॥ श्रीहरिः ॥
अष्टम स्कन्ध
श्रीमद्भागवतमहापुराणम्
अष्टमः स्कन्धः
- 1अथ प्रथमोऽध्यायःमन्वन्तरोंका वर्णन33 श्लोक
पृष्ठ 905 - 2अथ द्वितीयोऽध्यायःग्राहके द्वारा गजेन्द्रका पकड़ा जाना33 श्लोक
पृष्ठ 909 - 3अथ तृतीयोऽध्यायःगजेन्द्रके द्वारा भगवान्की स्तुति और उसका संकटसे मुक्त होना33 श्लोक
पृष्ठ 913 - 4अथ चतुर्थोऽध्यायःगज और ग्राहका पूर्वचरित्र तथा उनका उद्धार26 श्लोक
पृष्ठ 918 - 5अथ पञ्चमोऽध्यायःदेवताओंका ब्रह्माजीके पास जाना और ब्रह्माकृत भगवान्की स्तुति50 श्लोक
पृष्ठ 922 - 6अथ षष्ठोऽध्यायःदेवताओं और दैत्योंका मिलकर समुद्रमन्थनके लिये उद्योग करना39 श्लोक
पृष्ठ 929 - 7अथ सप्तमोऽध्यायःसमुद्रमन्थनका आरम्भ और भगवान् शंकरका विषपान46 श्लोक
पृष्ठ 934 - 8अथाष्टमोऽध्यायःसमुद्रसे अमृतका प्रकट होना और भगवान्का मोहिनी-अवतार ग्रहण करना46 श्लोक
पृष्ठ 940 - 9अथ नवमोऽध्यायःमोहिनीरूपसे भगवान्के द्वारा अमृत बाँटा जाना29 श्लोक
पृष्ठ 947 - 10अथ दशमोऽध्यायःदेवासुर-संग्राम57 श्लोक
पृष्ठ 951 - 11अथैकादशोऽध्यायःदेवासुर-संग्रामकी समाप्ति48 श्लोक
पृष्ठ 957 - 12अथ द्वादशोऽध्यायःमोहिनीरूपको देखकर महादेवजीका मोहित होना47 श्लोक
पृष्ठ 963 - 13अथ त्रयोदशोऽध्यायःआगामी सात मन्वन्तरोंका वर्णन36 श्लोक
पृष्ठ 968 - 14अथ चतुर्दशोऽध्यायःमनु आदिके पृथक्-पृथक् कर्मोंका निरूपण11 श्लोक
पृष्ठ 972 - 15अथ पञ्चदशोऽध्यायःराजा बलिकी स्वर्गपर विजय36 श्लोक
पृष्ठ 974 - 16अथ षोडशोऽध्यायःकश्यपजीके द्वारा अदितिको पयोव्रतका उपदेश62 श्लोक
पृष्ठ 978 - 17अथ सप्तदशोऽध्यायःभगवान्का प्रकट होकर अदितिको वर देना28 श्लोक
पृष्ठ 985 - 18अथाष्टादशोऽध्यायःवामनभगवान्का प्रकट होकर राजा बलिकी यज्ञशालामें पधारना32 श्लोक
पृष्ठ 987 - 19अथैकोनविंशोऽध्यायःभगवान् वामनका बलिसे तीन पग पृथ्वी माँगना, बलिका वचन देना और शुक्राचार्यजीका उन्हें रोकना43 श्लोक
पृष्ठ 992 - 20अथ विंशोऽध्यायःभगवान् वामनजीका विराट्रूप होकर दो ही पगसे पृथ्वी और स्वर्गको नाप लेना34 श्लोक
पृष्ठ 998 - 21अथैकविंशोऽध्यायःबलिका बाँधा जाना34 श्लोक
पृष्ठ 1002 - 22अथ द्वाविंशोऽध्यायःबलिके द्वारा भगवान्की स्तुति और भगवान्का उसपर प्रसन्न होना36 श्लोक
पृष्ठ 1005 - 23अथ त्रयोविंशोऽध्यायःबलिका बन्धनसे छूटकर सुतललोकको जाना31 श्लोक
पृष्ठ 1011 - 24अथ चतुर्विंशोऽध्यायःभगवान्के मत्स्यावतारकी कथा61 श्लोक
पृष्ठ 1013
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥