श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.16.33

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

तस्याहमब्जकुलिशाङ्कुशकेतुकेतैः

श्रीमत्पदैर्भगवतः समलङ्कृताङ्गी।

त्रीनत्यरोच उपलभ्य त३तो विभूतिं

लोकान् स मां व्यसृजदुत्स्मयतीं तदन्ते॥ ३३

tasyāhamabjakuliśāṅkuśaketuketaiḥ

śrīmatpadairbhagavataḥ samalaṅkṛtāṅgī|

trīnatyaroca upalabhya tato vibhūtiṃ

lokān sa māṃ vyasṛjadutsmayatīṃ tadante|| 33

अर्थ

जिनका कृपाकटाक्ष प्राप्त करनेके लिये ब्रह्मा आदि देवता भगवान्‌के शरणागत होकर बहुत दिनोंतक तपस्या करते रहे, वही लक्ष्मीजी अपने निवासस्थान कमलवनका परित्याग करके बड़े प्रेमसे जिनके चरणकमलोंकी सुभग छत्रछायाका सेवन करती हैं, उन्हीं भगवान्‌के कमल, वज्र, अंकुश, ध्वजा आदि चिह्नोंसे युक्त श्रीचरणोंसे विभूषित होनेके कारण मुझे महान् वैभव प्राप्त हुआ था और मेरी तीनों लोकोंसे बढ़कर शोभा हुई थी; परन्तु मेरे सौभाग्यका अब अन्त हो गया! भगवान्‌ने मुझ अभागिनीको छोड़ दिया! मालूम होता है मुझे अपने सौभाग्यपर गर्व हो गया था, इसीलिये उन्होंने मुझे यह दण्ड दिया है॥ ३२-३३॥✎ 106

यह अर्थ श्लोक 32–33 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

टिप्पणियाँ

  1. ३

    प्रा० पा०—तपोविभूतिं।

    (मुद्रित पृष्ठ 162)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #106 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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