श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.14.42

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

कच्चित्त्वं नागमोऽगम्यां गम्यां वासत्कृतां स्त्रियम्।

पराजितो वाथ भवान्‍नोत्तमैर्नासमैः पथि॥ ४२

kaccittvaṃ nāgamo'gamyāṃ gamyāṃ vāsatkṛtāṃ striyam|

parājito vātha bhavānnottamairnāsamaiḥ pathi|| 42

अर्थ

कहीं तुमने अगम्या स्त्रीसे समागम तो नहीं किया? अथवा गमन करनेयोग्य स्त्रीके साथ असत्कारपूर्वक समागम तो नहीं किया? कहीं मार्गमें अपनेसे छोटे अथवा बराबरीवालोंसे हार तो नहीं गये?॥ ४२॥✎ 1859

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1859 अक्षर (एक स्थानपर, प्रमाणसहित): ४३़॥ → ४३॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें