पुण्यकीर्ति भगवान्की लीला सुननेसे हमें कभी भी तृप्ति नहीं हो सकती; क्योंकि रसज्ञ श्रोताओंको पद-पदपर भगवान्की लीलाओंमें नये-नये रसका अनुभव होता है॥ १९॥✎ 2324
वयं तु न वितृप्याम उत्तमश्लोकविक्रमे।
यच्छृण्वतां रसज्ञानां स्वादु स्वादु पदे पदे॥ १९
पुण्यकीर्ति भगवान्की लीला सुननेसे हमें कभी भी तृप्ति नहीं हो सकती; क्योंकि रसज्ञ श्रोताओंको पद-पदपर भगवान्की लीलाओंमें नये-नये रसका अनुभव होता है॥ १९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.1.19 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 83) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/1/19/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)