na vyathanti na hṛṣyanti yata ātmā'guṇāśrayaḥ|| 50
अर्थ
महात्माओंका स्वभाव ही ऐसा होता है कि जगत्में जब दूसरे लोग उन्हें सुख-दुःखादि द्वन्द्वोंमें डाल देते हैं, तब भी वे प्रायः हर्षित या व्यथित नहीं होते; क्योंकि आत्माका स्वरूप तो गुणोंसे सर्वथा परे है॥ ५०॥
प्रायशः साधवो लोके परैर्द्वन्द्वेषु योजिताः।
न व्यथन्ति न हृष्यन्ति यत आत्माऽगुणाश्रयः॥ ५०
महात्माओंका स्वभाव ही ऐसा होता है कि जगत्में जब दूसरे लोग उन्हें सुख-दुःखादि द्वन्द्वोंमें डाल देते हैं, तब भी वे प्रायः हर्षित या व्यथित नहीं होते; क्योंकि आत्माका स्वरूप तो गुणोंसे सर्वथा परे है॥ ५०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.18.50 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 174) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/18/50/