श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.18.30

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

स१ तु ब्रह्मऋषेरंसे गतासुमुरगं रुषा।

विनिर्गच्छन्धनुष्कोट्या निधाय पुरमागमत्२॥ ३०

sa tu brahmaṛṣeraṃse gatāsumuragaṃ ruṣā|

vinirgacchandhanuṣkoṭyā nidhāya puramāgamat|| 30

अर्थ

वहाँसे लौटते समय उन्होंने क्रोधवश धनुषकी नोकसे एक मरा साँप उठाकर ऋषिके गलेमें डाल दिया और अपनी राजधानीमें चले आये॥ ३०॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—तस्य ब्रह्मर्षरंसे।

    (मुद्रित पृष्ठ 172)
  2. २

    प्रा० पा०—मागतः।

    (मुद्रित पृष्ठ 172)

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