श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.10.14

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

न्यरुन्धन्‍नुद्गलद‍्बाष्पमौत्कण्ठ्याद्देवकीसुते।

निर्यात्यगारान्‍नोऽभद्रमिति स्याद‍्बान्धवस्त्रियः॥ १४

nyarundhannudgaladbāṣpamautkaṇṭhyāddevakīsute|

niryātyagārānno'bhadramiti syādbāndhavastriyaḥ|| 14

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्णके घरसे चलते समय उनके बन्धुओंकी स्त्रियोंके नेत्र उत्कण्ठावश उमड़ते हुए आँसुओंसे भर आये; परंतु इस भयसे कि कहीं यात्राके समय अशकुन न हो जाय, उन्होंने बड़ी कठिनाईसे उन्हें रोक लिया॥ १४॥✎ 75 76

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #75 शब्दोंके बीचका स्थान: कोदेखते → को देखते
  • #76 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें