{"id":"9.16","title":"नवम स्कन्ध · अध्याय 16","part":"नवम स्कन्ध","heading":"अथ षोडशोऽध्यायः","topics":["परशुरामजीके द्वारा क्षत्रियसंहार और विश्‍वामित्रजीके वंशकी कथा"],"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/16/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 9.16.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/16/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[80,84]},"verses":[{"id":"9.16.1","number":1,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/16/1/","page":80,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["पित्रोपशिक्षितो रामस्तथेति कुरुनन्दन।","संवत्सरं तीर्थयात्रां चरित्वाऽऽश्रममाव्रजत्॥ १"],"iast":["pitropaśikṣito rāmastatheti kurunandana|","saṃvatsaraṃ tīrthayātrāṃ caritvā''śramamāvrajat|| 1"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! अपने पिताकी यह शिक्षा भगवान् परशुरामने ‘जो आज्ञा’ कहकर स्वीकार की। इसके बाद वे एक वर्षतक तीर्थयात्रा करके अपने आश्रमपर लौट आये॥ १॥"},{"id":"9.16.2","number":2,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/16/2/","page":80,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कदाचिद् रेणुका याता गंगायां पद्ममालिनम्।","गन्धर्वराजं क्रीडन्तमप्सरोभिरपश्यत॥ २"],"iast":["kadācid reṇukā yātā gaṃgāyāṃ padmamālinam|","gandharvarājaṃ krīḍantamapsarobhirapaśyata|| 2"],"meaning":"एक दिनकी बात है, परशुरामजीकी माता रेणुका गंगातटपर गयी हुई थीं। वहाँ उन्होंने देखा कि गन्धर्वराज चित्ररथ कमलोंकी माला पहने अप्सराओंके साथ विहार कर रहा है॥ २॥"},{"id":"9.16.3","number":3,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/16/3/","page":80,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["विलोकयन्ती क्रीडन्तमुदकार्थं नदीं गता।","होमवेलां न सस्मार किंचिच्चित्ररथस्पृहा॥ ३"],"iast":["vilokayantī krīḍantamudakārthaṃ nadīṃ gatā|","homavelāṃ na sasmāra kiṃciccitrarathaspṛhā|| 3"],"meaning":"वे जल लानेके लिये नदीतटपर गयी थीं, परन्तु वहाँ जलक्रीडा करते हुए गन्धर्वको देखने लगीं और पतिदेवके हवनका समय हो गया है—इस बातको भूल गयीं। उनका मन कुछ-कुछ चित्ररथकी ओर खिंच भी गया था॥ ३॥"},{"id":"9.16.4","number":4,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/16/4/","page":80,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कालात्ययं तं विलोक्य मुनेः शापविशंकिता।","आगत्य कलशं तस्थौ पुरोधाय कृतांजलिः॥ ४"],"iast":["kālātyayaṃ taṃ vilokya muneḥ śāpaviśaṃkitā|","āgatya kalaśaṃ tasthau purodhāya kṛtāṃjaliḥ|| 4"],"meaning":"हवनका समय बीत गया, यह जानकर वे महर्षि जमदग्‍निके शापसे भयभीत हो गयीं और तुरंत वहाँसे आश्रमपर चली आयीं। वहाँ जलका कलश महर्षिके सामने रखकर हाथ जोड़ खड़ी हो गयीं॥ ४॥"},{"id":"9.16.5","number":5,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/16/5/","page":80,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["व्यभिचारं मुनिर्ज्ञात्वा पत्‍न्याः प्रकुपितोऽब्रवीत्।","घ्नतैनां पुत्रकाः पापामित्युक्तास्ते न चक्रिरे॥ ५"],"iast":["vyabhicāraṃ munirjñātvā patnyāḥ prakupito'bravīt|","ghnataināṃ putrakāḥ pāpāmityuktāste na cakrire|| 5"],"meaning":"जमदग्‍नि मुनिने अपनी पत्‍नीका मानसिक व्यभिचार जान लिया और क्रोध करके कहा—‘मेरे पुत्रो! इस पापिनीको मार डालो।’ परन्तु उनके किसी भी पुत्रने उनकी वह आज्ञा स्वीकार नहीं की॥ ५॥"},{"id":"9.16.6","number":6,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/16/6/","page":80,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["रामः संचोदितः पित्रा भ्रातॄन् मात्रा सहावधीत्।","प्रभावज्ञो मुनेः सम्यक् समाधेस्तपसश्‍च सः॥ ६"],"iast":["rāmaḥ saṃcoditaḥ pitrā bhrātṝn mātrā sahāvadhīt|","prabhāvajño muneḥ samyak samādhestapasaśca saḥ|| 6"],"meaning":"इसके बाद पिताकी आज्ञासे परशुरामजीने माताके साथ सब भाइयोंको भी मार डाला। इसका कारण था। वे अपने पिताजीके योग और तपस्याका प्रभाव भलीभाँति जानते थे॥ ६॥"},{"id":"9.16.7","number":7,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/16/7/","page":81,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["वरेणच्छन्दयामास प्रीतः सत्यवतीसुतः।","वव्रे हतानां रामोऽपि जीवितं चास्मृतिं वधे॥ ७"],"iast":["vareṇacchandayāmāsa prītaḥ satyavatīsutaḥ|","vavre hatānāṃ rāmo'pi jīvitaṃ cāsmṛtiṃ vadhe|| 7"],"meaning":"परशुरामजीके इस कामसे सत्यवतीनन्दन महर्षि जमदग्‍नि बहुत प्रसन्‍न हुए और उन्होंने कहा—‘बेटा! तुम्हारी जो इच्छा हो, वर माँग लो।’ परशुरामजीने कहा—‘पिताजी! मेरी माता और सब भाई जीवित हो जायँ तथा उन्हें इस बातकी याद न रहे कि मैंने उन्हें मारा था’॥ ७॥"},{"id":"9.16.8","number":8,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/16/8/","page":81,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["उत्तस्थुस्ते कुशलिनो निद्रापाय इवांजसा।","पितुर्विद्वांस्तपोवीर्यं रामश्‍चक्रे सुहृद्वधम्॥ ८"],"iast":["uttasthuste kuśalino nidrāpāya ivāṃjasā|","piturvidvāṃstapovīryaṃ rāmaścakre suhṛdvadham|| 8"],"meaning":"परशुरामजीके इस प्रकार कहते ही जैसे कोई सोकर उठे, सब-के-सब अनायास ही सकुशल उठ बैठे। परशुरामजीने अपने पिताजीका तपो-बल जानकर ही तो अपने सुहृदोंका वध किया था॥ ८॥"},{"id":"9.16.9","number":9,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/16/9/","page":81,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["येऽर्जुनस्य सुता राजन् स्मरन्तः स्वपितुर्वधम्।","रामवीर्यपराभूता लेभिरे शर्म न क्‍वचित्॥ ९"],"iast":["ye'rjunasya sutā rājan smarantaḥ svapiturvadham|","rāmavīryaparābhūtā lebhire śarma na kvacit|| 9"],"meaning":"परीक्षित्! सहस्रबाहु अर्जुनके जो लड़के परशुरामजीसे हारकर भाग गये थे, उन्हें अपने पिताके वधकी याद निरन्तर बनी रहती थी। कहीं एक क्षणके लिये भी उन्हें चैन नहीं मिलता था॥ ९॥"},{"id":"9.16.10","number":10,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/16/10/","page":81,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एकदाऽऽश्रमतो रामे सभ्रातरि वनं गते।","वैरं सिसाधयिषवो लब्धच्छिद्रा उपागमन्॥ १०"],"iast":["ekadā''śramato rāme sabhrātari vanaṃ gate|","vairaṃ sisādhayiṣavo labdhacchidrā upāgaman|| 10"],"meaning":"एक दिनकी बात है, परशुरामजी अपने भाइयोंके साथ आश्रमसे बाहर वनकी ओर गये हुए थे। यह अवसर पाकर वैर साधनेके लिये सहस्रबाहुके लड़के वहाँ आ पहुँचे॥ १०॥"},{"id":"9.16.11","number":11,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/16/11/","page":81,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["दृष्ट्वा‌ग्‍न्यगार आसीनमावेशितधियं मुनिम्।","भगवत्युत्तमश्‍लोके जघ्नुस्ते पापनिश्‍चयाः॥ ११"],"iast":["dṛṣṭvāgnyagāra āsīnamāveśitadhiyaṃ munim|","bhagavatyuttamaśloke jaghnuste pāpaniścayāḥ|| 11"],"meaning":"उस समय महर्षि जमदग्‍नि अग्‍निशालामें बैठे हुए थे और अपनी समस्त वृत्तियोंसे पवित्रकीर्ति भगवान्‌के ही चिन्तनमें म‌ग्‍न हो रहे थे। उन्हें बाहरकी कोई सुध न थी। उसी समय उन पापियोंने जमदग्‍नि ऋषिको मार डाला। उन्होंने पहलेसे ही ऐसा पापपूर्ण निश्‍चय कर रखा था॥ ११॥"},{"id":"9.16.12","number":12,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/16/12/","page":81,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["याच्यमानाः कृपणया राममात्रातिदारुणाः।","प्रसह्य शिर उत्कृत्य निन्युस्ते क्षत्रबन्धवः॥ १२"],"iast":["yācyamānāḥ kṛpaṇayā rāmamātrātidāruṇāḥ|","prasahya śira utkṛtya ninyuste kṣatrabandhavaḥ|| 12"],"meaning":"परशुरामकी माता रेणुका बड़ी दीनतासे उनसे प्रार्थना कर रही थीं, परन्तु उन सबोंने उनकी एक न सुनी। वे बलपूर्वक महर्षि जमदग्‍निका सिर काटकर ले गये। परीक्षित्! वास्तवमें वे नीच क्षत्रिय अत्यन्त क्रूर थे॥ १२॥"},{"id":"9.16.13","number":13,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/16/13/","page":81,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["रेणुका दुःखशोकार्ता निघ्नन्त्यात्मानमात्मना।","राम रामेहि तातेति विचुक्रोशोच्चकैः सती॥ १३"],"iast":["reṇukā duḥkhaśokārtā nighnantyātmānamātmanā|","rāma rāmehi tāteti vicukrośoccakaiḥ satī|| 13"],"meaning":"सती रेणुका दुःख और शोकसे आतुर हो गयीं। वे अपने हाथों अपनी छाती और सिर पीट-पीटकर जोर-जोरसे रोने लगीं—‘परशुराम! बेटा परशुराम! शीघ्र आओ’॥ १३॥"},{"id":"9.16.14","number":14,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/16/14/","page":81,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तदुपश्रुत्य दूरस्थो हा रामेत्यार्तवत्स्वनम्।","त्वरयाऽऽश्रममासाद्य ददृशे पितरं हतम्॥ १४"],"iast":["tadupaśrutya dūrastho hā rāmetyārtavatsvanam|","tvarayā''śramamāsādya dadṛśe pitaraṃ hatam|| 14"],"meaning":"परशुरामजीने बहुत दूरसे माताका ‘हा राम!’ यह करुण-क्रन्दन सुन लिया। वे बड़ी शीघ्रतासे आश्रमपर आये और वहाँ आकर देखा कि पिताजी मार डाले गये हैं॥ १४॥"},{"id":"9.16.15","number":15,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/16/15/","page":81,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तद् दुःखरोषामर्षार्तिशोकवेगविमोहितः।","हा तात साधो धर्मिष्ठ त्यक्त्वास्मान् स्वर्गतो भवान्॥ १५"],"iast":["tad duḥkharoṣāmarṣārtiśokavegavimohitaḥ|","hā tāta sādho dharmiṣṭha tyaktvāsmān svargato bhavān|| 15"],"meaning":"परीक्षित्! उस समय परशुरामजीको बड़ा दुःख हुआ। साथ ही क्रोध, असहिष्णुता, मानसिक पीड़ा और शोकके वेगसे वे अत्यन्त मोहित हो गये। ‘हाय पिताजी! आप तो बड़े महात्मा थे। पिताजी! आप तो धर्मके सच्चे पुजारी थे। आप हमलोगोंको छोड़कर स्वर्ग चले गये’॥ १५॥"},{"id":"9.16.16","number":16,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/16/16/","page":82,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["विलप्यैवं पितुर्देहं निधाय भ्रातृषु स्वयम्।","प्रगृह्य परशुं रामः क्षत्रान्ताय मनो दधे॥ १६"],"iast":["vilapyaivaṃ piturdehaṃ nidhāya bhrātṛṣu svayam|","pragṛhya paraśuṃ rāmaḥ kṣatrāntāya mano dadhe|| 16"],"meaning":"इस प्रकार विलापकर उन्होंने पिताका शरीर तो भाइयोंको सौंप दिया और स्वयं हाथमें फरसा उठाकर क्षत्रियोंका संहार कर डालनेका निश्‍चय किया॥ १६॥"},{"id":"9.16.17","number":17,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/16/17/","page":82,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["गत्वा माहिष्मतीं रामो ब्रह्मघ्नविहतश्रियम्।","तेषां स शीर्षभी राजन् मध्ये चक्रे महागिरिम्॥ १७"],"iast":["gatvā māhiṣmatīṃ rāmo brahmaghnavihataśriyam|","teṣāṃ sa śīrṣabhī rājan madhye cakre mahāgirim|| 17"],"meaning":"परीक्षित्! परशुरामजीने माहिष्मती नगरीमें जाकर सहस्रबाहु अर्जुनके पुत्रोंके सिरोंसे नगरके बीचो-बीच एक बड़ा भारी पर्वत खड़ा कर दिया। उस नगरकी शोभा तो उन ब्रह्मघाती नीच क्षत्रियोंके कारण ही नष्ट हो चुकी थी॥ १७॥"},{"id":"9.16.18","number":18,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/16/18/","page":82,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तद्रक्तेन नदीं घोरामब्रह्मण्यभयावहाम्।","हेतुं कृत्वा पितृवधं क्षत्रेऽमंगलकारिणि॥ १८"],"iast":["tadraktena nadīṃ ghorāmabrahmaṇyabhayāvahām|","hetuṃ kṛtvā pitṛvadhaṃ kṣatre'maṃgalakāriṇi|| 18"],"meaning":"उनके रक्तसे एक बड़ी भयंकर नदी बह निकली, जिसे देखकर ब्राह्मणद्रोहियोंका हृदय भयसे काँप उठता था। भगवान्‌ने देखा कि वर्तमान क्षत्रिय अत्याचारी हो गये हैं। इसलिये राजन्! उन्होंने अपने पिताके वधको निमित्त बनाकर इक्कीस बार पृथ्वीको क्षत्रियहीन कर दिया और कुरुक्षेत्रके समन्तपंचकमें ऐसे-ऐसे पाँच तालाब बना दिये, जो रक्तके जलसे भरे हुए थे॥ १८-१९॥","meaning_covers":[18,19]},{"id":"9.16.19","number":19,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/16/19/","page":82,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवीं कृत्वा निःक्षत्रियां प्रभुः।","समन्तपंचके चक्रे शोणितोदान् ह्रदान् नृप॥ १९"],"iast":["triḥsaptakṛtvaḥ pṛthivīṃ kṛtvā niḥkṣatriyāṃ prabhuḥ|","samantapaṃcake cakre śoṇitodān hradān nṛpa|| 19"],"meaning":"उनके रक्तसे एक बड़ी भयंकर नदी बह निकली, जिसे देखकर ब्राह्मणद्रोहियोंका हृदय भयसे काँप उठता था। भगवान्‌ने देखा कि वर्तमान क्षत्रिय अत्याचारी हो गये हैं। इसलिये राजन्! उन्होंने अपने पिताके वधको निमित्त बनाकर इक्कीस बार पृथ्वीको क्षत्रियहीन कर दिया और कुरुक्षेत्रके समन्तपंचकमें ऐसे-ऐसे पाँच तालाब बना दिये, जो रक्तके जलसे भरे हुए थे॥ १८-१९॥","meaning_covers":[18,19]},{"id":"9.16.20","number":20,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/16/20/","page":82,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["पितुः कायेन सन्धाय शिर आदाय बर्हिषि।","सर्वदेवमयं देवमात्मानमयजन्मखैः॥ २०"],"iast":["pituḥ kāyena sandhāya śira ādāya barhiṣi|","sarvadevamayaṃ devamātmānamayajanmakhaiḥ|| 20"],"meaning":"परशुरामजीने अपने पिताजीका सिर लाकर उनके धड़से जोड़ दिया और यज्ञोंद्वारा सर्वदेवमय आत्मस्वरूप भगवान्‌का यजन किया॥ २०॥"},{"id":"9.16.21","number":21,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/16/21/","page":82,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ददौ प्राचीं दिशं होत्रे ब्रह्मणे दक्षिणां दिशम्।","अध्वर्यवे प्रतीचीं वै उद्गात्रे उत्तरां दिशम्॥ २१"],"iast":["dadau prācīṃ diśaṃ hotre brahmaṇe dakṣiṇāṃ diśam|","adhvaryave pratīcīṃ vai udgātre uttarāṃ diśam|| 21"],"meaning":"यज्ञोंमें उन्होंने पूर्व दिशा होताको, दक्षिण दिशा ब्रह्माको, पश्‍चिम दिशा अध्वर्युको और उत्तर दिशा सामगान करनेवाले उद्गाताको दे दी॥ २१॥"},{"id":"9.16.22","number":22,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/16/22/","page":82,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अन्येभ्योऽवान्तरदिशः कश्यपाय च मध्यतः।","आर्यावर्तमुपद्रष्ट्रे सदस्येभ्यस्ततः परम्॥ २२"],"iast":["anyebhyo'vāntaradiśaḥ kaśyapāya ca madhyataḥ|","āryāvartamupadraṣṭre sadasyebhyastataḥ param|| 22"],"meaning":"इसी प्रकार अग्‍निकोण आदि विदिशाएँ ऋत्विजोंको दीं, कश्यपजीको मध्यभूमि दी, उपद्रष्टाको आर्यावर्त दिया तथा दूसरे सदस्योंको अन्यान्य दिशाएँ प्रदान कर दीं॥ २२॥"},{"id":"9.16.23","number":23,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/16/23/","page":82,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ततश्‍चावभृथस्नानविधूताशेषकिल्बिषः।","सरस्वत्यां ब्रह्मनद्यां रेजे व्यभ्र इवांशुमान्॥ २३"],"iast":["tataścāvabhṛthasnānavidhūtāśeṣakilbiṣaḥ|","sarasvatyāṃ brahmanadyāṃ reje vyabhra ivāṃśumān|| 23"],"meaning":"इसके बाद यज्ञान्त-स्नान करके वे समस्त पापोंसे मुक्त हो गये और ब्रह्मनदी सरस्वतीके तटपर मेघरहित सूर्यके समान शोभायमान हुए॥ २३॥"},{"id":"9.16.24","number":24,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/16/24/","page":82,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स्वदेहं जमदग्‍निस्तु लब्ध्वा संज्ञानलक्षणम्।","ऋषीणां मण्डले सोऽभूत् सप्तमो रामपूजितः॥ २४"],"iast":["svadehaṃ jamadagnistu labdhvā saṃjñānalakṣaṇam|","ṛṣīṇāṃ maṇḍale so'bhūt saptamo rāmapūjitaḥ|| 24"],"meaning":"महर्षि जमदग्‍निको स्मृतिरूप संकल्पमय शरीरकी प्राप्ति हो गयी। परशुरामजीसे सम्मानित होकर वे सप्तर्षियोंके मण्डलमें सातवें ऋषि हो गये॥ २४॥"},{"id":"9.16.25","number":25,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/16/25/","page":82,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["जामद‌ग्‍न्योऽपि भगवान् रामः कमललोचनः।","आगामिन्यन्तरे राजन् वर्तयिष्यति वै बृहत्॥ २५"],"iast":["jāmadagnyo'pi bhagavān rāmaḥ kamalalocanaḥ|","āgāminyantare rājan vartayiṣyati vai bṛhat|| 25"],"meaning":"परीक्षित्! कमललोचन जमदग्‍निनन्दन भगवान् परशुराम आगामी मन्वन्तरमें सप्तर्षियोंके मण्डलमें रहकर वेदोंका विस्तार करेंगे॥ २५॥"},{"id":"9.16.26","number":26,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/16/26/","page":82,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["आस्तेऽद्यापि महेन्द्राद्रौ न्यस्तदण्डः प्रशान्तधीः।","उपगीयमानचरितः सिद्धगन्धर्वचारणैः॥ २६"],"iast":["āste'dyāpi mahendrādrau nyastadaṇḍaḥ praśāntadhīḥ|","upagīyamānacaritaḥ siddhagandharvacāraṇaiḥ|| 26"],"meaning":"वे आज भी किसीको किसी प्रकारका दण्ड न देते हुए शान्त चित्तसे महेन्द्र पर्वतपर निवास करते हैं। वहाँ सिद्ध, गन्धर्व और चारण उनके चरित्रका मधुर स्वरसे गान करते रहते हैं॥ २६॥"},{"id":"9.16.27","number":27,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/16/27/","page":83,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवं भृगुषु विश्‍वात्मा भगवान् हरिरीश्‍वरः।","अवतीर्य परं भारं भुवोऽहन् बहुशो नृपान्॥ २७"],"iast":["evaṃ bhṛguṣu viśvātmā bhagavān harirīśvaraḥ|","avatīrya paraṃ bhāraṃ bhuvo'han bahuśo nṛpān|| 27"],"meaning":"सर्वशक्तिमान् विश्‍वात्मा भगवान् श्रीहरिने इस प्रकार भृगुवंशियोंमें अवतार ग्रहण करके पृथ्वीके भारभूत राजाओंका बहुत बार वध किया॥ २७॥"},{"id":"9.16.28","number":28,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/16/28/","page":83,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["गाधेरभून्महातेजाः समिद्ध इव पावकः।","तपसा क्षात्रमुत्सृज्य यो लेभे ब्रह्मवर्चसम्॥ २८"],"iast":["gādherabhūnmahātejāḥ samiddha iva pāvakaḥ|","tapasā kṣātramutsṛjya yo lebhe brahmavarcasam|| 28"],"meaning":"महाराज गाधिके पुत्र हुए प्रज्वलित अग्‍निके समान परम तेजस्वी विश्‍वामित्रजी। इन्होंने अपने तपोबलसे क्षत्रियत्वका त्याग करके ब्रह्मतेज प्राप्त कर लिया॥ २८॥"},{"id":"9.16.29","number":29,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/16/29/","page":83,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["विश्‍वामित्रस्य चैवासन् पुत्रा एकशतं नृप।","मध्यमस्तु मधुच्छन्दा मधुच्छन्दस एव ते॥ २९"],"iast":["viśvāmitrasya caivāsan putrā ekaśataṃ nṛpa|","madhyamastu madhucchandā madhucchandasa eva te|| 29"],"meaning":"परीक्षित्! विश्‍वामित्रजीके सौ पुत्र थे। उनमें बिचले पुत्रका नाम था मधुच्छन्दा। इसलिये सभी पुत्र ‘मधुच्छन्दा’ के ही नामसे विख्यात हुए॥ २९॥"},{"id":"9.16.30","number":30,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/16/30/","page":83,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["पुत्रं कृत्वा शुनःशेपं देवरातं च भार्गवम्।","आजीगर्तं सुतानाह ज्येष्ठ एष प्रकल्प्यताम्॥ ३०"],"iast":["putraṃ kṛtvā śunaḥśepaṃ devarātaṃ ca bhārgavam|","ājīgartaṃ sutānāha jyeṣṭha eṣa prakalpyatām|| 30"],"meaning":"विश्‍वामित्रजीने भृगुवंशी अजीगर्तके पुत्र अपने भानजे शुनःशेपको, जिसका एक नाम देवरात भी था, पुत्ररूपमें स्वीकार कर लिया और अपने पुत्रोंसे कहा कि ‘तुमलोग इसे अपना बड़ा भाई मानो’॥ ३०॥"},{"id":"9.16.31","number":31,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/16/31/","page":83,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यो वै हरिश्‍चन्द्रमखे विक्रीतः पुरुषः पशुः।","स्तुत्वा देवान् प्रजेशादीन् मुमुचे पाशबन्धनात्॥ ३१"],"iast":["yo vai hariścandramakhe vikrītaḥ puruṣaḥ paśuḥ|","stutvā devān prajeśādīn mumuce pāśabandhanāt|| 31"],"meaning":"यह वही प्रसिद्ध भृगुवंशी शुनःशेप था, जो हरिश्‍चन्द्रके यज्ञमें यज्ञपशुके रूपमें मोल लेकर लाया गया था। विश्‍वामित्रजीने प्रजापति वरुण आदि देवताओंकी स्तुति करके उसे पाशबन्धनसे छुड़ा लिया था। देवताओंके यज्ञमें यही शुनःशेप देवताओंद्वारा विश्‍वामित्रजीको दिया गया था; अतः ‘देवैः रातः’ इस व्युत्पत्तिके अनुसार गाधिवंशमें यह तपस्वी देवरातके नामसे विख्यात हुआ॥ ३१-३२॥","meaning_covers":[31,32]},{"id":"9.16.32","number":32,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/16/32/","page":83,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यो रातो देवयजने देवैर्गाधिषु तापसः।","देवरात इति ख्यातः शुनःशेपः स भार्गवः॥ ३२"],"iast":["yo rāto devayajane devairgādhiṣu tāpasaḥ|","devarāta iti khyātaḥ śunaḥśepaḥ sa bhārgavaḥ|| 32"],"meaning":"यह वही प्रसिद्ध भृगुवंशी शुनःशेप था, जो हरिश्‍चन्द्रके यज्ञमें यज्ञपशुके रूपमें मोल लेकर लाया गया था। विश्‍वामित्रजीने प्रजापति वरुण आदि देवताओंकी स्तुति करके उसे पाशबन्धनसे छुड़ा लिया था। देवताओंके यज्ञमें यही शुनःशेप देवताओंद्वारा विश्‍वामित्रजीको दिया गया था; अतः ‘देवैः रातः’ इस व्युत्पत्तिके अनुसार गाधिवंशमें यह तपस्वी देवरातके नामसे विख्यात हुआ॥ ३१-३२॥","meaning_covers":[31,32]},{"id":"9.16.33","number":33,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/16/33/","page":83,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ये मधुच्छन्दसो ज्येष्ठाः कुशलं मेनिरे न तत्।","अशपत् तान्मुनिः क्रुद्धो म्लेच्छा भवत दुर्जनाः॥ ३३"],"iast":["ye madhucchandaso jyeṣṭhāḥ kuśalaṃ menire na tat|","aśapat tānmuniḥ kruddho mlecchā bhavata durjanāḥ|| 33"],"meaning":"विश्‍वामित्रजीके पुत्रोंमें जो बड़े थे, उन्हें शुनःशेपको बड़ा भाई माननेकी बात अच्छी न लगी। इसपर विश्‍वामित्रजीने क्रोधित होकर उन्हें शाप दे दिया कि ‘दुष्टो! तुम सब म्लेच्छ हो जाओ’॥ ३३॥"},{"id":"9.16.34","number":34,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/16/34/","page":83,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स होवाच मधुच्छन्दाः सार्धं पंचाशता ततः।","यन्‍नो भवान् संजानीते तस्मिंस्तिष्ठामहे वयम्॥ ३४"],"iast":["sa hovāca madhucchandāḥ sārdhaṃ paṃcāśatā tataḥ|","yanno bhavān saṃjānīte tasmiṃstiṣṭhāmahe vayam|| 34"],"meaning":"इस प्रकार जब उनचास भाई म्लेच्छ हो गये तब विश्‍वामित्रजीके बिचले पुत्र मधुच्छन्दाने अपनेसे छोटे पचासों भाइयोंके साथ कहा—‘पिताजी! आप हमलोगोंको जो आज्ञा करते हैं, हम उसका पालन करनेके लिये तैयार हैं’॥ ३४॥"},{"id":"9.16.35","number":35,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/16/35/","page":83,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ज्येष्ठं मन्त्रदृशं चक्रुस्त्वामन्वञ्चो वयं स्म हि।","विश्‍वामित्रः सुतानाह वीरवन्तो भविष्यथ।","ये मानं मेऽनुगृह्णन्तो वीरवन्तमकर्त माम्॥ ३५"],"iast":["jyeṣṭhaṃ mantradṛśaṃ cakrustvāmanvañco vayaṃ sma hi|","viśvāmitraḥ sutānāha vīravanto bhaviṣyatha|","ye mānaṃ me'nugṛhṇanto vīravantamakarta mām|| 35"],"meaning":"यह कहकर मधुच्छन्दाने मन्त्रद्रष्टा शुनःशेपको बड़ा भाई स्वीकार कर लिया और कहा कि ‘हम सब तुम्हारे अनुयायी—छोटे भाई हैं।’ तब विश्‍वामित्रजीने अपने इन आज्ञाकारी पुत्रोंसे कहा—‘तुम लोगोंने मेरी बात मानकर मेरे सम्मानकी रक्षा की है, इसलिये तुमलोगों-जैसे सुपुत्र प्राप्त करके मैं धन्य हुआ। मैं तुम्हें आशीर्वाद देता हूँ कि तुम्हें भी सुपुत्र प्राप्त होंगे॥ ३५॥"},{"id":"9.16.36","number":36,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/16/36/","page":84,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एष वः कुशिका वीरो देवरातस्तमन्वित।","अन्ये चाष्टकहारीतजयक्रतुमदादयः॥ ३६"],"iast":["eṣa vaḥ kuśikā vīro devarātastamanvita|","anye cāṣṭakahārītajayakratumadādayaḥ|| 36"],"meaning":"मेरे प्यारे पुत्रो! यह देवरात शुनःशेप भी तुम्हारे ही गोत्रका है। तुमलोग इसकी आज्ञामें रहना।’ परीक्षित्! विश्‍वामित्रजीके अष्टक, हारीत, जय और क्रतुमान् आदि और भी पुत्र थे॥ ३६॥"},{"id":"9.16.37","number":37,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/16/37/","page":84,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवं कौशिकगोत्रं तु विश्‍वामित्रैः पृथग्विधम्।","प्रवरान्तरमापन्‍नं तद्धि चैवं प्रकल्पितम्॥ ३७"],"iast":["evaṃ kauśikagotraṃ tu viśvāmitraiḥ pṛthagvidham|","pravarāntaramāpannaṃ taddhi caivaṃ prakalpitam|| 37"],"meaning":"इस प्रकार विश्‍वामित्रजीकी सन्तानोंसे कौशिकगोत्रमें कई भेद हो गये और देवरातको बड़ा भाई माननेके कारण उसका प्रवर ही दूसरा हो गया॥ ३७॥"}],"text":[{"b":26114,"kind":"adhyaya_heading","page":80,"text":"अथ षोडशोऽध्यायः"},{"b":26115,"kind":"topic_heading","page":80,"text":"परशुरामजीके द्वारा क्षत्रियसंहार और विश्‍वामित्रजीके वंशकी कथा"},{"b":26116,"kind":"hindi_commentary","page":80,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":26117,"kind":"sanskrit_shloka","page":80,"verses":["9.16.1"],"text":"पित्रोपशिक्षितो रामस्तथेति कुरुनन्दन।"},{"b":26118,"kind":"hindi_commentary","page":80,"verses":["9.16.1"],"text":"संवत्सरं तीर्थयात्रां चरित्वाऽऽश्रममाव्रजत्॥ १"},{"b":26119,"kind":"sanskrit_shloka","page":80,"verses":["9.16.2"],"text":"कदाचिद् रेणुका याता गंगायां पद्ममालिनम्।"},{"b":26120,"kind":"sanskrit_shloka","page":80,"verses":["9.16.2"],"text":"गन्धर्वराजं क्रीडन्तमप्सरोभिरपश्यत॥ २"},{"b":26121,"kind":"sanskrit_shloka","page":80,"verses":["9.16.3"],"text":"विलोकयन्ती क्रीडन्तमुदकार्थं नदीं गता।"},{"b":26122,"kind":"sanskrit_shloka","page":80,"verses":["9.16.3"],"text":"होमवेलां न सस्मार किंचिच्चित्ररथस्पृहा॥ ३"},{"b":26123,"kind":"sanskrit_shloka","page":80,"verses":["9.16.4"],"text":"कालात्ययं तं विलोक्य मुनेः शापविशंकिता।"},{"b":26124,"kind":"sanskrit_shloka","page":80,"verses":["9.16.4"],"text":"आगत्य कलशं तस्थौ पुरोधाय कृतांजलिः॥ ४"},{"b":26125,"kind":"sanskrit_shloka","page":80,"verses":["9.16.5"],"text":"व्यभिचारं मुनिर्ज्ञात्वा पत्‍न्याः प्रकुपितोऽब्रवीत्।"},{"b":26126,"kind":"sanskrit_shloka","page":80,"verses":["9.16.5"],"text":"घ्नतैनां पुत्रकाः पापामित्युक्तास्ते न चक्रिरे॥ ५"},{"b":26127,"kind":"sanskrit_shloka","page":80,"verses":["9.16.6"],"text":"रामः संचोदितः पित्रा भ्रातॄन् मात्रा सहावधीत्।"},{"b":26128,"kind":"sanskrit_shloka","page":80,"verses":["9.16.6"],"text":"प्रभावज्ञो मुनेः सम्यक् समाधेस्तपसश्‍च सः॥ ६"},{"b":26129,"kind":"hindi_commentary","page":80,"explains":["9.16.1","9.16.2","9.16.3","9.16.4","9.16.5","9.16.6"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! अपने पिताकी यह शिक्षा भगवान् परशुरामने ‘जो आज्ञा’ कहकर स्वीकार की। इसके बाद वे एक वर्षतक तीर्थयात्रा करके अपने आश्रमपर लौट आये॥ १॥ एक दिनकी बात है, परशुरामजीकी माता रेणुका गंगातटपर गयी हुई थीं। वहाँ उन्होंने देखा कि गन्धर्वराज चित्ररथ कमलोंकी माला पहने अप्सराओंके साथ विहार कर रहा है॥ २॥ वे जल लानेके लिये नदीतटपर गयी थीं, परन्तु वहाँ जलक्रीडा करते हुए गन्धर्वको देखने लगीं और पतिदेवके हवनका समय हो गया है—इस बातको भूल गयीं। उनका मन कुछ-कुछ चित्ररथकी ओर खिंच भी गया था॥ ३॥ हवनका समय बीत गया, यह जानकर वे महर्षि जमदग्‍निके शापसे भयभीत हो गयीं और तुरंत वहाँसे आश्रमपर चली आयीं। वहाँ जलका कलश महर्षिके सामने रखकर हाथ जोड़ खड़ी हो गयीं॥ ४॥ जमदग्‍नि मुनिने अपनी पत्‍नीका मानसिक व्यभिचार जान लिया और क्रोध करके कहा—‘मेरे पुत्रो! इस पापिनीको मार डालो।’ परन्तु उनके किसी भी पुत्रने उनकी वह आज्ञा स्वीकार नहीं की॥ ५॥ इसके बाद पिताकी आज्ञासे परशुरामजीने माताके साथ सब भाइयोंको भी मार डाला। इसका कारण था। वे अपने पिताजीके योग और तपस्याका प्रभाव भलीभाँति जानते थे॥ ६॥"},{"b":26130,"kind":"sanskrit_shloka","page":81,"verses":["9.16.7"],"text":"वरेणच्छन्दयामास प्रीतः सत्यवतीसुतः।"},{"b":26131,"kind":"sanskrit_shloka","page":81,"verses":["9.16.7"],"text":"वव्रे हतानां रामोऽपि जीवितं चास्मृतिं वधे॥ ७"},{"b":26132,"kind":"sanskrit_shloka","page":81,"verses":["9.16.8"],"text":"उत्तस्थुस्ते कुशलिनो निद्रापाय इवांजसा।"},{"b":26133,"kind":"sanskrit_shloka","page":81,"verses":["9.16.8"],"text":"पितुर्विद्वांस्तपोवीर्यं रामश्‍चक्रे सुहृद्वधम्॥ ८"},{"b":26134,"kind":"hindi_translation","page":81,"explains":["9.16.7","9.16.8"],"text":"परशुरामजीके इस कामसे सत्यवतीनन्दन महर्षि जमदग्‍नि बहुत प्रसन्‍न हुए और उन्होंने कहा—‘बेटा! तुम्हारी जो इच्छा हो, वर माँग लो।’ परशुरामजीने कहा—‘पिताजी! मेरी माता और सब भाई जीवित हो जायँ तथा उन्हें इस बातकी याद न रहे कि मैंने उन्हें मारा था’॥ ७॥ परशुरामजीके इस प्रकार कहते ही जैसे कोई सोकर उठे, सब-के-सब अनायास ही सकुशल उठ बैठे। परशुरामजीने अपने पिताजीका तपो-बल जानकर ही तो अपने सुहृदोंका वध किया था॥ ८॥"},{"b":26135,"kind":"sanskrit_shloka","page":81,"verses":["9.16.9"],"text":"येऽर्जुनस्य सुता राजन् स्मरन्तः स्वपितुर्वधम्।"},{"b":26136,"kind":"sanskrit_shloka","page":81,"verses":["9.16.9"],"text":"रामवीर्यपराभूता लेभिरे शर्म न क्‍वचित्॥ ९"},{"b":26137,"kind":"sanskrit_shloka","page":81,"verses":["9.16.10"],"text":"एकदाऽऽश्रमतो रामे सभ्रातरि वनं गते।"},{"b":26138,"kind":"sanskrit_shloka","page":81,"verses":["9.16.10"],"text":"वैरं सिसाधयिषवो लब्धच्छिद्रा उपागमन्॥ १०"},{"b":26139,"kind":"sanskrit_shloka","page":81,"verses":["9.16.11"],"text":"दृष्ट्वा‌ग्‍न्यगार आसीनमावेशितधियं मुनिम्।"},{"b":26140,"kind":"sanskrit_shloka","page":81,"verses":["9.16.11"],"text":"भगवत्युत्तमश्‍लोके जघ्नुस्ते पापनिश्‍चयाः॥ ११"},{"b":26141,"kind":"sanskrit_shloka","page":81,"verses":["9.16.12"],"text":"याच्यमानाः कृपणया राममात्रातिदारुणाः।"},{"b":26142,"kind":"sanskrit_shloka","page":81,"verses":["9.16.12"],"text":"प्रसह्य शिर उत्कृत्य निन्युस्ते क्षत्रबन्धवः॥ १२"},{"b":26143,"kind":"sanskrit_shloka","page":81,"verses":["9.16.13"],"text":"रेणुका दुःखशोकार्ता निघ्नन्त्यात्मानमात्मना।"},{"b":26144,"kind":"sanskrit_shloka","page":81,"verses":["9.16.13"],"text":"राम रामेहि तातेति विचुक्रोशोच्चकैः सती॥ १३"},{"b":26145,"kind":"sanskrit_shloka","page":81,"verses":["9.16.14"],"text":"तदुपश्रुत्य दूरस्थो हा रामेत्यार्तवत्स्वनम्।"},{"b":26146,"kind":"sanskrit_shloka","page":81,"verses":["9.16.14"],"text":"त्वरयाऽऽश्रममासाद्य ददृशे पितरं हतम्॥ १४"},{"b":26147,"kind":"sanskrit_shloka","page":81,"verses":["9.16.15"],"text":"तद् दुःखरोषामर्षार्तिशोकवेगविमोहितः।"},{"b":26148,"kind":"sanskrit_shloka","page":81,"verses":["9.16.15"],"text":"हा तात साधो धर्मिष्ठ त्यक्त्वास्मान् स्वर्गतो भवान्॥ १५"},{"b":26149,"kind":"sanskrit_shloka","page":82,"verses":["9.16.16"],"text":"विलप्यैवं पितुर्देहं निधाय भ्रातृषु स्वयम्।"},{"b":26150,"kind":"sanskrit_shloka","page":82,"verses":["9.16.16"],"text":"प्रगृह्य परशुं रामः क्षत्रान्ताय मनो दधे॥ १६"},{"b":26151,"kind":"hindi_translation","page":81,"explains":["9.16.9","9.16.10","9.16.11","9.16.12","9.16.13","9.16.14","9.16.15","9.16.16"],"text":"परीक्षित्! सहस्रबाहु अर्जुनके जो लड़के परशुरामजीसे हारकर भाग गये थे, उन्हें अपने पिताके वधकी याद निरन्तर बनी रहती थी। कहीं एक क्षणके लिये भी उन्हें चैन नहीं मिलता था॥ ९॥ एक दिनकी बात है, परशुरामजी अपने भाइयोंके साथ आश्रमसे बाहर वनकी ओर गये हुए थे। यह अवसर पाकर वैर साधनेके लिये सहस्रबाहुके लड़के वहाँ आ पहुँचे॥ १०॥ उस समय महर्षि जमदग्‍नि अग्‍निशालामें बैठे हुए थे और अपनी समस्त वृत्तियोंसे पवित्रकीर्ति भगवान्‌के ही चिन्तनमें म‌ग्‍न हो रहे थे। उन्हें बाहरकी कोई सुध न थी। उसी समय उन पापियोंने जमदग्‍नि ऋषिको मार डाला। उन्होंने पहलेसे ही ऐसा पापपूर्ण निश्‍चय कर रखा था॥ ११॥ परशुरामकी माता रेणुका बड़ी दीनतासे उनसे प्रार्थना कर रही थीं, परन्तु उन सबोंने उनकी एक न सुनी। वे बलपूर्वक महर्षि जमदग्‍निका सिर काटकर ले गये। परीक्षित्! वास्तवमें वे नीच क्षत्रिय अत्यन्त क्रूर थे॥ १२॥ सती रेणुका दुःख और शोकसे आतुर हो गयीं। वे अपने हाथों अपनी छाती और सिर पीट-पीटकर जोर-जोरसे रोने लगीं—‘परशुराम! बेटा परशुराम! शीघ्र आओ’॥ १३॥ परशुरामजीने बहुत दूरसे माताका ‘हा राम!’ यह करुण-क्रन्दन सुन लिया। वे बड़ी शीघ्रतासे आश्रमपर आये और वहाँ आकर देखा कि पिताजी मार डाले गये हैं॥ १४॥ परीक्षित्! उस समय परशुरामजीको बड़ा दुःख हुआ। साथ ही क्रोध, असहिष्णुता, मानसिक पीड़ा और शोकके वेगसे वे अत्यन्त मोहित हो गये। ‘हाय पिताजी! आप तो बड़े महात्मा थे। पिताजी! आप तो धर्मके सच्चे पुजारी थे। आप हमलोगोंको छोड़कर स्वर्ग चले गये’॥ १५॥ इस प्रकार विलापकर उन्होंने पिताका शरीर तो भाइयोंको सौंप दिया और स्वयं हाथमें फरसा उठाकर क्षत्रियोंका संहार कर डालनेका निश्‍चय किया॥ १६॥"},{"b":26152,"kind":"sanskrit_shloka","page":82,"verses":["9.16.17"],"text":"गत्वा माहिष्मतीं रामो ब्रह्मघ्नविहतश्रियम्।"},{"b":26153,"kind":"sanskrit_shloka","page":82,"verses":["9.16.17"],"text":"तेषां स शीर्षभी राजन् मध्ये चक्रे महागिरिम्॥ १७"},{"b":26154,"kind":"sanskrit_shloka","page":82,"verses":["9.16.18"],"text":"तद्रक्तेन नदीं घोरामब्रह्मण्यभयावहाम्।"},{"b":26155,"kind":"sanskrit_shloka","page":82,"verses":["9.16.18"],"text":"हेतुं कृत्वा पितृवधं क्षत्रेऽमंगलकारिणि॥ १८"},{"b":26156,"kind":"sanskrit_shloka","page":82,"verses":["9.16.19"],"text":"त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवीं कृत्वा निःक्षत्रियां प्रभुः।"},{"b":26157,"kind":"sanskrit_shloka","page":82,"verses":["9.16.19"],"text":"समन्तपंचके चक्रे शोणितोदान् ह्रदान् नृप॥ १९"},{"b":26158,"kind":"sanskrit_shloka","page":82,"verses":["9.16.20"],"text":"पितुः कायेन सन्धाय शिर आदाय बर्हिषि।"},{"b":26159,"kind":"sanskrit_shloka","page":82,"verses":["9.16.20"],"text":"सर्वदेवमयं देवमात्मानमयजन्मखैः॥ २०"},{"b":26160,"kind":"sanskrit_shloka","page":82,"verses":["9.16.21"],"text":"ददौ प्राचीं दिशं होत्रे ब्रह्मणे दक्षिणां दिशम्।"},{"b":26161,"kind":"sanskrit_shloka","page":82,"verses":["9.16.21"],"text":"अध्वर्यवे प्रतीचीं वै उद्गात्रे उत्तरां दिशम्॥ २१"},{"b":26162,"kind":"sanskrit_shloka","page":82,"verses":["9.16.22"],"text":"अन्येभ्योऽवान्तरदिशः कश्यपाय च मध्यतः।"},{"b":26163,"kind":"sanskrit_shloka","page":82,"verses":["9.16.22"],"text":"आर्यावर्तमुपद्रष्ट्रे सदस्येभ्यस्ततः परम्॥ २२"},{"b":26164,"kind":"sanskrit_shloka","page":82,"verses":["9.16.23"],"text":"ततश्‍चावभृथस्नानविधूताशेषकिल्बिषः।"},{"b":26165,"kind":"sanskrit_shloka","page":82,"verses":["9.16.23"],"text":"सरस्वत्यां ब्रह्मनद्यां रेजे व्यभ्र इवांशुमान्॥ २३"},{"b":26166,"kind":"sanskrit_shloka","page":82,"verses":["9.16.24"],"text":"स्वदेहं जमदग्‍निस्तु लब्ध्वा संज्ञानलक्षणम्।"},{"b":26167,"kind":"sanskrit_shloka","page":82,"verses":["9.16.24"],"text":"ऋषीणां मण्डले सोऽभूत् सप्तमो रामपूजितः॥ २४"},{"b":26168,"kind":"sanskrit_shloka","page":82,"verses":["9.16.25"],"text":"जामद‌ग्‍न्योऽपि भगवान् रामः कमललोचनः।"},{"b":26169,"kind":"sanskrit_shloka","page":82,"verses":["9.16.25"],"text":"आगामिन्यन्तरे राजन् वर्तयिष्यति वै बृहत्॥ २५"},{"b":26170,"kind":"sanskrit_shloka","page":82,"verses":["9.16.26"],"text":"आस्तेऽद्यापि महेन्द्राद्रौ न्यस्तदण्डः प्रशान्तधीः।"},{"b":26171,"kind":"sanskrit_shloka","page":82,"verses":["9.16.26"],"text":"उपगीयमानचरितः सिद्धगन्धर्वचारणैः॥ २६"},{"b":26172,"kind":"sanskrit_shloka","page":83,"verses":["9.16.27"],"text":"एवं भृगुषु विश्‍वात्मा भगवान् हरिरीश्‍वरः।"},{"b":26173,"kind":"sanskrit_shloka","page":83,"verses":["9.16.27"],"text":"अवतीर्य परं भारं भुवोऽहन् बहुशो नृपान्॥ २७"},{"b":26174,"kind":"hindi_commentary","page":82,"explains":["9.16.17","9.16.18","9.16.19","9.16.20","9.16.21","9.16.22","9.16.23","9.16.24","9.16.25","9.16.26","9.16.27"],"text":"परीक्षित्! परशुरामजीने माहिष्मती नगरीमें जाकर सहस्रबाहु अर्जुनके पुत्रोंके सिरोंसे नगरके बीचो-बीच एक बड़ा भारी पर्वत खड़ा कर दिया। उस नगरकी शोभा तो उन ब्रह्मघाती नीच क्षत्रियोंके कारण ही नष्ट हो चुकी थी॥ १७॥ उनके रक्तसे एक बड़ी भयंकर नदी बह निकली, जिसे देखकर ब्राह्मणद्रोहियोंका हृदय भयसे काँप उठता था। भगवान्‌ने देखा कि वर्तमान क्षत्रिय अत्याचारी हो गये हैं। इसलिये राजन्! उन्होंने अपने पिताके वधको निमित्त बनाकर इक्कीस बार पृथ्वीको क्षत्रियहीन कर दिया और कुरुक्षेत्रके समन्तपंचकमें ऐसे-ऐसे पाँच तालाब बना दिये, जो रक्तके जलसे भरे हुए थे॥ १८-१९॥ परशुरामजीने अपने पिताजीका सिर लाकर उनके धड़से जोड़ दिया और यज्ञोंद्वारा सर्वदेवमय आत्मस्वरूप भगवान्‌का यजन किया॥ २०॥ यज्ञोंमें उन्होंने पूर्व दिशा होताको, दक्षिण दिशा ब्रह्माको, पश्‍चिम दिशा अध्वर्युको और उत्तर दिशा सामगान करनेवाले उद्गाताको दे दी॥ २१॥ इसी प्रकार अग्‍निकोण आदि विदिशाएँ ऋत्विजोंको दीं, कश्यपजीको मध्यभूमि दी, उपद्रष्टाको आर्यावर्त दिया तथा दूसरे सदस्योंको अन्यान्य दिशाएँ प्रदान कर दीं॥ २२॥ इसके बाद यज्ञान्त-स्नान करके वे समस्त पापोंसे मुक्त हो गये और ब्रह्मनदी सरस्वतीके तटपर मेघरहित सूर्यके समान शोभायमान हुए॥ २३॥ महर्षि जमदग्‍निको स्मृतिरूप संकल्पमय शरीरकी प्राप्ति हो गयी। परशुरामजीसे सम्मानित होकर वे सप्तर्षियोंके मण्डलमें सातवें ऋषि हो गये॥ २४॥ परीक्षित्! कमललोचन जमदग्‍निनन्दन भगवान् परशुराम आगामी मन्वन्तरमें सप्तर्षियोंके मण्डलमें रहकर वेदोंका विस्तार करेंगे॥ २५॥ वे आज भी किसीको किसी प्रकारका दण्ड न देते हुए शान्त चित्तसे महेन्द्र पर्वतपर निवास करते हैं। वहाँ सिद्ध, गन्धर्व और चारण उनके चरित्रका मधुर स्वरसे गान करते रहते हैं॥ २६॥ सर्वशक्तिमान् विश्‍वात्मा भगवान् श्रीहरिने इस प्रकार भृगुवंशियोंमें अवतार ग्रहण करके पृथ्वीके भारभूत राजाओंका बहुत बार वध किया॥ २७॥"},{"b":26175,"kind":"sanskrit_shloka","page":83,"verses":["9.16.28"],"text":"गाधेरभून्महातेजाः समिद्ध इव पावकः।"},{"b":26176,"kind":"sanskrit_shloka","page":83,"verses":["9.16.28"],"text":"तपसा क्षात्रमुत्सृज्य यो लेभे ब्रह्मवर्चसम्॥ २८"},{"b":26177,"kind":"sanskrit_shloka","page":83,"verses":["9.16.29"],"text":"विश्‍वामित्रस्य चैवासन् पुत्रा एकशतं नृप।"},{"b":26178,"kind":"sanskrit_shloka","page":83,"verses":["9.16.29"],"text":"मध्यमस्तु मधुच्छन्दा मधुच्छन्दस एव ते॥ २९"},{"b":26179,"kind":"sanskrit_shloka","page":83,"verses":["9.16.30"],"text":"पुत्रं कृत्वा शुनःशेपं देवरातं च भार्गवम्।"},{"b":26180,"kind":"sanskrit_shloka","page":83,"verses":["9.16.30"],"text":"आजीगर्तं सुतानाह ज्येष्ठ एष प्रकल्प्यताम्॥ ३०"},{"b":26181,"kind":"sanskrit_shloka","page":83,"verses":["9.16.31"],"text":"यो वै हरिश्‍चन्द्रमखे विक्रीतः पुरुषः पशुः।"},{"b":26182,"kind":"sanskrit_shloka","page":83,"verses":["9.16.31"],"text":"स्तुत्वा देवान् प्रजेशादीन् मुमुचे पाशबन्धनात्॥ ३१"},{"b":26183,"kind":"sanskrit_shloka","page":83,"verses":["9.16.32"],"text":"यो रातो देवयजने देवैर्गाधिषु तापसः।"},{"b":26184,"kind":"hindi_commentary","page":83,"verses":["9.16.32"],"text":"देवरात इति ख्यातः शुनःशेपः स भार्गवः॥ ३२"},{"b":26185,"kind":"sanskrit_shloka","page":83,"verses":["9.16.33"],"text":"ये मधुच्छन्दसो ज्येष्ठाः कुशलं मेनिरे न तत्।"},{"b":26186,"kind":"sanskrit_shloka","page":83,"verses":["9.16.33"],"text":"अशपत् तान्मुनिः क्रुद्धो म्लेच्छा भवत दुर्जनाः॥ ३३"},{"b":26187,"kind":"sanskrit_shloka","page":83,"verses":["9.16.34"],"text":"स होवाच मधुच्छन्दाः सार्धं पंचाशता ततः।"},{"b":26188,"kind":"sanskrit_shloka","page":83,"verses":["9.16.34"],"text":"यन्‍नो भवान् संजानीते तस्मिंस्तिष्ठामहे वयम्॥ ३४"},{"b":26189,"kind":"sanskrit_shloka","page":83,"verses":["9.16.35"],"text":"ज्येष्ठं मन्त्रदृशं चक्रुस्त्वामन्वञ्चो वयं स्म हि।"},{"b":26190,"kind":"hindi_commentary","page":83,"verses":["9.16.35"],"text":"विश्‍वामित्रः सुतानाह वीरवन्तो भविष्यथ।"},{"b":26191,"kind":"sanskrit_shloka","page":83,"verses":["9.16.35"],"text":"ये मानं मेऽनुगृह्णन्तो वीरवन्तमकर्त माम्॥ ३५"},{"b":26192,"kind":"sanskrit_shloka","page":84,"verses":["9.16.36"],"text":"एष वः कुशिका वीरो देवरातस्तमन्वित।"},{"b":26193,"kind":"sanskrit_shloka","page":84,"verses":["9.16.36"],"text":"अन्ये चाष्टकहारीतजयक्रतुमदादयः॥ ३६"},{"b":26194,"kind":"sanskrit_shloka","page":84,"verses":["9.16.37"],"text":"एवं कौशिकगोत्रं तु विश्‍वामित्रैः पृथग्विधम्।"},{"b":26195,"kind":"sanskrit_shloka","page":84,"verses":["9.16.37"],"text":"प्रवरान्तरमापन्‍नं तद्धि चैवं प्रकल्पितम्॥ ३७"},{"b":26196,"kind":"hindi_commentary","page":83,"explains":["9.16.28","9.16.29","9.16.30","9.16.31","9.16.32","9.16.33","9.16.34","9.16.35","9.16.36","9.16.37"],"text":"महाराज गाधिके पुत्र हुए प्रज्वलित अग्‍निके समान परम तेजस्वी विश्‍वामित्रजी। इन्होंने अपने तपोबलसे क्षत्रियत्वका त्याग करके ब्रह्मतेज प्राप्त कर लिया॥ २८॥ परीक्षित्! विश्‍वामित्रजीके सौ पुत्र थे। उनमें बिचले पुत्रका नाम था मधुच्छन्दा। इसलिये सभी पुत्र ‘मधुच्छन्दा’ के ही नामसे विख्यात हुए॥ २९॥ विश्‍वामित्रजीने भृगुवंशी अजीगर्तके पुत्र अपने भानजे शुनःशेपको, जिसका एक नाम देवरात भी था, पुत्ररूपमें स्वीकार कर लिया और अपने पुत्रोंसे कहा कि ‘तुमलोग इसे अपना बड़ा भाई मानो’॥ ३०॥ यह वही प्रसिद्ध भृगुवंशी शुनःशेप था, जो हरिश्‍चन्द्रके यज्ञमें यज्ञपशुके रूपमें मोल लेकर लाया गया था। विश्‍वामित्रजीने प्रजापति वरुण आदि देवताओंकी स्तुति करके उसे पाशबन्धनसे छुड़ा लिया था। देवताओंके यज्ञमें यही शुनःशेप देवताओंद्वारा विश्‍वामित्रजीको दिया गया था; अतः ‘देवैः रातः’ इस व्युत्पत्तिके अनुसार गाधिवंशमें यह तपस्वी देवरातके नामसे विख्यात हुआ॥ ३१-३२॥ विश्‍वामित्रजीके पुत्रोंमें जो बड़े थे, उन्हें शुनःशेपको बड़ा भाई माननेकी बात अच्छी न लगी। इसपर विश्‍वामित्रजीने क्रोधित होकर उन्हें शाप दे दिया कि ‘दुष्टो! तुम सब म्लेच्छ हो जाओ’॥ ३३॥ इस प्रकार जब उनचास भाई म्लेच्छ हो गये तब विश्‍वामित्रजीके बिचले पुत्र मधुच्छन्दाने अपनेसे छोटे पचासों भाइयोंके साथ कहा—‘पिताजी! आप हमलोगोंको जो आज्ञा करते हैं, हम उसका पालन करनेके लिये तैयार हैं’॥ ३४॥ यह कहकर मधुच्छन्दाने मन्त्रद्रष्टा शुनःशेपको बड़ा भाई स्वीकार कर लिया और कहा कि ‘हम सब तुम्हारे अनुयायी—छोटे भाई हैं।’ तब विश्‍वामित्रजीने अपने इन आज्ञाकारी पुत्रोंसे कहा—‘तुम लोगोंने मेरी बात मानकर मेरे सम्मानकी रक्षा की है, इसलिये तुमलोगों-जैसे सुपुत्र प्राप्त करके मैं धन्य हुआ। मैं तुम्हें आशीर्वाद देता हूँ कि तुम्हें भी सुपुत्र प्राप्त होंगे॥ ३५॥ मेरे प्यारे पुत्रो! यह देवरात शुनःशेप भी तुम्हारे ही गोत्रका है। तुमलोग इसकी आज्ञामें रहना।’ परीक्षित्! विश्‍वामित्रजीके अष्टक, हारीत, जय और क्रतुमान् आदि और भी पुत्र थे॥ ३६॥ इस प्रकार विश्‍वामित्रजीकी सन्तानोंसे कौशिकगोत्रमें कई भेद हो गये और देवरातको बड़ा भाई माननेके कारण उसका प्रवर ही दूसरा हो गया॥ ३७॥"},{"b":26197,"kind":"hindi_translation","page":84,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां नवमस्कन्धे षोडशोऽध्यायः॥ १६॥"}],"notes":[{"id":"v2:136","mark":"१","page":80,"after_verse":"9.16.6","text":"सः सुतः।"},{"id":"v2:137","mark":"१","page":83,"after_verse":"9.16.35","text":"त्रस्तु ताना०।"},{"id":"v2:138","mark":"२","page":83,"after_verse":"9.16.35","text":"वीरभावकसत्तमाः।"}],"corrections":{"count":3,"list":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/shuddhi/"}}