सूतजी कहते हैं—ऋषिश्रेष्ठ शौनकजी! धर्मका यह प्रवचन सुनकर सम्राट् परीक्षित् बहुत प्रसन्न हुए, उनका खेद मिट गया। उन्होंने शान्तचित्त होकर उनसे कहा—॥ २१॥
एवं धर्मे प्रवदति स सम्राड् द्विजसत्तम।
समाहितेन मनसा विखेदः पर्यचष्ट तम्॥ २१
सूतजी कहते हैं—ऋषिश्रेष्ठ शौनकजी! धर्मका यह प्रवचन सुनकर सम्राट् परीक्षित् बहुत प्रसन्न हुए, उनका खेद मिट गया। उन्होंने शान्तचित्त होकर उनसे कहा—॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.17.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 165) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/17/21/