ओह! इस प्राणीको जीवित रहनेकी कितनी प्रबल इच्छा होती है! इसीके कारण तो आप भीमका दिया हुआ टुकड़ा खाकर कुत्तेका-सा जीवन बिता रहे हैं॥ २२॥✎ 8990
अहो महीयसी जन्तोर्जीविताशा यया भवान्।
भीमापवर्जितं पिण्डमादत्ते गृहपालवत्॥ २२
ओह! इस प्राणीको जीवित रहनेकी कितनी प्रबल इच्छा होती है! इसीके कारण तो आप भीमका दिया हुआ टुकड़ा खाकर कुत्तेका-सा जीवन बिता रहे हैं॥ २२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.13.22 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 141) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/13/22/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)