श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.14.39

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

कच्चित्तेऽनामयं तात भ्रष्टतेजा विभासि मे।

अलब्धमानोऽवज्ञातः किं वा तात चिरोषितः॥ ३९

kaccitte'nāmayaṃ tāta bhraṣṭatejā vibhāsi me|

alabdhamāno'vajñātaḥ kiṃ vā tāta ciroṣitaḥ|| 39

अर्थ

भाई अर्जुन! यह भी बताओ कि तुम स्वयं तो कुशलसे हो न? मुझे तुम श्रीहीन-से दीख रहे हो; वहाँ बहुत दिनोंतक रहे, कहीं तुम्हारे सम्मानमें तो किसी प्रकारकी कमी नहीं हुई? किसीने तुम्हारा अपमान तो नहीं कर दिया?॥ ३९॥✎ 1859

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1859 अक्षर (एक स्थानपर, प्रमाणसहित): ४३़॥ → ४३॥

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