श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.11.9

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

यर्ह्यम्बुजाक्षापससार भो भवान् कुरून् मधून् वाथ सुहृद‍्दिदृक्षया।

तत्राब्दकोटिप्रतिमः क्षणो भवेद् रविं विनाक्ष्णोरिव नस्तवाच्युत१॥ ९

yarhyambujākṣāpasasāra bho bhavān kurūn madhūn vātha suhṛddidṛkṣayā|

tatrābdakoṭipratimaḥ kṣaṇo bhaved raviṃ vinākṣṇoriva nastavācyuta|| 9

अर्थ

कमलनयन श्रीकृष्ण! जब आप अपने बन्धु-बान्धवोंसे मिलनेके लिये हस्तिनापुर अथवा मथुरा (व्रजमण्डल) चले जाते हैं, तब आपके बिना हमारा एक-एक क्षण कोटि-कोटि वर्षोंके समान लम्बा हो जाता है। आपके बिना हमारी दशा वैसी हो जाती है, जैसे सूर्यके बिना आँखोंकी॥ ९॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—प्राचीन प्रतिमें नवम श्लोकके बाद एक श्लोक अधिक है, जो इस प्रकार है—‘कथं
    वयं नाथ चिरोषिते त्वयि प्रसन्‍नदृष्ट्याखिलतापशोषणम्। जीवाम ते सुन्दरहासशोभितमपश्यमाना वदनं मनोहरम्॥’

    (मुद्रित पृष्ठ 131)

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें