श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.18.21

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

अथापि यत्पादनखावसृष्टं

जगद्विरिञ्चोपहृतार्हणाम्भः ।

सेशं पुनात्यन्यतमो मुकुन्दात्

को नाम लोके भगवत्पदार्थः॥ २१

athāpi yatpādanakhāvasṛṣṭaṃ

jagadviriñcopahṛtārhaṇāmbhaḥ |

seśaṃ punātyanyatamo mukundāt

ko nāma loke bhagavatpadārthaḥ|| 21

अर्थ

ब्रह्माजीने भगवान्‌के चरणोंका प्रक्षालन करनेके लिये जो जल समर्पित किया था, वही उनके चरणनखोंसे निकलकर गंगाजीके रूपमें प्रवाहित हुआ। यह जल महादेवजीसहित सारे जगत‍्को पवित्र करता है। ऐसी अवस्थामें त्रिभुवनमें श्रीकृष्णके अतिरिक्त ‘भगवान्’ शब्दका दूसरा और क्या अर्थ हो सकता है॥ २१॥

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