॥ श्रीहरिः ॥
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीमद्भागवत महापुराण
सचित्र, सरल हिन्दी व्याख्यासहित
गीताप्रेस, गोरखपुर
आजका श्लोक
श्रीमद्भागवत अपने विषयमें
स्वकीयं यद्भवेत्तेजस्तच्च भागवतेऽदधात्।तिरोधाय प्रविष्टोऽयं श्रीमद्भागवतार्णवम्॥ ६१तेनेयं वाङ्मयी मूर्तिः प्रत्यक्षा वर्तते हरेः।सेवनाच्छ्रवणात्पाठाद्दर्शनात्पापनाशिनी॥ ६२शौनकजी! तब भगवान्ने अपनी सारी शक्ति भागवतमें रख दी; वे अन्तर्धान होकर इस भागवतसमुद्रमें प्रवेश कर गये॥ ६१॥ इसलिये यह भगवान्की साक्षात् शब्दमयी मूर्ति है। इसके सेवन, श्रवण, पाठ अथवा दर्शनसे ही मनुष्यके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं॥ ६२॥
श्लोक PRE.3.61–62 →प्रायोपविष्टं गंगायां परीतं परमर्षिभिः।कृष्णे स्वधामोपगते धर्मज्ञानादिभिः सह॥ ४३कलौ नष्टदृशामेष पुराणार्कोऽधुनोदितः।तत्र कीर्तयतो विप्रा विप्रर्षेर्भूरितेजसः॥ ४४अहं चाध्यगमं तत्र निविष्टस्तदनुग्रहात्।सोऽहं वः श्रावयिष्यामि यथाधीतं यथामति॥ ४५उस समय वे परमर्षियोंसे घिरे हुए आमरण अनशनका व्रत लेकर गंगातटपर बैठे हुए थे। भगवान् श्रीकृष्ण जब धर्म, ज्ञान आदिके साथ अपने परमधामको पधार गये, तब इस कलियुगमें जो लोग अज्ञानरूपी अन्धकारसे अंधे हो रहे हैं, उनके लिये यह पुराणरूपी सूर्य इस समय प्रकट हुआ है। शौनकादि ऋषियो! जब महातेजस्वी श्रीशुकदेवजी महाराज वहाँ इस पुराणकी कथा कह रहे थे, तब मैं भी वहाँ बैठा था। वहीं मैंने उनकी कृपापूर्ण अनुमतिसे इसका अध्ययन किया। मेरा जैसा अध्ययन है और मेरी बुद्धिने जितना जिस प्रकार इसको ग्रहण किया है, उसीके अनुसार इसे मैं आपलोगोंको सुनाऊँगा॥ ४३—४५॥
श्लोक 1.3.43–45 →निगमकल्पतरोर्गलितं फलं शुकमुखादमृतद्रवसंयुतम् ।पिबत भागवतं रसमालयं मुहुरहो रसिका भुवि भावुकाः॥ ३रसके मर्मज्ञ भक्तजन! यह श्रीमद्भागवत वेदरूप कल्पवृक्षका पका हुआ फल है। श्रीशुकदेवरूप तोतेके मुखका सम्बन्ध हो जानेसे यह परमानन्दमयी सुधासे परिपूर्ण हो गया है। इस फलमें छिलका, गुठली आदि त्याज्य अंश तनिक भी नहीं है। यह मूर्तिमान् रस है। जबतक शरीरमें चेतना रहे, तबतक इस दिव्य भगवद्रसका निरन्तर बार-बार पान करते रहो। यह पृथ्वीपर ही सुलभ है॥ ३॥
श्लोक 1.1.3 →अनुक्रमणिका
प्रथम खण्ड
- प्रथम खण्ड — मुखपृष्ठ
- आरम्भिक सामग्री
- श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण)देवर्षि नारदकी भक्तिसे भेंट · भक्तिका दुःख दूर करनेके लिये नारदजीका उद्योग6 अध्याय · 504 श्लोक
- 1प्रथम स्कन्धश्रीसूतजीसे शौनकादि ऋषियोंका प्रश्न · भगवत्कथा और भगवद्भक्तिका माहात्म्य19 अध्याय · 809 श्लोक
- 2द्वितीय स्कन्धध्यान-विधि और भगवान्के विराट्स्वरूपका वर्णन · भगवान्के स्थूल और सूक्ष्मरूपोंकी धारणा तथा क्रममुक्ति और सद्योमुक्तिका वर्णन10 अध्याय · 391 श्लोक
- 3तृतीय स्कन्धउद्धव और विदुरकी भेंट · उद्धवजीद्वारा भगवान्की बाललीलाओंका वर्णन33 अध्याय · 1,411 श्लोक
- 4चतुर्थ स्कन्धस्वायम्भुव-मनुकी कन्याओंके वंशका वर्णन · भगवान् शिव और दक्ष प्रजापतिका मनोमालिन्य31 अध्याय · 1,445 श्लोक
- 5पञ्चम स्कन्धप्रियव्रत-चरित्र · आग्नीध्र-चरित्र26 अध्याय · 668 श्लोक
- 6षष्ठ स्कन्धअजामिलोपाख्यानका प्रारम्भ · विष्णुदूतोंद्वारा भागवतधर्म-निरूपण और अजामिलका परमधामगमन19 अध्याय · 851 श्लोक
- 7सप्तम स्कन्धनारद-युधिष्ठिर-संवाद और जय-विजयकी कथा · हिरण्याक्षका वध होनेपर हिरण्यकशिपुका अपनी माता और कुटुम्बियोंको समझाना15 अध्याय · 750 श्लोक
- 8अष्टम स्कन्धमन्वन्तरोंका वर्णन · ग्राहके द्वारा गजेन्द्रका पकड़ा जाना24 अध्याय · 931 श्लोक
- प्रथम खण्डके अन्तमें — स्तोत्र और आरती
द्वितीय खण्ड
- द्वितीय खण्ड — मुखपृष्ठ
- 9नवम स्कन्धवैवस्वत मनुके पुत्र राजा सुद्युम्नकी कथा · पृषध्र आदि मनुके पाँच पुत्रोंका वंश24 अध्याय · 964 श्लोक
- 10दशम स्कन्ध (पूर्वार्ध)भगवान्के द्वारा पृथ्वीको आश्वासन, वसुदेव-देवकीका विवाह और कंसके द्वारा देवकीके छः पुत्रोंकी हत्या · भगवान्का गर्भ-प्रवेश और देवताओंद्वारा गर्भ-स्तुति49 अध्याय · 2,013 श्लोक
- 10दशम स्कन्ध (उत्तरार्ध)जरासन्धसे युद्ध और द्वारकापुरीका निर्माण · कालयवनका भस्म होना, मुचुकुन्दकी कथा41 अध्याय · 1,933 श्लोक
- 11एकादश स्कन्धयदुवंशको ऋषियोंका शाप · वसुदेवजीके पास श्रीनारदजीका आना और उन्हें राजा जनक तथा नौ योगीश्वरोंका संवाद सुनाना31 अध्याय · 1,367 श्लोक
- 12द्वादश स्कन्धकलियुगके राजवंशोंका वर्णन · कलियुगके धर्म13 अध्याय · 566 श्लोक
- श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (स्कन्दपुराण)परीक्षित् और वज्रनाभका समागम, शाण्डिल्यमुनिके मुखसे भगवान्की लीलाके रहस्य और व्रजभूमिके महत्त्वका वर्णन · यमुना और श्रीकृष्णपत्नियोंका संवाद, कीर्तनोत्सवमें उद्धवजीका प्रकट होना4 अध्याय · 199 श्लोक
- द्वितीय खण्डके अन्तमें — पाठके प्रयोग, स्तोत्र और आरती

