श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.12.32

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

यक्ष्यमाणोऽश्‍वमेधेन ज्ञातिद्रोहजिहासया।

राजालब्धधनो द२ध्यावन्यत्र करदण्डयोः॥ ३२

yakṣyamāṇo'śvamedhena jñātidrohajihāsayā|

rājālabdhadhano dadhyāvanyatra karadaṇḍayoḥ|| 32

अर्थ

इसी समय स्वजनोंके वधका प्रायश्चित्त करनेके लिये राजा युधिष्ठिरने अश्‍वमेधयज्ञके द्वारा भगवान्‌की आराधना करनेका विचार किया, परन्तु प्रजासे वसूल किये हुए कर और दण्ड (जुर्माने)-की रकमके अतिरिक्त और धन न होनेके कारण वे बड़ी चिन्तामें पड़ गये॥ ३२॥✎ 87 88

टिप्पणियाँ

  1. २

    दध्यौ नान्यत्र।

    (मुद्रित पृष्ठ 138)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #87 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #88 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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