अब आपका चौथा चरण केवल ‘सत्य’ ही बच रहा है। उसीके बलपर आप जी रहे हैं। असत्यसे पुष्ट हुआ यह अधर्मरूप कलियुग उसे भी ग्रास कर लेना चाहता है॥ २५॥✎ 107
इदानीं धर्म पादस्ते सत्यं निर्वर्तयेद्यतः।
तं जिघृक्षत्यधर्मोऽयमनृतेनैधितः कलिः॥ २५
अब आपका चौथा चरण केवल ‘सत्य’ ही बच रहा है। उसीके बलपर आप जी रहे हैं। असत्यसे पुष्ट हुआ यह अधर्मरूप कलियुग उसे भी ग्रास कर लेना चाहता है॥ २५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.17.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 165) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/17/25/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)