श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.15.46

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

ते साधुकृतसर्वार्था१ ज्ञात्वाऽऽत्यन्तिकमात्मनः।

मनसा धारयामासुर्वैकुण्ठचरणाम्बुजम्॥ ४६

te sādhukṛtasarvārthā jñātvā''tyantikamātmanaḥ|

manasā dhārayāmāsurvaikuṇṭhacaraṇāmbujam|| 46

अर्थ

उन्होंने जीवनके सभी लाभ भलीभाँति प्राप्त कर लिये थे; इसलिये यह निश्‍चय करके कि भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमल ही हमारे परम पुरुषार्थ हैं, उन्होंने उन्हें हृदयमें धारण किया॥ ४६॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—सत्त्वार्थाः।

    (मुद्रित पृष्ठ 157)

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