श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.13.44

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

तस्माज्जह्यङ्ग वैक्लव्यमज्ञानकृतमात्मनः।

कथं त्वनाथाः कृपणा वर्तेरंस्ते च मां विना॥ ४४

tasmājjahyaṅga vaiklavyamajñānakṛtamātmanaḥ|

kathaṃ tvanāthāḥ kṛpaṇā varteraṃste ca māṃ vinā|| 44

अर्थ

इसलिये धर्मराज! वे दीन-दुःखी चाचा-चाची असहाय अवस्थामें मेरे बिना कैसे रहेंगे, इस अज्ञानजन्य मनकी विकलताको छोड़ दो ॥ ४४॥✎ 91

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #91 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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