श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.11.16

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

निशम्य प्रेष्ठमायान्तं वसुदेवो महामनाः।

अक्रूरश्चोग्रसेनश्‍च रामश्चाद्भुतविक्रमः॥ १६

niśamya preṣṭhamāyāntaṃ vasudevo mahāmanāḥ|

akrūraścograsenaśca rāmaścādbhutavikramaḥ|| 16

अर्थ

उदारशिरोमणि वसुदेव, अक्रूर, उग्रसेन, अद्भुत पराक्रमी बलराम, प्रद्युम्न, चारुदेष्ण और जाम्बवतीनन्दन साम्बने जब यह सुना कि हमारे प्रियतम भगवान् श्रीकृष्ण आ रहे हैं, तब उनके मनमें इतना आनन्द उमड़ा कि उन लोगोंने अपने सभी आवश्यक कार्य—सोना, बैठना और भोजन आदि छोड़ दिये। प्रेमके आवेगसे उनका हृदय उछलने लगा। वे मंगलशकुनके लिये एक गजराजको आगे करके स्वस्त्ययनपाठ करते हुए और मांगलिक सामग्रियोंसे सुसज्जित ब्राह्मणोंको साथ लेकर चले। शंख और तुरही आदि बाजे बजने लगे और वेदध्वनि होने लगी। वे सब हर्षित होकर रथोंपर सवार हुए और बड़ी आदरबुद्धिसे भगवान्‌की अगवानी करने चले॥ १६—१८॥✎ 80 81

यह अर्थ श्लोक 16–18 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #80 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #81 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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