श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.14.18

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

नद्यो नदाश्‍च क्षुभिताः सरांसि च मनांसि च।

न ज्वलत्यग्‍निराज्येन कालोऽयं किं विधास्यति॥ १८

nadyo nadāśca kṣubhitāḥ sarāṃsi ca manāṃsi ca|

na jvalatyagnirājyena kālo'yaṃ kiṃ vidhāsyati|| 18

अर्थ

नदी, नद, तालाब और लोगोंके मन क्षुब्ध हो रहे हैं। घीसे आग नहीं जलती। यह भयंकर काल न जाने क्या करेगा॥ १८॥✎ 93

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #93 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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