॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 1.10.23
स वा अयं यत्पदमत्र सूरयो जितेन्द्रिया निर्जितमातरिश्वनः।
पश्यन्ति भक्त्युत्कलितामलात्मना नन्वेष सत्त्वं परिमार्ष्टुमर्हति॥ २३
sa vā ayaṃ yatpadamatra sūrayo jitendriyā nirjitamātariśvanaḥ|
paśyanti bhaktyutkalitāmalātmanā nanveṣa sattvaṃ parimārṣṭumarhati|| 23
अर्थ
इस जगत्में जिसके स्वरूपका साक्षात्कार जितेन्द्रिय योगी अपने प्राणोंको वशमें करके भक्तिसे प्रफुल्लित निर्मल हृदयमें किया करते हैं, ये श्रीकृष्ण वही साक्षात् परब्रह्म हैं। वास्तवमें इन्हींकी भक्तिसे अन्तःकरणकी पूर्ण शुद्धि हो सकती है, योगादिके द्वारा नहीं॥ २३॥