श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.15.14

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

यद‍्बान्धवः कुरुबलाब्धिमनन्तपार-

मेको रथेन ततरेऽहमतार्यसत्त्वम्।

प्रत्याहृतं बहु१ धनं च मया परेषां

तेजास्पदं मणिमयं च हृतं शिरोभ्यः॥ १४

yadbāndhavaḥ kurubalābdhimanantapāra-

meko rathena tatare'hamatāryasattvam|

pratyāhṛtaṃ bahu dhanaṃ ca mayā pareṣāṃ

tejāspadaṃ maṇimayaṃ ca hṛtaṃ śirobhyaḥ|| 14

अर्थ

महाराज! कौरवोंकी सेना भीष्म-द्रोण आदि अजेय महामत्स्योंसे पूर्ण अपार समुद्रके समान दुस्तर थी, परंतु उनका आश्रय ग्रहण करके अकेले ही रथपर सवार हो मैं उसे पार कर गया। उन्हींकी सहायतासे, आपको याद होगा, मैंने शत्रुओंसे राजा विराटका सारा गोधन तो वापस ले ही लिया, साथ ही उनके सिरोंपरसे चमकते हुए मणिमय मुकुट तथा अंगोंके अलंकारतक छीन लिये थे॥ १४॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—पुरु।

    (मुद्रित पृष्ठ 153)

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