॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 1.11.22
प्रह्वा७भिवादनाश्लेषकरस्पर्शस्मितेक्षणैः ।
आश्वास्य चाश्वपाकेभ्यो वरैश्चाभिमतैर्विभुः॥ २२
prahvābhivādanāśleṣakarasparśasmitekṣaṇaiḥ |
āśvāsya cāśvapākebhyo varaiścābhimatairvibhuḥ|| 22
अर्थ
किसीको सिर झुकाकर प्रणाम किया, किसीको वाणीसे अभिवादन किया, किसीको हृदयसे लगाया, किसीसे हाथ मिलाया, किसीकी ओर देखकर मुसकरा भर दिया और किसीको केवल प्रेमभरी दृष्टिसे देख लिया। जिसकी जो इच्छा थी, उसे वही वरदान दिया। इस प्रकार चाण्डालपर्यन्त सबको संतुष्ट करके गुरुजन, सपत्नीक ब्राह्मण और वृद्धोंका तथा दूसरे लोगोंका भी आशीर्वाद ग्रहण करते एवं वंदीजनोंसे विरुदावली सुनते हुए सबके साथ भगवान् श्रीकृष्णने नगरमें प्रवेश किया॥ २२-२३॥
टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—बान्धवानथ आश्लिष्य।