na jvalatyagnirājyena kālo'yaṃ kiṃ vidhāsyati|| 18
अर्थ
नदी, नद, तालाब और लोगोंके मन क्षुब्ध हो रहे हैं। घीसे आग नहीं जलती। यह भयंकर काल न जाने क्या करेगा॥ १८॥✎ 93
नद्यो नदाश्च क्षुभिताः सरांसि च मनांसि च।
न ज्वलत्यग्निराज्येन कालोऽयं किं विधास्यति॥ १८
नदी, नद, तालाब और लोगोंके मन क्षुब्ध हो रहे हैं। घीसे आग नहीं जलती। यह भयंकर काल न जाने क्या करेगा॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.14.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 147) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/14/18/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)