॥ श्रीहरिः ॥
तत्र सञ्जयमासीनं पप्रच्छोद्विग्नमानसः।
गावल्गणे क्व नस्तातो३ वृद्धो हीनश्च नेत्रयोः॥ ३१✎ 1876
tatra sañjayamāsīnaṃ papracchodvignamānasaḥ|
gāvalgaṇe kva nastāto vṛddho hīnaśca netrayoḥ|| 31
अर्थ
युधिष्ठिरने उद्विग्नचित्त होकर वहीं बैठे हुए संजयसे पूछा—‘संजय! मेरे वे वृद्ध और नेत्रहीन पिता धृतराष्ट्र कहाँ हैं?॥ ३१॥
तत्र सञ्जयमासीनं पप्रच्छोद्विग्नमानसः।
गावल्गणे क्व नस्तातो वृद्धो हीनश्च नेत्रयोः॥ ३१
युधिष्ठिरने उद्विग्नचित्त होकर वहीं बैठे हुए संजयसे पूछा—‘संजय! मेरे वे वृद्ध और नेत्रहीन पिता धृतराष्ट्र कहाँ हैं?॥ ३१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.13.31 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 142) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/13/31/टिप्पणियाँ
- ३
प्रा० पा०—यातोऽसौ।
(मुद्रित पृष्ठ 142)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
- #1876 अक्षर (एक स्थानपर, प्रमाणसहित): गावल्गणेक् → गावल्गणे क्