श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.1.19

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

वयं तु न वितृप्याम उत्तमश्लोकविक्रमे।

यच्छृण्वतां रसज्ञानां स्वादु स्वादु पदे पदे॥ १९

vayaṃ tu na vitṛpyāma uttamaślokavikrame|

yacchṛṇvatāṃ rasajñānāṃ svādu svādu pade pade|| 19

अर्थ

पुण्यकीर्ति भगवान्‌की लीला सुननेसे हमें कभी भी तृप्ति नहीं हो सकती; क्योंकि रसज्ञ श्रोताओंको पद-पदपर भगवान्‌की लीलाओंमें नये-नये रसका अनुभव होता है॥ १९॥✎ 23 24

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #23 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #24 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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