श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.13.29

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

पतिं प्रयान्तं सुबलस्य पुत्री पतिव्रता चानुजगाम साध्वी।

हिमालयं न्यस्तदण्डप्रहर्षं मनस्विनामिव सत्सम्प्रहारः॥ २९

patiṃ prayāntaṃ subalasya putrī pativratā cānujagāma sādhvī|

himālayaṃ nyastadaṇḍapraharṣaṃ manasvināmiva satsamprahāraḥ|| 29

अर्थ

जब परम पतिव्रता सुबलनन्दिनी गान्धारीने देखा कि मेरे पतिदेव तो उस हिमालयकी यात्रा कर रहे हैं जो संन्यासियोंको वैसा ही सुख देता है जैसा वीर पुरुषोंको लड़ाईके मैदानमें अपने शत्रुके द्वारा किये हुए न्यायोचित प्रहारसे होता है। तब वे भी उनके पीछे-पीछे चल पड़ीं॥ २९॥

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