श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.17.30

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

पतितं पादयोर्वीक्ष्य कृपया दीनवत्सलः।

शरण्यो नावधीच्छ्लोक्य आह चेदं हसन्‍निव॥ ३०

patitaṃ pādayorvīkṣya kṛpayā dīnavatsalaḥ|

śaraṇyo nāvadhīcchlokya āha cedaṃ hasanniva|| 30

अर्थ

परीक्षित् बड़े यशस्वी, दीनवत्सल और शरणागतरक्षक थे। उन्होंने जब कलियुगको अपने पैरोंपर पड़े देखा तो कृपा करके उसको मारा नहीं, अपितु हँसते हुए-से उससे कहा॥ ३०॥

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