॥ श्रीहरिः ॥
विदुरस्तु तदाश्चर्यं निशाम्य कुरुनन्दन।
हर्षशोकयुतस्तस्माद् गन्ता तीर्थनिषेवकः॥ ५८
vidurastu tadāścaryaṃ niśāmya kurunandana|
harṣaśokayutastasmād gantā tīrthaniṣevakaḥ|| 58
अर्थ
धर्मराज! विदुरजी अपने भाईका आश्चर्यमय मोक्ष देखकर हर्षित और वियोग देखकर दुःखित होते हुए वहाँसे तीर्थ-सेवनके लिये चले जायँगे॥ ५८॥✎ 92
विदुरस्तु तदाश्चर्यं निशाम्य कुरुनन्दन।
हर्षशोकयुतस्तस्माद् गन्ता तीर्थनिषेवकः॥ ५८
धर्मराज! विदुरजी अपने भाईका आश्चर्यमय मोक्ष देखकर हर्षित और वियोग देखकर दुःखित होते हुए वहाँसे तीर्थ-सेवनके लिये चले जायँगे॥ ५८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.13.58 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 145) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/13/58/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
- #92 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्की