श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.18.50

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

प्रायशः साधवो लोके परैर्द्वन्द्वेषु योजिताः।

न व्यथन्ति न हृष्यन्ति यत आत्माऽगुणाश्रयः॥ ५०

prāyaśaḥ sādhavo loke parairdvandveṣu yojitāḥ|

na vyathanti na hṛṣyanti yata ātmā'guṇāśrayaḥ|| 50

अर्थ

महात्माओंका स्वभाव ही ऐसा होता है कि जगत‍्में जब दूसरे लोग उन्हें सुख-दुःखादि द्वन्द्वोंमें डाल देते हैं, तब भी वे प्रायः हर्षित या व्यथित नहीं होते; क्योंकि आत्माका स्वरूप तो गुणोंसे सर्वथा परे है॥ ५०॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे
विप्रशापोपलम्भनं नामाष्टादशोऽध्यायः॥ १८॥

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