श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.11.22

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

प्रह्वा७भिवादनाश्लेषकरस्पर्शस्मितेक्षणैः ।

आश्वास्य चाश्‍वपाकेभ्यो वरैश्चाभिमतैर्विभुः॥ २२

prahvābhivādanāśleṣakarasparśasmitekṣaṇaiḥ |

āśvāsya cāśvapākebhyo varaiścābhimatairvibhuḥ|| 22

अर्थ

किसीको सिर झुकाकर प्रणाम किया, किसीको वाणीसे अभिवादन किया, किसीको हृदयसे लगाया, किसीसे हाथ मिलाया, किसीकी ओर देखकर मुसकरा भर दिया और किसीको केवल प्रेमभरी दृष्टिसे देख लिया। जिसकी जो इच्छा थी, उसे वही वरदान दिया। इस प्रकार चाण्डालपर्यन्त सबको संतुष्ट करके गुरुजन, सपत्नीक ब्राह्मण और वृद्धोंका तथा दूसरे लोगोंका भी आशीर्वाद ग्रहण करते एवं वंदीजनोंसे विरुदावली सुनते हुए सबके साथ भगवान् श्रीकृष्णने नगरमें प्रवेश किया॥ २२-२३॥

यह अर्थ श्लोक 22–23 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

टिप्पणियाँ

  1. ७

    प्रा० पा०—बान्धवानथ आश्लिष्य।

    (मुद्रित पृष्ठ 132)

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें