगवान्‌को याद रखते हुए अपने-अपने कर्तव्यका पालन करते रहिये; क्योंकि आपका स्वार्थ भी इसीमें है और इस प्रकार मुझपर भी आपका बड़ा अनुग्रह होगा॥ २५॥ विशुद्धचित्त देवता, पितर और महर्षिगण! आप भी मेरी इस प्रार्थनाका अनुमोदन कीजिये; क्योंकि कोई भी कर्म हो, मरनेके अनन्तर उसके कर्ता, उपदेष्टा और समर्थकको उसका समान फल मिलता है॥ २६॥ माननीय सज्जनो! किन्हीं श्रेष्ठ महानुभावोंके मतमें तो कर्मोंका फल देनेवाले भगवान् यज्ञपति ही हैं; क्योंकि इहलोक और परलोक दोनों ही जगह कोई-कोई शरीर बड़े तेजोमय देखे जाते हैं॥ २७॥ मनु, उत्तानपाद, महीपति ध्रुव, राजर्षि प्रियव्रत, हमारे दादा अंग तथा ब्रह्मा, शिव, प्रह्लाद, बलि और इसी कोटिके अन्यान्य महानुभावोंके मतमें तो धर्म-अर्थ-काम-मोक्षरूप चतुर्वर्ग तथा स्वर्ग और अपवर्गके स्वाधीन नियामक, कर्मफलदातारूपसे भगवान् गदाधरकी आवश्यकता है ही। इस विषयमें तो केवल मृत्युके दौहित्र वेन आदि कुछ शोचनीय और धर्मविमूढ़ लोगोंका ही मतभेद है। अतः उसका कोई विशेष महत्त्व नहीं हो सकता॥ २८—३०॥"},{"b":12429,"kind":"sanskrit_shloka","page":509,"verses":["4.21.31"],"text":"यत्पादसेवाभिरुचिस्तपस्विना-"},{"b":12430,"kind":"sanskrit_shloka","page":509,"verses":["4.21.31"],"text":"मशेषजन्मोपचितं मलं धियः।"},{"b":12431,"kind":"sanskrit_shloka","page":509,"verses":["4.21.31"],"text":"सद्यः क्षिणोत्यन्वहमेधती सती"},{"b":12432,"kind":"sanskrit_shloka","page":509,"verses":["4.21.31"],"text":"यथा पदांगुष्ठविनिःसृता सरित्॥ ३१"},{"b":12433,"kind":"sanskrit_shloka","page":509,"verses":["4.21.32"],"text":"विनिर्धुताशेषमनोमलः पुमा-"},{"b":12434,"kind":"sanskrit_shloka","page":509,"verses":["4.21.32"],"text":"नसंगविज्ञानविशेषवीर्यवान् ।"},{"b":12435,"kind":"sanskrit_shloka","page":509,"verses":["4.21.32"],"text":"यदङ्‌घ्रिमूले कृतकेतनः पुन-"},{"b":12436,"kind":"sanskrit_shloka","page":509,"verses":["4.21.32"],"text":"र्न संसृतिं क्लेशवहां प्रपद्यते॥ ३२"},{"b":12437,"kind":"sanskrit_shloka","page":509,"verses":["4.21.33"],"text":"तमेव यूयं भजतात्मवृत्तिभि-"},{"b":12438,"kind":"sanskrit_shloka","page":509,"verses":["4.21.33"],"text":"र्मनोवचःकायगुणैः स्वकर्मभिः।"},{"b":12439,"kind":"sanskrit_shloka","page":509,"verses":["4.21.33"],"text":"अमायिनः कामदुघाङ्‌घ्रिपङ्कजं"},{"b":12440,"kind":"sanskrit_shloka","page":509,"verses":["4.21.33"],"text":"यथाधिकारावसितार्थसिद्धयः ॥ ३३"},{"b":12441,"kind":"hindi_translation","page":509,"explains":["4.21.31","4.21.32","4.21.33"],"text":"जिनके चरणकमलोंकी सेवाके लिये निरन्तर बढ़नेवाली अभिलाषा उन्हींके चरणनखसे निकली हुई गंगाजीके समान, संसारतापसे संतप्त जीवोंके समस्त जन्मोंके संचित मनोमलको तत्काल नष्ट कर देती है, जिनके चरणतलका आश्रय लेनेवाला पुरुष सब प्रकारके मानसिक दोषोंको धो डालता तथा वैराग्य और तत्त्वसाक्षात्काररूप बल पाकर फिर इस दुःखमय संसारचक्रमें नहीं पड़ता और जिनके चरणकमल सब प्रकारकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले हैं—उन प्रभुको आपलोग अपनी-अपनी आजीविकाके उपयोगी वर्णाश्रमोचित अध्यापनादि कर्मों तथा ध्यान-स्तुति-पूजादि मानसिक, वाचिक एवं शारीरिक क्रियाओंके द्वारा भजें। हृदयमें किसी प्रकारका कपट न रखें तथा यह निश्‍चय रखें कि हमें अपने-अपने अधिकारानुसार इसका फल अवश्य प्राप्त होगा॥ ३१—३३॥"},{"b":12442,"kind":"sanskrit_shloka","page":509,"verses":["4.21.34"],"text":"असाविहानेकगुणोऽगुणोऽध्वरः"},{"b":12443,"kind":"sanskrit_shloka","page":509,"verses":["4.21.34"],"text":"पृथग्विधद्रव्यगुणक्रियोक्तिभिः ।"},{"b":12444,"kind":"sanskrit_shloka","page":509,"verses":["4.21.34"],"text":"सम्पद्यतेऽर्थाशयलिंगनामभि-"},{"b":12445,"kind":"sanskrit_shloka","page":509,"verses":["4.21.34"],"text":"र्विशुद्धविज्ञानघनः स्वरूपतः॥ ३४"},{"b":12446,"kind":"sanskrit_shloka","page":509,"verses":["4.21.35"],"text":"प्रधानकालाशयधर्मसंग्रहे"},{"b":12447,"kind":"sanskrit_shloka","page":509,"verses":["4.21.35"],"text":"शरीर एष प्रतिपद्य चेतनाम्।"},{"b":12448,"kind":"sanskrit_shloka","page":509,"verses":["4.21.35"],"text":"क्रियाफलत्वेन विभुर्विभाव्यते"},{"b":12449,"kind":"sanskrit_shloka","page":509,"verses":["4.21.35"],"text":"यथानलो दारुषु तद‍्गुणात्मकः॥ ३५"},{"b":12450,"kind":"hindi_commentary","page":509,"explains":["4.21.34","4.21.35"],"text":"भगवान् स्वरूपतः विशुद्ध विज्ञानघन और समस्त विशेषणोंसे रहित हैं; किन्तु इस कर्ममार्गमें जौ-चावल आदि विविध द्रव्य, शुक्लादि गुण, अवघात (कूटना) आदि क्रिया एवं मन्त्रोंके द्वारा और अर्थ, आशय (संकल्प), लिंग (पदार्थ-शक्ति) तथा ज्योतिष्टोम आदि नामोंसे सम्पन्‍न होनेवाले, अनेक विशेषणयुक्त यज्ञके रूपमें प्रकाशित होते हैं॥ ३४॥ जिस प्रकार एक ही अग्‍नि भिन्‍न-भिन्‍न काष्ठोंमें उन्हींके आकारादिके अनुरूप भासती है, उसी प्रकार वे सर्वव्यापक प्रभु परमानन्दस्वरूप होते हुए भी प्रकृति, काल, वासना और अदृष्टसे उत्पन्‍न हुए शरीरमें विषयाकार बनी हुई बुद्धिमें स्थित होकर उन यज्ञ-यागादि क्रियाओंके फलरूपसे अनेक प्रकारके जान पड़ते हैं॥ ३५॥"},{"b":12451,"kind":"sanskrit_shloka","page":509,"verses":["4.21.36"],"text":"अहो ममामी वितरन्त्यनुग्रहं"},{"b":12452,"kind":"sanskrit_shloka","page":509,"verses":["4.21.36"],"text":"हरिं गुरुं यज्ञभुजामधीश्‍वरम्।"},{"b":12453,"kind":"sanskrit_shloka","page":509,"verses":["4.21.36"],"text":"स्वधर्मयोगेन यजन्ति मामका"},{"b":12454,"kind":"sanskrit_shloka","page":509,"verses":["4.21.36"],"text":"निरन्तरं क्षोणितले दृढव्रताः॥ ३६"},{"b":12455,"kind":"sanskrit_shloka","page":509,"verses":["4.21.37"],"text":"मा जातु तेजः प्रभवेन्महर्द्धिभि-"},{"b":12456,"kind":"sanskrit_shloka","page":509,"verses":["4.21.37"],"text":"स्तितिक्षया तपसा विद्यया च।"},{"b":12457,"kind":"sanskrit_shloka","page":509,"verses":["4.21.37"],"text":"देदीप्यमानेऽजितदेवतानां"},{"b":12458,"kind":"sanskrit_shloka","page":509,"verses":["4.21.37"],"text":"कुले स्वयं राजकुलाद् द्विजानाम्॥ ३७"},{"b":12459,"kind":"hindi_commentary","page":509,"explains":["4.21.36","4.21.37"],"text":"अहो! इस पृथ्वीतलपर मेरे जो प्रजाजन यज्ञ-भोक्ताओंके अधीश्‍वर सर्वगुरु श्रीहरिका एकनिष्ठभावसे अपने-अपने धर्मोंके द्वारा निरन्तर पूजन करते हैं, वे मुझपर बड़ी कृपा करते हैं॥ ३६॥ सहनशीलता, तपस्या और ज्ञान इन विशिष्ट विभूतियोंके कारण वैष्णव और ब्राह्मणोंके वंश स्वभावतः ही उज्ज्वल होते हैं। उनपर राजकुलका तेज, धन, ऐश्‍वर्य आदि समृद्धियोंके कारण अपना प्रभाव न डाले॥ ३७॥"},{"b":12460,"kind":"sanskrit_shloka","page":510,"verses":["4.21.38"],"text":"ब्रह्मण्यदेवः पुरुषः पुरातनो"},{"b":12461,"kind":"sanskrit_shloka","page":510,"verses":["4.21.38"],"text":"नित्यं हरिर्यच्चरणाभिवन्दनात्।"},{"b":12462,"kind":"sanskrit_shloka","page":510,"verses":["4.21.38"],"text":"अवाप लक्ष्मीमनपायिनीं यशो"},{"b":12463,"kind":"sanskrit_shloka","page":510,"verses":["4.21.38"],"text":"जगत्पवित्रं च महत्तमाग्रणीः॥ ३८"},{"b":12464,"kind":"sanskrit_shloka","page":510,"verses":["4.21.39"],"text":"यत्सेवयाशेषगुहाशयः स्वराड्"},{"b":12465,"kind":"sanskrit_shloka","page":510,"verses":["4.21.39"],"text":"विप्रप्रियस्तुष्यति काममीश्‍वरः।"},{"b":12466,"kind":"sanskrit_shloka","page":510,"verses":["4.21.39"],"text":"तदेव तद्धर्मपरैर्विनीतैः"},{"b":12467,"kind":"sanskrit_shloka","page":510,"verses":["4.21.39"],"text":"सर्वात्मना ब्रह्मकुलं निषेव्यताम्॥ ३९"},{"b":12468,"kind":"sanskrit_shloka","page":510,"verses":["4.21.40"],"text":"पुमाँल्लभेतानतिवेलमात्मनः"},{"b":12469,"kind":"sanskrit_shloka","page":510,"verses":["4.21.40"],"text":"प्रसीदतोऽत्यन्तशमं स्वतः स्वयम्।"},{"b":12470,"kind":"sanskrit_shloka","page":510,"verses":["4.21.40"],"text":"यन्‍नित्यसम्बन्धनिषेवया ततः"},{"b":12471,"kind":"sanskrit_shloka","page":510,"verses":["4.21.40"],"text":"परं किमत्रास्ति मुखं हविर्भुजाम्॥ ४०"},{"b":12472,"kind":"sanskrit_shloka","page":510,"verses":["4.21.41"],"text":"अश्नात्यनन्तः खलु तत्त्वकोविदैः"},{"b":12473,"kind":"sanskrit_shloka","page":510,"verses":["4.21.41"],"text":"श्रद्धाहुतं यन्मुख इज्यनामभिः।"},{"b":12474,"kind":"sanskrit_shloka","page":510,"verses":["4.21.41"],"text":"न वै तथा चेतनया बहिष्कृते"},{"b":12475,"kind":"sanskrit_shloka","page":510,"verses":["4.21.41"],"text":"हुताशने पारमहंस्यपर्यगुः॥ ४१"},{"b":12476,"kind":"sanskrit_shloka","page":510,"verses":["4.21.42"],"text":"यद्ब्रह्म नित्यं विरजं सनातनं"},{"b":12477,"kind":"sanskrit_shloka","page":510,"verses":["4.21.42"],"text":"श्रद्धातपोमंगलमौनसंयमैः ।"},{"b":12478,"kind":"sanskrit_shloka","page":510,"verses":["4.21.42"],"text":"समाधिना बिभ्रति हार्थदृष्टये"},{"b":12479,"kind":"sanskrit_shloka","page":510,"verses":["4.21.42"],"text":"यत्रेदमादर्श इवावभासते॥ ४२"},{"b":12480,"kind":"sanskrit_shloka","page":510,"verses":["4.21.43"],"text":"तेषामहं पादसरोजरेणु-"},{"b":12481,"kind":"sanskrit_shloka","page":510,"verses":["4.21.43"],"text":"मार्या वहेयाधिकिरीटमाऽऽयुः।"},{"b":12482,"kind":"sanskrit_shloka","page":510,"verses":["4.21.43"],"text":"यं नित्यदा बिभ्रत आशु पापं"},{"b":12483,"kind":"sanskrit_shloka","page":510,"verses":["4.21.43"],"text":"नश्यत्यमुं सर्वगुणा भजन्ति॥ ४३"},{"b":12484,"kind":"sanskrit_shloka","page":510,"verses":["4.21.44"],"text":"गुणायनं शीलधनं कृतज्ञं"},{"b":12485,"kind":"sanskrit_shloka","page":510,"verses":["4.21.44"],"text":"वृद्धाश्रयं संवृणतेऽनु सम्पदः।"},{"b":12486,"kind":"sanskrit_shloka","page":510,"verses":["4.21.44"],"text":"प्रसीदतां ब्रह्मकुलं गवां च"},{"b":12487,"kind":"sanskrit_shloka","page":510,"verses":["4.21.44"],"text":"जनार्दनः सानुचरश्‍च मह्यम्॥ ४४"},{"b":12488,"kind":"hindi_commentary","page":510,"explains":["4.21.38","4.21.39","4.21.40","4.21.41","4.21.42","4.21.43","4.21.44"],"text":"ब्रह्मादि समस्त महापुरुषोंमें अग्रगण्य, ब्राह्मणभक्त, पुराणपुरुष श्रीहरिने भी निरन्तर इन्हींके चरणोंकी वन्दना करके अविचल लक्ष्मी और संसारको पवित्र करनेवाली कीर्ति प्राप्त की है॥ ३८॥ आपलोग भगवान्‌के लोकसंग्रहरूप धर्मका पालन करनेवाले हैं तथा सर्वान्तर्यामी स्वयंप्रकाश ब्राह्मणप्रिय श्रीहरि विप्रवंशकी सेवा करनेसे ही परम सन्तुष्ट होते हैं, अतः आप सभीको सब प्रकारसे विनयपूर्वक ब्राह्मणकुलकी सेवा करनी चाहिये॥ ३९॥ इनकी नित्य सेवा करनेसे शीघ्र ही चित्त शुद्ध हो जानेके कारण मनुष्य स्वयं ही (ज्ञान और अभ्यास आदिके बिना ही) परम शान्तिरूप मोक्ष प्राप्त कर लेता है। अतः लोकमें इन ब्राह्मणोंसे बढ़कर दूसरा कौन है जो हविष्यभोजी देवताओंका मुख हो सके?॥ ४०॥ उपनिषदोंके ज्ञान-परक वचन एकमात्र जिनमें ही गतार्थ होते हैं, वे भगवान् अनन्त इन्द्रादि यज्ञीय देवताओंके नामसे तत्त्वज्ञानियोंद्वारा ब्राह्मणोंके मुखमें श्रद्धापूर्वक हवन किये हुए पदार्थको जैसे चावसे ग्रहण करते हैं, वैसे चेतनाशून्य अग्‍निमें होमे हुए द्रव्यको नहीं ग्रहण करते॥ ४१॥ सभ्यगण! जिस प्रकार स्वच्छ दर्पणमें प्रतिबिम्बका भान होता है—उसी प्रकार जिससे इस सम्पूर्ण प्रपंचका ठीक-ठीक ज्ञान होता है, उस नित्य, शुद्ध और सनातन ब्रह्म (वेद)-को जो परमार्थ-तत्त्वकी उपलब्धिके लिये श्रद्धा, तप, मंगलमय आचरण, स्वाध्यायविरोधी वार्तालापके त्याग तथा संयम और समाधिके अभ्यासद्वारा धारण करते हैं, उन ब्राह्मणोंके चरणकमलोंकी धूलिको मैं आयुपर्यन्त अपने मुकुटपर धारण करूँ; क्योंकि उसे सर्वदा सिरपर चढ़ाते रहनेसे मनुष्यके सारे पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं और सम्पूर्ण गुण उसकी सेवा करने लगते हैं॥ ४२-४३॥ उस गुणवान्, शीलसम्पन्‍न, कृतज्ञ और गुरुजनोंकी सेवा करनेवाले पुरुषके पास सारी सम्पदाएँ अपने-आप आ जाती हैं। अतः मेरी तो यही अभिलाषा है कि ब्राह्मणकुल, गोवंश और भक्तोंके सहित श्रीभगवान् मुझपर सदा प्रसन्‍न रहें॥ ४४॥"},{"b":12489,"kind":"topic_heading","page":511,"text":"मैत्रेय उवाच"},{"b":12490,"kind":"sanskrit_shloka","page":511,"verses":["4.21.45"],"text":"इति ब्रुवाणं नृपतिं पितृदेवद्विजातयः।"},{"b":12491,"kind":"sanskrit_shloka","page":511,"verses":["4.21.45"],"text":"तुष्टुवुर्हृष्टमनसः साधुवादेन साधवः॥ ४५"},{"b":12492,"kind":"sanskrit_shloka","page":511,"verses":["4.21.46"],"text":"पुत्रेण जयते लोकानिति सत्यवती श्रुतिः।"},{"b":12493,"kind":"sanskrit_shloka","page":511,"verses":["4.21.46"],"text":"ब्रह्मदण्डहतः पापो यद्वेनोऽत्यतरत्तमः॥ ४६"},{"b":12494,"kind":"hindi_commentary","page":511,"explains":["4.21.45","4.21.46"],"text":"श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—महाराज पृथुका यह भाषण सुनकर देवता, पितर और ब्राह्मण आदि सभी साधुजन बड़े प्रसन्‍न हुए और ‘साधु! साधु!’ यों कहकर उनकी प्रशंसा करने लगे॥ ४५॥ उन्होंने कहा, ‘पुत्रके द्वारा पिता पुण्यलोकोंको प्राप्त कर लेता है’ यह श्रुति यथार्थ है; पापी वेन ब्राह्मणोंके शापसे मारा गया था; फिर भी इनके पुण्यबलसे उसका नरकसे निस्तार हो गया॥ ४६॥"},{"b":12495,"kind":"sanskrit_shloka","page":511,"verses":["4.21.47"],"text":"हिरण्यकशिपुश्चापि भगवन्‍निन्दया तमः।"},{"b":12496,"kind":"sanskrit_shloka","page":511,"verses":["4.21.47"],"text":"विविक्षुरत्यगात्सूनोः प्रह्रादस्यानुभावतः॥ ४७"},{"b":12497,"kind":"sanskrit_shloka","page":511,"verses":["4.21.48"],"text":"वीरवर्य पितः पृथ्व्याः समाः संजीव शाश्‍वतीः।"},{"b":12498,"kind":"sanskrit_shloka","page":511,"verses":["4.21.48"],"text":"यस्येदृश्यच्युते भक्तिः सर्वलोकैकभर्तरि॥ ४८"},{"b":12499,"kind":"hindi_commentary","page":511,"explains":["4.21.47","4.21.48"],"text":"इसी प्रकार हिरण्यकशिपु भी भगवान्‌की निन्दा करनेके कारण नरकोंमें गिरनेवाला ही था कि अपने पुत्र प्रह्लादके प्रभावसे उन्हें पार कर गया॥ ४७॥ वीरवर पृथुजी! आप तो पृथ्वीके पिता ही हैं और सब लोकोंके एकमात्र स्वामी श्रीहरिमें भी आपकी ऐसी अविचल भक्ति है, इसलिये आप अनन्त वर्षोंतक जीवित रहें॥ ४८॥"},{"b":12500,"kind":"sanskrit_shloka","page":511,"verses":["4.21.49"],"text":"अहो वयं ह्यद्य पवित्रकीर्ते"},{"b":12501,"kind":"sanskrit_shloka","page":511,"verses":["4.21.49"],"text":"त्वयैव नाथेन मुकुन्दनाथाः।"},{"b":12502,"kind":"sanskrit_shloka","page":511,"verses":["4.21.49"],"text":"य उत्तमश्लोकतमस्य विष्णो-"},{"b":12503,"kind":"sanskrit_shloka","page":511,"verses":["4.21.49"],"text":"र्ब्रह्मण्यदेवस्य कथां व्यनक्ति॥ ४९"},{"b":12504,"kind":"hindi_commentary","page":511,"explains":["4.21.49"],"text":"आपका सुयश बड़ा पवित्र है; आप उदारकीर्ति ब्रह्मण्यदेव श्रीहरिकी कथाओंका प्रचार करते हैं। हमारा बड़ा सौभाग्य है; आज आपको अपने स्वामीके रूपमें पाकर हम अपनेको भगवान्‌के ही राज्यमें समझते हैं॥ ४९॥"},{"b":12505,"kind":"sanskrit_shloka","page":511,"verses":["4.21.50"],"text":"नात्यद्भुतमिदं नाथ तवाजीव्यानुशासनम्।"},{"b":12506,"kind":"sanskrit_shloka","page":511,"verses":["4.21.50"],"text":"प्रजानुरागो महतां प्रकृतिः करुणात्मनाम्॥ ५०"},{"b":12507,"kind":"hindi_commentary","page":511,"explains":["4.21.50"],"text":"स्वामिन्! अपने आश्रितोंको इस प्रकारका श्रेष्ठ उपदेश देना आपके लिये कोई आश्‍चर्यकी बात नहीं है; क्योंकि अपनी प्रजाके ऊपर प्रेम रखना तो करुणामय महापुरुषोंका स्वभाव ही होता है॥ ५०॥"},{"b":12508,"kind":"sanskrit_shloka","page":511,"verses":["4.21.51"],"text":"अद्य नस्तमसः पारस्त्वयोपासादितः प्रभो।"},{"b":12509,"kind":"sanskrit_shloka","page":511,"verses":["4.21.51"],"text":"भ्राम्यतां नष्टदृष्टीनां कर्मभिर्दैवसंज्ञितैः॥ ५१"},{"b":12510,"kind":"hindi_commentary","page":511,"explains":["4.21.51"],"text":"हमलोग प्रारब्धवश विवेकहीन होकर संसारारण्यमें भटक रहे थे; सो प्रभो! आज आपने हमें इस अज्ञानान्धकारके पार पहुँचा दिया॥ ५१॥"},{"b":12511,"kind":"sanskrit_shloka","page":511,"verses":["4.21.52"],"text":"नमो विवृद्धसत्त्वाय पुरुषाय महीयसे।"},{"b":12512,"kind":"sanskrit_shloka","page":511,"verses":["4.21.52"],"text":"यो ब्रह्म क्षत्रमाविश्य बिभर्तीदं स्वतेजसा॥ ५२"},{"b":12513,"kind":"hindi_commentary","page":511,"explains":["4.21.52"],"text":"आप शुद्ध सत्त्वमय परमपुरुष हैं, जो ब्राह्मणजातिमें प्रविष्ट होकर क्षत्रियोंकी और क्षत्रियजातिमें प्रविष्ट होकर ब्राह्मणोंकी तथा दोनों जातियोंमें प्रतिष्ठित होकर सारे जगत‍्की रक्षा करते हैं। हमारा आपको नमस्कार है॥ ५२॥"},{"b":12514,"kind":"hindi_translation","page":511,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे एकविंशोऽध्यायः॥ २१॥"}],"notes":[{"id":"v1:542","mark":"१","page":506,"after_verse":"4.21.8","text":"प्रा० पा०—तदाधिरा०।"},{"id":"v1:543","mark":"२","page":506,"after_verse":"4.21.10","text":"प्रा० पा०—उपयन्ति।"}],"corrections":{"count":6,"list":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/shuddhi/"}}