श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.10.11

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

सत्सङ्गान्मुक्तदुःसङ्गो हातुं नोत्सहते बुधः।

कीर्त्यमानं यशो यस्य सकृदाकर्ण्य रोचनम्॥ ११

satsaṅgānmuktaduḥsaṅgo hātuṃ notsahate budhaḥ|

kīrtyamānaṃ yaśo yasya sakṛdākarṇya rocanam|| 11

अर्थ

भगवद्भक्त सत्पुरुषोंके संगसे जिसका दुःसंग छूट गया है, वह विचारशील पुरुष भगवान्‌के मधुर-मनोहर सुयशको एक बार भी सुन लेनेपर फिर उसे छोड़नेकी कल्पना भी नहीं करता। उन्हीं भगवान्‌के दर्शन तथा स्पर्शसे, उनके साथ आलाप करनेसे तथा साथ-ही-साथ सोने, उठने-बैठने और भोजन करनेसे जिनका सम्पूर्ण हृदय उन्हें समर्पित हो चुका था, वे पाण्डव भला, उनका विरह कैसे सह सकते थे॥ ११-१२॥✎ 75 76

यह अर्थ श्लोक 11–12 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #75 शब्दोंके बीचका स्थान: कोदेखते → को देखते
  • #76 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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