श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.16.31

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

आत्मानं चानुशोचामि भवन्तं चामरोत्तमम्।

देवान् पितॄनृषीन् साधून् सर्वान् वर्णांस्तथाऽऽश्रमान्॥ ३१✎ 989

ātmānaṃ cānuśocāmi bhavantaṃ cāmarottamam|

devān pitṝnṛṣīn sādhūn sarvān varṇāṃstathā''śramān|| 31

अर्थ

अपने लिये, देवताओंमें श्रेष्ठ तुम्हारे लिये, देवता, पितर, ऋषि, साधु और समस्त वर्णों तथा आश्रमोंके मनुष्योंके लिये मैं शोकग्रस्त हो रही हूँ॥ ३१॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #989 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): पितृनृषीन् → पितॄनृषीन्

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