श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.17.14

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

जनेऽनागस्यघं युञ्जन् सर्वतोऽस्य च मद्भयम्।

साधूनां भद्रमेव स्यादसाधुदमने कृते॥ १४

jane'nāgasyaghaṃ yuñjan sarvato'sya ca madbhayam|

sādhūnāṃ bhadrameva syādasādhudamane kṛte|| 14

अर्थ

जो किसी निरपराध प्राणीको सताता है, उसे चाहे वह कहीं भी रहे, मेरा भय अवश्य होगा। दुष्टोंका दमन करनेसे साधुओंका कल्याण ही होता है॥ १४॥

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