श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.13.31

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

तत्र सञ्जयमासीनं पप्रच्छोद्विग्नमानसः।

गावल्गणे क्‍व नस्तातो३ वृद्धो हीनश्‍च नेत्रयोः॥ ३१✎ 1876

tatra sañjayamāsīnaṃ papracchodvignamānasaḥ|

gāvalgaṇe kva nastāto vṛddho hīnaśca netrayoḥ|| 31

अर्थ

युधिष्ठिरने उद्विग्नचित्त होकर वहीं बैठे हुए संजयसे पूछा—‘संजय! मेरे वे वृद्ध और नेत्रहीन पिता धृतराष्ट्र कहाँ हैं?॥ ३१॥

टिप्पणियाँ

  1. ३

    प्रा० पा०—यातोऽसौ।

    (मुद्रित पृष्ठ 142)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1876 अक्षर (एक स्थानपर, प्रमाणसहित): गावल्गणेक् → गावल्गणे क्

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