{"id":"6.19","title":"षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 19","part":"षष्ठ स्कन्ध","heading":"अथैकोनविंशोऽध्यायः","topics":["पुंसवन-व्रतकी विधि"],"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/19/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 6.19.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/19/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":1,"pages":[800,804]},"verses":[{"id":"6.19.1","number":1,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/19/1/","page":801,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["व्रतं पुंसवनं ब्रह्मन् भवता यदुदीरितम्।","तस्य वेदितुमिच्छामि येन विष्णुः प्रसीदति॥ १"],"iast":["vrataṃ puṃsavanaṃ brahman bhavatā yadudīritam|","tasya veditumicchāmi yena viṣṇuḥ prasīdati|| 1"],"meaning":"राजा परीक्षित‍्ने पूछा—भगवन्! आपने अभी-अभी पुंसवन-व्रतका वर्णन किया है और कहा है कि उससे भगवान् विष्णु प्रसन्‍न हो जाते हैं। सो अब मैं उसकी विधि जानना चाहता हूँ॥ १॥"},{"id":"6.19.2","number":2,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/19/2/","page":801,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["शुक्ले मार्गशिरे पक्षे योषिद्भर्तुरनुज्ञया।","आरभेत व्रतमिदं सार्वकामिकमादितः॥ २"],"iast":["śukle mārgaśire pakṣe yoṣidbharturanujñayā|","ārabheta vratamidaṃ sārvakāmikamāditaḥ|| 2"],"meaning":"श्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित्! यह पुंसवन-व्रत समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है। स्त्रीको चाहिये कि वह अपने पतिदेवकी आज्ञा लेकर मार्गशीर्ष शुक्ल प्रतिपदासे इसका आरम्भ करे॥ २॥"},{"id":"6.19.3","number":3,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/19/3/","page":801,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["निशम्य मरुतां जन्म ब्राह्मणाननुमन्त्र्य च।","स्नात्वा शुक्लदती शुक्ले वसीतालङ्कृताम्बरे।","पूजयेत्प्रातराशात्प्राग्भगवन्तं श्रिया सह॥ ३"],"iast":["niśamya marutāṃ janma brāhmaṇānanumantrya ca|","snātvā śukladatī śukle vasītālaṅkṛtāmbare|","pūjayetprātarāśātprāgbhagavantaṃ śriyā saha|| 3"],"meaning":"पहले मरुद्गणके जन्मकी कथा सुनकर ब्राह्मणोंसे आज्ञा ले। फिर प्रतिदिन सबेरे दाँतुन आदिसे दाँत साफ करके स्नान करे, दो श्वेत वस्त्र धारण करे और आभूषण भी पहन ले। प्रातःकाल कुछ भी खानेसे पहले ही भगवान् लक्ष्मी-नारायणकी पूजा करे॥ ३॥"},{"id":"6.19.4","number":4,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/19/4/","page":801,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अलं ते निरपेक्षाय पूर्णकाम नमोऽस्तु ते।","महाविभूतिपतये नमः सकलसिद्धये॥ ४"],"iast":["alaṃ te nirapekṣāya pūrṇakāma namo'stu te|","mahāvibhūtipataye namaḥ sakalasiddhaye|| 4"],"meaning":"(इस प्रकार प्रार्थना करे—) ‘प्रभो! आप पूर्णकाम हैं। अतएव आपको किसीसे भी कुछ लेना-देना नहीं है। आप समस्त विभूतियोंके स्वामी और सकल-सिद्धिस्वरूप हैं। मैं आपको बार-बार नमस्कार करती हूँ॥ ४॥"},{"id":"6.19.5","number":5,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/19/5/","page":801,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यथा त्वं कृपया भूत्या तेजसा महिनौजसा।","जुष्ट ईश गुणैः सर्वैस्ततोऽसि भगवान् प्रभुः॥ ५"],"iast":["yathā tvaṃ kṛpayā bhūtyā tejasā mahinaujasā|","juṣṭa īśa guṇaiḥ sarvaistato'si bhagavān prabhuḥ|| 5"],"meaning":"मेरे आराध्यदेव! आप कृपा, विभूति, तेज, महिमा और वीर्य आदि समस्त गुणोंसे नित्ययुक्त हैं। इन्हीं भगों—ऐश्‍वर्योंसे नित्ययुक्त रहनेके कारण आपको भगवान् कहते हैं। आप सर्वशक्तिमान् हैं॥ ५॥"},{"id":"6.19.6","number":6,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/19/6/","page":801,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["विष्णुपत्नि महामाये महापुरुषलक्षणे।","प्रीयेथा मे महाभागे लोकमातर्नमोऽस्तु ते॥ ६"],"iast":["viṣṇupatni mahāmāye mahāpuruṣalakṣaṇe|","prīyethā me mahābhāge lokamātarnamo'stu te|| 6"],"meaning":"माता लक्ष्मीजी! आप भगवान्‌की अर्द्धांगिनी और महामाया-स्वरूपिणी हैं। भगवान्‌के सारे गुण आपमें निवास करते हैं। महाभाग्यवती जगन्माता! आप मुझपर प्रसन्‍न हों। मैं आपको नमस्कार करती हूँ’॥ ६॥"},{"id":"6.19.7","number":7,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/19/7/","page":801,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ॐ नमो भगवते महापुरुषाय महानुभावाय महाविभूतिपतये सह महाविभूतिभिर्बलिमुपहराणीति। अनेनाहरहर्मन्त्रेण विष्णोरावाहनार्घ्यपाद्योपस्पर्शनस्नानवासउपवीतविभूषणगन्धपुष्पधूपदीपोपहाराद्युपचारांश्‍च समाहित उपाहरेत्॥ ७॥"],"iast":["oṃ namo bhagavate mahāpuruṣāya mahānubhāvāya mahāvibhūtipataye saha mahāvibhūtibhirbalimupaharāṇīti| anenāharaharmantreṇa viṣṇorāvāhanārghyapādyopasparśanasnānavāsaüpavītavibhūṣaṇagandhapuṣpadhūpadīpopahārādyupacārāṃśca samāhita upāharet|| 7||"],"meaning":"परीक्षित्! इस प्रकार स्तुति करके एकाग्रचित्तसे ‘ॐ नमो भगवते महापुरुषाय महानुभावाय महाविभूतिपतये सह महाविभूतिभिर्बलिमुपहराणि।’ ‘ओंकारस्वरूप, महानुभाव, समस्त महाविभूतियोंके स्वामी भगवान् पुरुषोत्तमको और उनकी महाविभूतियोंको मैं नमस्कार करती हूँ और उन्हें पूजोपहारकी सामग्री समर्पण करती हूँ’—इस मन्त्रके द्वारा प्रतिदिन स्थिर चित्तसे विष्णुभगवान्का आवाहन, अर्घ्य, पाद्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, यज्ञोपवीत, आभूषण, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य आदि निवेदन करके पूजन करे॥ ७॥"},{"id":"6.19.8","number":8,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/19/8/","page":802,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["हविःशेषं तु जुहुयादनले द्वादशाहुतीः।","ॐ नमो भगवते महापुरुषाय महाविभूतिपतये स्वाहेति॥ ८"],"iast":["haviḥśeṣaṃ tu juhuyādanale dvādaśāhutīḥ|","oṃ namo bhagavate mahāpuruṣāya mahāvibhūtipataye svāheti|| 8"],"meaning":"जो नैवेद्य बच रहे, उससे ‘ॐ नमो भगवते महापुरुषाय महाविभूतिपतये स्वाहा।’ ‘महान् ऐश्‍वर्योंके अधिपति भगवान् पुरुषोत्तमको नमस्कार है। मैं उन्हींके लिये इस हविष्यका हवन कर रही हूँ।’—यह मन्त्र बोलकर अग्‍निमें बारह आहुतियाँ दे॥ ८॥"},{"id":"6.19.9","number":9,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/19/9/","page":802,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["श्रियं विष्णुं च वरदावाशिषां प्रभवावुभौ।","भक्‍त्या सम्पूजयेन्‍नित्यं यदीच्छेत्सर्वसम्पदः॥ ९"],"iast":["śriyaṃ viṣṇuṃ ca varadāvāśiṣāṃ prabhavāvubhau|","bhaktyā sampūjayennityaṃ yadīcchetsarvasampadaḥ|| 9"],"meaning":"परीक्षित्! जो सब प्रकारकी सम्पत्तियोंको प्राप्त करना चाहता हो, उसे चाहिये कि प्रतिदिन भक्तिभावसे भगवान् लक्ष्मीनारायणकी पूजा करे; क्योंकि वे ही दोनों समस्त अभिलाषाओंके पूर्ण करनेवाले एवं श्रेष्ठ वरदानी हैं॥ ९॥"},{"id":"6.19.10","number":10,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/19/10/","page":802,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["प्रणमेद्दण्डवद‍्भूमौ भक्तिप्रह्वेण चेतसा।","दशवारं जपेन्मन्त्रं ततः स्तोत्रमुदीरयेत्॥ १०"],"iast":["praṇameddaṇḍavadbhūmau bhaktiprahveṇa cetasā|","daśavāraṃ japenmantraṃ tataḥ stotramudīrayet|| 10"],"meaning":"इसके बाद भक्तिभावसे भरकर बड़ी नम्रतासे भगवान्‌को साष्टांग दण्डवत् करे। दस बार पूर्वोक्त मन्त्रका जप करे और फिर इस स्तोत्रका पाठ करे—॥ १०॥"},{"id":"6.19.11","number":11,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/19/11/","page":802,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["युवां तु विश्‍वस्य विभू जगतः कारणं परम्।","इयं हि प्रकृतिः सूक्ष्मा मायाशक्तिर्दुरत्यया॥ ११"],"iast":["yuvāṃ tu viśvasya vibhū jagataḥ kāraṇaṃ param|","iyaṃ hi prakṛtiḥ sūkṣmā māyāśaktirduratyayā|| 11"],"meaning":"‘हे लक्ष्मीनारायण! आप दोनों सर्वव्यापक और सम्पूर्ण चराचर जगत‍्के अन्तिम कारण हैं—आपका और कोई कारण नहीं है। भगवन्! माता लक्ष्मीजी आपकी मायाशक्ति हैं। ये ही स्वयं अव्यक्त प्रकृति भी हैं। इनका पार पाना अत्यन्त कठिन है॥ ११॥"},{"id":"6.19.12","number":12,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/19/12/","page":802,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तस्या अधीश्‍वरः साक्षात्त्वमेव पुरुषः परः।","त्वं सर्वयज्ञ इज्येयं क्रियेयं फलभुग्भवान्॥ १२"],"iast":["tasyā adhīśvaraḥ sākṣāttvameva puruṣaḥ paraḥ|","tvaṃ sarvayajña ijyeyaṃ kriyeyaṃ phalabhugbhavān|| 12"],"meaning":"प्रभो! आप ही इन महामायाके अधीश्‍वर हैं और आप ही स्वयं परमपुरुष हैं। आप समस्त यज्ञ हैं और ये हैं यज्ञ-क्रिया। आप फलके भोक्ता हैं और ये हैं उसको उत्पन्‍न करनेवाली क्रिया॥ १२॥"},{"id":"6.19.13","number":13,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/19/13/","page":802,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["गुणव्यक्तिरियं देवी व्यञ्जको गुणभुग्भवान्।","त्वं हि सर्वशरीर्यात्मा श्रीः शरीरेन्द्रियाशया।","नामरूपे भगवती प्रत्ययस्त्वमपाश्रयः॥ १३"],"iast":["guṇavyaktiriyaṃ devī vyañjako guṇabhugbhavān|","tvaṃ hi sarvaśarīryātmā śrīḥ śarīrendriyāśayā|","nāmarūpe bhagavatī pratyayastvamapāśrayaḥ|| 13"],"meaning":"माता लक्ष्मीजी तीनों गुणोंकी अभिव्यक्ति हैं और आप उन्हें व्यक्त करनेवाले और उनके भोक्ता हैं। आप समस्त प्राणियोंके आत्मा हैं और लक्ष्मीजी शरीर, इन्द्रिय और अन्तःकरण हैं। माता लक्ष्मीजी नाम एवं रूप हैं और आप नाम-रूप दोनोंके प्रकाशक तथा आधार हैं॥ १३॥"},{"id":"6.19.14","number":14,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/19/14/","page":802,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यथा युवां त्रिलोकस्य वरदौ परमेष्ठिनौ।","तथा म उत्तमश्लोक सन्तु सत्या महाशिषः॥ १४"],"iast":["yathā yuvāṃ trilokasya varadau parameṣṭhinau|","tathā ma uttamaśloka santu satyā mahāśiṣaḥ|| 14"],"meaning":"प्रभो! आपकी कीर्ति पवित्र है। आप दोनों ही त्रिलोकीके वरदानी परमेश्‍वर हैं। अतः मेरी बड़ी-बड़ी आशा-अभिलाषाएँ आपकी कृपासे पूर्ण हों’॥ १४॥"},{"id":"6.19.15","number":15,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/19/15/","page":803,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इत्यभिष्टूय वरदं श्रीनिवासं श्रिया सह।","तन्‍निःसार्योपहरणं दत्त्वाऽऽचमनमर्चयेत्॥ १५"],"iast":["ityabhiṣṭūya varadaṃ śrīnivāsaṃ śriyā saha|","tanniḥsāryopaharaṇaṃ dattvā''camanamarcayet|| 15"],"meaning":"परीक्षित्! इस प्रकार परम वरदानी भगवान् लक्ष्मी-नारायणकी स्तुति करके वहाँसे नैवेद्य हटा दे और आचमन कराके पूजा करे॥ १५॥"},{"id":"6.19.16","number":16,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/19/16/","page":803,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ततः स्तुवीत स्तोत्रेण भक्तिप्रह्वेण चेतसा।","यज्ञोच्छिष्टमवघ्राय पुनरभ्यर्चयेद्धरिम्॥ १६"],"iast":["tataḥ stuvīta stotreṇa bhaktiprahveṇa cetasā|","yajñocchiṣṭamavaghrāya punarabhyarcayeddharim|| 16"],"meaning":"तदनन्तर भक्तिभावभरित हृदयसे भगवान्‌की स्तुति करे और यज्ञावशेषको सूँघकर फिर भगवान्‌की पूजा करे॥ १६॥"},{"id":"6.19.17","number":17,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/19/17/","page":803,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["पतिं च परया भक्‍त्या महापुरुषचेतसा।","प्रियैस्तैस्तैरुपनमेत् प्रेमशीलः स्वयं पतिः।","बिभृयात् सर्वकर्माणि पत्न्या उच्चावचानि च॥ १७"],"iast":["patiṃ ca parayā bhaktyā mahāpuruṣacetasā|","priyaistaistairupanamet premaśīlaḥ svayaṃ patiḥ|","bibhṛyāt sarvakarmāṇi patnyā uccāvacāni ca|| 17"],"meaning":"भगवान्‌की पूजाके बाद अपने पतिको साक्षात् भगवान् समझकर परम प्रेमसे उनकी प्रिय वस्तुएँ सेवामें उपस्थित करे। पतिका भी यह कर्तव्य है कि वह आन्तरिक प्रेमसे अपनी पत्नीके प्रिय पदार्थ ला-लाकर उसे दे और उसके छोटे-बड़े सब प्रकारके काम करता रहे॥ १७॥"},{"id":"6.19.18","number":18,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/19/18/","page":803,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कृतमेकतरेणापि दम्पत्योरुभयोरपि।","पत्न्यां कुर्यादनर्हायां पतिरेतत् समाहितः॥ १८"],"iast":["kṛtamekatareṇāpi dampatyorubhayorapi|","patnyāṃ kuryādanarhāyāṃ patiretat samāhitaḥ|| 18"],"meaning":"परीक्षित्! पति-पत्नीमेंसे एक भी कोई काम करता है, तो उसका फल दोनोंको होता है। इसलिये यदि पत्‍नी (रजोधर्म आदिके समय) यह व्रत करनेके अयोग्य हो जाय तो बड़ी एकाग्रता और सावधानीसे पतिको ही इसका अनुष्ठान करना चाहिये॥ १८॥"},{"id":"6.19.19","number":19,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/19/19/","page":803,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["विष्णोर्व्रतमिदं बिभ्रन्‍न विहन्यात् कथञ्चन।","विप्रान् स्त्रियो वीरवतीः स्रग्गन्धबलिमण्डनैः।","अर्चेदहरहर्भक्‍त्या देवं नियममास्थितः॥ १९"],"iast":["viṣṇorvratamidaṃ bibhranna vihanyāt kathañcana|","viprān striyo vīravatīḥ sraggandhabalimaṇḍanaiḥ|","arcedaharaharbhaktyā devaṃ niyamamāsthitaḥ|| 19"],"meaning":"यह भगवान् विष्णुका व्रत है। इसका नियम लेकर बीचमें कभी नहीं छोड़ना चाहिये। जो भी यह नियम ग्रहण करे, वह प्रतिदिन माला, चन्दन, नैवेद्य और आभूषण आदिसे भक्तिपूर्वक ब्राह्मण और सुहागिनी स्त्रियोंका पूजन करे तथा भगवान् विष्णुकी भी पूजा करे॥ १९॥"},{"id":"6.19.20","number":20,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/19/20/","page":803,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["उद्वास्य देवं स्वे धाम्नि तन्‍निवेदितमग्रतः।","अद्यादात्मविशुद्ध्यर्थं सर्वकामर्द्धये तथा॥ २०"],"iast":["udvāsya devaṃ sve dhāmni tanniveditamagrataḥ|","adyādātmaviśuddhyarthaṃ sarvakāmarddhaye tathā|| 20"],"meaning":"इसके बाद भगवान्‌को उनके धाममें पधरा दे, विसर्जन कर दे। तदनन्तर आत्मशुद्धि और समस्त अभिलाषाओंकी पूर्तिके लिये पहलेसे ही उन्हें निवेदित किया हुआ प्रसाद ग्रहण करे॥ २०॥"},{"id":"6.19.21","number":21,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/19/21/","page":803,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एतेन पूजाविधिना मासान् द्वादश हायनम्।","नीत्वाथोपचरेत्साध्वी कार्तिके चरमेऽहनि॥ २१"],"iast":["etena pūjāvidhinā māsān dvādaśa hāyanam|","nītvāthopacaretsādhvī kārtike carame'hani|| 21"],"meaning":"साध्वी स्त्री इस विधिसे बारह महीनोंतक—पूरे सालभर इस व्रतका आचरण करके मार्गशीर्षकी अमावास्याको उद्यापनसम्बन्धी उपवास और पूजन आदि करे॥ २१॥"},{"id":"6.19.22","number":22,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/19/22/","page":803,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["श्वोभूतेऽप उपस्पृश्य कृष्णमभ्यर्च्य पूर्ववत्।","पयःशृतेन जुहुयाच्चरुणा सह सर्पिषा।","पाकयज्ञविधानेन द्वादशैवाहुतीः पतिः॥ २२"],"iast":["śvobhūte'pa upaspṛśya kṛṣṇamabhyarcya pūrvavat|","payaḥśṛtena juhuyāccaruṇā saha sarpiṣā|","pākayajñavidhānena dvādaśaivāhutīḥ patiḥ|| 22"],"meaning":"उस दिन प्रातःकाल ही स्नान करके पूर्ववत् विष्णुभगवान्का पूजन करे और उसका पति पाकयज्ञकी विधिसे घृतमिश्रित खीरकी अग्‍निमें बारह आहुति दे॥ २२॥"},{"id":"6.19.23","number":23,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/19/23/","page":803,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["आशिषः शिरसाऽऽदाय द्विजैः प्रीतैः समीरिताः।","प्रणम्य शिरसा भक्‍त्या भुञ्जीत तदनुज्ञया॥ २३"],"iast":["āśiṣaḥ śirasā''dāya dvijaiḥ prītaiḥ samīritāḥ|","praṇamya śirasā bhaktyā bhuñjīta tadanujñayā|| 23"],"meaning":"इसके बाद जब ब्राह्मण प्रसन्‍न होकर उसे आशीर्वाद दें, तो बड़े आदरसे सिर झुकाकर उन्हें स्वीकार करे। भक्तिभावसे माथा टेककर उनके चरणोंमें प्रणाम करे और उनकी आज्ञा लेकर भोजन करे॥ २३॥"},{"id":"6.19.24","number":24,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/19/24/","page":804,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["आचार्यमग्रतः कृत्वा वाग्यतः सह बन्धुभिः।","दद्यात्पत्न्यै चरोः शेषं सुप्रजस्त्वं सुसौभगम्॥ २४"],"iast":["ācāryamagrataḥ kṛtvā vāgyataḥ saha bandhubhiḥ|","dadyātpatnyai caroḥ śeṣaṃ suprajastvaṃ susaubhagam|| 24"],"meaning":"पहले आचार्यको भोजन कराये, फिर मौन होकर भाई-बन्धुओंके साथ स्वयं भोजन करे। इसके बाद हवनसे बची हुई घृतमिश्रित खीर अपनी पत्नीको दे। वह प्रसाद स्त्रीको सत्पुत्र और सौभाग्य दान करनेवाला होता है॥ २४॥"},{"id":"6.19.25","number":25,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/19/25/","page":804,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एतच्चरित्वा विधिवद्व्रतं विभो-","रभीप्सितार्थं लभते पुमानिह।","स्त्री त्वेतदास्थाय लभेत सौभगं","श्रियं प्रजां जीवपतिं यशो गृहम्॥ २५"],"iast":["etaccaritvā vidhivadvrataṃ vibho-","rabhīpsitārthaṃ labhate pumāniha|","strī tvetadāsthāya labheta saubhagaṃ","śriyaṃ prajāṃ jīvapatiṃ yaśo gṛham|| 25"],"meaning":"परीक्षित्! भगवान्‌के इस पुंसवन-व्रतका जो मनुष्य विधिपूर्वक अनुष्ठान करता है, उसे यहीं उसकी मनचाही वस्तु मिल जाती है। स्त्री इस व्रतका पालन करके सौभाग्य, सम्पत्ति, सन्तान, यश और गृह प्राप्त करती है तथा उसका पति चिरायु हो जाता है॥ २५॥"},{"id":"6.19.26","number":26,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/19/26/","page":804,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कन्या च विन्देत समग्रलक्षणं","वरं त्ववीरा हतकिल्बिषा गतिम्।","मृतप्रजा जीवसुता धनेश्‍वरी","सुदुर्भगा सुभगा रूपमग्र्यम्॥ २६"],"iast":["kanyā ca vindeta samagralakṣaṇaṃ","varaṃ tvavīrā hatakilbiṣā gatim|","mṛtaprajā jīvasutā dhaneśvarī","sudurbhagā subhagā rūpamagryam|| 26"],"meaning":"इस व्रतका अनुष्ठान करनेवाली कन्या समस्त शुभ लक्षणोंसे युक्त पति प्राप्त करती है और विधवा इस व्रतसे निष्पाप होकर वैकुण्ठमें जाती है। जिसके बच्चे मर जाते हों, वह स्त्री इसके प्रभावसे चिरायु पुत्र प्राप्त करती है। धनवती किन्तु अभागिनी स्त्रीको सौभाग्य प्राप्त होता है और कुरूपाको श्रेष्ठ रूप मिल जाता है। रोगी इस व्रतके प्रभावसे रोगमुक्त होकर बलिष्ठ शरीर और श्रेष्ठ इन्द्रियशक्ति प्राप्त कर लेता है। जो मनुष्य मांगलिक श्राद्धकर्मोंमें इसका पाठ करता है, उसके पितर और देवता अनन्त तृप्ति लाभ करते हैं॥ २६-२७॥","meaning_covers":[26,27]},{"id":"6.19.27","number":27,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/19/27/","page":804,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["विन्देद् विरूपा विरुजा विमुच्यते","य आमयावीन्द्रियकल्पदेहम्।","एतत्पठन्‍नभ्युदये च कर्म-","ण्यनन्ततृप्तिः पितृदेवतानाम्॥ २७"],"iast":["vinded virūpā virujā vimucyate","ya āmayāvīndriyakalpadeham|","etatpaṭhannabhyudaye ca karma-","ṇyanantatṛptiḥ pitṛdevatānām|| 27"],"meaning":"इस व्रतका अनुष्ठान करनेवाली कन्या समस्त शुभ लक्षणोंसे युक्त पति प्राप्त करती है और विधवा इस व्रतसे निष्पाप होकर वैकुण्ठमें जाती है। जिसके बच्चे मर जाते हों, वह स्त्री इसके प्रभावसे चिरायु पुत्र प्राप्त करती है। धनवती किन्तु अभागिनी स्त्रीको सौभाग्य प्राप्त होता है और कुरूपाको श्रेष्ठ रूप मिल जाता है। रोगी इस व्रतके प्रभावसे रोगमुक्त होकर बलिष्ठ शरीर और श्रेष्ठ इन्द्रियशक्ति प्राप्त कर लेता है। जो मनुष्य मांगलिक श्राद्धकर्मोंमें इसका पाठ करता है, उसके पितर और देवता अनन्त तृप्ति लाभ करते हैं॥ २६-२७॥","meaning_covers":[26,27]},{"id":"6.19.28","number":28,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/19/28/","page":804,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तुष्टाः प्रयच्छन्ति समस्तकामान्","होमावसाने हुतभुक् श्रीर्हरिश्‍च।","राजन् महन्मरुतां जन्म पुण्यं","दितेर्व्रतं चाभिहितं महत्ते॥ २८"],"iast":["tuṣṭāḥ prayacchanti samastakāmān","homāvasāne hutabhuk śrīrhariśca|","rājan mahanmarutāṃ janma puṇyaṃ","ditervrataṃ cābhihitaṃ mahatte|| 28"],"meaning":"वे सन्तुष्ट होकर हवनके समाप्त होनेपर व्रतीकी समस्त इच्छाएँ पूर्ण कर देते हैं। ये सब तो सन्तुष्ट होते ही हैं, समस्त यज्ञोंके एकमात्र भोक्ता भगवान् लक्ष्मीनारायण भी सन्तुष्ट हो जाते हैं और व्रतीकी समस्त अभिलाषाएँ पूर्ण कर देते हैं। परीक्षित्! मैंने तुम्हें मरुद्गणकी आदरणीय और पुण्यप्रद जन्म-कथा सुनायी और साथ ही दितिके श्रेष्ठ पुंसवन-व्रतका वर्णन भी सुना दिया॥ २८॥"}],"text":[{"b":17965,"kind":"adhyaya_heading","page":801,"text":"अथैकोनविंशोऽध्यायः"},{"b":17966,"kind":"topic_heading","page":801,"text":"पुंसवन-व्रतकी विधि"},{"b":17967,"kind":"topic_heading","page":801,"text":"राजोवाच"},{"b":17968,"kind":"sanskrit_shloka","page":801,"verses":["6.19.1"],"text":"व्रतं पुंसवनं ब्रह्मन् भवता यदुदीरितम्।"},{"b":17969,"kind":"sanskrit_shloka","page":801,"verses":["6.19.1"],"text":"तस्य वेदितुमिच्छामि येन विष्णुः प्रसीदति॥ १"},{"b":17970,"kind":"hindi_commentary","page":801,"explains":["6.19.1"],"text":"राजा परीक्षित‍्ने पूछा—भगवन्! आपने अभी-अभी पुंसवन-व्रतका वर्णन किया है और कहा है कि उससे भगवान् विष्णु प्रसन्‍न हो जाते हैं। सो अब मैं उसकी विधि जानना चाहता हूँ॥ १॥"},{"b":17971,"kind":"topic_heading","page":800,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":17972,"kind":"sanskrit_shloka","page":801,"verses":["6.19.2"],"text":"शुक्ले मार्गशिरे पक्षे योषिद्भर्तुरनुज्ञया।"},{"b":17973,"kind":"sanskrit_shloka","page":801,"verses":["6.19.2"],"text":"आरभेत व्रतमिदं सार्वकामिकमादितः॥ २"},{"b":17974,"kind":"sanskrit_shloka","page":801,"verses":["6.19.3"],"text":"निशम्य मरुतां जन्म ब्राह्मणाननुमन्त्र्य च।"},{"b":17975,"kind":"sanskrit_shloka","page":801,"verses":["6.19.3"],"text":"स्नात्वा शुक्लदती शुक्ले वसीतालङ्कृताम्बरे।"},{"b":17976,"kind":"sanskrit_shloka","page":801,"verses":["6.19.3"],"text":"पूजयेत्प्रातराशात्प्राग्भगवन्तं श्रिया सह॥ ३"},{"b":17977,"kind":"sanskrit_shloka","page":801,"verses":["6.19.4"],"text":"अलं ते निरपेक्षाय पूर्णकाम नमोऽस्तु ते।"},{"b":17978,"kind":"sanskrit_shloka","page":801,"verses":["6.19.4"],"text":"महाविभूतिपतये नमः सकलसिद्धये॥ ४"},{"b":17979,"kind":"sanskrit_shloka","page":801,"verses":["6.19.5"],"text":"यथा त्वं कृपया भूत्या तेजसा महिनौजसा।"},{"b":17980,"kind":"sanskrit_shloka","page":801,"verses":["6.19.5"],"text":"जुष्ट ईश गुणैः सर्वैस्ततोऽसि भगवान् प्रभुः॥ ५"},{"b":17981,"kind":"sanskrit_shloka","page":801,"verses":["6.19.6"],"text":"विष्णुपत्नि महामाये महापुरुषलक्षणे।"},{"b":17982,"kind":"sanskrit_shloka","page":801,"verses":["6.19.6"],"text":"प्रीयेथा मे महाभागे लोकमातर्नमोऽस्तु ते॥ ६"},{"b":17983,"kind":"hindi_commentary","page":801,"explains":["6.19.2","6.19.3","6.19.4","6.19.5","6.19.6"],"text":"श्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित्! यह पुंसवन-व्रत समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है। स्त्रीको चाहिये कि वह अपने पतिदेवकी आज्ञा लेकर मार्गशीर्ष शुक्ल प्रतिपदासे इसका आरम्भ करे॥ २॥ पहले मरुद्गणके जन्मकी कथा सुनकर ब्राह्मणोंसे आज्ञा ले। फिर प्रतिदिन सबेरे दाँतुन आदिसे दाँत साफ करके स्नान करे, दो श्वेत वस्त्र धारण करे और आभूषण भी पहन ले। प्रातःकाल कुछ भी खानेसे पहले ही भगवान् लक्ष्मी-नारायणकी पूजा करे॥ ३॥ (इस प्रकार प्रार्थना करे—) ‘प्रभो! आप पूर्णकाम हैं। अतएव आपको किसीसे भी कुछ लेना-देना नहीं है। आप समस्त विभूतियोंके स्वामी और सकल-सिद्धिस्वरूप हैं। मैं आपको बार-बार नमस्कार करती हूँ॥ ४॥ मेरे आराध्यदेव! आप कृपा, विभूति, तेज, महिमा और वीर्य आदि समस्त गुणोंसे नित्ययुक्त हैं। इन्हीं भगों—ऐश्‍वर्योंसे नित्ययुक्त रहनेके कारण आपको भगवान् कहते हैं। आप सर्वशक्तिमान् हैं॥ ५॥ माता लक्ष्मीजी! आप भगवान्‌की अर्द्धांगिनी और महामाया-स्वरूपिणी हैं। भगवान्‌के सारे गुण आपमें निवास करते हैं। महाभाग्यवती जगन्माता! आप मुझपर प्रसन्‍न हों। मैं आपको नमस्कार करती हूँ’॥ ६॥"},{"b":17984,"kind":"hindi_translation","page":801,"verses":["6.19.7"],"text":"ॐ नमो भगवते महापुरुषाय महानुभावाय महाविभूतिपतये सह महाविभूतिभिर्बलिमुपहराणीति। अनेनाहरहर्मन्त्रेण विष्णोरावाहनार्घ्यपाद्योपस्पर्शनस्नानवासउपवीतविभूषणगन्धपुष्पधूपदीपोपहाराद्युपचारांश्‍च समाहित उपाहरेत्॥ ७॥"},{"b":17985,"kind":"hindi_commentary","page":801,"explains":["6.19.7"],"text":"परीक्षित्! इस प्रकार स्तुति करके एकाग्रचित्तसे ‘ॐ नमो भगवते महापुरुषाय महानुभावाय महाविभूतिपतये सह महाविभूतिभिर्बलिमुपहराणि।’ ‘ओंकारस्वरूप, महानुभाव, समस्त महाविभूतियोंके स्वामी भगवान् पुरुषोत्तमको और उनकी महाविभूतियोंको मैं नमस्कार करती हूँ और उन्हें पूजोपहारकी सामग्री समर्पण करती हूँ’—इस मन्त्रके द्वारा प्रतिदिन स्थिर चित्तसे विष्णुभगवान्का आवाहन, अर्घ्य, पाद्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, यज्ञोपवीत, आभूषण, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य आदि निवेदन करके पूजन करे॥ ७॥"},{"b":17986,"kind":"sanskrit_shloka","page":802,"verses":["6.19.8"],"text":"हविःशेषं तु जुहुयादनले द्वादशाहुतीः।"},{"b":17987,"kind":"sanskrit_shloka","page":802,"verses":["6.19.8"],"text":"ॐ नमो भगवते महापुरुषाय महाविभूतिपतये स्वाहेति॥ ८"},{"b":17988,"kind":"hindi_commentary","page":802,"explains":["6.19.8"],"text":"जो नैवेद्य बच रहे, उससे ‘ॐ नमो भगवते महापुरुषाय महाविभूतिपतये स्वाहा।’ ‘महान् ऐश्‍वर्योंके अधिपति भगवान् पुरुषोत्तमको नमस्कार है। मैं उन्हींके लिये इस हविष्यका हवन कर रही हूँ।’—यह मन्त्र बोलकर अग्‍निमें बारह आहुतियाँ दे॥ ८॥"},{"b":17989,"kind":"sanskrit_shloka","page":802,"verses":["6.19.9"],"text":"श्रियं विष्णुं च वरदावाशिषां प्रभवावुभौ।"},{"b":17990,"kind":"sanskrit_shloka","page":802,"verses":["6.19.9"],"text":"भक्‍त्या सम्पूजयेन्‍नित्यं यदीच्छेत्सर्वसम्पदः॥ ९"},{"b":17991,"kind":"hindi_commentary","page":802,"explains":["6.19.9"],"text":"परीक्षित्! जो सब प्रकारकी सम्पत्तियोंको प्राप्त करना चाहता हो, उसे चाहिये कि प्रतिदिन भक्तिभावसे भगवान् लक्ष्मीनारायणकी पूजा करे; क्योंकि वे ही दोनों समस्त अभिलाषाओंके पूर्ण करनेवाले एवं श्रेष्ठ वरदानी हैं॥ ९॥"},{"b":17992,"kind":"sanskrit_shloka","page":802,"verses":["6.19.10"],"text":"प्रणमेद्दण्डवद‍्भूमौ भक्तिप्रह्वेण चेतसा।"},{"b":17993,"kind":"sanskrit_shloka","page":802,"verses":["6.19.10"],"text":"दशवारं जपेन्मन्त्रं ततः स्तोत्रमुदीरयेत्॥ १०"},{"b":17994,"kind":"hindi_translation","page":802,"explains":["6.19.10"],"text":"इसके बाद भक्तिभावसे भरकर बड़ी नम्रतासे भगवान्‌को साष्टांग दण्डवत् करे। दस बार पूर्वोक्त मन्त्रका जप करे और फिर इस स्तोत्रका पाठ करे—॥ १०॥"},{"b":17995,"kind":"sanskrit_shloka","page":802,"verses":["6.19.11"],"text":"युवां तु विश्‍वस्य विभू जगतः कारणं परम्।"},{"b":17996,"kind":"sanskrit_shloka","page":802,"verses":["6.19.11"],"text":"इयं हि प्रकृतिः सूक्ष्मा मायाशक्तिर्दुरत्यया॥ ११"},{"b":17997,"kind":"hindi_translation","page":802,"explains":["6.19.11"],"text":"‘हे लक्ष्मीनारायण! आप दोनों सर्वव्यापक और सम्पूर्ण चराचर जगत‍्के अन्तिम कारण हैं—आपका और कोई कारण नहीं है। भगवन्! माता लक्ष्मीजी आपकी मायाशक्ति हैं। ये ही स्वयं अव्यक्त प्रकृति भी हैं। इनका पार पाना अत्यन्त कठिन है॥ ११॥"},{"b":17998,"kind":"sanskrit_shloka","page":802,"verses":["6.19.12"],"text":"तस्या अधीश्‍वरः साक्षात्त्वमेव पुरुषः परः।"},{"b":17999,"kind":"sanskrit_shloka","page":802,"verses":["6.19.12"],"text":"त्वं सर्वयज्ञ इज्येयं क्रियेयं फलभुग्भवान्॥ १२"},{"b":18000,"kind":"hindi_translation","page":802,"explains":["6.19.12"],"text":"प्रभो! आप ही इन महामायाके अधीश्‍वर हैं और आप ही स्वयं परमपुरुष हैं। आप समस्त यज्ञ हैं और ये हैं यज्ञ-क्रिया। आप फलके भोक्ता हैं और ये हैं उसको उत्पन्‍न करनेवाली क्रिया॥ १२॥"},{"b":18001,"kind":"sanskrit_shloka","page":802,"verses":["6.19.13"],"text":"गुणव्यक्तिरियं देवी व्यञ्जको गुणभुग्भवान्।"},{"b":18002,"kind":"sanskrit_shloka","page":802,"verses":["6.19.13"],"text":"त्वं हि सर्वशरीर्यात्मा श्रीः शरीरेन्द्रियाशया।"},{"b":18003,"kind":"sanskrit_shloka","page":802,"verses":["6.19.13"],"text":"नामरूपे भगवती प्रत्ययस्त्वमपाश्रयः॥ १३"},{"b":18004,"kind":"hindi_translation","page":802,"explains":["6.19.13"],"text":"माता लक्ष्मीजी तीनों गुणोंकी अभिव्यक्ति हैं और आप उन्हें व्यक्त करनेवाले और उनके भोक्ता हैं। आप समस्त प्राणियोंके आत्मा हैं और लक्ष्मीजी शरीर, इन्द्रिय और अन्तःकरण हैं। माता लक्ष्मीजी नाम एवं रूप हैं और आप नाम-रूप दोनोंके प्रकाशक तथा आधार हैं॥ १३॥"},{"b":18005,"kind":"sanskrit_shloka","page":802,"verses":["6.19.14"],"text":"यथा युवां त्रिलोकस्य वरदौ परमेष्ठिनौ।"},{"b":18006,"kind":"sanskrit_shloka","page":802,"verses":["6.19.14"],"text":"तथा म उत्तमश्लोक सन्तु सत्या महाशिषः॥ १४"},{"b":18007,"kind":"hindi_translation","page":802,"explains":["6.19.14"],"text":"प्रभो! आपकी कीर्ति पवित्र है। आप दोनों ही त्रिलोकीके वरदानी परमेश्‍वर हैं। अतः मेरी बड़ी-बड़ी आशा-अभिलाषाएँ आपकी कृपासे पूर्ण हों’॥ १४॥"},{"b":18008,"kind":"sanskrit_shloka","page":803,"verses":["6.19.15"],"text":"इत्यभिष्टूय वरदं श्रीनिवासं श्रिया सह।"},{"b":18009,"kind":"sanskrit_shloka","page":803,"verses":["6.19.15"],"text":"तन्‍निःसार्योपहरणं दत्त्वाऽऽचमनमर्चयेत्॥ १५"},{"b":18010,"kind":"sanskrit_shloka","page":803,"verses":["6.19.16"],"text":"ततः स्तुवीत स्तोत्रेण भक्तिप्रह्वेण चेतसा।"},{"b":18011,"kind":"sanskrit_shloka","page":803,"verses":["6.19.16"],"text":"यज्ञोच्छिष्टमवघ्राय पुनरभ्यर्चयेद्धरिम्॥ १६"},{"b":18012,"kind":"sanskrit_shloka","page":803,"verses":["6.19.17"],"text":"पतिं च परया भक्‍त्या महापुरुषचेतसा।"},{"b":18013,"kind":"sanskrit_shloka","page":803,"verses":["6.19.17"],"text":"प्रियैस्तैस्तैरुपनमेत् प्रेमशीलः स्वयं पतिः।"},{"b":18014,"kind":"sanskrit_shloka","page":803,"verses":["6.19.17"],"text":"बिभृयात् सर्वकर्माणि पत्न्या उच्चावचानि च॥ १७"},{"b":18015,"kind":"sanskrit_shloka","page":803,"verses":["6.19.18"],"text":"कृतमेकतरेणापि दम्पत्योरुभयोरपि।"},{"b":18016,"kind":"sanskrit_shloka","page":803,"verses":["6.19.18"],"text":"पत्न्यां कुर्यादनर्हायां पतिरेतत् समाहितः॥ १८"},{"b":18017,"kind":"sanskrit_shloka","page":803,"verses":["6.19.19"],"text":"विष्णोर्व्रतमिदं बिभ्रन्‍न विहन्यात् कथञ्चन।"},{"b":18018,"kind":"sanskrit_shloka","page":803,"verses":["6.19.19"],"text":"विप्रान् स्त्रियो वीरवतीः स्रग्गन्धबलिमण्डनैः।"},{"b":18019,"kind":"sanskrit_shloka","page":803,"verses":["6.19.19"],"text":"अर्चेदहरहर्भक्‍त्या देवं नियममास्थितः॥ १९"},{"b":18020,"kind":"sanskrit_shloka","page":803,"verses":["6.19.20"],"text":"उद्वास्य देवं स्वे धाम्नि तन्‍निवेदितमग्रतः।"},{"b":18021,"kind":"sanskrit_shloka","page":803,"verses":["6.19.20"],"text":"अद्यादात्मविशुद्ध्यर्थं सर्वकामर्द्धये तथा॥ २०"},{"b":18022,"kind":"hindi_translation","page":802,"explains":["6.19.15","6.19.16","6.19.17","6.19.18","6.19.19","6.19.20"],"text":"परीक्षित्! इस प्रकार परम वरदानी भगवान् लक्ष्मी-नारायणकी स्तुति करके वहाँसे नैवेद्य हटा दे और आचमन कराके पूजा करे॥ १५॥ तदनन्तर भक्तिभावभरित हृदयसे भगवान्‌की स्तुति करे और यज्ञावशेषको सूँघकर फिर भगवान्‌की पूजा करे॥ १६॥ भगवान्‌की पूजाके बाद अपने पतिको साक्षात् भगवान् समझकर परम प्रेमसे उनकी प्रिय वस्तुएँ सेवामें उपस्थित करे। पतिका भी यह कर्तव्य है कि वह आन्तरिक प्रेमसे अपनी पत्नीके प्रिय पदार्थ ला-लाकर उसे दे और उसके छोटे-बड़े सब प्रकारके काम करता रहे॥ १७॥ परीक्षित्! पति-पत्नीमेंसे एक भी कोई काम करता है, तो उसका फल दोनोंको होता है। इसलिये यदि पत्‍नी (रजोधर्म आदिके समय) यह व्रत करनेके अयोग्य हो जाय तो बड़ी एकाग्रता और सावधानीसे पतिको ही इसका अनुष्ठान करना चाहिये॥ १८॥ यह भगवान् विष्णुका व्रत है। इसका नियम लेकर बीचमें कभी नहीं छोड़ना चाहिये। जो भी यह नियम ग्रहण करे, वह प्रतिदिन माला, चन्दन, नैवेद्य और आभूषण आदिसे भक्तिपूर्वक ब्राह्मण और सुहागिनी स्त्रियोंका पूजन करे तथा भगवान् विष्णुकी भी पूजा करे॥ १९॥ इसके बाद भगवान्‌को उनके धाममें पधरा दे, विसर्जन कर दे। तदनन्तर आत्मशुद्धि और समस्त अभिलाषाओंकी पूर्तिके लिये पहलेसे ही उन्हें निवेदित किया हुआ प्रसाद ग्रहण करे॥ २०॥"},{"b":18023,"kind":"sanskrit_shloka","page":803,"verses":["6.19.21"],"text":"एतेन पूजाविधिना मासान् द्वादश हायनम्।"},{"b":18024,"kind":"sanskrit_shloka","page":803,"verses":["6.19.21"],"text":"नीत्वाथोपचरेत्साध्वी कार्तिके चरमेऽहनि॥ २१"},{"b":18025,"kind":"sanskrit_shloka","page":803,"verses":["6.19.22"],"text":"श्वोभूतेऽप उपस्पृश्य कृष्णमभ्यर्च्य पूर्ववत्।"},{"b":18026,"kind":"sanskrit_shloka","page":803,"verses":["6.19.22"],"text":"पयःशृतेन जुहुयाच्चरुणा सह सर्पिषा।"},{"b":18027,"kind":"sanskrit_shloka","page":803,"verses":["6.19.22"],"text":"पाकयज्ञविधानेन द्वादशैवाहुतीः पतिः॥ २२"},{"b":18028,"kind":"hindi_translation","page":803,"explains":["6.19.21","6.19.22"],"text":"साध्वी स्त्री इस विधिसे बारह महीनोंतक—पूरे सालभर इस व्रतका आचरण करके मार्गशीर्षकी अमावास्याको उद्यापनसम्बन्धी उपवास और पूजन आदि करे॥ २१॥ उस दिन प्रातःकाल ही स्नान करके पूर्ववत् विष्णुभगवान्का पूजन करे और उसका पति पाकयज्ञकी विधिसे घृतमिश्रित खीरकी अग्‍निमें बारह आहुति दे॥ २२॥"},{"b":18029,"kind":"sanskrit_shloka","page":803,"verses":["6.19.23"],"text":"आशिषः शिरसाऽऽदाय द्विजैः प्रीतैः समीरिताः।"},{"b":18030,"kind":"sanskrit_shloka","page":803,"verses":["6.19.23"],"text":"प्रणम्य शिरसा भक्‍त्या भुञ्जीत तदनुज्ञया॥ २३"},{"b":18031,"kind":"hindi_translation","page":803,"explains":["6.19.23"],"text":"इसके बाद जब ब्राह्मण प्रसन्‍न होकर उसे आशीर्वाद दें, तो बड़े आदरसे सिर झुकाकर उन्हें स्वीकार करे। भक्तिभावसे माथा टेककर उनके चरणोंमें प्रणाम करे और उनकी आज्ञा लेकर भोजन करे॥ २३॥"},{"b":18032,"kind":"sanskrit_shloka","page":804,"verses":["6.19.24"],"text":"आचार्यमग्रतः कृत्वा वाग्यतः सह बन्धुभिः।"},{"b":18033,"kind":"sanskrit_shloka","page":804,"verses":["6.19.24"],"text":"दद्यात्पत्न्यै चरोः शेषं सुप्रजस्त्वं सुसौभगम्॥ २४"},{"b":18034,"kind":"hindi_translation","page":804,"explains":["6.19.24"],"text":"पहले आचार्यको भोजन कराये, फिर मौन होकर भाई-बन्धुओंके साथ स्वयं भोजन करे। इसके बाद हवनसे बची हुई घृतमिश्रित खीर अपनी पत्नीको दे। वह प्रसाद स्त्रीको सत्पुत्र और सौभाग्य दान करनेवाला होता है॥ २४॥"},{"b":18035,"kind":"sanskrit_shloka","page":804,"verses":["6.19.25"],"text":"एतच्चरित्वा विधिवद्व्रतं विभो-"},{"b":18036,"kind":"sanskrit_shloka","page":804,"verses":["6.19.25"],"text":"रभीप्सितार्थं लभते पुमानिह।"},{"b":18037,"kind":"sanskrit_shloka","page":804,"verses":["6.19.25"],"text":"स्त्री त्वेतदास्थाय लभेत सौभगं"},{"b":18038,"kind":"sanskrit_shloka","page":804,"verses":["6.19.25"],"text":"श्रियं प्रजां जीवपतिं यशो गृहम्॥ २५"},{"b":18039,"kind":"sanskrit_shloka","page":804,"verses":["6.19.26"],"text":"कन्या च विन्देत समग्रलक्षणं"},{"b":18040,"kind":"sanskrit_shloka","page":804,"verses":["6.19.26"],"text":"वरं त्ववीरा हतकिल्बिषा गतिम्।"},{"b":18041,"kind":"sanskrit_shloka","page":804,"verses":["6.19.26"],"text":"मृतप्रजा जीवसुता धनेश्‍वरी"},{"b":18042,"kind":"sanskrit_shloka","page":804,"verses":["6.19.26"],"text":"सुदुर्भगा सुभगा रूपमग्र्यम्॥ २६"},{"b":18043,"kind":"sanskrit_shloka","page":804,"verses":["6.19.27"],"text":"विन्देद् विरूपा विरुजा विमुच्यते"},{"b":18044,"kind":"sanskrit_shloka","page":804,"verses":["6.19.27"],"text":"य आमयावीन्द्रियकल्पदेहम्।"},{"b":18045,"kind":"sanskrit_shloka","page":804,"verses":["6.19.27"],"text":"एतत्पठन्‍नभ्युदये च कर्म-"},{"b":18046,"kind":"sanskrit_shloka","page":804,"verses":["6.19.27"],"text":"ण्यनन्ततृप्तिः पितृदेवतानाम्॥ २७"},{"b":18047,"kind":"sanskrit_shloka","page":804,"verses":["6.19.28"],"text":"तुष्टाः प्रयच्छन्ति समस्तकामान्"},{"b":18048,"kind":"sanskrit_shloka","page":804,"verses":["6.19.28"],"text":"होमावसाने हुतभुक् श्रीर्हरिश्‍च।"},{"b":18049,"kind":"sanskrit_shloka","page":804,"verses":["6.19.28"],"text":"राजन् महन्मरुतां जन्म पुण्यं"},{"b":18050,"kind":"sanskrit_shloka","page":804,"verses":["6.19.28"],"text":"दितेर्व्रतं चाभिहितं महत्ते॥ २८"},{"b":18051,"kind":"hindi_commentary","page":804,"explains":["6.19.25","6.19.26","6.19.27","6.19.28"],"text":"परीक्षित्! भगवान्‌के इस पुंसवन-व्रतका जो मनुष्य विधिपूर्वक अनुष्ठान करता है, उसे यहीं उसकी मनचाही वस्तु मिल जाती है। स्त्री इस व्रतका पालन करके सौभाग्य, सम्पत्ति, सन्तान, यश और गृह प्राप्त करती है तथा उसका पति चिरायु हो जाता है॥ २५॥ इस व्रतका अनुष्ठान करनेवाली कन्या समस्त शुभ लक्षणोंसे युक्त पति प्राप्त करती है और विधवा इस व्रतसे निष्पाप होकर वैकुण्ठमें जाती है। जिसके बच्चे मर जाते हों, वह स्त्री इसके प्रभावसे चिरायु पुत्र प्राप्त करती है। धनवती किन्तु अभागिनी स्त्रीको सौभाग्य प्राप्त होता है और कुरूपाको श्रेष्ठ रूप मिल जाता है। रोगी इस व्रतके प्रभावसे रोगमुक्त होकर बलिष्ठ शरीर और श्रेष्ठ इन्द्रियशक्ति प्राप्त कर लेता है। जो मनुष्य मांगलिक श्राद्धकर्मोंमें इसका पाठ करता है, उसके पितर और देवता अनन्त तृप्ति लाभ करते हैं॥ २६-२७॥ वे सन्तुष्ट होकर हवनके समाप्त होनेपर व्रतीकी समस्त इच्छाएँ पूर्ण कर देते हैं। ये सब तो सन्तुष्ट होते ही हैं, समस्त यज्ञोंके एकमात्र भोक्ता भगवान् लक्ष्मीनारायण भी सन्तुष्ट हो जाते हैं और व्रतीकी समस्त अभिलाषाएँ पूर्ण कर देते हैं। परीक्षित्! मैंने तुम्हें मरुद्गणकी आदरणीय और पुण्यप्रद जन्म-कथा सुनायी और साथ ही दितिके श्रेष्ठ पुंसवन-व्रतका वर्णन भी सुना दिया॥ २८॥"},{"b":18052,"kind":"hindi_translation","page":804,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे वैयासिक्यामष्टादशसाहस्र्यां पारमहंस्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे पुंसवनव्रतकथनं नामैकोनविंशोऽध्यायः॥ १९॥"},{"b":18053,"kind":"hindi_commentary","page":804,"text":"इति षष्ठः स्कन्धः समाप्तः।"},{"b":18054,"kind":"hindi_commentary","page":804,"text":"॥ हरिः ॐ तत्सत्॥"}],"notes":[],"corrections":{"count":7,"list":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/shuddhi/"}}