॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 1.15.21
तद्वै धनुस्त इषवः स रथो हयास्ते
सोऽहं रथी नृपतयो यत आनमन्ति।
सर्वं क्षणेन तदभूदसदीशरिक्तं
भस्मन् हुतं कुहकराद्धमिवोप्तमूष्याम्॥ २१
tadvai dhanusta iṣavaḥ sa ratho hayāste
so'haṃ rathī nṛpatayo yata ānamanti|
sarvaṃ kṣaṇena tadabhūdasadīśariktaṃ
bhasman hutaṃ kuhakarāddhamivoptamūṣyām|| 21
अर्थ
वही मेरा गाण्डीव धनुष है, वे ही बाण हैं, वही रथ है, वही घोड़े हैं और वही मैं रथी अर्जुन हूँ, जिसके सामने बड़े-बड़े राजालोग सिर झुकाया करते थे। श्रीकृष्णके बिना ये सब एक ही क्षणमें नहींके समान सारशून्य हो गये—ठीक उसी तरह, जैसे भस्ममें डाली हुई आहुति, कपटभरी सेवा और ऊसरमें बोया हुआ बीज व्यर्थ जाता है॥ २१॥✎ 99 100