श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.18.41

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

निशम्य शप्तमतदर्हं नरेन्द्रं

स ब्राह्मणो नात्मजमभ्यनन्दत्।

अहो बतांहो महदज्ञ ते कृत-

मल्पीयसि द्रोह उरुर्दमो धृतः॥ ४१

niśamya śaptamatadarhaṃ narendraṃ

sa brāhmaṇo nātmajamabhyanandat|

aho batāṃho mahadajña te kṛta-

malpīyasi droha ururdamo dhṛtaḥ|| 41

अर्थ

ब्रह्मर्षि शमीकने राजाके शापकी बात सुनकर अपने पुत्रका अभिनन्दन नहीं किया। उनकी दृष्टिमें परीक्षित् शापके योग्य नहीं थे। उन्होंने कहा—‘ओह, मूर्ख बालक! तूने बड़ा पाप किया! खेद है कि उनकी थोड़ी-सी गलतीके लिये तूने उनको इतना बड़ा दण्ड दिया॥ ४१॥

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