श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.11.14

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

सम्मार्जितमहामार्गरथ्यापणकचत्वराम्।

सिक्तां गन्धजलैरुप्तां फलपुष्पाक्षताङ्कुरैः॥ १४

sammārjitamahāmārgarathyāpaṇakacatvarām|

siktāṃ gandhajalairuptāṃ phalapuṣpākṣatāṅkuraiḥ|| 14

अर्थ

उसके राजमार्ग, अन्यान्य सड़कें, बाजार और चौक झाड़-बुहारकर सुगन्धित जलसे सींच दिये गये थे और भगवान्‌के स्वागतके लिये बरसाये हुए फल-फूल, अक्षत-अंकुर चारों ओर बिखरे हुए थे॥ १४॥✎ 79

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #79 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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